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	<title>Article On West Bengal Elections Archives - TIS Media</title>
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	<description>हर अक्षर सच, हर खबर निष्पक्ष </description>
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	<title>Article On West Bengal Elections Archives - TIS Media</title>
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		<title>ममता ने मारा गोल, फाउल करके</title>
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		<pubDate>Tue, 04 May 2021 08:04:19 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>इसी परिवेश में ममता बनर्जी के चुनाव प्रबंधक प्रशान्त किशोर की उक्ति के भिन्न अभिप्रायों को समझना होगा। वे बोले : &#8221;भाजपा के जय श्रीराम के जवाब में चण्डीपाठ हमारा नारा था।&#8221; अर्थात् हिन्दू वोट हेतु ममता को बधोपाध्याय (बनर्जी का संस्कृत) बनना पड़ा। अपना विप्र वर्ण प्रचारित करना था। गोत्र शाण्डिल्य को उच्चारित करना &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-west-bengal-election-and-why-mamata-banerjee-is-not-appropriate-for-becoming-pm-of-india/7783/">ममता ने मारा गोल, फाउल करके</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>पश्चिम बंगाल विधानसभा में 2 मई 2021 संपन्न हुये मतदान के सिलसिले में कई पहलू उभरते है, कई वाजिब प्रश्न उठते हैं। इन पर राष्ट्र को गौर करना पड़ेगा यदि देश का फिर एक और विभाजन नहीं होने देना है तो। अगर सेक्युलर तथा उदार गणतंत्र संजोये रखना है तो। अर्थात् मजहब का सियासत में घालमेल रोकना है तो।
			</div>
		</div>
	
<p>इसी परिवेश में ममता बनर्जी के चुनाव प्रबंधक प्रशान्त किशोर की उक्ति के भिन्न अभिप्रायों को समझना होगा। वे बोले : &#8221;भाजपा के जय श्रीराम के जवाब में चण्डीपाठ हमारा नारा था।&#8221; अर्थात् हिन्दू वोट हेतु ममता को बधोपाध्याय (बनर्जी का संस्कृत) बनना पड़ा। अपना विप्र वर्ण प्रचारित करना था। गोत्र शाण्डिल्य को उच्चारित करना था। इसी श्रृंखला में नंदीग्राम में शिवालय जाना लाजिमी था। यहीं ममता पर भाजपा के कथित अराजक तत्वों ने उनकी कार का दरवाजा झटके से मारा था। उससे मुख्यमंत्री के टांग और नितम्ब पर चोट लगी थी। हड्डी घायल हो गयी थी। परिणाम स्वरुप ममता के बायें टांग पर प्लास्टर चढ़ाया गया। पहियेदार गाड़ी पर सवार होकर चुनाव प्रचार करना पड़ा। वोटरों की हमदर्दी बटोरने का यह बड़ा मारु साधन मिल गया था। हालांकि जिस दिन चुनाव परिणाम घोषित हुये तत्क्षण ममता भली चंगी हो गयीं। टांगों पर चलने लगी। सारा दर्द लुप्त हो गया। आखिरी वोट भी 53वें दिन पड़ चुका था। एक मिलती जुलती वारदात हुयी थी मार्च 1977 में जब अमेठी चुनाव क्षेत्र में गौरीगंज के आगे कांग्रेसी प्रत्याशी संजय गांधी पर गोली &#8221;चली&#8221; थी। हालांकि फिर भी संजय हार गये। हमदर्दी नहीं मिली। जांच में गोलीकाण्ड बनावटी पाया गया था।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-dr-pawan-saxena-on-west-bengal-election-and-indian-political-parties/7701/"><strong>अब दिल्ली आइये दीदी&#8230;</strong></a></span></p>
