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	<description>हर अक्षर सच, हर खबर निष्पक्ष </description>
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		<title>ममता ने मारा गोल, फाउल करके</title>
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		<pubDate>Tue, 04 May 2021 08:04:19 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>इसी परिवेश में ममता बनर्जी के चुनाव प्रबंधक प्रशान्त किशोर की उक्ति के भिन्न अभिप्रायों को समझना होगा। वे बोले : &#8221;भाजपा के जय श्रीराम के जवाब में चण्डीपाठ हमारा नारा था।&#8221; अर्थात् हिन्दू वोट हेतु ममता को बधोपाध्याय (बनर्जी का संस्कृत) बनना पड़ा। अपना विप्र वर्ण प्रचारित करना था। गोत्र शाण्डिल्य को उच्चारित करना &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-west-bengal-election-and-why-mamata-banerjee-is-not-appropriate-for-becoming-pm-of-india/7783/">ममता ने मारा गोल, फाउल करके</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>पश्चिम बंगाल विधानसभा में 2 मई 2021 संपन्न हुये मतदान के सिलसिले में कई पहलू उभरते है, कई वाजिब प्रश्न उठते हैं। इन पर राष्ट्र को गौर करना पड़ेगा यदि देश का फिर एक और विभाजन नहीं होने देना है तो। अगर सेक्युलर तथा उदार गणतंत्र संजोये रखना है तो। अर्थात् मजहब का सियासत में घालमेल रोकना है तो।
			</div>
		</div>
	
<p>इसी परिवेश में ममता बनर्जी के चुनाव प्रबंधक प्रशान्त किशोर की उक्ति के भिन्न अभिप्रायों को समझना होगा। वे बोले : &#8221;भाजपा के जय श्रीराम के जवाब में चण्डीपाठ हमारा नारा था।&#8221; अर्थात् हिन्दू वोट हेतु ममता को बधोपाध्याय (बनर्जी का संस्कृत) बनना पड़ा। अपना विप्र वर्ण प्रचारित करना था। गोत्र शाण्डिल्य को उच्चारित करना था। इसी श्रृंखला में नंदीग्राम में शिवालय जाना लाजिमी था। यहीं ममता पर भाजपा के कथित अराजक तत्वों ने उनकी कार का दरवाजा झटके से मारा था। उससे मुख्यमंत्री के टांग और नितम्ब पर चोट लगी थी। हड्डी घायल हो गयी थी। परिणाम स्वरुप ममता के बायें टांग पर प्लास्टर चढ़ाया गया। पहियेदार गाड़ी पर सवार होकर चुनाव प्रचार करना पड़ा। वोटरों की हमदर्दी बटोरने का यह बड़ा मारु साधन मिल गया था। हालांकि जिस दिन चुनाव परिणाम घोषित हुये तत्क्षण ममता भली चंगी हो गयीं। टांगों पर चलने लगी। सारा दर्द लुप्त हो गया। आखिरी वोट भी 53वें दिन पड़ चुका था। एक मिलती जुलती वारदात हुयी थी मार्च 1977 में जब अमेठी चुनाव क्षेत्र में गौरीगंज के आगे कांग्रेसी प्रत्याशी संजय गांधी पर गोली &#8221;चली&#8221; थी। हालांकि फिर भी संजय हार गये। हमदर्दी नहीं मिली। जांच में गोलीकाण्ड बनावटी पाया गया था।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-dr-pawan-saxena-on-west-bengal-election-and-indian-political-parties/7701/"><strong>अब दिल्ली आइये दीदी&#8230;</strong></a></span></p>
<p>ममता द्वारा चुनाव अभियान के दो तथ्यों पर हर पंथनिरपेक्ष और लोकतंत्रप्रेमियों का विचलित होना स्वाभाविक है। पश्चिम बंगाल के 27 प्रतिशत मुस्लिम वोट हेतु तृणमूल कांग्रेस ने जो प्रहसन रचा, वह बड़ा चिन्ताजनक है। ताज्जुब तो इस तथ्य पर होता है कि सात सदी पुराने फरफरा शरीफ (मौलाना अबू बकर सिद्दीकी) के वंशवाले जनाब पीरजादा अब्बासी सिद्दीकी द्वारा गठित (इंडियन सेक्युलर फ्रंट), वामपंथी और सोनिया—कांग्रेसी वाले महाजोत की अपील को नजरअंदाज कर मुसलमान मतदाताओं के बहुलांश ने तृणमूल कांग्रेस का समर्थन किया। इसका भावार्थ यही कि पश्चिम बंगाल के मुसलमानों का एजेण्डा है कि भारत के भीतर नया बांग्लादेश बने। तृणमूल कांग्रेस इन मुसलमानों का पहला प्यार साबित हुयी।</p>
<p>मजहब पर इतना जघन्य ध्रुवीकरण किसी भी चुनाव में आजतक नहीं हुआ। कई अर्थों में ममता ने इस आरोप को सही दिखाया कि वे देश—तोड़क तथा समाज—ध्वंसक अभियान से परहेज नहीं करेंगी। मुसलमान घुसपैठिये तो उनका वोट बैंक हैं ही। भाजपायी हिन्दुवाद का शायद उनका ऐसा ही जवाब था। पर घातक तो यह भारतीय राष्ट्रवाद के लिये रहा। इसी संदर्भ में एक नीति यह भी है कि पारम्परिक तौर पर चुनाव में पराजय की जिम्मेदारी स्वीकार कर पार्टी पुरोधा त्यागपत्र देता है। अमित शाह और जेपी नड्डा से ने पेशकश तक नहीं की।</p>
<p>अब अति महत्वपूर्ण मसला उठता है कि पराजित प्रत्याशी ममता बनर्जी क्या मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगी? कानूनन तो यह संभव है। संविधान की धारा 164(4) के अनुसार बिना सदन के सदस्य रहे छह माह तक मंत्री बने रह सकते हैं। अत: ममता बनर्जी भी मुख्यमंत्री भी शपथ ले सकतीं हैं। पर प्रश्न यहां नैतिकता का है। ममता तो नैतिकता की देवी होने का दावा करतीं हैं। आचार, व्यवहार और मर्यादा का तकाजा है कि वह जनादेश जीतकर ही मुख्यमंत्री पद संभाले। नन्दीग्राम के मतदाताओं द्वारा खारिज किये गये इस राजनेता को बंगाल के सर्वोच्च जनवादी पद पर नहीं बैठना चाहिये। वह वोटरों द्वारा परित्यक्ता है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-dr-vivek-mishra-on-covid-19-taught-us-how-we-should-behave-and-what-we-should-do-for-our-society/7697/"><strong>कोरोना से लड़ेगा इंडिया जीतेगा इंडिया: आओ मिलकर बेहतर जहान बनाएं</strong></a></span></p>
<p>हालांकि उनके पार्टीजन जवाहरलाल नेहरु का दृष्टांत पेश कर सकते हैं। इस लोकशाहीवाले सिद्धांत का उल्लंघन तब किया गया था। उनकी कांग्रेस पार्टी के नेता चन्द्रभानु गुप्ता को यूपी का मुख्यमंत्री बनाया। वे दो—दो बार यूपी विधानसभा का चुनाव हार चुके थे। पहली बार तो लखनऊ (पूर्व) से वे मार्च 1957 में कांग्रेस के प्रत्याशी बनकर लड़े थे। तब यूपी सरकार के काबीना मंत्री थे। उन्हें प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के बाबू त्रिलोकी सिंह ने हराया था। फिर बुन्देलखण्ड के मौदाहा रियासत की रानी साहिबा राजेन्द्र कुमारी को इन्ही प्रजा सोशलिस्टों ने उपचुनाव में लड़ाया और गुप्ताजी दोबारा हार गये। फिर भी प्रधानमंत्री नेहरु ने गुप्ताजी को नामित कर दिया। संपूर्णानन्द की जगह यूपी के मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलायी गयी। ऐसे कई उदाहरण कांग्रेस इतिहास से कई मिल जायेंगे। मगर प्रश्न रहेगा कि जनवादी सिद्धांत के अनुसार एक पराजित प्रत्याशी को मुख्यमंत्री बनना चाहिये? ममता से यही सवाल है, सदाचार के आधार पर।</p>
<p>अब कई निष्णात और ज्ञानीजन टीएमसी के पक्ष में अभूतपूर्व चुनावी चित्र रंग रहे हैं। उन्हें  ताजा आंकड़े भी देखना चाहिये। मतदान का गणित स्पष्ट हो जायेगा। ममता की पार्टी को पश्चिम बंगाल की विधानसभा में 2011 के चुनाव में 184 सीटें मिलीं थीं। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के साढ़े तीन दशक के राज का उन्होंने खात्मा किया था। फिर पिछले 2016 के चुनाव में तृणमूल के 211 विधायक रहे। कल के परिणाम में उन्हें 217 सीटें मिलीं हैं। पांच वर्षों में मात्र सात—आठ विधायक ही बढ़े हैं। वोट प्रतिशत भी 48 था जो 2016 की तुलना में मात्र पांच फीसदी ज्यादा था। तो क्या करिश्मा कर दिखाया ?</p>
