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	<title>Hindi Stories Archives - TIS Media</title>
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	<description>हर अक्षर सच, हर खबर निष्पक्ष </description>
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	<title>Hindi Stories Archives - TIS Media</title>
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		<title>चली कहानीः लोक-कथा दरख़्त रानी</title>
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		<pubDate>Sun, 24 Oct 2021 04:08:38 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Art and Literature]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पुराने ज़माने में किसी गाँव में एक बूढ़ा आदमी रहता था। उसकी शादी को 20 साल हो गए थे पर वह औलाद की दौलत से महरूम था। भगवान की कृपा से बूढ़े की औरत का पाँव भारी था। नई-नई चीज़ें खाने को उसका जी चाहता था। बूढ़ा भी अपनी बिसात के मुताबिक़ उसे खाने की &#8230;</p>
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			<div class="author-avatar">
				<img decoding="async" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/Lok-Kathayen.jpg" alt="About the author" class="author-avatar-img" width="111" height="111" />
			</div>
			<div class="author-info">
				<h4>About the author</h4><span style="color: #ff0000;"><strong>लोककथाएं इतनी पुरानी हैं कि कोई भी नहीं बता सकता कि उन्हें पहले-पहल किसने कहा होगा। लोक-कथाएं एक कान से दूसरे कान में, एक देश से दूसरे देश में जाती रहती हैं। एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने पर इन कथाओं का रूपरंग भी बदलता जाता है। एक ही कहानी अलग-अलग जगहों में अलग-अलग ढंग से कही-सुनी जाती है। इस तरह लोक कथाएं हमेशा नई बनी रहती हैं।-शंकर लोककथाओं में सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें पशु-पक्षी, सुर-असुर, देव-परियां, पेड़-पौधे, प्रकृति का मानवीकरण, चमत्कार आदि सभी कुछ होने के बावजूद मनुष्य के दुःख-सुख और उसकी अभिलाषाओं की तृप्ति निहित रहती है । यह लोककथाएं ही हैं जो हमें बोध करवाती हैं कि मूल रूप में समस्त विश्व में मनुष्य का स्वभाव एक जैसा ही है।</strong></span>
			</div>
		</div>
	
<p>पुराने ज़माने में किसी गाँव में एक बूढ़ा आदमी रहता था। उसकी शादी को 20 साल हो गए थे पर वह औलाद की दौलत से महरूम था। भगवान की कृपा से बूढ़े की औरत का पाँव भारी था। नई-नई चीज़ें खाने को उसका जी चाहता था। बूढ़ा भी अपनी बिसात के मुताबिक़ उसे खाने की चीज़ें ला कर देता था।</p>
<p>एक रोज़ बूढ़े की बीवी को खट्टे-मीठे बेर खाने की बहुत ख़्वाहिश हुई। गरमी के मौसम में बेर कहाँ मिलते हैं। फिर भी बूढ़ा बेरों की तलाश में जंगलों में भटकता रहा। एक दिन जंगलों में इधर-उधर बेर तलाश करते हुए वह एक तालाब के किनारे पहुँचा तो एक बेर की झाड़ी नज़र आई। बूढ़े को बहुत खुशी हुई। वह अपने दोनों हाथों से बेर इकट्ठे करने लगा।</p>
<p>अभी झोली भर बेर ही तोड़े थे कि एक आदमख़ोर मगरमच्छ ने अपना बड़ा सा मुँह पानी से ऊपर निकाला और ज़ोर से साँस खींची। उसके साँस लेने से एक ज़ोरदार आँधी चली और बूढ़ा कमज़ोरी की वजह से अपने को न संभाल पाया और तालाब में आ गिरा। बूढ़ा अपने को संभालते हुए किनारे तक पहुँचना ही चाहता था कि मगरमच्छ ने इसके पाँव ही पकड़ लिए। बूढ़ा उससे कहने लगा,‘‘भाई खट्टे-मीठे बेरों की तलाश में मेरे पाँव घिस गए और फिर जब बेर मिले तो मेरे रास्ते में तू रोड़ा बनता है।’’</p>
<p><strong>चली कहानीः <a href="https://tismedia.in/category/entertainment/art-and-literature/">पढ़ें और भी कहानियां </a></strong></p>
<p>‘‘तेरी यह मक्कारी मुझपर कोई असर नहीं करेगी। बहुत दिनों से इंसान का गोश्त खाने को नहीं मिला। तेरी करारी ह़ड्डियों को चबाने में मुझे बहुत मज़ा आएगा। आज मैं तुझे खाऊँगा।’’ मगरमच्छ ने लार टपकाते हुए कहा।<br />
‘‘क्यों। मुझे तू क्यों खाएगा’’<br />
‘‘इसलिए क्योंकि तूने मुझसे बगैर इजाज़त लिए मेरे बेर लिए हैं।’’</p>
<p>‘‘भाई मैं यह बेर बहुत मजबूरी में ले रहा हूँ। मेरी बीवी की हालत कुछ ऐसी है। मैं और मेरी बीवी अब और ज़्यादा इंतज़ार नहीं कर सकते।’’ बूढ़े की बात सुनकर मगरमच्छ समझ गया।</p>
<p>‘‘ओह’’ अगर यह बात है तो मैं तुझे नहीं खाऊँगा। तू अपनी राह ले लेकिन मेरी एक शर्त है। ‘‘क्या शर्त’’ है। बूढे़ ने पूछा।<br />
‘‘अगर लड़का होगा तो तेरा और लड़की हुई तो मेरी।’’</p>
<p>‘‘मंजूर’’ कहकर वह बेरों की झोली संभालते हुए चल दिया। वह अपने दिल में सोचने लगा कि मगरमच्छ उसे फिर कहाँ मिलेगा और अगर उसके यहाँ लड़का पैदा हुआ तो फिर तो परेशानी की कोई बात ही नहीं।</p>
<p><strong>History Of The Day: <a href="https://tismedia.in/category/knowledge/history-of-the-day/">तारीखों की गवाही से जानिए हर दिन का इतिहास </a></strong></p>
<p>बूढ़ा अपनी बीवी की आव भगत में कोई कमी नहीं करता था। दिन पर लगा कर उड़ते रहे और एक दिन बूढ़े के घर एक खूबसूरत और बहुत तंदरूस्त लड़की पैदा हुई। बच्ची को देखकर उसे मगरमच्छ की बात याद आई तो वह काँप उठा। लड़की का रंग गुलाब के फूल की तरह था। उसकी आँखे हीरों की तरह चमकदार थीं। वह परियों की तरह हसीन और मासूम थी। ऐसी मन्नतों और मुरादों की लड़की मगरमच्छ के पेट में जाए यह सोचकर बूढ़ा दुख से काँपने लगा। उसने सोचा कि अब वह कभी तालाब के किनारे नहीं जाएगा।</p>
<p>बारिश का मौसम आया और नदी में बाढ़ आ गई। मगरमच्छ पानी में बह कर तालाब से निकल कर खेत में आ गया। अब उसे आसानी से शिकार मिलने लगा। एक दिन बूढ़ा खेत से सब्ज़ी तोड़कर ला रहा था तो रास्ते में मगरमच्छ ने उसे रोककर सवाल किया।</p>
<p>‘‘क्यों बे बुडढ़े! मुझसे छुपता क्यों है? तू मुझसे छुप कर कहाँ भागेगा। सीधी तरह बता तेरे यहाँ लड़की हुई या लड़का।’’<br />
‘‘लड़की हुई है।’’ बूढ़े ने सहमी हुई आवाज़ में कहा।<br />
‘‘तो फिर वह मेरी है। मेरी अमानत को अब तक तूने अपने पास क्यों रखा है। क्या तू अमानत में ख़्यानत करना चाहता है।’’<br />
‘‘इतनी छोटी बच्ची को तुझे कैसे दे दूँ?’’ बूढ़े ने कहा।</p>
<p>‘‘चौदह साल पहले तूने मुझसे वादा किया था। क्या वह अब भी बच्ची है। तू बाप की नज़र से देखता है वह अगर बूढ़ी भी हो जाएगी तब भी वह बच्ची ही रहेगी। तू मुझे अब और बेवकूफ़ नहीं बना सकता। मैं तुझे चैन से रहने नहीं दूंगा। देख! अगर तूने लड़की को कल ही लाकर मुझे नहीं दिया तो मैं तुम तीनों को एक-एक कर ख़्तम कर दूँगा।’’ मगरमच्छ ने कहा।</p>
<p>‘‘वह मेरी बेटी है। अपना खून तुझे मैं कैसे दे दूँ? लोग क्या कहेंगे?’’ बूढ़े ने सवाल किया।</p>
<p>‘‘लोग क्या कहेंगे वह मैं नहीं जानता। तू क्या कहता है? वादा ख़िलाफ़ी करना चाहता है?’’ मगरमच्छ ने गुस्से से चिल्लाकर कहा।</p>
<p>‘‘नहीं नहीं! यह बात नहीं है। मै चाहता हूँ कि मेरी बेटी को इस बात का पता न चले। और।।।’’ बूढ़ा कहते-कहते रुक गया। ‘‘तू क्या चाहता है बोल।’’ मगरमच्छ ने कहा।</p>
<p>‘‘मेरी लड़की को कमल का फूल बहुत पसंद है। तू अपनी पीठ पर एक कमल का फूल रखकर तालाब के अंदर पानी के नीचे बैठे रहना। जब लड़की खुशी से इसे लेने जाएगी तो इसे तू ले जाना।’’ मगरमच्छ को यह तरकीब पसंद आई।</p>
<p>दूसरे दिन जब बूढ़े ने अपनी बीवी को बताया तो लड़की की माँ परेशान हो गई। वह अपने आपको कोस रही थी कि क्यों उसने बेर खाने की ख़्वाहिश की। आज उसकी बेटी मौत के मुँह में जा रही थी। भगवान उसे मौत क्यों नहीं देता। उसका दिल रो रहा था लेकिन वह लड़की से कह रही थी, ‘‘बेटी! कितने दिन हुए नानी के घर तू नहीं गई। वह तुझे याद कर रही है। तू आज अपने बाप के साथ नानी के घर जाएगी। दो दिन रहकर वापस आ जाना।’’</p>
<p>बूढ़े की बेटी मगरमच्छ को सामने देखकर घबरा गई और चीख़ने लगी लेकिन उसकी चीख़ जंगल में गूंज कर रह गई पर उसका बाप वापस नहीं आया। मगरमच्छ उसको अपने बड़े-बड़े पंजों में पकड़ कर तालाब के दूसरे किनारे एक गुफा के अंदर ले गया और वहाँ लड़की को छोड़कर वापस आ गया</p>
<p>ननिहाल जाने की बात सुनकर बेटी को खुशी हुई। उसके लिए मामू का घर जन्नत से कुछ कम नहीं था। वहाँ की हर चीज़ उसे पसंद थी। वहाँ का चाँद खूबसूरत था। वहाँ के फूल खूबसूरत और फल रसीले थे। नानी के घर जाने की ख़बर सुनकर वह खुशी से नए कपड़े पहन कर तैयार हो गई थी। बूढ़ा उसे लेकर जंगल और नाले पार करता हुआ उस तालाब के किनारे पहुँचा और बेटी को तालाब के किनारे बैठा कर बोला, ‘‘बेटी तू यहाँ बैठी रह। मैं अभी आया।’’ बूढ़ा चला गया लेकिन वापस नहीं आया।</p>
<p>उधर बेटी को एक बेहद खूबसूरत कमल का फूल नज़र आया। वह सोचने लगी कि इतना खूबसूरत कमल तालाब के बिल्कुल किनारे खिला है लेकिन उसे अभी तक किसी ने हाथ नहीं लगाया! हो सकता है किसी की नज़र उस पर न पड़ी हो। बूढे की बेटी धीरे से पानी के अंदर गई। कमल के फूल की तरफ हाथ बढ़ाते ही कमल थोड़ा आगे खिसक गया। लड़की डर कर अपने बाप को पुकारने लगी।</p>
<p>घुटने पानी हुआ है बाबा<br />
कमल खिसकता जाता है</p>
<p>वह फिर आगे बढ़ने लगी। कमल फिर से खिसक गया। लड़की चीख़ कर अपने बाप को पुकारने लगी।</p>
<p>छाती पानी हुआ है बाबा<br />
कमल खिसकता जाता है</p>
<p>बाप वहाँ होता तो जवाब देता। उसे डर लग रहा था वह सोच रही थी कि वापस चली जाए। उसी वक़्त बड़ी-बड़ी लाल आँखों वाला मगरमच्छ मुँह खोले पानी की सतह पर दिखाई दिया। बूढ़े की बेटी मगरमच्छ को सामने देखकर घबरा गई और चीख़ने लगी लेकिन उसकी चीख़ जंगल में गूंज कर रह गई पर उसका बाप वापस नहीं आया। मगरमच्छ उसको अपने बड़े-बड़े पंजों में पकड़ कर तालाब के दूसरे किनारे एक गुफा के अंदर ले गया और वहाँ लड़की को छोड़कर वापस आ गया।</p>
<p>लड़की की मासूमियत और खूबसूरती को देखकर उसे खाने का इरादा इस वक़्त उसने छोड़ दिया। राहगीर जो तालाब में नहाने या पानी पीने आते थे, उन्हें वह पेट भरकर खाता और उस आदमी के पास खाने का जो सामान होता उसे लाकर इस लड़की को देता। लड़की इस गुफा में पड़ी रहती। पर मगरमच्छ के डर से वह कुछ बोलती नहीं थी।</p>
<p>इस तरह दिन गुज़रते गए। चारों तरफ इस तालाब का मगरमच्छ आदमखोर के नाम से मशहूर हो गया था। डर के मारे कोई राहगीर इस तालाब की तरफ़ नहीं आता था। मगरमच्छ भूख से बेक़रार होने लगा। उसने तालाब की बड़ी-बड़ी मच्छलियों को खाकर ख़त्म कर दिया। अब वह भूख के मारे मरने लगा। जंगल की गाय-बकरी भेड़ भी वह भूख की शिद्दत में खा गया। अब उसके डर से वहाँ कोई जानवर भी पानी पीने नहीं आता था। जब उसे ज़ोर की भूख सताने लगी तो वह बूढ़े की बेटी के क़रीब आकर उसे अपनी लाल और ललचाई आँखों से घूरने लगा। बूढ़े की बेटी समझ गई कि अब उसकी बारी थी। लेकिन मगरमच्छ ने उसे उस दिन नहीं खाया। सोचने लगा कि अब उसके दाँतों में धार नहीं थी। उन्हें लुहार से तेज़ कराने के बाद उस लड़की को खाएगा। यह सोचकर वह लुहार के पास चला गया।</p>
<p>इधर बूढ़े की बेटी अपनी जान बचाने की तरकीब सोचने लगी। गुफा में जितने सोने-चाँदी के ज़ेवरात मगरमच्छ ने लाकर रखे थे। उसने सबको इकट्ठा किया और एक टोकरी में रखकर सूखे पत्ते और छोटी-छोटी लकड़ियों से उसे ढँक लिया और अपने जिस्म पर कीचड़ लेप कर अपनी सूरत एक अंधी बुढ़िया जैसी बना ली और टोकरी कमर पर लादकर लाठी टेकते-टेकते जाने लगी। जैसे ही गुफा से बाहर निकली उसी वक़्त मगरमच्छ आ गया और दहाड़ कर पूछने लगा।।।‘‘तू कौन है?’’ बूढ़े की बेटी डर से काँपने लगी लेकिन बाद में ख़ुद को संभालते हुए कहने लगी।।।</p>
<p>मैं अँधी बूढ़ी हूँ<br />
हड्डियो की लड़ी हूँ</p>
<p>‘‘मेरे बदन में क्या है जो तू खाएगा? तू अपनी गुफा को जा। वहाँ तेरे लिए एक तंदरूस्त लड़की मौजूद है। उसकी हड्डियाँ चबाने में तुझे मज़ा आएगा।’’</p>
<p>मगरमच्छ उसे पहचान न सका उसके मुँह में इंसानी गोश्त के मज़े को सोचकर पानी आ गया और वह तेज़ी से गुफा के अंदर चला गया। बूढ़े की बेटी उससे छुटका मिलते ही घबरा कर दौड़ने लगी और घने जंगल में गुम हो गई।</p>
<p>वह सोच रही थी कि जिस माँ-बाप ने उसे धोखा देकर मगरमच्छ के हवाले कर दिया। वह उनके पास नहीं जाएगी। वह यही कुछ सोचते हुए घने जंगल में चली जा रही थी कि उसे शेर की गरज सुनाई दी। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। वह ख़ौफ़ के मारे इधर-उधर छुपने की जगह ढूंढने लगी। इतनी देर में एक हाथी के बराबर ऊँचा और बड़ा शेर उसके सामने आ गया। डर के मारे वह सामने एक बड़े बरगद के दरख़त के तने से चिपट गई और रो-रो कर मजबूरन दरख़्त से दरख्वास्त करने लगी।।।‘‘ऐ दरख़्त तू फट जा मैं तुझमें समा जाऊँ और तू बंद हो जा।’’ यह सुनते ही दरख़्त सचमुच फट गया और वह उसके अंदर चली गई और दरख़्त बंद हो गया।</p>
<p>एक दिन एक राजकुमार शिकार करने के लिए उसी जंगल में आया। वह दातुन के लिए एक शाख़ काटने लगा कि उसके कानों में ये आवाज़ आई।।।</p>
<p>राजकुमार धीरे काट कहीं<br />
मेरी आँख फूट न जाए<br />
मेरी नाक काट न जाए<br />
मेरा हाथ टूट न जाए</p>
<p>यह सुरीली आवाज़ सनकर राजकुमार को हैरत हुई। और वह दातुन लिए बग़ैर राजमहल वापिस चला आया। वह रात भर उसी जादुई दरख़्त के बारे में सोचता रहा। राजमहल में राजकुमार की शादी की तैयारियाँ हो रही थीं। ज्योतिषी और पुरोहित राजकुमार को समझा रहे थे लेकिन राजकुमार की बस एक ही ज़िद थी कि वह उसी दरख़्त से शादी करेगा। अगर उसकी शादी उस दरख़्त से नहीं हुई तो वह अपनी जान दे देगा। राजकुमार राजा की इकलौती औलाद था। उसकी नज़र में शादी की अहमियत बेटे की ज़िंदगी से कम ही थी। इसलिए राजकुमार की ख़्वाहिश पूरी की गई। उसी दरख़्त के साथ उसकी शादी की रस्म अदा की गई।</p>