<p>ममता द्वारा चुनाव अभियान के दो तथ्यों पर हर पंथनिरपेक्ष और लोकतंत्रप्रेमियों का विचलित होना स्वाभाविक है। पश्चिम बंगाल के 27 प्रतिशत मुस्लिम वोट हेतु तृणमूल कांग्रेस ने जो प्रहसन रचा, वह बड़ा चिन्ताजनक है। ताज्जुब तो इस तथ्य पर होता है कि सात सदी पुराने फरफरा शरीफ (मौलाना अबू बकर सिद्दीकी) के वंशवाले जनाब पीरजादा अब्बासी सिद्दीकी द्वारा गठित (इंडियन सेक्युलर फ्रंट), वामपंथी और सोनिया—कांग्रेसी वाले महाजोत की अपील को नजरअंदाज कर मुसलमान मतदाताओं के बहुलांश ने तृणमूल कांग्रेस का समर्थन किया। इसका भावार्थ यही कि पश्चिम बंगाल के मुसलमानों का एजेण्डा है कि भारत के भीतर नया बांग्लादेश बने। तृणमूल कांग्रेस इन मुसलमानों का पहला प्यार साबित हुयी।</p>
<p>मजहब पर इतना जघन्य ध्रुवीकरण किसी भी चुनाव में आजतक नहीं हुआ। कई अर्थों में ममता ने इस आरोप को सही दिखाया कि वे देश—तोड़क तथा समाज—ध्वंसक अभियान से परहेज नहीं करेंगी। मुसलमान घुसपैठिये तो उनका वोट बैंक हैं ही। भाजपायी हिन्दुवाद का शायद उनका ऐसा ही जवाब था। पर घातक तो यह भारतीय राष्ट्रवाद के लिये रहा। इसी संदर्भ में एक नीति यह भी है कि पारम्परिक तौर पर चुनाव में पराजय की जिम्मेदारी स्वीकार कर पार्टी पुरोधा त्यागपत्र देता है। अमित शाह और जेपी नड्डा से ने पेशकश तक नहीं की।</p>
<p>अब अति महत्वपूर्ण मसला उठता है कि पराजित प्रत्याशी ममता बनर्जी क्या मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगी? कानूनन तो यह संभव है। संविधान की धारा 164(4) के अनुसार बिना सदन के सदस्य रहे छह माह तक मंत्री बने रह सकते हैं। अत: ममता बनर्जी भी मुख्यमंत्री भी शपथ ले सकतीं हैं। पर प्रश्न यहां नैतिकता का है। ममता तो नैतिकता की देवी होने का दावा करतीं हैं। आचार, व्यवहार और मर्यादा का तकाजा है कि वह जनादेश जीतकर ही मुख्यमंत्री पद संभाले। नन्दीग्राम के मतदाताओं द्वारा खारिज किये गये इस राजनेता को बंगाल के सर्वोच्च जनवादी पद पर नहीं बैठना चाहिये। वह वोटरों द्वारा परित्यक्ता है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-dr-vivek-mishra-on-covid-19-taught-us-how-we-should-behave-and-what-we-should-do-for-our-society/7697/"><strong>कोरोना से लड़ेगा इंडिया जीतेगा इंडिया: आओ मिलकर बेहतर जहान बनाएं</strong></a></span></p>
<p>हालांकि उनके पार्टीजन जवाहरलाल नेहरु का दृष्टांत पेश कर सकते हैं। इस लोकशाहीवाले सिद्धांत का उल्लंघन तब किया गया था। उनकी कांग्रेस पार्टी के नेता चन्द्रभानु गुप्ता को यूपी का मुख्यमंत्री बनाया। वे दो—दो बार यूपी विधानसभा का चुनाव हार चुके थे। पहली बार तो लखनऊ (पूर्व) से वे मार्च 1957 में कांग्रेस के प्रत्याशी बनकर लड़े थे। तब यूपी सरकार के काबीना मंत्री थे। उन्हें प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के बाबू त्रिलोकी सिंह ने हराया था। फिर बुन्देलखण्ड के मौदाहा रियासत की रानी साहिबा राजेन्द्र कुमारी को इन्ही प्रजा सोशलिस्टों ने उपचुनाव में लड़ाया और गुप्ताजी दोबारा हार गये। फिर भी प्रधानमंत्री नेहरु ने गुप्ताजी को नामित कर दिया। संपूर्णानन्द की जगह यूपी के मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलायी गयी। ऐसे कई उदाहरण कांग्रेस इतिहास से कई मिल जायेंगे। मगर प्रश्न रहेगा कि जनवादी सिद्धांत के अनुसार एक पराजित प्रत्याशी को मुख्यमंत्री बनना चाहिये? ममता से यही सवाल है, सदाचार के आधार पर।</p>