<p>ममता ने निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर आरोप लगाया कि तीन रिटायर्ड सरकारी नौकर सदस्य नामित होकर मतदान का निर्णय करेंगे? तो इस बांग्ला राजनेता ममता बनर्जी के को याद दिला दिया जाये कि उनकी पुरानी पार्टी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राज में भारत के प्रधान न्यायाधीश थे सुधिरंजन दास, उनके दामाद थे नेहरु काबीना के कानून मंत्री अशोक कुमार सेन। उनके सगे भाई थे सुकुमार सेन जो मुख्य निर्वाचन आयुक्त थे। तीनों उच्च सरकारी पद एक ही कुटुम्ब में सीमित था। तब केवल राममनोहर लोहिया ने इस घृणास्पद वंशवाद का मसला उठाया था।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/five-decades-of-watergate-scandal/7600/"><strong>वॉटरगेट कांड: हिंदुस्तानी अखबारों में है इतना दम! जो सत्ता के शीर्ष को दे सके ऐसी चुनौती</strong></a></span></p>
<p>अखबारों की आज सुर्खियां हैं कि ममता के रुप में भारतीय प्रतिपक्ष को एक सर्वमान्य राष्ट्रस्तरीय पुरोधा मिल गया। वही पुरानी पत्रकारी अतिशयोक्ति। भला जो महिला बंगाल को ही राष्ट्र माने, उसे भारत से भी बड़ा समझे, क्या वह मलयाली, नागा, लदृाखी, पंजाबी आदि विविध राजनेताओं का समर्थन कभी हासिल कर पायेंगी ?  ऐसी क्षेत्रवादी प्रवृत्ति का नेता बस एक प्रदेश का होकर रह जाता है। समूचे भारत का कभी नहीं। बंगपुत्री ममता बनर्जी हुगली तट और बंगाल की खाड़ी के मध्यस्थल को ही अपनी दुनिया मानती है। याद आता है रेलमंत्री के पद पर रहते जब ममता बनर्जी बजाये रेल भवन मुख्यालय के, सियालदह स्टेशन से राष्ट्र के रेल के चलाती थीं। गोमुख से चली पवित्र भागीरथी बहते—बहते कोलकता पहुंचते हीं गंदली हुगली बन जाती है। फिर गंगासागर में समुद्र में गिरती है। मगर ममता इस गंगा को सिर्फ हुगली ही मानेंगी क्योंकि वह उनके राज्य में बस इतना ही भाग गंगा का बहता है। तो क्या ऐसी संकीर्णदिल महिला भारत की पीएम लायक होंगी?</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>(<span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://tismedia.in/">TIS Media</a></span> परिवार के संरक्षक<span style="color: #ff0000;"> <a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के. विक्रम राव</a> </span>का शुमार देश के नामचीन पत्रकारों में होता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उन्होंने इमरजेंसी तक में स्वतंत्र आवाज के लिए जेल यात्रा की। महीनों की सजाएं भुगती। श्री राव,  वॉयस ऑफ अमेरिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनोमिक टाइम्स, फिल्मफेयर और इलस्ट्रेटेड वीकली में प्रमुख पदों पर रहने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड के संस्थापक संपादक भी रह चुके हैं। प्रेस की नियामक संस्था &#8216;भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य रहने के अलावा मजीठिया वेतन बोर्ड और मणिसाना वेतन बोर्ड के सदस्य के तौर पर पत्रकारों के हित में लंबा संघर्ष किया है। <span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के.विक्रम राव</a>,</span> फिलहाल इंडियन फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट <span style="color: #ff0000;">#IFWJ</span> के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)</strong></span></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-west-bengal-election-and-why-mamata-banerjee-is-not-appropriate-for-becoming-pm-of-india/7783/">ममता ने मारा गोल, फाउल करके</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>अब दिल्ली आइये दीदी&#8230;</title>
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		<pubDate>Mon, 03 May 2021 08:48:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>लोकसभा चुनाव में मोदी के सामने संयुक्त विपक्ष का मजबूत चेहरा बनकर उभर सकती हैं ममता बनर्जी, मोदी के लिए वाटरलू बन सकता है बंगाल का चुनाव, अब सारी जिम्मेदारी यूपीए की  यह लेख एक पॉलिटिकल हाईपोथीसिस है यानी राजनीतिक परिकल्पना। जिसमें हम उपलब्ध तर्को, तथ्यों को जोड़कर एक सिरे में पिरोकर आगे की पटकथा &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-dr-pawan-saxena-on-west-bengal-election-and-indian-political-parties/7701/">अब दिल्ली आइये दीदी&#8230;</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
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				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>आज मेरा कौतुहल सीमित था। सिर्फ इतना कि बंगाल कौन जीतेगा। नतीजे आ गए। दीदी जीत गईं। आंकड़ों की गुणा-भाग को अलग से समझियेगा। मैं जरा जल्दी में हूं। भविष्य तलाशने की। हां, एक खास बात और – अगर आप लोकतंत्र में मजबूत विपक्ष को नापसंद करते हैं तो यहां लिखी लाइनें शायद आपके लिए नहीं हैं। जब तक आप अपना पसंददीदा न्यूज चैनल देखिये, हम अपनी बात को आगे बढ़ाते हैं।
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		</div>
	
<h5><span style="color: #ff0000;">लोकसभा चुनाव में मोदी के सामने संयुक्त विपक्ष का मजबूत चेहरा बनकर उभर सकती हैं ममता बनर्जी, मोदी के लिए वाटरलू बन सकता है बंगाल का चुनाव, अब सारी जिम्मेदारी यूपीए की </span></h5>
<p>यह लेख एक पॉलिटिकल हाईपोथीसिस है यानी राजनीतिक परिकल्पना। जिसमें हम उपलब्ध तर्को, तथ्यों को जोड़कर एक सिरे में पिरोकर आगे की पटकथा को समझने की कोशिश करेंगे। दिल्ली का अश्वमेघ बंगाल में रुक गया है। फिलहाल। लेकिन क्या यह दिल्ली दरबार की हार है। सच कहें तो यह कहना सच नहीं। एक तो आज की दिल्ली आसानी से हार नहीं मानती, और दूसरा उसके पास कम से कम राजनीतिक मुद्दों के लिए ही सही पर हमेशा  प्लान ए, बी, सी, डी तो जरूर होता है। तीन सीटों वाली दो अंकों तक जा पहुंची है। बाम वाले राम हो गए हैं। सरकार भले ही ना बनी हो, पर बड़े कमाल तो मोदी सेना ने भी किए ही हैं। खैर, इन बारीकियों को फिर परखेंगे अभी तो बात देश की जमीन पर पड़े, अंतिम सांसे ले रहे जर्जर विपक्ष के पुनर्जीवन पर केंद्रित करते हैं।</p>
<p>कहते हैं घायल शेरनी की सांसे भी दहाड़ से तेज होती हैं। अपने जीवन का सबसे खूंरेंजी चुनाव लड़के घायल ममता लड़खड़ाते कदमों से ही सही तीसरी बार राइटर्स बिल्डिंग पहुंच गई हैं मगर क्या उनके सपनों में 7 लोक कल्याण मार्ग नहीं आता होगा। बताते चलें यह दिल्ली का वह पता है जहां प्रधानमंत्री रहते हैं और इसे पहले 7 रेसकोर्स कहा जाता था।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-dr-vivek-mishra-on-covid-19-taught-us-how-we-should-behave-and-what-we-should-do-for-our-society/7697/"><strong>कोरोना से लड़ेगा इंडिया जीतेगा इंडिया: आओ मिलकर बेहतर जहान बनाएं</strong></a></span></p>
