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	<title>Bhisham Sahni Archives - TIS Media</title>
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	<description>हर अक्षर सच, हर खबर निष्पक्ष </description>
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	<title>Bhisham Sahni Archives - TIS Media</title>
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		<title>गंगो का जाया&#8230; आज की कहानी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[tismedia.in]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 03 Jul 2021 09:51:33 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[Editorial]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>~भीष्म साहनी गंगो की जब नौकरी छूटी तो बरसात का पहला छींटा पड़ रहा था। पिछले तीन दिन से गहरे नीले बादलों के पुँज आकाश में करवटें ले रहे थे, जिनकी छाया में गरमी से अलसाई हुई पृथ्‍वी अपने पहले ठण्‍डे उच्‍छ्‌वास छोड़ रही थी, और शहर-भर के बच्‍चे-बूढ़े बरसात की पहली बारिश का नंगे &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="color: #ff0000;">~भीष्म साहनी</span></h4>
<p>गंगो की जब नौकरी छूटी तो बरसात का पहला छींटा पड़ रहा था। पिछले तीन दिन से गहरे नीले बादलों के पुँज आकाश में करवटें ले रहे थे, जिनकी छाया में गरमी से अलसाई हुई पृथ्&#x200d;वी अपने पहले ठण्&#x200d;डे उच्&#x200d;छ्‌वास छोड़ रही थी, और शहर-भर के बच्&#x200d;चे-बूढ़े बरसात की पहली बारिश का नंगे बदन स्&#x200d;वागत करने के लिए उतावले हो रहे थे। यह दिन नौकरी से निकाले जाने का न था। मज़दूरी की नौकरी थी बेशक, पर बनी रहती, तो इसकी स्&#x200d;थिरता में गंगो भी बरसात के छींटे का शीतल स्&#x200d;पर्श ले लेती। पर हर शगुन के अपने चिन्&#x200d;ह होते हैं। गंगो ने बादलों की पहली गर्जन में ही जैसे अपने भाग्&#x200d;य की आवाज़ सुन ली थी।</p>
<p>नौकरी छूटने में देर नहीं लगी। गंगो जिस इमारत पर काम करती थी, उसकी निचली मंज़िल तैयार हो चुकी थी, अब दूसरी मंज़िल पर काम चल रहा था। नीचे मैदान में से गारे की टोकरियाँ उठा-उठाकर छत पर ले जाना गंगो का काम था।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/deputy-collectory-story-by-amarkant/9593/"><strong>डिप्टी-कलक्टरी&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>मगर आज सुबह जब गंगो टोकरी उठाने के लिए ज़मीन की ओर झुकी, तो उसके हाथ ज़मीन तक न पहुँच पाए। ज़मीन पर, पाँव के पास पड़ी हुई टोकरी को छूना एक गहरे कुएँ के पानी को छूने के समान होने लगा। इतने में किसी ने गंगो को पुकारा, “मेरी मान जाओ, गंगो, अब टोकरी तुमसे न उठेगी। तुम छत पर ईंट पकड़ने के लिए आ जाओ।”</p>
<p>छत पर, लाल ओढ़नी पहने और चार ईंटें उठाए, दूलो मज़दूरन खड़ी उसे बुला रही थी।</p>
<p>गंगो ने न माना और फिर एक बार टोकरी उठाने का साहस किया, मगर होंठ काटकर रह गई। टोकरी तक उसका हाथ न पहुँच पाया।</p>
<p>गंगो के बच्&#x200d;चा होने वाला था, कुछ ही दिन बाकी रह गए थे। छत पर बैठकर ईंट पकड़नेवाला काम आसान था। एक मज़दूर, नीचे मैदान में खड़ा, एक-एक ईंट उठाकर छत की ओर फेंकता, और ऊपर बैठी हुई मज़दूरन उसे झपटकर पकड़ लेती। मगर गंगो का इस काम से ख़ून सूखता था। कहीं झपटने में हाथ चूक जाए, और उड़ती हुई ईंट पेट पर आ लगे तो क्&#x200d;या होगा?</p>
<p>ठेकेदार हर मज़दूर के भाग्&#x200d;य का देवता होता है। जो उसकी दया बनी रहे तो मज़दूर के सब मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं, पर जो देवता के तेवर बदल जाएँ तो अनहोनी भी होके रहती है। गंगो खड़ी सोच ही रही थी कि कहीं से, मकान की परिक्रमा लेता हुआ ठेकेदार सामने आ पहुँचा। छोटा-सा, पतला शरीर, काली टोपी, घनी-घनेरी मूँछों में से बीड़ी का धुआँ छोड़ता हुआ, गंगो को देखते ही चिल्&#x200d;ला उठा&#8211;</p>
<p>“खड़ी देख क्&#x200d;या रही है? उठाती क्&#x200d;यों नहीं, जो पेट निकला हुआ था, तो आई क्&#x200d;यों थी?”</p>
<p>गंगो धीरे-धीरे चलती हुई ठेकेदार के सामने आ खड़ी हुई। ठेकेदार का डर होते हुए भी गंगो के होंठों पर से वह हल्&#x200d;की-सी स्&#x200d;निग्&#x200d;ध मुस्&#x200d;कान ओझल न हो पाई, जो महीने-भर से उसके चेहरे पर खेल रही थी, जब से बच्&#x200d;चे ने गर्भ में ही अपने कौतुक शुरू कर दिए थे और गंगो की आँखें जैसे अन्&#x200d;तर्मुखी हो गई थीं। ठेकेदार झगड़ता तो भी शान्&#x200d;त रहती, और जो उसका घरवाला बात-बात पर तिनक उठता, तो भी चुपचाप सुनती रहती।</p>
<p>“काम क्&#x200d;यों नहीं करूँगी? छत पर ईंटें पकड़ने का काम दे दो, वह कर लूँगी।” गंगो ने निश्&#x200d;चय करते हुए कहा।</p>
<p>“तेरे बाप का मकान बन रहा है, जो जी चाहा करेगी? चल, दूर हो यहाँ से। आधे दिन के पैसे ले और दफ़ा हो जा। हरामख़ोर आ जाते हैं&#8230;”</p>
<p>“तुम्&#x200d;हें क्&#x200d;या फ़रक पड़ेगा, दूलो मेरा काम कर लेगी, मैं उसकी जगह चली जाऊँगी, काम तो होता रहेगा।”<br />
“पहले पेट खाली करके आओ, फिर काम मिलेगा।”<br />
क्षण-भर में ठेकेदार का रजिस्&#x200d;टर खुल गया और गंगो के नाम पर लकीर फिर गई।</p>
<p>ऐन उसी वक़्&#x200d;त बारिश का छींटा भी पड़ने लगा था। गंगो ने समझ लिया कि जो आसमान में बादल न होते तो काम पर से भी छुट्‌टी न मिलती। आकाश में बादल आए नहीं कि ठेकेदार को काम ख़त्&#x200d;म करने की चिन्&#x200d;ता हुई नहीं। इस हालत में गर्भवाली मज़दूरन को कौन काम पर रखेगा। गंगो चुपचाप, ओढ़नी के पल्&#x200d;ले से अपने गर्भ को ढँकती हुई बाहर निकल आई।</p>
<p>उन दिनों दिल्&#x200d;ली फिर से जैसे बसने लगी थी। कोई दिशा या उपदिशा ऐसी न थी, जहाँ नई आबादियों के झुरमुट न उठ रहे हों। नए मकानों की लम्&#x200d;बी कतारें, समुद्र की लहरों की तरह फैलती हुई, अपने प्रसार में दिल्&#x200d;ली के कितने ही खण्&#x200d;डहर और स्&#x200d;मृति-कंकाल रौंदती हुई, बढ़ रही थीं। देखते- ही-देखते एक नई आबादी, गर्व से माथा ऊँचा किए, समय का उपहास करती हुई खड़ी हो जाती। लोग कहते, दिल्&#x200d;ली फिर से जवान हो रही है। नई आबादियों की बाढ़ आ गयी थी। नया राष्&#x200d;ट्र, नये निर्माण-कार्य, लोगों को इस फैलती राजधानी पर गर्व होने लगा था।</p>
<p>जहाँ कहीं किसी नई आबादी की योजना पनपने लगती, तो सैकड़ों मज़दूर खिंचे हुए, अपने फूस के छप्&#x200d;पर कन्&#x200d;धों पर उठाए, वहाँ जा पहुँचते, और उसी की बगल में अपनी झोंपड़ों की बस्&#x200d;ती खड़ी कर लेते। और जब वह नई आबादी बनकर तैयार हो जाती, तो फिर मज़दूरों की टोलियाँ अपने फूस के छप्&#x200d;पर उठाए, किसी दूसरी आबादी की नींव रखने चल पड़तीं। मगर ज्&#x200d;योंही बरसात के बादल आकाश में मँडराने लगते, तो सब काम ठप्&#x200d;प हो जाता, और मज़दूर अपने झोंपड़ों में बैठे, आकाश को देखते हुए, चौमासे के दिन काटने लगते। कई मज़दूर अपने गाँवों को चले जाते, पर अधिकतर छोटे-मोटे काम की तलाश में सड़कों पर घूमते रहते। काम इतना न था जितने मज़दूर आ पहुँचते थे। दिल्&#x200d;ली के हर खण्&#x200d;डहर की अपनी गाथा है, कहानी है, पर मज़दूर की फूस की झोंपड़ी का खण्&#x200d;डहर क्&#x200d;या होगा, और कहानी क्&#x200d;या होगी? हँसती-खेलती नई आबादियों में इन झोंपड़ों का या इन नये झोंपड़ों में खेले गए नाटकों का, स्&#x200d;मृति-चिन्&#x200d;ह भी नहीं मिलता।</p>
<p>उस रात गंगो और उसका पति घीसू, देर तक झोंपड़े के बाहर बैठे अपनी स्&#x200d;थिति का सोचते रहे।<br />
“जो छुट्‌टी मिल गई थी तो घर क्&#x200d;यों चली आई, कहीं दूसरी जगह काम देखती।”<br />
“देखा है। इस हालत में कौन काम देगा? जहाँ जाओ, ठेकेदार पेट देखने लगते हैं।”</p>
<p>झोंपड़े के अन्&#x200d;दर उनका छह बरस का लड़का रीसा सोया पड़ा था। घीसू कई दिनों से चिन्&#x200d;तित था, तीन आदमी खानेवाले, और कमानेवाला अब केवल एक और ऊपर चौमासा और गंगो की हालत! उसका मन खीज उठा। अगर और पन्&#x200d;द्रह-बीस रोज़ मज़दूरी पर निकल जाते, तो क्&#x200d;या मुश्&#x200d;किल था? गर्भवाली औरतें बच्&#x200d;चा होनेवाले दिन तक काम पर जुटी रहती हैं। घीसू गठीले बदन का, नाटे कद का मज़दूर था, जो किसी बात पर तिनक उठता तो घण्&#x200d;टों उसका मन अपने काबू में न रहता। थोड़ी देर चिलम के कश लगाने के बाद धीरे-धीरे कहने लगा, “तुम गाँव चली जाओ।”</p>
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<p>“गाँव में मेरा कौन है?”<br />
“तू पहले से ही सब पाठ पढ़े हुए है, तू इस हालत में जाएगी, तो तुझे घर से निकाल देंगे?”<br />
“मैं कहीं नहीं जाऊँगी। तुम्&#x200d;हारा भाई ज़मीन पर पाँव नहीं रखने देगा। दो दफ़े तो तुमसे लड़ने-मरने की नौबत आ चुकी है।”</p>
<p>“तो यहाँ क्&#x200d;या करेगी? मेरे काम का भी कोई ठिकाना नहीं। सुनते हैं सरकार ज़ियादह मज़दूर लगाकर तीन दिन में बाकी सड़क तैयार कर देना चाहती है।”</p>
<p>“मरम्&#x200d;मती काम तो चलता रहेगा?” गंगो ने धीरे-से कहा।<br />
“मरम्&#x200d;मती काम से तीन जीव खा सकते हैं? एक दिन काम है, चार दिन नहीं।”<br />
काफ़ी रात गए तक यह उधेड़-बुन चलती रही।</p>
<p>सोमवार को गंगो काम पर से बरख़ास्&#x200d;त हुई, और सनीचर तक पहुँचते-पहुँचते झोंपड़ी की गिरस्&#x200d;ती डावाँडोल हो गई। माँ, बाप और बेटा, तीन जीव खानेवाले, और कमानेवाला केवल एक। गंगो काम की तलाश में सुबह घर से निकल जाती, और दोपहर तक बस्&#x200d;ती के तीन-तीन चक्&#x200d;कर काट आती। किसी से काम का पूछती तो या तो वह हँसने लगता, या आसमान पर मँडराते बादल दिखा देता। सड़कों पर दर्ज़नों मज़दूर दोपहर तक घूमते हुए नज़र आने लगे। फिर एक दिन जब घीसू ने घर लौटकर सुना दिया कि सरकारी सड़क का काम समाप्&#x200d;त हो चुका है, तो घीसू और गंगो, मज़दूरों के स्&#x200d;तर से लुढ़ककर आवारा लोगों के स्&#x200d;तर पर आ पहुँचे। कभी चूल्&#x200d;हा जलता, कभी नहीं। भर-पेट खाना किसी को न मिल पाता। छोटा बालक रीसा, जो दिन-भर खेलते न थकता था, अब झोंपड़े के इर्दगिर्द ही मँडराता रहता। पति-पत्&#x200d;नी रोज़ रात को झोंपड़े के बाहर बैठते, झगड़ते, परामर्श करते और बात-बात पर खीज उठते।</p>
<p>फिर एक रात, हज़ार सोचने और भटकने के बाद घीसू के उद्विग्&#x200d;न मन ने घर का खर्चा कम करने की तरकीब सोची। अधभरे पेट की भूख को चिलम के धुएँ से शान्&#x200d;त करते हुए बोला, “रीसे को किसी काम पर लगा दें।”</p>
<p>“रीसा क्&#x200d;या करेगा, छोटा-सा तो है?”<br />
“छोटा है? चंगे-भले आदमी का राशन खाता है। इस जैसे सब लड़के काम करते हैं।”</p>
<p>गंगो चुप रही। कमाऊ बेटा किसे अच्&#x200d;छा नहीं लगता? मगर रीसा अभी सड़क पर चलता भी था, तो बाप का हाथ पकड़कर। वह क्&#x200d;या काम करेगा? पर घीसू कहता गया, “इस जैसे लौंडे बूट-पॉलिश करते हैं, साइकिलों की दूकानों पर काम करते हैं, अख़बार बेचते हैं, क्&#x200d;या नहीं करते? कल इसे मैं गणेशी के सुपुर्द कर दूँगा, इसे बूट-पॉलिश करना सिखा देगा।”</p>
<p>गणेशी घीसू के गाँव का आदमी था। इस बस्&#x200d;ती से एक फर्लांग दूर, पुल के पास छोटी-सी कोठरी में रहता था। एक छोटा-सा सन्&#x200d;दूकचा कन्&#x200d;धे पर से लटकाए गलियों के चक्&#x200d;कर काटता और बूटों के तलवे लगाया करता था।</p>
<p>दूसरे दिन घीसू काम की खोज में झोंपड़े में से निकलते हुए गंगो से कह गया&#8211;<br />
“मैं गणेशी को रास्&#x200d;ते में कहता जाऊँगा। तू सूरज चढ़ने तक रीसे को उसके पास भेज देना।”</p>
