<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0"
	xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/"
	xmlns:wfw="http://wellformedweb.org/CommentAPI/"
	xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/"
	xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"
	xmlns:sy="http://purl.org/rss/1.0/modules/syndication/"
	xmlns:slash="http://purl.org/rss/1.0/modules/slash/"
	>

<channel>
	<title>Bazar-Darshan Story Archives - TIS Media</title>
	<atom:link href="https://tismedia.in/tag/bazar-darshan-story/feed/" rel="self" type="application/rss+xml" />
	<link>https://tismedia.in/tag/bazar-darshan-story/</link>
	<description>हर अक्षर सच, हर खबर निष्पक्ष </description>
	<lastBuildDate>Tue, 01 Jun 2021 09:57:32 +0000</lastBuildDate>
	<language>en-US</language>
	<sy:updatePeriod>
	hourly	</sy:updatePeriod>
	<sy:updateFrequency>
	1	</sy:updateFrequency>
	<generator>https://wordpress.org/?v=6.9.4</generator>

<image>
	<url>https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/04/cropped-tis-media-logo-scaled-2-32x32.jpg</url>
	<title>Bazar-Darshan Story Archives - TIS Media</title>
	<link>https://tismedia.in/tag/bazar-darshan-story/</link>
	<width>32</width>
	<height>32</height>
</image> 
	<item>
		<title>बाजार-दर्शन&#8230; पढ़िए आज की कहानी</title>
		<link>https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/bazar-darshan-story-by-jainendra-kumar/8872/?utm_source=rss&#038;utm_medium=rss&#038;utm_campaign=bazar-darshan-story-by-jainendra-kumar</link>
					<comments>https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/bazar-darshan-story-by-jainendra-kumar/8872/#respond</comments>
		
		<dc:creator><![CDATA[tismedia.in]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 01 Jun 2021 09:57:32 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Art and Literature]]></category>
		<category><![CDATA[Cover Stories]]></category>
		<category><![CDATA[Editorial]]></category>
		<category><![CDATA[Top Stories]]></category>
		<category><![CDATA[Bazar-Darshan]]></category>
		<category><![CDATA[Bazar-Darshan Story]]></category>
		<category><![CDATA[hindi news]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi Story]]></category>
		<category><![CDATA[Jainendra Kumar]]></category>
		<category><![CDATA[latest news]]></category>
		<category><![CDATA[Story By Jainendra Kumar]]></category>
		<category><![CDATA[the inside stories]]></category>
		<category><![CDATA[TISMedia]]></category>
