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	<title>Ajay Singh Archives - TIS Media</title>
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	<description>हर अक्षर सच, हर खबर निष्पक्ष </description>
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	<title>Ajay Singh Archives - TIS Media</title>
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		<title>जब सुरज हुआ बूढ़ा तो जमीन छट-पटा उठी</title>
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		<pubDate>Sun, 02 May 2021 11:54:46 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>पिछले दो महीने से इस विषय पर लिखने की सोच रहा हूं। लेकिन लिखने में डर लग रहा था। कई बार लिखने को सोचा। हर बार बहुत दूर तक सोचकर रुक गया। दरअसल, जो बातें मैं कहने जा रहा हूं, उनका मेरे पास कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। होगा भी कैसे, अभी तक विज्ञान ने &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-ajay-singh-on-these-unusual-tragedies-happened-in-last-one-year/7684/">जब सुरज हुआ बूढ़ा तो जमीन छट-पटा उठी</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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				<img decoding="async" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/04/tismedia.in-Ajay-Singh.jpg" alt="अजय सिंह" class="author-avatar-img" width="111" height="111" />
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			<div class="author-info">
				<h4>अजय सिंह</h4>भारतीय जनसंचार संस्थान से अध्ययन करने के बाद सामाजिक व्यवहार एवं जनसंचार विषय पर निरंतर शोध में जुटे हैं।
			</div>
		</div>
	
<p>पिछले दो महीने से इस विषय पर लिखने की सोच रहा हूं। लेकिन लिखने में डर लग रहा था। कई बार लिखने को सोचा। हर बार बहुत दूर तक सोचकर रुक गया।</p>
<p>दरअसल, जो बातें मैं कहने जा रहा हूं, उनका मेरे पास कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। होगा भी कैसे, अभी तक विज्ञान ने इस विषय पर बहुत शोध ही नहीं किया है। स्टीफ़न हाकिंग जैसों ने भी इसपर कुछ नहीं कहा। मैंने बहुत खोजा, मिला नहीं। इस विषय पर उनका ध्यान ही नहीं गया। हो सकता है, समय न मिला हो। मनुष्य की आयु होती ही कितने साल है।</p>
<p>लेकिन अब वैश्विक परिस्थिति और त्राहिमाम देखते हुए शायद इसे व्यक्त करना ज़रूरी है। स्थितियां देखते हुए क्या पता, कल मैं खुद भी लिखने के लिए होऊं या न होऊं।</p>
<p>इससे पहले कि यह अछूता और अलिखित रहा जाए, आज लिखने जा रहा हूं। आप इसे स्वीकारने या नकारने के लिए ससम्मान पूरी तरह से स्वतंत्र हैं।</p>
<p>हालांकि, कई दार्शनिकों और खगोलशास्त्रियों ने इससे मिलती-जुलती बातें ज़रूर कही हैं। लेकिन इस आवश्यक विषय पर अबतक बहुत शोध नहीं हो सके। इस विषय पर उतना गहरा शोध नहीं हो सका, जितनी इसे ज़रूरत है।</p>
<p>आज लिखने जा रहा हूं। पढ़िएगा और समझने का प्रयास करिएगा। पोस्ट लंबा है। किसी किताब की तरह इसे पढ़ डालिएगा। ब्रम्हांड से संबंधित एक झलक आपको देखने को मिल सकती है। मैं पूरा प्रयास करूंगा कि चीज़ें आपको समझ में आ जाएं&#8230;</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/impact-on-women-due-to-covid-19-in-india/7669/"><strong>कोरोना काल और आधी आबादी का पूरा सच</strong></a></span></p>
