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	<title>Assam Archives - TIS Media</title>
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		<title>चली कहानीः निन्यानवे का चक्कर, असमिया लोक-कथा</title>
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		<pubDate>Tue, 02 Nov 2021 01:57:39 +0000</pubDate>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ff0000;"><strong>प्राचीनकाल</strong></span> की बात है। असम के ग्रामीण इलाके में तीरथ नाम का कुम्हार रहता था । वह जितना कमाता था, उससे उसका घर खर्च आसानी से चल जाता था । उसे अधिक धन की चाह नहीं थी । वह सोचता था कि उसे अधिक कमा कर क्या करना है । दोनों वक्त वह पेट भर खाता था, उसी से संतुष्ट था ।<br />
वह दिन भर में ढेरों में बर्तन बनाता, जिन पर उसकी लागत सात-आठ रुपये आती थी । अगले दिन वह उन बर्तनों को बाजार में बेच आता था । जिस पर उसे डेढ़ या दो रुपये बचते थे । इतनी कमाई से ही उसकी रोटी का गुजारा हो जाता था, इस कारण वह मस्त रहता था ।<br />
रोज शाम को तीरथ अपनी बांसुरी लेकर बैठ जाता और घंटों से बजाता रहता । इसी तरह दिन बीतते जा रहे थे । धीरे-धीरे एक दिन आया कि उसका विवाह भी हो गया । उसकी पत्नी का नाम कल्याणी था ।<br />
कल्याणी एक अत्यंत सुघड़ और सुशील लड़की थी । वह पति के साथ पति के काम में खूब हाथ बंटाने लगी । वह घर का काम भी खूब मन लगाकर करती थी । अब तीरथ की कमाई पहले से बढ़ गई । इस कारण दो लोगों का खर्च आसानी से चल जाता था ।<br />
तीरथ और कल्याणी के पड़ोसी यह देखकर जलते थे कि वे दोनों इतने खुश रहते थे । दोनों दिन भर मिलकर काम करते थे । तीरथ पहले की तरह शाम को बांसुरी बजाता रहता था । कल्याणी घर के भीतर बैठी कुछ गाती गुनगुनाती रहती थी ।<br />
एक दिन कल्याणी तीरथ से बोली कि तुम जितना भी कमाते हो वह रोज खर्च हो जाता है । हमें अपनी कमाई से कुछ न कुछ बचाना अवश्य है ।<br />
इस पर तीरथ बोला &#8211; &#8220;हमें ज्यादा कमा कर क्या करना है ? ईश्वर ने हमें इतना कुछ दिया है, मैं इसी से संतुष्ट हूं । चाहे छोटी ही सही, हमारा अपना घर है । दोनों वक्त हम पेट भर कर खाते हैं, और हमें क्या चाहिए ?&#8221;<br />
इस पर कल्याणी बोली &#8211; &#8220;मैं जानती हूं कि ईश्वर का दिया हमारे पास सब कुछ है और मैं इसमें खूब खुश भी हूं । परन्तु आड़े वक्त के लिए भी हमें कुछ न कुछ बचाकर रखना चाहिए ।&#8221;<br />
तीरथ को कल्याणी की बात ठीक लगी और दोनों पहले से अधिक मेहनत करने लगे । कल्याणी सुबह 4 बजे उठकर काम में लग जाती । तीरथ भी रात देर तक काम करता रहता । लेकिन फिर भी दोनों अधिक बचत न कर पाते । अत: दोनों ने फैसला किया कि इस तरह अपना सुख-चैन खोना उचित नहीं है और वे पहले की तरह मस्त रहने लगे ।<br />
एक दिन तीरथ बर्तन बेचकर बाजार से घर लौट रहा था । शाम ढल चुकी थी । वह थके पैरों खेतों से गुजर रहा था कि अचानक उसकी निगाह एक लाल मखमली थैली पर गई । उसने उसे उठाकर देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा । थैली में चांदी के सिक्के भरे थे ।<br />