<p>रीसा काम पर निकला। छोटा-सा पतला शरीर, चकित, उत्&#x200d;सुक आँखें। बदन पर एक ही कुर्ता लटकाए हुए। गणेशी के घर तक पहुँचना कौन-सी आसान बात थी। रास्&#x200d;ते में प्रकृति रीसे के मन को लुभाने के लिए जगह-जगह अपना मायाजाल फैलाए बैठी थी। किसी जगह दो लौंडे झगड़ रहे थे, उनका निपटारा करना ज़रूरी था, रीसा घण्&#x200d;टा-भर उन्&#x200d;हीं के साथ घूमता रहा, कहीं एक भैंस कीचड़ में फँसी पड़ी थी, कहीं पर एक मदारी अपने खेल दिखा रहा था, रीसा दिन-भर घूम-फिरकर, दोपहर के वक़्&#x200d;त, हाथ में एक छड़ी घुमाता हुआ घर लौट आया।</p>
<p>कह देना आसान था कि रीसा काम करे, मगर रीसे को काम में लगाना नए बैल को हल में जोतने के बराबर था। पर उधर झोंपड़े में बची-बचाई रसद क्षीण होती जा रही थी। दूसरे दिन घीसू उसे स्&#x200d;वयं गणेशी के सुपुर्द कर आया, और पाँच-सात आने पैसे भी पॉलिश की डिब्&#x200d;बिया और ब्रुश के लिए दे आया।</p>
<p>उस दिन तो रीसा जैसे हवा में उड़ता रहा। दिल्&#x200d;ली की नई-नई गलियाँ घूमने को मिलीं, नए-नए लोग देखने को मिले। चप्&#x200d;पे-चप्&#x200d;पे पर आकर्षण था। रीसे की समझ में न आया कि बाप गुस्&#x200d;सा क्&#x200d;यों हो रहा था, जब उसे यहाँ घूमने के लिए भेजना चाहता था। दूकानें रंग-बिरंगी चीज़ों से लदी हुईं और भीड़ इतनी कि रीसे का लुब्&#x200d;ध मन भी चकरा गया।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/pinjar-story-by-rabindranath-tagore/9521/"><strong>पिंजर&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>रीसे की माँ सड़क पर आँखें गाड़े उसकी राह देख रही थी, जब रीसा अपने बोझल पाँव खींचता हुआ घर पहुँचा। अपने छः सालों के नन्&#x200d;हें-से जीवन में वह इतना कभी नहीं चल पाया था, जितना कि वह आज एक दिन में। मगर माँ को मिलते ही वह उसे दिन-भर की देखी-दिखाई सुनाने लगा। और जब बाप काम पर से लौटा तो रीसा अपना ब्रुश और पॉलिश की डिब्&#x200d;बिया उठाकर भागता हुआ उसके पास जा पहुँचा, “बप्&#x200d;पू, तेरा जूता पॉलिश कर दूँ?”</p>
<p>सुनकर, घीसू के हर वक़्&#x200d;त तने हुए चेहरे पर भी हल्&#x200d;की-सी मुस्&#x200d;कान दौड़ गई&#8211;<br />
“मेरा नहीं, किसी बाबू का करना, जो पैसे भी देगा।”<br />
और गंगो और उसका पति, अपने कमाऊ बेटे की दिनचर्या सुनते हुए, कुछ देर के लिए अपनी चिन्&#x200d;ताएँ भूल गए।</p>
<p>दूसरा दिन आया। घीसू और रीसा अपने-अपने काम पर निकले। दो रोटियाँ, एक चिथड़े में लिपटी हुइर्ं, घीसू की बगल के नीचे, और एक रोटी रीसे की बगल के नीचे। दोनों सड़क पर इकट्ठे उतरे और फिर अपनी-अपनी दिशा में जाने के लिए अलग हो गए।</p>
<p>पर आज रीसा जब सड़क की तलाई पार करके पुल के पास पहुँचा तो गणेशी वहाँ पर नहीं था।</p>
<p>थोड़ी देर तक मुँह में उँगली दबाए वह पुल पर आते-जाते लोगों को देखता रहा, फिर गणेशी की तलाश में आगे निकल गया। शहर की गलियाँ, एक के बाद दूसरी, अपना जटिल इन्&#x200d;द्रजाल फैलाए, जैसे रीसे की इन्&#x200d;तज़ार में ही बैठी थीं। एक के बाद दूसरी गली में वह बढ़ने लगा, मगर किसी में भी उसे कल का परिचित रूप नज़र नहीं आया, न ही कहीं गणेशी की आवाज़ सुनाई दी। थोड़ी देर घूमने के बाद रीसा एक गली के मोड़ पर बैठ गया, अपनी पॉलिश की डिब्&#x200d;बियाँ और ब्रुश सामने रख लिए और अपने पहले ग्राहक का इन्&#x200d;तज़ार करने लगा। गणेशी की तरह उसने मुँह टेढ़ा करके ‘पॉलिश श श श&#8230;!&#8217; का शब्&#x200d;द पूरी चिल्&#x200d;लाहट के साथ पुकारा। पहले तो अपनी आवाज़ ही सुनकर स्&#x200d;तब्&#x200d;ध हो रहा, फिर निःसंकोच बार-बार पुकारने लगा। पाँच-सात मर्तबा ज़ोर-ज़ोर से चिल्&#x200d;लाने पर एक बाबू, जो सामने एक दूकान की भीड़ में सौदा ख़रीदने के इन्&#x200d;तज़ार में खड़ा था, रीसे के पास चला आया।</p>
<p>“पॉलिश करने का क्&#x200d;या लोगे?”<br />
“जो खुसी हो दे देना।” रीसे ने गणेशी के वाक्&#x200d;य को दोहरा दिया। बाबू ने बूट उतार दिए, और दूकान की भीड़ में फिर जाकर खड़ा हो गया।</p>
<p>रीसे ने अपनी डिब्&#x200d;बिया खोली। गणेशी के वाक्&#x200d;य तो वह दोहरा सकता था, मगर उसकी तरह हाथ कैसे चलाता? बूट पर पॉलिश क्&#x200d;या लगी, जितनी उसकी टाँगों, हाथों और मुँह को लगी। एक जूते पर पॉलिश लगाने में रीसे की आधी डिब्&#x200d;बिया खर्च हो गई। अभी बूट के तलवे पर पॉलिश लगाने की सोच ही रहा था कि बाबू सामने आन खड़ा हुआ। रीसे के हाथ अनजाने में ठिठक गए। बाबू ने बूटों की हालत देखी, आव देखा न ताव, ज़ोर से रीसे के मुँह पर थप्&#x200d;पड़ दे मारा, जिससे रीसे का मुँह घूम गया। उसकी समझ में न आया कि बात क्&#x200d;या हुई है। गणेशी को तो किसी बाबू ने थप्&#x200d;पड़ नहीं मारा था।</p>
<p>“हरामजादे, काले बूटों पर लाल पॉलिश!” और गुस्&#x200d;से में गालियाँ देने लगा।</p>
<p>पास खड़े लोगों ने यह अभिनय देखा, कुछ हँसे, कुछ-एक ने बाबू को समझाया, दो-एक ने रीसे को गालियाँ दीं, और उसके बाद बाबू गालियाँ देता हुआ, बूट पहनकर चला गया। रीसा, हैरान और परेशान कभी एक के मुँह की तरफ, कभी दूसरे के मुँह की तरफ देखता रहा, और फिर वहाँ से उठकर, धीरे-धीरे गली के दूसरे कोने पर जाकर खड़ा हो गया। हर राह जाते बाबू से उसे डर लगने लगा। गणेशी की तरह ‘पॉलिश श श!&#8217; चिल्&#x200d;लाने की उसकी हिम्&#x200d;मत न हुई। रीसे को माँ की याद आई, और उल्&#x200d;टे पाँव वापिस हो लिया। मगर गलियों का कोई छोर किनारा न था, एक गली के अन्&#x200d;त तक पहुँचता तो चार गलियाँ और सामने आ जातीं। अनगिनत गलियों में घूमने के बाद वह घबराकर रोने लगा, मगर वहाँ कौन उसके आँसू पोंछनेवाला था। एक गली के बाद दूसरी गली लाँघता हुआ, कभी गणेशी की तलाश में, कभी माँ की तलाश में वह दोपहर तक घूमता रहा। बार-बार रोता और बार-बार स्&#x200d;तब्&#x200d;ध और भयभीत चुप हो जाता। फिर शाम हुई और थोड़ी देर बाद गलियों में अँधेरा छाने लगा। एक गली के नाके पर खड़ा सिसकियाँ ले रहा था, कि उस- जैसे ही लड़कों का टोला यहाँ-वहाँ से इकट्ठा होकर उसके पास आ पहुँचा। एक छोटे- से लड़के ने अपनी फटी हुई टोपी सिर पर खिसकाते हुए कहा, “अबे साले रोता क्&#x200d;यों है?”</p>
<p>दूसरे ने उसका बाजू पकड़ा और रीसे को खींचते हुए एक बराण्&#x200d;डे के नीचे ले गया। तीसरे ने उसे धक्&#x200d;का दिया! चौथे ने उसके कन्&#x200d;धे पर हाथ रखते हुए, उसे बराण्&#x200d;डे के एक कोने में बैठा दिया। फिर उस छोटे-से लड़के ने अपने कुर्ते की जेब में से थोड़ी-सी मूँगफली निकालकर रीसे की झोली में डाल दी।</p>
<p>“ले साले, कभी कोई रोता भी है? हमारे साथ घूमा कर, हम भी बूट-पॉलिश करते हैं।”</p>
<p>आधी रात गए, नन्&#x200d;हा रीसा, जीवन की एक पूरी मंज़िल एक दिन में लाँघकर, सिर के नीचे ब्रुश और पॉलिश की डिब्&#x200d;बिया और एक छोटा-सा चीथड़ा रखे, उसी बराण्&#x200d;डे की छत के नीचे अपनी यात्रा के नये साथियों के साथ, भाग्&#x200d;य की गोद में सोया पड़ा था।</p>
<p>उधर, झोंपड़े के अन्&#x200d;दर लेटे-लेटे, कई घण्&#x200d;टे की विफल खोज के बाद, घीसू गंगो को आश्&#x200d;वासन दे रहा थाः “मुझे कौन काम सिखाने आया था? सभी गलियों में ही सीखते हैं। मरेगा नहीं, घीसू का बेटा है, कभी-न-कभी तुझे मिलने आ जाएगा।&#8221;</p>
<p>घीसू का उद्विग्&#x200d;न मन जहाँ बेटे के यूँ चले जाने पर व्&#x200d;याकुल था, वहाँ इस दारुण सत्&#x200d;य को भी न भूल सकता था कि अब झोंपड़े में दो आदमी होंगे, और बरसात काटने तक, और गंगो की गोद में नया जीव आ जाने तक, झोंपड़ा शायद सलामत खड़ा रह सकेगा।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/boodhi-kaki-story-by-munshi-premchand/9498/"><strong>बूढ़ी काकी&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>गंगो झोंपड़े की बालिश्&#x200d;त-भर ऊँची छत को ताकती हुई चुपचाप लेटी रही। उसी वक्&#x200d;त गंगो के पेट में उसके दूसरे बच्&#x200d;चे ने करवट ली। जैसे संसार का नवागन्&#x200d;तुक संसार का द्वार खटखटाने लगा हो। और गंगो ने सोचा&#8211; यह क्&#x200d;यों जन्&#x200d;म लेने के लिए इतना बेचैन हो रहा है? गंगो का हाथ कभी पेट के चपल बच्&#x200d;चे को सहलाता, कभी आँखों से आँसू पोंछने लगता।</p>
<p>आकाश पर बरसात के बादलों से खेलती हुई चाँद की किरनों के नीचे नए मकानों की बस्&#x200d;ती झिलमिला रही थी। दिल्&#x200d;ली फिर बस रही थी, और उसका प्रसार दिल्&#x200d;ली के बढ़ते गौरव को चार चाँद लगा रहा था।</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/gango-ka-jaya-story-by-bhisham-sahni/9630/">गंगो का जाया&#8230; आज की कहानी</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>ओ हरामजादे !&#8230; आज की कहानी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[tismedia.in]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 28 Jun 2021 09:29:05 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Art and Literature]]></category>
		<category><![CDATA[Cover Stories]]></category>
		<category><![CDATA[Editorial]]></category>
		<category><![CDATA[Top Stories]]></category>
		<category><![CDATA[Bhisham Sahni]]></category>
		<category><![CDATA[hindi news]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi Story]]></category>
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		<category><![CDATA[O Haramzade]]></category>
		<category><![CDATA[O Haramzade Story]]></category>
		<category><![CDATA[Story By Bhisham Sahni]]></category>
		<category><![CDATA[the inside stories]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>~भीष्म साहनी घुमक्कड़ी के दिनों में मुझे खुद मालूम न होता कि कब किस घाट जा लगूंगा। कभी भूमध्य सागर के तट पर भूली बिसरी किसी सभ्यता के खण्डहर देख रहा होता, तो कभी युरोप के किसी नगर की जनाकीर्ण सड़कों पर घूम रह होता। दुनिया बड़ी विचित्र पर साथ ही अबोध और अगम्य लगती, &#8230;</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="color: #ff0000;">~भीष्म साहनी</span></h4>
<p>घुमक्कड़ी के दिनों में मुझे खुद मालूम न होता कि कब किस घाट जा लगूंगा। कभी भूमध्य सागर के तट पर भूली बिसरी किसी सभ्यता के खण्डहर देख रहा होता, तो कभी युरोप के किसी नगर की जनाकीर्ण सड़कों पर घूम रह होता। दुनिया बड़ी विचित्र पर साथ ही अबोध और अगम्य लगती, जान पड़ता जैसे मेरी ही तरह वह भी बिना किसी घुरे के निरुद्देश्य घूम रही है।</p>
<p>ऎसे ही एक बार मैं यूरोप के एक दूरवर्ती इलाके में जा पहुंचा था। एक दिन दोपहर के वक्त होटल के कमरे में से निकल कर मैं खाड़ी के किनारे बैंच पर बैठा आती जाती नावों को देख रहा था, जब मेरे पास से गुजरते हुए अधेड़ उम्र की एक महिला ठिठक कर खड़ी हो गई। मैंने विशेष ध्यान नहीं दिया, मैंने समझा उसे किसी दूसरे चेहरे का मुगालता हुआ होगा। पर वह और निकट आ गयी।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/mandi-story-by-mohan-rakesh/9450/"><strong>मंदी&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>“भारत से आये हो?&#8221; उसने धीरे से बड़ी शिष्ट मुसकान के साथ पूछा।</p>
<p>मैंने भी मुस्कुरा कर सिर हिला दिया।</p>
<p>“मैं देखते ही समझ गई थी कि तुम हिंदुस्तानी होगे।&#8221; और वह अपना बड़ा सा थैला बैंच पर रख कर मेरे पास बैठ गई।</p>
<p>नाटे कद की बोझिल से शरीर की महिला बाजार से सौदा खरीद के लौट रही थी। खाड़ी के नीले जल जैसी ही उसकी आंखें थी। इतनी साफ नीली आंखे किवल छोटे बच्चों की ही होती हैं। इस पर साफ गौरी त्वचा। पर बाल खिचड़ी हो रहे थे और चेहरे पर हल्की हल्की रेखायें उतर आई थीं, जिनके जाल से, खाड़ी हो या रेगीस्तान, कभी कोई बच नहीं सकता। अपना खरीदारी का थैला बैंच पर रख कर वह मेरे पास तनिक सुस्ताने के लिये बैठ गई। वह अंग्रेज नहीं थी पर टूटी फूटी अंग्रेजी में अपना मतलब अच्छी तरह से समझा लेती थी।</p>
