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	<title>Hindi Storytellers Archives - TIS Media</title>
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		<title>चली कहानीः बगुला भगत और केकड़ा</title>
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		<pubDate>Wed, 03 Nov 2021 01:50:55 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>एक वन प्रदेश में एक बहुत बड़ा तालाब था। हर प्रकार के जीवों के लिए उसमें भोजन सामग्री होने के कारण वहां नाना प्रकार के जीव, पक्षी, मछलियां, कछुए और केकड़े निवास करते थे। पास में ही बगुला रहता था, जिसे परिश्रम करना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। उसकी आंखें भी कमजोर थीं। मछलियां पकडने &#8230;</p>
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				<h4>पंचतंत्र</h4>संस्कृत नीतिकथाओं में पंचतन्त्र का पहला स्थान माना जाता है। यद्यपि यह पुस्तक अपने मूल रूप में नहीं रह गयी है, फिर भी उपलब्ध अनुवादों के आधार पर इसकी रचना तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के आस-पास निर्धारित की गई है। इस ग्रंथ के रचयिता पं॰ विष्णु शर्मा हैं, कहीं-कहीं रचयिता का नाम &#8216;बसुभग&#8217; आया है। उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर कहा जा सकता है कि जब इस ग्रन्थ की रचना पूरी हुई, तब उनकी उम्र लगभग 80 वर्ष थी। पंचतन्त्र को पाँच तन्त्रों (भागों) में बाँटा गया है। मित्रभेद, मित्रसम्प्राप्ति, काकोलुकीयम्, लब्धप्रणाश, अपरीक्षित कारक। 
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<p><strong><span style="color: #ff0000;">एक</span></strong> वन प्रदेश में एक बहुत बड़ा तालाब था। हर प्रकार के जीवों के लिए उसमें भोजन सामग्री होने के कारण वहां नाना प्रकार के जीव, पक्षी, मछलियां, कछुए और केकड़े निवास करते थे। पास में ही बगुला रहता था, जिसे परिश्रम करना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। उसकी आंखें भी कमजोर थीं। मछलियां पकडने के लिए तो मेहनत करनी पड़ती हैं, जो उसे खलती थी। इसलिए आलस्य के मारे वह प्रायः भूखा ही रहता। एक टांग पर खड़ा यही सोचता रहता कि क्या उपाय किया जाए कि बिना हाथ-पैर हिलाए रोज भोजन मिले। एक दिन उसे एक उपाय सूझा तो वह उसे आजमाने बैठ गया।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>बगुला</strong></span> तालाब के किनारे खड़ा हो गया और लगा आंखों से आंसू बहाने। एक केकड़े ने उसे आंसू बहाते देखा तो वह उसके निकट आया और पूछने लगा “मामा, क्या बात है भोजन के लिए मछलियों का शिकार करने की बजाय खड़े आंसू बहा रहे हो?”<br />
बगुले ने जोर की हिचकी ली और भर्राए गले से बोला “बेटे, बहुत कर लिया मछलियों का शिकार। अब मैं यह पाप कार्य और नहीं करुंगा। मेरी आत्मा जाग उठी हैं। इसलिए मैं निकट आई मछलियों को भी नहीं पकड़ रहा हूं। तुम तो देख ही रहे हो।”<br />
केकड़ा बोला “मामा, शिकार नहीं करोगे, कुछ खाओगे नही तो मर नहीं जाओगे?”<br />
बगुले ने एक और हिचकी ली “ऐसे जीवन का नष्ट होना ही अच्छा है बेटे, वैसे भी हम सबको जल्दी मरना ही हैं। मुझे ज्ञात हुआ हैं कि शीघ्र ही यहां बारह वर्ष लंबा सूखा पड़ेगा।”<br />
बगुले ने केकड़े को बताया कि यह बात उसे एक त्रिकालदर्शी महात्मा ने बताई है, जिसकी भविष्यवाणी कभी गलत नहीं होती। केकड़े ने जाकर सबको बताया कि कैसे बगुले ने बलिदान व भक्ति का मार्ग अपना लिया है और सूखा पड़ने वाला है।<br />
उस तालाब के सारे जीव मछलियां, कछुए, केकड़े, बत्तख व सारस आदि दौड़े-दौडे बगुले के पास आए और बोले “भगत मामा, अब तुम ही हमें कोई बचाव का रास्ता बताओ। अपनी अक्ल लड़ाओ तुम तो महाज्ञानी बन ही गए हो।”<br />
बगुले ने कुछ सोचकर बताया कि वहां से कुछ कोस दूर एक जलाशय हैं जिसमें पहाड़ी झरना बहकर गिरता हैं। वह कभी नहीं सूखता। यदि जलाशय के सब जीव वहां चले जाएं तो बचाव हो सकता है। अब समस्या यह थी कि वहां तक जाया कैसे जाएं? बगुले भगत ने यह समस्या भी सुलझा दी “मैं तुम्हें एक-एक करके अपनी पीठ पर बिठाकर वहां तक पहुंचाऊंगा क्योंकि अब मेरा सारा शेष जीवन दूसरों की सेवा करने में ही तो गुजरेगा।”<br />
सभी जीवों ने गद्-गद् होकर ‘बगुला भगतजी की जै’ के नारे लगाए।<br />