		<guid isPermaLink="false">https://tismedia.in/?p=8872</guid>

					<description><![CDATA[<p>~जैनेंद्र कुमार एक बार की बात कहता हूँ। मित्र बाजार गए तो थे कोई एक मामूली चीज लेने पर लौटे तो एकदम बहुत-से बंडल पास थे। मैंने कहा &#8211; यह क्‍या? बोले &#8211; यह जो साथ थीं। उनका आशय था कि यह पत्‍नी की महिमा है। उस महिमा का मैं कायल हूँ। आदि काल से &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/bazar-darshan-story-by-jainendra-kumar/8872/">बाजार-दर्शन&#8230; पढ़िए आज की कहानी</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="color: #ff0000;">~जैनेंद्र कुमार</span></h4>
<p>एक बार की बात कहता हूँ। मित्र बाजार गए तो थे कोई एक मामूली चीज लेने पर लौटे तो एकदम बहुत-से बंडल पास थे।</p>
<p>मैंने कहा &#8211; यह क्&#x200d;या?</p>
<p>बोले &#8211; यह जो साथ थीं।</p>
<p>उनका आशय था कि यह पत्&#x200d;नी की महिमा है। उस महिमा का मैं कायल हूँ। आदि काल से इस विषय में पति से पत्&#x200d;नी की हो प्रमुखता प्रमाणित है। और यह व्&#x200d;यक्तित्&#x200d;व का प्रश्&#x200d;न नहीं, स्&#x200d;त्रीत्&#x200d;व का प्रश्&#x200d;न है। स्&#x200d;त्री माया न जोड़े, तो क्&#x200d;या मैं जोड़ूँ? फिर भी सच है और वह यह कि इस बात में पत्&#x200d;नी की ओट ली जाती है। मूल में एक और तत्व को महिमा सविशेष है। वह तत्व है मनीबेग, अर्थात पैसे की गरमी या एनर्जी।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/juloos-story-by-munshi-premchand/8848/">जुलूस&#8230; पढ़िए आज की कहानी</a></span></strong></span></p>
<p>पैसा पावर है। पर उसके सबूत में आस-पास माल-टाल न जमा हो तो क्&#x200d;या वह खाक पावर है! पैसे को देखने के लिए बैंक-हिसाब देखिए, पर पाल-असबाब मकान-कोठी तो अनदेखे भी दीखते हैं। पैसे की उस &#8216;पर्चेजिंग पावर&#8217; के प्रयोग में हो पावर का रस है।</p>
<p>लेकिन नहीं। लोग संयमी भी होते हैं। वे फि़जूल सामान को फिजूल समझते हैं। वे पैसा बहाते नहीं हैं और बुद्धिमान होते हैं। बुद्धि और संयमपूर्वक वह पैसे को जोड़ते जाते हैं, जोड़ते जाते हैं। वह पैसे की पावर को इतना निश्&#x200d;चय समझते हैं कि उसके प्रयोग की परीक्षा उन्&#x200d;हें दरकार नहीं है। बस खुद पैसे के जुड़ा होने पर उनका मन गर्व से भरा फूला रहता है।</p>
<p>मैंने कहा &#8211; यह कितना सामान ले आए!</p>
<p>मित्र ने सामने मनीबेग फैला दिया, कहा &#8211; यह देखिए। सब उड़ गया, अब जो रेल-टिकट के लिए भी बचा हो!</p>
<p>मैंने तक तय माना कि और पैसा होता और सामान आता। वह सामान जरूरत की तरफ देखकर नहीं आया, अपनी &#8216;पर्चेजिंग पावर&#8217; के अनुपात में आया है।</p>
<p>लेकिन ठहरिए। इस सिलसिले में एक और भी महत्व का तत्व है, जिसे नहीं भूलना चाहिए। उसका भी इस करतब में बहुत-कुछ हाथ है। वह महत्&#x200d;तत्&#x200d;व है, बाजार।</p>