<p>“मेरा पति भी भारत का रहने वला है, इस वक्त घर पर है, तुम से मिलकर बहुत खुश होगा।&#8221;</p>
<p>मैं थोड़ा हैरान हुआ, इंगलैंड और फ्रांस आदि देशों में तो हिन्दुस्तानी लोग बहुत मिल जाते हैं। वहीं पर सैंकड़ों बस भी गये हैं, लेकिन युरोप के इस दूर दराज के इलाके मैं कोई हिन्दुस्तनी क्यों आकर रहने लगा होगा। कुछ कोतुहल वश, कुछ वक्त काटने की इच्छा से मैं तैयार हो गया।</p>
<p>“चलिये, जरूर मिलना चाहूंगा।&#8221; और हम दोनों उठ खड़े हुए।</p>
<p>सड़क पर चलते हुये मेरी नजर बार बार उस महिला के गोल मटोल शरीर पर जाती रही। उस हिंदुस्तानी ने इस औरत में क्या देखा होगा जो घर बार छोड़ कर यहां इसके साथ बस गया है। संभव है, जवानी में चुलबुली और नटखट रही होगी। इसकी नीली आंखों ने कहर ढाये होंगे। हिन्दुस्तानी मरता ही नीली आंखों और गोरी चमड़ी पर ही है। पर अब तो समय उस पर कहर ढाने लग था। पचास पचपन की रही होगी। थैला उठाये हुए सांस बार बार फूल रहा था। कभी उसे एक हाथ में उठाती और कभी दूसरे हाथ में। मैने थैला उसके हाथ से ले लिया और हम बतियाते हुए उसके घर की ओर जाने लगे।</p>
<p>“आप भी कभी भारत गई हैं?&#8221; मैंने पूछा।<br />
“एक बार गई थी, लाल ले गया था, पर इसे तो अब लगता है बीसियों बरस बीत चुके हैं।&#8221;<br />
“लाल साहब तो जाते रहते होंगे?&#8221;</p>
<p>महिला ने खिचड़ी बालों वाला अपना सिर झटक कर कहा &#8220;नहीं, वह भी नहीं गया। इसलिये वह तुम से मिल कर बहुत खुश होगा, यहां हिंदुस्तानी बहुत कम आते हैं।&#8221;</p>
<p>तंग सीढ़ियां चढ़ कर हम एक फ्लैट में पहुंचे, अंदर रोशनी थी और एक खुला सा कमरा जिसकी चारों दिवारों के साथ किताबों से ठसाठस भरी अलमारियां रखीं थीं। दिवार पर जहां कहीं कोई टुकड़ा खाली मिल था, वहां तरह तरह के नक्शे और मानचित्र टांग दिये गये थे। उसी कमरे में दूर, खिड़की के पास वाले कमरे में काले रंग का सूट पहने , सांवले रंग और उड़ते सफेद बालों वाला एक हिंदुस्तानी बैठा कोई पत्रिका बांच रह था।</p>
<p>“लाल, देखो तो कौन आया है? इनसे मिलो। तुम्हारे एक देशवासी को जबर्दस्ती खींच लायी हूं।&#8221; महिला ने हँस कर कहा।<br />
वह उठ खड़ा हुआ और जिज्ञासा और कोतुहल से मेरी और देखता हुआ आगे बढ़ आया।</p>
<p>“आइए-आइए! बड़ी खुशी हुई। मुझे लाल कह्ते हैं, मैं यहां इंजीनियर हूं। मेरी पत्नी ने मुझ पर बड़ा एहसान किया है जो आपको ले आई हैं।&#8221;</p>
<p>ऊँचे, लंबे कद का आदमी निकला। यह कहना कठिन था कि भारत के किस हिस्से से आया है। शरीर का बोझिल और ढीला ढाला था। दोनों कनपटियों के पास सफेद बालों के गुच्छे से उग आये थे जबकि सिर के ऊपर गिने चुने सफेद बाल उड़ से रहे थे।</p>
<p>दुआ-सलाम के बाद हम बैठे ही थे कि असने सवालों की झड़ी लगा दी। &#8220;दिल्ली शहर तो अब बहुत कुछ बदल गया होगा?&#8221; उसने बच्चों के से आग्रह के साथ पूछा।</p>
<p>“हाँ। बदल गया है। आप कब थे दिल्ली में?&#8221;</p>
<p>“मैं दिल्ली का रहने वाला नहीं हूं। यों लड़कपन में बहुत बार दिल्ली गया हूं। रहने वाला तो मैं पंजाब का हूँ, जालन्धर का। जालन्धर तो आपने कहां देखा होगा।&#8221;</p>
<p>“ऎसा तो नहीं, मैं स्वंय पंजाब का रहने वाला हू। किसी जमाने में जालन्धर में रह चुका हूं।&#8221;<br />
मेरे कहने की देर थी कि वह आदमी उठ खड़ा हुआ और लपक कर मुझे बाहों में भर लिया।<br />
“ओ लाजम! तूं बोलना नहीं ऎँ जे जलन्धर दा रहणवाला ऎं?&#8221;</p>
<p>मैं सकुचा गया। ढीले ढाले बुजुर्ग को यों उत्तेजित होता देख मुझे अटपटा सा लगा। पर वह सिर से पाँव तक पुलक उठा था। इसी उत्तेजना में वह आदमी मुझे छोड़ कर तेज तेज चलता हुआ पिछले कमरे की और चला गया और थोड़ी देर बाद अपनी पत्नी को साथ लिये अंदर दाखिल हुआ जो इसी बीच थैला उठाए अंदर चली गई थी।</p>
<p>“हेलेन, यह आदमी जलन्धर से आया है, मेरे शहर से, तुमने बताया ही नहीं।&#8221;<br />
उत्तेजना के कारण उसका चेहरा दमकने लगा था और बड़ी बड़ी आँखों के नीचे गुमड़ों में नमी आ गई थी।</p>
<p>“मैंने ठीक ही किया ना,&#8221; महिला कमरे में आते हुए बोली। उसने इस बीच एप्रन पहन लिया था और रसोई घर में काम करने लग गई थी। बड़ी शालीन, स्निग्ध नजर से उसने मेरी और देखा। उसके चेहरे पर वैसी ही शालीनता झलक रही थी जो दसियों वर्ष तक शिष्टाचार निभाने के बाद स्वभाव का अंग बन जती है। वह मुस्कुरती हुई मेरे पास आकर बैठ गई।</p>
<p>“लाल, मुझे भारत में जगह जगह घुमाने ले गया था। आगरा, बनारस, कलकत्ता, हम बहुत घूमे थे…..&#8221;</p>
<p>वह बुजुर्ग इस बीच टकटकी बांधे मेरी और देखे जा रहा था। उसकी आँखों में वही रुमानी किस्म का देशप्रेम झलकने लगा था जो देश के बाहर रहने वाले हिन्दुस्तानी की आँखों में, अपने किसी देशवासी से मिलने पर चमकने लगता है। हिन्दुस्तानी पहले तो अपने देश से भगता है और बाद से उसी हिन्दुस्तानी के लिये तरसने लगता है।</p>
<p>“भारत छोड़ने के बाद आप बहुत दिन से भारत नहीं गये, आपकी श्रीमती बता रही थी। भारत के साथ आपका संपर्क तो रहता ही होगा?&#8221;<br />
और मेरी नजर किताबों से ठसाठस भरी अल्मारियों पर पड़ी। दिवारॊं पर टंगे अनेक मानचित्र भारत के ही मानचित्र थे।<br />
उसकी पत्नी अपनी भारत यात्रा को याद करके कुछ अनमनी सी हो गयी थी, एक छाया सी मानो उसके चेहरे पर डोलने लगी हो।</p>
<p>“लाल के कुछ मित्र संबंधी अभी भी जालन्धर में रहते हैं। कभी-कभी उनका खत आ जाता है।&#8221; फिर हँसकर बोली, &#8220;उनके खत मुझे पढ़ने के लिये नहीं देता। कमरा अन्दर से बंद करके उन्हें पढ़ता है।&#8221;</p>
<p>“तुम क्या जानो कि उन खतों से मुझे क्या मिलता है!&#8221; लाल ने भावुक होते हुए कहा।<br />
इस पर उसकी पत्नी उठ खड़ी हुई।<br />
“तुम लोग जालन्धर की गलियों में घूमो, मैं चाय का प्रबंध करती हूं।&#8221; उसने हँसके कहा और उन्हीं कदमों रसोई घर की और घूम गई।</p>
<p>भारत के प्रति उस आदमी की अत्यधिक भावुकता को देख कर मुझे अचन्भा भी हो रहा था। देश के बाहर दशाब्दियों तक रह चुकने के बाद भी कोई आदमी बच्चों की तरह भावुक हो सकता है, मुझे अटपटा लग रहा था।</p>
<p>“मेरे एक मित्र को भी आप ही कि तरह भारत से बड़ा लगाव था,&#8221; मैंने आवाज को हल्का करते हुए मजाक के से लहजे में कहा, &#8220;वह भी बरसों तक देश के बाहर रहता रहा था। उसके मन में ललक उठने लगी कि कब मैं फिर से अपने देश की धरती पर पाँव रख पाऊँगा।&#8221;</p>
<p>कहते हुए मैं क्षण भर के लिये ठिठका। मैं जो कहने जा रहा हूं, शायद मुझे नहीं कहना चाहिये। लेकिन फिर भी घृष्टता से बोलता चल गया, &#8221; चुनांचे वर्षों बाद सचमुच वह एक दिन टिकट कटवाकर हवाईजहाज द्वारा दिल्ली जा पहुंचा। उसने खुद यह किस्सा बाद में मुझे सुनाया था। हवाईजहाज से उतर कर वो बाहर आया, हवाई अड्डे की भीड़ में खड़े खड़े ही वह नीचे की और झुका और बड़े श्रद्धा भाव से भारत की धरती को स्पर्श करने के बाद खड़ा हुआ तो देखा, बटुआ गायब था…&#8221;</p>
<p>बुजुर्ग अभी भी मेरी ओर देखे जा रहा था। उसकी आंखों के भाव में एक तरह की दूरी आ गयी थी, जैसे अतीत की अंधियारी खोह में से दो आँखें मुझ पर लगी हों।</p>
<p>“उसने झुक कर स्पर्श तो किया यही बड़ी बात है,&#8221; उसने धीरे से कहा, &#8220;दिल की साध तो पूरी कर ली।&#8221;</p>
<p>मैं सकुचा गया। मुझे अपना व्यवहार भोंडा सा लगा, लेकिन उसकी सनक के प्रति मेरे दिल में गहरी सहानुभूति रही हो, ऎसा भी नहीं था।</p>
<p>वह अभी भी मेरी और बड़े स्नेह से देखे जा रहा था। फिर वह सहसा उठ खड़ा हुआ- ऎसे मौके तो रोज रोज नहीं आते। इसे तो हम सेलिब्रेट करेंगे।&#8221; और पीछे जा कर एक अलमरी में से कोन्याक शराब की बोतल और दो शीशे के जाम उठा लाया।</p>
<p>जाम में कोन्याक उड़ेली गई। वह मेरे साथ बगलगीर हुआ, और हमने इस अनमोल घड़ी के नाम जाम टकराये।<br />
“आपको चाहिये कि आप हर तीसरे चौथे साल भारत की यात्रा पर जाया करें। इससे मन भरा रहता है।&#8221; मैंने कहा।</p>
<p>इसने सिर हिलाया &#8220;एक बार गया था, लेकिन तभी निश्चय कर लिया था कि अब कभी भारत नहीं आऊँगा।&#8221; शराब के दो एक जामों के बाद ही वह खुलने लगा था, और उसकी भावुकता में एक प्रकार की अत्मीयता का पुट भी आने लगा था। मेरे घुटने पर हाथ रख कर बोला, &#8220;मैं घर से भाग कर आया था। तब मैं बहुत छोटा था। इस बात को अब लगभग चालीस साल होने को आये हैं,&#8221; वह ठोड़ी देर के लिये पुरानी यादों में खो गया, पर फिर, अपने को झटका सा देकर वर्तमान में लौटा लाया। &#8220;जिंदगी में कभी कोइ बड़ी घटना जिंदगी का रुख नहीं बदलती, हमेशा छोटी तुच्छ सी घटनायें ही जिंदगी का रुख बदलती हैं। मेरे भाई ने केवल मुझे डाँटा था कि तुम पढ़ते लिखते नहीं हो, आवारा घूमते रहते हो, पिताजी का पैसा बरबाद करते हो……..और मैं उसी रात घर से भाग गया था।&#8221;</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/dilli-mein-ek-maut-story-by-kamleshwar/9424/"><strong>दिल्ली में एक मौत&#8230; पढ़िए आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>कहते हुये उसने फिर से मेरे घुटने पर हाथ रखा और बड़ी आत्मीयता से बोला &#8220;अब सोचता हूं, वह एक बार नहीं , दस बार भी मुझे डाँटता तो मैं इसे अपना सौभाग्य समझता। कम से कम कोई डाँटने वाला तो था।&#8221;</p>
<p>कहते कहते उसकी आवाज लड़खड़ा गयी, &#8220;बाद में मुझे पता चला कि मेरी माँ जिन्दगी के आखिरी दिनों तक मेरा इन्तजार करती रही थी। और मेरा बाप , हर रोज सुबह ग्यारह बजे , जब डाकिये के आने का वक्त होता तो वह घर के बाहर चबूतरे पर आकर खड़ा हो जाता था। और इधर मैंने यह दृढ़ निश्चय कर रखा था कि जब तक मैं कुछ बन ना जाऊं, घर वालों को खत नहीं लिखुंगा।&#8221;</p>
<p>एक क्षीण सी मुस्कान उसके होंठों पर आयी और बुझ गई,&#8221;फिर मैं भारत गया। यह लगभग पंद्रह साल बाद की बात रही होगी। मैं बड़े मंसूबे बांध कर गया था…..&#8221;</p>
<p>उसने फिर जाम भरे और अपना किस्सा सुनाने को मुँह खोला ही था कि चाय आ गयी। नाटे कद की उसकी गॊलमटोल पत्नी चाय की ट्रे उठाये, मुस्कुराती हुई चली आ रही थी। उसे देख कर मन में फिर से सवाल उठा, क्या यह महिला जिन्दगी का रुख बदलने का कारण बन सकती है?</p>
<p>चाय आ जाने पर वार्तालाप में औपचारिकता आ गई।</p>
<p>“जालन्धर में हम माई हीराँ के दरवाजे के पास रहते थे। तब तो जालन्धर बड़ा टूटा फूटा सा शहर था। क्यों, हनी? तुम्हे याद है, जालन्धर में हम कहाँ पर रहे थे?&#8221;</p>
<p>“मुझे गलियों के नाम तो मालूम नहीं, लाल, लेकिन इतना याद है कि सड़कों पर कुत्ते बहुत घूमते थे, और नालियां बड़ी गंदी थीं, मेरी बड़ी बेटी &#8211; तब वह डेढ़ साल की थी- मक्खी देख कर डर गई थी। पहले कभी मक्खी नहीं देखी थी। वहीं पर हमने पहली बार गिलहरी को भी देखा था। गिलहरी उसके सामने से लपक कर एक पेड़ पर चड़ गयी तो वह भागती हुई मेरे पास दोड़ आयी थी। ……और क्या था वहाँ?&#8221;</p>
<p>“……….हम लाल के पुश्तैनी घर में रहे थे……&#8221;</p>
<p>चाय पीते समय हम इधर उधर कि बातें करते रहे। भारत की अर्थ्व्यावस्था की, नये नये उद्योग धंधों की, और मुझे लगा कि देश से दूर रहते हुए भी यह आदमी देश की गतिविधि से बहुत कुछ परिचित है।</p>
<p>“मैं भारत में रहते हुए भी भारत के बारे में बहुत कम जानता हू, आप भारत से दूर हैं, पर भारत के बारे में बहुत कुछ जानते हैं।&#8221;<br />
उसने मेरी और देखा और होले से मुस्कुरा कर बोला &#8221; तुम भारत में रहते हो, यही बड़ी बात है।&#8221;</p>