<p>अब कई निष्णात और ज्ञानीजन टीएमसी के पक्ष में अभूतपूर्व चुनावी चित्र रंग रहे हैं। उन्हें  ताजा आंकड़े भी देखना चाहिये। मतदान का गणित स्पष्ट हो जायेगा। ममता की पार्टी को पश्चिम बंगाल की विधानसभा में 2011 के चुनाव में 184 सीटें मिलीं थीं। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के साढ़े तीन दशक के राज का उन्होंने खात्मा किया था। फिर पिछले 2016 के चुनाव में तृणमूल के 211 विधायक रहे। कल के परिणाम में उन्हें 217 सीटें मिलीं हैं। पांच वर्षों में मात्र सात—आठ विधायक ही बढ़े हैं। वोट प्रतिशत भी 48 था जो 2016 की तुलना में मात्र पांच फीसदी ज्यादा था। तो क्या करिश्मा कर दिखाया ?</p>
<p>ममता ने निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर आरोप लगाया कि तीन रिटायर्ड सरकारी नौकर सदस्य नामित होकर मतदान का निर्णय करेंगे? तो इस बांग्ला राजनेता ममता बनर्जी के को याद दिला दिया जाये कि उनकी पुरानी पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राज में भारत के प्रधान न्यायाधीश थे सुधिरंजन दास, उनके दामाद थे नेहरु काबीना के कानून मंत्री अशोक कुमार सेन। उनके सगे भाई थे सुकुमार सेन जो मुख्य निर्वाचन आयुक्त थे। तीनों उच्च सरकारी पद एक ही कुटुम्ब में सीमित था। तब केवल राममनोहर लोहिया ने इस घृणास्पद वंशवाद का मसला उठाया था।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/five-decades-of-watergate-scandal/7600/"><strong>वॉटरगेट कांड: हिंदुस्तानी अखबारों में है इतना दम! जो सत्ता के शीर्ष को दे सके ऐसी चुनौती</strong></a></span></p>
<p>अखबारों की आज सुर्खियां हैं कि ममता के रुप में भारतीय प्रतिपक्ष को एक सर्वमान्य राष्ट्रस्तरीय पुरोधा मिल गया। वही पुरानी पत्रकारी अतिशयोक्ति। भला जो महिला बंगाल को ही राष्ट्र माने, उसे भारत से भी बड़ा समझे, क्या वह मलयाली, नागा, लदृाखी, पंजाबी आदि विविध राजनेताओं का समर्थन कभी हासिल कर पायेंगी ?  ऐसी क्षेत्रवादी प्रवृत्ति का नेता बस एक प्रदेश का होकर रह जाता है। समूचे भारत का कभी नहीं। बंगपुत्री ममता बनर्जी हुगली तट और बंगाल की खाड़ी के मध्यस्थल को ही अपनी दुनिया मानती है। याद आता है रेलमंत्री के पद पर रहते जब ममता बनर्जी बजाये रेल भवन मुख्यालय के, सियालदह स्टेशन से राष्ट्र के रेल के चलाती थीं। गोमुख से चली पवित्र भागीरथी बहते—बहते कोलकता पहुंचते हीं गंदली हुगली बन जाती है। फिर गंगासागर में समुद्र में गिरती है। मगर ममता इस गंगा को सिर्फ हुगली ही मानेंगी क्योंकि वह उनके राज्य में बस इतना ही भाग गंगा का बहता है। तो क्या ऐसी संकीर्णदिल महिला भारत की पीएम लायक होंगी?</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>(<span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://tismedia.in/">TIS Media</a></span> परिवार के संरक्षक<span style="color: #ff0000;"> <a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के. विक्रम राव</a> </span>का शुमार देश के नामचीन पत्रकारों में होता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उन्होंने इमरजेंसी तक में स्वतंत्र आवाज के लिए जेल यात्रा की। महीनों की सजाएं भुगती। श्री राव,  वॉयस ऑफ अमेरिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनोमिक टाइम्स, फिल्मफेयर और इलस्ट्रेटेड वीकली में प्रमुख पदों पर रहने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड के संस्थापक संपादक भी रह चुके हैं। प्रेस की नियामक संस्था &#8216;भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य रहने के अलावा मजीठिया वेतन बोर्ड और मणिसाना वेतन बोर्ड के सदस्य के तौर पर पत्रकारों के हित में लंबा संघर्ष किया है। <span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के.