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	<title>Bade Bhai Sahab Archives - TIS Media</title>
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	<description>हर अक्षर सच, हर खबर निष्पक्ष </description>
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	<title>Bade Bhai Sahab Archives - TIS Media</title>
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		<title>बड़े भाई साहब&#8230; आज की कहानी</title>
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		<pubDate>Tue, 08 Jun 2021 08:51:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>~मुंशी प्रेम चंद 1 मेरे भाई साहब मुझसे पॉँच साल बडे थे, लेकिन तीन दरजे आगे। उन्‍होने भी उसी उम्र में पढना शुरू किया था जब मैने शुरू किया; लेकिन तालीम जैसे महत्‍व के मामले में वह जल्‍दीबाजी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भवन कि बुनियाद खूब मजबूत डालना चाहते थे जिस &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="color: #ff0000;">~मुंशी प्रेम चंद</span></h4>
<p>1<br />
मेरे भाई साहब मुझसे पॉँच साल बडे थे, लेकिन तीन दरजे आगे। उन्&#x200d;होने भी उसी उम्र में पढना शुरू किया था जब मैने शुरू किया; लेकिन तालीम जैसे महत्&#x200d;व के मामले में वह जल्&#x200d;दीबाजी से काम लेना पसंद न करते थे। इस भवन कि बुनियाद खूब मजबूत डालना चाहते थे जिस पर आलीशान महल बन सके। एक साल का काम दो साल में करते थे। कभी-कभी तीन साल भी लग जाते थे। बुनियाद ही पुख्&#x200d;ता न हो, तो मकान कैसे पाएदार बने।</p>
<p>मैं छोटा था, वह बडे थे। मेरी उम्र नौ साल कि,वह चौदह साल &#x200d;के थे। उन्&#x200d;हें मेरी तम्&#x200d;बीह और निगरानी का पूरा जन्&#x200d;मसिद्ध अधिकार था। और मेरी शालीनता इसी में थी कि उनके हुक्&#x200d;म को कानून समझूँ।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/the-postmaster-story-by-rabindranath-tagore/8978/"><strong>पोस्टमास्टर&#8230; पढिए आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>वह स्&#x200d;वभाव से बडे अघ्&#x200d;ययनशील थे। हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर चिडियों, कुत्&#x200d;तों, बल्लियो की तस्&#x200d;वीरें बनाया करते थें। कभी-कभी एक ही नाम या शब्&#x200d;द या वाक्&#x200d;य दस-बीस बार लिख डालते। कभी एक शेर को बार-बार सुन्&#x200d;दर अक्षर से नकल करते। कभी ऐसी शब्&#x200d;द-रचना करते, जिसमें न कोई अर्थ होता, न कोई सामंजस्&#x200d;य! मसलन एक बार उनकी कापी पर मैने यह इबारत देखी-स्&#x200d;पेशल, अमीना, भाइयों-भाइयों, दर-असल, भाई-भाई, राघेश्&#x200d;याम, श्रीयुत राघेश्&#x200d;याम, एक घंटे तक—इसके बाद एक आदमी का चेहरा बना हुआ था। मैंने चेष्&#x200d;टा की&#x200d; कि इस पहेली का कोई अर्थ निकालूँ; लेकिन असफल रहा और उसने पूछने का साहस न हुआ। वह नवी जमात में थे, मैं पाँचवी में। उनकि रचनाओ को समझना मेरे लिए छोटा मुंह बडी बात थी।</p>