<p>मुझे लगा जैसे सब कुछ रहते हुए भी, एक अभाव सा, इस आदमी के दिल को अन्दर ही अन्दर चाटता रहता है- एक खला जिसे जीवन की उपलब्धियां और आराम आसायश, कुछ भी नहीं पाट सकता, जैसे रह रह कर कोई जख्म सा रिसने लगता हो।</p>
<p>सहसा उसकी पत्नी बोली, &#8220;लाल ने अभी तक अपने को इस बात के लिये माफ नहीं किया कि उसने मेरे साथ शादी क्यों की।&#8221;<br />
“हेलेन…&#8221;</p>
<p>मैं अटपटा महसूस करने लगा। मुझे लगा जैसे भारत को लेकर पति पत्नी के बीच अक्सर झगड़ा उठ खड़ा होता होगा, और जैसे इस विषय पर झगड़ते हुए ही ये लोग बुड़ापे की दहलीज तक आ पहुंचे थे। मन में आया कि मैं फिर से भारत की बुराई करूँ ताकि यह सज्जन आपनी भावुक परिकल्पनाओं से छुटकारा पाये लेकिन यह कोशिश बेसूद थी।</p>
<p>“सच कहती हूं,&#8221; उसकी पत्नी कहे जा रही थी, &#8220;इसे भारत में शादी करनी चाहिये थी। तब यह खुश रहता। मैं अब भी कहती हूं कि यह भारत चला जाये, और मैं अलग यहां रहती रहूंगी। हमारी दोनो बेटियां बड़ी हो गई हैं। मैं अपना ध्यान रख लूंगी….&#8221;</p>
<p>वह बड़ी संतुलित, निर्लिप्त आवाज में कहे जा रही थी। उसकी आवाज में न शिकायत का स्वर था, न क्षोभ का। मानो अपने पति के ही हित की बात बड़े तर्कसंगत और सुचिन्तित ढंग से कह रही हो।</p>
<p>“पर मैं जानती हूं, यह वहां पर भी सुख से नहीं रह पायेगा। अब तो वहां की गर्मी भी बर्दाश्त नहीं कए पायेगा। और वहां पर अब इसका कौन बैठा है? माँ रही, न बाप। भाई ने मरने से पहले पुराना पुश्तैनी घर भी बेच दिया था।&#8221;</p>
<p>“हेलेन, प्लीज…&#8221; बुजुर्ग ने वास्ता डालने के से लहजे में कहा।</p>
<p>अब की बार मैंने स्वंय इधर उधर की बातें छेड दीं। पता चला कि उनकी दो बेटियां हैं, जो इस समय घर पर नहीं थीं, बड़ी बेटी बाप की ही तरह इंजीनियर बनी थी, जबकी छोटी बेटी अभी युनीवर्सिटी में पढ़ रही थी, कि दोनो बड़ी समझदार और प्रतिभासंपन्न हैं। युवतियां हैं।</p>
<p>क्षण भर के लिये मुझे लगा कि मुझे इस भावुकता की ओर अधिक ध्यान नहीं देना चाहिये, इसे सनक से ज्यादा नहीं समझना चाहिये, जो इस आदमी को कभी कभी परेशान करने लगती है जब अपने वतन का कोई आदमी इससे मिलता है। मेरे चले जाने के बाद भावुकता का यह ज्वार उतर जायेगा और यह फिर से अपने दैनिक जीवन की पटरी पर आ जायेगा।</p>
<p>आखिर चाय का दौर खतम हुआ. और हमने सिगरेट सुलगाया। कोन्याक का दौर अभी भी थोड़े थोड़े वक्त के बाद चल रहा था। कुछ देर सिगरेटों सिगारों की चर्चा चली, इसी बीच उसकी पत्नी चाय के बर्तन उठा कर किचन की ओर बढ़ गई।</p>
<p>“हां, आप कुछ बता रहे थे कि कोई छोटी सी घटना घटी थी….&#8221;</p>
<p>वह क्षण भर के लिये ठिठका, फिर सिर टेढ़ा करके मुस्कुराने लगा, &#8220;तुम अपने देश से ज्यादा देर बाहर नहीं रहे इस लिये नहीं जानते कि परदेश में दिल की कैफियत क्या होती है। पहले कुछ साल तो मैं सब कुछ भूले रहा पर भारत से निकले दस-बारह साल बाद भारत कि याद रह रह कर मुझे सताने लगी। मुझ पर इक जुनून सा तारी होने लगा। मेरे व्यवहार में भी इक बचपना सा आने लगा। कभी कभी मैं कुर्ता पायजाम पहन कर सड़कों पर घूमने लगता था, ताकि लोगों को पता चले कि मैं हिन्दूस्तानी हूं, भारत का रहने वाला हूं। कभी जोधपुरी चप्पल पहन लेता, जो मैंने लंदन से मंगवायी थी, लोग सचमुच बड़े कोतुहल से मेरी चप्पल की ओर देखते, और मुझे बड़ा सुख मिलता। मेरा मन चाहता कि सड़कों पर पान चबाता हुआ निकलूं, धोती पहन कर चलूं। मैं सचमुच दिखाना चाहता था कि मैं भीड़ में खोया अजनबी नहीं हूं, मेरा भी कोई देश है, मैं भी कहीं का रहने वाला हूं। परदेस में रहने वाले हिन्दुस्तानी के दिल को जो बात सबसे ज्यादा सालती है, वह यह कि वह परदेश में एक के बाद एक सड़क लांघता चला जाये और उसे कोई जानता नहीं, कोई पहचानता नहीं, जबकि अपने वतन में हर तीसरा आदमी वाकिफ होता है। दिवाली के दिन मैं घर में मोमबत्तियाँ लाकर जला देता, हेलेन के माथे पर बिंदी लगाता, उसकी माँग में लाल रंग भरता। मैं इस बात के लिये तरस तरस जाता कि रक्षा बन्धन का दिन हो और मेरी बहिन अपने हाथों से मुझे राखी बांधे, और कहे ’मेरा वीर जुग जुग जिये!’ मैं ’वीर’ शब्द सुन पाने के लिये तरस तरस जाता। आखिर मैंने भारत जाने का फैसला कर लिया। मैंने सोचा, मैं हेलेन को भी साथ ले चलुंगा और अपनी डेढ़ बरस की बची को भी। हेलेन को भारत की सैर कराउंगा और यदि उसे भारत पसंद आया तो वहीं छोटी मोटी नौकरी करके रह जाऊंगा।&#8221;</p>
<p>“पहले तो हम भारत में घूमते घामते रहे। दिल्ली, आगरा, बनारस…. मैं एक एक जगह बड़े चाव से इसे दिखाता और इसकी आँखों में इसकी प्रतिक्रिया देखता रहता। इसे कोई जगह पसन्द होती तो मेरा दिल गर्व से भर उठता।&#8221;</p>
<p>“फिर हम जलन्धर गये।&#8221; कहते ही वह आदमी फिर से अनमना सा होकर नीचे की और देखने लगा और चुपचाप सा होगया, मुझे जगा जैसे वह मन ही मन दूर अतीत में खो गया है और खोता चला जा रहा है। पर सहसा उसने कंधे झटक दिये और फर्श की ओर आँखे लगाये ही बोला, &#8221; जालन्धर में पहुंचते ही मुझे घोर निराशा हुई। फटीचर सा शहर, लोग जरूरत से ज्यादा काले और दुबले। सड़कें टूटी हुइं। सभी कुछ जाना पहचाना था लेकिन बड़ा छोटा छोटा और टूटा फूटा। क्या यही मेरा शहर है जिसे मैं हेलेन को दिखाने लाया हूं? हमारा पुशतैनी घर जो बचपन में मुझे इतना बड़ा बड़ा और शानदार लग करता था, पुराना और सिकुड़ा हुआ। माँ बाप बरसों पहले मर चुके थे। भाई प्यार से मिला लेकिन उसे लगा जैसे मैं जायदाद बाँटने आया हूं और वह पहले दिन से ही खिंचा खिंचा रहने लगा। छोटी बहन की दस बरस पहले शादी हो चुकी थी और वह मुरादाबाद में जाकर रहने लगी थी। क्या मैं विदेशों में बैठा इसी नगर के स्वपन देखा करता था? क्या मैं इसी शहर को देख पाने के लिये बरसों से तरसता रहा हूं? जान पहचान के लोग बूढ़े हो चुके थे। गली के सिरे पर कुबड़ा हलवाई बैठा करता था। अब वह पहले से भी ज्यादा पिचक गया था, और दुकान में चौकी पर बैठने के बजाये, दुकान के बाहर खाट पर उकड़ूं बैठा था। गलियां बोसीदा, सोयी हुई। मैं हेलेन को क्या दिखाने लाया हूं? दो तीन दिन इसी तरह बीत गये। कभी मैं शहर से बाहर खेतों में चल जाता, कभी गली बाजार में घूमता। पर दिल में कोई स्फूर्ति नहीं थी, कोई उत्साह नहीं था। मुझे लगा जैसे मैं फिर किसी पराये नगर में पहुंच गया हूं।</p>
<p>तभी एक दिन बाजार में जाते हुए मुझे अचानक ऊँची सी आवाज सुनायी दी &#8211; ’ओ हरामजादे !’ मैंने विशेष ध्यान नहीं दिया। यह हमारे शहर की परम्परागत गाली थी जो चौबिसों घंटे हर शहरी की जबान पर रहती थी। केवल इतना भर विचार मन में उठा कि शहर तो बूढ़ा हो गया है लेकिन उसकी तहजीब ज्यों की त्यों कायम है।</p>
<p>“ओ हराम जादे ! अपने बाप की तरफ देखता भी नहीं?&#8221;</p>
<p>मुझे लगा जैसे कोई आदमी मुझे ही सम्बोधन कर रहा है। मैंने घूम कर देखा। सड़क के उस पार, साईकिलों की एक दुकान के चबूतरे पर खड़ा एक आदमी मुझे ही बुला रहा था।</p>
<p>मैंने ध्यान से देखा। काली काली फनियर मूँछों, सपाट गंजे सिर और आँखों पर लगे मोटे चश्मे के बीच से एक आकृति सी उभरने लगी। फिर मैंने झट से उसे पहचान लिया। वह तिलकराज था, मेरा पुराना सहपाठी।</p>
<p>” हरामजादे! अब बाप को पहचानता भी नहीं है!&#8221; दूसरे क्षण हम दोनो एक दूसरे की बाहों में थे।</p>
<p>“ओ हराम दे! बाहर की गया, साहब बन गया तूं?&#8221; तेरी साहबी विच मैं…….&#8221; और उसने मुझे जमीन पर से उठा लिया। मुझे डर था कि वह सचमुच ही जमीन पर मुझे पटक न दे। दूसरे क्षण हम एक दूसरे को गालियां निकाल रहे थे।</p>
<p>मुझे लड़कपन का मेरा दोस्त मिल गया था। तभी सहसा मुझे लगा जैसे जालन्धर मिल गया है, मुझे मेरा वतन मिल गया है। अभी तक मैं अपने शहर में अजनबी सा घूम रहा था। तिलक राज से मिलने की देर थी कि मेरा सारा पराया पन जाता रहा। मुझे लगा जैसे मैं यहीं का रहने वाला हूं। मैं सड़क पर चलते किसी भी आदमी से बात कर सकता हूं, झगड़ सकता हूं। हर इन्सान कही का बन कर रहना चाहता है। अभी तक मैं अपने शहर में लौट कर भी परदेसी था, मुझे किसी ने पहचाना नहीं था। अपनाया नहीं था। यह गाली मेरे लिये वह तन्तू थी, सोने की वह कड़ी थी जिसने मुझे मेरे वतन से, मेरे लोगों से, मेरे बचपन और लड़कपन से, फिर से जोड़ दिया था।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/balako-ka-chor-story-by-sarat-chandra-chattopadhyay/9367/"><strong>बालकों का चोर&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>तिलकराज की और मेरी हरकतों में बचपना था, बेवकूफी थी। पर उस वक्त वही सत्य था, और उसकी सत्यता से आज भी मैं इन्कार नहीं कर सकता। दिल दुनिया के सच बड़े भॊंडे पर बड़े गहरे और सच्चे होते हैं।</p>
<p>“चल, कहीं बैठ्कर चाय पीते हैं,” तिलकराज ने फिर गाली देकर कहा। “वह पंजाबी दोस्त क्या जो गाली देकर, फक्कड़ तोलकर बगलगीर न हो जाये।”</p>
<p>हम दोनों, एक दूसरे की कमर में हाथ डाले. खरामा खरामा माई हीरां के दरवाजे की ओर जाने लगे। मेरी चाल में पुराना अलसाव आ गया। मैं जालन्धर की गलियों में यूं घूमने लगा जैसे कोई जागीरदार अपनी जगीर में घूमता है। मैं पुलक पुलक रहा था। किसी किसी वक्त मन में से आवज उठती, तुम यहां के नहीं हो, पराये हो, परदेसी हो, पर मैं अपने पैर और भी जोर से पटक पटक कर चलने लगता।</p>
<p>“चुच्चा हलवाई अभी भी वहीं पर बैठता है?”<br />
“और क्या, तूं हमें धोखा दे गया है, और लोगों ने तो धोखा नहीं दिया।”</p>
<p>इसी अल्हड़पन से, एक दूसरे की कमर में हाथ डाले, हम किसी जमाने में इन्हीं सड़कों पर घूमा करते थे। तिलकराज के साथ मैं लड़कपन में पहुंच गया था, उन दिनों का अलबेलापन महसूस करने लग था।</p>
<p>हम एक मैले कुचैले ढाबे में जा बैठे। वही मक्खियों और मैल से अटा गन्दा मेज, पर मुझे परवाह नहीं थी, यह मेरे जालन्धर के ढाबे का मेज था। उस वक्त मेरा दिल करता कि हेलेन मुझे इस स्थिति में आकर देखे, तब वह मुझे जान लेगी कि मैं कौन हूं, कहां का रहने वाला हूं,कि दुनिया में एक कौना ऎसा भी है जिसे मैं अपना कह सकता हूं, यह गन्दा ढाबा, यह धूंआधारी फटीचर खोह।</p>
<p>ढाबे से निकल कर हम देर तक सड़कों पर मटरगश्ती करते रहे यहां तक कि थककर चूर हो गये। वह उसी तरह मुझे अपने घर के सामने तक ले गया। जैसे लड़कपन में मैं उसके साथ चलता हुआ, उसे उसके घर तक छोड़ने जाता था, फिर वह मुझे मेरे घर तक छोड़ने आता था।</p>
<p>तभी उसने कहा, “कल रात खाना तुम मेरे घर पर खाओगे। अगर इन्कार किया तो साले, यहीं तुझे गले से पकड़ कर नाली में घुसेड़ दूंगा।”</p>
<p>“आऊंगा,” मैंने झट से कहा।<br />
“अपनी मेम को भी लाना। आठ बजे मैं तेरी राह देखूंगा। अगर नहीं आया तो साले हराम दे….”</p>
<p>और पुराने दिनों की ही तरह उसने पहले हाथ मिलाया और फिर घुटना उठा कर मेरी जांघ पर दे मारा। यही हमारा विदा होने का ढंग हुआ करता था। जो पहले ऎसा कर जाये कर जाये। मैंने भी उसे गले से पकड़ लिया और नीचे गिराने का अभिनय करने लगा।</p>
<p>यह स्वाँग था। मेरी जालन्धर की सारी यात्रा ही छलावा थी। कोई भावना मुझे हांके चले जा रही थी और मैं इस छलावे में ही खोया रहना चाहता था।</p>
<p>दूसरे रोज, आठ बजते न बजते, हेलेन और मैं उसके घर जा पहूंचे। बच्ची को हमने पहले ही खिलाकर सुला दिया था। हेलेन ने अपनी सबसे बढिया पोशाक पहनी, काले रंग का फ्राक, जिसपर सुनहरी कसीदाकारी हो रही थी, कंघों पर नारंगी रंग का स्टोल डाला, और बार बार कहे जाती:</p>
<p>“तुम्हारा पुराना दोस्त है तो मुझे बन सँवर कर ही जाना चाहिये ना।”</p>
<p>मैं हां कह देता पर उसके एक एक प्रसाधन पर वह और भी ज्यादा दूर होती जा रही थी। न तो काला फ्राक और बनाव सिंगार और न स्टोल और इत्र फुलेल ही जालन्धर में सही बैठते थे। सच पूछो तो मैं चाहता भी नहीं था कि हेलेन मेरे साथ जाये। मैंने एकाध बार उसे टालने की कोशिश भी की, जिस पर वह बिगड़ कर बोली, “वाह जी, तुम्हारा दोस्त हो और मैं उससे न मिलूं? फिर तुम मुझे यहां लाये ही क्यों हो?”</p>