<p>हम सब जानते हैं, हमारे ब्रम्हांड में कई गैलेक्सीज़ हैं। अभी तक 10^11 (यानी 100000000000) गैलेक्सीज की ही खोज हो पाई है। उसमें हमारी गैलेक्सी भी एक है। इसका नाम &#8216;मिल्की वे&#8217; है। हिंदी में इसे &#8216;आकाश गंगा&#8217; कहते हैं।</p>
<p>हमारी इस गैलेक्सी (आकाश गंगा) में भी अभी तक 10^11 तारों की खोज हो सकी है। यानी, अभी भी अनगिनत तारे खोजे जाने बाकी हैं।</p>
<p>हमारा सूर्य भी एक तारा ही है। सूर्य हमारी पृ्थ्वी से लगभग 6 लाख गुना बड़ा है। इसे ऐसे समझें कि सूर्य को अगर हम एक फुटबॉल मान लें तो, सूर्य में पृथ्वी जैसी 6 लाख छोटी गोलियां भरी जा सकती हैं। सूर्य से लाखों गुने बड़े तारे हमारी गैलेक्सी में हैं। ब्रम्हांड में तो और भी न जाने कितने बड़े-बड़े तारे होंगे।</p>
<p>इसी तरह से हमारा &#8216;सोलर सिस्टम&#8217; (हिंदी में सौरमंडल) सूर्य के चारों ओर चक्कर काट रहा है। इसमें नौ ग्रह (8 ग्रह और एक छूद्र ग्रह) शामिल हैं। ये सभी ग्रह सूर्य के चारों और चक्कर काट रहे हैं।</p>
<p>सभी ग्रह अलग-अलग त्रिज्या के वृत्त में थ्री-डायमेंशनल स्पेस में चक्कर काट रहे हैं। इसीलिए ये कभी आपस में टकराते नहीं हैं।</p>
<p>इसी तरह से, हमारा सूर्य भी किसी बड़े सिस्टम के चारों ओर (अपने सभी नौ पिंडों को लेकर) चक्कर काट रहा है। इसी तरह से वह बड़ा निकाय भी किसी दूसरे बड़े पिंड के चारो ओर चक्कर काट रहा है।</p>
<p>ब्रम्हांड में इस तरह के कई सूर्य हैं। लाखों-करोड़ों सूर्य हैं। वो सब भी इसी प्रक्रिया में गतिमान हैं।</p>
<p>यानी, पहला, दूसरे के चारों और चक्कर काट रहा है। फिर दूसरा, पहले को साथ लेकर किसी तीसरे के चारों और चक्कर काट रहा है। फिर तीसरा, पहले और दूसरे को साथ लेकर किसी चौथे के चारों और चक्कर काट रहा है।</p>
<p>इस तरह से यह क्रम चलता ही जा रहा है, चलता ही जा रहा है, चलता ही जा रहा है।</p>
<p>फिजिक्स की भाषा में, इसके पीछे गुरुत्वाकर्षण बल की ताक़त है। इस तरह से हमारा पूरा ब्रम्हांड भी एक अन्य ब्रम्हांड के चारों ओर चक्कर काट रहा है।</p>
<p>यहीं से मल्टीवर्स या बहुब्रम्हांड यानी एक से अधिक ब्रम्हांडों की परिकल्पना का अंकुरण होता है।</p>
<p>और एक-दूसरे के चारों ओर चक्कर लगाने के पीछे जो ऊर्जा है, वह दो पिंडों के बीच गुरुत्वाकर्षण बल की वज़ह से है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/senior-journalist-vikas-bahuguna-is-reviewing-the-situation-and-systems-of-corona-in-india/7665/">सरकार बहादुर! सांस लेने में दिक्कत है तो क्या ‘गर्व’ से सीना फुलाकर काम चलाएं</a></span></strong></span></p>
<p>दरअसल, हर एक कण, हर दूसरे कण को प्रभावित करता है। यहां तक कि धरती पर गिरा एक सूखा तिनका भी सूर्य और ब्रम्हांड के हर कण को प्रभावित कर रहा है। वो अलग बात है कि उसका प्रभाव बेहद कम है। इसलिए हम नग्न आखों से उसका असर देख नहीं पाते।</p>
<p>यानी, इस ब्रम्हांड में सब ऊर्जा का खेल है। सब ऊर्जा संतुलन का खेल है। कुछ भी मुक्त नहीं है। सब बंधे हैं। ब्रम्हांड, गैलेक्सी, सौरमंडल, सूर्य, पृथ्वी, हम, आप, वृक्ष, पशु, पक्षी और हर वो चीज जिसे आप सोच सकते हैं, कुछ भी यहां मुक्त नहीं है। सब किसी मशीन के पुर्ज़ों की तरह अपने-अपने फंक्शन में लगे हैं।</p>