<p>राजकुमार ने उस दरख़्त को वहाँ से उखाड़कर अपने महल के पास बाग़ में लगवा लिया। बूढ़े की बेटी रात गए दरख़्त से निकलती और महल के अंदर जाकर सब काम पूरे करती और सुबह होते ही वापस दरख़्त के अंदर चली जाती। एक रोज़ राजकुमार ने छुपकर बूढ़े की बेटी के ये सब काम देखे। दूसरे दिन जब बूढ़े की बेटी दरख़्त से निकल कर महल के अंदर गई तो राजकुमार ने उस दरख़्त को आग लगाकर भस्म कर दिया।</p>
<p>बूढ़े की बेटी दौड़ती हुई आई और बोली,‘‘आह। तुमने यह क्या किया?’’</p>
<p>इस पर राजकुमार ने कहा, ‘‘इतना बड़ा महल है तुम इसमें रह सकती हो। इस खूबसूरत बाग़ में घूम सकती हो। बेवजह इस दरख़्त के अंधेरे में क्यों सड़ती रहती हो। और फिर मैं तुमसे बेइंतेहा मोहब्बत करता हूँ मैंने तुम्हें अपनी रानी बना लिया है। मैं तुम्हारे बिना जी न सकूंगा।!’’</p>
<p>लड़की तो सिर्फ़ मोहब्बत की भूखी थी। लड़की को लगा कि जैसे सारे जहाँ की खुशी उसे मिल गई हो। उस दिन के बाद दोनों राजमहल में हँसी खुशी रहने लगे।</p>
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		<title>चली कहानीः सिक्का बदल गया, पढ़िए कृष्णा सोबती की कहानी</title>
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		<pubDate>Sat, 23 Oct 2021 03:52:42 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[Hindi Stories]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi Writers]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>खद्दर की चादर ओढ़े, हाथ में माला लिए शाहनी जब दरिया के किनारे पहुंची तो पौ फट रही थी। दूर-दूर आसमान के परदे पर लालिमा फैलती जा रही थी। शाहनी ने कपड़े उतारकर एक ओर रक्खे और &#8216;श्रीराम, श्रीराम&#8217; करती पानी में हो ली। अंजलि भरकर सूर्य देवता को नमस्कार किया, अपनी उनीदी आंखों पर &#8230;</p>
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		<div class="about-author about-author-box container-wrapper">
			<div class="author-avatar">
				<img decoding="async" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/krishna-sobti.jpg" alt="About the author" class="author-avatar-img" width="111" height="111" />
			</div>
			<div class="author-info">
				<h4>About the author</h4><span style="color: #ff0000;"><strong><span style="color: #0000ff;">कृष्णा सोबती</span> (18 फ़रवरी 1925-25 जनवरी 2019) अपनी साफ-सुधरी रचनात्मकता और अभिव्यक्ति के लिए जानी जाती हैं। इन्होंने हिन्दी की कथा-भाषा को अपनी विलक्षण प्रतिभा से अप्रतिम ताज़गी़ और स्फूर्ति प्रदान की है।। उन्हें १९८० में साहित्य अकादमी पुरस्कार, १९९६ में साहित्य अकादमी अध्येतावृत्ति तथा २०१७ में ५३वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं; कहानी संग्रह: बादलों के घेरे; लम्बी कहानी (आख्यायिका/उपन्यासिका): डार से बिछुड़ी, मित्रो मरजानी, यारों के यार, तिन पहाड़, ऐ लड़की, जैनी मेहरबान सिंह; उपन्यास: सूरजमुखी अँधेरे के, ज़िन्दगी़नामा, दिलोदानिश, समय सरगम, गुजरात पाकिस्तान से गुजरात हिंदुस्तान; विचार-संवाद-संस्मरण: हम हशमत (तीन भागों में), सोबती एक सोहबत, शब्दों के आलोक में, सोबती वैद संवाद, मुक्तिबोध : एक व्यक्तित्व सही की तलाश में, लेखक का जनतंत्र, मार्फ़त दिल्ली; यात्रा-आख्यान: बुद्ध का कमण्डल : लद्दाख़</strong></span> ।
			</div>
		</div>
	
<p>खद्दर की चादर ओढ़े, हाथ में माला लिए शाहनी जब दरिया के किनारे पहुंची तो पौ फट रही थी। दूर-दूर आसमान के परदे पर लालिमा फैलती जा रही थी। शाहनी ने कपड़े उतारकर एक ओर रक्खे और &#8216;श्रीराम, श्रीराम&#8217; करती पानी में हो ली। अंजलि भरकर सूर्य देवता को नमस्कार किया, अपनी उनीदी आंखों पर छींटे दिये और पानी से लिपट गयी! चनाब का पानी आज भी पहले-सा ही सर्द था, लहरें लहरों को चूम रही थीं। वह दूर सामने काश्मीर की पहाड़ियों से बंर्फ पिघल रही थी। उछल-उछल आते पानी के भंवरों से टकराकर कगारे गिर रहे थे लेकिन दूर-दूर तक बिछी रेत आज न जाने क्यों खामोश लगती थी! शाहनी ने कपड़े पहने, इधर-उधर देखा, कहीं किसी की परछाई तक न थी। पर नीचे रेत में अगणित पांवों के निशान थे। वह कुछ सहम-सी उठी!</p>
<p><strong>पढ़ें और भी कहानियांः <a href="https://tismedia.in/category/entertainment/art-and-literature/">TIS Media चली कहानी </a></strong></p>
<p>आज इस प्रभात की मीठी नीरवता में न जाने क्यों कुछ भयावना-सा लग रहा है। वह पिछले पचास वर्षों से यहां नहाती आ रही है। कितना लम्बा अरसा है! शाहनी सोचती है, एक दिन इसी दुनिया के किनारे वह दुलहिन बनकर उतरी थी। और आज&#8230;आज शाहजी नहीं, उसका वह पढ़ा-लिखा लड़का नहीं, आज वह अकेली है, शाहजी की लम्बी-चौड़ी हवेली में अकेली है। पर नहींयह क्या सोच रही है वह सवेरे-सवेरे! अभी भी दुनियादारी से मन नहीं फिरा उसका! शाहनी ने लम्बी सांस ली और &#8216;श्री राम, श्री राम&#8217;, करती बाजरे के खेतों से होती घर की राह ली। कहीं-कहीं लिपे-पुते आंगनों पर से धुआं उठ रहा था। टनटनबैलों, की घंटियां बज उठती हैं। फिर भी&#8230;फिर भी कुछ बंधा-बंधा-सा लग रहा है। &#8216;जम्मीवाला&#8217; कुआं भी आज नहीं चल रहा। ये शाहजी की ही असामियां हैं। शाहनी ने नंजर उठायी। यह मीलों फैले खेत अपने ही हैं। भरी-भरायी नयी फसल को देखकर शाहनी किसी अपनत्व के मोह में भीग गयी। यह सब शाहजी की बरकतें हैं। दूर-दूर गांवों तक फैली हुई जमीनें, जमीनों में कुएं सब अपने हैं। साल में तीन फसल, जमीन तो सोना उगलती है। शाहनी कुएं की ओर बढ़ी, आवांज दी, &#8220;शेरे, शेरे, हसैना हसैना&#8230;।&#8221;</p>
<p>शेरा शाहनी का स्वर पहचानता है। वह न पहचानेगा! अपनी मां जैना के मरने के बाद वह शाहनी के पास ही पलकर बड़ा हुआ। उसने पास पड़ा गंडासा &#8216;शटाले&#8217; के ढेर के नीचे सरका दिया। हाथ में हुक्का पकड़कर बोला&#8221;ऐ हैसैना-सैना&#8230;।&#8221; शाहनी की आवांज उसे कैसे हिला गयी है! अभी तो वह सोच रहा था कि उस शाहनी की ऊंची हवेली की अंधेरी कोठरी में पड़ी सोने-चांदी की सन्दूकचियां उठाकर&#8230;कि तभी &#8216;शेरे शेरे&#8230;। शेरा गुस्से से भर गया। किस पर निकाले अपना क्रोध? शाहनी पर! चीखकर बोला&#8221;ऐ मर गयीं एं एब्ब तैनू मौत दे&#8221;</p>
<p>हसैना आटेवाली कनाली एक ओर रख, जल्दी-जल्दी बाहिर निकल आयी। &#8220;ऐ आयीं आं क्यों छावेले (सुबह-सुबह) तड़पना एं?&#8221;<br />
अब तक शाहनी नंजदीक पहुंच चुकी थी। शेरे की तेजी सुन चुकी थी। प्यार से बोली, &#8220;हसैना, यह वक्त लड़ने का है? वह पागल है तो तू ही जिगरा कर लिया कर।&#8221;<br />
&#8220;जिगरा !&#8221; हसैना ने मान भरे स्वर में कहा, &#8220;शाहनी, लड़का आखिर लड़का ही है। कभी शेरे से भी पूछा है कि मुंह अंधेरे ही क्यों गालियां बरसाई हैं इसने?&#8221; शाहनी ने लाड़ से हसैना की पीठ पर हाथ फेरा, हंसकर बोली&#8221;पगली मुझे तो लड़के से बहू प्यारी है! शेरे&#8221;<br />
&#8220;हां शाहनी!&#8221;<br />
&#8220;मालूम होता है, रात को कुल्लूवाल के लोग आये हैं यहां?&#8221; शाहनी ने गम्भीर स्वर में कहा।<br />
शेरे ने जरा रुककर, घबराकर कहा, &#8220;नहीं शाहनी&#8230;&#8221; शेरे के उत्तर की अनसुनी कर शाहनी जरा चिन्तित स्वर से बोली, &#8220;जो कुछ भी हो रहा है, अच्छा नहीं। शेरे, आज शाहजी होते तो शायद कुछ बीच-बचाव करते। पर&#8230;&#8221; शाहनी कहते-कहते रुक गयी। आज क्या हो रहा है। शाहनी को लगा जैसे जी भर-भर आ रहा है। शाहजी को बिछुड़े कई साल बीत गये, परपर आज कुछ पिघल रहा है शायद पिछली स्मृतियां&#8230;आंसुओं को रोकने के प्रयत्न में उसने हसैना की ओर देखा और हल्के-से हंस पड़ी। और शेरा सोच ही रहा है, क्या कह रही है शाहनी आज! आज शाहनी क्या, कोई भी कुछ नहीं कर सकता। यह होके रहेगा क्यों न हो? हमारे ही भाई-बन्दों से सूद ले-लेकर शाहजी सोने की बोरियां तोला करते थे। प्रतिहिंसा की आग शेरे की आंखों में उतर आयी। गंड़ासे की याद हो आयी। शाहनी की ओर देखानहीं-नहीं, शेरा इन पिछले दिनों में तीस-चालीस कत्ल कर चुका है परपर वह ऐसा नीच नहीं&#8230;सामने बैठी शाहनी नहीं, शाहनी के हाथ उसकी आंखों में तैर गये। वह सर्दियों की रातें कभी-कभी शाहजी की डांट खाके वह हवेली में पड़ा रहता था। और फिर लालटेन की रोशनी में वह देखता है, शाहनी के ममता भरे हाथ दूध का कटोरा थामे हुए &#8216;शेरे-शेरे, उठ, पी ले।&#8217; शेरे ने शाहनी के झुर्रियां पड़े मुंह की ओर देखा तो शाहनी धीरे से मुस्करा रही थी। शेरा विचलित हो गया। &#8216;आंखिर शाहनी ने क्या बिगाड़ा है हमारा? शाहजी की बात शाहजी के साथ गयी, वह शाहनी को जरूर बचाएगा। लेकिन कल रात वाला मशवरा! वह कैसे मान गया था फिरोंज की बात! &#8216;सब कुछ ठीक हो जाएगासामान बांट लिया जाएगा!&#8217;</p>
<p>&#8220;शाहनी चलो तुम्हें घर तक छोड़ आऊं!&#8221;<br />
शाहनी उठ खड़ी हुई। किसी गहरी सोच में चलती हुई शाहनी के पीछे-पीछे मंजबूत कदम उठाता शेरा चल रहा है। शंकित-सा-इधर उधर देखता जा रहा है। अपने साथियों की बातें उसके कानों में गूंज रही हैं। पर क्या होगा शाहनी को मारकर?<br />
&#8220;शाहनी!&#8221;<br />
&#8220;हां शेरे।&#8221;<br />
शेरा चाहता है कि सिर पर आने वाले खतरे की बात कुछ तो शाहनी को बता दे, मगर वह कैसे कहे?<br />
&#8220;शाहनी&#8221;<br />
शाहनी ने सिर ऊंचा किया। आसमान धुएं से भर गया था। &#8220;शेरे&#8221;<br />
शेरा जानता है यह आग है। जबलपुर में आज आग लगनी थी लग गयी! शाहनी कुछ न कह सकी। उसके नाते रिश्ते सब वहीं हैं हवेली आ गयी। शाहनी ने शून्य मन से डयोढ़ी में कदम रक्खा। शेरा कब लौट गया उसे कुछ पता नहीं। दुर्बल-सी देह और अकेली, बिना किसी सहारे के! न जाने कब तक वहीं पड़ी रही शाहनी। दुपहर आयी और चली गयी। हवेली खुली पड़ी है। आज शाहनी नहीं उठ पा रही। जैसे उसका अधिकार आज स्वयं ही उससे छूट रहा है! शाहजी के घर की मालकिन&#8230;लेकिन नहीं, आज मोह नहीं हट रहा। मानो पत्थर हो गयी हो। पड़े-पड़े सांझ हो गयी, पर उठने की बात फिर भी नहीं सोच पा रही। अचानक रसूली की आवांज सुनकर चौंक उठी। &#8220;शाहनी-शाहनी, सुनो ट्रकें आती हैं लेने?&#8221;</p>
<p>&#8220;ट्रके&#8230;?&#8221; शाहनी इसके सिवाय और कुछ न कह सकी। हाथों ने एक-दूसरे को थाम लिया। बात की बात में खबर गांव भर में फैल गयी। बीबी ने अपने विकृत कण्ठ से कहा&#8221;शाहनी, आज तक कभी ऐसा न हुआ, न कभी सुना। गजब हो गया, अंधेर पड़ गया।&#8221; शाहनी मूर्तिवत् वहीं खड़ी रही। नवाब बीबी ने स्नेह-सनी उदासी से कहा &#8220;शाहनी, हमने तो कभी न सोचा था!&#8221;</p>
<p>शाहनी क्या कहे कि उसीने ऐसा सोचा था। नीचे से पटवारी बेगू और जैलदार की बातचीत सुनाई दी। शाहनी समझी कि वक्त आन पहुंचा। मशीन की तरह नीचे उतरी, पर डयोढ़ी न लांघ सकी। किसी गहरी, बहुत गहरी आवांज से पूछा&#8221;कौन? कौन हैं वहां?&#8221;</p>
<p>कौन नहीं है आज वहां? सारा गांव है, जो उसके इशारे पर नाचता था कभी। उसकी असामियां हैं जिन्हें उसने अपने नाते-रिश्तों से कभी कम नहीं समझा। लेकिन नहीं, आज उसका कोई नहीं, आज वह अकेली है! यह भीड़ की भीड़, उनमें कुल्लूवाल के जाट। वह क्या सुबह ही न समझ गयी थी?</p>
<p>बेगू पटवारी और मसीत के मुल्ला इस्माइल ने जाने क्या सोचा। शाहनी के निकट आ खड़े हुए। बेगू आज शाहनी की ओर देख नहीं पा रहा। धीरे से जरा गला सांफ करते हुए कहा&#8221;शाहनी, रब्ब नू एही मंजूर सी।&#8221;<br />
शाहनी के कदम डोल गये। चक्कर आया और दीवार के साथ लग गयी। इसी दिन के लिए छोड़ गये थे शाहजी उसे? बेजान-सी शाहनी की ओर देखकर बेगू सोच रहा है &#8216;क्या गुंजर रही है शाहनी पर! मगर क्या हो सकता है! सिक्का बदल गया है&#8230;&#8217;</p>
<p>शाहनी का घर से निकलना छोटी-सी बात नहीं। गांव का गांव खड़ा है हवेली के दरवाजे से लेकर उस दारे तक जिसे शाहजी ने अपने पुत्र की शादी में बनवा दिया था। तब से लेकर आज तक सब फैसले, सब मशविरे यहीं होते रहे हैं। इस बड़ी हवेली को लूट लेने की बात भी यहीं सोची गयी थी! यह नहीं कि शाहनी कुछ न जानती हो। वह जानकर भी अनजान बनी रही। उसने कभी बैर नहीं जाना। किसी का बुरा नहीं किया। लेकिन बूढ़ी शाहनी यह नहीं जानती कि सिक्का बदल गया है&#8230;</p>
<p>देर हो रही थी। थानेदार दाऊद खां जरा अकड़कर आगे आया और डयोढ़ी पर खड़ी जड़ निर्जीव छाया को देखकर ठिठक गया! वही शाहनी है जिसके शाहजी उसके लिए दरिया के किनारे खेमे लगवा दिया करते थे। यह तो वही शाहनी है जिसने उसकी मंगेतर को सोने के कनफूल दिये थे मुंह दिखाई में। अभी उसी दिन जब वह &#8216;लीग&#8217; के सिलसिले में आया था तो उसने उद्दंडता से कहा था&#8217;शाहनी, भागोवाल मसीत बनेगी, तीन सौ रुपया देना पड़ेगा!&#8217; शाहनी ने अपने उसी सरल स्वभाव से तीन सौ रुपये दिये थे। और आज&#8230;?<br />
&#8220;शाहनी!&#8221; डयोढ़ी के निकट जाकर बोला &#8220;देर हो रही है शाहनी। (धीरे से) कुछ साथ रखना हो तो रख लो। कुछ साथ बांध लिया है? सोना-चांदी&#8221;</p>
<p>शाहनी अस्फुट स्वर से बोली &#8220;सोना-चांदी!&#8221; जरा ठहरकर सादगी से कहा&#8221;सोना-चांदी! बच्चा वह सब तुम लोगों के लिए है। मेरा सोना तो एक-एक जमीन में बिछा है।&#8221;<br />
दाऊद खां लज्जित-सा हो गया। &#8220;शाहनी तुम अकेली हो, अपने पास कुछ होना जरूरी है। कुछ नकदी ही रख लो। वक्त का कुछ पता नहीं&#8221;<br />
&#8220;वक्त?&#8221; शाहनी अपनी गीली आंखों से हंस पड़ी। &#8220;दाऊद खां, इससे अच्छा वक्त देखने के लिए क्या मैं जिन्दा रहूंगी!&#8221; किसी गहरी वेदना और तिरस्कार से कह दिया शाहनी ने।<br />