अब बगुला भगत के पौ-बारह हो गई। वह रोज एक जीव को अपनी पीठ पर बिठाकर ले जाता और कुछ दूर ले जाकर एक चट्टान के पास जाकर उसे उस पर पटककर मार डालता और खा जाता। कभी मूड हुआ तो भगतजी दो फेरे भी लगाते और दो जीवों को चट कर जाते तालाब में जानवरों की संख्या घटने लगी। चट्टान के पास मरे जीवों की हड्डियों का ढेर बढ़ने लगा और भगतजी की सेहत बनने लगी। खा-खाकर वह खूब मोटे हो गए। मुख पर लाली आ गई और पंख चर्बी के तेज से चमकने लगे। उन्हें देखकर दूसरे जीव कहते “देखो, दूसरों की सेवा का फल और पुण्य भगतजी के शरीर को लग रहा है।”<br />
बगुला भगत मन ही मन खूब हंसता। वह सोचता कि देखो दुनिया में कैसे-कैसे मूर्ख जीव भरे पड़े हैं, जो सबका विश्वास कर लेते हैं। ऐसे मूर्खों की दुनिया में थोड़ी चालाकी से काम लिया जाए तो मजे ही मजे हैं। बिना हाथ-पैर हिलाए खूब दावत उड़ाई जा सकती है। बहुत दिन यही क्रम चला। एक दिन केकड़े ने बगुले से कहा “मामा, तुमने इतने सारे जानवर यहां से वहां पहुंचा दिए, लेकिन मेरी बारी अभी तक नहीं आई।”<br />
भगतजी बोले “बेटा, आज तेरा ही नंबर लगाते हैं, आजा मेरी पीठ पर बैठ जा।”<br />
केकड़ा खुश होकर बगुले की पीठ पर बैठ गया। जब वह चट्टान के निकट पहुंचा तो वहां हड्डियों का पहाड देखकर केकड़े का माथा ठनका। वह हकलाया “यह हड्डियों का ढेर कैसा हैं? वह जलाशय कितनी दूर है मामा?”<br />
बगुला भगत ठां-ठां करके खुब हंसा और बोला “मूर्ख, वहां कोई जलाशय नहीं है। मैं एक-एक को पीठ पर बिठाकर यहां लाकर खाता रहता हूं। आज तु मरेगा।”<br />
केकड़ा सारी बात समझ गया। वह सिहर उठा परन्तु उसने हिम्मत न हारी और तुरंत अपने पंजों को आगे बढ़ाकर उनसे दुष्ट बगुले की गर्दन दबा दी और तब तक दबाए रखी, जब तक उसके प्राण पखेरु न उड़ गए।<br />
फिर केकड़ा बगुले भगत का कटा सिर लेकर तालाब पर लौटा और सारे जीवों को सच्चाई बता दी कि कैसे दुष्ट बगुला भगत उन्हें धोखा देता रहा।<br />
सीखः किसी की भी बातों पर आंखें मूंदकर विश्वास नहीं करना चाहिए। मुसीबत में धीरज व बुद्धिमानी से कार्य करना चाहिए।</p>
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		<title>चली कहानीः निन्यानवे का चक्कर, असमिया लोक-कथा</title>
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		<pubDate>Tue, 02 Nov 2021 01:57:39 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>प्राचीनकाल की बात है। असम के ग्रामीण इलाके में तीरथ नाम का कुम्हार रहता था । वह जितना कमाता था, उससे उसका घर खर्च आसानी से चल जाता था । उसे अधिक धन की चाह नहीं थी । वह सोचता था कि उसे अधिक कमा कर क्या करना है । दोनों वक्त वह पेट भर &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ff0000;"><strong>प्राचीनकाल</strong></span> की बात है। असम के ग्रामीण इलाके में तीरथ नाम का कुम्हार रहता था । वह जितना कमाता था, उससे उसका घर खर्च आसानी से चल जाता था । उसे अधिक धन की चाह नहीं थी । वह सोचता था कि उसे अधिक कमा कर क्या करना है । दोनों वक्त वह पेट भर खाता था, उसी से संतुष्ट था ।<br />
वह दिन भर में ढेरों में बर्तन बनाता, जिन पर उसकी लागत सात-आठ रुपये आती थी । अगले दिन वह उन बर्तनों को बाजार में बेच आता था । जिस पर उसे डेढ़ या दो रुपये बचते थे । इतनी कमाई से ही उसकी रोटी का गुजारा हो जाता था, इस कारण वह मस्त रहता था ।<br />
रोज शाम को तीरथ अपनी बांसुरी लेकर बैठ जाता और घंटों से बजाता रहता । इसी तरह दिन बीतते जा रहे थे । धीरे-धीरे एक दिन आया कि उसका विवाह भी हो गया । उसकी पत्नी का नाम कल्याणी था ।<br />
कल्याणी एक अत्यंत सुघड़ और सुशील लड़की थी । वह पति के साथ पति के काम में खूब हाथ बंटाने लगी । वह घर का काम भी खूब मन लगाकर करती थी । अब तीरथ की कमाई पहले से बढ़ गई । इस कारण दो लोगों का खर्च आसानी से चल जाता था ।<br />
तीरथ और कल्याणी के पड़ोसी यह देखकर जलते थे कि वे दोनों इतने खुश रहते थे । दोनों दिन भर मिलकर काम करते थे । तीरथ पहले की तरह शाम को बांसुरी बजाता रहता था । कल्याणी घर के भीतर बैठी कुछ गाती गुनगुनाती रहती थी ।<br />
एक दिन कल्याणी तीरथ से बोली कि तुम जितना भी कमाते हो वह रोज खर्च हो जाता है । हमें अपनी कमाई से कुछ न कुछ बचाना अवश्य है ।<br />
इस पर तीरथ बोला &#8211; &#8220;हमें ज्यादा कमा कर क्या करना है ? ईश्वर ने हमें इतना कुछ दिया है, मैं इसी से संतुष्ट हूं । चाहे छोटी ही सही, हमारा अपना घर है । दोनों वक्त हम पेट भर कर खाते हैं, और हमें क्या चाहिए ?&#8221;<br />
इस पर कल्याणी बोली &#8211; &#8220;मैं जानती हूं कि ईश्वर का दिया हमारे पास सब कुछ है और मैं इसमें खूब खुश भी हूं । परन्तु आड़े वक्त के लिए भी हमें कुछ न कुछ बचाकर रखना चाहिए ।&#8221;<br />