<p>यहां तक कि सूर्य को पिता, धरती को माता और बाकी सबको धरती की संतान कहे जाने के पीछे भी अपना तर्क है। हम जानते हैं, सूर्य की वज़ह से धूप होता है। धूप की वज़ह से गर्मी बढ़ती है। गर्मी की वज़ह से वाष्पीकरण की प्रक्रिया होती है। वाष्पीकरण की प्रक्रिया की वज़ह से बादल बनते हैं। बादलों की वज़ह से बारिश होती है। बारिश की वज़ह से धरती पर जलचक्र संतुलन बना है। और इसी वज़ह से धरती हरी-भरी है। धरती पर प्रजनन की प्रक्रिया सतत चल रही है।</p>
<p>अगर सूर्य धीरे-धीरे बुझ जाए (जो होना तय है), तो धरती सूख जाएगी। धरती मृत हो जाएगी।</p>
<p>कहते हैं, ब्रम्हांड में अभी भी लाखों-करोड़ों सूर्य हैं। ब्रम्हांड में इससे पहले भी लाखों-करोड़ों सूर्य थे। वो धीरे-धीरे बुझ गये। वो पृथ्वियां भी मर गईं। आज वो सभी लाखों-करोड़ों पृथ्वियां सूखी मिट्टी का बड़ा सा गोला मात्र बनकर ब्रम्हांड में तैर रही हैं। उनका कोई इतिहास भी नहीं है। जब कुछ बचा ही नहीं तो इतिहास बताएगा कौन! यही गति इस धरती का होना तय है। अभी नहीं, कुछ लाख वर्षों बाद।</p>
<p>इस तरह से इस ब्रम्हांड में कुछ भी फ्री नहीं है। कुछ भी निरपेक्ष नहीं है। कुछ भी नहीं, कुछ भी नहीं। यहां तक कि हमारे-आपके विचार तक निरपेक्ष नहीं हैं।</p>
<p>आप अपना जीवन पथ ही मुड़कर देख लीजिए। आप पाएंगे, आज आप जो कुछ भी हैं, वहां आपको पहुंचाने में समय के बहाव और घटनाओं के स्टेयरिंग ने आपको वहां तक पहुंचाया है। आप तो बस किसी लिखी-लिखाई स्क्रिप्ट के अभिनेता मात्र बनकर रह गये।</p>
<p>कुल मिलाकर, इस ब्रम्हांड में कुछ भी मुक्त नहीं है। कुछ भी। एक तिनका भी सूर्य को प्रभावित करता है। सूर्य भी तिनके-तिनके को प्रभावित करता है।</p>
<p>यहां तक कि सूर्य दिन में दो-दो बार समुंदर को उठा-उठाकर पटक देता है, जिसे हम ज्वार-भाटा कहते हैं। हम देखते ही रह जाते हैं।</p>
<p>सोचिए, इतने अथाह समुंदर तक को जो सूरज प्रतिदिन दो बार उठाकर पटक देता है, आपको क्या लगता है, वह हमें-आपको प्रभावित नहीं करता है!</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/impact-of-increase-in-inflation-due-to-covid-19-in-india/7661/"><strong>ये कैसी विडंबना</strong><strong>, </strong><strong>महंगाई भी तिल-तिल मार रही !</strong></a></span></p>
<p>अब आते हैं, रोचक तथ्यों पर&#8230;</p>
<p>सूर्य पर हर ग्यारह वर्षों पर सोलर तूफान आते हैं। धब्बे बनते हैं। यह घटना जब-जब होती है, तब-तब धरती पर उथल-पुथल मचती है।</p>
<p>इसी तरह से सूर्य पर हर 90 वर्षों के अंतराल पर बड़े-बड़े विस्फोटक गुबार बनते हैं। धब्बे बनते हैं। गैसों के गुब्बारे बनते हैं। फिर फटते हैं। महाविस्फोट होते हैं। सूर्य के अणुओं और ऊर्जा का पोलराइजेशन (ध्रुवीकरण) होता है।</p>
<p>उपर्युक्त दोनों ही स्थितियों में हमारे सौर मंडल में ऊर्जा संतुलन बिगड़ता है। उथल-पुथल मचता है। पूरी धरती पर भौतिक परिस्थितियों के अलावा व्यक्ति विशेष की मानसिक स्थिति तक पर गहरा असर पड़ता है।</p>
<p>इन दोनों में से सबसे ख़तरनाक असर सूर्य पर 90 वर्ष में होने वाली घटनाएं डालती हैं। इस 90 वर्ष के पूरे होने के वर्षों में धरती पर महामारियां फैल सकती हैं। अकाल पड़ सकते हैं। एक के बाद एक दुर्घटनाएं हो सकती हैं। धरती भूकंपों से भर जाती है। विश्वयुद्ध हो सकते हैं। धरती पर आत्महत्याएं बढ़ती हैं। लोगों की मति मारी जाती है। धरती पर ना-ना प्रकार से त्रासदियां ही त्रासदियां आती हैं।</p>