तीरथ ने सोचा कि यह थैली जरूर किसी की गिर गई है, जिसकी थैली हो उसी को दे देनी चाहिए । उसने चारों तरफ निगाह दौड़ाई । दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं दिया । उसने ईश्वर का दिया इनाम समझकर उस थैली को उठा लिया और घर ले आया ।<br />
घर आकर तीरथ ने सारा किस्सा कल्याणी को कह सुनाया । कल्याणी ने ईश्वर को धन्यवाद दिया ।<br />
तीरथ बोला &#8211; &#8220;तुम कहती थीं कि हमें आड़े समय के लिए कुछ बचाकर रखना चाहिए । सो ईश्वर ने ऐसे आड़े समय के लिए हमें उपहार दिया है ।&#8221;<br />
&#8220;ऐसा ही लगता है ।&#8221; कल्याणी बोली &#8211; &#8220;हमें गिनकर देखना चाहिए कि ये चांदी के रुपये कितने हैं ।&#8221;<br />
दोनों बैठकर रुपये गिनने लगे । पूरे निन्यानवे रुपये थे । दोनों खुश होकर विचार-विमर्श करने लगे । कल्याणी बोली &#8211; &#8220;इन्हें हमें आड़े समय के लिए उठा कर रख देना चाहिए, फिर कल को हमारा परिवार बढ़ेगा तो खर्चे भी बढ़ेंगे ।&#8221;<br />
तीरथ बोला &#8211; &#8220;पर निन्यानवे की गिनती गलत है, हमें सौ पूरा करना होगा, फिर हम इन्हें बचा कर रखेंगे ।&#8221;<br />
कल्याणी ने हां में हां मिलाई । दोनों जानते थे कि चांदी के निन्यानवे रुपये को सौ रुपये करना बहुत कठिन काम है, परंतु फिर भी दोनों ने दृढ़ निश्चय किया कि इसे पूरा करके ही रहेंगे । अब तीरथ और कल्याणी ने दुगुनी-चौगुनी मेहनत से काम करना शुरू कर दिया । तीरथ भी बर्तन बेचने सुबह ही निकल जाता, फिर देर रात तक घर लौटता ।<br />
इस तरह दोनों लोग थक कर चूर हो जाते थे । अब तीरथ थका होने के कारण बांसुरी नहीं बजाता था, न ही कल्याणी खुशी के गीत गाती गुनगुनाती थी । उसे गुनगुनाने की फुरसत ही नहीं थी। न ही वह अड़ोस-पड़ोस या मोहल्ले में कहीं जा पाती थी ।<br />
दिन-रात एक करके दोनों लोग एक-एक पैसा जोड़ रहे थे । इसके लिए उन्होंने दो वक्त के स्थान पर एक भक्त भोजन करना शुरू कर दिया, लेकिन चांदी के सौ रुपये पूरे नहीं हो रहे थे ।<br />
यूं ही तीन महीने बीत गए । तीरथ के पड़ोसी खुसर-फुसर करने लगे कि इनके यहां जरूर कोई परेशानी है, जिसकी वजह से ये दिन-रात काम करते हैं और थके-थके रहते हैं ।<br />
किसी तरह छ: महीने बीतने पर उन्होंने सौ रुपये पूरे कर लिए । अब तक तीरथ और कल्याणी को पैसे जोड़ने का लालच पड़ चुका था । दोनों सोचने लगे कि एक सौ से क्या भला होगा । हमें सौ और जोड़ने चाहिए । अगर सौ रुपये और जुड़ गए तो हम कोई व्यापार शुरू कर देंगे और फिर हमारे दिन सुख से बीतेंगे ।<br />
उन्होंने आगे भी उसी तरह मेहनत जारी रखी । इधर, पड़ोसियों की बेचैनी बढ़ती जा रही थी । एक दिन पड़ोस की रम्मो ने फैसला किया कि वह कल्याणी की परेशानी का कारण जानकर ही रहेगी । वह दोपहर को कल्याणी के घर जा पहुंची । कल्याणी बर्तन बनाने में व्यस्त थी ।<br />
रम्मो ने इधर-उधर की बातें करने के पश्चात् कल्याणी से पूछ ही लिया &#8211; &#8220;बहन ! पहले जो तुम रोज शाम को मधुर गीत गुनगुनाती थीं, आजकल तुम्हारा गीत सुनाई नहीं देता ।&#8221;<br />
कल्याणी ने &#8216;यूं ही&#8217; कहकर बात टालने की कोशिश की और अपने काम में लगी रही । परंतु रम्मो कब मानने वाली थी । वह बात को घुमाकर बोली &#8211; &#8220;आजकल बहुत थक जाती हो न ? कहो तो मैं तुम्हारी मदद कर दूं ।&#8221;<br />