दाऊद खां निरुत्तर है। साहस कर बोला &#8220;शाहनी कुछ नकदी जरूरी है।&#8221;<br />
&#8220;नहीं बच्चा मुझे इस घर से (शाहनी का गला रुंध गया) नकदी प्यारी नहीं। यहां की नकदी यहीं रहेगी।&#8221;<br />
शेरा आन खड़ा गुजरा कि हो ना हो कुछ मार रहा है शाहनी से। &#8220;खां साहिब देर हो रही है&#8221;</p>
<p>शाहनी चौंक पड़ी। देरमेरे घर में मुझे देर ! आंसुओं की भँवर में न जाने कहाँ से विद्रोह उमड़ पड़ा। मैं पुरखों के इस बड़े घर की रानी और यह मेरे ही अन्न पर पले हुए&#8230;नहीं, यह सब कुछ नहीं। ठीक हैदेर हो रही हैपर नहीं, शाहनी रो-रोकर नहीं, शान से निकलेगी इस पुरखों के घर से, मान से लाँघेगी यह देहरी, जिस पर एक दिन वह रानी बनकर आ खड़ी हुई थी। अपने लड़खड़ाते कदमों को संभालकर शाहनी ने दुपट्टे से आंखें पोछीं और डयोढ़ी से बाहर हो गयी। बडी-बूढ़ियाँ रो पड़ीं। किसकी तुलना हो सकती थी इसके साथ! खुदा ने सब कुछ दिया था, मगरमगर दिन बदले, वक्त बदले&#8230;</p>
<p>शाहनी ने दुपट्टे से सिर ढाँपकर अपनी धुंधली आंखों में से हवेली को अन्तिम बार देखा। शाहजी के मरने के बाद भी जिस कुल की अमानत को उसने सहेजकर रखा आज वह उसे धोखा दे गयी। शाहनी ने दोनों हाथ जोड़ लिए यही अन्तिम दर्शन था, यही अन्तिम प्रणाम था। शाहनी की आंखें फिर कभी इस ऊंची हवेली को न देखी पाएंगी। प्यार ने जोर मारासोचा, एक बार घूम-फिर कर पूरा घर क्यों न देख आयी मैं? जी छोटा हो रहा है, पर जिनके सामने हमेशा बड़ी बनी रही है उनके सामने वह छोटी न होगी। इतना ही ठीक है। बस हो चुका। सिर झुकाया। डयोढ़ी के आगे कुलवधू की आंखों से निकलकर कुछ बन्दें चू पड़ीं। शाहनी चल दीऊंचा-सा भवन पीछे खड़ा रह गया। दाऊद खां, शेरा, पटवारी, जैलदार और छोटे-बड़े, बच्चे, बूढ़े-मर्द औरतें सब पीछे-पीछे।<br />
ट्रकें अब तक भर चुकी थीं। शाहनी अपने को खींच रही थी। गांववालों के गलों में जैसे धुंआ उठ रहा है। शेरे, खूनी शेरे का दिल टूट रहा है। दाऊद खां ने आगे बढ़कर ट्रक का दरवांजा खोला। शाहनी बढ़ी। इस्माइल ने आगे बढ़कर भारी आवांज से कहा&#8221; शाहनी, कुछ कह जाओ। तुम्हारे मुंह से निकली असीस झूठ नहीं हो सकती!&#8221; और अपने साफे से आंखों का पानी पोछ लिया। शाहनी ने उठती हुई हिचकी को रोककर रुंधे-रुंधे से कहा, &#8220;रब्ब तुहानू सलामत रक्खे बच्चा, खुशियां बक्शे&#8230;।&#8221;</p>
<p>वह छोटा-सा जनसमूह रो दिया। जरा भी दिल में मैल नहीं शाहनी के। और हमहम शाहनी को नहीं रख सके। शेरे ने बढ़कर शाहनी के पांव छुए, &#8220;शाहनी कोई कुछ कर नहीं सका। राज भी पलट गया&#8221; शाहनी ने कांपता हुआ हाथ शेरे के सिर पर रक्खा और रुक-रुककर कहा&#8221;तैनू भाग जगण चन्ना!&#8221; (ओ चाँद तेरे भाग्य जागें) दाऊद खां ने हाथ का संकेत किया। कुछ बड़ी-बूढ़ियां शाहनी के गले लगीं और ट्रक चल पड़ी।</p>
<p>अन्न-जल उठ गया। वह हवेली, नयी बैठक, ऊंचा चौबारा, बड़ा &#8216;पसार&#8217; एक-एक करके घूम रहे हैं शाहनी की आंखों में! कुछ पता नहींट्रक चल दिया है या वह स्वयं चल रही है। आंखें बरस रही हैं। दाऊद खां विचलित होकर देख रहा है इस बूढ़ी शाहनी को। कहां जाएगी अब वह?<br />
&#8220;शाहनी मन में मैल न लाना। कुछ कर सकते तो उठा न रखते! वकत ही ऐसा है। राज पलट गया है, सिक्का बदल गया है&#8230;&#8221;<br />
रात को शाहनी जब कैंप में पहुंचकर जमीन पर पड़ी तो लेटे-लेटे आहत मन से सोचा &#8216;राज पलट गया है&#8230;सिक्का क्या बदलेगा? वह तो मैं वहीं छोड़ आयी।&#8230;&#8217;<br />
और शाहजी की शाहनी की आंखें और भी गीली हो गयीं!<br />
आसपास के हरे-हरे खेतों से घिरे गांवों में रात खून बरसा रही थी।<br />
शायद राज पलटा भी खा रहा था और सिक्का बदल रहा था&#8230;।</p>
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		<title>यह कहानी नहीं: अमृता प्रीतम</title>
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		<pubDate>Fri, 22 Oct 2021 04:53:49 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Art and Literature]]></category>
		<category><![CDATA[Cover Stories]]></category>
		<category><![CDATA[Amrita Pritam]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi Literature]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi Stories]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पत्थर और चूना बहुत था, लेकिन अगर थोड़ी-सी जगह पर दीवार की तरह उभरकर खड़ा हो जाता, तो घर की दीवारें बन सकता था। पर बना नहीं। वह धरती पर फैल गया, सड़कों की तरह और वे दोनों तमाम उम्र उन सड़कों पर चलते रहे&#8230;। सड़कें, एक-दूसरे के पहलू से भी फटती हैं, एक-दूसरे के &#8230;</p>
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		<div class="clearfix"></div>
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			<div class="author-avatar">
				<img decoding="async" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/amrita.jpg" alt="अमृता प्रीतम (Amrita Pritam)" class="author-avatar-img" width="111" height="111" />
			</div>
			<div class="author-info">
				<h4>अमृता प्रीतम (Amrita Pritam)</h4>अमृता प्रीतम (31 अगस्त, 1919-31 अक्तूबर 2005) का जन्म, गुजरांवाला (पंजाब) में हुआ । उन्होंने पंजाबी भाषा में कविता, उपन्यास, कहानी समेत अनेक विधाओं में रचना की । उनकी मुख्य कृतियाँ हैं; उपन्यास : डॉक्टर देव, पिंजर, आह्लणा, आशू, इक सिनोही, बुलावा, बंद दरवाज़ा, रंग दा पत्ता, इक सी अनीता, चक्क नम्बर छत्ती, धरती सागर ते सीपियाँ, दिल्ली दियाँ गलियाँ, एकते एरियल, जलावतन, यात्री, जेबकतरे, अग दा बूटा, पक्की हवेली, अग दी लकीर, कच्ची सड़क, कोई नहीं जानदाँ, उनहाँ दी कहानी, इह सच है, दूसरी मंज़िल, तेहरवाँ सूरज, उनींजा दिन, कोरे कागज़, हरदत्त दा ज़िंदगीनामा; आत्मकथा : रसीदी टिकट; कहानी संग्रह : हीरे दी कनी, लातियाँ दी छोकरी, पंज वरा लंबी सड़क, इक शहर दी मौत, तीसरी औरत; कविता संग्रह : लोक पीड़, मैं जमा तू, लमियाँ वाटां , कस्तूरी, सुनेहुड़े, कागज ते कैनवस; गद्य कृतियाँ : किरमिची लकीरें, काला गुलाब, अग दियाँ लकीराँ, इकी पत्तियाँ दा गुलाब, सफ़रनामा, औरत : इक दृष्टिकोण, इक उदास किताब, अपने-अपने चार वरे, केड़ी ज़िंदगी केड़ा साहित्य, कच्चे अखर, इक हथ मेहन्दी इक हथ छल्ला, मुहब्बतनामा, मेरे काल मुकट समकाली, शौक़ सुराही, कड़ी धुप्प दा सफ़र, अज्ज दे काफ़िर उनको साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ पुरस्कार मिले ।
			</div>
		</div>
	
<p><span style="color: #0000ff;"><em><strong>पत्थर और चूना बहुत था, लेकिन अगर थोड़ी-सी जगह पर दीवार की तरह उभरकर खड़ा हो जाता, तो घर की दीवारें बन सकता था। पर बना नहीं। वह धरती पर फैल गया, सड़कों की तरह और वे दोनों तमाम उम्र उन सड़कों पर चलते रहे&#8230;।</strong></em></span></p>
<p>सड़कें, एक-दूसरे के पहलू से भी फटती हैं, एक-दूसरे के शरीर को चीरकर भी गुज़रती हैं, एक-दूसरे से हाथ छूड़ाकर गुम भी हो जाती हैं, और एक-दूसरे के गले से लगकर एक-दूसरे में लीन भी हो जाती थीं। वे एक-दूसरे से मिलते रहे, पर सिर्फ तब, जब कभी-कभार उनके पैरों के नीचे बिछी हुई सड़कें एक-दूसरे से आकर मिल जाती थीं।<br />
घड़ी-पल के लिए शायद सड़कें भी चौंककर रुक जाती थीं, और उनके पैर भी&#8230;<br />
और तब शायद दोनों को उस घर का ध्यान आ जाता था जो बना नहीं था&#8230;<br />
बन सकता था, फिर क्यों नहीं बना? वे दोनों हैरान-से होकर पाँवों के नीचे की ज़मीन को ऐसे देखते थे जैसे यह बात उस ज़मीन से पूछ रहे हों&#8230;<br />
और फिर वे कितनी ही देर ज़मीन की ओर ऐसे देखने लगते मानों वे अपनी नज़र से ज़मीन में उस घर की नींवें खोद लेंगे।&#8230;<br />
और कई बार सचमुच वहाँ जादू का एक घर उभरकर खड़ा हो जाता और वे दोनों ऐसे सहज मन हो जाते मानों बरसों से उस घर में रह रहे हों&#8230;</p>
<p>यह उनकी भरपूर जवानी के दिनों की बात नहीं, अब की बात है, ठण्डी उम्र की बात, कि अ एक सरकारी मीटिंग के लिए स के शहर गई। अ को भी वक्त ने स जितना सरकारी ओहदा दिया है, और बराबर की हैसियत के लोग जब मीटिंग से उठे, सरकारी दफ्तर ने बाहर के शहरों से आने वालों के लिए वापसी टिकट तैयार रखे हुए थे, स ने आगे बढ़कर अ का टिकट ले लिया, और बाहर आकर अ से अपनी गाड़ी में बैठने के लिए कहा।</p>
<p>पूछा &#8211; “सामान कहाँ है?”<br />
“होटल में।”<br />
स ने ड्राइवर से पहले होटल और फिर वापस घर चलने के लिए कहा।<br />
अ ने आपत्ति नहीं की, पर तर्क के तौर पर कहा &#8211; “प्लेन में सिर्फ दो घंटे बाकी हैं, होटल होकर मुश्किल से एयरपोर्ट पहुँचूँगी।”<br />
“प्लेन कल भी जाएगा, परसों भी, रोज़ जाएगा।” स ने सिर्फ इतना कहा, फिर रास्ते में कुछ नहीं कहा।<br />
होटल से सूटकेस लेकर गाड़ी में रख लिया, तो एक बार अ ने फिर कहा &#8211;<br />
“वक्त थोड़ा है, प्लेन मिस हो जाएगा।”<br />
स ने जवाब में कहा &#8211; “घर पर माँ इन्तज़ार कर ही होगी।”<br />
अ सोचती रही कि शायद स ने माँ को इस मीटिंग का दिन बताया हुआ था, पर वह समझ नहीं सकी &#8211; क्यों बताया था?<br />
अ कभी-कभी मन से यह ‘क्यों’ पूछ लेती थी, पर जवाब का इन्तज़ार नहीं करती थी। वह जानती थी &#8211; मन के पास कोई जवाब नहीं था। वह चुप बैठी शीशे में से बाहर शहर की इमारतों के देखती रही&#8230;<br />
कुछ देर बाद इमारतों का सिलसिला टूट गया। शहर से दूर बाहर आबादी आ गई, और पाम के बड़े-बड़े पेड़ों की कतारें शुरु हो गईं&#8230;</p>
<p>समुद्र शायद पास ही था, अ के साँस नमकीन-से हो गए। उसे लगा-पाम के पत्तों की तरह उसके हाथों में कम्पन आ गया था-शायद स का घर भी अब पास था&#8230;<br />
पेड़ों-पत्तों में लिपटी हुई-सी कॉटेज के पास पहुँचकर गाड़ी खड़ी हो गई। अ भी उतरी, पर कॉटेज के भीतर जाते हुए एक पल के लिए बाहर केले के पेड़ के पास खड़ी हो गई। जी किया &#8211; अपने काँपते हुए हाथों को यहाँ बाहर केले के काँपते हुए पत्तों के बीच में रख दे। वह स के साथ भीतर कॉटेज में जा सकती थी, पर हाथों की वहाँ ज़रूरत नहीं थी &#8211; इन हाथों से न वह अब स को कुछ दे सकती थी, न स से कुछ ले सकती थी&#8230;</p>
<p>माँ ने शायद गाड़ी की आवाज़ सुन ली थी, बाहर आ गईं। उन्होंने हमेशा की तरह माथा चूमा और कहा -”आओ, बेटी।”<br />
इस बार अ बहुत दिनों बाद माँ से मिली थी, पर माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए &#8211; जैसे सिर पर बरसों का बोझ उतार दिया हो &#8211; और उसे भीतर ले जाकर बिठाते हुए उससे पूछा -”क्या पियोगी, बेटी?”<br />
स भी अब तक भीतर आ गया था, माँ से कहने लगा &#8211; “पहले चाय बनवाओ, फिर खाना।”<br />
अ ने देखा &#8211; ड्राइवर गाड़ी से सूटकेस अन्दर ला रहा था। उसने स की ओर देखा, कहा &#8211; “बहुत थोड़ा वक्त है, मुश्किल से एयरपोर्ट पहुँचूँगी।”<br />
स ने उससे नहीं, ड्राइवर से कहा &#8211; “कल सवेरे जाकर परसों का टिकट ले आना।” और माँ से कहा -”तुम कहती थीं कि मेरे कुछ दोस्तों को खाने पर बुलाना है, कल बुला लो।”<br />
अ ने स की जेब की ओर देखा जिसमें उसका वापसी का टिकट पड़ा हुआ था, कहा -”पर यह टिकट बरबाद हो जाएगा&#8230;”</p>
<p>माँ रसोई की तरफ जाते हुए खड़ी हो गई, और अ के कन्धे पर अपना हाथ रखकर कहने लगी -”टिकट का क्या है, बेटी! इतना कह रहा है, रुक जाओ।”<br />
पर क्यों? अ के मन में आया, पर कहा कुछ नहीं। कुर्सी से उठकर कमरे के आगे बरामदे में जाकर खड़ी हो गई। सामने दूर तक पाम के ऊँचे-ऊँचे पेड़ थे। समुद्र परे था। उसकी आवाज़ सुनाई दे रही थी। अ को लगा &#8211; सिर्फ आज का ‘क्यों’ नहीं, उसकी ज़िन्दगी के कितने ही ‘क्यों’ उसके मन के समुद्र के तट पर इन पाम के पेड़ों की तरह उगे हुए हैं, और उनके पत्ते अनेक वर्षों से हवा में काँप रहे हैं।</p>
<p>अ ने घर के मेहमान की तरह चाय पी, रात को खाना खाया, और घर का गुसलखाना पूछकर रात को सोने के समय पहनने वाले कपड़े बदले। घर में एक लम्बी बैठक थी, ड्राइंग-डाइनिंग, और दो और कमरे थे &#8211; एक स का, एक माँ का। माँ ने ज़िद करके अपना कमरा अ को दे दिया, और स्वयं बैठक में सो गई।<br />
अ सोने वाले कमरे में चली गई, पर कितनी ही देर झिझकी हुई-सी खड़ी रही। सोचती रही &#8211; मैं बैठक में एक-दो रातें मुसाफिरों की तरह ही रह लेती, ठीक था, यह कमरा माँ का है, माँ को ही रहना चाहिए था&#8230;<br />
सोने वाले कमरे के पलंग में, पद… में, और अलमारी में एक घरेलू-सी बू-बास होती है, अ ने इसका एक घूँट-सा भरा। पर फिर अपना साँस रोक लिया मानो अपने ही साँसो से डर रही हो&#8230;<br />
बराबर का कमरा स का था। कोई आवाज़ नहीं थी। घड़ी पहले स ने सिर-दर्द की शिकायत की थी, नींद की गोली खाई थी, अब तक शायद सो गया था। पर बराबर वाले कमरों की भी अपनी बू-बास होती है, अ ने एक बार उसका भी घूँट पीना चाहा, पर साँस रुका रहा।</p>
<p>फिर अ का ध्यान अलमारी के पास नीचे फर्श पर पड़े हुए अपने सूटकेस की ओर गया, और उसे हँसी-सी आ गई &#8211; यह देखो मेरा सूटकेस, मुझे सारी रात मेरी मुसाफिरी की याद दिलाता रहेगा&#8230;<br />
और वह सूटकेस की ओर देखते हुए थकी हुई-सी, तकिए पर सिर रखकर लेट गई&#8230;</p>
<p>न जाने कब नींद आ गई। सोकर जागी तो खासा दिन चढ़ा हुआ था। बैठक में रात को होने वाली दावत की हलचल थी।<br />