<p>हो सकता है, आज यह अनुमान आपको थोड़ा ज्यादा लगे, अतिश्योक्त, लेकिन अगर हम एक – एक करके ममता बनर्जी के राजनीतिक ट्रेक को डीकोड करें तब समझ सकेंगे कि वह कैसी हैं और उनको दिल्ली क्यों पहुंचना चाहिए। थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं। जनवरी के जाड़े, तारीख दो जनवरी और सन् 1985, पश्चिम बंगाल से एक खबर आई – 29 साल की एक लड़की जिसका नाम ममता बनर्जी है, उसने बामपंथ के उस वक्त के सबसे बड़े दरख्त सोमनाथ चटर्जी को चुनाव हरा दिया है। चिल्ला जाड़ों में भी दिल्ली की सियासी जमात के माथे पर पसीना आ गया था। ममता बनर्जी की राजनीति की बुनियाद बामपंथ के विरोध पर खड़ी हो चुकी थी। 1996 कांग्रेस नेतृत्व यानी सीताराम केसरी ने सोमेन मित्रा को प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया। दीदी उस वक्त युवक कांग्रेस की अध्यक्ष थीं। सोमेन बाबू से उनकी नहीं पटी। वजह थी सोमेन के बामपंथी दोस्त। वह अपने प्रदेश अध्यक्ष को तरबूज कहतीं, यानी बाहर से हरा और अंदर से लाल। सोमेन मित्रा सीताराम केसरी गुट से आते थे। केसरी मित्रा की मदद से दोबारा कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए, यह महत्वाकांक्षी दीदी को पसंद नहीं था। जब कांग्रेस का 80 वां अधिवेशन कोलकाता में हुआ, सामने लाखों की भीड़ के साथ ममता की रैली हुई। ममता बनर्जी ने रैली में आने वाले हरेक को असली जमीनी कांग्रेसी बताया। यानी ग्रासरूट कांग्रेसी। यही से बनी तृणमूल कांग्रेस। कांग्रेस ने ममता को छह साल के लिए निकाल दिया, वह जार्ज फर्नाडीज के साथ मिलकर एनडीए में चली गईं। अटल जी की सरकार में मंत्री बनीं। यशवंत सिन्हा की बात मानें तो कांधार हाईजैक के वक्त उन्होंने खुद को मंत्री के रुप में आतंकियों को सौंप कर आम यात्रियों की रिहाई का प्रस्ताव भी दिया। आज के वक्त में अगर कोई ऐसा करता तब यह जोरदार ब्रांडिंग का मास्टर स्ट्रोक होता, खैर, वह वक्त ऐसा नहीं था।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/madeinkota/pride-of-kota/covid-care-center-at-kota-university-running-with-the-help-of-allen-career-institute-and-health-department/7694/"><strong>खुशनुमा और सकारात्मक माहौल से जीतेंगे जंग</strong></a></span></p>
<p>वह एनडीए में रहीं मगर सोनिया गांधी से उनके रिश्ते हमेशा गर्मजोशी से भरे रहे। सोनिया गांधी की मजबूरी यूपीए – वन में लेफ्ट लिबरल ताकतों का दबदबा था, जिसने ममता से दूरी को बनाये रखा। इसीलिए जब 2009 में कांग्रेस और लेफ्ट के रास्ते अलग हुए ममता फिर कांग्रेस के साथ आ गईं। वह गठजोड़ की राजनीति में माहिर हो चुकी थीं। 2011 में पश्चिम बंगाल (West Bengal) की जनता ने उनको राइटर्स बिल्डिंग पहुंचा दिया। वह मुख्यमंत्री बन गईं। पहली बार और फिर 2016 में दूसरी बार और अब 2021 में जीत – तीसरी बार।</p>
<p>चुनाव से ठीक पहले विभिन्न राजनीतिक दलों को भाजपा (BJP) विरोध के नाम पर जोड़ना। शरद पवार से मदद मांगना। ठीक चुनाव के बीच भाजपा की राजनीति के खिलाफ देश के प्रमुख विपक्षी दलों को चिट्ठी लिखना, यह बताता है कि उनका दिमाग आगे का रास्ता बना चुका है। रही बात कांग्रेस की तो दस जनपथ, उनके लिए नरम महसूस होता है। उनके चोट लगने पर जब पश्चिम बंगाल कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे अधीर रंजन ने मजाक उड़ाया तब कांग्रेस नेतृत्व ने उनके भी पर कतर दिये। राहुल गांधी भी पश्चिम बंगाल के चुनाव में सिर्फ औपचारिक उपस्थिति लगाते ही दिखे।</p>
<p>दीदी, अपनी आदत के मुताबिक दुश्मन के हमले का इंतजार नहीं करतीं। उनकी आक्रामकता ही उनका सबसे बड़ा हथियार है। चुनाव निपट चुका है, अब हमला करने की बारी उनकी है। वह जानती हैं कि कोरोना की मौतें, सरकारी नाकामी, नीतियों की विफलतायें, तबाह अर्थव्यवस्था, असंतुष्ट किसान और बेरोजगार – देश में ऐसी भी असंख्य आंखें हैं जो मोदी का विकल्प तलाश रही हैं। उनकी सादा सफेद साड़ी, हवाई चप्पल और स्ट्रीट फाइटर का मिजाज यह विकल्प हो सकता है।</p>
<p>प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा की चुनावी मशीनरी ने चुनावों को पूरी तरह से व्यक्ति केंद्रित कर दिया है। पर्सनालिटी ब्रांडिंग ही वह वजह है कि उनके लिए काम करने वाले या उनके समर्थक जब यह सवाल पूछते हैं कि मोदी नहीं तो कौन..। इसका आत्मविश्वास से भरा जवाब किसी के पास नहीं होता। कांग्रेसी भी जानते हैं कि नए जमाने की भाजपा की टेक्नोलाजी ने उनके सबसे बड़े नेता राहुल गांधी का नाम कम से कम किसी चमत्कार से तो कोसों दूर पहुंचा ही दिया है। मीडिया की भाषा में इसे टीना इफेक्ट कहते हैं। यानी देयर इज नो आल्टरनेटिव, जिसका कोई विकल्प ना हो। अब अगर 2024 की चुनावी जमीन पर विपक्ष वास्तव में खड़ा होना चाहता है तब उसे यूपीए का पुनर्गठन करना होगा। ममता बनर्जी को प्रधानमंत्री पद के लिए पहले से ही उम्मीदवार घोषित करना होगा। हांलाकि विपक्षी दलों के लिए यह फैसला कई समझौतों, अहंकारों के आग के दरिया से गुजर के जाने के बराबर होगा लेकिन बड़ी लड़ाई कुर्बानी तो मांगती ही है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/impact-of-increase-in-inflation-due-to-covid-19-in-india/7661/"><strong>ये कैसी विडंबना</strong><strong>, </strong><strong>महंगाई भी तिल-तिल मार रही !</strong></a></span></p>
<p>हो सकता है ऐसा हो, या ऐसा ना भी हो। किसी दावे के साथ ऐसा नहीं कह सकता। बस इतना बता सकता हूं कि आज से ठीक तीन दिन बाद पांच मई है। अब से ठीक दौ सौ साल पहले इस दिन नेपोलियन बोनापार्ट की मौत हुई थी। वाटरलू की हार के बाद। नेपोलियन एक साधारण योद्धा से शासक बना था। फ्रांस और यूरोप के बाद पूरी दुनिया को जीतना चाहता था। हार उसे बर्दाश्त नहीं थी। वह खुद को सुधारक कहता मगर इतिहास ने उसे अधिनायकवादी तानाशाह माना। वह वाटरलू की ऐसी छोटी सी लड़ाई हार गया था जो उसके लिए कुछ नहीं थी – जस्ट पीनट्स, यानी मूंगफली के दाने के बराबर। यहां यह प्रसंग इसलिए कि इतिहास निर्मम होता है, पर फिलहाल तो हम यहां भविष्य की बात कर रहे हैं।</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong><span style="color: #ff0000;">डॉ. पवन सक्सेना – </span>पत्रकार एवं लेखक पत्रकारिता एवं जनसंचार में पीएचडी हैं तथा सक्रिय पत्रकारिता का 22 वर्षो का अनुभव है। अमर उजाला, दैनिक जागरण समेत कई मीडिया हाउस को सेवायें दे चुके हैं।</strong></span><br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>संप्रति – संपादक – लीडर पोस्ट। (Editor – Leader Post)</strong></span></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-dr-pawan-saxena-on-west-bengal-election-and-indian-political-parties/7701/">अब दिल्ली आइये दीदी&#8230;</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>कोरोना से लड़ेगा इंडिया जीतेगा इंडिया: आओ मिलकर बेहतर जहान बनाएं</title>
		<link>https://tismedia.in/editorial/article/article-by-dr-vivek-mishra-on-covid-19-taught-us-how-we-should-behave-and-what-we-should-do-for-our-society/7697/?utm_source=rss&#038;utm_medium=rss&#038;utm_campaign=article-by-dr-vivek-mishra-on-covid-19-taught-us-how-we-should-behave-and-what-we-should-do-for-our-society</link>