<p>मेरा जी पढने में बिलकुल न लगता था। एक घंटा भी किताब लेकर बैठना पहाड़ था। मौका पाते ही होस्&#x200d;टल से निकलकर मैदान में आ जाता और कभी कंकरियां उछालता, कभी कागज कि तितलियाँ उडाता, और कहीं कोई साथी &#x200d;मिल गया तो पूछना ही क्&#x200d;या कभी चारदीवारी पर चढकर नीचे कूद रहे है, कभी फाटक पर वार, उसे आगे-पीछे चलाते हुए मोटरकार का आनंद उठा रहे है। लेकिन कमरे में आते ही भाई साहब का रौद्र रूप देखकर प्राण सूख जाते। उनका पहला सवाल होता-‘कहां थें?‘ हमेशा यही सवाल, इसी घ्&#x200d;वनि में पूछा जाता था और इसका जवाब मेरे पास केवल मौन था। न जाने मुंह से यह बात क्&#x200d;यों न निकलती कि जरा बाहर खेल रहा था। मेरा मौन कह देता था कि मुझे अपना अपराध स्&#x200d;वीकार है और भाई साहब के लिए इसके सिवा और कोई इलाज न था कि रोष से मिले हुए शब्&#x200d;दों में मेरा सत्&#x200d;कार करें।</p>
<p>‘इस तरह अंग्रेजी पढोगे, तो जिन्&#x200d;दगी-भर पढते रहोगे और एक हर्फ न आएगा। अँगरेजी पढना कोई हंसी-खेल नही है कि जो चाहे पढ ले, नही, ऐरा-गैरा नत्&#x200d;थू-खैरा सभी अंगरेजी कि विद्धान हो जाते। यहां रात-दिन आंखे फोडनी पडती है और खून जलाना पडता है, जब कही यह विधा आती है। और आती क्&#x200d;या है, हां, कहने को आ जाती है। बडे-बडे विद्धान भी शुद्ध अंगरेजी नही लिख सकते, बोलना तो दुर रहा। और मैं कहता हूं, तुम कितने घोंघा हो कि मुझे देखकर भी सबक नही लेते। मैं कितनी मेहनत करता हूं, तुम अपनी आंखो देखते हो, अगर नही देखते, जो यह तुम्&#x200d;हारी आंखो का कसूर है, तुम्&#x200d;हारी बुद्धि का कसूर है। इतने मेले-तमाशे होते है, मुझे तुमने कभी देखने जाते देखा है, रोज ही क्रिकेट और हाकी मैच होते हैं। मैं पास नही फटकता। हमेशा पढता रहा हूं, उस पर भी एक-एक दरजे में दो-दो, तीन-तीन साल पडा रहता हूं फिर तुम कैसे आशा करते हो कि तुम यों खेल-कुद में वक्&#x200d;त गंवाकर पास हो जाओगे? मुझे तो दो-ही-तीन साल लगते हैं, तुम उम्र-भर इसी दरजे में पडे सडते रहोगे। अगर तुम्&#x200d;हे इस तरह उम्र गंवानी है, तो बंहतर है, घर चले जाओ और मजे से गुल्&#x200d;ली-डंडा खेलो। दादा की गाढी कमाई के रूपये क्&#x200d;यो बरबाद करते हो?’</p>
<p>मैं यह लताड़ सुनकर आंसू बहाने लगता। जवाब ही क्&#x200d;या था। अपराध तो मैंने किया, लताड कौन सहे? भाई साहब उपदेश कि कला में निपुण थे। ऐसी-ऐसी लगती बातें कहते, ऐसे-ऐसे सूक्&#x200d;ति-बाण चलाते कि मेरे जिगर के टुकडे-टुकडे हो जाते और हिम्&#x200d;मत छूट जाती। इस तरह जान तोडकर मेहनत करने कि शक्&#x200d;ति मैं अपने में न पाता था और उस निराशा मे जरा देर के लिए मैं सोचने लगता-क्&#x200d;यों न घर चला जाऊँ। जो काम मेरे बूते के बाहर है, उसमे हाथ डालकर क्&#x200d;यो अपनी जिन्&#x200d;दगी खराब करूं। मुझे अपना मूर्ख रहना मंजूर था; लेकिन उतनी मेहनत से मुझे तो चक्&#x200d;कर आ जाता था। लेकिन घंटे–दो घंटे