एक बार तो अ की आँखें झपककर रह गईं &#8211; बैठक में सामने स खड़ा था। चारखाने का नीले रंग का तहमद पहने हुए। अ ने उसे कभी रात के सोने के समय के कपड़ों में नहीं देखा था। हमेशा दिन में ही देखा था &#8211; किसी सड़क पर, सड़क के किनारे, किसी कैफे में, होटल में, या किसी सरकारी मीटिंग में &#8211; उसकीयह पहचान नई-सी लगी। आँखों में अटक-सी गई&#8230;</p>
<p>अ ने भी इस समय नाइट सूट पहना हुआ था, पर अ ने बैठक में आने से पहले उस पर ध्यान नहीं दिया था, अब ध्यान आया तो अपना-आप ही अजीब लगा &#8211; साधारण से असाधारण-सा होता हुआ&#8230;<br />
बैठक में खड़ा हुआ स, अ को आते हुए देखकर कहने लगा -”ये दो सोफे हैं, इन्हें लम्बाई के रुख रख लें। बीच में जगह खुली हो जाएगी।”<br />
अ ने सोफों को पकड़वाया, छोटी मेज़ों को उठाकर कुर्सियों के बीच में रखा। फिर माँ ने चौके से आवाज़ दी तो अ ने चाय लाकर मेज़ पर रख दी।<br />
चाय पीकर स ने उससे कहा -”चलो, जिन लोगों को बुलाना है, उनके घर जाकर कह आएँ और लौटते हुए कुछ फल लेते आएँ।”<br />
दोनों ने पुराने परिचित दोस्तों के घर जाकर दस्तक दी, सन्देशे दिए, रास्ते से चीजें खरीदीं, फिर वापस आकर दोपहर का खाना खाया, और फिर बैठक को फूलों से सजाने में लग गए।</p>
<p>दोनों ने रास्ते में साधारण-सी बातें की थीं &#8211; फल कौन-कौन-से लेने हैं? पान लेने हैं या नहीं? ड्रिंक्स के साथ के लिए कबाब कितने ले लें? फलाँ का घर रास्ते में पड़ता है, उसे भी बुला लें? &#8211; और यह बातें वे नहीं थीं जो सात बरस बाद मिलने वाले करते हैं।</p>
<p>अ को सवेरे दोस्तों के घर पर पहली-दूसरी दस्तक देते समय ही सिर्फ थोड़ी-सी परेशानी महसूस हुई थी। वे भले ही स के दोस्त थे, पर एक लम्बे समय से अ को जानते थे, दरवाज़ा खोलने पर बाहर उसे स के साथ देखते तो हैरान-से हो कह उठते -”आप।”<br />
पर वे जब अकेले गाड़ी में बैठते, तो स हँस देता -”देखा, कितना हैरान हो गया, उससे बोला भी नहीं जा रहा था।”<br />
और फिर एक-दो बार के बाद दोस्तों की हैरानी भी उनकी साधारण बातों में शामिल हो गई। स की तरह अ भी सहज मन से हँसने लगी।<br />
शाम के समय स ने छाती में दर्द की शिकायत की। माँ ने कटोर में ब्राण्डी डाल दी, और अ से कहा -”लो बेटी! यह ब्राण्डी इसकी छाती पर मल दो।”<br />
इस समय तक शायद इतना कुछ सहज हो चुका था, अ ने स की कमीज़ के ऊपर वाले बटन खोले, और हाथ से उसकी छाती पर ब्राण्डी मलने लगी।<br />
बाहर पाम के पेड़ों के पत्ते और केलों के पत्ते शायद अभी भी काँप रहे थे, पर अ के हाथ में कम्पन नहीं था। एक दोस्त समय से पहले आ गया था, अ ने ब्राण्डी में भीगे हुए हाथों से उसका स्वागत करते हुए नमस्कार भी किया, और फिर कटोरी में हाथ डोबकर बाकी रहती ब्राण्डी को उसकी गर्दन पर मल दिया &#8211; कन्धों तक।</p>
<p>धीरे-धीरे कमरा मेहमानों से भर गया। अ फ्रिज सर बरफ निकालती रही और सादा पानी भर-भर फ्रिज में रखती रही। बीच-बीच में रसोई की तरफ जाती, ठण्डे कबाब फिर से गर्म करके ले आती। सिर्फ एक बार जब स ने अ के कान के पास होकर कहा -”तीन-चार तो वे लोग बी आ गए हैं, जिन्हें बुलाया नहीं था। ज़रूर किसी दोस्त ने उनसे भी कहा होगा, तुम्हें देखने के लिए आ गए हैं” &#8211; तो पल-भर के लिए अ की स्वाभाविकता टूटी, पर फिर जब स ने उससे कुछ गिलास धोने के लिए कहा, तो वह उसी तरह सहज मन हो गई।</p>
<p>महफिल गर्म हुई, ठंडी हुई, और जब लगभग आधी रात के समय सब चले गए, अ को सोने वाले कमरे में जाकर अपने सूटकेस में से रात के कपड़े निकालकर पहनते हुए लगा &#8211; कि सड़कों पर बना हुआ जादू का घर अब कहीं भी नहीं था&#8230;.</p>
<p>यह जादू का घर उसने कई बार देखा था &#8211; बनते हुए भी, मिटते हुए भी, इसलिए वह हैरान नहीं थी। सिर्फ थकी-थकी सी तकिए पर सिर रखकर सोचने लगी &#8211; कब की बात है&#8230; शायद पचीस बरस हो गए- नहीं तीस बरस &#8230;. जब पहली बार वे ज़िन्दगी की सड़कों पर मिले थे &#8211; अ किस सड़क से आई थी, स कौन-सी सड़क से आया या, दोनों पूछना भी भूल गये थे, और बताना भी। वे निगाह नीची किए ज़मीन में नींवें खोदते रहे, और फिर यहाँ जादू का एक घर बनकर खड़ा हो गया, और वे सहज मन से सारे दिन उस घर में रहते रहे।</p>
<p>फिर जब दोनों की सड़कों ने उन्हें आवाज़ें दीं, वे अपनी-अपनी सड़क की ओर जाते हुए चौंककर खड़े हो गए। देखा &#8211; दोनों सड़कों के बीच एक गहरी खाई थी। स कितनी देर उस खाई की ओर देखता रहा, जैसे अ से पूछ रहा हो कि इस खाई को तुम किस तरह से पार करोगी? अ ने कहा कुछ नहीं था, पर स के हाथ की ओर देखा था, जैसे कह रही हो &#8211; तुम हाथ पकड़कर पार करा लो, मैं महज़ब की इस खाई को पार कर जाऊँगी।</p>
<p>फिर स का ध्यान ऊपर की ओर गया था, अ के हाथ की ओर। अ की उँगली में हीरे की एक अँग्ïठी चमक रही थी। स कितनी देर तक देखता रहा, जैसे पूछ रहा हो &#8211; तुम्हारी उँगली पर यह जो कान्ïन का धागा लिपटा हुआ है, मैं इसका क्या करूँगा? अ ने अपनी उँगली की ओर देखा था और धीरे से हँस पड़ी थी, जैसे कह रही हो &#8211; तुम एक बार कहो, मैं कानून का यह धागा नाखूनों से खोल लूँगी। नाखूनों से नहीं खुलेगा तो दाँतों से खोल लूँगी।</p>
<p>पर स चुप रहा या, और अ भी चुप खड़ी रह गई थी। पर जैसे सड़कें एक ही जगह पर खड़ी हुई भी चलती रहती हैं, वे भी एक जगह पर खड़े हुए चलते रहे&#8230;</p>
<p>फिर एक दिन स के शहर से आने वाली सड़क अ के शहर आ गई थी, और अ ने स की आवाज़ सुनकर अपने एक बरस के बच्चे को उठाया था और बाहर सड़क पर उसके पास आकर खड़ी हो गई थी। स ने धीरे से हाथ आगे करके सोए हुए बच्चे को अ से ले लिया था और अपने कन्धे से लगा लिया था। और फिर वे सारे दिन उस शहर की सड़कों पर चलते रहे&#8230;</p>
<p>वे भरपूर जवानी के दिन थे &#8211; उनके लिए न धूप थी, न ­ड। और फिर जब चाय पीने के लिए वे एक कैफे में गए तो बैरे ने एक मर्द, एक औरत और एक बच्चे को देखकर एक अलग कोने की कुर्सियाँ पोंछ दी थीं। और कैफे के उस अलग कोने में एक जादू का घर बनकर खड़ा हो गया था&#8230;</p>
<p>और एक बार&#8230; अचानक चलती हुई रेलगाड़ी में मिलाप हो गया था। स भी था, माँ भी, और स का एक दोस्त भी। अ की सीट बहुत दूर थी, पर स के दोस्त ने उससे अपनी सीट बदल ली थी और उसका सूटकेस उठाकर स के सूटकेस के पास रख दिया था। गाड़ी में दिन के समय ठंड नहीं थी, पर रात ठंडी थी। माँ ने दोनों को एक कम्बल दे दिया था। आधा स के लिए आधा अ के लिए। और चलती गाड़ी में उस साझे के कम्बल के किनारे जादू के घर की दीवारें बन गई थीं&#8230;</p>
<p>जादू की दीवारें बनती थीं, मिटती थीं, और आखिर उनके बीच खँडहरों की-सी खामोशी का एक ढेर लग जाता था&#8230;<br />
स को कोई बन्धन नहीं था। अ को था। पर वह तोड़ सकती थी। फिर यह क्या था कि वे तमाम उम्र सड़कों पर चलते रहे&#8230;<br />
अब तो उम्र बीत गई&#8230; अ ने उम्र के तपते दिनों के बारे में भी सोचा और अब के ठण्डे दिनों के बारे में भी। लगा &#8211; सब दिन, सब बरस पाम के पत्तों की तरह हवा में खड़े काँप रहे थे।<br />
बहुत दिन हुए, एक बार अ ने बरसों की खामोशी को तोड़कर पूछा था &#8211; “तुम बोलते क्यों नहीं? कुछ भी नहीं कहते। कुछ तो कहो।”<br />
पर स हँस दिया था, कहने लगा -”यहाँ रोशनी बहुत है, हर जगह रोशनी होती है, मुझसे बोला नहीं जाता।”<br />
और अ का जी किया था &#8211; वह एक बार सूरज को पकड़कर बुझा दे&#8230;<br />
सड़कों पर सिर्फ दिन चढ़ते हैं। रातें तो घरों में होती हैं&#8230; पर घर कोई था नहीं, इसलिए रात भी कहीं नहीं थी &#8211; उनके पास सिर्फ सड़कें थीं, और सूरज था, और स सूरज की रोशनी में बोलता नहीं था।<br />
एक बार बोला था&#8230;<br />
वह चुप-सा बैठा हुआ था जब अ ने पूछा था -”क्या सोच रहे हो?” तो वह बोला &#8211; “सोच रहा हूँ, लड़कियों से फ्लर्ट करूँ और तुम्हें दुखी करूँ।”<br />
पर इस तरह अ दुखी नहीं, सुखी हो जाती। इसलिए अ भी हँसने लगी थी, स भी।</p>
<p>और फिर एक लम्बी खामोशी&#8230;<br />
कई बार अ के जी में आता था -हाथ आगे बढ़ाकर स को उसकी खामोशी में से बाहर ले आए, वहाँ तक जहाँ तक दिल का दर्द है। पर वह अपने हाथों को सिर्फ देखती रहती थी, उसने हाथों से कभी कुछ कहा नहीं था।<br />
एक बार स ने कहा था -”चलो चीन चलें।”<br />
“चीन?”<br />
“जाएँगे, पर आएँगे नहीं।”<br />
“पर चीन क्यों?”<br />
यह ‘क्यों’ भी शायद पाम के पेड़ के समान था जिसके पत्ते फिर हवा में काँपने लगे&#8230;<br />
इस समय अ ने तकिए पर सिर रख हुआ था, पर नींद नहीं आ रही थी। स बराबर के कमरे में सोया हुआ था, शायद नींद की गोली खाकर।<br />
अ को न अपने जागने पर गुस्सा आया, न स की नींद पर। वह सिर्फ यह सोच रही थी &#8211; कि वे सड़कों पर चलते हुए जब कभी मिल जाते हैं तो वहाँ घड़ी-पहर के लिए एक जादू का घर क्यों बनकर खड़ा हो जाता है?<br />
अ को हँसी-सी आ गई &#8211; तपती हुई जवानी के समय तो ऐसा होता था, ठीक है, लेकिन अब क्यों होता है? आज क्यों हुआ?<br />
यह न जाने क्या था, जो उम्र की पकड़ में नहीं आ रहा था&#8230;<br />
बाकी रात न जाने कब बीत गई &#8211; अब दरवाज़े पर धीरे से खटका करता हुआ ड्राइवर कह रहा या कि एयरपोर्ट जाने का समय हो गया है&#8230;<br />
अ ने साड़ी पहनी, सूटकेस उठाया, स भी जागकर अपने कमरे से आ गया, और वे दोनों दरवाज़े की ओर बढ़े जो बाहर सड़क की ओर खुलता था&#8230;<br />
ड्राइवर ने अ के हाथ से सूटकेस ले लिया था, अ को अपने हाथ और खाली-खाली से लगे। वह दहलीज़ के पास अटक-सी गई, फिर जल्दी से अन्दर गई और बैठक में सोई हुई माँ को खाली हाथों से प्रणाम करके बाहर आ गई&#8230;<br />
फिर एयरपोर्ट वाली सड़क शुरु हो गई, खत्म होने को भी आ गई, पर स भी चुप था, अ भी&#8230;</p>
<p>अचानक स ने कहा -”तुम कुछ कहने जा रही थीं?”<br />
“नहीं।”<br />
और वह फिर चुप हो गया।<br />
फिर अ को लगा &#8211; शायद स को भी &#8211; कि बहुत-कुछ कहने को था, बहुत-कुछ सुनने को, पर बहुत देर हो गई थी, और अब सब शब्द ज़मीन में गड़ गए थे &#8211; पाम के पेड़ बन गए थे और मन के समुद्र के पास लगे हुए उन पेड़ों के पत्ते शायद तब तक काँपते रहेंगे जब तक हवा चलती रहेगी..<br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>एयरपोर्ट आ गया और पाँवों के नीचे स के शहर की सड़क टूट गई&#8230;.।</strong></span></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/story-of-amrita-pritam-yah-kahani-nahi/10961/">यह कहानी नहीं: अमृता प्रीतम</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>चली कहानीः धर्मवीर भारती की &#8220;गुलकी बन्नो&#8221;</title>
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		<pubDate>Thu, 21 Oct 2021 03:40:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Art and Literature]]></category>
		<category><![CDATA[Cover Stories]]></category>
		<category><![CDATA[Chali Kahani]]></category>
		<category><![CDATA[Dharamveer Bharti]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>‘‘ऐ मर कलमुँहे !’ अकस्मात् घेघा बुआ ने कूड़ा फेंकने के लिए दरवाजा खोला और चौतरे पर बैठे मिरवा को गाते हुए देखकर कहा, ‘‘तोरे पेट में फोनोगिराफ उलियान बा का, जौन भिनसार भवा कि तान तोड़ै लाग ? राम जानै, रात के कैसन एकरा दीदा लागत है !’’ मारे डर के कि कहीं घेघा &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/story-of-dharamveer-bharti-gulki-banno/10945/">चली कहानीः धर्मवीर भारती की &#8220;गुलकी बन्नो&#8221;</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
		<div class="clearfix"></div>
		<div class="about-author about-author-box container-wrapper">
			<div class="author-avatar">
				<img loading="lazy" decoding="async" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/bharati.jpg" alt="धर्मवीर भारती " class="author-avatar-img" width="111" height="111" />
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			<div class="author-info">
				<h4>धर्मवीर भारती </h4><strong><span style="color: #ff0000;">धर्मवीर भारती (२५ दिसंबर, १९२६- ४ सितंबर, १९९७) आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रमुख लेखक, कवि, नाटककार और सामाजिक विचारक थे। उनका जन्म इलाहाबाद के अतर सुइया मुहल्ले में हुआ। उनके पिता का नाम श्री चिरंजीव लाल वर्मा और माँ का श्रीमती चंदादेवी था। उन्होंने अध्यापन और पत्रकारिता क्षेत्र में कार्य किया । उनकी प्रमुख कृतियां हैं: काव्य रचनाएं : ठंडा लोहा, सात गीत-वर्ष, कनुप्रिया, सपना अभी भी, आद्यन्त, मेरी वाणी गैरिक वसना, कुछ लम्बी कविताएँ; कहानी संग्रह : मुर्दों का गाँव, स्वर्ग और पृथ्वी, चाँद और टूटे हुए लोग, बंद गली का आखिरी मकान, साँस की कलम से (समस्त कहानियाँ एक साथ) ; उपन्यास: गुनाहों का देवता, सूरज का सातवां घोड़ा, ग्यारह सपनों का देश, प्रारंभ व समापन; निबंध : ठेले पर हिमालय, पश्यंती; पद्य नाटक : अंधा युग; आलोचना : प्रगतिवाद : एक समीक्षा, मानव मूल्य और साहित्य</span></strong>। 
			</div>
		</div>
	
<p>‘‘<span style="color: #ff0000;"><strong>ऐ मर कलमुँहे</strong></span> !’ अकस्मात् घेघा बुआ ने कूड़ा फेंकने के लिए दरवाजा खोला और चौतरे पर बैठे मिरवा को गाते हुए देखकर कहा, ‘‘तोरे पेट में फोनोगिराफ उलियान बा का, जौन भिनसार भवा कि तान तोड़ै लाग ? राम जानै, रात के कैसन एकरा दीदा लागत है !’’ मारे डर के कि कहीं घेघा बुआ सारा कूड़ा उसी के सर पर न फेक दें, मिरवा थोड़ा खिसक गया और ज्यों ही घेघा बुआ अन्दर गयीं कि फिर चौतरे की सीढ़ी पर बैठ, पैर झुलाते हुए उसने उल्टा-सुल्टा गाना शुरू कर किया, ‘‘तुमें बछ याद कलते अम छनम तेरी कछम !’’ मिरवा की आवाज़ सुनकर जाने कहाँ से झबरी कुतिया भी कान-पूँछ झटकारते आ गयी और नीचे सड़क पर बैठकर मिरवा का गाना बिलकुल उसी अन्दाज़ में सुनने लगी जैसे हिज़ मास्टर्स वॉयस के रिकार्ड पर तसवीर बनी होती है।<br />