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		<pubDate>Mon, 03 May 2021 07:58:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>कोरोना हमारे रहने सोचने और विचार करने के तरीके में बदलाव ला रहा है। यह लगातार सजग और सतर्क रहने के साथ आत्मसंयम की मांग करता है। कोरोना ने हम सबको एक नये आचार शास्त्र में लेकर आया है। कोरोना के साथ चलते हुए कोरोना के अनुरूप व्यवहार करना चाहिए। ऐसा नहीं हो सकता कि &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-dr-vivek-mishra-on-covid-19-taught-us-how-we-should-behave-and-what-we-should-do-for-our-society/7697/">कोरोना से लड़ेगा इंडिया जीतेगा इंडिया: आओ मिलकर बेहतर जहान बनाएं</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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				<img decoding="async" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/05/tismedia.in-Dr-Vivek-Kumar-Mishra.jpg" alt="डॉ. विवेक कुमार मिश्रा" class="author-avatar-img" width="111" height="111" />
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				<h4>डॉ. विवेक कुमार मिश्रा</h4>राजकीय महाविद्यालय कोटा में वरिष्ठ शिक्षक, कवि एवं समसामयिक विषयों पर निरंतर लेखन से जुड़े हैं।
			</div>
		</div>
	
<p>कोरोना हमारे रहने सोचने और विचार करने के तरीके में बदलाव ला रहा है। यह लगातार सजग और सतर्क रहने के साथ आत्मसंयम की मांग करता है। कोरोना ने हम सबको एक नये आचार शास्त्र में लेकर आया है। कोरोना के साथ चलते हुए कोरोना के अनुरूप व्यवहार करना चाहिए। ऐसा नहीं हो सकता कि आप कोरोना समय में रहते हुए कोरोना से परे जाकर व्यवहार करें। अब समय आ गया है कि हमें अपने आसपास की दुनिया को साफ सुथरा रखने के लिए लगातार आगे आना चाहिए। इस एक वाइरस ने पूरी मानव जाति को सावधान कर दिया है कि तुम अपने आसपास के वातावरण को साफ सुथरा रखने में मदद करों। हर समय साफ सुथरा रहने के लिए तत्पर रहो। सफाई इस समय का सबसे बड़ा उपकरण है। मनुष्य को बचाने के लिए इसी तरह सोचना और कर्म रूप में अपने व्यवहार को ढ़ालना होगा। कोरोना है और हां है इसमें कोई शक नहीं की कोरोना है और कोरोना का खौफ भी लोगों में है पर यह काफी नहीं है।</p>
<p>कोरोना की मार<br />
हमारी जीवनशैली जीने की आदतों और हम कैसे व्यवहार करते हैं इस पर बहुत कुछ निर्भर करता। साहस के साथ कोरोना समय में रहने की जरूरत है। अपना मानसिक स्तर लगातार मजबूत रखने और निरंतर अपडेट रहते हुए समय संसार को देखने की जरूरत है। मानव जाति ने इस पृथ्वी पर एक से एक भयानक दृश्य देखे हैं दुनिया के किसी ने किसी कोने में एक त्रासदी चलती रहती है एक सुनामी आती है और दूसरी जाती है। इन सब के बावजूद मनुष्य निरापद बचा रह जाता है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-ajay-singh-on-these-unusual-tragedies-happened-in-last-one-year/7684/"><strong>जब सुरज हुआ बूढ़ा तो जमीन छट-पटा उठी</strong></a></span></p>
<p>आज दहलीज पर एक नन्ही चिड़िया / सुंदर सी चिड़िया आई और कह गई कि देखो न मैं हूं। मुझे किसी कोरोना से भय नहीं लगता। फिर तुम तो मनुष्य हो&#8230; उनमें भी सबसे ज्यादा पढ़े लिखे &#8211; फिर इतने डरे , परेशान , हैरान क्यों रहते हो ? कोरोना आया है तो चला जायेगा। उसका जो काम है वह करेगा तुम्हें तो वह करना है जो तुम्हारा काम है। कोरोना की चिंता मत करो जो तुम्हें करना है वह करों। देखो फिर कैसे टिकता है कोरोना। भाग छुटेगा। कोरोना का हाहाकार मत मचाओ। डरों मत न किसी को कोरोना से डराओ। कोरोना से बचाव का सबसे बढ़िया तरीका है कि तुम अपने आसपास का वातावरण साफ रखो। मन से शरीर से साफ &#8211; सुथरा रहो। एक दूसरे से दूरी बनाकर रहो। इस तरह रहो की कोरोना टिके ही नहीं। कोरोना पृथ्वी पर घूम रहा है फिर आप इतने बेफिक्र होकर क्यों घूम रहे हैं।</p>
<p>थोड़ा अपने लिए, परिवार के लिए, समाज के लिए, देश के लिए कुछ निर्णय लेने पड़ते हैं। अब वह समय आ गया है जब आपका सही कदम परिवार समाज और देश को बचाने में मदद करेगा। कोरोना की जीवित दुनिया को कोई दूर करेगा तो तुम्हारी सजगता व सतर्कता। यहीं बचायेगी कोरोना से&#8230;. इसलिए चलते हुए कुछ जरूरी बातें अपने आचरण का हिस्सा बनाते हुए चलें &#8211;</p>
<ol>
<li>अनावश्यक घर से बाहर कदम नहीं रखें फिर भी जाना पड़े तो मास्क लगाकर ही निकलें, समय समय पर हाथ धोते रहें तथा सोशल डिस्टेन्सिंग का पालन करते रहें।</li>
<li>स्वयं सकारात्मक होते हुए आसपास सकारात्मक भाव का परिसर बनाते चलें। आपके पास देने के लिए कुछ हो न हो पर सकारात्मकता तो है, यहीं दीजिए यह सबसे बड़ी मानव सेवा होगी कि आपके सामने जो आया वह खुश होकर हंसते हुए जा रहा है। किसी को दुख देने की जगह किसी के खुशी का कारक बनकर देखिए। दुनिया बदली हुई दिखेंगी।</li>
<li>सुबह &#8211; सुबह ध्यान, प्राणायाम, व योग आदि क्रियाएं खुले में छत पर करें। यह आपकी आंतरिक मजबूती का आधार है। सुबह के धुप का सेवन करें। गर्म पानी पीते रहे।</li>
<li>कोरोना एक महामारी है, इससे बचाव के लिए दिये गये दिशा निर्देशों, गाइडलाइंस का पालन करें।</li>
<li>कोरोना किसी को देखता नहीं कि कौन है? क्या उसका प्रभाव है? किसी को भी हो सकता है। जो इस वाइरस के संपर्क में आया उसे कोरोना हो गया। कोरोना को लेकर कोई पहचान अलग से काम नहीं आती।</li>
<li>कोरोना से बचाव के लिए मास्क, सेनेटाइजर और सोशल डिस्टेन्सिंग का पालन करें। खुद करें और अपने आसपास, समाज को अधिक से अधिक पालन करने के लिए प्रेरित करें।</li>
<li>खांसते झींकते समय रुमाल या टिशु पेपर का प्रयोग करें। इधर &#8211; उधर थुके नहीं।</li>
<li>आत्मसंयम व दृढ़ता से ही कोरोना से बचाव कर सकते हैं।</li>
<li>कोरोना वैक्सीन आ चुकी है। इसके बारे में बिना किसी भ्रम, अपने पास के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पर प्रथम और द्वितीय डोज लगवा लें।</li>
<li>कोरोना समय में कोरोना के अनुरूप व्यवहार कर आप सामाजिक होने और जिम्मेदार नागरिक होने का फर्ज पूरा कर रहे हैं।</li>
</ol>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-on-current-situation-of-india-by-rajesh-kasera/7580/"><strong>कोरोना काल में दर्द बांटे</strong><strong>, </strong><strong>जनता को लूटे-छले नहीं</strong></a></span></p>
<p>कोरोना समय मानव समाज को समझने और उत्पन चुनौती से जूझने के लिए एक समय संसार बनाते रहने का समय है । इस भयावह समय ने बताया कि हमें कैसे रहना चाहिए, किस तरह अपने को संयोजित करना चाहिए। एक बार यदि आप इस तरह रहना सीख लें यह जान समझ लें कि क्या करना है कैसे रहना है? फिर कुछ भी मुश्किल नहीं। आपदाएं आती रही हैं और आती रहेगी। इसे सहज भाव से स्वीकार करने की जरूरत है। कोरोना ने यह सीखाया है कि अपने आप का रोना छोड़िए। इस संसार के लिए क्या कुछ कर सकते हैं वह करें। इस संसार को बेहतर बनाने में हमारा क्या योग होगा यह देखिए। कोरोना ने यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि उसकी उपस्थिति पर उसके अहं पर पंचर लगाने के लिए एक वाइरस ही काफी है। महल / बंगला आगे-पीछे लोग सब धरा रह जाएगा। इसलिए अपने अहं के घेरे से बाहर निकल कर आसपास के लोगों के लिए कुछ न कुछ करते रहिए। दुनिया को अपनी उपस्थिति से रहने लायक और सुंदर बनाइये।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">लेखक &#8211;</span> <span style="color: #0000ff;">डॉ. विवेक कुमार मिश्रा</span></strong></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-dr-vivek-mishra-on-covid-19-taught-us-how-we-should-behave-and-what-we-should-do-for-our-society/7697/">कोरोना से लड़ेगा इंडिया जीतेगा इंडिया: आओ मिलकर बेहतर जहान बनाएं</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>कोरोना काल और आधी आबादी का पूरा सच</title>