विक्रम राव</a>,</span> फिलहाल इंडियन फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट <span style="color: #ff0000;">#IFWJ</span> के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)</strong></span></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-west-bengal-election-and-why-mamata-banerjee-is-not-appropriate-for-becoming-pm-of-india/7783/">ममता ने मारा गोल, फाउल करके</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>अब दिल्ली आइये दीदी&#8230;</title>
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		<pubDate>Mon, 03 May 2021 08:48:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>लोकसभा चुनाव में मोदी के सामने संयुक्त विपक्ष का मजबूत चेहरा बनकर उभर सकती हैं ममता बनर्जी, मोदी के लिए वाटरलू बन सकता है बंगाल का चुनाव, अब सारी जिम्मेदारी यूपीए की  यह लेख एक पॉलिटिकल हाईपोथीसिस है यानी राजनीतिक परिकल्पना। जिसमें हम उपलब्ध तर्को, तथ्यों को जोड़कर एक सिरे में पिरोकर आगे की पटकथा &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-dr-pawan-saxena-on-west-bengal-election-and-indian-political-parties/7701/">अब दिल्ली आइये दीदी&#8230;</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
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				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>आज मेरा कौतुहल सीमित था। सिर्फ इतना कि बंगाल कौन जीतेगा। नतीजे आ गए। दीदी जीत गईं। आंकड़ों की गुणा-भाग को अलग से समझियेगा। मैं जरा जल्दी में हूं। भविष्य तलाशने की। हां, एक खास बात और – अगर आप लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष को नापसंद करते हैं तो यहां लिखी लाइनें शायद आपके लिए नहीं हैं। जब तक आप अपना पसंददीदा न्यूज चैनल देखिये, हम अपनी बात को आगे बढ़ाते हैं।
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		</div>
	
<h5><span style="color: #ff0000;">लोकसभा चुनाव में मोदी के सामने संयुक्त विपक्ष का मजबूत चेहरा बनकर उभर सकती हैं ममता बनर्जी, मोदी के लिए वाटरलू बन सकता है बंगाल का चुनाव, अब सारी जिम्मेदारी यूपीए की </span></h5>
<p>यह लेख एक पॉलिटिकल हाईपोथीसिस है यानी राजनीतिक परिकल्पना। जिसमें हम उपलब्ध तर्को, तथ्यों को जोड़कर एक सिरे में पिरोकर आगे की पटकथा को समझने की कोशिश करेंगे। दिल्ली का अश्वमेघ बंगाल में रुक गया है। फिलहाल। लेकिन क्या यह दिल्ली दरबार की हार है। सच कहें तो यह कहना सच नहीं। एक तो आज की दिल्ली आसानी से हार नहीं मानती, और दूसरा उसके पास कम से कम राजनीतिक मुद्दों के लिए ही सही पर हमेशा  प्लान ए, बी, सी, डी तो जरूर होता है। तीन सीटों वाली दो अंकों तक जा पहुंची है। बाम वाले राम हो गए हैं। सरकार भले ही ना बनी हो, पर बड़े कमाल तो मोदी सेना ने भी किए ही हैं। खैर, इन बारीकियों को फिर परखेंगे अभी तो बात देश की जमीन पर पड़े, अंतिम सांसे ले रहे जर्जर विपक्ष के पुनर्जीवन पर केंद्रित करते हैं।</p>