<p>मैंने कहा &#8211; यह इतना कुछ नाहक ले आए!</p>
<p>मित्र बोले &#8211; कुछ न पूछो। बाजार है कि शैतान का जाल है? ऐसा सजा-सजाकर माल रखते हैं कि बेहया ही हो जो न फँसे।</p>
<p>मैंने मन में कहा, ठीक। बाजार आमंत्रित करता है कि आओ मुझे लूटो और लूटो। सब भूल जाओ, मुझे देखो। मेरा रूप और किसके लिए है? मैं तुम्&#x200d;हारे लिए हूँ। नहीं कुछ चाहते हो, तो भी देखने में क्&#x200d;या हरज है। अजी आओ भी।</p>
<p>इस आमंत्रण में यह खूबी है कि आग्रह नहीं है आग्रह तिरस्&#x200d;कार जगाता है। लेकिन ऊँचे बाजार का आमंत्रण मूक होता है और उससे चाह जगती है। चाह मतलब अभाव। चौक बाजार में खड़े होकर आदमी को लगने लगता है कि उसके अपने पास काफी नहीं है। और चाहिए, और चाहिये। मेरे यहाँ कितना परिमित है और यहाँ कितना अतुलित है। ओह!</p>
<p>कोई अपने को न जाने तो बाजार का यह चौक उसे कामना से विकल बना छोड़े। विकल क्&#x200d;यों, पागल। असंतोष, तृष्&#x200d;णा और ईर्ष्&#x200d;या से घायल कर मनुष्&#x200d;य को सदा के लिए यह बेकार बड़ा डाल सकता है।</p>
<p>एक और मित्र की बात है। यह दोपहर के पहले के गए-गए बाजार से कहीं शाम की वापिस आए। आए तो खाली हाथ!</p>
<p>मैंने पूछा &#8211; कहाँ रहे?</p>
<p>बोले &#8211; बाजार देखते रहे।</p>
<p>मैंने कहा &#8211; बाजार का देखते क्&#x200d;या रहे?</p>
<p>बोले &#8211; क्&#x200d;यों? बाजार &#8211;</p>
<p>तब मैंने कहा &#8211; लाए तो कुछ नहीं!</p>
<p>बोले &#8211; हाँ। पर यह समझ न आता था कि न लूँ तो क्&#x200d;या? सभी कुछ तो लेने को जी होता था। कुछ लेने का मतलब था शेष सब-कुछ को छोड़ देना। पर मैं कुछ भी नहीं छोड़ना चाहता था। इससे मैं कुछ भी नहीं ले सका।</p>
<p>मैंने कहा &#8211; खूब!</p>
<p>पर मित्र की बात ठीक थी। अगर ठीक पता नहीं है कि क्&#x200d;या चाहते हो तो सब ओर की चाह तुम्&#x200d;हें घेर लेगी। और तब परिणाम त्रास ही होगा, गति नहीं होगी, न कर्म।</p>
<p>बाजार में एक जादू है। वह जादू आँख की राह काम करता है। वह रूप का जादू है। पर जैसे चुंबक का जादू लोहे पर ही चलता है, वैसे ही इस जादू की भी मर्यादा है। जेब भरी हो, और मन खाली हो, ऐसी हालत में जादू का असर खूब होता है। जेब खाली पर मन भरा न हो, तो भी जादू चल जाएगा। मन खाली है तो बाजार की अनेकानेक चीजों का निमंत्रण उस तक पहुँच जाएगा कहीं हुई उस वक्&#x200d;त जेब भरी तब तो फिर वह मन किसकी मानने वाला है! मालूम होता है यह भी लूँ, वह भी लूँ। सभी सामान जरूरी और आराम को बढ़ाने वाला मालूम होता है। पर यह सब जादू का असर है। जादू की सवारी उतरी कि पता चलता है कि फैंसी चीजों की बहुतायत आराम में मदद नहीं देती, बल्कि खलल ही डालती है। थोड़ी देर को स्&#x200d;वाभिमान को जरूर सेंक मिल जाता है। पर इससे अभिमान की गिल्&#x200d;टी की ओर खुराक ही मिलती है। जकड़ रेशमी डोरी की हो तो रेशम के स्&#x200d;पर्श के मुलायम के कारण क्&#x200d;या वह कम जकड़ होगी?</p>