कल्याणी थकी तो थी ही, प्यार भरे शब्द सुनकर पिघल गई और बोली &#8211; &#8220;हां बहन, मैं सचमुच बहुत थक जाती हूं, पर क्या करूं हम बड़ी मुश्किल से सौ पूरे कर पाए हैं ।&#8221;<br />
&#8220;क्या मतलब ?&#8221; रम्मो बोली तो कल्याणी ने पूरा किस्सा कह सुनाया । रम्मो बोली &#8211; &#8220;बहन, तुम दोनों तो गजब के चक्कर में पड़ गए हो, तुम्हें इस चक्कर में पड़ना ही नहीं चाहिए था । यह चक्कर आदमी को कहीं का नहीं छोड़ता ।&#8221;<br />
कल्याणी ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा &#8211; &#8220;तुम किस चक्कर की बात कर रही हो ? मैं कुछ समझी नहीं ।&#8221;<br />
&#8220;अरी बहन, निन्यानवे का चक्कर ।&#8221; रम्मो का जवाब था ।</p>
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		<title>आखिर राजनीतिक दलों से क्या चाहते हैं लोग</title>
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		<pubDate>Thu, 20 May 2021 10:40:51 +0000</pubDate>
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		<div class="box info  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>हाल में देश के पाँच राज्यों में हुए विधानसभा के चुनावों के परिणाम आ ही गए हैं। इनमें केवल दो राज्यों तमिलनाडु और केन्द्र शासित राज्य पुडुचेरी में ही सत्ता बदली है, शेष तीन राज्यों असम, पश्चिम बंगाल और केरल में जनता ने पहले से सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों में ही अपना पुनः विश्वास व्यक्त किया है। इनमें से कुछ राज्यों में विशेष रूप से पश्चिम बंगाल के चुनावी परिणामो कों लेकर अधिकतर चुनावी पण्डितों के अनुमान गलत साबित हुए हैं। जहाँ पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल काँग्रेस(टीएमसी) को जितनी सीटें पर सफलता मिली हैं, उतने का अनुमान उनके चुनाव रणनीतिकार प्रशान्त किशोर के सिवाय किसी को नहीं था। हालाँकि वह ममता बनर्जी की पराजय के बारे में भविष्यवाणी करने में अवश्य विफल रहे हैं।
			</div>
		</div>
	
<p>यहाँ उल्लेखनीय है जिस ईवीएम और केन्द्रीय चुनाव आयोग पर ममता बनर्जी और उनकी पार्टी घोर अविश्वास व्यक्त करती आयी हैं, उसने उनकी झोली सीटों से भर दी है। फिर भी अपनी हार को लेकर वह चुनाव आयोग के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय जाने की धमकी दे रही हैं। ऐसे ही तमिलनाडु में तीसरी बार सत्ता पाने की उम्मीद लगा रही अन्ना डीएमके नेतृत्व वाले गठबन्धन को जितनी सीटों पर कामयाबी मिली है, उतनी का किसी ने अन्दाज नहीं लगाया था। यद्यपि इस राज्य में द्रमुक (डीएमके) के स्टालिन को भी आशा से अधिक सफलता मिली है, जिनकी पार्टी पिछले दस साल से सत्ता से बाहर थी। यद्यपि व्यक्ति केन्द्रित दोनों राजनीतिक दलों को वर्तमान में अपने स्थापित नेता एम. करुणानिधि और जयललित की अनुपस्थित चुनाव लड़ना पड़ा है, तथापि स्तालिन ने इस भारी चुनावी सफलता मजबूत नेता के रूप में स्वयं का स्थापित कर दिखाया है। केरल में एल.डी.एफ. की वापसी भी चैंकाने वाली है, क्योंकि इस राज्य में हर पाँच साल में जनता चुनाव में सत्ता बदलती आयी है, किन्तु इस बार उसने परम्परा बदल डाली है। पाडुचेरी में काँग्रेस -द्रमुक के सत्ता में आने के आसार कम ही नजर आ रहे थे। परिणाम भी लगभग वैसा ही आया है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-mamata-banerjee-and-narada-chit-fund-case/8542/">ममता दीदी का &#8221;खेला&#8221; चालू छे !</a></span></strong></span></p>