बाद निराशा के बादल फट जाते और मैं इरादा करता कि आगे से खूब जी लगाकर पढूंगा। चटपट एक टाइम-टेबिल बना डालता। बिना पहले से नक्&#x200d;शा बनाए, बिना कोई स्&#x200d;किम तैयार किए काम कैसे शुरूं करूं? टाइम-टेबिल में, खेल-कूद कि मद बिलकुल उड जाती। प्रात:काल उठना, छ: बजे मुंह-हाथ धो, नाश्&#x200d;ता कर पढने बैठ जाना। छ: से आठ तक अंग्रेजी, आठ से नौ तक हिसाब, नौ से साढे नौ तक इतिहास, &#x200d;फिर भोजन और स्&#x200d;कूल। साढे तीन बजे स्&#x200d;कूल से वापस होकर आधा घंण्&#x200d;टा आराम, चार से पांच तक भूगोल, पांच से छ: तक ग्रामर, आघा घंटा होस्&#x200d;टल के सामने टहलना, साढे छ: से सात तक अंग्रेजी कम्&#x200d;पोजीशन, फिर भोजन करके आठ से नौ तक अनुवाद, नौ से दस तक हिन्&#x200d;दी, दस से ग्&#x200d;यारह तक विविध विषय, फिर विश्राम। मगर टाइम-टेबिल बना लेना एक बात है, उस पर अमल करना दूसरी बात। पहले ही दिन से उसकी अवहेलना शुरू हो जाती। मैदान की वह सुखद हरियाली, हवा के वह हलके-हलके झोके, फुटबाल की उछल-कूद, कबड्डी के वह दांव-घात, वाली-बाल की वह तेजी और फुरती मुझे अज्ञात और अनिर्वाय रूप से खीच ले जाती और वहां जाते ही मैं सब कुछ भूल जाता। वह जान-लेवा टाइम-टेबिल, वह आंखफोड पुस्&#x200d;तके किसी कि याद न रहती, और फिर भाई साहब को नसीहत और फजीहत का अवसर मिल जाता। मैं उनके साये से भागता, उनकी आंखो से दूर रहने कि चेष्&#x200d;टा करता। कमरे मे इस तरह दबे पांव आता कि उन्&#x200d;हे खबर न हो। उनकि नजर मेरी ओर उठी और मेरे प्राण निकले। हमेशा सिर पर नंगी तलवार-सी लटकती मालूम होती। फिर भी जैसे मौत और विपत्&#x200d;ति के बीच मे भी आदमी मोह और माया के बंधन में जकडा रहता है, मैं फटकार और घुडकियां खाकर भी खेल-कूद का तिरस्&#x200d;कार न कर सकता।</p>
<p>2<br />
सालाना इम्&#x200d;तहान हुआ। भाई साहब फेल हो गए, मैं पास हो गया और दरजे में प्रथम आया। मेरे और उनके बीच केवल दो साल का अन्&#x200d;तर रह गया। जी में आया, भाई साहब को आडें हाथो लूँ—आपकी वह घोर तपस्&#x200d;या कहाँ गई? मुझे देखिए, मजे से खेलता भी रहा और दरजे में अव्&#x200d;वल भी हूं। लेकिन वह इतने दु:खी और उदास थे कि मुझे उनसे दिल्&#x200d;ली हमदर्दी हुई और उनके घाव पर नमक छिडकने का विचार ही लज्&#x200d;जास्&#x200d;पद जान पडा। हां, अब मुझे अपने ऊपर कुछ अभिमान हुआ और आत्&#x200d;माभिमान भी बढा भाई साहब का वहरोब मुझ पर न रहा। आजादी से खेल–कूद में शरीक होने लगा। दिल मजबूत था। अगर उन्&#x200d;होने फिर मेरी फजीहत की, तो साफ कह दूँगा—आपने अपना खून जलाकर कौन-सा तीर मार लिया। मैं तो खेलते-कूदते दरजे में अव्&#x200d;वल आ गया। जबावसेयह हेकडी जताने कासाहस न होने पर भी मेरे रंग-ढंग से साफ जाहिर होता था कि भाई साहब का वह आतंक अब मुझ पर नहीं है। भाई साहब ने इसे भाँप लिया-उनकी ससहसत बुद्धि बडी तीव्र थी और एक दिन जब मै भोर का सारा समय गुल्&#x200d;ली-डंडे कि भेंट करके ठीक भोजन के समय लौटा, तो भाई