<p>पर उस जादू की जकड़ से बचने का एक सीधा-सा उपाय है। वह यह कि बाजार जाओ तो मन खाली न हो। मन खाली हो, तब बाजार न जाओ। कहते हैं लू में जाना हो तो पानी पीकर जाना चाहिए। पानी भीतर हो, लू का लूपन व्&#x200d;यर्थ हो जाता है। मन लक्ष्&#x200d;य में भरा हो तो बाजार भी फैला-का-फैला ही रह जायगा। तब वह घाव बिलकुल नहीं दे सकेगा, बल्कि कुछ आनंद ही देगा। तब बाजार तुमसे कृतार्थ होगा, क्&#x200d;योंकि तुम कुछ-न-कुछ सच्&#x200d;चा लाभ उसे दोगे। बाजार की असली कृतार्थता है आवश्&#x200d;यकता के समय काम आना।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/rishvat-story-by-saadat-hasan-manto/8831/">रिश्वत&#8230; आज की कहानी</a></span></strong></span></p>
<p>यहाँ एक अंतर चीन्&#x200d;ह लेना बहुत जरूरी है। मन खाली नहीं रहना चाहिए, इसका मतलब यह नहीं है कि वह मन बंद रहना चाहिए। जो बंद हो जायगा, वह शून्&#x200d;य हो जायगा। शून्&#x200d;य होने का अधिकार बस परमात्&#x200d;मा का है जो सनातन भाव से संपूर्ण है। शेष सब अपूर्ण है। इससे मन बंद नहीं रह सकता। सब इच्&#x200d;छाओं का निरोध कर लोगे, यह झूठ है। और अगर &#8216;इच्&#x200d;छानिरोधस्&#x200d;तप:&#8217; का ऐसा ही नकारात्&#x200d;मक अर्थ हो तो वह तप झूठ है। वैसे तप की राह रेगिस्&#x200d;तान को जाती होगी, मोक्ष की राह वह नहीं है। ठाट देकर मन को बंद कर रखना जड़ता है। लोभ का यह जीतना नहीं है कि जहाँ लोभ होता है, यानी मन में, वहाँ नकार हो! यह तो लोभ की ही जीत है और आदमी की हार। आँख अपनी फोड़ डाली, तब लोभनीय के दर्शन से बचे तो क्&#x200d;या हुआ? ऐसे क्&#x200d;या लोभ मिट जाएगा? और कौन कहता है कि आँख फूटने पर रूप दीखना बंद हो जायगा? क्&#x200d;या आँख बंद करके ही हम सपने नहीं लेते हैं? और वे सपने क्&#x200d;या चैन-भंग नहीं करते हैं? इससे मन को बंद कर डालने की कोशिश तो अच्&#x200d;छी नहीं। वह अकारथ है। यह तो हठवाला योग है। शायद हठ-ही-हठ है, योग नहीं है। इससे मन कृश भले हो जाय और पीला और अशक्&#x200d;त जैसे विद्वान का ज्ञान। वह मुक्&#x200d;त ऐसे नहीं होता। इससे वह व्&#x200d;यापक को जगह संकीर्ण और विराट की जगह क्षुद्र होता है। इसलिए उसका रोम-रोम मूँदकर बंद तो मन को करना नहीं चाहिए। वह मन पूर्ण कब है? हम में पूर्णता होती तो परमात्&#x200d;मा से अभिन्&#x200d;न हम महाशून्&#x200d;य ही न होते? अपूर्ण हैं, इसी से हम हैं। सच्&#x200d;चा ज्ञान सदा इसी अपूर्णता के बोध को हम में गहरा करता है। सच्&#x200d;चा कर्म सदा इस अपूर्णता की स्&#x200d;वीकृति के साथ होता है। अतः उपाय कोई वही हो सकता है जो बलात् मन को रोकने को न कहे, जो मन को भी इसलिए सुने क्&#x200d;योंकि वह अप्रयोजनीय रूप में हमें नहीं प्राप्&#x200d;त हुआ है। हाँ, मनमानेपन की छूट मन को न हो, क्&#x200d;योंकि वह अखिल का अंग है, खुद कुल नहीं है।</p>