<p>हम लोग तो ठीक आठ बजे उसके घर पहुंच गये लेकिन उल्लू के पट्ठे ने मेरे साथ धोखा किया। मैं समझे बैठा था कि मैं और मेरी पत्नी ही उसके परिवर के साथ खाना खायेंगे। पर जब हम उसके घर पहुंचे तो उसने सारा जालन्धर इकट्ठा कर रखा था, सारा घर मेहमानों से भरा था। तरह तरह के लोग बुलाये गये थे। मुझे झेंप हुई। अपनी ओर से वह मेरा शानदार स्वागत करना चाहता था। वह भी पंजाबी स्वभाव के अनुरूप ही। दोस्त बाहर से आये और वह उसकी खातिरदारी न करे। अपनी जमीन जायदाद बेचकर भी वह मेरी खातिरदारी करता। अगर उसका बस चलता तो वह बैंड बाजा भी बुला लेता। पर मुझे बड़ी कोफ्त हुई। जब हम पहुंचे तो बैठक वाला कमरा महमानों से भरा था, उनमें से अनेक मेरे परिचित भी निकल आये और मेरे मन में फिर हिलोर सी उठने लगी।</p>
<p>पत्नी से मेरा परिचय कराने के लिये मुझे बैठक में से रसोईघर की ओर ले गया। वह चुल्हे के पास बैठी कुछ तल रही थी। वह झट से उठ खड़ी हुई दुप्पटे के कोने से हाथ पोंछते हुए आगे बढ़ आयी। उसका चेहरा लाल हो रहा था और बालों की लट माथे पर झूल आयी थी। ठेठ पंजाबिन, अपनत्व से भरी, मिलनसार, हँसमुख। उसे यों उठते देखकर मेरा सारा शरीर झनझना उठा। मेरी भावज भी चुल्हे से ऎसे ही उठ आया करती थी, दुप्पटे के कोने से हाथ पोंछती हुई, मेरी बड़ी बहनें भी, मेरी माँ भी। पंजाबी महिला का सारा बांकापन, सारी आत्मियता उसमें जैसे निखर निखर आयी थी। किसी पंजाबिन से मिलना हो तो रसोईघर की दहलीज पर ही मिलो। मैं सराबोर हो उठा। वह सिर पर पल्ला ठीक करती हुई, लजाती हुई सी मेरे सामने आ खड़ी हुई।</p>
<p>“भाभी, यह तेरा घरवाला तो पल्ले दर्जे का बेवकूफ है, तुम इसकी बातों में क्यों आ गईं?”<br />
“इतना आडम्बर करने की क्या जरूरत थी? हम लोग तो तुमसे मिलने आये हैं…”</p>
<p>फिर मैंने तिलकराज की और मुखातिब होकर कह, “उल्लू के पट्ठे, तुझे मेहमाननवाजी करने को किसने कहा था? हरामी, क्या मैं तेरा मेहमान हूं? … मैं तुझसे निबट लूंगा।”</p>
<p>उसकी पत्नी कभी मेरी ओर देखती, कभी अपने पति की ओर फिर धीरे से बोली, “आप आयें और हम खाना भी न करें? आपके पैरों से तो हमारा घर पवित्र हुआ है।”</p>
<p>वही वाक्य जो शताब्दियों से हमारी गृहणियाँ मेहमानों से कहती आ रही हैं।</p>
<p>फिर वह हमें छोड़ कर सीधा मेरी पत्नी से मिलने चली गई और जाते ही उसका हाथ पकड़ लिया और बड़ी आत्मीयता से उसे खींचती हुई एक कुर्सी की ओर ले गयी। वह यों व्यवहार कर रही थी जैसे उसका भाग्य जागा हो। हेलेन को कुर्सी पर बैठाने के बाद वह स्वँय नीचे फर्श पर बैठ गयी। वह टूटी फूटी अंग्रेजी बोल लेती थी ओर बेधड़क बोले जा रही थी। हर बार उनकी आँखें मिलतीं तो वह हंस देती। उसके लिये हेलेन तक अपने विचार पहुंचाना कठिन था लेकिन अपनी आत्मीयता और स्नेह भाव उस तक पहुंचाने में उसे कोई कठिनाई नहीं हुई।</p>
<p>उस शाम तिलकराज की पत्नी हेलेन के आगे पीछे घूमती रही। कभी अन्दर से कढ़ाई के कपड़े उठा लाती और एक एक करके हेलेन को दिखाने लगती। कभी उसका हाथ पकड़ कर उसे रसोईघर में ले जाती , और उसे एक एक व्यंजन दिखाती कि उसने क्या क्या बनाया है और कैसे कैसे बनाया है। फिर वह अपनी कुल्लू की शाल उठा लायी और जब उसने देखा कि हेलेन को पसंद आयी है, तो उसने उसके कंधों पर डाल दी।</p>
<p>इस सारी आवभगत के बावजूद हेलेन थक गयी। भाषा की कठिनाई के बावजूद वह बड़ी शालीनता के साथ सभी से पेश आयी। पर अजनबी लोगों के साथ आखिर कोई कितनी देर तक शिष्टाचार निभाता रहे? अभी ड्रिंक्स ही चल रहे थे जब वह एक कुर्सी पर थक कर बैठ गयी। जब कभी मेरी नजर हेलेन की ओर उठती तो वह नजर नीची कर लेती, जिसक मतलब था कि मैं चुपचाप इस इन्तजार में बैठी हूं कि कब तुम मुझे यहां से ले चलो।</p>
<p>रात के बारह बजे के करीब पार्टी खत्म हुई और तिलकराज के यार दोस्त नशे में झूमते हुये अपने अपने घर जाने लगे। उस वक्त तक काफी शोर गुल होने लगा था, कुछ लोग बहकने भी लगे थे। एक आदमी के हाथ से शराब का गिलास गिरकर टूट गया था।</p>
<p>जब हम लोग भी जाने को हुए और हेलेन भी उठ खड़ी हुई तो तिलकराज ने पंजाबी दस्तूर के मुताबिक कहा &#8211; बैठ जा, बैठ जा, कोई जाना वाना नहीं है।</p>
<p>“नहीं यार, अब चलें। देर हो गयी है।”<br />
उसने फिर मुझे धक्का देकर कुर्सी पर फेंक दिया।</p>
<p>कुछ हल्का हल्का सरूर, कुछ पुरानी याद, तिलकराज का प्यार और स्नेह उसकी पत्नी का आत्मीयता से भरा व्यवहार, मुझे भला लग रहा था। सलवार कमीज पहने बालों का जूड़ा बनाये, चूड़ीयां खनकाती एक कमरे से दूसरे कमरे में जाती हुई तिलकराज की पत्नी मेरे लिये मेरे वतन का मुजस्समा बन गयी थी, मेरे देश की समुची संस्कृति उसमें सिमट आयी थी। मेरे दिल में, कहीं गहरे में, एक टीस सी उठी कि मेरे घर में भी कोई मेरे ही देश की महिला एक कमरे से दूसरे कमरे में घूमा करती, उसी की हंसी गूंजती, मेरे ही देश के गीत गुनगुनाती। वर्षों से मैं उन बोलों के लिये तरस गया था जो बचपन में अपने घर में सुना करता था।</p>
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<p>हेलेन से मुझे कोई शिकायत नहीं थी। मेरे लिये उसने क्या नहीं किया था। उसने चपाती बनाना सीख लिया था। दाल छोंकना सीख लिया था। शादी के कुछ समय बाद ही वह मेरे मुंह से सुने गीत टप्पे भी गुनगुनाने लगी थी। कभी कभी सलवार कमीज पहन कर मेरे साथ घूमने निकल पड़ती। रसोईघर की दीवार पर उसने भारत का एक मानचित्र टांग दिया था जिस पर अनेक स्थानों पर लाल पेंसिल से निशान लगा रखे थे कि जालन्धर कहां है और दिल्ली कहां है और अमृतसर कहां है जहां मेरी बड़ी बहन रहती थी। भारत सम्बंधी जो किताब मिलती, उठा लाती, जब कभी कोई हिन्दुस्तानी मिल जाता उसे आग्रह अनुरोध करके घर ले आती। पर उस समय मेरी नजर में यह सब बनावट था, नकल थी, मुलम्मा था &#8211; इन्सान क्यों नहीं विवेक और समझदारी के बल पर अपना जीवन व्यतीत कर सकता? क्यों सारा वक्त तरह तरह के अरमान उसके दिल को मथते रहते हैं?</p>
<p>“फिर?” मैंने आग्रह से पूछा।</p>
<p>उसने मेरी ओर देखा और उसके चेहरे की मांसपेशियों में हल्का सा कम्पन हुआ। वह मुस्कराकर कहने लगा, “तुम्हे क्या बताऊं।” तभी मैं एक भूल कर बैठा। हर इन्सान कहीं न कहीं पागल होता है और पागल बना रहना चाहता है……..जब मैं विदा लेने लगा और तिलकराज कभी मुझे गलबहियां देकर और कभी धक्का देकर बिठा रहा था और हेलेन भी पहले से दरवाजे पर जा खड़ी हुई थी, तभी तिलकराज की पत्नी लपककर रसोईघर की ओर से आई और बोली, “हाय, आपलोग जा रहे हैं? यह कैसे हो सकता है? मैंने तो खास आपके लिये सरसों का साग और मक्के की रोटियां बनाई हैं।”</p>
<p>मैं ठिठक गया। सरसों का साग और मक्की की रोटियां पंजाबियों का चहेता भोजन है।<br />
“भाभी, तुम भी अब कह रही हो? पहले अंट संट खिलाती रही हो और अब घर जाने लगे हैं तो….”</p>
<p>“मैं इतने लोगों के लिये कैसे मक्की की रोटियां बना सकती थी? अकेली बनाने वाली जो थी। मैंने आपके लिये थोड़ी सी बना दी। यह कहते थे कि आपको सरसों का साग और मक्की की रोटी बहुत पसंद है…..”</p>
<p>सरसों का साग और मक्की की रोटी। मैं चहक उठा, और तिलकराज को सम्बोधन करके कहा. “ओ हरामी, मुझे बताया क्यों नहीं?” और उसी हिलोरे में हेलेन से कहा, “आओ हेलेन, भाभी ने सरसों का साग बनाया है। यह तो तुम्हे चखना ही होगा।”</p>
<p>हेलेन खीज उठी। पर अपने को संयत कर मुस्कुराती हुई बोली, “मुझे नहीं, तुम्हे चखना होगा।” फिर धीरे से कहने लगी, “मैं बहुत थक गयी हूं। क्या यह साग कल नहीं खाया जा सकता?”</p>
<p>सरसों का साग, नाम से ही मैं बावला हो उठा था। उधर शराब का हल्का हल्का नशा भी तो था।</p>
<p>“भाभी ने खास हमारे लिये बनाया है। तुम्हे जरूर अच्छा लगेगा।”</p>
<p>फिर बिना हेलेन के उत्तर का इन्तजार किये, साग है तो मैं तो रसोईघर के अन्दर बैठ कर खाऊंगा। मैंने बच्चों की तरह लाड़ से कहा, “चल बे, उल्लू के पट्ठे, उतार जूते, धो हाथ और बैठ जा थाली के पास ! एक ही थाली में खायेंगे।”</p>
<p>छोटा सा रसोईघर था। हमारे अपने घर में भी ऎसा ही रसोईघर हुआ करता था जहां मां अंगीठी के पास रोटियां सेंका करती थी और हम घर के बच्चे, साझी थालियों में झुके लुकमे तोड़ा करते थे।</p>
<p>फिर एक बार चिरपरिचित दृश्य मानों अतीत में से उभर कर मेरी आंखों के सामने घूमने लगा था और मैं आत्मविभोर होकर उसे देखे जा रहा था। चुल्हे की आग की लौ में तिलकराज की पत्नी के कान का झूमर चमक चमक जाता था। सोने के कांटे में लाल नगीना पंजाबियों को बहुत फबता है। इस पर हर बार तवे पर रोटी सेंकने पर उसकी चूड़ियां खनक उठतीं और वह दोनो हाथों से गरम गरम रोटी तवे पर से उतार कर हंसते हुए हमारी थाली में डाल देती।</p>
<p>यह दृश्य मैं बरसों के बाद देख रहा था और यह मेरे लिये किसी स्वपन से भी अधिक सुन्दर और हृदयग्राही था। मुझे हेलेन की सुध भी नहीं रही। मैं बिल्कुल भूले हुए था कि बैठक में हेलेन अकेली बैठी मेरा इन्तजार कर रही है। मुझे डर था कि अगर मैं रसोईघर में से उठ गया तो स्वपन भंग हो जायेगा। यह सुन्दरतम चित्र टुकड़े टुकड़े हो जायेगा। लेकिन तिलकराज की पत्नी उसे नहीं भूली थी। वह सबसे पहले एक तशतरी में मक्की की रोटी और थोड़ा सा साग और उस पर थोड़ा सा मक्खन रख कर हेलेन के लिये ले गयी थी। बाद में भी, दो एक बार बीच बीच में उठ कर उसके पास कुछ न कुछ लेजाती रही थी।</p>
<p>खाना खा चुकने पर, जब हम लोग रसोईघर में से निकल कर बैठक में आये तो हेलेन कुर्सीं में बैठे बैठे सो गयी थी और तिपाई पर मक्की की रोटी अछूती रखी थी। हमारे कदमों की आहट पाकर उसने आंखें खोलीं और उसी शालीन शिष्ट मुस्कान के साथ उठ खड़ी हुई।</p>
<p>विदा लेकर जब हम लोग बाहर निकले तो चारों ओर सन्नाटा छाया था। नुक्क्ड़ पर हमें एक तांगा मिल गया। तांगे में घूमे बरसों बीत चुके थे, मैंने सोचा हेलेन को भी इसकी सवारी अच्छी लगेगी। पर जब हम लोग तांगे में बैठे कर घर की ओर जाने लगे तो रास्ते में हेलेन बोली, “कितने दिन और तुम्हारा विचार जालन्धर में रहने का है?”</p>
<p>“क्यों अभी से ऊब गयीं क्या?” आज तुम्हे बहुत परेशान किया ना, आई एम सारी।”<br />
हेलेन चुप रही, न हूं, न हां।</p>
<p>“हम पंजाबी लोग सरसों के साग के लिये पागल हुए रहते हैं। आज मिला तो मैंने सोचा जी भर के खाओ। तुम्हे कैसे लगा?”<br />
“सुनो, मैं सोचती हूं मैं यहां से लौट जाऊं, तुम्हारा जब मन आये, चले आना।”<br />
“यह क्या कह रही हो हेलेन, क्या तुम्हे मेरे लोग पसंद नहीं हैं?”</p>
<p>भारत में आने पर मुझे मन ही मन कई बार यह खयाल आया था कि अगर हेलेन और बच्ची साथ में नहीं आतीं तो में खुल कर घूम फिर सकता था। छुट्टी मना सकता था। पर मैं स्वंय ही बड़े आग्रह से उसे अपने साथ लाया था। मैं चाहता था कि हेलेन मेरा देश देखे, मेरे लोगों से मिले, हमारी नन्ही बच्ची के संस्कारों में भारत के संस्कार भी जुड़ें और यदि हो सके तो मैं भारत में ही छोटी मोटी नौकरी कर लूं।</p>
<p>हेलेन की शिष्ट, सन्तुलित आवाज में मुझे रुलाई का भास हुआ। मैंने दुलार से उसे आलिंगन में भरने की कोशिश की। उसमे धीरे से मेरी बांह को परे हटा दिया। मुझे दूसरी बार उसके इर्द गिर्द अपनी बांह डाल देनी चाहिये थी, लेकिन मैं स्वंय तुनक उठा।</p>
<p>“तुम तो बड़ी डींग मारा करतीं हो कि तुम्हे कुछ भी बुरा नहीं लगता और अभी एक घंटे में ही कलई खुल गई।”</p>
<p>तांगे में हिचकोले आ रहे थे। पुराना फटीचर सा तांगा था, जिसके सब चुल ढीले थे। हेलेन को तांगे के हिचकोले परेशान कर रहे थे। ऊबड़ खाबड़, गड्डों से भरी सड़क पर हेलेन बार बार संभल कर बैठने की कोशिश कर रही थी।</p>
