प्रेमचंदः जीवन का लेखक पढ़िए कथा सम्राट की जयंती पर विवेक मिश्र का “विमर्श”

प्रेमचंद जीवन को गढ़ते हैं। एक ऐसे संसार को बनाते हैं जिसमें सब रह सकें। उनकी कहानियां मनुष्य की चरित गाथा हैं जिसमें सभी अपना चेहरा देख सकते हैं । मनुष्य को , गांव समाज और मानवीय जिजीविषा को समझने के लिए उनके यहां इतने जिंदा चरित्र हैं कि उस रोशनी में हर समय में मनुष्य होने के नाते हम अपनी दुनिया को रच और गढ़ सकते हैं। विमर्श – विवेक कुमार मिश्र
प्रेमचंद भारतीय ग्राम समाज के जीवन संसार को बहुत गहरे उतर कर अनुभव करते हैं। गांव का सच और मनुष्य मात्र के सच को अपने कथा भूमि में रखते हुए वे सीधे – सीधे उस जगह पर लें जाते हैं जहां से कहानी केवल कहने के लिए नहीं आती वल्कि उस सत्य से हमारा साक्षात्कार कराती है जिसे जानना और समझना जीवन संसार को जानना होता है। गांव की कथा उनके यहां जीवन संघर्ष की यात्रा है। संसार को समझने के लिए मानव कथा में होना और गांव में होना पूरी एक दुनिया है। यहां हाड़ मांस के वास्तविक आदमी हैं और सीधे व सरल अपनी प्रकृति के साथ रहते हैं। चालाकियां, बाजार और छल छद्म नहीं है यहां। ये अपने ढंग से सीधी – साधी दुनिया में जीवन जीना चाहते हैं पर यह भी नसीब नहीं हो पाता। बहुत मुश्किल से घर संसार की जीवन गाड़ी चलती है। ऐसे में मनुष्य की इच्छा और स्वप्न को कैसे पाया जाये , यह भी आसान नहीं है। मानवीय स्वप्न को समझने के लिए हमें गांव के संसार को जीना पड़ता है और इस जीने में मदद प्रेमचंद की कथा कहानियां करती हैं।
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प्रेमचंद के विषय क्या हैं ? संसार क्या हैं और जीवन स्थितियां क्या हैं ? यहीं न कि बेटा बीमार है और पिता अपने बेटे को लेकर डॉक्टर के यहां दिखाने जाता है । डॉक्टर चड्डा को गोल्फ खेलने जाना है । वह बीमार बेटे को नहीं देखता बहुत बिनती करने के बाद भी नहीं देखता, हताश निराश बूढ़ा पिता बीमार बेटे को लेकर घर जाता है और इलाज के बिना ही भगत का बेटा मर जाता है। बूढ़ा पिता जिस पर दुखों का पहाड़ टूट जाता है। मन मसोस कर रह जाता कि क्या करें? पर यहीं प्रेमचंद और कहानी करिश्माई ढंग से सामने आती है कि थोड़े दिनों बाद ही स्थितियां बदलती हैं। डॉक्टर चड्डा के बेटे को सांप डस लेता है। पूरे इलाके में आग की तरह यह खबर फैल जाती है। बूढ़े पिता भगत को भी सूचना पहुंचती है कि डाक्टर के बेटे को सांप ने काट लिया। यहां भगत को सांप का मंतर, जहर उतारना आता है। भगत सीधे डॉक्टर के घर जाता है भीड़ को चीरते हुए डॉ.चड्डा के बेटे को देखता है। उसकी नब्ज टटोलने के बाद …सांप का मंत्र मारना शुरू करता है। यह वहीं भगत है जिसके बीमार बेटे को डॉक्टर ने देखने से साफ मना कर दिया था। पर भगत जो सांप का मंत्र जानता है वह डॉक्टर के बेटे को जिंदा करता है । यह बड़े डॉक्टर और बूढ़े गरीब भगत के जीवन के प्रति सोच का अंतर है ।
एक के लिए अपना शौक बड़ा है भले जीवन चला जाये वहीं दूसरे के लिए जीवन को किसी भी स्थिति में क्यों न हो बचाना मूल्यवान है। यह जीवन के प्रति सोच और दुनिया को अपने अपने ढंग से देखने का नतीजा है कि एक के पास सब कुछ होते हुए भी वह बीमार को नहीं बचाता और दूसरा जिसके उपर दुखों का पहाड़ टूटा है वह मृत्यु की ओर जा रहे व्यक्ति को बचाने के लिए दौड़ पड़ता है । यहां पर कथाकार प्रेमचंद जो दुनिया रचते हैं उसमें बड़ा आदमी वह नहीं है जिसके पास धन दौलत है , जिसके बड़े शौंक हैं नहीं नहीं बड़ा वह है जो अभावों के बीच , दुखों के पहाड़ पर रहते हुए भी जीवन को बचाने के लिए न केवल दौड़ता है वल्कि जीवन को बचाता है । बूढ़ा भगत इस समय किसी भगवान की तरह सामने आता है । मानवीय वोध को जीवन की प्रेरणा बनाने का काम यह कहानी इस कला के साथ करती है कि संवेदना की अजस्र धार मानों फूट पड़ी हों । यह प्रेमचंद की संवेदना और प्रतिरोध का प्रमाण भी है कि जीवन को बचाने के लिए हमें किसी तरह के प्रतिशोध में नहीं आना चाहिए । किसी भी कीमत पर जीवन की रक्षा की जानी चाहिए । यह मानवता का संदेश है और यथार्थ की उस भूमि से संदेश सामने आता है कि यह सीधे मन पर , जीवन पर उतर जाता है ।
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बूढ़ा भगत गांव की भूमि से, अभाव की भूमि से मनुष्यता के लिए, जीवन के लिए दौड़ता है। अभाव, दुःख और संघर्ष कितना भी बड़ा क्यों न हो वह जीवन को बचाने के लिए सामने आता है। यह दुनिया केवल धन से नहीं चलती न अपनी ज़िद से चलती वल्कि मानवीय वोध और जीवन के प्रति सम्मान के भाव से चलती है। इस तरह प्रेमचंद जीवन को गढ़ते हैं। एक ऐसे संसार को बनाते हैं जिसमें सब रह सकें। उनकी कहानियां मनुष्य की चरित गाथा हैं जिसमें सभी अपना चेहरा देख सकते हैं । मनुष्य को , गांव समाज और मानवीय जिजीविषा को समझने के लिए उनके यहां इतने जिंदा चरित्र हैं कि उस रोशनी में हर समय में मनुष्य होने के नाते हम अपनी दुनिया को रच और गढ़ सकते हैं।
(विमर्श: लेखक- विवेक कुमार मिश्र)