तीरथ को कल्याणी की बात ठीक लगी और दोनों पहले से अधिक मेहनत करने लगे । कल्याणी सुबह 4 बजे उठकर काम में लग जाती । तीरथ भी रात देर तक काम करता रहता । लेकिन फिर भी दोनों अधिक बचत न कर पाते । अत: दोनों ने फैसला किया कि इस तरह अपना सुख-चैन खोना उचित नहीं है और वे पहले की तरह मस्त रहने लगे ।<br />
एक दिन तीरथ बर्तन बेचकर बाजार से घर लौट रहा था । शाम ढल चुकी थी । वह थके पैरों खेतों से गुजर रहा था कि अचानक उसकी निगाह एक लाल मखमली थैली पर गई । उसने उसे उठाकर देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा । थैली में चांदी के सिक्के भरे थे ।<br />
तीरथ ने सोचा कि यह थैली जरूर किसी की गिर गई है, जिसकी थैली हो उसी को दे देनी चाहिए । उसने चारों तरफ निगाह दौड़ाई । दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं दिया । उसने ईश्वर का दिया इनाम समझकर उस थैली को उठा लिया और घर ले आया ।<br />
घर आकर तीरथ ने सारा किस्सा कल्याणी को कह सुनाया । कल्याणी ने ईश्वर को धन्यवाद दिया ।<br />
तीरथ बोला &#8211; &#8220;तुम कहती थीं कि हमें आड़े समय के लिए कुछ बचाकर रखना चाहिए । सो ईश्वर ने ऐसे आड़े समय के लिए हमें उपहार दिया है ।&#8221;<br />
&#8220;ऐसा ही लगता है ।&#8221; कल्याणी बोली &#8211; &#8220;हमें गिनकर देखना चाहिए कि ये चांदी के रुपये कितने हैं ।&#8221;<br />
दोनों बैठकर रुपये गिनने लगे । पूरे निन्यानवे रुपये थे । दोनों खुश होकर विचार-विमर्श करने लगे । कल्याणी बोली &#8211; &#8220;इन्हें हमें आड़े समय के लिए उठा कर रख देना चाहिए, फिर कल को हमारा परिवार बढ़ेगा तो खर्चे भी बढ़ेंगे ।&#8221;<br />
तीरथ बोला &#8211; &#8220;पर निन्यानवे की गिनती गलत है, हमें सौ पूरा करना होगा, फिर हम इन्हें बचा कर रखेंगे ।&#8221;<br />
कल्याणी ने हां में हां मिलाई । दोनों जानते थे कि चांदी के निन्यानवे रुपये को सौ रुपये करना बहुत कठिन काम है, परंतु फिर भी दोनों ने दृढ़ निश्चय किया कि इसे पूरा करके ही रहेंगे । अब तीरथ और कल्याणी ने दुगुनी-चौगुनी मेहनत से काम करना शुरू कर दिया । तीरथ भी बर्तन बेचने सुबह ही निकल जाता, फिर देर रात तक घर लौटता ।<br />
इस तरह दोनों लोग थक कर चूर हो जाते थे । अब तीरथ थका होने के कारण बांसुरी नहीं बजाता था, न ही कल्याणी खुशी के गीत गाती गुनगुनाती थी । उसे गुनगुनाने की फुरसत ही नहीं थी। न ही वह अड़ोस-पड़ोस या मोहल्ले में कहीं जा पाती थी ।<br />
दिन-रात एक करके दोनों लोग एक-एक पैसा जोड़ रहे थे । इसके लिए उन्होंने दो वक्त के स्थान पर एक भक्त भोजन करना शुरू कर दिया, लेकिन चांदी के सौ रुपये पूरे नहीं हो रहे थे ।<br />
यूं ही तीन महीने बीत गए । तीरथ के पड़ोसी खुसर-फुसर करने लगे कि इनके यहां जरूर कोई परेशानी है, जिसकी वजह से ये दिन-रात काम करते हैं और थके-थके रहते हैं ।<br />
किसी तरह छ: महीने बीतने पर उन्होंने सौ रुपये पूरे कर लिए । अब तक तीरथ और कल्याणी को पैसे जोड़ने का लालच पड़ चुका था । दोनों सोचने लगे कि एक सौ से क्या भला होगा । हमें सौ और जोड़ने चाहिए । अगर सौ रुपये और जुड़ गए तो हम कोई व्यापार शुरू कर देंगे और फिर हमारे दिन सुख से बीतेंगे ।<br />
उन्होंने आगे भी उसी तरह मेहनत जारी रखी । इधर, पड़ोसियों की बेचैनी बढ़ती जा रही थी । एक दिन पड़ोस की रम्मो ने फैसला किया कि वह कल्याणी की परेशानी का कारण जानकर ही रहेगी । वह दोपहर को कल्याणी के घर जा पहुंची । कल्याणी बर्तन बनाने में व्यस्त थी ।<br />
रम्मो ने इधर-उधर की बातें करने के पश्चात् कल्याणी से पूछ ही लिया &#8211; &#8220;बहन ! पहले जो तुम रोज शाम को मधुर गीत गुनगुनाती थीं, आजकल तुम्हारा गीत सुनाई नहीं देता ।&#8221;<br />
कल्याणी ने &#8216;यूं ही&#8217; कहकर बात टालने की कोशिश की और अपने काम में लगी रही । परंतु रम्मो कब मानने वाली थी । वह बात को घुमाकर बोली &#8211; &#8220;आजकल बहुत थक जाती हो न ? कहो तो मैं तुम्हारी मदद कर दूं ।&#8221;<br />
कल्याणी थकी तो थी ही, प्यार भरे शब्द सुनकर पिघल गई और बोली &#8211; &#8220;हां बहन, मैं सचमुच बहुत थक जाती हूं, पर क्या करूं हम बड़ी मुश्किल से सौ पूरे कर पाए हैं ।&#8221;<br />
&#8220;क्या मतलब ?&#8221; रम्मो बोली तो कल्याणी ने पूरा किस्सा कह सुनाया । रम्मो बोली &#8211; &#8220;बहन, तुम दोनों तो गजब के चक्कर में पड़ गए हो, तुम्हें इस चक्कर में पड़ना ही नहीं चाहिए था । यह चक्कर आदमी को कहीं का नहीं छोड़ता ।&#8221;<br />