साइब ने मानो तलवार खीच ली और मुझ पर टूट पडे-देखता हूं, इस साल पास हो गए और दरजे में अव्&#x200d;वल आ गए, तो तुम्&#x200d;हे दिमाग हो गया है; मगर भाईजान, घमंड तो बडे-बडे का नही रहा, तुम्&#x200d;हारी क्&#x200d;या हस्&#x200d;ती है, इतिहास में रावण का हाल तो पढ़ा ही होगा। उसके चरित्र से तुमने कौन-सा उपदेश लिया? या यो ही पढ गए? महज इम्&#x200d;तहान पास कर लेना कोई चीज नही, असल चीज है बुद्धि का विकास। जो कुछ पढो, उसका अभिप्राय समझो। रावण भूमंडल का स्&#x200d;वामी था। ऐसे राजो को चक्रवर्ती कहते है। आजकल अंगरेजो के राज्&#x200d;य का विस्&#x200d;तार बहुत बढा हुआ है, पर इन्&#x200d;हे चक्रवर्ती नहीं कह सकते। संसार में अनेको राष्&#x200d;ट़्र अँगरेजों का आधिपत्&#x200d;य स्&#x200d;वीकार नहीं करते। बिलकुल स्&#x200d;वाधीन हैं। रावण चक्रवर्ती राजा था। संसार के सभी महीप उसे कर देते थे। बडे-बडे देवता उसकी गुलामी करते थे। आग और पानी के देवता भी उसके दास थे; मगर उसका अंत क्&#x200d;या हुआ, घमंड ने उसका नाम-निशान तक मिटा दिया, कोई उसे एक चिल्&#x200d;लू पानी देनेवाला भी न बचा। आदमी जो कुकर्म चाहे करें; पर अभिमान न करे, इतराए नही। अभिमान किया और दीन-दुनिया से गया।</p>
<p>शैतान का हाल भी पढा ही होगा। उसे यह अनुमान हुआ था कि ईश्&#x200d;वर का उससे बढकर सच्&#x200d;चा भक्&#x200d;त कोई है ही नहीं। अन्&#x200d;त में यह हुआ कि स्&#x200d;वर्ग से नरक में ढकेल दिया गया। शाहेरूम ने भी एक बार अहंकार किया था। भीख मांग-मांगकर मर गया। तुमने तो अभी केवल एक दरजा पास किया है और अभी से तुम्&#x200d;हारा सिर फिर&#x200d; गया, तब तो तुम आगे बढ चुके। यह समझ लो कि तुम अपनी मेहनत से नही पास हुए, अन्&#x200d;धे के हाथ बटेर लग गई। मगर बटेर केवल एक बार हाथ लग सकती है, बार-बार नहीं। कभी-कभी गुल्&#x200d;ली-डंडे में भी अंधा चोट निशाना पड़ जाता है। उससे कोई सफल खिलाड़ी नहीं हो जाता। सफल खिलाड़ी वह है, जिसका कोई निशान खाली न जाए।</p>
<p>मेरे फेल होने पर न जाओ। मेरे दरजे में आओगे, तो दाँतो पसीना आयगा। जब अलजबरा और जामेंट्री के लोहे के चने चबाने पड़ेंगे और इंगलिस्&#x200d;तान का इतिहास पढ़ना पड़ेंगा! बादशाहों के नाम याद रखना आसान नहीं। आठ-आठ हेनरी को गुजरे है कौन-सा कांड किस हेनरी के समय हुआ, क्&#x200d;या यह याद कर लेना आसान समझते हो? हेनरी सातवें की जगह हेनरी आठवां लिखा और सब नम्&#x200d;बर गायब! सफाचट। सिर्फ भी न मिलगा, सिफर भी! हो किस ख्&#x200d;याल में! दरजनो तो जेम्&#x200d;स हुए हैं, दरजनो विलियम, कोडियों चार्ल्&#x200d;स दिमाग चक्&#x200d;कर खाने लगता है। आंधी रोग हो जाता है। इन अभागो को नाम भी न जुडते थे। एक ही नाम के पीछे दोयम, तेयम, चहारम, पंचम नगाते चले गए। मुछसे पूछते, तो दस लाख नाम बता देता।