<p>पड़ोस में एक महानुभाव रहते हैं जिनको लोग भगत जी कहते हैं। चूरन बेचते हैं। यह काम करने जाने उन्&#x200d;हें कितने बरस हो गए हैं। लेकिन किसी एक भी दिन चूरन से उन्&#x200d;होंने छः आने पैसे से ज्&#x200d;यादे नहीं कमाए। चूरन उनका आस-पास सरनाम है। और खुद खूब लोकप्रिय हैं। कहीं व्&#x200d;यवसाय का गुर पकड़ लेते और उस पर चलते तो आज खुशहाल क्&#x200d;या मालामाल होते! क्&#x200d;या कुछ उनके पास न होता! इधर दस वर्षों से मैं देख रहा हूँ, उनका चूरन हाथों-हाथ जाता है। पर वह न उसे थोक देते हैं, न व्&#x200d;यापारियों को बेचते हैं। पेशगी आर्डर कोई नहीं लेते। बँधे वक्&#x200d;त पर अपनी चूरन की पेटी लेकर घर से बाहर हुए नहीं कि देखते-देखते छह आने की कमाई उनकी हो जाती है। लोग उनका चूरन लेने को उत्&#x200d;सुक जो रहते हैं। चूरन से भी अधिक शायद वह भगतजी के प्रति अपनी सद्भावना का देय देने को उत्&#x200d;सुक रहते हैं। पर छह आने पूरे हुए नहीं कि भगतजी बाकी चूरन बालकों को मुफ्त बाँट देते हैं। कभी ऐसा नहीं हुआ है कि कोई उन्&#x200d;हें पच्&#x200d;चीसवाँ पैसा भी दे सके! कभी चूरन में लापरवाही नहीं हुई है, और कभी रोग होता भी मैंने उन्&#x200d;हें नहीं देखा है।</p>
<p>और तो नहीं, लेकिन इतना मुझे निश्&#x200d;चय मालूम होता है कि इन चूरनवाले भगतजी पर बाजार का जादू नहीं चल सकता।</p>
<p>कहीं आप भूल न कर बैठियेगा। इन पंक्तियों को लिखने वाला मैं चूरन नहीं बेचता हूँ। जी नहीं, ऐसी हलकी बात भी न सोचिएगा। न ही यह समझिएगा कि लेख के किसी भी मान्&#x200d;य पाठक से उस चूरन वाले को श्रेष्&#x200d;ठ बताने की मैं हिम्&#x200d;मत कर सकता हूँ। क्&#x200d;या जाने उस भोले आदमी को अक्षर-ज्ञान तक भी है या नहीं। और बड़ी बातें तो उसे मालूम क्&#x200d;या होंगी। और हम-आप न जाने कितनी बड़ी-बड़ी बातें जानते हैं। इससे यह तो हो सकता है कि वह चूरन वाला भगत हम लोगों के सामने एकदम नाचीज आदमी हो। लेकिन आप पाठकों की विद्वान् श्रेणी का सदस्&#x200d;य होकर भी मैं यह स्&#x200d;वीकार नहीं करना चाहता हूँ कि उस अपदार्थ प्राणी को वह प्राप्&#x200d;त है जो हम में से बहुत कम को शायद प्राप्&#x200d;त है। उस पर बाजार का जादू वार नहीं कर पाता। माल बिछा रहता है, और उसका मन अडिग रहता है। पैसा उससे आगे होकर भीख तक माँगता है कि मुझे लो। लेकिन उसके मन में पैसे पर दया नहीं समाती। वह निर्मम व्&#x200d;यक्ति पैसे को अपने आहत गर्व में बिलखता ही छोड़ देता है। ऐसे आदमी के आगे क्&#x200d;या पैसे की व्&#x200d;यंग्य-शक्ति कुछ भी चलती होगी? क्&#x200d;या वह शक्ति कुंठित रहकर सलज्&#x200d;ज ही न हो जाती होगी?</p>