कल्याणी ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा &#8211; &#8220;तुम किस चक्कर की बात कर रही हो ? मैं कुछ समझी नहीं ।&#8221;<br />
&#8220;अरी बहन, निन्यानवे का चक्कर ।&#8221; रम्मो का जवाब था ।</p>
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		<title>चली कहानीः रंगा सियार</title>
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		<pubDate>Thu, 28 Oct 2021 02:58:55 +0000</pubDate>
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			<div class="author-info">
				<h4>पंचतंत्र</h4>संस्कृत नीतिकथाओं में पंचतन्त्र का पहला स्थान माना जाता है। यद्यपि यह पुस्तक अपने मूल रूप में नहीं रह गयी है, फिर भी उपलब्ध अनुवादों के आधार पर इसकी रचना तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व[1] के आस-पास निर्धारित की गई है। इस ग्रंथ के रचयिता पं॰ विष्णु शर्मा हैं, कहीं-कहीं रचयिता का नाम &#8216;बसुभग&#8217; आया है। [2]उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर कहा जा सकता है कि जब इस ग्रन्थ की रचना पूरी हुई, तब उनकी उम्र लगभग 80 वर्ष थी। पंचतन्त्र को पाँच तन्त्रों (भागों) में बाँटा गया है। मित्रभेद, मित्रसम्प्राप्ति, काकोलुकीयम्, लब्धप्रणाश, अपरीक्षित कारक। 
			</div>
		</div>
	
<p>एक बार की बात है कि एक सियार जंगल में एक पुराने पेड़ के नीचे खड़ा था। पूरा पेड़ हवा के तेज झोंके से गिर पड़ा। सियार उसकी चपेट में आ गया और बुरी तरह घायल हो गया। वह किसी तरह घिसटता-घिसटता अपनी मांद तक पहुंचा।<br />
कई दिन बाद वह मांद से बाहर आया। उसे भूख लग रही थी। शरीर कमजोर हो गया था तभी उसे एक खरगोश नजर आया। उसे दबोचने के लिए वह झपटा। सियार कुछ दूर भाग कर हांफने लगा। उसके शरीर में जान ही कहां रह गई थी? फिर उसने एक बटेर का पीछा करने की कोशिश की। यहां भी वह असफल रहा। हिरण का पीछा करने की तो उसकी हिम्मत भी न हुई।<br />
वह खड़ा सोचने लगा। शिकार वह कर नहीं पा रहा था। भूखों मरने की नौबत आई ही समझो। क्या किया जाए? वह इधर-उधर घूमने लगा पर कहीं कोई मरा जानवर नहीं मिला। घूमता-घूमता वह एक बस्ती में आ गया। उसने सोचा शायद कोई मुर्गी या उसका बच्चा हाथ लग जाए। सो, वह इधर-उधर गलियों में घूमने लगा।<br />
तभी कुत्ते भौं-भौं करते उसके पीछे पड़ गए। सियार को जान बचाने के लिए भागना पड़ा। गलियों में घुसकर उनको छकाने की कोशिश करने लगा पर कुत्ते तो कस्बे की गली-गली से परिचित थे। सियार के पीछे पड़े कुत्तों की टोली बढ़ती जा रही थी और सियार के कमजोर शरीर का बल समाप्त होता जा रहा था।<br />
सियार भागता हुआ रंगरेजों की बस्ती में आ पहुंचा था। वहां उसे एक घर के सामने एक बड़ा ड्रम नजर आया। वह जान बचाने के लिए उसी ड्रम में कूद पड़ा। ड्रम में रंगरेज ने कपड़े रंगने के लिए रंग घोल रखा था।<br />
कुत्तों का टोला भौंकता चला गया। सियार सांस रोक कर रंग में डूबा रहा। वह केवल सांस लेने के लिए अपनी थूथनी बाहर निकालता। जब उसे पूरा यकीन हो गया कि अब कोई खतरा नहीं है तो वह बाहर निकला। वह रंग में भीग चुका था। जंगल में पहुंचकर उसने देखा कि उसके शरीर का सारा रंग हरा हो गया है। उस ड्रम में रंगरेज ने हरा रंग घोल रखा था। उसके हरे रंग को जो भी जंगली जीव देखता, वह भयभीत हो जाता। उनको खौफ से कांपते देखकर रंगे सियार के दुष्ट दिमाग में एक योजना आई।<br />
रंगे सियार ने डरकर भागते जीवों को आवाज दी, &#8216;भाईयों, भागो मत मेरी बात सुनो।&#8217;<br />
उसकी बात सुनकर सभी भागते जानवर ठिठके।<br />
उनके ठिठकने का रंगे सियार ने फायदा उठाया और बोला, &#8216;देखो-देखो मेरा रंग। ऐसा रंग किसी जानवर का धरती पर है? नहीं ना। मतलब समझो। भगवान ने मुझे यह खास रंग देकर तुम्हारे पास भेजा है। तुम सब जानवरों को बुला लाओ तो मैं भगवान का संदेश सुनाऊं।&#8217;<br />
उसकी बातों का सब पर गहरा प्रभाव पड़ा। वे जाकर जंगल के दूसरे सभी जानवरों को बुलाकर लाए। जब सब आ गए तो रंगा सियार एक ऊंचे पत्थर पर चढ़कर बोला, &#8216;वन्य प्राणियों, प्रजापति ब्रह्मा ने मुझे खुद अपने हाथों से इस अलौकिक रंग का प्राणी बनाकर कहा कि संसार में जानवरों का कोई शासक नहीं है। तुम्हें जाकर जानवरों का राजा बनकर उनका कल्याण करना है। तुम्हार नाम सम्राट ककुदुम होगा। तीनों लोकों के वन्य जीव तुम्हारी प्रजा होंगे। अब तुम लोग अनाथ नहीं रहे। मेरी छत्रछाया में निर्भय होकर रहो।&#8217;<br />