अभी सारी गली में सन्नाटा था। सबसे पहले मिरवा (असली नाम मिहिरलाल) जागता था और आँख मलते-मलते घेघा बुआ के चौतरे पर आ बैठता था। उसके बाद झबरी कुतिया, फिर मिरवा की छोटी बहन मटकी और उसके बाद एक-एक कर गली के तमाम बच्चे-खोंचेवाली का लड़का मेवा, ड्राइवर साहब की लड़की निरमल, मनीजर साहब के मुन्ना बाबू-सभी आ जुटते थे। जबसे गुलकी ने घेघा बुआ के चौतरे पर तरकारियों की दुकान रखी थी तब से यह जमावड़ा वहाँ होने लगा था। उसके पहले बच्चे हकीमजी के चौतरे पर खेलते थे। धूप निकलते गुलकी सट्टी से तरकारियाँ ख़रीदकर अपनी कुबड़ी पीठ पर लादे, डण्डा टेकती आती और अपनी दुकान फैला देती। मूली, नीबू, कद्दू, लौकी, घिया-बण्डा, कभी-कभी सस्ते फल ! मिरवा और मटकी जानकी उस्ताद के बच्चे थे जो एक भंयकर रोग में गल-गलकर मरे थे और दोनों बच्चे भी विकलांग, विक्षिप्त और रोगग्रस्त पैदा हुए थे। सिवा झबरी कुतिया के और कोई उनके पास नहीं बैठता था और सिवा गुलकी के कोई उन्हें अपनी देहरी या दुकान पर चढ़ने नहीं देता था।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">आज</span></strong> भी गुलकी को आते देखकर पहले मिरवा गाना छोड़कर, ‘‘छलाम गुलकी !’’ और मटकी अपने बढ़ी हुई तिल्लीवाले पेट पर से खिसकता हुआ जाँघिया सँभालते हुए बोली, ‘‘एक ठो मूली दै देव ! ए गुलकी !’’ गुलकी पता नहीं किस बात से खीजी हुई थी कि उसने मटकी को झिड़क दिया और अपनी दुकान लगाने लगी। झबरी भी पास गयी कि गुलकी ने डण्ड उठाया। दुकान लगाकर वह अपनी कुबड़ी पीठ दुहराकर बैठ गयी और जाने किसे बुड़बुड़ाकर गालियाँ देने लगी। मटकी एक क्षण चुपचाप रही फिर उसने रट लगाना शुरू किया, ‘‘एक मूली ! एक गुलकी !&#8230;एक’’ गुलकी ने फिर झिड़का तो चुप हो गयी और अलग हटकर लोलुप नेत्रों से सफेद धुली हुई मूलियों को देखने लगी। इस बार वह बोली नहीं। चुपचाप उन मूलियों की ओर हाथ बढ़ाया ही था कि गुलकी चीख़ी, ‘‘हाथ हटाओ। छूना मत। कोढ़िन कहीं की ! कहीं खाने-पीने की चीज देखी तो जोंक की तरह चिपक गयी, चल इधर !’’ मटकी पहले तो पीछे हटी पर फिर उसकी तृष्णा ऐसी अदम्य हो गयी कि उसने हाथ बढ़ाकर एक मूली खींच ली। गुलकी का मुँह तमतमा उठा और उसने बाँस की खपच्ची उठाकर उसके हाथ पर चट से दे मारी ! मूली नीचे गिरी और हाय ! हाय ! हाय !’’ कर दोनों हाथ झटकती हुई मटकी पाँव पटकपटक कर रोने लगी। ‘‘जावो अपने घर रोवो। हमारी दुकान पर मरने को गली-भर के बच्चे हैं-’’ गुलकी चीख़ी ! ‘‘दुकान दैके हम बिपता मोल लै लिया। छन-भर पूजा-भजन में भी कचरघाँव मची रहती है !’’ अन्दर से घेघा बुआ ने स्वर मिलाया। ख़ासा हंगामा मच गया कि इतने में झबरी भी खड़ी हो गयी और लगी उदात्त स्वर में भूँकने। ‘लेफ्ट राइट ! लेफ्ट राइट !’ चौराहे पर तीन-चार बच्चों का जूलूस चला आ रहा था। आगे-आगे दर्जा ‘ब’ में पढ़नेवाले मुन्ना बाबू नीम की सण्टी को झण्डे की तरह थामे जलूस का नेतृत्व कर रहे थे, पीछे थे मेवा और निरमल। जलूस आकर दूकान के सामने रूक गया। गुलकी सतर्क हो गयी। दुश्मन की ताक़त बढ़ गयी थी।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>मटकी</strong></span> खिसकते-खिसकते बोली, ‘‘हमके गुलकी मारिस है। हाय ! हाय ! हमके नरिया में ढकेल दिहिस। अरे बाप रे !’’ निरमल, मेवा, मुन्ना, सब पास आकर उसकी चोट देखने लगे। फिर मुन्ना ने ढकेलकर सबको पीछे हटा दिया और सण्टी लेकर तनकर खड़े हो गये। ‘‘किसने मारा है इसे !’’<br />
‘‘हम मारा है !’’ कुबड़ी गुलकी ने बड़े कष्ट से खड़े होकर कहा, ‘‘का करोगे ? हमें मारोगे !’’ मारोगे !’’ मारेंगे क्यों नहीं ?’’ मुन्ना बाबू ने अकड़कर कहा। गुलकी इसका कुछ जवाब देती कि बच्चे पास घिर आये। मटकी ने जीभ निकालकर मुँह बिराया, मेवा ने पीछे जाकर कहा, ‘‘ए कुबड़ी, ए कुबड़ी, अपना कूबड़ दिखाओ !’’ और एक मुट्ठी धूल उसकी पीठ पर छोड़कर भागा। गुलकी का मुँह तमतमा आया और रूँधे गले से कराहते हुए उसने पता नहीं क्या कहा। किन्तु उसके चेहरे पर भय की छाया बहुत गहरी हो रही थी। बच्चे सब एक-एक मुट्ठी धूल लेकर शोर मचाते हुए दौड़े कि अकस्मात् घेघा बुआ का स्वर सुनाई पड़ा, ‘‘ए मुन्ना बाबू, जात हौ कि अबहिन बहिनजी का बुलवाय के दुई-चार कनेठी दिलवायी !’’ ‘‘जाते तो हैं !’’ मुन्ना ने अकड़ते हुए कहा, ‘‘ए मिरवा, बिगुल बजाओ।’’ मिरवा ने दोनों हाथ मुँह पर रखकर कहा, ‘‘धुतु-धुतु-धू।’’ जलूस आगे चल पड़ा और कप्तान ने नारा लगाया:<br />
अपने देस में अपना राज !<br />
गुलकी की दुकान बाईकाट !</p>
<p>नारा लगाते हुए जलूस गली में मुड़ गया। कुबड़ी ने आँसू पोंछे, तरकारी पर से धूल झाड़ी और साग पर पानी के छींटे देने लगी।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">गुलकी</span></strong> की उम्र ज़्यादा नहीं थी। यही हद-से-हद पच्चीस-छब्बीस। पर चेहरे पर झुर्रियाँ आने लगी थीं और कमर के पास से वह इस तरह दोहरी हो गयी थी जैसे अस्सी वर्ष की बुढ़िया हो। बच्चों ने जब पहली बार उसे मुहल्ले में देखा तो उन्हें ताजुज्ब भी हुआ और थोड़ा भय भी। कहाँ से आयी ? कैसे आ गयी ? पहले कहाँ थी ? इसका उन्हें कुछ अनुमान नहीं था ? निरमल ने ज़रूर अपनी माँ को उसके पिता ड्राइवर से रात को कहते हुए सुना, ‘‘यह मुसीबत और खड़ी हो गयी। मरद ने निकाल दिया तो हम थोड़े ही यह ढोल गले बाँधेंगे। बाप अलग हम लोगों का रुपया खा गया। सुना चल बसा तो डरी कि कहीं मकान हम लोग न दखल कर लें और मरद को छोड़कर चली आयी। खबरदार जो चाभी दी तुमने !’’ ‘‘क्या छोटेपन की बात करती हो ! रूपया उसके बाप ने ले लिया तो क्या हम उसका मकान मार लेंगे ? चाभी हमने दे दी है। दस-पाँच दिन का नाज-पानी भेज दो उसके यहाँ।’’<br />
‘‘हाँ-हाँ, सारा घर उठा के भेज देव। सुन रही हो घेघा बुआ !’’<br />
‘‘तो का भवा बहू, अरे निरमल के बाबू से तो एकरे बाप की दाँत काटी रही।’’ घेघा बुआ की आवाज़ आयी-‘‘बेचारी बाप की अकेली सन्तान रही। एही के बियाह में मटियामेट हुई गवा। पर ऐसे कसाई के हाथ में दिहिस की पाँचै बरस में कूबड़ निकल आवा।’’<br />
‘‘साला यहाँ आवे तो हण्टर से ख़बर लूँ मैं।’’ ड्राइवर साहब बोले, ‘‘पाँच बरस बाद बाल-बच्चा हुआ। अब मरा हुआ बच्चा पैदा हुआ तो उसमें इसका क्या कसूर ! साले ने सीढ़ी से ढकेल दिया। जिन्दगी-भर के लिए हड्डी खराब हो गयी न ! अब कैसे गुजारा हो उसका ?’’<br />
‘‘बेटवा एको दुकान खुलवाय देव। हमरा चौतरा खाली पड़ा है। यही रूपया दुइ रूपया किराया दै देवा करै, दिन-भर अपना सौदा लगाय ले। हम का मना करित है ? एत्ता बड़ा चौतरा मुहल्लेवालन के काम न आयी तो का हम छाती पर धै लै जाब ! पर हाँ, मुला रुपया दै देव करै।’’</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">दूसरे</span></strong> दिन यह सनसनीख़ेज ख़बर बच्चों में फैल गयी। वैसे तो हकीमजी का चबूतरा पड़ा था, पर वह कच्चा था, उस पर छाजन नहीं थी। बुआ का चौतरा लम्बा था, उस पर पत्थर जुड़े थे। लकड़ी के खम्भे थे। उस पर टीन छायी थी। कई खेलों की सुविधा थी। खम्भों के पीछे किल-किल काँटे की लकीरें खींची जा सकती थीं। एक टाँग से उचक-उचककर बच्चे चिबिड्डी खेल सकते थे। पत्थर पर लकड़ी का पीढ़ा रखकर नीचे से मुड़ा हुआ तार घुमाकर रेलगाड़ी चला सकते थे। जब गुलकी ने अपनी दुकान के लिए चबूतरों के खम्भों में बाँस-बाँधे तो बच्चों को लगा कि उनके साम्राज्य में किसी अज्ञात शत्रु ने आकर क़िलेबन्दी कर ली है। वे सहमे हुए दूर से कुबड़ी गुलकी को देखा करते थे। निरमल ही उसकी एकमात्र संवाददाता थी और निरमल का एकमात्र विश्वस्त सूत्र था उसकी माँ। उससे जो सुना था उसके आधार पर निरमल ने सबको बताया था कि यह चोर है। इसका बाप सौ रूपया चुराकर भाग गया। यह भी उसके घर का सारा रूपया चुराने आयी है। ‘‘रूपया चुरायेगी तो यह भी मर जाएगी।’’ मुन्ना ने कहा, ‘‘भगवान सबको दण्ड देता है।’’ निरमल बोली ‘‘ससुराल में भी रूपया चुराये होगी।’’ मेवा बोला ‘‘अरे कूबड़ थोड़े है ! ओही रूपया बाँधे है पीठ पर। मनसेधू का रूपया है।’’ ‘‘सचमुच ?’’ निरमल ने अविश्वास से कहा। ‘‘और नहीं क्या कूबड़ थोड़ी है। है तो दिखावै।’’ मुन्ना द्वारा उत्साहित होकर मेवा पूछने ही जा रहा था कि देखा साबुनवाली सत्ती खड़ी बात कर रही है गुलकी से-कह रही थी, ‘‘अच्छा किया तुमने ! मेहनत से दुकान करो। अब कभी थूकने भी न जाना उसके यहाँ। हरामजादा, दूसरी औरत कर ले, चाहे दस और कर ले। सबका खून उसी के मत्थे चढ़ेगा। यहाँ कभी आवे तो कहलाना मुझसे। इसी चाकू से दोनों आँखें निकाल लूँगी !’’<br />
बच्चे डरकर पीछे हट गये। चलते-चलते सत्ती बोली, ‘‘कभी रूपये-पैसे की जरूरत हो तो बताना बहिना !’’</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">कुछ</span></strong> दिन बच्चे डरे रहे। पर अकस्मात् उन्हें यह सूझा कि सत्ती को यह कुबड़ी डराने के लिए बुलाती है। इसने उसके गु़स्से में आग में घी का काम किया। पर कर क्या सकते थे। अन्त में उन्होंने एक तरीक़ा ईजाद किया। वे एक बुढ़िया का खेल खेलते थे। उसको उन्होंने संशोधित किया। मटकी को लैमन जूस देने का लालच देकर कुबड़ी बनाया गया। वह उसी तरह पीठ दोहरी करके चलने लगी। बच्चों ने सवाल जवाब शुरू कियेः<br />
‘‘कुबड़ी-कुबड़ी का हेराना ?’’<br />
‘‘सुई हिरानी।’’<br />
‘‘सुई लैके का करबे’’<br />
‘‘कन्था सीबै! ’’<br />
‘‘कन्था सी के का करबे ?’’<br />
‘‘लकड़ी लाबै !’’<br />
‘‘लकड़ी लाय के का करबे ?’’<br />
‘‘भात पकइबे! ’’<br />
‘‘भात पकाये के का करबै ?’’<br />
‘‘भात खाबै !’’<br />
‘‘भात के बदले लात खाबै।’’<br />
और इसके पहले कि कुबड़ी बनी हुई मटकी कुछ कह सके, वे उसे जोर से लात मारते और मटकी मुँह के बल गिर पड़ती, उसकी कोहनिया और घुटने छिल जाते, आँख में आँसू आ जाते और ओठ दबाकर वह रूलाई रोकती। बच्चे खुशी से चिल्लाते, ‘‘मार डाला कुबड़ी को । मार डाला कुबड़ी को।’’ गुलकी यह सब देखती और मुँह फेर लेती।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">एक</span></strong> दिन जब इसी प्रकार मटकी को कुबड़ी बनाकर गुलकी की दुकान के सामने ले गये तो इसके पहले कि मटकी जबाव दे, उन्होंने ने अनचिते में इतनी ज़ोर से ढकेल दिया कि वह कुहनी भी न टेक सकी और सीधे मुँह के बल गिरी। नाक, होंठ और भौंह ख़ून से लथपथ हो गये। वह ‘‘हाय ! हाय !’’ कर इस बुरी तरह चीख़ी कि लड़के कुबड़ी मर गयी चिल्लाते हुए सहम गये और हतप्रभ हो गये। अकस्मात् उन्होंने देखा की गुलकी उठी । वे जान छोड़ भागे। पर गुलकी उठकर आयी, मटकी को गोद में लेकर पानी से उसका मुँह धोने लगी और धोती से खून पोंछने लगी। बच्चों ने पता नहीं क्या समझा कि वह मटकी को मार रही है, या क्या कर रही है कि वे अकस्मात् उस पर टूट पड़े। गुलकी की चीख़े सुनकर मुहल्ले के लोग आये तो उन्होंने देखा कि गुलकी के बाल बिखरे हैं और दाँत से ख़ून बह रहा है, अधउघारी चबूतरे से नीचे पड़ी है, और सारी तरकारी सड़क पर बिखरी है। घेघा बुआ ने उसे उठाया, धोती ठीक की और बिगड़कर बोलीं, ‘‘औकात रत्ती-भर नै, और तेहा पौवा-भर। आपन बखत देख कर चुप नै रहा जात। कहे लड़कन के मुँह लगत हो ?’’ लोगों ने पूछ तो कुछ नहीं बोली। जैसे उसे पाला मार गया हो। उसने चुपचाप अपनी दुकान ठीक की और दाँत से खू़न पोंछा, कुल्ला किया और बैठ गयी।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">उसके</span></strong> बाद अपने उस कृत्य से बच्चे जैसे खु़द सहम गये थे। बहुत दिन तक वे शान्त रहे। आज जब मेवा ने उसकी पीठ पर धूल फेंकी तो जैसे उसे खू़न चढ़ गया पर फिर न जाने वह क्या सोचकर चुप रह गयी और जब नारा लगाते जूलूस गली में मुड़ गया तो उसने आँसू पोंछे, पीठ पर से धूल झाड़ी और साग पर पानी छिड़कने लगी। लड़के का हैं गल्ली के राक्षस हैं !’’ घेघा बुआ बोलीं। ‘‘अरे उन्हें काहै कहो बुआ ! हमारा भाग भी खोटा है !’’ गुलकी ने गहरी साँस लेकर कहा&#8230;.।<br />
इस बार जो झड़ी लगी तो पाँच दिन तक लगातार सूरज के दर्शन नहीं हुए। बच्चे सब घर में क़ैद थे और गुलकी कभी दुकान लगाती थी, कभी नहीं, राम-राम करके तीसरे पहर झड़ी बन्द हुई। बच्चे हकीमजी के चौतरे पर जमा हो गये। मेवा बिलबोटी बीन लाया था और निरमल ने टपकी हुई निमकौड़ियाँ बीनकर दुकान लगा ली थी और गुलकी की तरह आवाज़ लगा रही थी, ‘‘ले खीरा, आलू, मूली, घिया, बण्डा !’’ थोड़ी देर में क़ाफी शिशु-ग्राहक दुकान पर जुट गये। अकस्मात् शोरगुल से चीरता हुआ बुआ के चौतरे से गीत का स्वर उठा बच्चों ने घूम कर देखा मिरवा और मटकी गुलकी की दुकान पर बैठे हैं। मटकी खीरा खा रही है और मिरवा झबरी का सर अपनी गोद में रखे बिलकुल उसकी आँखों में आँखें डालकर गा रहा है।<br />
तुरन्त मेवा गया और पता लगाकर लाया कि गुलकी ने दोनों को एक –एक अधन्ना दिया है दोनों मिलकर झबरी कुतिया के कीड़े निकाल रहे हैं। चौतरे पर हलचल मच गयी और मुन्ना ने कहा, ‘‘निरमल ! मिरवा-मटकी को एक भी निमकौड़ी मत देना। रहें उसी कुबड़ी के पास !’’ ‘‘हाँ जी !’’ निरमल ने आँख चमकाकर गोल मुंह करके कहा, ‘‘हमार अम्माँ कहत रहीं उन्हें छुयो न ! न साथ खायो, न खेलो। उन्हें बड़ी बुरी बीमारी है। आक थू !’’ मुन्ना ने उनकी ओर देखकर उबकायी जैसा मुँह बनाकर थूक दिया।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">गुलकी</span></strong> बैठी-बैठी सब समझ रही थी और जैसे इस निरर्थक घृणा में उसे कुछ रस-सा आने लगा था। उसने मिरवा से कहा, ‘‘तुम दोनों मिल के गाओ तो एक अधन्ना दें। खूब जोर से !’’ भाई-बहन दोनों ने गाना शुरू किया-माल कताली मल जाना, पल अकियाँ किछी से&#8230;’’ अकस्मात् पटाक से दरवाजा खुला और एक लोटा पानी दोनों के ऊपर फेंकती हुई घेघा बुआ गरजीं, दूर कलमुँहे। अबहिन बितौ-भर के नाहीं ना और पतुरियन के गाना गाबै लगे। न बहन का ख्याल, न बिटिया का। और ए कुबड़ी, हम तुहूँ से कहे देइत है कि हम चकलाखाना खोलै के बरे अपना चौतरा नहीं दिया रहा। हुँह ! चली हुँआ से मुजरा करावै।’’<br />