<p>पैसे की व्&#x200d;यंग्&#x200d;य-शक्ति की सुनिए। वह दारुण है। मैं पैदल चल रहा हूँ कि पास ही धूल उड़ाती निकल गई मोटर। वह क्&#x200d;या निकली मेरे कलेजे को कौंधती एक कठिन व्&#x200d;यंग्य की लीख ही आर-से-पार हो गई। जैसे किसी ने आँखों में उँगली देकर दिखा दिया हो कि देखो, उसका नाम है मोटर, और तुम उससे वंचित हो! यह मुझे अपनी ऐसी विडंबना मालूम होती है कि बस पूछिए नहीं। मैं सोचने को हो आता हूँ कि हाय, ये ही माँ-बाप रह गए थे जिनके यहाँ मैं जन्&#x200d;म लेने को था! क्&#x200d;यों न मैं मोटरवालों के यहाँ हुआ! उस व्यंग्य में इतनी शक्ति है कि जरा में मुझे अपने सगों के प्रति कृतघ्&#x200d;न कर सकती है।</p>
<p>लेकिन क्&#x200d;या लोकवैभव की यह व्यंग्य-शक्त्&#x200d;िा उस चूरन वाले अकिंचित्&#x200d;कर मनुष्&#x200d;य के आगे चूर-चूर होकर ही नहीं रह जाती? चूर-चूर क्&#x200d;यों, कहो पानी-पानी।</p>
<p>तो वह क्&#x200d;या बल है जो इस तीखे व्यंग्य के आगे ही अजेय ही नहीं रहता, बल्कि मानो उस व्यंग्य की क्रूरता को ही पिघला देता है?</p>
<p>उस बल को नाम जो दो; पर वह निश्&#x200d;चय उस तल की वस्&#x200d;तु नहीं है जहाँ पर संसारी वैभव फलता-फूलता है। वह कुछ अपर जाति का तत्व है। लोग स्पिरिचुअल कहते हैं; आत्मिक, धार्मिक, नैतिक कहते हैं। मुझे योग्&#x200d;यता नहीं कि मैं उन शब्&#x200d;दों में अंतर देखूँ और प्रतिपादन करूँ। मुझे शब्&#x200d;द से सरोकार नहीं। मैं विद्वान नहीं कि शब्&#x200d;दों पर अटकूँ। लेकिन इतना तो है कि जहाँ तृष्&#x200d;णा है, बटोर रखने की स्&#x200d;पृहा है, वहाँ उस बल का बीज नहीं है। बल्कि यदि उसी बल को सच्&#x200d;चा बल मानकर बात की जाय तो कहना होगा कि संचय की तृष्&#x200d;णा और वैभव की चाह में व्&#x200d;यक्ति की निर्बलता ही प्रमाणित होती है। निर्बल ही धन की ओर झुकता है। वह अबलता है। वह मनुष्&#x200d;य पर धन की और चेतन पर जड़ की विजय है।</p>
<p>एक बार चूरन वाले भगतजी बाजार चौक में दीख गए। मुझे देखते ही उन्&#x200d;होंने जय-जयराम किया। मैंने भी जयराम कहा। उनकी आँखें बंद नहीं थीं और न उस समय वह बाजार को किसी भाँति कोस रहे मालूम होते थे। राह में बहुत लोग, बहुत बालक मिले जो भगतजी द्वारा पहचाने जाने के इच्&#x200d;छुक थे। भगतजी ने सबको ही हँसकर पहचाना। सबका अभिवादन लिया और स&#x200d;बको अभिवादन किया। इससे तनिक भी यह नहीं कहा जा सकेगा कि चौक-बाजार में होकर उनकी आँखें किसी से भी कम खुली थीं। लेकिन भौंचक्&#x200d;के हो रहने की लाचारी उन्&#x200d;हें नहीं थी। व्&#x200d;यवहार में पसोपेश उन्&#x200d;हें नहीं था और खोए-से खड़े नहीं वह रह जाते थे। भाँति-भाँति के बढ़िया माल से चौक भरा पड़ा है। उस सबके प्रति अप्रीति इस भगत के मन में नहीं है। जैसे उस समूचे नाव के प्रति भी उनके में आशीर्वाद हो सकता है। विद्रोह नहीं, प्रसन्&#x200d;नता ही भीतर है, क्&#x200d;योंकि कोई रिक्ति भीतर नहीं है। देखता हूँ कि खुली आँख, तुष्ट और मग्न, वह चौक-बाजार में से चलते चले जाते हैं। राह में बड़े-बड़े फैन्&#x200d;सी स्&#x200d;टोर पड़ते हैं, पर पड़े रह जाते हैं। रुकते हैं तो एक छोटी, पंसारी की दुकान पर रुकते हैं। यहाँ दो-चार