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		<pubDate>Sun, 02 May 2021 08:19:42 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>अधिकांश लोगों ने कोरोनाकाल में अपना सारा वक्त घर पर खाली बैठ कर, वर्क फ्रॉम होम करके ही बिताया &#124; पर यूएनओ के अनुसार अत्यधिक गरीबी से बच निकलने वाली बहुत सी महिलाओं के आर्थिक स्तर के पुन: गिरने का खतरा बढ़ गया है &#124; महिलाओं की घर में भूमिका चार गुणा बढ़ गई &#124; &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/impact-on-women-due-to-covid-19-in-india/7669/">कोरोना काल और आधी आबादी का पूरा सच</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
		<div class="box info  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>2020 में आये कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया को झकझोर रख दिया विश्व के महानतम विकसित देशों के कॉमन सेन्स, हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर, संवेदनशीलता की सच्चाई दुनिया के सामने लाकर रख दी | कोविड-19 की वजह से हुए दुनिया भर में जिंदगी के पहियों और पंखों को जो लॉकडाउन लगा भविष्य में शायद ही कोई भुला पाएगा | कोरोना वायरस ने दुनिया भर के तमाम देशों के अस्तित्व और नागरिकों के जीवन में खलबली मचा रखी है | लोगों की जिंदगी अपने ही घरों में किसी कैदी जैसी हो गई जो घर से बाहर नहीं निकल सकते क्योंकि घरों के बाहर सरकारी नुमाइंदे बेतरतीब चालान काटने (आर्थिक दंड) और लठ देने को खड़े है | इन सबके के बावजूद समाज के जिस अंग पर इस वायरस का सबसे ज्यादा नकारात्मक प्रभाव पड़ा है वो है महिलाएं, जो है इस मनुष्य जाति की आधी आबादी |
			</div>
		</div>
	
<p>अधिकांश लोगों ने कोरोनाकाल में अपना सारा वक्त घर पर खाली बैठ कर, वर्क फ्रॉम होम करके ही बिताया | पर यूएनओ के अनुसार अत्यधिक गरीबी से बच निकलने वाली बहुत सी महिलाओं के आर्थिक स्तर के पुन: गिरने का खतरा बढ़ गया है | महिलाओं की घर में भूमिका चार गुणा बढ़ गई | लॉकडाउन में महिलाएं बहुआयामी भूमिका में नजर आईं। घर में बच्चों और बुजुर्गों का ख्याल रखने, माँ, बहन, बेटी, बहु की जिम्मेदारियों के साथ-साथ ऑफिस कार्य, घरेलु कार्य (झाड़ू, पोछा, बर्तन, कपड़े, साफ-सफाई, 24 घंटे की केयर टेकर) का कार्यभार भी उन पर आ गया | फिर भी महिलाओं ने बिना किसी दुःख, तकलीफ, शिकायत के अपने सारे रूप और जिम्मेदारी भली प्रकार से निभाए | परन्तु इन सबसे महिलाओं के जीवन में बहुत सारे बड़े परिवर्तन आये जो इस रूप में देखे जा सकते है:-</p>
<p>असुरक्षित महिलाएं:- महामारी के प्रकोप विश्व के सभी देश झेल रहे है परन्तु इसका सबसे विपरीत प्रभाव महिलाओं की घरेलू स्थिति पर हुआ है महामारी की वजह से सभी पुरुष घरों में 24 घंटे रहने लगे जिससे उनके बीच मन मुटाव बढ़ गए और घरेलू हिंसा की वारदाते पुरे विश्व में काफी बढ़ी है | कोरोना के दौरान लगे लॉकडाउन से 243 मिलियन महिलाएं पिछले 12 महीनों में यौन या शारीरिक शोषण का शिकार हुई है | भारत, नाइजीरिया, दक्षिण अफ्रीका, पेरू, ब्राजील, मेक्सिको, रशिया जैसे देशों में रेप के केसेस बढ़े, गुमशुदा महिलाओं की संख्या में वृद्धि हुई है, महिलाओं की हत्या के आकड़ों में वृद्धि हुई साथ ही साथ यौन हिंसा की घटनाओं में अविश्वसनीय वृद्धि हुई | सितंबर माह में यूएनओ के द्वारा जारी रिपोर्ट में अनुसार लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा के मामलों में अर्जेंटीना में 25 प्रतिशत, साइप्रस और फ्रांस में 30 प्रतिशत और सिंगापुर में 33 प्रतिशत बढ़ोतरी दर्ज की गई है | भारत में भी 2015-16 में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे में यह बात पता चली थी कि 15-49 आयु वर्ग की 33% विवाहित महिलाएं शारीरिक, यौन या भावनात्मक रूप से हिंसात्मक हिंसा का सामना किया जिसमें कोरोना के समय राष्ट्रीय महिला आयोग के अनुसार घरेलू हिंसा के मामलों की शिकायतों में 100% वृद्धि दर्ज की | आंकड़ों के मुताबिक लॉकडाउन के पहले ही हफ्ते में आयोग के सामने महिलाओं के साथ हिंसा के सैकड़ों मामले सामने आए हैं | उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार, हरियाणा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र इसमें आगे हैं और ये केवल वो केसेस है जिसमें महिलाओं ने पत्र, ईमेल या संदेश के माध्यम से आयोग तक अपनी आप-बीती पहुंचाने का प्रयास किया | इसके अतिरिक्त ऐसे हजारों मामले है जो घरों से बाहर निकले ही नहीं | और सबसे बड़ी विडम्बना तो इस लॉकडाउन में घरेलू हिंसा से जूझ रही महिलाओं के साथ यह है की रही ये महिलाएं अब न तो आम दिनों की तरह अपने माता-पिता, भाई-बहन के पास जा सकती हैं और न ही किसी दोस्त, रिश्तेदार, सगे सम्बन्धी को मदद के लिए बुला सकती है |</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/impact-of-increase-in-inflation-due-to-covid-19-in-india/7661/"><strong>ये कैसी विडंबना</strong><strong>, </strong><strong>महंगाई भी तिल-तिल मार रही !</strong></a></span></p>
<p>महिलाओं के अवैतनिक कार्य में वृद्धि:- यूएन वुमन कि डिप्टी एक्ज़िक्यूटिव अनीता भाटिया बताती हैं, “हमने पिछले 25 वर्षों में जो भी काम किया है, वो एक साल में खो सकता है|” रोज़गार और शिक्षा के मौक़े ख़त्म सकते हैं. महिलाएं ख़राब मानसिक और शारीरिक स्वास्थ की शिकार हो सकती हैं | इस समय महिलाओं पर देखभाल का जो भार बढ़ गया है, उससे 1950 के समय की लैंगिक रूढ़ियों के फिर से क़ायम होने का ख़तरा पैदा हो गया है | कोरोना के कारण घर के कार्यों में अप्रत्याशित वृद्धि हो गई जैसे फल-सब्जियों को अच्छे से गर्म पानी से धोकर रखना, जितनी बार घर से बाहर निकलो उतनी ही बार कपड़े धोना, मास्क धोना, बार-बार टच की जाने वाली सतह की बार-बार सफाई करना आदि जिससे घर में रहने वाली महिलाओं के द्वारा किये जाने वाले अवैतनिक कार्यो की मात्रा दो गुणा हो गई परन्तु महिलाओं के द्वारा घर में किये जा रहे काम के लिए उन्हें न तो पैसे मिलते है और न ही घर के सदस्यों से इज़्ज़त | डॉ. निधि प्रजापति बताती है की “महिलाओं के द्वारा घर की देखभाल के रूप में किये गए काम की कभी सराहना नहीं होती, हमेशा से ही महिला की जिम्मेदारी कह कर उसके घर के दिए गए योगदान की अहमियत समाप्त कर दी जाती है और न ही उसके मेहनत का कोई आर्थिक लाभ उसे मिल पता है |”</p>