<p>“मैं सोचती हूं, मैं बच्ची को लेकर लौट जाऊंगी। मेरे यहां रहते तुम लोगों से खुलकर नहीं मिल सकते।” उसकी आवाज में औपचारिकता का वैसा ही पुट था जैसा सरसों के साग की तारीफ करते समय रहा होगा, झूठी तारीफ और यहां झूठी सद्भावना।</p>
<p>“ तुम खुद सारा वक्त गुमसुम बैठी रही हो। मैं इतने चाव से तुम्हे अपना देश दिखाने लाया हूं।”</p>
<p>“तुम अपने दिल की भूख मिटाने आये हो, मुझे अपना देश दिखाने नहीं लाये,” उसने स्थिर, समतल, ठण्डी आवाज में कहा.”और अब मैंने तुम्हारा देश देख लिया है।”</p>
<p>मुझे चाबुक सी लगी।</p>
<p>“इतना बुरा क्या है मेरे देश में जो तुम इतनी नफरत से उसके बारे में बोल रही हो? हमार देश गरीब है तो क्या, है तो हमारा अपना।”</p>
<p>“मैंने तुम्हारे देश के बारे में कुछ नहीं कहा।”</p>
<p>“तुम्हारी चुप्पी ही बहुत कुछ कह देती है। जितनी ज्यादा चुप रहती हो उतना ही ज्यादा विष घोलती हो।”</p>
<p>वह चुप हो गयी। अन्दर ही अन्दर मेरा हीन भाव जिससे उन दिनों हम सब हिन्दुस्तानी ग्रस्त हुआ करते थे, छटपटाने लगा था। आक्रोश और तिलमिलाहट के उन क्षणॊं में भी मुझे अन्दर ही अन्दर कोई रोकने की कोशिश कर रहा था। अब बात और आगे नहीं बढ़ाओ, बाद में तुम्हे अफसोस होगा, लेकिन मैं बेकाबू हुआ जा रहा था। अंधेरे में यह भी नहीं देख पाया कि हेलेन की आंखें भर आयी हैं और वह उन्हें बार बार पोंछ रही है। तांगा हिचकोले खाता बढ़ा जा रहा था और साथ साथ मेरी बौखलाहट भी बढ़ रही थी। आखिर तांगा हमारे घर के आगे जा खड़ा हुआ। हमारे घर की बत्ती जलती छोड़कर घर के लोग अपने अपने कमरों में आराम से सो रहे थे। कमरे मे पहुंच कर हेलेन ने फिर एक बार कहा, “तुम्हे किसी हिन्दुस्तानी लड़की से शादी करनी चाहिये थी। उसके साथ तुम खुश रहते। मेरे साथ तुम बंधे बंधे महसूस करते हो।”</p>
<p>हेलेन ने आंख उठा कर मेरी ओर देखा। उसकी नीली आंखें मुझे कांच कि बनी लगी, ठन्डी, कठोर, भावनाहीन, “तुम सीधा क्यों नही कहती हो कि तुम्हे एक हिन्दुस्तानी के साथ ब्याह नहीं करना चाहिये था।</p>
<p>मुझ पर इस बात का दोष क्यों लगती हो?”<br />
“मैंने ऎसा कुछ नहीं कहा,” बह बोली और पार्टीशन के पीछॆ कपड़े बदलने चली गयी।</p>
<p>दीवार के साथ एक ओर हमारी बच्ची पालने में सो रही थी। मेरी आवाज सुन कर वह कुनकुनाई, इस पर हेलेन झट से पार्टीशन के पीछे से लौट आयी और बच्ची को थपथपाकर सुलाने लगी। बच्ची फिर से गहरी नींद में सो गई। और हेलेन पार्टीशन की ओर बढ़ गई। तभी मैंने पार्टीशन की और जाकर गुस्से से कहा, “जब से भारत आये हैं, आज पहले दिन कुछ दोस्तों से मिलने का मौका मिला है, तुम्हे वह भी बुरा लगा है। लानत है ऎसी शादी पर!”</p>
<p>मैं जानता था पार्टीशन के पीछे से कोई उत्तर नहीं आयेगा। बच्ची सो रही हो तो हेलेन कमरे में चलती भी दबे पांव थी। बोलने का तो सवाल ही नहीं उठता।</p>
<p>पर वह उसी समतल आवाज में धीरे से बोली,” तुम्हे मेरी क्या परवाह। तुम तो मजे से अपने दोस्त कॊ बीवी के साथ फ्लर्ट कर रहे थे।”</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/bahadur-story-by-amarkant/9282/"><strong>बहादुर&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>“हेलेन!” मुझे आग लग गयी, “क्या बक रही हो।”<br />
मुझे लगा जैसे उसने एक अत्यंत पवित्र, अत्यंत कोमल और सुन्दर चीज को एक झटके में तोड़ दिया हो।<br />
“तुम समझती हो मैं अपने मित्र की बीवी के साथ फ्लर्ट कर रहा था?”<br />
“मैं क्या जानूं तुम क्या कर रहे थे। जिस ढंग से तुम सारा वक्त उसकी ओर देख रहे थे….”<br />
दुसरे क्षण मैं लपक कर पार्टीशन के पीछे जा पहुंचा और हेलेन के मूंह पर सीधा थप्पड़ दे मारा।</p>
<p>उसने दोनो हाथों से अपना मूंह ढांप लिया। एक बार उसकी आंखें टेड़ी हो कर मेरी ओर उठीं। पर वह चिल्लायी नहीं। थप्पड़ परने पर उसका सिर पार्टीशन से टकराया था। जिससे उसकी कनपटी पर चोट आयी थी।</p>
<p>“मार लो, अपने देश में लाकर तुम मेरे साथ ऎसा व्यवहार करोगे, मैं नहीं जानती थी।”</p>
<p>उसके मुंह से यह वाक्य निकलने की देर थी कि मेरी टांगे लरज गयीं और सारा शरीर ठंडा पड़ गया। हेलेन ने चेहरे पर से हाथ हटा लिये थे। उसके गाल पर थप्पड़ का गहरा निशान पड़ गया था। पार्टीशन के पीछे वह केवल शमीज पहने सिर झुकाये खड़ी थी क्योंकि उसने फ्राक उतार दिया था। उसके सुनहरे बाल छितराकर उसके माथे पर फैले हुए थे।</p>
<p>यह मैं क्या कर बैठा था? यह मुझे क्या हो गया था? मैं आंखें फाड़े उसकी ओर देखे जा रहा था और मेरा सारा शरीर निरुद्ध हुआ जा रहा था। मेरे मुंह से फटी फटी सी एक हुंकार निकली, मानो दिल का सार क्षोभ और दर्द अनुकूल शब्द न पाकर मात्र क्रंदन में ही छटपटाकर व्यक्त हो पाया हो। मैं पार्टीशन के पीछे से निकल कर बाहर आंगन में चला गया। यह मुझसे क्या हो गया है? यही एक वाक्य मेरे मन में बार बार चक्कर काट रहा था……</p>
<p>इस घटना के तीन दिन बाद हमने भारत छोड़ दिया। मैंने मन ही मन निश्चय कर लिया कि अब लौट कर नहीं आऊंगा। उस दिन जो जालन्धर छोड़ा तो फिर लौट कर नहीं गया…..</p>
<p>सीढ़ियों पर कदमों की आवज आयी। उसी वक्त रसोईघर से हेलेन भी एप्रेन पहने चली आयी। सीढ़ियों की ओर से हंसने चहकने और तेज तेज सीढ़ियां चढ़्ने की आवाज आयी। जोर से दरवाजा खुला और हांफती हांफती दो युवतियां &#8211; लाल साहब की बेटियां- अन्दर दाखिल हुईं। बड़ी बेटी ऊंची लम्बी थी, उसके बाल काले थे और आंखें किरमिची रंग की थीं। छोटी के हाथ में किताबें थीं, उसका रंग कुछ कुछ सांवला था, और आंखों में नीली नीली झाईयां थीं। दोनो ने बारी बारी से मां और बाप के गाल चूमे, फिर झट से चाय की तिपायी पर से केक के टुकड़े उठा उठा कर हड़पने लगीं। उनकी मां भी कुर्सी पर बैठ गयी और दोनो बेटियां दिन भर की छोटी छोटी घटनायें अपनी भाषा में सुनाने लगीं। सारा घर उनकी चहकती आवाजों से गूंजने लगा। मैंने लाल की ओर देखा। उसकी आंखों में भावुकता के स्थान पर स्नेह उतर आया था।</p>
<p>“यह सज्जन भारत से आये हैं। यह भी जालन्धर के रहने वाले हैं।”</p>
<p>बड़ी बेटी ने मुस्कुरा कर मेरा अभिवादन किया। फिर चहक कर बोली, “जालन्धर तो अब बहुत कुछ बदल गया होगा। जब मैं वहां गयी थी, तब तो वह बहुत पुराना पुराना सा शहर था। क्यों मां?” और खिलखिलाकर हंसने लगी।</p>
<p>लाल का अतीत भले ही कैसा रहा हो, उसका वर्तमान बड़ा समृद्ध और सुन्दर था।</p>
<p>वह मुझे मेरे होटल तक छोड़ने आया। खाड़ी के किनारे ढलती शाम के सायों में देर तक हम टहलते बतियाते रहे। वह मुझे अपने नगर के बारे में बताता रहा, अपने व्यवसाय के बारे में, इस नगर में अपनी उपलब्धियों के बारे में। वह बड़ा समझदार और प्रतिभासंपन्न व्यक्ति निकला। आते जाते अनेक लोगों के साथ उसकी दुआ सलाम हुई। मुझे लगा शहर में उसकी इज्जत है। और मैं फिर उसी उधेड़बुन में खो गया कि इस आदमी का वास्तविक रूप कौन सा है? जब वह यादों में खोया अपने देश के लिये छटपटाता है, या एक लब्धप्रतिष्ठ और सफल इंजीनियर जो कहां से आया और कहां आकर बस गया और अपनी मेहनत से अनेक उपलब्धियां हासिल कीं?</p>
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<p>विदा होते समय उसने मुझे फिर बांहों में भींच लिया और देर तक भींचे रहा, और मैंने महसूस किया कि भावनाओं का ज्वार उसके अन्दर फिर से उठने लगा है, और उसका शरीर फिर से पुलकने लगा है।</p>
<p>“यह मत समझना कि मुझे कोई शिकायत है। जिन्दगी मुझपर बड़ी मेहरबान रही है। मुझे कोई शिकायत नहीं है, अगर शिकायत है तो अपने आप से….” फिर थोड़ी देर चुप रहने के बाद वह हंस कर बोला, “ हां एक बात की चाह मन में अभी तक मरी नहीं है, इस बुढ़ापे में भी नहीं मरी है कि सड़क पर चलते हुए कभी अचानक कहीं से आवाज आये ’ओ हरामजादे!’ और मैं लपक कर उस आदमी को छाती से लगा लूं,” कहते हुए उसकी आवाज़ फिर से लड़खड़ा गयी।</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/o-haramzade-story-by-bhisham-sahni/9470/">ओ हरामजादे !&#8230; आज की कहानी</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>भाग्य-रेखा&#8230; पढ़िए आज की कहानी</title>
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		<pubDate>Fri, 18 Jun 2021 08:39:29 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>~भीष्म साहनी कनाट सरकस के बाग में जहाँ नई दिल्ली की सब सड़कें मिलती हैं, जहाँ शाम को रसिक और दोपहर को बेरोजगार आ बैठते हैं, तीन आदमी, खड़ी धूप से बचने के लिए, छाँह में बैठे, बीडिय़ाँ सुलगाए बातें कर रहे हैं। और उनसे जरा हटकर, दाईं ओर, एक आदमी खाकी-से कपड़े पहने, अपने &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="color: #ff0000;">~भीष्म साहनी</span></h4>
<p>कनाट सरकस के बाग में जहाँ नई दिल्ली की सब सड़कें मिलती हैं, जहाँ शाम को रसिक और दोपहर को बेरोजगार आ बैठते हैं, तीन आदमी, खड़ी धूप से बचने के लिए, छाँह में बैठे, बीडिय़ाँ सुलगाए बातें कर रहे हैं। और उनसे जरा हटकर, दाईं ओर, एक आदमी खाकी-से कपड़े पहने, अपने जूतों का सिरहाना बनाए, घास पर लेटा हुआ मुतवातर खाँस रहा है।</p>
<p>पहली बार जब वह खाँसा तो मुझे बुरा लगा। चालीस-पैंतालीस वर्ष का कुरूप-सा आदमी, सफेद छोटे-छोटे बाल, काला, झाइयों-भरा चेहरा, लम्बे-लम्बे दाँत और कन्धे आगे को झुके हुए, खाँसता जाता और पास ही घास पर थूकता जाता। मुझसे न रहा गया। मैंने कहा, &#8221;सुना है, विलायत में सरकार ने जगह-जगह पीकदान लगा रखे हैं, ताकि लोगों को घास-पौधों पर न थूकना पड़े।’’</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/kasbe-ka-aadmi-story-by-kamleshwar/9162/"><strong>क़सबे का आदमी&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>उसने मेरी ओर निगाह उठाई, पल-भर घूरा, फिर बोला, &#8221;तो साहब, वहाँ लोगों को ऐसी खाँसी भी न आती होगी।’’ फिर खाँसा, और मुस्कराता हुआ बोला, &#8216;बड़ी नामुराद बीमारी है, इसमें आदमी घुलता रहता है, मरता नहीं।’</p>
<p>मैंने सुनी-अनसुनी करके, जेब में से अखबार निकाला और देखने लगा। पर कुछ देर बाद कनखियों से देखा, तो वह मुझ पर टकटकी बाँधे मुस्करा रहा था। मैंने अखबार छोड़ दिया, &#8221;क्या धन्धा करते हो?’’</p>
<p>&#8221;जब धन्धा करते थे तो खाँसी भी यूँ तंग न किया करती थी।’’<br />
&#8221;क्या करते थे?’’</p>
<p>उस आदमी ने अपने दोनों हाथों की हथेलियाँ मेरे सामने खोल दीं। मैंने देखा, उसके दाएँ हाथ के बीच की तीन उँगलियाँ कटी थीं। वह बोला, &#8221;मशीन से कट गईं। अब मैं नई उँगलियाँ कहाँ से लाऊँ? जहाँ जाओ, मालिक पूरी दस उँगलियाँ माँगता है,’’ कहकर हँसने लगा।</p>
<p>&#8221;पहले कहाँ काम करते थे?’’<br />
&#8221;कालका वर्कशाप में।’’</p>
<p>हम दोनों फिर चुप हो गए। उसकी रामकहानी सुनने को मेरा जी नहीं चाहता था, बहुत-सी रामकहानियाँ सुन चुका था। थोड़ी देर तक वह मेरी तरफ देखता रहा, फिर छाती पर हाथ रखे लेट गया। मैं भी लेटकर अखबार देखने लगा, मगर थका हुआ था, इसलिए मैं जल्दी ही सो गया।</p>
<p>जब मेरी नींद टूटी तो मेरे नजदीक धीमा-धीमा वार्तालाप चल रहा था, &#8221;यहाँ पर भी तिकोन बनती है, जहाँ आयु की रेखा और दिल की रेखा मिलती हैं। देखा? तुम्हें कहीं से धन मिलनेवाला है।’’</p>
<p>मैंने आँखें खोलीं। वही दमे का रोगी घास पर बैठा, उँगलियाँ कटे हाथ की हथेली एक ज्योतिषी के सामने फैलाए अपनी किस्मत पूछ रहा था।</p>
<p>&#8221;लाग-लपेटवाली बात नहीं करो, जो हाथ में लिखा है, वही पढ़ो।’’<br />
&#8221;इधर अँगूठे के नीचे भी तिकोन बनती है। तेरा माथा बहुत साफ है, धन जरूर मिलेगा।’’<br />
&#8221;कब?’’<br />
&#8221;जल्दी ही।’’<br />
देखते-ही-देखते उसने ज्योतिषी के गाल पर एक थप्पड़ दे मारा। ज्योतिषी तिलमिला गया।<br />