अपने काम की चीज ली, और चले आते हैं। बाजार से हठ-पूर्वक विमुखता उनमें नहीं हैं; लेकिन अगर उन्&#x200d;हें जीरा और काला नमक चाहिए तो सारे चौक-बाजार की सत्ता उनके लिए तभी है, तभी तक उपयोगी है, जब तक वहाँ जीरा मिलता है। जरूरत-भर जीरा वहाँ से ले लिया सारा चौक उनके लिए आसानी से नहीं बराबर हो जाता है। वह जानते हैं कि जो उन्&#x200d;हें चाहिए वह है जीरा नमक। बस इस निश्चित प्रतीति के बल पर शेष सब चाँदनी दाएँ-बाएँ भूखी-की-भूखी फैली रह जाती है, क्&#x200d;योंकि भगतजी को जीरा चाहिए वह कोने वाली पंसारी की दुकान से मिल जाता है और वहाँ से सहज भाव में ले लिया गया है। इसके आगे आस-पास अगर चाँदनी बिछी रहती है तो बड़ी खुशी से बिछी रहे, भगत जी उस बेचारी का कल्&#x200d;याण ही चाहते हैं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/pachtawa-story-by-munshi-premchand/8808/">पछतावा&#8230; पढ़िए आज की कहानी</a></span></strong></span></p>
<p>जहाँ मुझे ज्ञात होता है कि बाजार को सार्थकता भी वही मनुष्&#x200d;य देता है जो जानता है कि वह क्&#x200d;या चाहता है। ओर जो नहीं जानते कि वे क्&#x200d;या चाहते है, अपनी &#8216;पर्चेंजिग पावर&#8217; के गर्व में अपने पैसे से केवल एक विनाशक शक्ति &#8211; शैतानी शक्ति, व्यंग्य की शक्ति ही बाजार को देते है। न तो वे बाजार से लाभ उठा सकते हैं, न उस बाजार को सच्&#x200d;चा लाभ दे सकते हैं। वे लोग बाजार का बाजाररूपन बढ़ाते हैं, जिसका मतलब है कि कपट बढ़ाते हैं। कपट की बढ़ती का अर्थ परस्&#x200d;पर में सद्भाव की घटी। इस सद्भाव के हाथ पर आदमी आपस में भाई-भाई और सुहृद और पड़ोसी फिर रह ही नहीं जाते हैं और आपस में कोरे ग्राहक ओर बेचक की तरह व्&#x200d;यवहार करते हैं। मानों दोनों एक-दूसरे को ठगने की घात में हों। एक की हानि में दूसरे को अपना लाभ दीखता है और यह बाजार का, बल्कि इतिहास का; सत्&#x200d;य माना जाता है। ऐसे बाजार को बीच में लेकर लोगों में आवश्&#x200d;यकताओं का आदान-प्रदान नहीं होता; बल्कि शोषण होने लगता है। तब कपट सफल होता है, निष्&#x200d;कपट शिकार होता है। ऐसे बाजार मानवता के लिए बिडंबना है। और जो ऐसे बाजार का पोषण करता है, जो उसका शास्&#x200d;त्र बना हुआ है; वह अर्थ-शास्&#x200d;त्र सरासर औंधा हैं। यह मायावी शास्&#x200d;त्र है। यह अर्थ-शास्&#x200d;त्र अनीति-शास्&#x200d;त्र है।</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/bazar-darshan-story-by-jainendra-kumar/8872/">बाजार-दर्शन&#8230; पढ़िए आज की कहानी</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
]]></content:encoded>
					
					<wfw:commentRss>https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/bazar-darshan-story-by-jainendra-kumar/8872/feed/</wfw:commentRss>
			<slash:comments>0</slash:comments>
		
		
			</item>
	</channel>
</rss>