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/namak-ka-daroga-story-by-munshi-prem-chand/8954/"><strong>नमक का दारोगा&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>और जामेट्री तो बस खुदा की पनाह! अ ब ज की जगह अ ज ब लिख दिया और सारे नम्&#x200d;बर कट गए। कोई इन निर्दयी मुमतहिनों से नहीं पूछता कि आखिर अ ब ज और अ ज ब में क्&#x200d;या फर्क है और व्&#x200d;यर्थकी बात के लिए क्&#x200d;यो छात्रो का खून करते हो दाल-भात-रोटी खायी या भात-दाल-रोटी खायी, इसमें क्&#x200d;या रखा है; मगर इन परीक्षको को क्&#x200d;या परवाह! वह तो वही देखते है, जो पुस्&#x200d;तक में लिखा है। चाहते हैं कि लडके अक्षर-अक्षर रट डाले। और इसी रटंत का नाम शिक्षा रख छोडा है और आखिर इन बे-सिर-पैर की बातो के पढ़ने से क्&#x200d;या फायदा?</p>
<p>इस रेखा पर वह लम्&#x200d;ब गिरा दो, तो आधार लम्&#x200d;ब से दुगना होगा। पूछिए, इससे प्रयोजन? दुगना नही, चौगुना हो जाए, या आधा ही रहे, मेरी बला से, लेकिन परीक्षा में पास होना है, तो यह सब खुराफात याद करनी पड़ेगी। कह दिया-‘समय की पाबंदी’ पर एक निबन्&#x200d;ध लिखो, जो चार पन्&#x200d;नो से कम न हो। अब आप कापी सामने खोले, कलम हाथ में लिये, उसके नाम को रोइए।</p>
<p>कौन नहीं जानता कि समय की पाबन्&#x200d;दी बहुत अच्&#x200d;छी बात है। इससे आदमी के जीवन में संयम आ जाता है, दूसरो का उस पर स्&#x200d;नेह होने लगता है और उसके करोबार में उन्&#x200d;नति होती है; जरा-सी बात पर चार पन्&#x200d;ने कैसे लिखें? जो बात एक वाक्&#x200d;य में कही जा सके, उसे चार पन्&#x200d;ने में लिखने की जरूरत? मैं तो इसे हिमाकत समझता हूं। यह तो समय की किफायत नही, बल्&#x200d;कि उसका दुरूपयोग है कि व्&#x200d;यर्थ में किसी बात को ठूंस दिया। हम चाहते है, आदमी को जो कुछ कहना हो, चटपट कह दे और अपनी राह ले। मगर नही, आपको चार पन्&#x200d;ने रंगने पडेंगे, चाहे जैसे लिखिए और पन्&#x200d;ने भी पूरे फुल्&#x200d;सकेप आकार के। यह छात्रो पर अत्&#x200d;याचार नहीं तो और क्&#x200d;या है? अनर्थ तो यह है कि कहा जाता है, संक्षेप में लिखो। समय की पाबन्&#x200d;दी पर संक्षेप में एक निबन्&#x200d;ध लिखो, जो चार पन्&#x200d;नो से कम न हो। ठीक! संक्षेप में चार पन्&#x200d;ने हुए, नही शायद सौ-दो सौ पन्&#x200d;ने लिखवाते। तेज भी दौडिए और धीरे-धीरे भी। है उल्&#x200d;टी बात या नही? बालक भी इतनी-सी बात समझ सकता है, लेकिन इन अध्&#x200d;यापको को इतनी तमीज भी नहीं। उस पर दावा है कि हम अध्&#x200d;यापक है। मेरे दरजे में आओगे लाला, तो ये सारे पापड बेलने पड़ेंगे और तब आटे-दाल का भाव मालूम होगा। इस दरजे में अव्&#x200d;वल आ गए हो, वो जमीन पर पांव नहीं रखते इसलिए मेरा कहना मानिए। लाख फेल हो गया हूँ, लेकिन तुमसे बड़ा हूं, संसार का मुझे तुमसे ज्&#x200d;यादा अनुभव है। जो कुछ कहता हूं, उसे &#x200d; गिरह बांधिए नही पछताएँगे।</p>