&#8221;कब धन मिलेगा? धन मिलेगा! तीन साल से भाई के टुकड़ों पर पड़ा हूँ, कहता है, धन मिलेगा!’’</p>
<p>ज्योतिषी अपना पोथी-पत्रा उठाकर जाने लगा, मगर यजमान ने कलाई खींचकर बिठा लिया, &#8221;मीठी-मीठी बातें तो बता दीं, अब जो लिखा है, वह बता, मैं कुछ नहीं कहूँगा।’’</p>
<p>ज्योतिषी कोई बीस-बाईस वर्ष का युवक था। काला चेहरा, सफेद कुर्ता और पाजामा जो जगह-जगह से सिला हुआ था। बातचीत के ढंग से बंगाली जान पड़ता था। पहले तो घबराया फिर हथेली पर यजमान का हाथ लेकर रेखाओं की मूकभाषा पढ़ता रहा। फिर धीरे से बोला, &#8221;तेरे भाग्य-रेखा नहीं है।’’</p>
<p>यजमान सुनकर हँस पड़ा, &#8221;ऐसा कह न साले, छिपाता क्यों है? भाग्य-रेखा कहाँ होती है?’’<br />
&#8221;इधर, यहाँ से उस उँगली तक जाती है।’’<br />
&#8221;भाग्य-रेखा नहीं है तो धन कहाँ से मिलेगा?’’<br />
&#8221;धन जरूर मिलेगा। तेरी नहीं तो तेरी घरवाली की रेखा अच्छी होगी। उसका भाग्य तुझे मिलेगा। ऐसे भी होता है।’’<br />
&#8221;ठीक है, उसी के भाग्य पर तो अब तक जी रहा हूँ। वही तो चार बच्चे छोड़कर अपनी राह चली गई है।’’</p>
<p>ज्योतिषी चुप हो गया। दोनों एक-दूसरे के मुँह की ओर देखने लगे। फिर यजमान ने अपना हाथ खींच लिया, और ज्योतिषी को बोला, &#8221;तू अपना हाथ दिखा।’’</p>
<p>ज्योतिषी सकुचाया, मगर उससे छुटकारा पाने का कोई साधन न देखकर, अपनी हथेली उसके सामने खोल दी, &#8221;यह तेरी भाग्य-रेखा है?’’</p>
<p>&#8221;हाँ।’’<br />
&#8221;तेरा भाग्य तो बहुत अच्छा है। कितने बँगले हैं तेरे?’’<br />
ज्योतिषी ने अपनी हथेली बन्द कर ली और फिर पोथी-पत्रा सहेजने लगा, &#8221;बैठ जा इधर। कब से यह धन्धा करने लगा है?’’<br />
ज्योतिषी चुप।<br />
दमे के रोगी ने पूछा, &#8221;कहाँ से आया है?’’<br />
&#8221;पूर्वी बंगाल से।’’<br />
&#8221;शरणार्थी है?’’<br />
&#8221;हाँ।’’<br />
&#8221;पहले भी यही धन्धा या?’’</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/kabuliwala-story-by-rabindranath-tagore/9139/"><strong>काबुलीवाला&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>ज्योतिषी फिर चुप। तनाव कुछ ढीला पडऩे लगा। यजमान धीरे से बोला, &#8221;हमसे क्या मिलेगा! जा, किसी मोटरवाले का हाथ देख।’’</p>
<p>ज्योतिषी ने सिर हिलाया, &#8221;वह कहाँ दिखाते हैं! जो दो पैसे मिलते हैं, तुम्हीं जैसों से।’’</p>
<p>सूर्य सामने पेड़ के पीछे ढल गया था। इतने में पाँच-सात चपरासी सामने से आए और पेड़ के नीचे बैठ गए, &#8221;जा, उनका हाथ देख। उनकी जेबें खाली न होंगी।’’</p>
<p>मगर ज्योतिषी सहमा-सा बैठा रहा। एकाएक बाग की आबादी बढऩे लगी। नीले कुर्ते-पाजामे पहने, लोगों की कई टोलियाँ, एक-एक करके आईं, और पास के फुटपाथ पर बैठने लगीं।</p>
<p>फिर एक नीली-सी लारी झपटती हुई आई, और बाग के ऐन सामने रुक गई। उसमें से पन्द्रह-बीस लट्ठधारी पुलिसवाले उतरे और सड़क के पार एक कतार में खड़े हो गए। बाग की हवा में तनाव आने लगा। राहगीर पुलिस को देखकर रुकने लगे। पेड़ों के तले भी कुछ मजदूर आ जुटे।</p>
<p>&#8221;लोग किसलिए जमा हो रहे हैं?’’ ज्योतिषी ने यजमान से पूछा।<br />
&#8221;तुम नहीं जानते? आज मई दिवस है, मजदूरों का दिन है।’’</p>
<p>फिर यजमान गम्भीर हो गया, &#8221;आज के दिन मजदूरों पर गोली चली थी।’’</p>
<p>मजदूरों की तादाद बढ़ती ही गई। और मजदूरों के साथ खोमचेवाले, मलाई, बरफ, मूँगफली, चाट, चबेनेवाले भी आन पहुँचे, और घूम-घूमकर सौदा बेचने लगे।</p>
<p>इतने में शहर की ओर से शोर सुनाई दिया। बाग से लोग दौड़-दौड़कर फुटपाथ पर जा खड़े हुए। सड़क के पार सिपाही लाठियाँ सँभाले तनकर खड़े हो गए।</p>
<p>जुलूस आ रहा था। नारे गूँज रहे थे। हवा में तनाव बढ़ रहा था। फुटपाथ पर खड़े लोग भी नारे लगाने लगे।</p>
<p>पुलिस की एक और लारी आ लगी, और लट्ठधारी सिपाही कूद-कूदकर उतरे।</p>
<p>&#8221;आज लाठी चलेगी।’’ यजमान ने कहा।<br />
पर किसी ने कोई उत्तर न दिया।</p>
<p>सड़क के दोनों ओर भीड़ जम गई। सवारियों का आना-जाना रुक गया। शहरवाली सड़क पर से एक जुलूस बाग की तरफ बढ़ता हुआ नजर आया। फुटपाथ वाले भी उसमें जा-जाकर मिलने लगे। इतने में दो और जुलूस अलग-अलग दिशा से बाग की तरफ आने लगे। भीड़ जोश में आने लगी। मजदूर बाग के सामने आठ-आठ की लाइन बनाकर खड़े होने लगे। नारे आसमान तक गूँजने लगे, और लोगों की तादाद हजारों तक जा लगी। सारे शहर की धड़कन मानो इसी भीड़ में पुंजीभूत हो गई हो! कई जुलूस मिलकर एक हो गए। मजदूरों ने झंडे उठाए और आगे बढऩे लगे। पुलिसवालों ने लाठियाँ उठा लीं और साथ-साथ जाने लगे।</p>
<p>फिर वह भीमाकार जुलूस धीरे-धीरे आगे बढऩे लगा। कनाट सरकस की मालदार, धुली-पुती दीवारों के सामने वह अनोखा लग रहा था, जैसे नीले आकाश में सहमा अँधियारे बादल करवटें लेने लगें! धीरे-धीरे चलता हुआ जुलूस उस ओर घूम गया जिस तरफ से पुलिस की लारियाँ आई थीं। ज्योतिषी अपनी उत्सकुता में बेंच के ऊपर आ खड़ा हुआ था। दमे का रोगी, अब भी अपनी जगह पर बैठा, एकटक जुलूस को देख रहा था।</p>
<p>दूर होकर नारों की गूँज मंदतर पडऩे लगी। दर्शकों की भीड़ बिखर गई। जो लोग जुलूस के संग नहीं गए, वे अपने घरों की ओर रवाना हुए। बाग पर धीरे-धीरे दुपहर जैसी ही निस्तब्धता छाने लगी। इतने में एक आदमी, जो बाग के आर-पार तेजी से भागता हुआ जुलूस की ओर आ रहा था, सामने से गुजरा। दुबला-सा आदमी, मैली गंजी और जाँघिया पहने हुए। यजमान ने उसे रोक लिया, &#8221;क्यों दोस्त, जरा इधर तो आओ।’’</p>
<p>&#8221;क्या है?’’<br />
&#8221;यह जुलूस कहाँ जाएगा?’’<br />
&#8221;पता नहीं। सुनते हैं, अजमेरी गेट, दिल्ली दरवाजा होता हुआ लाल किले जाएगा, वहाँ जलसा होगा।’’<br />
&#8221;वहाँ तक पहुँचेगा भी? यह लट्ठधारी जो साथ जा रहे हैं, जो रास्ते में गड़बड़ हो गई तो?’’<br />
&#8221;अरे, गड़बड़ तो होती ही रहती है, तो जुलूस रुकेगा थोड़े ही,’’ कहता हुआ वह आगे बढ़ गया।</p>
<p>दमे का रोगी जुलूस के ओझल हो जाने तक, टकटकी बाँधे उसे देखता रहा। फिर ज्योतिषी के कन्धे को थपथपाता हुआ, उसकी आँखों में आँखें डालकर मुस्कराने लगा। ज्योतिषी फिर कुछ सकुचाया, घबराया।</p>
<p>यजमान बोला, &#8221;देखा साले?’’<br />
&#8221;हाँ, देखा है।’’</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/katil-story-by-munshi-premchand/9120/"><strong>क़ातिल&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>अब भी यजमान की आँखें जुलूस की दिशा में अटकी हुई थीं। फिर मुस्कराते हुए, अपनी उँगलियाँ-कटी हथेली ज्योतिषी के सामने खोल दी, &#8221;फिर देख हथेली, साले, तू कैसे कहता है कि भाग्य-रेखा कमजोर है?’’</p>
<p>और फिर बाएँ हाथ से छाती को थामे जोर-जोर से खाँसने लगा।</p>
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		<title>गुलेलबाज़ लड़का&#8230; आज की कहानी</title>
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		<pubDate>Sat, 12 Jun 2021 10:11:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>~भीष्म साहनी छठी कक्षा में पढ़ते समय मेरे तरह-तरह के सहपाठी थे। एक हरबंस नाम का लड़का था, जिसके सब काम अनूठे हुआ करते थे। उसे जब सवाल समझ में नहीं आता तो स्याही की दवात उठाकर पी जाता। उसे किसी ना कह रखा था कि काली स्याही पीने से अक्ल तेज़ हो जाती है। &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/gulelbaz-ladka-story-by-bhisham-sahni/9073/">गुलेलबाज़ लड़का&#8230; आज की कहानी</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="color: #ff0000;">~भीष्म साहनी</span></h4>
<p>छठी कक्षा में पढ़ते समय मेरे तरह-तरह के सहपाठी थे। एक हरबंस नाम का लड़का था, जिसके सब काम अनूठे हुआ करते थे। उसे जब सवाल समझ में नहीं आता तो स्याही की दवात उठाकर पी जाता। उसे किसी ना कह रखा था कि काली स्याही पीने से अक्ल तेज़ हो जाती है। मास्टर जी गुस्सा होकर उस पर हाथ उठाते तो बेहद ऊँची आवाज़ में चिल्लाने लगता &#8212; &#8220;मार डाला! मास्टर जी ने मार डाला!&#8221; वह इतनी ज़ोर से चिल्लाता कि आसपास की जमातों के उस्ताद बाहर निकल आते कि क्या हुआ है। मास्टर जी ठिठक कर हाथ नीचा कर लेते। यदि वह उसे पीटने लगते तो हरबंस सीधा उनसे चिपट जाता और ऊँची-ऊँची आवाज़ में कहने लगता &#8212; &#8220;अब की माफ़ कर दो जी! आप बादशाह हो जी! आप अकबर महान हो जी! आप सम्राट अशोक हो जी! आप माई-बाप हो जी, दादा हो जी, परदादा हो जी!&#8221;</p>
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<p>क्लास में लड़के हँसने लगते और मास्टर जी झेंपकर उसे पीटना छोड़ देते। ऐसा था वह हरबंस। हर आए दिन बाग़ में से मेंढक पकड़ लाता और कहता कि हाथ पर मेंढक की चर्बी लगा लें तो मास्टर जी के बेंत का कोई असर नहीं होता। हाथ को पता ही नहीं चलता कि बेंत पड़ा है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/aam-story-by-saadat-hasan-manto/9046/"><strong>आम&#8230; पढ़िए आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>एक दूसरा सहपाठी था &#8212; बोधराज। इससे हम सब डरते थे। जब वह चिकोटी काटता तो लगता जैसे साँप ने डस लिए है। बड़ा जालिम लड़का था। गली की नाली पर जब बर्रें आकर बैठते तो नंगे हाथ से वह बर्र पकड़ कर उसका डंक निकाल लेता और फिर बर्रें की ताँक में धागा बाँधकर उसे पतंग की तरह उड़ाने की कोशिश करता। बाग़ में जाते तो फूल पर बैठी तितली को लपक कर पकड़ लेता और दूसरे क्षण उँगलियों के बीच मसल डालता। अगर मसलता नहीं तो फड़फड़ाती तितली में पिन खोंस कर उसे अपनी कापी में टाँक लेता।</p>
<p>उसके बारे में कहा जाता था कि अगर बोधराज को बिच्छू काट ले तो स्वयं बिच्छू मर जाता है। बोधराज का ख़ून इतना कड़वा है कि उसे कुछ भी महसूस नहीं होता। सारा वक़्त उसके हाथ में गुलेल रहती और उसका निशाना अचूक था। पक्षियों के घोंसलों पर तो उसकी विशेष कृपा रहती थी। पेड़ के नीचे खड़े होकर वह ऐसा निशाना बाँधता कि दूसरे ही क्षण पक्षियों की &#8220;चों-चों&#8221; सुनाई देती और घोंसलों में से तिनके और थिगलियाँ टूट-टूट कर हवा में छितरने लगते, या वह झट से पेड़ पर चढ़ जाता और घोंसलों में से अंडे निकाल लाता। जब तक वह घोंसलों को तोड़-फोड़ नहीं डाले, उसे चैन नहीं मिलता था।</p>
<p>उसे कभी भी कोई ऐसा खेल नहीं सूझता था जिसमें किसी को कष्ट नहीं पहुँचाया गया हो। बोधराज की माँ भी उसे राक्षस कहा करती थीं। बोधराज जेब में तरह-तरह की चीज़ें रखे घूमता, कभी मैना का बच्चा, या तरह-तरह के अण्डे, या काँटेदार झाऊ चूहा। उससे सभी छात्र डरते थे. किसी के साथ झगड़ा हो जाता तो बोधराज सीधा उसकी छाती में टक्कर मारता, या उसके हाथ पर काट खाता। स्कूल के बाद हम लोग तो अपने-अपने घरों को चले जाते, मगर बोधराज न जाने कहाँ घूमता रहता।</p>
<p>कभी-कभी वह हमें तरह-तरह के क़िस्से सुनाता। एक दिन कहने लगा &#8212; &#8220;हमारे घर में एक गोह रहती है। जानते हो गोह क्या होते है?&#8221; &#8220;नहीं तो, क्या होती है गोह?&#8221;</p>
<p>&#8220;गोह, साँप जैसा एक जानवर होता है, बालिश्त भर लम्बा, मगर उसके पैर होते हैं, आठ पंजे होते हैं। साँप के पैर नहीं होते।&#8221; हम सिहर उठे।</p>
<p>हमारे घर में सीढ़ियों के नीचे गोह रहती है,&#8221; &#8212; वह बोला &#8212; &#8220;जिस चीज़ को वह अपने पंजों से पकड़ ले, वह उसे कभी भी नहीं छोड़ती, कुछ भी हो जाए नहीं छोड़ती।&#8221; हम फिर सिहर उठे. &#8220;चोर अपने पास गोह को रखते हैं. वे दीवार फाँदने के लिए गोह का इस्तेमाल करते हैं। वे गोह की एक टाँग में रस्सी बाँध देते हैं. फिर जिस दीवार को फाँदना हो, रस्सी झुलाकर दीवार के ऊपर की ओर फेंकते हैं। दीवार के साथ लगते ही गोह अपने पंजों से दीवार को पकड़ लेती है। उसका पंजा इतना मज़बूत होता है कि फिर रस्सी को दस आदमी भी खींचे, तो गोह दीवार को नहीं छोड़ेगी। चोर उसी रस्सी के सहारे दीवार फाँद जाते हैं।&#8221;</p>