<p>अगर आप देश-दुनिया से अपडेट रहते हैं, तो आप इस समय उपर्युक्त घटनाओं के उदाहरणों से भरे पड़े होंगे। कोरोना, निसर्ग, बेमौसम ओलावृष्टि, बर्फबारी, गैस लीक़, ऑयल प्लांट में आग, यूरोप के एक वित्तमंत्री का आत्महत्या कर लेना, एक के बाद लगातार भूकंप, टिड्डी दलों का हमला&#8230;ये सब अकारण ही नहीं हो रहे हैं। इसके पीछे वज़ह है। आख़िर, इससे पहले आपने एकसाथ इतनी त्रासदियों को कभी देखा??? नहीं ना&#8230;???</p>
<p>ओशो तो यहां तक कहते हैं कि इन वर्षों में पैदा होने वाले बच्चे (चाहे वो किसी भी जीव के हों) औसत रूप से कम प्रतिभाशाली होंगे। क्योंकि ये एक तरह से सूर्य के बूढ़ा होने का वर्ष है। इन वर्षों में धरती पर ऊर्जा कम होती है। धरती अलसायी हुई, सुस्त होती है। सूरज थका हुआ सा होता है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/128-journalists-died-in-last-one-year-out-of-which-77-journalists-died-in-april-2021/7594/"><strong>मुद्दा: आखिर क्यों काल के गाल में समा रहे हैं पत्रकार</strong><strong>, </strong><strong>सिर्फ अप्रैल महीने में </strong><strong>77 </strong><strong>की मौत</strong></a></span></p>
<p>इसके बाद सूरज फिर उभरना शुरू करता है। 45 वर्षों बाद सूरज फिर अपनी जवानी पर होता है। उस समय पूरी धरती (पूरा सौर मंडल) ऊर्जा से लबरेज़ होती है। उस समय धरती पर महापुरुषों के जन्म की संभावनाएं अधिकतम होती हैं।</p>
<p>अब पोस्ट बहुत लंबा हो चला है। इसके आगे के रोचक तथ्य अगले क्रम में लिखने का प्रयास करूंगा&#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-ajay-singh-on-these-unusual-tragedies-happened-in-last-one-year/7684/">जब सुरज हुआ बूढ़ा तो जमीन छट-पटा उठी</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>कोरोनाः एक आम डॉक्टर भी देश के काम आ सकता है, बशर्ते&#8230;</title>
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		<pubDate>Tue, 27 Apr 2021 07:23:28 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>सच तो यह है कि भारत में कोरोना की दूसरी लहर कम्युनिटी स्प्रेड कर चुकी है। अब कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग काम नहीं आने वाला। लेकिन राहत की बात यह है कि कोरोना में मृत्युदर कोई खास नहीं है। इससे अधिक तो लोग डेंगू, मलेरिया, टाइफॉयड में ही मर जाते हैं। अगर किडनी व फेफड़े से संबंधित बीमारियों, &#8230;</p>
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				<h4>अजय सिंह</h4>भारतीय जनसंचार संस्थान से अध्ययन करने के बाद सामाजिक व्यवहार एवं जनसंचार विषय पर निरंतर शोध में जुटे हैं।
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<p>सच तो यह है कि भारत में कोरोना की दूसरी लहर कम्युनिटी स्प्रेड कर चुकी है। अब कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग काम नहीं आने वाला। लेकिन राहत की बात यह है कि कोरोना में मृत्युदर कोई खास नहीं है। इससे अधिक तो लोग डेंगू, मलेरिया, टाइफॉयड में ही मर जाते हैं। अगर किडनी व फेफड़े से संबंधित बीमारियों, ब्लड प्रेशर, शुगर, कैंसर&#8230; जैसी बीमारियों से पीड़ित उम्रदराज़ मरीजों को छोड़कर बातें करें तो, इसमें मृत्युदर 1% से भी कम है। और दूसरी संतोष की बात यह कि कोरोना के इलाज़ में सर्जरी जैसे किसी बहुत तकनीकी और महंगी विधि की भी ज़रूरत नहीं है। इसके इलाज़ में एक आम डॉक्टर भी देश के काम आ सकता है। बशर्ते, उसे पीपीई किट्स, ऑक्सीजन सिलेंडर, ऑक्सीजन किट्स, रेमडिसिवियर इंजेक्शन समेत सभी अन्य दवाइयां&#8230; उपलब्ध करा दी जाएं। ऐसे में कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए सरकार दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ सिर्फ़ दो काम कर दे, तो इस लड़ाई को बहुत ही व्यवस्थित ढंग से जीता जा सकता है।</p>