<p>जीवनयापन का संकट:- संयुक्त राष्ट्र संघ ने बताया कि वैश्विक स्तर पर 65 प्रतिशत महिलाएं अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़ी हुई हैं और अब उनके जीवन में आर्थिक अनिश्चितता का खतरा मंडरा रहा है | वर्ल्ड बैंक के अनुसार (2019) कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी का 25.69 प्रतिशत थी जो वर्तमान में बढ़ गई है | शोध के माध्यम से पाया कि कोरोना के चलते लगने वाले लॉक डाउन की वजह से काम काजी महिलाओं को पुरुषों की तुलना में अधिक नौकरियों खोने का नुकसान हुआ है | यहाँ तक की लॉकडाउन के बाद उनकी नौकरियों की रिकवरी रेट भी बहुत कम रही, उन्हें या तो नौकरी दुबारा मिली नहीं और अगर मिली भी तो उनकी तनख्वाह पहले से बहुत कम हो गई | लॉकडाउन से उन महिलाओं पर भी विपरीत प्रभाव पड़े जिनके पति काम के लिए दूसरे शहरों में जाते हैं | लॉकडाउन के कारण वे वापस नहीं लौटे, न ही काम छीन जाने के कारण पैसे भेज सके ऐसे में परिवार में बच्चों और बुजुर्गों की देख-रेख और खान-पान की जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर आ गई | राशन लाना, खाना पकाना, समय पर खिलाना, साफ़ सफाई करना और इनके सबके साथ आजीविका का साधन तलाशना, खेतों में काम करना जैसे काम महिलाओं के जिम्मे आ गए  ताकि वे घर का लालन-पालन कर सके |</p>
<p>स्वास्थ्य, यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य तथा लैंगिक समानता पर विपरीत प्रभाव:- लम्बे समय से लगे लॉकडाउन ने महिलओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर विपरीत प्रभाव डाले है | मासिक धर्म स्वच्छता के स्तर में अविश्वसनीय गिरावट आई है क्योंकि महिलाओं और बालिकाओं को सेनेटरी नैपकिन तक उपलब्ध नहीं हो रहे | एक ओर स्कूल बंद होने के कारण लड़कियों को सरकार की तरफ से मिलने वाले निशुल्क सेनेटरी नैपकिन वितरण की व्यवस्था बंद होने से गरीब बालिकाओं के सामने स्वयं की स्वच्छता का संकट खड़ा हो गया है | दूसरी ओर महिलाओं और बच्चियों को इसलिए परेशानियों का सामना अधिक करना पड़ रहा है क्योंकि वे लॉकडाउन के कारण घर के बाहर जा नहीं सकती और लोक-लाज, सामाजिक बंधन, शर्म के कारण घर के पुरुषों से सेनेटरी नैपकिन जैसी अत्यंत महत्वपूर्ण वस्तु बाजार से मंगा नहीं सकती | ऐसे में वे जलन, खुजली, सर्विक्स कैंसर जैसी अनेक भयंकर समस्याओं और बिमारियों को निमंत्रण दे रही | यूएन के अनुसार महामारी के कारण महिलाओं के यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य तथा लैंगिक समानता की दिशा में पिछले 25 वर्षों में जो प्रगति हुई उस पर विपरीत प्रभाव पड़ा है | आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं की पूर्ति में बाधा उत्पन्न होने से महिलाओं और लड़कियों तक स्वास्थ्य सेवाएं नहीं पहुँच रही है | लगातार लॉक डाउन से मासिक धर्म प्रबंधन, प्रसव के पहले और बाद की देखभाल, परिवार नियोजन और गर्भनिरोधक आपूर्ति आदि संसाधनों से भी महिलाओं और सरकार का ध्यान हट गया है जिससे कई महिलाओं ने तो इस कोरोना में अपनी जान भी गवां दी है | प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं सहित आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं की लंबे समय से सीमित उपलब्धता महिलाओं के पुरे विश्व में हानिकारक साबित हो रही है |</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/senior-journalist-vikas-bahuguna-is-reviewing-the-situation-and-systems-of-corona-in-india/7665/">सरकार बहादुर! सांस लेने में दिक्कत है तो क्या ‘गर्व’ से सीना फुलाकर काम चलाएं</a></span></strong></span></p>
<p>तनाव में वृद्धि:- कोरोना की वजह से घर के सभी सदस्यों अपना सारा वक्त सरकार के द्वारा लगाये गए लॉक डाउन के कारण घर पर ही बिताया| जिसकी वजह से बहुत सारे लड़ाई-झगडे पुरानी-नई बातों के कारण घरों में शुरू हो गए | परिवार जन, बच्चों, बड़े-बुजुर्गों के स्वास्थ्य की चिंता हमेशा महिलाओं को रहने लगी | लगातार घर-ऑफिस के काम सामंजस्य बिठाने की कोशिश ने तनाव के स्तर को और बढ़ा दिया | महीनों तक लगे देशव्यापी लॉकडाउन से बच्चों को स्कूल से छुट्टी मिल गई है और कई नौकरीपेशा लोगों को दफ्तर नहीं जाने और घर से काम करने का मौका मिल गया है परन्तु  लाखों नौकरीपेशा महिलाओं की समस्याएं दोगुनी हो गई हैं | वर्क फ्रॉम होम की डबल जिम्मेदारी के अंतर्गत लंबे समय तक एक ही जगह बैठकर काम करने की वजह से महिलाओं को कंधे व पीठदर्द की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है जिसे वे नजरअंदाज करके अपने दूसरे कामों को निपटाती हैं| ऐसे में भविष्य का आर्थिक संकट, चिंता-अनिश्चितता, तनाव, अनिंद्रा, चिडचड़ापन, थकान, मानसिक अस्थिरता, कुण्ठा जैसी मनोवैज्ञानिक समस्याएं महिलाओं के स्वास्थ्य को बिगाड़ रही है |</p>
<p>रसोई में जकड़ी महिला:- कोरोना के कारण घर के सारे सदस्य घरों में बंद हो गए साथ ही होटल रेस्टोरेंट भी बंद जिससे महिलाओं पर किचन का अतिरिक्त भार बढ़ गया घर में बच्चे, बुजुर्ग, जवान, पति आदि की समय समय पर आने वाली अलग अलग खाने, स्नैक्स, चाय, कॉफ़ी, शरबत की फरमाइशों ने महिलाओं को रसोई के दरवाजों में सीमित करके रख दिया | संक्रमण के डर से लोग अब बाहर के खाने के बजाये घर पर ही स्वादिष्ट नए नए व्यंजन बनाने की मांग करने लगे जिसके कारण महिलाओं का सारा समय खाना बनाने की तैयारी में रसोई में ही निकल जाता |</p>
<p>महिलाओं की स्वतंत्रता में कमी:- कोरोना के चलते कामवालियों और ऐसे दूसरे हेल्परों की गैर-मौजूदगी ने महिलाओं की मुसीबतें कई गुनी बढ़ा दी हैं क्योंकि अब उन्हें ही सारा काम करना था | लॉकडाउन हुआ तो सभी ऑफिस, स्कूल, कॉलेज, पार्लर, फक्ट्रियाँ आदि बंद हो गई जिससे महिलाओं की आर्थिक आजादी के साथ साथ सामाजिक आजादी भी ख़तम हो गई | घर में रहते हुए अब उनकी व्यक्तिगत आजादी पूरी तरह से समाप्त हो गई थी घर में उनके पास अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और माता-पिता से बात करने का समय भी अतिरिक्त कार्यभार के चलते छीन गया | हर वक्त इस बात का ख्याल रखना, अलर्ट रहना कि पति, बच्चे या घर के बुजुर्गों को किसी चीज की जरूरत तो नहीं ताकि उन्हें किसी तरह की कोई तकलीफ न हो, कोरोना से सुरक्षा से सम्बन्धी सभी साधन उनके पास है या नहीं आदि में ही महिलाओं की जिंदगी उलझ कर रह गई| घर, बढे-बुजुर्ग, बच्चों व परिवार के अन्य सदस्यों का ख्याल रखते-रखते हुए उनका समय कब खत्म हो जाता है, उन्हें खुद पता नहीं चलता| ऑफिस और घर दोनों को अच्छे से संतुलित करने के लिए  महिलाएं देर तक जागकर काम कर रही हैं| ऐसे में पूरी नींद न होने के कारण इसका सीधा असर उनके स्वास्थ्य पर साफ दिखाई पड़ रहा है| महिलाएं खुद के लिए समय निकलना ही भूल गई |</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/128-journalists-died-in-last-one-year-out-of-which-77-journalists-died-in-april-2021/7594/">मुद्दा: आखिर क्यों काल के गाल में समा रहे हैं पत्रकार, सिर्फ अप्रैल महीने में 77 की मौत</a></span></strong></span></p>
<p>माताओं की ऑनलाइन क्लास:- इस कोरोना काल में बच्चों की ऑनलाइन क्लासेस शुरू हो गई जिसमें स्कूल कॉलेज के द्वारा बच्चों पर क्लास में उपस्थित होने का दबाव बनाया गया ऐसे में घर की महिलाओं और माताओं के हिस्से में एक काम और बढ़ गया क्योंकि जो बच्चे छोटे थे उनके साथ घर के सारे काम सुबह जल्दी निपटाने के बाद उन्हें भी पूरे समय बैठे रहना पड़ता था ताकि बच्चे अपनी पढ़ाई से ध्यान न हटाए| ऑनलाइन क्लासेस में जो प्रोजेक्ट दिए गए उनको पूरा करने, जो निर्देश दिए जा रहे है उन्हें समझना जैसी गतिविधियों ने महिलाओं को पुनः स्कूल में भर्ती करा दिया |</p>