<p>स्&#x200d;कूल का समय निकट था, नहीं इश्&#x200d;वर जाने, यह उपदेश-माला कब समाप्&#x200d;त होती। भोजन आज मुझे निस्&#x200d;स्&#x200d;वाद-सा लग रहा था। जब पास होने पर यह तिरस्&#x200d;कार हो रहा है, तो फेल हो जाने पर तो शायद प्राण ही ले लिए जाएं। भाई साहब ने अपने दरजे की पढाई का जो भयंकर चित्र खीचा था; उसने मुझे भयभीत कर दिया। कैसे स्&#x200d;कूल छोडकर घर नही भागा, यही ताज्&#x200d;जुब है; लेकिन इतने तिरस्&#x200d;कार पर भी पुस्&#x200d;तकों में मेरी अरूचि ज्&#x200d;यो-कि-त्&#x200d;यों बनी रही। खेल-कूद का कोई अवसर हाथ से न जाने देता। पढ़ता भी था, मगर बहुत कम। बस, इतना कि रोज का टास्&#x200d;क पूरा हो जाए और दरजे में जलील न होना पडें। अपने ऊपर जो विश्&#x200d;वास पैदा हुआ था, वह फिर लुप्&#x200d;त हो गया और &#x200d;&#x200d;फिर चोरो का-सा जीवन कटने लगा।</p>
<p>3<br />
फिर सालाना इम्&#x200d;तहान हुआ, और कुछ ऐसा संयोग हुआ कि मै &#x200d;&#x200d;&#x200d;&#x200d;&#x200d;&#x200d;फ&#x200d;िर पास हुआ और भाई साहब फिर &#x200d;फेल हो गए। मैंने बहुत मेहनत न की पर न जाने, कैसे दरजे में अव्&#x200d;वल आ गया। मुझे खुद अचरज हुआ। भाई साहब ने प्राणांतक परिश्रम किया था। कोर्स का एक-एक शब्&#x200d;द चाट गये थे; दस बजे रात तक इधर, चार बजे भोर से उभर, छ: से साढे नौ तक स्&#x200d;कूल जाने के पहले। मुद्रा कांतिहीन हो गई थी, मगर बेचारे फेल हो गए। मुझे उन पर दया आ&#x200d;ती&#x200d;&#x200d; थी। नतीजा सुनाया गया, तो वह रो पड़े और मैं भी रोने लगा। अपने पास होने वाली खुशी आधी हो गई। मैं भी फेल हो गया होता, तो भाई साहब को इतना दु:ख न होता, लेकिन विधि की बात कौन टाले?</p>
<p>मेरे और भाई साहब के बीच में अब केवल एक दरजे का अन्&#x200d;तर और रह गया। मेरे मन में एक कुटिल भावना उदय हुई कि कही भाई साहब एक साल और फेल हो जाएँ, तो मै उनके बराबर हो जाऊं, &#x200d;फिर वह किस आधार पर मेरी फजीहत कर सकेगे, लेकिन मैंने इस कमीने विचार को दिल&#x200d; से बलपूर्वक निकाल डाला। आखिर वह मुझे मेरे हित के विचार से ही तो डांटते हैं। मुझे उस वक्&#x200d;त अप्रिय लगता है अवश्&#x200d;य, मगर यह शायद उनके उपदेशों का ही असर हो कि मैं दनानद पास होता जाता हूं और इतने अच्&#x200d;छे नम्&#x200d;बरों से।</p>
<p>अबकी भाई साहब बहुत-कुछ नर्म पड़ गए थे। कई बार मुझे डांटने का अवसर पाकर भी उन्&#x200d;होंने धीरज से काम लिया। शायद अब वह खुद समझने लगे थे कि मुझे डांटने का अधिकार उन्&#x200d;हे नही रहा; या रहा तो बहुत कम। मेरी स्&#x200d;वच्&#x200d;छंदता भी बढी। मैं उनकि सहिष्&#x200d;णुता का अनुचित लाभ उठाने लगा। मुझे कुछ ऐसी धारणा हुई कि मैं तो पास ही हो जाऊंगा, पढू या न पढूं मेरी तकदीर बलवान् है, इसलिए भाई साहब के डर से जो थोडा-बहुत बढ लिया करता था, वह भी बंद हुआ। मुझे कनकौए उडाने का नया शौक पैदा हो गया था और अब सारा समय पतंगबाजी ही की भेंट होता था, &#x200d;िफर भी मैं भाई साहब का अदब करता था, और उनकी नजर बचाकर कनकौए उड़ाता था। मांझा देना, कन्&#x200d;ने बांधना, पतंग टूर्नामेंट की तैयारियां आदि समस्&#x200d;याएँ अब गुप्&#x200d;त रूप से हल की जाती थीं। भाई साहब को यह संदेह न करने देना चाहता था कि उनका सम्&#x200d;मान और लिहाज मेरी नजरो से कम हो गया है।</p>