<p>कहते हैं घायल शेरनी की सांसे भी दहाड़ से तेज होती हैं। अपने जीवन का सबसे खूंरेंजी चुनाव लड़के घायल ममता लड़खड़ाते कदमों से ही सही तीसरी बार राइटर्स बिल्डिंग पहुंच गई हैं मगर क्या उनके सपनों में 7 लोक कल्याण मार्ग नहीं आता होगा। बताते चलें यह दिल्ली का वह पता है जहां प्रधानमंत्री रहते हैं और इसे पहले 7 रेसकोर्स कहा जाता था।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-dr-vivek-mishra-on-covid-19-taught-us-how-we-should-behave-and-what-we-should-do-for-our-society/7697/"><strong>कोरोना से लड़ेगा इंडिया जीतेगा इंडिया: आओ मिलकर बेहतर जहान बनाएं</strong></a></span></p>
<p>हो सकता है, आज यह अनुमान आपको थोड़ा ज्यादा लगे, अतिश्योक्त, लेकिन अगर हम एक – एक करके ममता बनर्जी के राजनीतिक ट्रेक को डीकोड करें तब समझ सकेंगे कि वह कैसी हैं और उनको दिल्ली क्यों पहुंचना चाहिए। थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं। जनवरी के जाड़े, तारीख दो जनवरी और सन् 1985, पश्चिम बंगाल से एक खबर आई – 29 साल की एक लड़की जिसका नाम ममता बनर्जी है, उसने बामपंथ के उस वक्त के सबसे बड़े दरख्त सोमनाथ चटर्जी को चुनाव हरा दिया है। चिल्ला जाड़ों में भी दिल्ली की सियासी जमात के माथे पर पसीना आ गया था। ममता बनर्जी की राजनीति की बुनियाद बामपंथ के विरोध पर खड़ी हो चुकी थी। 1996 कांग्रेस नेतृत्व यानी सीताराम केसरी ने सोमेन मित्रा को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया। दीदी उस वक्त युवक कांग्रेस की अध्यक्ष थीं। सोमेन बाबू से उनकी नहीं पटी। वजह थी सोमेन के बामपंथी दोस्त। वह अपने प्रदेश अध्यक्ष को तरबूज कहतीं, यानी बाहर से हरा और अंदर से लाल। सोमेन मित्रा सीताराम केसरी गुट से आते थे। केसरी मित्रा की मदद से दोबारा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए, यह महत्वाकांक्षी दीदी को पसंद नहीं था। जब कांग्रेस का 80 वां अधिवेशन कोलकाता में हुआ, सामने लाखों की भीड़ के साथ ममता की रैली हुई। ममता बनर्जी ने रैली में आने वाले हरेक को असली जमीनी कांग्रेसी बताया। यानी ग्रासरूट कांग्रेसी। यही से बनी तृणमूल कांग्रेस। कांग्रेस ने ममता को छह साल के लिए निकाल दिया, वह जार्ज फर्नाडीज के साथ मिलकर एनडीए में चली गईं। अटल जी की सरकार में मंत्री बनीं। यशवंत सिन्हा की बात मानें तो कांधार हाईजैक के वक्त उन्होंने खुद को मंत्री के रुप में आतंकियों को सौंप कर आम यात्रियों की रिहाई का प्रस्ताव भी दिया। आज के वक्त में अगर कोई ऐसा करता तब यह जोरदार ब्रांडिंग का मास्टर स्ट्रोक होता, खैर, वह वक्त ऐसा नहीं था।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/madeinkota/pride-of-kota/covid-care-center-at-kota-university-running-with-the-help-of-allen-career-institute-and-health-department/7694/"><strong>खुशनुमा और सकारात्मक माहौल से जीतेंगे जंग</strong></a></span></p>
<p>वह एनडीए में रहीं मगर सोनिया गांधी से उनके रिश्ते हमेशा गर्मजोशी से भरे रहे। सोनिया गांधी की मजबूरी यूपीए – वन में लेफ्ट लिबरल ताकतों का दबदबा था, जिसने ममता से दूरी को बनाये रखा। इसीलिए जब 2009 में कांग्रेस और लेफ्ट के रास्ते अलग हुए ममता फिर कांग्रेस के साथ आ गईं। वह गठजोड़ की राजनीति में माहिर हो चुकी थीं। 2011 में पश्चिम बंगाल (West Bengal) की जनता ने उनको राइटर्स बिल्डिंग पहुंचा दिया। वह मुख्यमंत्री बन गईं। पहली बार और फिर 2016 में दूसरी बार और अब 2021 में जीत – तीसरी बार।</p>