<p>&#8220;फिर दीवार को तुम्हारी गोह छोड़ती कैसे है?&#8221; &#8212; मैंने पूछा. &#8220;ऊपर पहुँचकर चोर उसे थोड़ा-सा दूध पिलाते हैं, दूध पीते ही गोह के पंजे ढीले पड़ जाते हैं।&#8221; इसी तरह के किस्से बोधराज हमें सुनाता। उन्हीं दिनों मेरे पिताजी की तरक्की हुई और हम लोग एक बड़े घर में जाकर रहने लगे। घर नहीं था, बंगला था, मगर पुराने ढंग का और शहर के बाहर। फ़र्श ईंटों के, छत ऊँची-ऊँची और ढलवाँ, कमरे बड़े-बड़े, लेकिन दीवार में लगता जैसे गारा भरा हुआ है। बाहर खुली ज़मीन थी और पेड़-पौधे थे। घर तो अच्छा था, मगर बड़ा ख़ाली-ख़ाली सा था। शहर से दूर होने के कारण मेरा कोई दोस्त-यार भी वहाँ पर नहीं था।</p>
<p>तभी वहाँ बोधराज आने लगा। शायद उसे मालूम हो गया कि वहाँ शिकार अच्छा मिलेगा, क्योंकि उस पुराने घर में और घर के आँगन में अनेक पक्षियों के घोंसले थे, आसपास बंदर घूमते थे और घर के बाहर झाड़ियों में नेवलों के दो एक बिल भी थे। घर के पिछले हिस्से में एक बड़ा कमरा था, जिसमें माँ ने फ़ालतू सामान भर कर गोदाम-सा बना दिया था। यहाँ पर कबूतरों का डेरा था। दिन भर गुटर-गूँ-गुटर-गूँ चलती रहती। वहाँ पर टूटे रोशनदान के पास एक मैना का भी घोंसला था। कमरे के फ़र्श पर पंख और टूटे अण्डे और घोंसलों के तिनके बिखरे रहते।</p>
<p>बोधराज आता तो मैं उसके साथ घूमने निकल जाता। एक बार वह झाऊ चूहा लाया, जिसका काला थूथना और कँटीले बाल देखते ही मैं डर गया था। माँ को मेरा बोधराज के साथ घूमना अच्छा नहीं लगता था, मगर वह जानती थी कि मैं अकेला घर में पड़ा-पड़ा क्या करूँगा। माँ भी उसे राक्षस कहती थी और उसे बहुत समझाती थी कि वह ग़रीब जानवरों को तंग नहीं किया करे। एक दिन माँ मुझसे बोली &#8212; &#8220;अगर तुम्हारे दोस्त को घोंसले तोड़ने में मज़ा आता है तो उससे कहो कि हमारे गोदाम में से घोंसले साफ़ कर दे। चिड़ियों ने कमरे को बहुत गन्दा कर रखा है। &#8220;मगर माँ तुम ही तो कहती थीं कि जो घोंसले तोड़ता है, उसे पाप चढ़ता है।&#8221; &#8220;मैं यह थोड़े ही कहती हूँ कि पक्षियों को मारे। यह तो पक्षियों पर गुलेल चलाता है, उन्हें मारता है। घोंसला हटाना तो दूसरी बात है।&#8221;</p>
<p>चुनाँचे जब बोधराज घर पर आया तो मैं घर का चक्कर लगाकर उसे पिछवाड़े की ओर गोदाम में ले गया। गोदाम में ताला लगा था। हम ताला खोलकर अन्दर गए। शाम हो रही थी और गोदाम के अन्दर झुटपुटा-सा छाया था। कमरे में पहुँचे तो मुझे लगा जैसे हम किसी जानवर की माँद में पहुँच गए हों। बला की बू थी और फ़र्श पर बिखरे हुए पंख और पक्षियों की बीट।</p>
<p>सच पूछो तो मैं डर गया। मैंने सोचा, यहाँ भी बोधराज अपना घिनौना शिकार खेलेगा, वह घोंसलों को तोड़-तोड़ कर गिराएगा, पक्षियों के पर नोचेगा, उनके अण्डे तोडेगा, ऐसी सभी बातीं करेगा जिनसे मेरा दिल दहलता था। न जाने माँ ने क्यों कह दिया था कि इसे गोदाम में ले जाओ और इससे कहो कि गोदाम में से घोंसले साफ़ कर दे। मुझे तो इसके साथ खेलने को भी मना करती थीं और अब कह दिया कि घोंसले तोड़ो।</p>
<p>मैंने बोधराज की ओर देखा तो उसने गुलेल सम्भाल ली थी और बड़े चाव से छत के नीचे मैना के घोंसले की ओर देख रहा था। गोदाम की ढलवाँ छतें तिकोन-सा बनाती थीं, दो पल्ले ढलवाँ उतरते थे और नीचे एक लम्बा शहतीर कमरे के आर-पार डाला गया था। इसी शहतीर पर टूटे हुए रोशनदान के पास ही एक बड़ा-सा घोंसला था, जिसमें से उभरे हुए तिनके, रुई के फाहे और लटकती थिगलियाँ हमें नज़र आ रही थीं। यह मैना का घोंसला था। कबूतर अलग से दूसरी ओर शहतीर पर गुटर-गूँ-गुटर-गूँ कर रहे थे और सारा वक़्त शहतीर के ऊपर मटरगश्ती कर रहे थे।</p>
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<p>&#8220;घोंसले में मैना के बच्चे हैं&#8221; &#8212; बोधराज ने कहा और अपनी गुलेल साध ली।</p>
<p>तभी मुझे घोंसले में से छोटे-छोटे बच्चों की पीली-पीली नन्हीं चोंचें झाँकती नज़र आईं।</p>
<p>&#8220;देखा?&#8221; &#8212; बोधराज कह रहा था &#8212; &#8220;ये विलायती मैना हैं, इधर घोंसला नहीं बनातीं। इनके माँ-बाप ज़रूर अपने काफ़िले से पिछड़ गए होंगे और यहाँ आकर घोंसला बना लिया होगा।</p>
<p>&#8220;इनके माँ-बाप कहाँ हैं?&#8221; &#8212; मैंने पूछा।</p>
<p>&#8220;चुग्गा लेने गए हैं। अभी आते ही होंगे&#8221; &#8212; कहते हुए बोधराज ने गुलेल उठाई।</p>
<p>मैं उसे रोकना चाहता था कि घोंसले पर गुलेल नहीं चलाए। पर तभी बोधराज को गुलेल से फर्रर्रर्र की आवाज़ निकली और इसके बाद जोर के टन्न की आवाज़ आई। गुलेल का कंकड़ घोंसले से न लग कर सीधा छत पर जा लगा था, जहाँ टीन की चादरें लगी थीं।</p>
<p>दोनों चोंच घोंसले के बीच कहीं गायब हो गईं और फिर सकता-सा आ गया। लग रहा था मानो मैना के बच्चे सहम कर चुप हो गए थे।</p>
<p>तभी बोधराज ने गुलेल से एक और वार किया। अबकी बार कंकड़ शहतीर से लगा। बड़ा अकड़ा करता था। दो निशाने चूक जाने पर वह बौखला उठा। अबकी बार वह थोड़ी देर तक चुपचाप खड़ा रहा। जिस वक़्त मैना के बच्चों ने चोंच फिर से उठाई और घोंसले के बाहर झाँक कर देखने लगे, उसी समय बोधराज ने तीसरा वार किया। अबकी कंकड़ घोंसले के किनारे पर लगा। तीन-चार तिनके और रुई के गाले उड़े और छितरा-छितरा कर फ़र्श की ओर उड़ने लगे। लेकिन घोंसला गिरा नहीं। बोधराज ने फिर से गुलेल तान ली थी। तभी कमरे में एक भयानक-सा साया डोल गया। हमने नज़र उठाकर देखा। रोशनदान में से आने वाली रोशनी सहसा ढक गई थी। रोशनदान के सींख़चे पर एक बड़ी-सी चील पर फैलाए बैठी थी। हम दोनों ठिठक कर उसकी ओर देखने लगे। रोशनदान में बैठी चील भयानक-सी लग रही थी।</p>
<p>&#8220;यह चील का घोंसला होगा। चील अपने घोंसले में लौटी है। &#8221; मैंने कहा।</p>
<p>&#8220;नहीं, चील का घोंसला यहाँ कैसे हो सकता है? चील अपना घोंसला पेड़ों पर बनाती है। यह मैना का घोंसला है।&#8221; उस वक़्त घोंसले में से चों-चों की ऊँची आवाज़ आने लगी। घोंसले में बैठी मैना के बच्चे पर फड़फड़ाने और चिल्लाने लगे।</p>
<p>हम दोनों निश्चेष्ट से खड़े हो गए, यह देखने के लिए कि चील अब क्या करेगी। हम दोनों टकटकी बाँधे चील की ओर देखे जा रहे थे।</p>
<p>चील रोशनदान में से अन्दर आ गई। उसने अपने पर समेट लिए थे और रोशनदान पर से उतरकर गोदाम के आर-पार लगे शहतीर पर उतर आई थी। वह अपना छोटा-सा सिर हिलाती, कभी दाएँ और कभी बाएँ देखने लगती। मैं चुप था। बोधराज भी चुप था, न जाने वह क्या सोच रहा था।</p>
<p>घोंसले में से बराबर चों-चों की आवाज़ आ रही थी, बल्कि पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गई थी। मैना के बच्चे बुरी तरह डर गए थे।</p>
<p>&#8220;यह यहाँ रोज़ आती होगी,&#8221; &#8212; बोधराज बोला।</p>
<p>अब मेरी समझ में आया कि क्यों फ़र्श पर जगह-जगह पँख और माँस के लोथड़े बिखरे पड़े रहते हैं। ज़रूर हर आए दिन चील घोंसले पर झपट्टा मारती रही होगी। माँस के टुकड़े और ख़ून-सने पर इसी की चोंच से गिरते होंगे।</p>
<p>बोधराज अभी भी टकटकी बाँधे चील की ओर देख रहा था। अब चील धीरे-धीरे शहतीर पर चलती हुई घोंसले की ओर बढ़ने लगी थी और घोंसले में बैठे मैना के बच्चे पर फड़फड़ाने और चीख़ने लगे थे। जब से चील रोशनदान पर आकर बैठी थी, मैना के बच्चे चीख़े जा रहे थे। बोधराज अब भी मूर्तिवत खड़ा चील की ओर ताके जा रहा था।</p>
<p>मैं घबरा उठा। मैं मन में बार-बार कहता &#8212; &#8220;क्या फ़र्क पड़ता है, अगर चील मैना के बच्चों को मार डालती है या बोधराज अपनी गुलेल से उन्हें मार डालता है? अगर चील नहीं आती तो इस वक़्त तक बोधराज ने मैना का घोंसला नोच भी डाला होता।</p>
<p>तभी बोधराज ने गुलेल उठाई और सीधा निशाना चील पर बाँध दिया।</p>
<p>&#8220;चील को मत छेड़ो। वह तुम पर झपटेगी।&#8221; &#8212; मैंने बोधराज से कहा।</p>
<p>मगर बोधराज ने मेरी बात नहीं सुनी और गुलेल चला दी। चील को निशाना नहीं लगा। कंकड़ छत से टकरा कर नीचे गिर पड़ा और चील ने अपने बड़े-बड़े पँख फैलाए और नीचे सिर किए घूरने लगी। &#8220;चलो यहाँ से निकल चलें।&#8221; &#8212; मैंने डर कर कहा।</p>
<p>&#8220;नहीं, हम चले गए तो चील बच्चों को खा जाएगी।&#8221;</p>
<p>&#8220;उसके मुँह से यह वाक्य मुझे बड़ा अटपटा लगा। स्वयं ही तो घोंसला तोड़ने के लिए गुलेल उठा लाया था।</p>
<p>बोधराज ने एक और निशाना बाँधा। मगर चील उस शहतीर पर से उड़ी और गोदाम के अन्दर पर फैलाए तैरती हुई-सी आधा चक्कर काटकर फिर से शहतीर पर जा बैठी। घोंसले में बैठे बच्चे बराबर चों-चों किए जा रहे थे।</p>
<p>बोधराज ने झट से गुलेल मुझे थमा दी और जेब से पाँच-सात कंकड़ निकाल कर मेरी हथेली पर रखे &#8212; &#8220;तुम चील पर गुलेल चलाओ। चलाते जाओ, उसे बैठने नहीं देना।&#8221; &#8211;उसने कहा और स्वयं भागकर दीवार के साथ रखी मेज़ पर एक टूटी हुई कुर्सी चढ़ा दी और फिर उछलकर मेज़ पर चढ़ गया और वहाँ से कुर्सी पर जा खड़ा हुआ। फिर बोधराज ने दोनों हाथ ऊपर को उठाए, जैसे-तैसे अपना सन्तुलन बनाए हुए उसने धीरे-से दोनों हाथों से घोंसले को शहतीर पर से उठा लिया और धीरे-धीरे कुर्सी पर से उतर कर मेज़ पर आ गया और घोंसले को थामे हुए ही छलाँग लगा दी।</p>
<p>&#8220;चलो, बाहर निकल चलो।&#8221; &#8212; उसने कहा और दरवाज़े की ओर लपका। गोदाम में से निकल कर हम गैराज में आ गए। गैराज में एक ही बड़ा दरवाज़ा था और दीवार में छोटा-सा एक झरोखा। यहाँ भी गैराज के आर-पार लकड़ी का एक शहतीर लगा था।</p>
<p>&#8220;यहाँ पर चील नहीं पहुँच सकती।&#8221; &#8212; बोधराज ने कहा और इधर उधर देखने लगा था।</p>
<p>थोड़ी देर में घोंसले में बैठे मैना के बच्चे चुप हो गए। बोधराज बक्से पर चढ़ कर मैना के घोंसले में झाँकने लगा। मैंने सोचा, अभी हाथ बढाकर दोनों बच्चों को एक साथ उठा लेगा, जैसा वह अक्सर किया करता था, फिर भले ही उन्हें जेब में डालकर घूमता फिरे। मगर उसने ऐसा कुछ नहीं किया। वह देर तक घोंसले के अन्दर झाँकता रहा और फिर बोला &#8212; &#8220;थोड़ा पानी लाओ, इन्हें प्यास लगी है। इनकी चोंच में बूँद-बूँद पानी डालेंगे।&#8221;</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/bade-bhai-sahab-story-by-munshi-premchand/8999/"><strong>बड़े भाई साहब&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>मैं बाहर गया और एक कटोरी में थोड़ा-सा पानी ले आया। दोनों नन्हें-नन्हें बच्चे चोंच ऊपर उठाए हाँफ रहे थे। बोधराज ने उनकी चोंच में बूँद-बूँद पानी डाला और बच्चों को छूने से मुझे मना कर दिया, न ही स्वयं उन्हें छुआ।</p>
<p>इन बच्चों के माँ-बाप यहाँ कैसे पहुँचेगे?&#8221; &#8212; मैंने पूछा।</p>
<p>&#8220;वे इस झरोखे में से आ जाएँगे। वे अपने आप इन्हें ढूँढ़ निकालेंगे।&#8221;</p>
<p>हम देर तक गैराज में बैठे रहे। बोधराज देर तक मंसूबे बनाता रहा कि वह कैसे रोशनदान को बन्द कर देगा, ताकि चील कभी गोदाम के अन्दर न आ सके। उस शाम वह चील की ही बातें करता रहा। दूसरे दिन जब बोधराज मेरे घर आया तो न तो उसके हाथ में गुलेल थी और न जेब में कंकड़, बल्कि जेब में बहुत-सा चुग्गा भरकर लाया था और हम दोनों देर तक मैना के बच्चों को चुग्गा डालते और उनके करतब देखे रहे थे।</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/gulelbaz-ladka-story-by-bhisham-sahni/9073/">गुलेलबाज़ लड़का&#8230; आज की कहानी</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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