<p>एक दिन संध्&#x200d;या समय होस्&#x200d;टल से दूर मै एक कनकौआ लूटने बंतहाशा दौडा जा रहा था। आंखे आसमान की ओर थीं और मन उस आकाशगामी पथिक की ओर, जो मंद गति से झूमता पतन की ओर चला जा रहा था, मानो कोई आत्&#x200d;मा स्&#x200d;वर्ग से निकलकर विरक्&#x200d;त मन से नए संस्&#x200d;कार ग्रहण करने जा रही हो। बालकों की एक पूरी सेना लग्&#x200d;गे और झड़दार बांस लिये उनका स्&#x200d;वागत करने को दौड़ी आ रही थी। किसी को अपने आगे-पीछे की खबर न थी। सभी मानो उस पतंग के साथ ही आकाश में उड़ रहे थे, जहॉं सब कुछ समतल है, न मोटरकारे है, न ट्राम, न गाडियाँ। सहसा भाई साहब से मेरी मुठभेड हो गई, जो शायद बाजार से लौट रहे थे। उन्&#x200d;होने वही मेरा हाथ पकड लिया और उग्रभाव से बोले-इन बाजारी लौंडो के साथ धेले के कनकौए के लिए दौड़ते तुम्&#x200d;हें शर्म नही आती? तुम्&#x200d;हें इसका भी कुछ लिहाज नहीं कि अब नीची जमात में नहीं हो, बल्कि आठवीं जमात में आ गये हो और मुझसे केवल एक दरजा नीचे हो। आखिर आदमी को कुछ तो अपनी पोजीशन का ख्याल करना चाहिए। एक जमाना था कि कि लोग आठवां दरजा पास करके नायब तहसीलदार हो जाते थे। मैं कितने ही मिडलचियों को जानता हूं, जो आज अव्&#x200d;वल दरजे के डिप्&#x200d;टी मजिस्&#x200d;ट्रेट या सुपरिटेंडेंट है। कितने ही आठवी जमाअत वाले हमारे लीडर और समाचार-पत्रो के सम्&#x200d;पादक है। बडें-बडें विद्धान उनकी मातहती में काम करते है और तुम उसी आठवें दरजे में आकर बाजारी लौंडों के साथ कनकौए के लिए दौड़ रहे हो। मुझे तुम्&#x200d;हारी इस कमअकली पर दु:ख होता है। तुम जहीन हो, इसमें शक नही: लेकिन वह जेहन किस काम का, जो हमारे आत्&#x200d;मगौरव की हत्&#x200d;या कर डाले? तुम अपने दिन में समझते होगे, मैं भाई साहब से महज एक दर्जा नीचे हूं और अब उन्&#x200d;हे मुझको कुछ कहने का हक नही है; लेकिन यह तुम्&#x200d;हारी गलती है। मैं तुमसे पांच साल बडा हूं और चाहे आज तुम मेरी ही जमाअत में आ जाओ–और परीक्षकों का यही हाल है, तो निस्&#x200d;संदेह अगले साल तुम मेरे समकक्ष हो जाओगे और शायद एक साल बाद तुम मुझसे आगे निकल जाओ-लेकिन मुझमें और जो पांच साल का अन्&#x200d;तर है, उसे तुम क्&#x200d;या, खुदा भी नही मिटा सकता। मैं तुमसे पांच साल बडा हूं और हमेशा रहूंगा। मुझे दुनिया का और जिन्&#x200d;दगी का जो तजरबा है, तुम उसकी बराबरी नहीं कर सकते, चाहे तुम एम. ए., डी. फिल. और डी. लिट. ही क्&#x200d;यो न हो जाओ। समझ किताबें पढने से नहीं आती है। हमारी अम्&#x200d;मा ने कोई दरजा पास नही किया, और दादा भी शायद पांचवी जमाअत के आगे नही गये, लेकिन हम दोनो चाहे सारी दुनिया की विधा पढ ले, अम्&#x200d;मा और दादा को हमें समझाने और सुधारने का अधिकार हमेशा रहेगा। केवल इसलिए नही कि वे हमारे जन्&#x200d;मदाता है, ब&#x200d;ल्कि इसलिए कि उन्&#x200d;हे दुनिया का हमसे ज्&#x200d;यादा जतरबा है और रहेगा। अमेरिका में किस जरह कि राज्&#x200d;य-व्&#x200d;यवस्&#x200d;था है और आठवे हेनरी ने कितने विवाह किये और आकाश में कितने नक्षत्र है, यह बाते चाहे उन्&#x200d;हे न मालूम हो, लेकिन हजारों ऐसी आते है, जिनका ज्ञान उन्&#x200d;हे हमसे और तुमसे ज्&#x200d;यादा है।</p>