<p>यद्यपि इन राज्यों के लोगों के निर्णय पर किसी को भी प्रश्न उठाने का अधिकार नहीं है, तथापि चुनाव के दौरान इन राज्यों में सत्तारूढ़ दल में असम में भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन (एन.डी.ए.), पश्चिम बंगाल में तृणमूल काँग्रेस तथा केरल में वामपन्थी लोकतांत्रिक गठबन्धन (एलडीएफ) की सरकारों पर प्रतिपक्षीय राजनीतिक दलों ने उनकी नीतियों से लेकर कामकाज पर कई तरह के गम्भीर आरोप भी लगाए थे। फिर भी उनकी अनदेखी करते हुए वहाँ की जनता अगले पाँच साल के सत्ता सम्हालने के लिए उन्हें ही बेहतर मानते चुना। यह सवाल दूसरे राज्यों के लोगों को सोचने-विचारने पर अवश्य विवश करता है। असम में मुख्य विपक्षी दल काँग्रेस ने तत्कालीन राजग सरकार पर ‘नागरिकता संशोधन विधेयक’ (सी.ए.ए.) तथा एन.आर.सी. को राज्य के लोगों विशेष रूप से मुसलमानों को उग्र आन्दोलन के लिए पूरी शक्ति से भड़काया। इसमें उसका साथ कई कट्टर इस्लामिक संगठनों के नेताओं उसकी खुलकर मदद की। परिमाणमतः असम में मुसलमानों ने जगह उग्र और हिंसक आन्दोलन किये। यह राज्य कई महीने तक उस हिंसक आन्दोलन से ग्रस्त रहा है। इसमें जहाँ असमियाँ हिन्दुओं को सीएए के माध्यम से लगभग डेढ़ करोड़ बांग्लादेश से आए बंगला भाषी हिन्दुओं को नागरिकता मिलने से अपनी असमिया अस्मिता को खतरा दिखायी दे रहा था, तो दूसरी बांग्लादेशी मुसलमानों को भारत से खदेड़े जाने। उस समय उग्र आन्दोलन को देखते हुए तत्कालीन सरकार ने अपनी ओर से सीएए और एनआरसी पर शान्त रहना ही उचित समझा। लेकिन इस विधानसभा के चुनाव के समय काँग्रेस ने इस मुद्दे को फिर हवा दी और सत्ता में आने के बाद सीएए को खत्म करने का वादा भी किया। उससे भी आगे बढ़कर उद्योगपति राजनीतिक नेता बदरूद्दीन अजमल ने अपनी राजनीतिक पार्टी ‘युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रण्ट’(यूडीएफ) का काँग्रेस से गठजोड़ तैयार किया। सत्तारूढ़ भाजपा के सामने की कड़ी चुनौती दी। उन्होंने अपनी चुनावी सभाओं में खुले आम कहा कि इस बार लुंगी-टोपी वालों की सरकार बनेगी। ऐसा कहकर मजहबी आधार पर ध्रुवीकरण करने की पुरजोर कोशिश की। लेकिन उनकी पार्टी को मुस्लिम बहुल इलाकों में ही कुछ कामयाबी मिली। वह और उनकी साथी काँग्रेस से सत्ता के गणित से बहुत दूर गई। इस चुनावी नतीजे से स्पष्ट है कि राज्य की अधिकांश जनता सीएए और एनआरसी के पक्ष में है, जिसमें असम की अस्मिता और देश की सुरक्षा भी निहित है। इस तरह असम की जनता एक बार फिर भाजपा की अगुवाई वाले राजग पर भरोसा जताया है। इसका एक बड़ा कारण सरकार का सभी वर्गों और सभी क्षेत्र के विकास पर बगैर भेदभाव के ध्यान दिया जाना रहा है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/vikram-rao-of-veteran-journalist-reviewing-india-palestine-israel-relations/8487/">बड़ा सवालः इस्राइल से भारत की यारी पर इतना खौफ क्यों ?</a></span></strong></span></p>