गुलकी ने पानी उधर छिटकाते हुए कहा, ‘‘बुआ बच्चे हैं। गा रहे हैं। कौन कसूर हो गया।’’<br />
‘‘ऐ हाँ ! बच्चे हैं। तुहूँ तो दूध पियत बच्ची हौ। कह दिया कि जबान न लड़ायों हमसे, हाँ ! हम बहुतै बुरी हैं। एक तो पाँच महीने से किराया नाहीं दियो और हियाँ दुनियाँ-भर के अन्धे-कोढ़ी बटुरे रहत हैं। चलौ उठायो अपनी दुकान हियाँ से। कल से न देखी हियाँ तुम्हें राम ! राम ! सब अघर्म की सन्तान राच्छस पैदा भये हैं मुहल्ले में ! धरतियौ नहीं फाटत कि मर बिलाय जाँय।’’<br />
गुलकी सन्न रह गयी। उसने किराया सचमुच पाँच महीने से नहीं दिया था। ब्रिक्री नहीं थी। मुहल्ले में उनसे कोई कुछ लेता ही नहीं था, पर इसके लिए बुआ निकाल देगी यह उसे कभी आशा नहीं थी। वैसे भी महीने में बीस दिन वह भूखी सोती थी। धोती में दस-दस पैबन्द थे। मकान गिर चुका था एक दालान में वह थेड़ी-सी जगह में सो जाती थी। पर दुकान तो वहाँ रखी नहीं जा सकती। उसने चाहा कि वह बुआ के पैर पकड़ ले, मिन्नत कर ले। पर बुआ ने जितनी जोर से दरवाजा खोला था उतनी ही जोर से बन्द कर दिया। जब से चौमास आया था, पुरवाई बही थी, उसकी पीठ में भयानक पीड़ा उठती थी। उसके पाँव काँपते थे। सट्टी में उस पर उधार बुरी तरह चढ़ गया था। पर अब होगा क्या ? वह मारे खीज के रोने लगी।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">इतने</span></strong> में कुछ खटपट हुई और उसने घुटनों से मुँह उठाकर देखा कि मौका पाकर मटकी ने एक फूट निकाल लिया है और मरभुखी की तरह उसे हबर-हबर खाती जा रही थी है, एक क्षण वह उसके फूलते-पचकते पेट को देखती रही, फिर ख्याल आते ही कि फूट पूरे दस पैसे का है, वह उबल पड़ी और सड़ासड़ तीन-चार खपच्ची मारते हुए बोली, ‘‘चोट्टी ! कुतिया ! तोरे बदन में कीड़ा पड़ें !’’ मटकी के हाथ से फूट गिर पड़ा पर वह नाली में से फूट के टुकड़े उठाते हुए भागी। न रोयी, न चीख़ी, क्योंकि मुँह में भी फूट भरा था। मिरवा हक्का-बक्का इस घटना को देख रहा था कि गुलकी उसी पर बरस पड़ी। सड़-सड़ उसने मिरवा को मारना शुरू किया, ‘‘भाग, यहाँ से हरामजादे !’’ मिरवा दर्द से तिलमिला उठा, ‘‘हमला पइछा देव तो जाई।’’ ‘‘देत हैं पैसा, ठहर तो।’’ सड़ ! सड़।&#8230; रोता हुआ। मिरवा चौतरे की ओर भागा।</p>
<p>निरमल की दुकान पर सन्नाटा छाया हुआ था। सब चुप उसी ओर देख रहे थे। मिरवा ने आकर कुबड़ी की शिकायत मुन्ना से की। और घूमकर बोला, ‘‘मेवा बता तो इसे !’ मेवा पहले हिचकिचाया, फिर बड़ी मुलायमियत से बोला, ‘‘मिरवा तुम्हें बीमारी हुई है न ! तो हम लोग तुम्हें नहीं छुएँगे । साथ नहीं खिलाएँगें तुम उधर बैठ जाओ।’’<br />
‘‘हम बीमाल हैं मुन्ना ?’’<br />
मुन्ना कुछ पिघला, ‘‘हाँ, हमें छूओ मत। निमकौड़ी खरीदना हो तो उधर बैठ जाओ हम दूर से फेंक देंगे। समझे !’’ मिरवा समझ गया सर हिलाया और अलग जाकर बैठ गया। मेवा ने निमकौड़ी उसके पास रख दी और चोट भूलकर पकी निमकौड़ी का बीजा निकाल कर छीलने लगा। इतने में उधर से घेघा बुआ की आवाज आयी, ‘‘ऐ मुन्ना !’’ तई तू लोग परे हो जाओ ! अबहिन पानी गिरी ऊपर से !’’ बच्चो ने ऊपर देखा। तिछत्ते पर घेघा बुआ मारे पानी के छप-छप करती घूम रही थीं। कूड़े से तिछत्ते की नाली बन्द थी और पानी भरा था। जिधर बुआ खड़ी थीं उसके ठीक नीचे गुलकी का सौदा था। बच्चे वहाँ से दूर थे पर गुलकी को सुनने के लिए बात बच्चों से कही गयी थी। गुलकी कराहती हुई उठी। कूबड़ की वजह से वह तनकर चिछत्ते की ओर देख भी नहीं सकती थी। उसने धरती की ओर देखा ऊपर बुआ से कहा, ‘‘इधर की नाली काहे खोल रही हो ? उधर की खोलो न !’’<br />
‘‘काहे उधर की खोली ! उधर हमारा चौका है कि नै !’’<br />
‘‘इधर हमारा सौदा लगा है।’’<br />
‘‘<span style="color: #ff0000;"><strong>ऐ है</strong> </span>!’’ बुआ हाथ चमका कर बोलीं, सौदा लगा है रानी साहब का ! किराया देय की दायीं हियाव फाटत है और टर्राय के दायीं नटई में गामा पहिलवान का जोर तो देखो ! सौदा लगा है तो हम का करी। नारी तो इहै खुली है !’’<br />
‘‘खोलो तो देखैं !’’ अकस्मात् गुलकी ने तड़प कर कहा। आज तक किसी ने उसका वह स्वर नहीं सुना था-‘‘पाँच महीने का दस रूपया नहीं दिया बेशक, पर हमारे घर की धन्नी निकाल के बसन्तू के हाथ किसने बेचा ? तुमने। पच्छिम ओर का दरवाजा चिरवा के किसने जलवाया ? तुमने। हम गरीब हैं। हमारा बाप नहीं है सारा मुहल्ला हमें मिल के मार डालो।’’<br />
‘‘हमें चोरी लगाती है। अरे कल की पैदा हुई।’’ बुआ मारे ग़ुस्से के खड़ी बोली बोलने लगी थीं।</p>
<p>बच्चे चुप खड़े थे। वे कुछ-कुछ सहमे हुए थे। कुबड़ी का यह रूप उन्होंने कभी न देखा न सोचा था<br />
‘‘हाँ ! हाँ ! हाँ। तुमने, ड्राइवर चाचा से, चाची ने सबने मिलके हमारा मकान उजाड़ा है। अब हमारी दुकान बहाय देव। देखेंगे हम भी। निरबल के भी भगवान हैं !’’<br />
‘‘ले ! ले ! ले ! भगवान हैं तो ले !’’ और बुआ ने पागलों की तरह दौड़कर नाली में जमा कूड़ा लकड़ी से ठेल दिया। छह इंच मोटी गन्दे पानी की धार धड़-धड़ करती हुई उसकी दुकान पर गिरने लगी। तरोइयाँ पहले नाली में गिरीं, फिर मूली, खीरे, साग, अदरक उछल-उछलकर दूर जा गिरे। गुलकी आँख फाड़े पागल-सी देखती रही और फिर दीवार पर सर पटककर हृदय-विदारक स्वर में डकराकर रो पड़ी, ‘‘अरे मोर बाबू, हमें कहाँ छोड़ गये ! अरे मोरी माई, पैदा होते ही हमें क्यों नहीं मार डाला ! अरे धरती मैया, हमें काहे नहीं लील लेती !’’<br />
सर खोले बाल बिखेरे छाती कूट-कूटकर वह रो रही थी और तिछत्ते का पिछले पहले नौ दिन का जमा पानी धड़-धड़ गिर रहा था।<br />
बच्चे चुप खड़े थे। अब तक जो हो रहा था, उनकी समझ में आ रहा था। पर आज यह क्या हो गया, यह उनकी समझ में नहीं आ सका । पर वे कुछ बोले नहीं। सिर्फ मटकी उधर गयी और नाली में बहता हुआ हरा खीरा निकालने लगी कि मुन्ना ने डाँटा, ‘‘खबरदार ! जो कुछ चुराया।’’ मटकी पीछे हट गयी। वे सब किसी अप्रत्याशित भय संवेदना या आशंका से जुड़-बटुरकर खड़े हो गये। सिर्फ़ मिरवा अलग सर झुकाये खड़ा था। झींसी फिर पड़ने लगी थी और वे एक-एक कर अपने घर चले गये।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">दूसरे</span></strong> दिन चौतरा ख़ाली थी। दुकान का बाँस उखड़वाकर बुआ ने नाँद में गाड़कर उस पर तुरई की लतर चढ़ा दी थी। उस दिन बच्चे आये पर उनकी हिम्मत चौतरे पर जाने की नहीं हुई। जैसे वहाँ कोई मर गया हो। बिलकुल सुनसान चौतरा था और फिर तो ऐसी झड़ी लगी कि बच्चों का निकलना बन्द। चौथे या पाँचवें दिन रात को भयानक वर्षा तो हो ही रही थी, पर बादल भी ऐसे गरज रहे थे कि मुन्ना अपनी खाट से उठकर अपनी माँ के पास घुस गया। बिजली चमकते ही जैसे कमरा रोशनी से नाच-नाच उठता था छत पर बूदों की पटर-पटर कुछ धीमी हुई, थोड़ी हवा भी चली और पेड़ों का हरहर सुनाई पड़ा कि इतने में धड़-धड़-धड़-धड़ाम ! भयानक आवाज़ हुई। माँ भी चौंक पड़ी। पर उठी नहीं। मुन्ना आँखें खोले अँधेरें में ताकने लगा। सहसा लगा मुहल्ले में कुछ लोग बातचीत कर रहे हैं घेघा बुआ की आवाज़ सुनाई पड़ी-‘‘किसका मकान गिर गया है रे’’ ‘‘गुलकी का !’’-किसी का दूरागत उत्तर आया। ‘‘अरे बाप रे ! दब गयी क्या ?’’ ‘‘नहीं, आज तो मेवा की माँ के यहाँ सोई है ! मुन्ना लेटा था और उसके ऊपर अँधेरे में यह सवाल-जवाब इधर-से-उधर और उधर-से-इधर आ रहे थे। वह फिर काँप उठा, माँ के पास घुस गया और सोते-सोते उसने साफ़ सुना-कुबड़ी फिर उसी तरह रो रही है, गला फाड़कर रो रही है ! कौन जाने मुन्ना के ही आँगन में बैठकर रो रही हो ! नींद में वह स्वर कभी दूर कभी पास आता हुआ लग रहा है जैसे कुबड़ी मुहल्ले के हर आँगन में जाकर रो रही है पर कोई सुन नहीं रहा है, सिवा मुन्ना के।<br />
बच्चों के मन में कोई बात इतनी गहरी लकीर बनाती कि उधर से उनका ध्यान हटे ही नहीं। सामने गुलकी थी तो वह एक समस्या थी, पर उसकी दुकान हट गयी, फिर वह जाकर साबुन वाली सत्ती के गलियारे में सोने लगी और दो-चार घरों से माँग-मूँगकर खाने लगी, उस गली में दिखती ही नहीं थी। बच्चे भी दूसरे कामों में व्यस्त हो गये। अब जाड़े आ रहे थे। उनका जमावड़ा सुबह न होकर तीसरे पहर होता था। जमा होने के बाद जूलूस निकलता था। और जिस जोशीले नारे से गली गूँज उठती थी वह था-‘घेघा बुआ को वोट दो।’’ पिछले दिनों म्युनिसिपैलिटी का चुनाव हुआ था और उसी में बच्चों ने यह नारा सीखा था। वैसे कभी-कभी बच्चों में दो पार्टियाँ भी होती थीं, पर दोनों को घेघा बुआ से अच्छा उम्मीदवार कोई नहीं मिलता था अतः दोनों गला फाड़-फाड़कर उनके ही लिए बोट माँगती थीं।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">उस</span></strong> दिन जब घेघा बुआ के धैर्य का बाँध टूट गया और नयी-नयी गालियों से विभूषित अपनी पहली इलेक्शन स्पीच देने ज्यों ही चौतरे पर अवतरित हुईं कि उन्हें डाकिया आता हुआ दिखाई पड़ा। वह अचकचाकर रूक गयीं। डाकिये के हाथ में एक पोस कार्ड था और वह गुलकी को ढूँढ़ रहा था। बुआ ने लपक कर पोस्टकार्ड लिया, एक साँस में पढ़ गयीं। उनकी आँखें मारे अचरज के फैल गयीं, और डाकिये को यह बताकर कि गुलकी सत्ती साबुनवाली के ओसारे में रहती है, वे झट से दौड़ी-दौड़ी निरमल की माँ ड्राइवर की पत्नी के यहाँ गयीं। बड़ी देर तक दोनों में सलाह-मशविरा होता रहा और अन्त में बुआ आयीं और उन्होंने मेवा को भेजा, ‘‘जा गुलकी को बुलाय ला !’’<br />
पर जब मेवा लौटा तो उसके साथ गुलकी नहीं वरन् सत्ती साबुनवाली थी और सदा की भाँति इस समय भी उसकी कमर से वह काले बेंट का चाकू लटक रहा था, जिससे वह साबुन की टिक्की काटकर दुकानदारों को देती थी। उसने आते ही भौं सिकोड़कर बुआ को देखा और कड़े स्वर में बोली, ‘‘क्यों बुलाया है गुलकी को ? तुम्हारा दस रूपये किराया बाकी था, तुमने पन्द्रह रूपये का सौदा उजाड़ दिया ! अब क्या काम है !’’ ‘‘अरे राम ! राम ! कैसा किराया बेटी ! अन्दर जाओ-अन्दर जाओ !’ बुआ के स्वर में असाधारण मुलायमियत थी। सत्ती के अन्दर जाते ही बुआ ने फटाक् से किवाड़ा बन्द कर लिये। बच्चों का कौतूहल बहुत बढ़ गया था। बुआ के चौके में एक झँझरी थी। सब बच्चे वहाँ पहुँचे और आँख लगाकर कनपटियों पर दोनों हथेलियाँ रखकर घण्टीवाला बाइसकोप देखने की मुद्रा में खड़े हो गये।<br />
अन्दर सत्ती गरज रही थी, ‘‘बुलाया है तो बुलाने दो। क्यों जाए गुलकी ? अब बड़ा खयाल आया है। इसलिए की उसकी रखैल को बच्चा हुआ है जो जाके गुलकी झाड़ू-बुहारू करे, खाना बनावे, बच्चा खिलावे, और वह मरद का बच्चा गुलकी की आँख के आगे रखैल के साथ गुलछर्रे उड़ावे !’’</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">निरमल</span></strong> की माँ बोलीं, ‘‘अपनी बिटिया, पर गुजर तो अपने आदमी के साथ करैगी न ! जब उसकी पत्नी आयी है तो गुलकी को जाना चाहिए। और मरद तो मरद। एक रखैल छोड़ दुई-दुई रखैल रख ले तो औरत उसे छोड़ देगी ? राम ! राम !’’<br />
‘‘नहीं, छोड़ नहीं देगी तो जाय कै लात खाएगी ?’’ सत्ती बोली।<br />
‘‘अरे बेटा !’’ बुआ बोलीं, ‘‘भगवान रहें न ? तौन मथुरापुरी में कुब्जा दासी के लात मारिन तो ओकर कूबर सीधा हुइ गवा। पती तो भगवान हैं बिटिया। ओका जाय देव !’’<br />
‘‘हाँ-हाँ, बड़ी हितू न बनिये ! उसके आदमी से आप लोग मुफ्त में गुलकी का मकान झटकना चाहती हैं। मैं सब समझती हूँ।’’<br />
निरमल की माँ का चेहरा ज़र्द पड़ गया। पर बुआ ने ऐसी कच्ची गोली नहीं खेली थी। वे डपटकर बोलीं, ‘‘खबरदार जो कच्ची जबान निकाल्यो ! तुम्हारा चरित्तर कौन नै जानता ! ओही छोकरा मानिक&#8230;’’<br />
जबान खींच लूँगी, ‘‘सत्ती गला फाड़कर चीख़ी जो आगे एक हरूफ़ कहा।’’ और उसका हाथ अपने चाकू पर गया-<br />
‘‘अरे ! अरे ! अरे !’’ बुआ सहमकर दस क़दम पीछे हट गयीं-‘‘तो का खून करबो का, कतल करबो का ?’’ सत्ती जैसे आयी थी वैसे ही चली गयी।<br />
तीसरे दिन बच्चों ने तय किया कि होरी बाबू के कुएँ पर चलकर बर्रें पकड़ी जायें। उन दिनों उनका जहर शान्त रहता है, बच्चे उन्हें पकड़कर उनका छोटा-सा काला डंक निकाल लेते और फिर डोरी में बाँधकर उन्हें उड़ाते हुए घूमते। मेवा, निरमल और मुन्ना एक-एक बर्रे उड़ाते हुए जब गली में पहुँचे तो देखा बुआ के चौतरे पर टीन की कुरसी डाले कोई आदमी बैठा है। उसकी अजब शक्ल थी। कान पर बड़े-बड़े बाल, मिचमिची आँखें, मोछा और तेल से चुचुआते हुए बाल। कमीज और धोती पर पुराना बदरंग बूट। मटकी हाथ फैलाये कह रही है, “एक डबल दै देव! एक दै देव ना?” मुन्ना को देखकर मटकी ताली बजा-बजाकर कहने लगी, “गुलकी का मनसेधू आवा है। ए मुन्ना बाबू! ई कुबड़ी का मनसेधू है।” फिर उधर मुड़कर- “एक डबल दै देव।” तीनों बच्चे कौतूहल में रुक गये। इतने में निरमल की माँ एक गिलास में चाय भरकर लायी और उसे देते-देते निरमल के हाथ में बर्रे देखकर उसे डाँटने लगी। फिर बर्रे छुड़ाकर निरमल को पास बुलाया और बोली, “बेटा, ई हमारी निरमला है। ए निरमल, जीजाजी हैं, हाथ जोड़ो! बेटा, गुलकी हमारी जात-बिरादरी की नहीं है तो का हुआ, हमारे लिए जैसे निरमल वैसे गुलकी। अरे, निरमल के बाबू और गुलकी के बाप की दाँत काटी रही। एक मकान बचा है उनकी चिहारी, और का?&#8221;; एक गहरी साँस लेकर निरमल की माँ ने कहा।<br />
“अरे तो का उन्हें कोई इनकार है?&#8221;; बुआ आ गयी थीं, “अरे सौ रुपये तुम दैवे किये रहय्यू, चलो तीन सौ और दै देव। अपने नाम कराय लेव?”<br />
“पाँच सौ से कम नहीं होगा?” उस आदमी का मुँह खुला, एक वाक्य निकला और मुँह फिर बन्द हो गया।<br />