<p>दैव न करें, आज मैं बीमार हो आऊं, तो तुम्&#x200d;हारे हाथ-पांव फूल जाएगें। दादा को तार देने के सिवा तुम्&#x200d;हे और कुछ न सूझेंगा; लेकिन तुम्&#x200d;हारी जगह पर दादा हो, तो किसी को तार न दें, न घबराएं, न बदहवास हों। पहले खुद मरज पहचानकर इलाज करेंगे, उसमें सफल न हुए, तो किसी डांक्&#x200d;टर को बुलायेगें। बीमारी तो खैर बडी चीज है। हम-तुम तो इतना भी नही जानते कि महीने-भर का महीने-भर कैसे चले। जो कुछ दादा भेजते है, उसे हम बीस-बाईस तक र्खच कर डालते है और पैसे-पैसे को मोहताज हो जाते है। नाश्&#x200d;ता बंद हो जाता है, धोबी और नाई से मुंह चुराने लगते है; लेकिन जितना आज हम और तुम र्खच कर रहे है, उसके आधे में दादा ने अपनी उम्र का बडा भाग इज्&#x200d;जत और नेकनामी के साथ निभाया है और एक कुटुम्&#x200d;ब का पालन किया है, जिसमे सब मिलाकर नौ आदमी थे। अपने हेडमास्&#x200d;टर साहब ही को देखो। एम. ए. हैं कि नही, और यहा के एम. ए. नही, आक्&#x200d;यफोर्ड के। एक हजार रूपये पाते है, लेकिन उनके घर इंतजाम कौन करता है? उनकी बूढी मां। हेडमास्&#x200d;टर साहब की डिग्री यहां बेकार हो गई। पहले खुद घर का इंतजाम करते थे। खर्च पूरा न पड़ता था। करजदार रहते थे। जब से उनकी माताजी ने प्रबंध अपने हाथ मे ले लिया है, जैसे घर में लक्ष्&#x200d;मी आ गई है। तो भाईजान, यह जरूर दिल से निकाल डालो कि तुम मेरे समीप आ गये हो और अब स्&#x200d;वतंत्र हो। मेरे देखते तुम बेराह नही चल पाओगे। अगर तुम यों न मानोगे, तो मैं (थप्&#x200d;पड दिखाकर) इसका प्रयोग भी कर सकता हूं। मैं जानता हूं, तुम्&#x200d;हें मेरी बातें जहर लग रही है।</p>
<p>मैं उनकी इस नई युक्&#x200d;ति से नतमस्&#x200d;तक हो गया। मुझे आज सचमुच अपनी लघुता का अनुभव हुआ और भाई साहब के प्रति मेरे तम में श्रद्धा उत्&#x200d;पन्&#x200d;न हुईं। मैंने सजल आंखों से कहा-हरगिज नही। आप जो कुछ फरमा रहे है, वह बिलकुल सच है और आपको कहने का अधिकार है।</p>
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<p>भाई साहब ने मुझे गले लगा लिया और बाल-कनकाए उड़ान को मना नहीं करता। मेरा जी भी ललचाता है, लेकिन क्या करूँ, खुद बेराह चलूं तो तुम्हारी रक्षा कैसे करूँ? यह कर्त्तव्य भी तो मेरे सिर पर है।</p>
<p>संयोग से उसी वक्त एक कटा हुआ कनकौआ हमारे ऊपर से गुजरा। उसकी डोर लटक रही थी। लड़कों का एक गोल पीछे-पीछे दौड़ा चला आता था। भाई साहब लंबे हैं ही, उछलकर उसकी डोर पकड़ ली और बेतहाशा होटल की तरफ दौड़े। मैं पीछे-पीछे दौड़ रहा था।</p>
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