<p>अब चर्चा करते हैं पश्चिम बंगाल की जहाँ भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में राज्य की कुल 42 सीटों में 18 पर सफलता पायी थी, जिसमें तृणमूल काँग्रेस को 22 और 2 सीटों पर काँग्रेस का कामयाबी मिली थी। लोकसभा की सफलता के आधार पर भाजपा इस विधानसभा चुनाव में वर्तमान 3सीटों से एकदम 200 से अधिक जीतने की घोषणा करती फिर रही थी।ऐसा करने के लिए उसने पूरी शक्ति झौंक दी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयप्रकाश नड्डा, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी, वरिष्ठ नेता शहनवाज हुसैन, उ.प्र.के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत तमाम नेताओं की सभाएँ करायी गईं। इस बीच चुनावी हिंसा के कई घटनाएँ हुई, इनमें भाजपा समेत दूसरे दलों के कार्यकर्ता मारे गए। इन घटनाओं के लिए टीएमसी कार्यकर्ताओं पर आरोप लगते रहे, पर यह सिलसिला रुका नहीं। कभी ममता बनर्जी ने खुलकर राजनीतिक हिंसा और उसके करने वालों की खुलकर निन्दा तक नहीं की। इसी कारण चुनाव आयोग ने आठ चक्रों में इस राज्य चुनाव कराने का निर्णय लिया था, जिसकी ममता बनर्जी और दूसरे राजनीतिक दलों ने बहुत आलोचना की थी। उसने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर केन्द्र की जनहितकारी योजनाओं यथा-आयुष्मान स्वास्थ्य योजना, किसान सम्मान निधि आदि, को राज्य में लागू न करना, अल्पसंख्यक तुष्टीकरण, हिन्दुओं की हर तरह से उपेक्षा,राजनीतिक हिंसा, स्त्रियों की असुरक्षा, कोयला घोटाला, हर काम में दलाली (टोलाबाजी), गायों की तस्करी में मदद, अपरमित भ्रष्टाचार, घुसपैठिये बांग्लादेशी और रोहिग्या मुसलमानों को संरक्षण देकर देश की सुरक्षा को खतरे में डालने जैसे गम्भीर आरोप लगाए। यहाँ तक कि हिन्दुओं को अपने धार्मिक पर्व-उत्सवों यथा -दुर्गा पूजा, सरस्वती पूजा में प्रतिबन्ध लगाने से लेकर मुल्ला-मौलवियों को सरकार से वेतन तथा मुहर्रहम के जुलूस को तरजीह देने के आरोप भी लगाए। इतना ही नहीं, अपने भ्रष्टाचार में लिप्त भतीजे को न केवल राजनीति में अनावश्यक बढ़ावा देना,बल्कि उसके और उसकी पत्नी के भ्रष्टाचार करने के प्रमाण भी दिये। इस बीच उनके सांसद भतीजे और उसकी पत्नी ,तृणमूल के दूसरे नेताओं से पूछताछ की गई। बंगाल का हर तरह का विकास कर इसे फिर से ‘सोनार बंगला’बनाने का विश्वास दिलाया। फिर भी पश्चिम बंगाल के लोगों ने भाजपा के तमाम आरोपों, उसके सुशासन तथ सर्वांगीण विकास करने के वादे की अनदेखी करते हुए ममता बनर्जी के बंगाल की अस्मिता, बंगाल की बेटी, भाजपा को बाहरी लोगों की पार्टी और उनकी सरकार की जैसी भी कार्यशैली है,उसे बेहतर मानते हुए उन्हें जमकर वोट दिया। उसने भाजपा के प्रत्याशी केन्द्रीय मंत्रियों, सांसदों, पूर्व मंत्रियों, अभिनेता, अभिनेत्रियों को हराने में कोई कोताही नहीं की। ऐसे केरल में एलडीएफ सरकार के मुख्यमंत्री पी.