“भवा! भवा! ऐ बेटा दामाद हौ, पाँच सौ कहबो तो का निरमल की माँ को इनकार है?”<br />
अकस्मात् वह आदमी उठकर खड़ा हो गया। आगे-आगे सत्ती चली आ रही थी | पीछे-पीछे गुलकी। सत्ती चौतरे के नीचे खड़ी हो गयी। बच्चे दूर हट गये। गुलकी ने सिर उठाकर देखा और अचकचाकर सर पर पल्ला डालकर माथे तक खींच लिया। सत्ती दो-एक क्षण उसकी ओर एकटक देखती रही और फिर गरजकर बोली, “यही कसाई है! गुलकी, आगे बढ़कर मार दो चपोटा इसके मुँह पर! खबरदार जो कोई बोला?&#8221;; बुआ चट से देहरी के अन्दर हो गयीं, निरमल की माँ की जैसे घिग्घी बँध गयी और वह आदमी हड़बड़ाकर पीछे हटने लगा।<br />
“बढ़ती क्यों नहीं गुलकी! बड़ा आया वहाँ से बिदा कराने?”<br />
गुलकी आगे बढ़ी ; सब सन्न थे ; सीढ़ी चढ़ी, उस आदमी के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। गुलकी चढ़ते-चढ़ते रुकी, सत्ती की ओर देखा, ठिठकी, अकस्मात् लपकी और फिर उस आदमी के पाँव पर गिर के फफक-फफककर रोने लगी, “हाय! हमें काहे को छोड़ दियौ! तुम्हारे सिवा हमारा लोक-परलोक और कौन है! अरे, हमरे मरै पर कौन चुल्लू भर पानी चढ़ायी।<br />
सत्ती का चेहरा स्याह पड़ गया। उसने बड़ी हिकारत से गुलकी की ओर देखा और गुस्से में थूक निगलते हुए कहा, “कुतिया!&#8221;; और तेजी से चली गयी। निरमल की मां और बुआ गुलकी के सर पर हाथ फेर-फेरकर कह रही थीं, “मत रो बिटिया! मत रो! सीता मैया भी तो बनवास भोगिन रहा। उठो गुलकी बेटा! धोती बदल लेव कंघी चोटी करो। पति के सामने ऐसे आना असगुन होता है। चलो!&#8221;;<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">गुलकी</span></strong> आँसू पोंछती-पोंछती निरमल की माँ के घर चली। बच्चे पीछे-पीछे चले तो बुआ ने डाँटा, “ऐ चलो एहर, हुँआ लड्डू बँट रहा है का?&#8221;;<br />
दूसरे दिन निरमल के बाबू (ड्राइवर साहब), गुलकी और जीजाजी दिन-भर कचहरी में रहे। शाम को लौटे तो निरमल की माँ ने पूछा, “पक्का कागज लिख गया?” “हाँ-हाँ रे, हाकिम, के सामने लिख गया।” फिर जरा निकट आकर फुसफुसाकर बोले, “मट्टी के मोल मकान मिला है। अब कल दोनों को बिदा करो।” “अरे, पहले सौ रुपये लाओ! बुआ का हिस्सा भी तो देना है?” निरमल की माँ उदास स्वर में बोली, “बड़ी चंट है बुढ़िया। गाड़-गाड़ के रख रही है, मर के साँप होयगी।&#8221;;<br />
सुबह निरमल की माँ के यहाँ मकान खरीदने की कथा थी। शंख, घण्टा-घड़ियाली, केले का पत्ता, पंजीरी, पंचामृत का आयोजन देखकर मुन्ना के अलावा सब बच्चे इकट्ठा थे। निरमल की माँ और निरमल के बाबू पीढ़े पर बैठे थे; गुलकी एक पीली धोती पहने माथे तक घूँघट काढ़े सुपारी काट रही थी और बच्चे झाँक-झाँककर देख रहे थे। मेवा ने पहुँचकर कहा, “ए गुलकी, ए गुलकी, जीजाजी के साथ जाओगी क्या?&#8221;; कुबड़ी ने झेंपकर कहा, “धत्त रे! ठिठोली करता है&#8221;; और लज्जा-भरी जो मुसकान किसी भी तरुणी के चेहरे पर मनमोहक लाली बनकर फैल जाती, उसके झुर्रियोंदार, बेडौल, नीरस चेहरे पर विचित्र रूप से बीभत्स लगने लगी। उसके काले पपड़ीदार होठ सिकुड़ गये, आँखों के कोने मिचमिचा उठे और अत्यन्त कुरुचिपूर्ण ढंग से उसने अपने पल्ले से सर ढाँक लिया और पीठ सीधी कर जैसे कूबड़ छिपाने का प्रयास करने लगी। मेवा पास ही बैठ गया। कुबड़ी ने पहले इधर-उधर देखा, फिर फुसफुसाकर मेवा से कहा, “क्यों रे! जीजाजी कैसे लगे तुझे?” मेवा ने असमंजस में या संकोच में पड़कर कोई जवाब नहीं दिया तो जैसे अपने को समझाते हुए गुलकी बोली, “कुछ भी होय। है तो अपना आदमी! हारे-गाढ़े कोई और काम आयेगा? औरत को दबाय के रखना ही चाहिए।” फिर थोड़ी देर चुप रहकर बोली, “मेवा भैया, सत्ती हमसे नाराज है। अपनी सगी बहन क्या करेगी जो सत्ती ने किया हमारे लिए। ये चाची और बुआ तो सब मतलब के साथी हैं हम क्या जानते नहीं? पर भैया अब जो कहो कि हम सत्ती के कहने से अपने मरद को छोड़ दें, सो नहीं हो सकता।” इतने में किसी का छोटा-सा बच्चा घुटनों के बल चलते-चलते मेवा के पास आकर बैठ गया। गुलकी क्षण-भर उसे देखती रही फिर बोली, “पति से हमने अपराध किया तो भगवान् ने बच्चा छीन लिया, अब भगवान् हमें छमा कर देंगे।” फिर कुछ क्षण के लिए चुप हो गयी। “क्षमा करेंगे तो दूसरी सन्तान देंगे?” “क्यों नहीं देंगे? तुम्हारे जीजाजी को भगवान् बनाये रखे। खोट तो हमी में है। फिर सन्तान होगी तब तो सौत का राज नहीं चलेगा।&#8221;;<br />
इतने में गुलकी ने देखा कि दरवाजे पर उसका आदमी खड़ा बुआ से कुछ बातें कर रहा है। गुलकी ने तुरत पल्ले से सर ढंका और लजाकर उधर पीठ कर ली। बोली, “राम! राम! कितने दुबरा गये हैं। हमारे बिना खाने-पीने का कौन ध्यान रखता! अरे, सौत तो अपने मतलब की होगी। ले भैया मेवा, जा दो बीड़ा पान दे आ जीजा को?” फिर उसके मुँह पर वही लाज की बीभत्स मुद्रा आयी- “तुझे कसम है, बताना मत किसने दिया है।”<br />
मेवा पान लेकर गया पर वहाँ किसी ने उसपर ध्यान ही नहीं दिया। वह आदमी बुआ से कह रहा था, “इसे ले तो जा रहे हैं, पर इतना कहे देते हैं, आप भी समझा दें उसे- कि रहना हो तो दासी बनकर रहे। न दूध की न पूत की, हमारे कौन काम की; पर हाँ औरतिया की सेवा करे, उसका बच्चा खिलावे, झाड़ू-बुहारू करे तो दो रोटी खाय पड़ी रहे। पर कभी उससे जबान लड़ाई तो खैर नहीं । हमारा हाथ बड़ा जालिम है। एक बार कूबड़ निकला, अगली बार परान निकलेगा।”<br />
“क्यों नहीं बेटा! क्यों नहीं?” बुआ बोलीं और उन्होंने मेवा के हाथ से पान लेकर अपने मुँह में दबा लिये।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">करीब</span></strong> तीन बजे इक्का लाने के लिए निरमल की माँ ने मेवा को भेजा। कथा की भीड़-भाड़ से उनका मूड़ पिराने; लगा था, अतः अकेली गुलकी सारी तैयारी कर रही थी। मटकी कोने में खड़ी थी। मिरवा और झबरी बाहर गुमसुम बैठे थे। निरमल की माँ ने बुआ को बुलवाकर पूछा कि बिदा-बिदाई में क्या करना होगा, तो बुआ मुँह बिगाड़कर बोलीं, “अरे कोई जात-बिरादरी की है का? एक लोटा में पानी भर के इकन्नी-दुअन्नी उतार के परजा-पजारू को दे दियो बस?” और फिर बुआ शाम को बियारी में लग गयीं।<br />
इक्का आते ही जैसे झबरी पागल-सी इधर-उधर दौड़ने लगी। उसे जाने कैसे आभास हो गया कि गुलकी जा रही है, सदा के लिए। मेवा ने अपने छोटे-छोटे हाथों से बड़ी-बड़ी गठरियाँ रखीं, मटकी और मिरवा चुपचाप आकर इक्के के पास खड़े हो गये। सर झुकाये पत्थर-सी चुप गुलकी निकली। आगे-आगे हाथ में पानी का भरा लोटा लिये निरमल थी। वह आदमी जाकर इक्के पर बैठ गया। “अब जल्दी करो!&#8221;; उसने भारी गले से कहा। गुलकी आगे बढ़ी, फिर रुकी और टेंट से दो अधन्नी निकाले- “ले मिरवा, ले मटकी?” मटकी जो हमेशा हाथ फैलाये रहती थी, इस समय जाने कैसा संकोच उसे आ गया कि वह हाथ नीचे कर दीवार से सट कर खड़ी हो गयी और सर हिलाकर बोली, “नहीं ?”–“नहीं बेटा! ले लो!” गुलकी ने पुचकारकर कहा। मिरवा-मटकी ने पैसे ले लिये और मिरवा बोला, “छलाम गुलकी! ए आदमी छलाम?&#8221;;<br />
“अब क्या गाड़ी छोड़नी है?” वह फिर भारी गले से बोला।<br />
“ठहरो बेटा, कहीं ऐसे दामाद की बिदाई होती है?” सहसा एक बिलकुल अजनबी किन्तु अत्यन्त मोटा स्वर सुनायी पड़ा। बच्चों ने अचरज से देखा, मुन्ना की माँ चली आ रही हैं। “हम तो मुन्ना का आसरा देख रहे थे कि स्कूल से आ जाये, उसे नाश्ता करा लें तो आयें, पर इक्का आ गया तो हमने समझा अब तू चली। अरे! निरमल की माँ, कहीं ऐसे बेटी की बिदाई होती है! लाओ जरा रोली घोलो जल्दी से, चावल लाओ, और सेन्दुर भी ले आना निरमल बेटा! तुम बेटा उतर आओ इक्के से!&#8221;;<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">निरमल</span></strong> की माँ का चेहरा स्याह पड़ गया था। बोलीं, “जितना हमसे बन पड़ा किया। किसी को दौलत का घमण्ड थोड़े ही दिखाना था?” “नहीं बहन! तुमने तो किया पर मुहल्ले की बिटिया तो सारे मुहल्ले की बिटिया होती है। हमारा भी तो फर्ज था। अरे माँ-बाप नहीं हैं तो मुहल्ला तो है। आओ बेटा?” और उन्होंने टीका करके आँचल के नीचे छिपाये हुए कुछ कपड़े और एक नारियल उसकी गोद में डालकर उसे चिपका लिया। गुलकी जो अभी तक पत्थर-सी चुप थी सहसा फूट पड़ी। उसे पहली बार लगा जैसे वह मायके से जा रही है। मायके से अपनी माँ को छोड़कर छोटे-छोटे भाई-बहनों को छोड़कर और वह अपने कर्कश फटे हुए गले से विचित्र स्वर से रो पड़ी।<br />
“ले अब चुप हो जा! तेरा भाई भी आ गया?” वे बोलीं। मुन्ना बस्ता लटकाये स्कूल से चला आ रहा था। कुबड़ी को अपनी माँ के कन्धे पर सर रखकर रोते देखकर वह बिल्कुल हतप्रभ-सा खड़ा हो गया- “आ बेटा, गुलकी जा रही है न आज! दीदी है न! बड़ी बहन है। चल पाँव छू ले! आ इधर?” माँ ने फिर कहा। मुन्ना और कुबड़ी के पाँव छुए? क्यों? क्यों? पर माँ की बात! एक क्षण में उसके मन में जैसे एक पूरा पहिया घूम गया और वह गुलकी की ओर बढ़ा। गुलकी ने दौड़कर उसे चिपका लिया और फूट पड़ी- “हाय मेरे भैया! अब हम जा रहे हैं! अब किससे लड़ोगे मुन्ना भैया? अरे मेरे वीरन, अब किससे लड़ोगे?” मुन्ना को लगा जैसे उसकी छोटी-छोटी पसलियों में एक बहुत बड़ा-सा आँसू जमा हो गया जो अब छलकने ही वाला है। इतने में उस आदमी ने फिर आवाज दी और गुलकी कराहकर मुन्ना की माँ का सहारा लेकर इक्के पर बैठ गयी। इक्का खड़-खड़ कर चल पड़ा। मुन्ना की माँ मुड़ी कि बुआ ने व्यंग्य किया, “एक आध गाना भी बिदाई का गाये जाओ बहन! गुलकी बन्नो ससुराल जा रही है!” मुन्ना की माँ ने कुछ जवाब नहीं दिया, मुन्ना से बोली, “जल्दी घर आना बेटा, नाश्ता रखा है?”<br />
पर<strong><span style="color: #ff0000;"> पागल</span></strong> मिरवा ने, जो बम्बे पर पाँव लटकाये बैठा था, जाने क्या सोचा कि वह सचमुच गला फाड़कर गाने लगा, “बन्नो डाले दुपट्टे का पल्ला, मुहल्ले से चली गयी राम?” यह उस मुहल्ले में हर लड़की की बिदा पर गाया जाता था। बुआ ने घुड़का तब भी वह चुप नहीं हुआ, उलटे मटकी बोली, “काहे न गावें, गुलकी नै पैसा दिया है?” और उसने भी सुर मिलाया, “बन्नो तली गयी लाम! बन्नो तली गयी लाम! बन्नो तली गयी लाम!”<br />
मुन्ना चुपचाप खड़ा रहा। मटकी डरते-डरते आयी- “मुन्ना बाबू! कुबड़ी ने अधन्ना दिया है, ले लें?”<br />
“ले ले” बड़ी मुश्किल से मुन्ना ने कहा और उसकी आँख में दो बड़े-बड़े आँसू डबडबा आये। उन्हीं आँसुओं की झिलमिल में कोशिश करके मुन्ना ने जाते हुए इक्के की ओर देखा। गुलकी आँसू पोंछते हुए परदा उठाकर मुड़-मुड़कर देख रही थी। मोड़ पर एक धचके से इक्का मुड़ा और फिर अदृश्य हो गया।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">सिर्फ</span></strong> झबरी सड़क तक इक्के के साथ गयी और फिर लौट गयी।</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/story-of-dharamveer-bharti-gulki-banno/10945/">चली कहानीः धर्मवीर भारती की &#8220;गुलकी बन्नो&#8221;</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>बौड़म: आखिर लोग आपको बौड़म क्यों कहते हैं? पढ़िए साहित्य सम्राट मुंशी प्रेम चंद की कहानी</title>
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		<pubDate>Fri, 30 Jul 2021 07:23:53 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>मुझे देवीपुर गये पाँच दिन हो चुके थे, पर ऐसा एक दिन भी न होगा कि बौड़म की चर्चा न हुई हो। मेरे पास सुबह से शाम तक गाँव के लोग बैठे रहते थे। मुझे अपनी बहुज्ञता को प्रदर्शित करने का न कभी ऐसा अवसर ही मिला था और न प्रलोभन ही। मैं बैठा-बैठा इधर-उधर &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/art-culture/baudam-story-of-munshi-premchand-tis-media/10189/">बौड़म: आखिर लोग आपको बौड़म क्यों कहते हैं? पढ़िए साहित्य सम्राट मुंशी प्रेम चंद की कहानी</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>मुझे देवीपुर गये पाँच दिन हो चुके थे, पर ऐसा एक दिन भी न होगा कि बौड़म की चर्चा न हुई हो। मेरे पास सुबह से शाम तक गाँव के लोग बैठे रहते थे। मुझे अपनी बहुज्ञता को प्रदर्शित करने का न कभी ऐसा अवसर ही मिला था और न प्रलोभन ही। मैं बैठा-बैठा इधर-उधर की गप्पें उड़ाया करता। बड़े लाट ने गाँधी बाबा से यह कहा और गाँधी बाबा ने यह जवाब दिया। अभी आप लोग क्या देखते हैं, आगे देखिएगा क्या-क्या गुल खिलते हैं। पूरे 50 हजार जवान जेल जाने को तैयार बैठे हुए हैं। गाँधी जी ने आज्ञा दी है कि हिन्दुओं में छूत-छात का भेद न रहे, नहीं तो देश को और भी अदिन देखने पड़ेंगे।</p>
<p>अस्तु! लोग मेरी बातों को तन्मय हो कर सुनते। उनके मुख फूल की तरह खिल जाते। आत्माभिमान की आभा मुख पर दिखायी देती। गद्&#x200d;गद कंठ से कहते, अब तो महात्मा जी ही का भरोसा है। न हुआ बौड़म नहीं आपका गला न छोड़ता। आपको खाना-पीना कठिन हो जाता। कोई उससे ऐसी बातें किया करे तो रात की रात बैठा रहे। मैंने एक दिन पूछा, आखिर यह बौड़म है कौन ? कोई पागल है क्या ? एक सज्जन ने कहा, ‘महाशय, पागल क्या है, बस बौड़म है। घर में लाखों की सम्पत्ति है, शक्कर की एक मिल सिवान में है, दो कारखाने छपरे में हैं, तीन-तीन, चार-चार सौ के तलबवाले आदमी नौकर हैं, पर इसे देखिए, फटेहाल घूमा करता है। घरवालों ने सिवान भेज दिया था कि जा कर वहाँ निगरानी करे। दो ही महीने में मैनेजर से लड़ बैठा, उसने यहाँ लिखा, मेरा इस्तीफा लीजिए। आपका लड़का मजदूरों को सिर चढ़ाये रहता है, वे मन से काम नहीं करते। आखिर घरवालों ने बुला लिया। नौकर-चाकर लूटते खाते हैं उसकी तो जरा भी चिन्ता नहीं, पर जो सामने आम का बाग है उसकी रात-दिन रखवाली किया करता है, क्या मजाल कि कोई एक पत्थर भी फेंक सके।’ एक मियाँ जी बोले, ‘बाबू जी, घर में तरह-तरह के खाने पकते हैं, मगर इसकी तकदीर में वही रोटी और दाल लिखी है और कुछ नहीं। बाप अच्छे-अच्छे कपड़े खरीदते हैं, लेकिन वह उनकी तरफ निगाह भी नहीं उठाता। बस, वही मोटा कुरता, गाढ़े की तहमत बाँधे मारा-मारा फिरता है। आपसे उसकी सिफत कहाँ तक कहें, बस पूरा बौड़म है।’</p>