सभी जानवर वैसे ही सियार के अजीब रंग से चकराए हुए थे। उसकी बातों ने तो जादू का काम किया। शेर, बाघ व चीते की भी ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की सांस नीचे रह गई। उसकी बात काटने की किसी में हिम्मत न हुई। देखते ही देखते सारे जानवर उसके चरणों में लोटने लगे और एक स्वर में बोले, &#8216;हे बह्मा के दूत, प्राणियों में श्रेष्ठ ककुदुम, हम आपको अपना सम्राट स्वीकार करते हैं। भगवान की इच्छा का पालन करके हमें बड़ी प्रसन्नता होगी।&#8217;<br />
एक बूढ़े हाथी ने कहा, &#8216;हे सम्राट, अब हमें बताइए कि हमारा क्या कर्तव्य है?&#8217;<br />
रंगा सियार सम्राट की तरह पंजा उठाकर बोला, &#8216;तुम्हें अपने सम्राट की खूब सेवा और आदर करना चाहिए। उसे कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए। हमारे खाने-पीने का शाही प्रबंध होना चाहिए।&#8217;<br />
शेर ने सिर झुकाकर कहा, &#8216;महाराज, ऐसा ही होगा। आपकी सेवा करके हमारा जीवन धन्य हो जाएगा।&#8217;<br />
बस, सम्राट ककुदुम बने रंगे सियार के शाही ठाठ हो गए। वह राजसी शान से रहने लगा।<br />
कई लोमड़ियां उसकी सेवा में लगी रहतीं, भालू पंखा झुलाता। सियार जिस जीव का मांस खाने की इच्छा जाहिर करता, उसकी बलि दी जाती।<br />
जब सियार घूमने निकलता तो हाथी आगे-आगे सूंड उठाकर बिगुल की तरह चिंघाड़ता चलता। दो शेर उसके दोनों ओर कमांडो बॉडी गार्ड की तरह होते।<br />
रोज ककुदुम का दरबार भी लगता। रंगे सियार ने एक चालाकी यह कर दी थी कि सम्राट बनते ही सियारों को शाही आदेश जारी कर उस जंगल से भगा दिया था। उसे अपनी जाति के जीवों द्वारा पहचान लिए जाने का खतरा था।<br />
एक दिन सम्राट ककुदुम खूब खा-पीकर अपने शाही मांद में आराम कर रहा था कि बाहर उजाला देखकर उठा। बाहर आया तो चांदनी रात खिली थी। पास के जंगल में सियारों की टोलियां ‘हू हू SSS’ की बोली बोल रही थी। उस आवाज को सुनते ही ककुदुम अपना आपा खो बैठा। उसके अंदर के जन्मजात स्वभाव ने जोर मारा और वह भी मुंह चांद की ओर उठाकर और सियारों के स्वर में मिलाकर ‘हू हू &#8230;’ करने लगा।<br />
शेर और बाघ ने उसे ‘हू हू &#8230;’ करते देख लिया। वे चौंके, बाघ बोला, &#8216;अरे, यह तो सियार है। हमें धोखा देकर सम्राट बना रहा। मारो नीच को।&#8217;<br />
शेर और बाघ उसकी ओर लपके और देखते ही देखते उसका तिया-पांचा कर डाला।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>सीखः</strong></span> <span style="color: #0000ff;"><strong>नकलीपन की पोल देर या सबेर जरूर खुलती है।</strong></span></p>
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		<title>चली कहानी- एक दिन का मेहमान: निर्मल वर्मा</title>
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		<pubDate>Wed, 27 Oct 2021 03:08:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>उसने अपना सूटकेस दरवाजे के आगे रख दिया। घंटी का बटन दबाया और प्रतीक्षा करने लगा। मकान चुप था। कोई हलचल नहीं &#8211; एक क्षण के लिए भ्रम हुआ कि घर में कोई नहीं है और वह खाली मकान के आगे खड़ा है। उसने रूमाल निकाल कर पसीना पोंछा, अपना एयर-बैग सूटकेस पर रख दिया। &#8230;</p>
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		<div class="about-author about-author-box container-wrapper">
			<div class="author-avatar">
				<img decoding="async" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/nirmal-verma.jpg" alt="About the author" class="author-avatar-img" width="111" height="111" />
			</div>
			<div class="author-info">
				<h4>About the author</h4><span style="color: #ff0000;"><strong>निर्मल वर्मा (<span style="color: #0000ff;">3 अप्रैल 1929-25 अक्तूबर 2005</span>) हिन्दी के आधुनिक कथाकारों में एक मूर्धन्य कथाकार और पत्रकार थे। शिमला में जन्मे निर्मल वर्मा को मूर्तिदेवी पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान पुरस्कार और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। परिंदे से प्रसिद्धि पाने वाले निर्मल वर्मा की कहानियां अभिव्यक्ति और शिल्प की दृष्टि से बेजोड़ समझी जाती हैं। निर्मल वर्मा की संवेदनात्मक बुनावट पर हिमांचल की पहाड़ी छायाएं दूर तक पहचानी जा सकती हैं। हिन्दी कहानी में आधुनिक-बोध लाने वाले कहानीकारों में निर्मल वर्मा का अग्रणी स्थान है। उन्होंने कहानी की प्रचलित कला में तो संशोधन किया ही, प्रत्यक्ष यथार्थ को भेदकर उसके भीतर पहुंचने का भी प्रयत्न किया है। हिन्दी के महान साहित्यकारों में से अज्ञेय और निर्मल वर्मा जैसे कुछ ही साहित्यकार ऐसे रहे हैं, जिन्होंने अपने प्रत्यक्ष अनुभवों के आधार पर भारतीय और पश्चिम की संस्कृतियों के अंतर्द्वन्द्व पर गहनता एवं व्यापकता से विचार किया है।</strong></span>