विजयन की महिला अधिकारी के सोने की तस्करी में पकड़े जाने और उसके कई बार सरकार खर्चे पर जाने के कारण उनके इस तस्करी सम्मिलित होने के साथ-साथ राज्य में लव जिहाद, हिन्दुओं की असुरक्षा, राजनीतिक हिंसा, भ्रष्टाचार समेत कई आरोप भाजपा ने लगाए थे, पर इस राज्य की जनता ने एक बार फिर उन्हें सत्ता की कमान सौंप कर भाजपा आरोपों का दरकिनार कर दिया है। इस चुनाव में भाजपा अपने इकलौती सीट भी गंवा बैठी है, जिसने विधानसभा चुनाव जीतने पर देश में ‘मेट्रोमैन’ के नाम से विख्यात मुरलीधरन को मुख्यमंत्री बनाये जाने की घोषणा की थी, पर वह ही चुनाव हार गए। इस राज्य में वामपन्थियों की राजनीतिक हिंसा के सबसे अधिक शिकार भाजपा ,आर.एस.एस.,काँग्रेस आदि के नेता और कार्यकर्ता रहे हैं। अब आते हैं तमिलनाडु की सियासत पर। यहाँ हर पाँच साल के बाद सत्ता बदलने की परम्परा रही है,पर जयललिता ने यह इस रवायत को तोड़ा था।उनके निधन के बाद अन्नाद्रमुक में गुटबाजी शुरू हो गई, फिर मुख्यमंत्री पलानीस्वामी ने बेहतर तरीके से शासन चलाया। उन्होंने कोरोना संकट में पहले भी राज्य की जनता का हर तरह से ख्याल रखा था। इस बार भी वैसा ही कर रहे थे, किन्तु जनता ने पता नहीं,क्यों सियासी बदलाव करना जरूरी समझा, जबकि द्रमुक के नेताओं पर भ्रष्टाचार के काले दाग लगे हैं। अब जहाँ इस चुनाव में भाजपा असम में अपनी सत्ता बचाने और पश्चिम बंगाल में भले ही उसके अपनी सरकार बनाने का अरमान पूरा न हुआ हो, पर उसने 3से 77 सीट पाकर मुख्य और दमदार विपक्षी दल की हैसियत हासिल कर ली है। पुडुचेरी में उसे मिलजुल कर सत्ता में शामिल होने का अवसर भी मिल गया है,लेकिन काँग्रेस पश्चिम बंगाल में महज 1 सीट पा सकी है, जिसकी पिछली विधानसभा में 44 सीटें थी। इसके बाद भी वह पश्चिम बंगाल में अपने अस्तित्व की चिन्ता भूलाकर भाजपा की हार का जश्न मानने में जुटी है। उसका केरल और असम में सत्ता में आने का ख्वाब -ख्वाब ही रह गया, जहाँ हर नए विधानसभा के पश्चात् सत्ता बदलती आयी है। पाडुचेरी में उसका गठबन्धन सत्ता से दूर रह गया। फिर वह अपनी पराजय के कारण पर विचार सुधरने को तैयार नहीं है। यही उसकी बदकिस्मती है। अब वामदल सिर्फ केरल तक सीमित रह गए हैं, पश्चिम बंगाल में उनका लगभग सूपड़ा-साफ हो गया है। वैसे जनता कैसे-कैसे लोगों को चुनती है,ऐसे-ऐसे लोगों को धूल चटा देती है,यह सोच कर हैरानी होती है। इन पाँच राज्यों के विधान सभा चुनावों के परिणामों को दृष्टिगत रखते यह अनुमान लगाना मुश्किल की जनता आखिर क्या सोचकर अपना वोट/मत देती है?</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>(डाॅ.बचन सिंह सिकरवार, देश के कई प्रमुख हिंदी अखबारों में संपादकीय जिम्मेदारियों का निर्वहन कर चुके हैं। देश और दुनिया के प्रमुख समाचार पत्रों में राजनीतिक, अंतरराष्ट्रीय मसलों एवं समसामयिक विषयों पर उनके बेबाक लेख चार दशकों के निरंतर प्रकाशित हो रहे हैं। डॉ. सिकरवार नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट (इंडिया) के संस्थापक सदस्य भी हैं।)</strong></span></p>
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		<title>देश तभी आत्मनिर्भर बनेगा जब हम &#8216;वोकल फॉर लोकल&#8217; अपनाएंगे : स्पीकर बिरला</title>