<p>संक्षिप्त रूप में देखा जाये तो कोरोना के कारण महिलाओं की जिंदगी पूरी तरह से बदल गई है | उनके व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक, शारीरिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक जीवन के पहलुओं पर कोरोना ने विपरीत प्रभाव डाला है जिससे उभरने में उन्हें कई साल तक लग सकते है |</p>
<p><strong>डॉ. निधि प्रजापति</strong><br />
<strong>अध्यक्ष : सोसाइटी हैस ईव इंटरनेशनल चैरिटेबल ट्रस्ट</strong></p>
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		<title>ये कैसी विडंबना, महंगाई भी तिल-तिल मार रही !</title>
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		<pubDate>Sun, 02 May 2021 07:39:48 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>दुर्भाग्यपूर्ण बात तो यह भी है कि किसी सरकार और उसके जिम्मेदार अधिकारियों को इसकी रत्ती भर परवाह नहीं है। वह इसलिए कि उन्होंने आपदा काल को कमाई का अवसर बना दिया। जितना दर्द और तकलीफें बढ़ेंगी, उनकी जेबें उतनी ही भरेंगी। कालाबाजारी का नंगा नाच खेला जा रहा है और सब खड़े होकर तमाशा &#8230;</p>
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				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>कोरोना से जूझ रहे हमारे इस देश में हर पल चारो तरफ से शोक, संताप और मातम से भरी सूचनाएं आ रही हैं। मनहूस खबरें दिल बैठाने का काम कर रही हैं। &#8220;मेरा क्या होगा?&#8221; यह सवाल दिन-रात खाए जा रहा है। जीने के लिए क्या करें, ये डर सताए जा रहा है। ऊपर से जेब का संकट आने वाले संकट और कठिन समय की दस्तक दे रहा है। घर-परिवार को पालने की चिंता दिन दुगुनी रात चौगुनी हो रही है। कोरोना काल ने काम-धंधे तो छीन ही लिए, पर जीवन बसर करने के लिए जो थोड़ी बहुत पूंजी बचाकर रखी थी, उसे महंगाई डायन तेजी से निगल रही है। जीवन बचाने के संघर्ष और जुगत में लगे आमजन को कोरोना का संक्रमण इतनी तेजी से नहीं मार रहा, जितनी तेजी से महंगाई ने लील रखा है।
			</div>
		</div>
	
<p>दुर्भाग्यपूर्ण बात तो यह भी है कि किसी सरकार और उसके जिम्मेदार अधिकारियों को इसकी रत्ती भर परवाह नहीं है। वह इसलिए कि उन्होंने आपदा काल को कमाई का अवसर बना दिया। जितना दर्द और तकलीफें बढ़ेंगी, उनकी जेबें उतनी ही भरेंगी। कालाबाजारी का नंगा नाच खेला जा रहा है और सब खड़े होकर तमाशा देख रहे हैं। घर परिवारों पर यकायक बढ़ा ये बोझ किसी को दिखाई नहीं दे रहा है, क्यों? बीते एक वर्ष की बात करें तो कोरोना काल की पहली और दूसरी लहर ने सिर्फ हजारों-लाखों लोगों को काल कलवित नहीं किया, करोड़ों की दो जून की रोटी को भी छीन लिया है। काम-काज नहीं होने से लोग बेहद परेशान हैं। परिवार को पालने के लिए हाथ पैर मारते हैं। जैसे-तैसे व्यवस्था भी करते हैं, लेकिन इस एक साल में महंगाई ने जिस कदर ऊंचाइयां छुई है, उसने आम आदमी को बेदम कर दिया।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong> READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/five-decades-of-watergate-scandal/7600/"><strong>वॉटरगेट कांड: हिंदुस्तानी अखबारों में है इतना दम! जो सत्ता के शीर्ष को दे सके ऐसी चुनौती</strong></a></span></p>
<p>पेट भरने और गृहस्थी चलाने के लिए जरूरी आटा, दाल, चावल, तेल, घी, शक्कर आदि के दामों में बेतहाशा वृद्धि हो गई है। खासकर एक महीने में लॉकडाउन और कर्फ्यू की घोषणा के बाद से जमाखोरों की पौ बारह हो गई है। संकट के समय लोगों की मदद करने के बजाय वे लोगों को लूटने का काम कर रहे हैं। जीवन बचाने के लिए जरूरी दवाइयों के दाम आसमान पर है। उनको स्टॉक करके मनमाने दामों में बेचा जा रहा है। लोगों की जिंदगी से खुलेआम सौदेबाजी की जा रही है। कोई इस पाप को रोकने के लिए आगे नहीं आ रहा। रोम जल रहा है और नीरो बंसी बजा रहा है। अव्यवस्थाओं का बोलबाला है और जनता लुट रही है। हर चीज़ की क़ीमत दोगुनी हो गई है। अगर आप फल, सब्जियां या किराने का सामान ख़रीदते हैं तो 1500 से दो हजार रुपए का बिल बन जाता है। भारतीय रिज़र्व बैंक के कुछ महीने पहले कराए गए उपभोक्ता विश्वास सर्वेक्षण में भी महंगाई से मार की पीड़ा निकलकर सामने आई। सर्वेक्षण में स्पष्ट रूप से सामने आया कि उपभोक्ताओं का विश्वास अब तक के सबसे निचले स्तर पर आ गया है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong> READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/128-journalists-died-in-last-one-year-out-of-which-77-journalists-died-in-april-2021/7594/"><strong>मुद्दा: आखिर क्यों काल के गाल में समा रहे हैं पत्रकार</strong><strong>, </strong><strong>सिर्फ अप्रैल महीने में </strong><strong>77 </strong><strong>की मौत</strong></a></span></p>
<p>कोरोना काल से पहले और कोरोना काल के दौरान खाद्य पदार्थों की जितनी कीमत नहीं बढ़ी थी, उतनी कोरोना संक्रमण काल के बाद बढ़ते दिख रही है। इसकी वजह से महंगाई चरम पर है। खाद्य तेल और दाल की कीमतों में हुए भारी इजाफे से आम लोगों पर आर्थिक बोझ बढ़ गया है और सरकार से वह महंगाई पर लगाम लगाने की गुहार लगा रहे हैं। पेट्रोल और डीजल के दाम भी लगातार बढ़ रहे हैं। नए साल में पेट्रोल और डीजल की कीमतों ने रिकॉर्ड ऊंचाई हासिल की है। इससे महंगाई भी बढ़ी हैं। डीजल के दाम बढ़ने से न सिर्फ किसानों की सिंचाई लागत बढ़ जाती है, बल्कि माल भाड़ा महंगा हो जाता है। माल भाड़ा महंगा होने से हर तरह की वस्तुओं के दाम बढ़ने की आशंका रहती है। आम लोगों का मानना है कि महंगाई बढ़ी है, लेकिन इनकम नहीं बढ़ पाई है। खाद्य पदार्थों के मूल्य में बेतहाशा वृद्धि से आर्थिक बोझ बढ़ता जा रहा है, जिससे उबरना सब चाहते हैं, लेकिन उम्मीद की किरण नजर नहीं आ रही है। रोज कमाने खाने वाले लोगों पर तो आफत टूट पड़ी है। आज सब्जियों के अलावा किराना सामान और आवश्यक खाद्य पदार्थों के दाम में भी बढ़ोतरी हुई है। दुकानदार भी बढ़ती महंगाई से परेशान हैं। आम आदमी के जीवन पर इन सबका असर दिखना शुरू हो गया है। ईंधन के दाम बढ़ते ही परिवहन सहित हर चीज के दाम बढ़ जाते हैं। करोड़ों लोग इस वक्त बिना रोजगार के हैं। ऐसे में महंगाई का बोझ लोग कैसे बर्दाश्त कर पाएंगे? इसी सवाल का जवाब जनता जानना चाहती है।</p>
<p>(लेखकःराजेश कसेरा राजस्थान के जाने-माने पत्रकार हैं। राजेश कसेरा, राजस्थान पत्रिका सहित कई प्रमुख हिंदी समाचार संस्थानों में पत्रकार से लेकर संपादक के तौर पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं।)</p>
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		<title>जन-तंत्र का खून चूस रहे भ्रष्टाचार के पिस्सू !</title>