<p>ये बातें सुन कर भी इस विचित्र व्यक्ति से मिलने की उत्कंठा हुई। सहसा एक आदमी ने कहा ‘वह देखिये, बौड़म आ रहा है।’ मैने कुतूहल से उसकी ओर देखा। एक 20-21 वर्ष का हृष्ट-पुष्ट युवक था। नंगे सिर, एक गाढ़े का कुरता पहने, गाढ़े का ढीला पाजामा पहने चला आता था! पैरों में जूते थे। पहले मेरी ही ओर आया। मैंने कहा, ‘आइए बैठिए।’ उसने मंडली की ओर अवहेलना की दृष्टि से देखा और बोला, ‘अभी नहीं, फिर आऊँगा।’ यह कहकर चला गया। जब संध्या हो गयी और सभा विसर्जित हुई तो वह आम के बाग की ओर से धीरे-धीरे आकर मेरे पास बैठ गया और बोला- इन लोगों ने तो मेरी खूब बुराइयाँ की होंगी। मुझे यह बौड़म का लकब मिला है।</p>
<p>मैंने सुकचाते हुए कहा- हाँ, आपकी चर्चा लोग रोज करते थे। मेरी आपसे मिलने की बड़ी इच्छा थी। आपका नाम क्या है?<br />
बौड़म ने कहा- नाम तो मेरा मुहम्मद खलील है, पर आस-पास के दस-पाँच गाँवों में मुझे लोग उर्फ के नाम से ज्यादा जानते हैं। मेरा उर्फ बौड़म है।<br />
मैं- आखिर लोग आपको बौड़म क्यों कहते हैं?<br />
खलील- उनकी खुशी और क्या कहूँ? मैं जिन्दगी को कुछ और समझता हूँ, पर मुझे इजाजत नहीं है कि पाँचों वक्त की नमाज पढ़ सकूँ। मेरे वालिद हैं, चचा हैं। दोनों साहब पहर रात से पहर रात तक काम में मसरूफ रहते हैं। रात-दिन हिसाब-किताब, नफा-नुकसान, मंदी-तेजी के सिवाय और कोई जिक्र ही नहीं होता, गोया खुदा के बन्दे न हुए इस दौलत के बन्दे हुए। चचा साहब हैं, वह पहर रात तक शीरे के पीपों के पास खड़े हो कर उन्हें गाड़ी पर लदवाते हैं। वालिद साहब अक्सर अपने हाथों से शक्कर का वजन करते हैं। दोपहर का खाना शाम को और शाम का खाना आधी रात को खाते हैं। किसी को नमाज पढ़ने की फुर्सत नहीं। मैं कहता हूँ, आप लोग इतना सिर-मगजन क्यों करते हैं। बड़े कारबार में सारा काम एतबार पर होता है। मालिक को कुछ न कुछ बल खाना ही पड़ता है। अपने बलबूते पर छोटे कारोबार ही चल सकते हैं। मेरा उसूल किसी को पसन्द नहीं, इसलिए मैं बौड़म हूँ।</p>
<p>मैं- मेरे खयाल में तो आपका उसूल ठीक है।<br />
खलील- ऐसा भूल कर भी न कहिएगा, वरना एक ही जगह दो बौड़म हो जायेंगे। लोगों को कारोबार के सिवा न दीन से गरज है न दुनिया से। न मुल्क से, न कौम से। मैं अखबार मँगाता हूँ, स्मर्ना फंड में कुछ रुपये भेजना चाहता हूँ। खिलाफत-फंड को मदद करना भी अपना फर्ज समझता हूँ। सबसे बड़ा सितम है कि खिलाफत का रज़ाकार भी हूँ। क्यों साहब, जब कौम पर, मुल्क पर और दीन पर चारों तरफ से दुश्मनों का हमला हो रहा है तो क्या मेरा फर्ज नहीं है कि जाति के फायदे को कौम पर कुर्बान कर दूँ। इसीलिए घर और बाहर मुझे बौड़म का लकब दिया गया है।<br />
मैं- आप तो वह कर रहे हैं जिसकी इस वक्त कौम को जरूरत है।<br />
खलील- मुझे खौफ है कि इस चौपट नगरी से आप बदनाम हो कर जायेंगे। जब मेरे हजारों भाई जेल में पड़े हुए हैं, उन्हें गजी का गाढ़ा तक पहनने को मयस्सर नहीं तो मेरी ग़ैरत गवारा नहीं करती कि मैं मीठे लुकमें उड़ाऊँ और चिकन के कुर्त्ते पहनूँ, जिनकी कलाइयों और मुड्ढों पर सीजनकारी की गयी हो।<br />
मैं- आप यह बहुत ही मुनासिब कहते हैं। अफसोस है कि और लोग आपका-सा त्याग करने के काबिल नहीं।<br />
खलील- मैं इसे त्याग नहीं समझता, न दुनिया को दिखाने के लिए यह भेष बना के घूमता हूँ। मेरा जी ही लज्जत और शौक से फिर गया है। थोड़े दिन होते हैं वालिद ने मुझे सिवान के मिल में निगरानी के लिए भेजा, मैंने वहाँ जा कर देखा तो इंजीनियर साहब के खानसामे, बैरे, मेहतर, धोबी, माली, चौकीदार, सभी मजदूरों की जेल में लिखे हुए थे। काम साहब का करते थे, मजदूरी कारखाने से पाते थे। साहब बहादुर खुद तो बेउसूल हैं, पर मजदूरों पर इतनी सख्ती थी कि अगर पाँच मिनट की देर हो जाए तो उनकी आधे दिन की मजदूरी कट जाती थी। मैंने साहब की मिजाजपुरसी करनी चाही। मजदूरों के साथ रियायत करनी शुरू की। फिर क्या था ? साहब बिगड़ गये, इस्तीफे की धमकी दी। घरवालों को उनके सब हालात मालूम हैं। पल्ले दरजे का हरामखोर आदमी है। लेकिन उसकी धमकी पाते ही सबके होश उड़ गये। मैं तार से वापस बुला लिया गया और घर पर मेरी खूब ले-दे हुई। पहले बौड़म होने में कुछ कोर-कसर थी, वह पूरी हो गयी। न जाने साहब से लोग क्यों इतना डरते हैं?</p>
<p>मैं- आपने वही किया जो इस हालत में मैं भी करता बल्कि मैं तो पहले साहब पर ग़बन का मुकदमा दायर करता, बदमाशों से पिटवाता, तब बात करता। ऐसे हरामखोरों की यही सजाएँ हैं।<br />
खलील- फिर तो एक और, दो हो गये। अफसोस यही है कि आपका यहाँ कयाम न रहेगा। मेरा जी चाहता है, कि चंद रोज आपके साथ रहूँ। मुद्दत के बाद आप ऐसे आदमी मिले हैं जिससे मैं अपने दिल की बातें कह सकता हूँ। इन गँवारों से मैं बोलता भी नहीं। मेरे चाचा साहब को जवानी में एक चमारिन से ताल्लुक हो गया था। उससे दो बच्चे, एक लड़का और एक लड़की पैदा हुए। चमारिन लड़की को गोद में छोड़कर मर गयी। तब से इन दोनों बच्चों की मेरे यहाँ वही हालत थी जो यतीमों की होती है। कोई बात न पूछता था। उनको खाने-पहनने को भी न मिलता। बेचारे नौकरों के साथ खाते और बाहर झोपड़े में पड़े रहते थे। जनाब, मुझसे यह न देखा गया। मैंने उन्हें अपने दस्तरखान पर खिलाया और अब भी खिलाता हूँ। घर में कुहराम मच गया। जिसे देखिए मुझ पर त्योरियाँ बदल रहा है, मगर मैंने परवाह न की। आखिर है वह भी तो हमारा ही खून। इसलिए मैं बौड़म कहलाता हूँ।</p>
<p>मैं- जो लोग आपको बौड़म कहते हैं, वे खुद बौड़म हैं।<br />
खलील- जनाब, इनके साथ रहना अजीब है। शाह काबुल ने कुर्बानी की मुमानियत कर दी है। हिंदुस्तान के उलमा ने भी यही फतवा दिया, पर यहाँ खास मेरे घर कुर्बानी हुई। मैंने हरचंद बावैला मचाया, पर मेरी कौन सुनता है ? उसका कफारा (प्रायश्चित्त) मैंने यह अदा किया कि अपनी सवारी का घोड़ा बेच कर 300 फकीरों को खाना खिलाया और तब से कसाइयों को गायें लिये जाते देखता हूँ तो कीमत दे कर खरीद लेता हूँ। इस वक्त तक दस गायों की जान बचा चुका हूँ। वे सब यहाँ हिंदुओं के घरों में हैं, पर मजा यह है कि जिन्हें मैंने गायें दी हैं, वे भी मुझे बौड़म कहते हैं। मैं भी इस नाम का इतना आदी हो गया हूँ कि अब मुझे इससे मुहब्बत हो गयी है।<br />
मैं- आप ऐसे बौड़म काश मुल्क में और ज्यादा होते।<br />
खलील- लीजिए आपने भी बनाना शुरू कर दिया। यह देखिए आम का बाग है। मैं उसकी रखवाली करता हूँ। लोग कहते हैं जहाँ हजारों का नुकसान हो रहा है वहाँ तो देखभाल करता नहीं, जरा-सी बगिया की रखवाली में इतना मुस्तैद। जनाब, यहाँ लड़कों का यह हाल है कि एक आम तो खाते हैं और पचीस आम गिराते हैं। कितने ही पेड़ चोट खा जाते हैं और फिर किसी काम के नहीं रहते। मैं चाहता हूँ कि आम पक जायें, टपकने लगें तब जिसका जी चाहे चुन ले जाए। कच्चे आम खराब करने से क्या फायदा ? यह भी मेरे बौड़मपन में दाखिल है।</p>
<p>ये बातें हो ही रही थीं कि सहसा तीन-चार आदमी एक बनिये को पकड़े, घसीटते हुए आते दिखायी दिये। पूछा तो उन चारों आदमियों में से एक ने, जो सूरत से मौलवी मालूम होते थे, कहा- यह बड़ा बेईमान है, इसके बाँट कम हैं। अभी इसके यहाँ से सेर भर घी ले गया हूँ। घर पर तौलता हूँ तो आध पाव गायब। अब जो लौटाने आया हूँ तो कहता है मैंने तो पूरा तौला था। पूछो अगर तूने पूरा तौला था तो क्या मैं रास्ते में खा गया। अब ले चलता हूँ थाने पर, वहीं इसकी मरम्मत होगी।<br />
दूसरे महाशय, जो वहाँ डाकखाने के मुंशी थे बोले इसकी हमेशा की यही आदत है, कभी पूरा नहीं तौलता। आज ही दो आने की शक्कर मँगवायी। लड़का घर ले कर गया तो मुश्किल से एक आने की थी। लौटाने आया तो आँखें दिखाने लगा। इसके बाँटों की आज जाँच करानी चाहिए।<br />
तीसरा आदमी अहीर था। अपने सिर पर से खली की गठरी उतार कर बोला- साहब, यह 11 रु. की खली है। 6 सेर के भाव से दी थी। घर पर तौला तो 2 सेर हुई। लाया कि लौटा दूँगा, पर यह लेता ही नहीं ! अब इसका निबटारा थाने ही में होगा। इस पर कई आदमियों ने कहा यह सचमुच बेईमान आदमी है।<br />
बनिये ने कहा- अगर मेरे बाँट रत्ती भर कम निकलें तो हजार रुपये डाँड़ दूँ।<br />
मौलवी साहब ने कहा- तो कमबख्त, टाँकी मारता होगा।<br />
मुंशी जी बोले- टाँकी मार देता है, यही बात है।<br />
अहीर ने कहा- दोहरे बाँट रखे हैं। दिखाने के और, बेचने के और। इसके घर की पुलिस तलाशी ले।<br />
बनिये ने फिर प्रतिवाद किया, पकड़नेवालों ने फिर आक्रमण किया, इसी तरह कोई आध घंटा तक तकरार होती रही। मेरी समझ में न आता था कि क्या करूँ। बनिये को छुड़ाने के लिए जोर दूँ या जाने दूँ। बनिये से सभी जले हुए मालूम होते थे। खलील को देखा तो गायब ? न जाने कब उठकर चला गया ? बनिया किसी तरह न दबता था, यहाँ तक कि थाने जाने से भी न डरता था।</p>
<p>ये लोग थाने जाना ही चाहते थे कि बौड़म सामने आता दिखायी दिया। उसके एक हाथ में एक टोकरा था, दूसरे हाथ में एक कटोरा और पीछे एक 7-8 बरस का लड़का । उसने आते ही मौलवी साहब से कहा- यह कटोरा आप ही का है काजी जी ?<br />
मौलवी- (चौंककर) हाँ है तो, फिर ? तुम मेरे घर से इसे क्यों लाये?<br />
बौड़म- इसलिए कि कटोरे में वही आधा पाव घी है जिसके विषय में आप कहते हैं कि बनिये ने कम तौला। घी वही है। वजन वही है। बेईमानी गरीब बनिये की नहीं है, बल्कि काजी हाजी मौलवी जहूर अहमद की।<br />
मौलवी- तुम अपना बौड़मपना यहाँ न दिखाना नहीं तो मैं किसी से डरने वाला नहीं हूँ। तुम लखपती होगे तो अपने घर के होगे। तुम्हें क्या मजाल था मेरे घर में जाने का !<br />
बौड़म- वही जो आपको बनिये को थाने में ले जाने का है। अब यह घी भी थाने जायेगा।<br />
मौलवी- (सिटपिटा कर) सबके घर में थोड़ी-बहुत चीज रखी ही रहती है। कसम कुरान शरीफ की, मैं अभी तुम्हारे वालिद के पास जाता हूँ, आज तक गाँव भर में किसी ने मुझ पर ऐसा इलजाम नहीं लगाया था।<br />
बनिया- मौलवी साहब, आप जाते कहाँ हैं ? चलिए हमारा-आपका फैसला थाने में होगा। मैं एक न मानूँगा। कहलाने को मौलवी, दीनदार, ऐसे बनते हैं कि देवता ही हैं। पर घर में चीज रख कर दूसरों को बेईमान बनाते हैं। यह लम्बी दाढ़ी धोखा देने के लिए बढ़ायी है?<br />
मगर मौलवी साहब न रुके। बनिये को छोड़ कर खलील के बाप के पास चले गये, जो इस वक्त शर्म से बचने का सहज बहाना था।<br />
तब खलील ने अहीर से कहा- क्यों बे, तू भी थाने जा रहा है ? चल मैं भी चलता हूँ। तेरे घर से यह सेर भर खली लेता आया हूँ।<br />
अहीर ने मौलवी साहब की दुर्गति देखी तो चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं, बोला- भैया जवानी की कसम है, मुझे मौलवी साहब ने सिखा दिया था।</p>
<p>खलील- दूसरे के सिखाने से तुम किसी के घर में आग लगा दोगे ? खुद तो बच्चा दूध में आधा पानी मिला-मिला कर बेचते हो, मगर आज तुमको इतनी मुटमरदी सवार हो गयी कि एक भले आदमी को तबाह करने पर आमादा हो गये। खली उठा कर घर में रख ली, उस पर बनिये से कहते हो कि कम तौला।<br />
बनिया- भैया, मेरी लाख रुपये की इज्जत बिगड़ गयी। मैं थाने में रपट किये बिना न मानूँगा।<br />
अहीर- साहू जी, अबकी माफ करो, नहीं तो कहीं का न रहूँगा।<br />
तब खलील ने मुंशी जी से कहा- कहिए जनाब, आपकी कलई खोलूँ या चुपके से घर की राह लीजिएगा।<br />
मुंशी- तुम बेचारे मेरी कलई क्या खोलोगे। मुझे भी अहीर समझ लिया है कि तुम्हारी भपकियों में आऊँगा ?<br />
खलील- (लड़के से) क्यों बेटा, तुम शक्कर ले कर सीधे घर चले गये थे?<br />
लड़का- (मुंशी जी को सशंक नेत्रों से देख कर) बताऊँगा।<br />
मुंशी- लड़कों को जैसा सिखा दोगे वैसा कहेंगे।<br />
खलील- बेटा, अभी तुमने मुझसे जो कहा था, वही फिर कह दो।<br />
लड़का- दादा मारेंगे।<br />
मुंशी- क्या तूने रास्ते में शक्कर फाँक ली थी।<br />
लड़का- रोने लगा।</p>
<p>खलील- जी हाँ, इसने मुझसे खुद कहा, पर आपने उससे तो पूछा नहीं बनिये के सिर हो गये। यही शराफत है।<br />
मुंशी- मुझे क्या मालूम था कि उसने रास्ते में यह शरारत की?<br />
खलील- तो ऐसे कमजोर सबूत पर आप थाने क्योंकर चले थे ? आप गँवारों को मनीआर्डर के रुपये देते हैं तो उस रुपये पर दो आने अपनी दस्तूरी काट लेते हैं। टके के पोस्टकार्ड आने में बेचते हैं, जब कहिए तब साबित कर दूँ। उसे क्या आप बेईमानी नहीं समझते हैं?<br />
मुंशी जी ने बौड़म के मुँह लगना मुनासिब न समझा। लड़के को मारते हुए घर ले गये। बनिये ने बौड़म को खूब आशीर्वाद दिया। दर्शक लोग भी धीरे-धीरे चले गये। तब मैंने खलील से कहा आपने इस बनिये की जान बचा ली नहीं तो बेचारा बेगुनाह पुलिस के पंजे में फँस जाता।<br />
खलील- आप जानते हैं कि मुझे क्या सिला (इनाम) मिलेगा। थानेदार मेरे दुश्मन हो जायेंगे। कहेंगे यह मेरे शिकारों को भगा दिया करता है। वालिद साहब पुलिस से थर-थर काँपते हैं। मुझे हाथों लेंगे कि तू दूसरों के बीच में क्यों दखल देता है ? यहाँ यह भी बौड़मपन में दाखिल है। एक बनिये के पीछे मुझे भले आदमियों की कलई खोलनी मुनासिब न थी। ऐसी हरकत बौड़म लोग किया करते हैं।<br />
मैंने श्रद्धापूर्ण शब्दों में कहा- अब मैं आपको इसी नाम से पुकारूँगा। आज मुझे मालूम हुआ कि बौड़म देवताओं को कहा जाता है! जो स्वार्थ पर आत्मा की भेंट कर देता है वह चतुर है, बुद्धिमान है। जो आत्मा के सामने, सच्चे सिद्धांत के सामने, सत्य के सामने, स्वार्थ की, निंदा की परवाह नहीं करता वह बौड़म है, निर्बुद्धि है।</p>
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