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		<pubDate>Fri, 26 Feb 2021 16:24:42 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>TISMedia@ शिलांग. आत्मनिर्भर भारत का सपना तभी साकार होगा जब हम वोकल फॉर लोकल का चुनाव करेंगे। हमारी ईस्ट नीति से उत्तर-पूर्व क्षेत्र के विकास की अपार संभावनाओं के द्वार खुले हैं और उत्तर पूर्वी राज्यों को इन अवसरों का अधिकाधिक लाभ उठाना चाहिए। यह बात शुक्रवार को शिलांग में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>TISMedia@ शिलांग.</strong> आत्मनिर्भर भारत का सपना तभी साकार होगा जब हम वोकल फॉर लोकल का चुनाव करेंगे। हमारी ईस्ट नीति से उत्तर-पूर्व क्षेत्र के विकास की अपार संभावनाओं के द्वार खुले हैं और उत्तर पूर्वी राज्यों को इन अवसरों का अधिकाधिक लाभ उठाना चाहिए। यह बात शुक्रवार को शिलांग में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहीं। बिरला गुरुवार को ही शिलांग पहुंचे। उन्होंने शुक्रवार को मेघालय और उत्तर-पूर्वी राज्यों के स्थानीय निकायों के लिए आउटरीच और परिचय कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए कहा कि कार्यपालिका की जवाबदेही केवल संसद और विधानसभाओं में ही नहीं, बल्कि जमीनी स्तर पर भी सुनिश्चित की जानी चाहिए। लघु विधायी निकायों के रूप में कार्य करने वाली स्वायत्त जिला परिषदों को चर्चा और संवाद के जरिए कार्यपालिका की जवाबदेही सुनिश्चित करनी चाहिए।</p>
<p><strong>जनता को केंद्र में रखकर निकाले समस्या का समाधान</strong><br />
स्पीकर बिरला ने स्थानीय निकायों के प्रशासन को पारदर्शी, जवाबदेह और सुगम बनाने के लिए सूचना और संचार तकनीकों व नई प्रौद्योगिकियों के अधिकाधिक उपयोग पर बल दिया। पंचायती राज संस्थाएं समावेशी विकास की अवधारणा के साथ विकास कार्यक्रमों के संबंध में सहयोग और सामूहिकता की भावना से चर्चा करे तथा जनता की समस्याओं का समाधान जनता को केन्द्र में रखकर निकालें। बिरला ने कहा कि हमारे लोकतंत्र को सशक्त बनाने के लिए क्षेत्रीय आकांक्षाओं और राष्ट्रीय एकता के बीच संतुलन बनाने की आवश्यकता है। उन्होंने लोकतांत्रिक संस्थाओं के भागीदारों से सकारात्मक चर्चा और संवाद के माध्यम से समस्याओं का समाधान करने का आग्रह किया । बिरला ने कहा कि हमें अपने विचारों और कार्यों में राष्ट्रीय एकता के मूलभूत आदर्श को प्राथमिकता देनी चाहिए।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>Read More : <a href="https://tismedia.in/kota/sub-inspector-gave-cattle-slaughter-in-kota-deoli-manjhi-police-station-sho-suspend/4800/">पशुबली कांड : देवलीमांझी एसएचओ सस्पेंड, डीएसपी करेंगे जांच</a></strong></span></p>
<p>मेघालय के मुख्य मंत्री डॉ. कॉनरेड के संगमा ने जिला परिषदों को दल-बदल विरोधी कानून के अंतर्गत लाने, ख़ासी, गारो और अन्य भाषाओं को संविधान की 8वीं अनुसूची में शामिल करने, उत्तर-पूर्वी जनजातियों और संस्कृति संबंधी जानकारी को स्कूली बच्चों के राष्ट्रीय पाठ्यक्रम में शामिल करने और उत्तर-पूर्व में राष्ट्रपति आवास स्थापित किए जाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने यह कार्यक्रम शिलांग में आयोजित करने तथा मेघालय और अन्य उत्तर पूर्वी राज्यों के