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		<pubDate>Tue, 27 Apr 2021 06:39:33 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>हाल में रेवेन्यू बोर्ड में पकड़े गए रिश्वतखोरों के पास से मिली अकूत संपत्ति और लाखों की नकदी ने फिर साबित कर दिया कि भ्रष्टाचारियों में किसी तरह का कोई खौफ नहीं है। इसकी गवाही खुद सरकार के आंकड़े बताते हैं। बीते तीन महीने में राजस्व विभाग में ही रिश्वतखोरी के 15 प्रकरण सामने आए। &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/when-rajasthan-will-be-free-from-corruption/7341/">जन-तंत्र का खून चूस रहे भ्रष्टाचार के पिस्सू !</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>शौर्य और वीरों की भूमि राजस्थान को रिश्वतखोरों के चंगुल से कब पूरी तरह से मुक्ति मिलेगी ? इस यक्ष प्रश्न को बुझने वाला आजादी के बाद से नहीं मिल पाया है। कई सरकारें आईं-कई गईं, लेकिन भ्रष्टाचार के &#8216;राक्षस&#8217; से कोई भी जीत नहीं दिला पाया। उलटे सबने भ्रष्टाचार को सिंचित व पोषित करने का काम किया। सिक्कों और नोटों की खनक के बोझ तले तंत्र की ढिलाई और नाकामी दबती चली गई। इसका खमियाजा आम जनता को उठाना पड़ा। आजादी के बाद से भ्रष्टाचार का दानव सुरसा की तरह मुंह खोले खड़ा है और उसका पेट भरने का नाम नहीं ले रहा है। रिश्वतखोरी के पोषक रक्तबीज की मानिद इस तरह फैले हैं कि जहां लालच की बूंद गिरी, ये पनप कर और कई गुना ताकतवर हो जाते हैं।
			</div>
		</div>
	
<p>हाल में रेवेन्यू बोर्ड में पकड़े गए रिश्वतखोरों के पास से मिली अकूत संपत्ति और लाखों की नकदी ने फिर साबित कर दिया कि भ्रष्टाचारियों में किसी तरह का कोई खौफ नहीं है। इसकी गवाही खुद सरकार के आंकड़े बताते हैं। बीते तीन महीने में राजस्व विभाग में ही रिश्वतखोरी के 15 प्रकरण सामने आए। इससे साफ है कि राजस्व विभाग में किस तरह से भ्रष्टाचार की बेल फल-फूल रही है। इसके दीगर पुलिस की बात करें तो वह राजस्थान का सबसे भ्रष्टतम विभाग है। भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (एसीबी) के आंकड़ों की बात करें तो बीते तीन महीनों में प्रदेश में रिश्वतखोरों के खिलाफ हुई धरपकड़ की कार्रवाई में 22 घूसखोर पुलिस विभाग से पकड़े गए हैं। भ्रष्ट कार्मिकों की सूची में दूसरे स्थान पर पंचायतीराज विभाग के रहे हैं, जहां ट्रैप की 17 कार्रवाई हुई है। राजस्थान में एसीबी ने इस वर्ष जनवरी से मार्च तक 109 घूसखोर ट्रैप किए, जो महाराष्ट्र के बाद सर्वाधिक हैं। एनसीआरबी के अनुसार महाराष्ट्र एसीबी सर्वाधिक घूसखोर अफसरों को पकड़ती है। इस दौरान उन्होंने 210 कार्मिकों को घूस लेते पकड़ा। इसी एसीबी ने 2019 में 74 रिश्वतखोरों को पकड़ा था।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/why-are-we-so-afraid-about-covid-19-we-should-also-know-this-aspect-of-truth/7250/">कोविड को लेकर इतने खौफजदा क्यों हैं हम, सच्चाई के इस पहलू को भी जानना चाहिए</a></span></strong></span></p>
<p>ऐसा कतई नहीं है कि भ्रष्टाचार पर लगाम कसने के लिए राज्य सरकार ने कमतर प्रयास किए हों। एसीबी ने 1064 नंबर की हेल्पलाइन डेस्क बना रखी है, लेकिन शिकायतें उम्मीद के अनुरूप नहीं आतीं। लोग डरते हैं कि कहीं उनका नाम या पहचान सामने आ गई तो लेने के देने पड़ जाएंगे। शिकायत पर एक्शन हो चाहे न हो, पर वे संबंधित विभाग या कार्मिक के रडार पर आ जाएंगे। यह डर एसीबी के पास आने वाली शिकायतों में भी साफ तौर पर दिखाई देता है। एसीबी के टोल फ्री नंबर पर इस साल 900 शिकायतें दर्ज हुईं, पर ट्रैप की कार्रवाई सिर्फ 10 में हो पाई। इसी तरह से वाट्सएप नंबर पर मिली 6 हजार 124 सूचनाओं में से 28 पर एक्शन हो पाया। ये संख्या साफतौर पर बताती है कि सैकड़ों-हजारों लोग प्रतिदिन घूसखोरों से रूबरू होते हैं और चाह कर भी कुछ नहीं कर पाते। फिर भी कुछ लोगों ने मौजूदा तंत्र के ऊपर विश्वास जताया और भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े हुए। इसका असर यह आया कि आईएएस, आईपीएस, आरपीएस, आरएएस समेत कई ऊंचे रैंक के अधिकारी व कर्मचारी घूस लेते पकड़े गए।</p>
<p>इन अधिकारियों में न तो कानून का डर है, न इज्जत जाने का खौफ। पैसों के आगे इन्हें कुछ दिखाई नहीं देता। हाल ही 10 अप्रैल को रेवेन्यू बोर्ड के दो सदस्य घूस लेकर पैसा देने वालों के पक्ष में फैसला दे रहे थे। इनमें से एक आरएएस के घर से 40 लाख रुपए नकद मिले। 18 मार्च को बिल भुगतान की एवज में सवाईमाधोपुर में 3 लाख की घूस लेते डीएफओ फुरकान अली ट्रैप हुआ था। 14 मार्चको दुष्कर्म केस में कार्रवाई के बदले अस्मत मांगने के आरोप में एसीपी कैलाश बोहरा गिरफ्तार हुआ था। 2 फरवरी को दौसा में आईपीएस मनीष अग्रवाल पकड़ा गया था। जनवरी में 10 और 5 लाख रुपए की घूस लेते एसडीएम पिंकी मीणा और पुष्कर मित्तल ट्रैप हुए थे। वहीं, पेट्रोल पंप की एनओसी देने को लेकर पांच लाख की घूस लेते बारां के जिला कलेक्टर व आइएएस अधिकारी इंद्रसिंह राव को पकड़ा गया था। ये तो कुछ बड़े मामले हैं जो चर्चाओं में आ गए। इससे अलग न जाने कितने और बड़े रिश्वतखोर ऐसे हैं जो बिना किसी भय के वसूली में लगे हैं। इनको न गरीब के आसुंओं से सरोकार है, न ही मजलूमों की आह से खौफ। बस, खुद की जेबों को भरना इनकी पहली और अंतिम सोच है।</p>
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<p>भ्रष्टाचार पर लगाम के लिए सिर्फ मजबूत इच्छाशक्ति काफी नहीं है। इस कुप्रथा को जड़ से नेस्तनाबूद करना होगा। तभी &#8220;जनता का, जनता के द्वारा और जनता के लिए&#8221; का नारा बुलंद हो पाएगा।</p>
<p>जीरो टॉलरेन्स की नीति अमल में लानी होगी<br />
भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेन्स की नीति तभी कारगर साबित होगी, जब पूरी ताकत के साथ इसके खिलाफ मुहिम छेड़ी जाएगी। वरना बिना नख-दंत के तो तंत्र पंगु ही बना रहेगा। हमारे राज्य में लोकायुक्त सचिवालय इसकी बड़ी बानगी है। बीते दो वर्ष से खाली पड़े लोकायुक्त के पद को बीते माह भरा गया।  सरकार ने पीके लोहरा को लोकायुक्त तो नियुक्त कर दिया लेकिन लोकायुक्त कार्यालय में पर्याप्त स्टाफ नहीं है। लोकायुक्त के पास प्रदेशभर के भ्रष्टाचार के करीब 8000 से ज्यादा मामले लंबित पड़े हैं। जबकि, लोकायुक्त कार्यालय में अधिकारियों और कर्मचारियों का टोटा है। लोकायुक्त सचिवालय में राज्य के अफसरों और कर्मचारियों के खिलाफ आई शिकायतें फाइल बना कर अलमारियों में रखी हैं। लोकायुक्त सचिवालय में दूसरे विभागों से लगाए कर्मचारियों का डेपुटेशन भी खत्म कर मूल विभाग में भिजवा दिया गया है। लोकायुक्त सचिवालय के हाल इतने बदहाल हैं कि यहां उप लोकायुक्त का पद खाली है। सचिव, अनुभाग अधिकारी, 3 सहायक अनुभाग अधिकारी, यूडीसी, 7 स्टेनोग्राफर, कनिष्ठ लेखाकार और जनसंपर्क अधिकारी के पद रिक्त पड़े हैं। पिछले दिनों प्रमुख एक सचिव, चार-चार निजी सचिव व संयुक्त सचिव, दो उप सचिव, तीन सहायक सचिव और 15 पुलिस प्रकोष्ठ के पद समाप्त कर दिए गए। इन दुर्गम हालात में लोकायुक्त कैसे भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ पाएंगे। सख्त संदेश दे पाएंगे।</p>
<p>(लेखकःराजेश कसेरा राजस्थान के जाने-माने पत्रकार हैं। राजेश कसेरा, राजस्थान पत्रिका सहित कई प्रमुख हिंदी समाचार संस्थानों में पत्रकार से लेकर संपादक के तौर पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं।)</p>
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