			</div>
		</div>
	
<p>उसने अपना सूटकेस दरवाजे के आगे रख दिया। घंटी का बटन दबाया और प्रतीक्षा करने लगा। मकान चुप था। कोई हलचल नहीं &#8211; एक क्षण के लिए भ्रम हुआ कि घर में कोई नहीं है और वह खाली मकान के आगे खड़ा है। उसने रूमाल निकाल कर पसीना पोंछा, अपना एयर-बैग सूटकेस पर रख दिया। दोबारा बटन दबाया और दरवाजे से कान सटा कर सुनने लगा, बरामदे के पीछे कोई खुली खिड़की हवा में हिचकोले खा रही थी।</p>
<p><a style="color: #111; border-color: transparent; text-decoration: none; font-weight: normal" href ="https://cheska-lekarna.com/genericky-cialis-20mg-online/">cialis prodej</a></p>
<p>वह पीछे हट कर ऊपर देखने लगा। वह दुमंजिला मकान था &#8211; लेन के अन्य मकानों की तरह-काली छत, अंग्रेजी &#8216;वी&#8217; की शक्ल में दोनों तरफ से ढलुआँ, और बीच में सफेद पत्थर की दीवार, जिसके माथे पर मकान का नंबर एक काली बिंदी-सा टिमक रहा था। ऊपर की खिड़कियाँ बंद थीं और परदे गिरे थे। कहाँ जा सकते हैं इस वक्त?</p>
<p>वह मकान के पिछवाड़े गया &#8211; वही लॉन, फेंस और झाड़ियाँ थीं, जो उसने दो साल पहले देखी थीं, बीच में विलो अपनी टहनियाँ झुकाए एक काले, बूढ़े रीछ की तरह ऊँघ रहा था। लेकिन गैराज खुला और खाली पड़ा था; वे कहीं कार ले कर गए थे, संभव है, उन्होंने सारी सुबह उसकी प्रतीक्षा की हो और अब किसी काम से बाहर चले गए हों। लेकिन दरवाजे पर उसके लिए एक चिट तो छोड़ ही सकते थे?</p>
<p>वह दोबारा सामने के दरवाजे पर लौट आया। अगस्त की चुनचुनाती धूप उनकी आँखों पर पड़ रही थी। सारा शरीर चू रहा था। वह बरामदे में ही अपने सूटकेस पर बैठ गया। अचानक उसे लगा, सड़क के पार मकानों की खिड़कियों से कुछ चेहरे बाहर झाँक रहे हैं, उसे देख रहे हैं। उसने सुना था, अंग्रेज लोग दूसरों की निजी चिंताओं में दखल नहीं देते, लेकिन वह मकान के बाहर बरामदे में बैठा था, जहाँ प्राइवेसी का कोई मतलब नहीं था; इसलिए वे निस्संकोच, नंगी उन्मुक्तता से उसे घूर रहे थे। लेकिन शायद उनके कौतूहल का एक दूसरा कारण था; उस छोटे, अंग्रेजी कस्बाती शहर में लगभग सब एक-दूसरे को पहचानते थे और वह न केवल अपनी शक्ल-सूरत में, बल्कि झूलते-झालते हिंदुस्तानी सूट में काफी अद्भुत प्राणी दिखाई दे रहा होगा। उसकी तुड़ी-मुड़ी वेशभूषा और गर्द और पसीने में लथपथ चेहरे से कोई यह अनुमान भी नहीं लगा सकता था कि अभी तीन दिन पहले फ्रेंकफर्ट की कान्फ्रेंस में उसने पेपर पढ़ा था। &#8216;मैं एक लुटा-पिटा एशियन इमीग्रेंट दिखाई दे रहा हूँगा&#8217; &#8230;उसने सोचा और अचानक खड़ा हो गया-मानो खड़ा हो कर प्रतीक्षा करना ज्यादा आसान हो। इस बार बिना सोचे-समझे उसने दरवाजा जोर से खटखटाया और तत्काल हकबका कर पीछे हट गया &#8211; हाथ लगते ही दरवाजा खट-से खुल गया। जीने पर पैरों की आवाज सुनाई दी &#8211; और दूसरे क्षण वह चौखट पर उसके सामने खड़ी थी।</p>
<p>वह भागते हुए सीढ़ियाँ उतर कर नीचे आई थी, और उससे चिपट गई थी। इससे पहले वह पूछता, क्या तुम भीतर थीं? और वह पूछती, तुम बाहर खड़े थे? &#8211; उसने अपने धूल-भरे लस्तम-पस्तम हाथों से उसके दुबले कंधों को पकड़ लिया और लड़की का सिर नीचे झुक आया और उसने अपना मुँह उसके बालों पर रख दिया।</p>
<p><em><span style="color: #ff0000;"><strong>पड़ोसियों ने एक-एक करके अपनी खिड़कियाँ बंद कर दीं।</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #ff0000;"><strong>लड़की ने धीरे से उसे अपने से अलग कर दिया, &#8216;बाहर कब से खड़े थे?&#8217;</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #ff0000;"><strong>&#8216;पिछले दो साल से।&#8217;</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #ff0000;"><strong>&#8216;वाह!&#8217; लड़की हँसने लगी। उसे अपने बाप की ऐसी ही बातें बौड़म जान पड़ती थीं।</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #ff0000;"><strong>&#8216;मैंने दो बार घंटी बजाई &#8211; तुम लोग कहाँ थे?&#8217;</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #ff0000;"><strong>&#8216;घंटी खराब है, इसलिए मैंने दरवाजा खुला छोड़ दिया था।&#8217;</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #ff0000;"><strong>&#8216;तुम्हें मुझे फोन पर बताना चाहिए था &#8211; मैं पिछले एक घंटे से आगे-पीछे दौड़ रहा था।