स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों को अपने अनुभव साझा करने का अवसर प्रदान करने के लिए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का आभार जताया। केंद्रीय खाद्य प्रसंस्करण उद्योग राज्य मंत्री रामेश्वर तेली ने कहा कि पंचायतराज संस्थाएं और अन्य स्थानीय निकाय राष्ट्र-निर्माण के शक्तिशाली माध्यम हैं। लोकतान्त्रिक प्रणाली को और सुदृढ़ करने के लिए लोकतन्त्र के परंपरागत मूल्यों का संरक्षण किया जाना चाहिए।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>Read More : <a href="https://tismedia.in/kota/education-department-clerk-suspended/4796/">पुलिस को रौब दिखाना &#8216;बाबू&#8217; को पड़ा भारी, कोर्ट ने जेल भेजा तो सरकार ने सस्पेंड किया</a></strong></span></p>
<p>मेघालय विधानसभा अध्यक्ष मेतबाह लिंगदोह ने स्व-शासन के महत्व पर बल देते हुए कहा कि इससे न केवल आम जनता सशक्त होगी बल्कि शासन को समाज के अंतिम व्यक्ति के द्वार तक पहुंचाने में भी मदद मिलेगी। उन्होने निचले स्तर पर पंचायत राज संस्थाओं और स्वायत्त जिला परिषदों को सशक्त किए जाने पर जोर दिया। मेघालय सरकार के जिला परिषद कार्य विभाग मंत्री लखमन रिम्बुई ने कहा कि शासन की सशक्त लोकतान्त्रिक संस्थाएं विकास का आधार होती हैं । यह आउटरीच कार्यक्रम मेघालय और अन्य उत्तर-पूर्वी राज्यों के स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों के लिए लाभकारी सिद्ध होगा।</p>
<p><strong>इन विषयों पर हुई चर्चा</strong><br />
-भारत की संसद और जमीनी स्तर की संस्थाएं<br />
&#8211; संभावनाएं और चुनौतियाँ<br />
&#8211; नेतृत्व का प्रथम सोपान<br />
-उत्तर-पूर्वी राज्यों में स्थानीय निकायों के नेतृत्व में जनजातीय कल्याण और उत्तर-पूर्वी राज्यों के प्राकृतिक संसाधन और इनके संरक्षण में स्थानीय और परंपरागत निकायों की भूमिका। मेघालय सहित उत्तर-पूर्वी राज्यों के स्थानीय निकायों के लगभग 115 सदस्यों ने कार्यक्रम में भाग लिया। इसके अलावा सभी उत्तर पूर्वी राज्यों से कई प्रतिभागी ऑनलाइन कार्यक्रम मेें शामिल हुए।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>Read More :<a href="https://tismedia.in/kota/kota-artists-honored-to-uit-officer-rd-meena/4803/"> कलाकारों की 21 संस्थाओं ने यूआईटी अधिकारी का किया सम्मान, यूडीएच मंत्री का जताया आभार</a></strong></span></p>
<p><strong>लोकसभा अध्यक्ष की पहल आउटरीच कार्यक्रम</strong></p>
<p>आउटरीच कार्यक्रम लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की पहल है। जिसका उद्देश्य देश की स्थानीय निकायों में सुशासन को बढ़ावा देना है। कार्यक्रम के माध्यम से निचले स्तर से शीर्ष स्तर तक लोकतांत्रिक संस्थाओं द्वारा अपनाई जा रही पद्धतियों और प्रक्रियाओं के बारे में जागरूकता बढ़ाकर लोकतंत्र में भागीदारी को बढ़ावा देने पर बल दिया जा रहा है। पहले आउटरीच का आयोजन 8 जनवरी को देहरादून में किया गया था। जिसमें 445 पंचायत प्रतिनिधियों ने भाग लिया और 40,000 पंचायत प्रतिनिधि और अधिकारी ऑनलाइन कार्यक्रम का हिस्सा बने।</p>
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