<p>पहला: कैसे भी करके युद्ध स्तर पर पीपीई किट्स, ऑक्सीजन सिलेंडर, ऑक्सीजन किट्स, रेमडिसिवियर इंजेक्शन समेत सभी अन्य दवाइयों के उत्पादन को बढ़ा दे (अगर इन सबकी पर्याप्त उपलब्धता होगी तो कालाबाज़ारी भी नहीं होगी)&#8230;</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/when-rajasthan-will-be-free-from-corruption/7341/">जन-तंत्र का खून चूस रहे भ्रष्टाचार के पिस्सू !</a></span></strong></span></p>
<p>दूसरा: सभी निजी अस्पतालों व क्लीनिक्स को सरकारी नियंत्रण में लेकर (भले ही 2-3 महीनों के लिए अनुच्छेद 356 लागू करना पड़ जाए), वहां पीपीई किट्स, ऑक्सीजन सिलेंडर, ऑक्सीजन किट्स, रेमडिसिवियर इंजेक्शन समेत सभी अन्य दवाइयां न्यूनतम संभव कीमत (सब्सिडाइज्ड रेट) पर उपलब्ध कराये जाएं।</p>
<p>और उन सभी निजी अस्पतालों व क्लीनिक्स में कार्यरत और देशभर में पंजीकृत सभी निजी (लाखों की संख्या में) डॉक्टर्स को एक सप्ताह की विधिवत ट्रेनिग देकर, युद्ध स्तर पर लगा दिया जाए। इसके बाद किसी भी क्षेत्र के कोरोना मरीज़ को पास के ही सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी), सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्र (पीएचसी) या निजी अस्पताल या फिर किसी भी तरह के सार्वजनिक/निजी स्वास्थ्य केंद्रों में इलाज अनिवार्य कर दिया जाए&#8230; फिलहाल, कहने को यह भले बहुत आसान है। लेकिन इसे करने के लिए सरकार में बहुत ही दृढ़ इच्छाशक्ति और मज़बूत प्रशासनिक तंत्र व नागरिकों में राष्ट्र के प्रति एकजुटता की भावना ज़रूरी है&#8230;</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/district-control-room-of-rajasthan-not-able-to-help-the-corona-victims/7321/">माफ कीजिए सीएम साहब! आपके कंट्रोल रूम किसी काम के नहीं हैं&#8230;</a></span></strong></span></p>
<p>लॉकडाउन न लगाने का मतलब है, अर्थव्यवस्था न रुकने पाए, इसके लिए आर्थिक गतिविधियों से संबंधित आवश्यक क्षेत्र चालू रहें। लेकिन चुनाव, रैलियां, कुंभ, आईपीएल&#8230; इत्यादि क्या हैं??? पढ़ा था कि देश में माननीय सर्वोच्च न्यायालय और चुनाव आयोग जैसी &#8216;स्वतंत्र संस्थाएं&#8217; भी रहती हैं&#8230;!<br />
लॉकडाउन न लगाया जाए, ये समझ में आता है। लेकिन फिर ये बैंक खुलने के घंटों में कटौती, नाइट कर्फ्यू, साप्ताहिक कर्फ्यू&#8230; ये सब क्या हैं???<br />
इससे तो चालू घंटों में और भी भीड़ बढ़ेगी! हताशा बढ़ेगी। हड़बड़ाहट बढ़ेगी। संक्रमण और बढ़ेंगे। इन सबसे सिर्फ़ शासन मे बैठे लोगों की प्रशासनिक समझ व तालमेल का पता चल रहा है।</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/suggestions-to-control-covid-19-situation-in-india-by-ajay-singh/7345/">कोरोनाः एक आम डॉक्टर भी देश के काम आ सकता है, बशर्ते&#8230;</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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