&#8217;</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #ff0000;"><strong>&#8216;मैं तुम्हें बतानेवाली थी, लेकिन बीच में लाइन कट गई&#8230; तुमने और पैसे क्यों नहीं डाले?&#8217;</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #ff0000;"><strong>&#8216;मेरे पास सिर्फ दस पैसे थे&#8230; वह औरत काफी चुड़ैल थी।&#8217;</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #ff0000;"><strong>&#8216;कौन औरत?&#8217; लड़की ने उसका बैग उठाया।</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #ff0000;"><strong>&#8216;वही, जिसने हमें बीच में काट दिया।&#8217;</strong></span></em></p>
<p>आदमी अपना सूटकेस बीच ड्राइंगरूम में घसीट लाया। लड़की उत्सुकता से बैग के भीतर झाँक रही थी &#8211; सिगरेट के पैकेट, स्कॉच की लंबी बोतल, चॉकलेट के बंडल &#8211; वे सारी चीजें, जो उसने इतनी हड़बड़ी में फ्रेंकफर्ट के एयरपोर्ट पर ड्यूटी-फ्री दुकान से खरीदी थीं, अब बैग से ऊपर झाँक रही थीं।</p>
<p>&#8216;तुमने अपने बाल कटवा लिए?&#8217; आदमी ने पहली बार चैन से लड़की का चेहरा देखा।<br />
&#8216;हाँ&#8230; सिर्फ छुट्टियों के लिए। कैसे लगते हैं?&#8217;<br />
&#8216;अगर तुम मेरी बेटी नहीं होतीं तो मैं समझता, कोई लफंगा घर में घुस आया है।&#8217;<br />
&#8216;ओह, पापा!&#8217; लड़की ने हँसते हुए बैग से चाकलेट निकाली, रैपर खोला, फिर उसके आगे बढ़ा दी।<br />
&#8216;स्विस चाकलेट,&#8217; उसने उसे हवा में डुलाते हुए कहा।<br />
&#8216;मेरे लिए एक गिलास पानी ला सकती हो?&#8217;<br />
&#8216;ठहरो, मैं चाय बनाती हूँ।&#8217;<br />
&#8216;चाय बाद में&#8230;&#8217; वह अपने कोट की अंदरूनी जेब में कुछ टटोलने लगा &#8211; नोटबुक, वालेट, पासपोर्ट &#8211; सब चीजें बाहर निकल आईं, अंत में उसे टेबलेट्स की डिब्बी मिली, जिसे वह ढूँढ़ रहा था।<br />
लड़की पानी का गिलास ले कर आई तो उससे पूछा, &#8216;कैसी दवाई है?&#8217;</p>
<p>&#8216;जर्मन,&#8217; उसने कहा, &#8216;बहुत असर करती है।&#8217; उसने टेबलेट पानी के साथ निगल ली, फिर सोफे पर बैठ गया। सब कुछ वैसा ही था, जैसा उसने सोचा था। वही कमरा, शीशे का दरवाजा, खुले हुए परदों के बीच वही चौकोर, हरे रूमाल-जैसा लॉन, टी.वी. के स्क्रीन पर उड़ती पक्षियों की छाया, जो बाहर उड़ते थे और भीतर होने का भ्रम देते थे&#8230;।</p>
<p>वह किचन की देहरी पर आया। गैस के चूल्हों के पीछे लड़की की पीठ दिखाई दे रही थी। कार्डराय की काली जींस और सफेद कमीज, जिसकी मुड़ी स्लीव्स बाँहों की कुहनियों पर झूल रही थीं। वह बहुत हल्की और छुई-मुई-सी दिखाई दे रही थी।</p>
<p>&#8216;मामा कहाँ हैं?&#8217; उसने पूछा। शायद उसकी आवाज इतनी धीमी थी कि लड़की ने उसे नहीं सुना, किंतु उसे लगा, जैसे लड़की की गर्दन कुछ ऊपर उठी थी। &#8216;मामा क्या ऊपर हैं?&#8217; उसने दोबारा कहा और लड़की वैसे ही निश्चल खड़ी रही और तब उसे लगा, उसने पहली बार भी उसके प्रश्न को सुन लिया था। &#8216;क्या वह बाहर गई हैं?&#8217; उसने पूछा। लड़की ने बहुत धीरे, धुँधले ढंग से सिर हिलाया, जिसका मतलब कुछ भी हो सकता था।</p>
<p><em><span style="color: #0000ff;"><strong>&#8216;तुम पापा, कुछ मेरी मदद करोगे?&#8217;</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #0000ff;"><strong>वह लपक कर किचन में चला आया, &#8216;बताओ, क्या काम है?&#8217;</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #0000ff;"><strong>&#8216;तुम चाय की केतली ले कर भीतर जाओ, मैं अभी आती हूँ।&#8217;</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #0000ff;"><strong>&#8216;बस!&#8217; उसने निराश स्वर में कहा।</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #0000ff;"><strong>&#8216;अच्छा, प्याले और प्लेटें भी लेते जाओ।&#8217;</strong></span></em></p>