<p>चुनाव से ठीक पहले विभिन्न राजनीतिक दलों को भाजपा (BJP) विरोध के नाम पर जोड़ना। शरद पवार से मदद मांगना। ठीक चुनाव के बीच भाजपा की राजनीति के खिलाफ देश के प्रमुख विपक्षी दलों को चिट्ठी लिखना, यह बताता है कि उनका दिमाग आगे का रास्ता बना चुका है। रही बात कांग्रेस की तो दस जनपथ, उनके लिए नरम महसूस होता है। उनके चोट लगने पर जब पश्चिम बंगाल कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे अधीर रंजन ने मजाक उड़ाया तब कांग्रेस नेतृत्व ने उनके भी पर कतर दिये। राहुल गांधी भी पश्चिम बंगाल के चुनाव में सिर्फ औपचारिक उपस्थिति लगाते ही दिखे।</p>
<p>दीदी, अपनी आदत के मुताबिक दुश्मन के हमले का इंतजार नहीं करतीं। उनकी आक्रामकता ही उनका सबसे बड़ा हथियार है। चुनाव निपट चुका है, अब हमला करने की बारी उनकी है। वह जानती हैं कि कोरोना की मौतें, सरकारी नाकामी, नीतियों की विफलतायें, तबाह अर्थव्यवस्था, असंतुष्ट किसान और बेरोजगार – देश में ऐसी भी असंख्य आंखें हैं जो मोदी का विकल्प तलाश रही हैं। उनकी सादा सफेद साड़ी, हवाई चप्पल और स्ट्रीट फाइटर का मिजाज यह विकल्प हो सकता है।</p>
<p>प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा की चुनावी मशीनरी ने चुनावों को पूरी तरह से व्यक्ति केंद्रित कर दिया है। पर्सनालिटी ब्रांडिंग ही वह वजह है कि उनके लिए काम करने वाले या उनके समर्थक जब यह सवाल पूछते हैं कि मोदी नहीं तो कौन..। इसका आत्मविश्वास से भरा जवाब किसी के पास नहीं होता। कांग्रेसी भी जानते हैं कि नए जमाने की भाजपा की टेक्नोलाजी ने उनके सबसे बड़े नेता राहुल गांधी का नाम कम से कम किसी चमत्कार से तो कोसों दूर पहुंचा ही दिया है। मीडिया की भाषा में इसे टीना इफेक्ट कहते हैं। यानी देयर इज नो आल्टरनेटिव, जिसका कोई विकल्प ना हो। अब अगर 2024 की चुनावी जमीन पर विपक्ष वास्तव में खड़ा होना चाहता है तब उसे यूपीए का पुनर्गठन करना होगा। ममता बनर्जी को प्रधानमंत्री पद के लिए पहले से ही उम्मीदवार घोषित करना होगा। हांलाकि विपक्षी दलों के लिए यह फैसला कई समझौतों, अहंकारों के आग के दरिया से गुजर के जाने के बराबर होगा लेकिन बड़ी लड़ाई कुर्बानी तो मांगती ही है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/impact-of-increase-in-inflation-due-to-covid-19-in-india/7661/"><strong>ये कैसी विडंबना</strong><strong>, </strong><strong>महंगाई भी तिल-तिल मार रही !</strong></a></span></p>
<p>हो सकता है ऐसा हो, या ऐसा ना भी हो। किसी दावे के साथ ऐसा नहीं कह सकता। बस इतना बता सकता हूं कि आज से ठीक तीन दिन बाद पांच मई है। अब से ठीक दौ सौ साल पहले इस दिन नेपोलियन बोनापार्ट की मौत हुई थी। वाटरलू की हार के बाद। नेपोलियन एक साधारण योद्धा से शासक बना था। फ्रांस और यूरोप के बाद पूरी दुनिया को जीतना चाहता था। हार उसे बर्दाश्त नहीं थी। वह खुद को सुधारक कहता मगर इतिहास ने उसे अधिनायकवादी तानाशाह माना। वह वाटरलू की ऐसी छोटी सी लड़ाई हार गया था जो उसके लिए कुछ नहीं थी – जस्ट पीनट्स, यानी मूंगफली के दाने के बराबर। यहां यह प्रसंग इसलिए कि इतिहास निर्मम होता है, पर फिलहाल तो हम यहां भविष्य की बात कर रहे हैं।</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong><span style="color: #ff0000;">डॉ. पवन सक्सेना – </span>पत्रकार एवं लेखक पत्रकारिता एवं जनसंचार में पीएचडी हैं तथा सक्रिय पत्रकारिता का 22 वर्षो का अनुभव है। अमर उजाला, दैनिक जागरण समेत कई मीडिया हाउस को सेवायें दे चुके हैं।</strong></span><br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>संप्रति – संपादक – लीडर पोस्ट। (Editor – Leader Post)</strong></span></p>
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