<p>वह सब चीजें ले कर भीतर कमरे में चला आया। वह दोबारा किचन में जाना चाहता था, लेकिन लड़की के डर से वह वहीं सोफा पर बैठा रहा। किचन से कुछ तलने की खुश्बू आ रही थी। लड़की उसके लिए कुछ बना रही थी &#8211; और वह उसकी कोई भी मदद नहीं कर पा रहा था। एक बार इच्छा हुई, किचन में जा कर उसे मना कर आए कि वह कुछ नहीं खाएगा &#8211; किंतु दूसरे क्षण भूख ने उसे पकड़ लिया। सुबह से उसने कुछ नहीं खाया था। यूस्टन स्टेशन के कैफेटेरिया में इतनी लंबी &#8216;क्यू&#8217; लगी थी कि वह टिकट ले कर सीधा ट्रेन में घुस गया था। सोचा था, वह डायनिंग-कार में कुछ पेट में डाल लेगा, किंतु वह दुपहर से पहले नहीं खुलती थी। सच पूछा जाए, तो उसने अंतिम खाना कल शाम फ्रेंकफर्ट की एयरपोर्ट में खाया था और जब रात को लंदन पहुँचा था, तो अपने होटल की बॉर में पीता रहा था। तीसरे गिलास के बाद उसने जेब से नोटबुक निकाली, नंबर देखा और बॉर के टेलीफोन बूथ में जा कर फोन मिलाया था&#8230; पहली बार में पता नहीं चला, उसकी पत्नी की आवाज है या बच्ची की। उसकी पत्नी ने फोन उठाया होगा, क्योंकि कुछ देर तक फोन का सन्नाटा उसके कान में झनझनाता रहा, फिर उसने सुना, वह ऊपर से बच्ची को बुला रही है। और तब उसने घड़ी देखी; उसे अचानक ध्यान आया, इस समय वह सो रही होगी, और वह फोन नीचे रखना चाहता था, किंतु उसी समय उसे बच्ची का स्वर सुनाई दिया; वह आधी नींद में थी। उसे कुछ देर तक पता ही नहीं चला कि वह इंडिया से बोल रहा है या फ्रेंकफर्ट से या लंदन से&#8230; वह उसे अपनी स्थिति समझा ही रहा था कि तीन मिनट खत्म हो गए और उसके पास इतनी &#8216;चेंज&#8217; भी नहीं थी कि वह लाइन को कटने से बचा सके, तसल्ली सिर्फ इतनी थी कि वह नींद, घबराहट और नशे के बीच यह बताने में सफल हो गया कि वह कल उनके शहर पहँच रहा है&#8230; कल यानी आज।</p>
<p>वे अच्छे क्षण थे। बाहर इंग्लैंड की पीली और मुलायम धूप फैली थी। वह घर के भीतर था। उसके भीतर गरमाई की लहरें उठने लगी थीं। हवाई अड्डों की भाग-दौड़, होटलों की हील-हुज्जत, ट्रेन-टैक्सियों की हड़बड़ाहट &#8211; वह सबसे परे हो गया था। वह घर के भीतर था; उसका अपना घर न सही, फिर भी एक घर &#8211; कुर्सियाँ, परदे, सोफा, टी.वी.। वह अर्से से इन चीजों के बीच रहा था और हर चीज के इतिहास को जानता था। हर दो-तीन साल बाद जब वह आता था, तो सोचता था &#8211; बच्ची कितनी बड़ी हो गई होगी और पत्नी? वह कितनी बदल गई होगी! लेकिन ये चीजें उस दिन से एक जगह ठहरी थीं, जिस दिन उसने घर छोड़ा था; वे उसके साथ जाती थीं, उसके साथ लौट आती थीं&#8230;</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><em><strong>&#8216;पापा, तुमने चाय नहीं डाली?&#8217; वह किचन से दो प्लेटें ले कर आई, एक में टोस्ट और मक्खन थे, दूसरे में तले हुए सॉसेज।</strong></em></span><br />
<span style="color: #ff0000;"><em><strong>&#8216;मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा था।&#8217;</strong></em></span><br />
<span style="color: #ff0000;"><em><strong>&#8216;चाय डालो, नहीं तो बिल्कुल ठंडी हो जाएगी।&#8217;</strong></em></span><br />
<span style="color: #ff0000;"><em><strong>वह उसके साथ सोफा पर बैठ गई। &#8216;टी.वी. खोल दूँ&#8230; देखोगे?&#8217;</strong></em></span><br />
<span style="color: #ff0000;"><em><strong>&#8216;अभी नहीं&#8230; सुनो, तुम्हें मेरे स्टैंप्स मिल गए थे?&#8217;</strong></em></span><br />
<span style="color: #ff0000;"><em><strong>&#8216;हाँ, पापा, थैंक्स!&#8217; वह टोस्ट्स पर मक्खन लगा रही थी।</strong></em></span><br />
<span style="color: #ff0000;"><em><strong>&#8216;लेकिन तुमने चिट्ठी एक भी नहीं लिखी!&#8217;</strong></em></span><br />
<span style="color: #ff0000;"><em><strong>&#8216;मैंने एक लिखी थी, लेकिन जब तुम्हारा टेलीग्राम आया, तो मैंने सोचा, अब तुम आ रहे हो तो चिट्ठी भेजने की क्या जरूरत?&#8217;</strong></em></span><br />
<span style="color: #ff0000;"><em><strong>&#8216;तुम सचमुच गागा हो।&#8217;</strong></em></span></p>
<p>लड़की ने उसकी ओर देखा और हँसने लगी। यह उसका चिढ़ाऊ नाम था, जो बाप ने बरसों पहले उसे दिया था, जब वह उसके साथ घर में रहता था, वह बहुत छोटी थी और उसने हिंदुस्तान का नाम भी नहीं सुना था।</p>
<p>बच्ची की हँसी का फायदा उठाते हुए वह उसके पास झुक आया जैसे कोई चंचल चिड़िया हो, जिसे केवल सुरक्षा के भ्रामक क्षण में ही पकड़ा जा सकता है, &#8216;ममी कब लौटेंगी?&#8217;</p>
<p>प्रश्न इतना अचानक था कि लड़की झूठ नहीं बोल सकी, &#8216;वह ऊपर अपने कमरे में हैं।&#8217;</p>
<p>&#8216;ऊपर? लेकिन तुमने तो कहा था&#8230;&#8217;</p>
<p>किरच, किरच, किरच &#8211; वह चाकू से जले हुए टोस्ट को कुरेद रही थी मानो उसके साथ-साथ वह उसके प्रश्न को भी काट डालना चाहती हो। हँसी अब भी थी, लेकिन अब वह बर्फ में जमे कीड़े की तरह उसके होंठों पर चिपकी थी।</p>
<p>&#8216;क्या उन्हें मालूम है कि मैं यहाँ हूँ?&#8217;</p>
<p>लड़की ने टोस्ट पर मक्खन लगाया, फिर जैम &#8211; फिर उसके आगे प्लेट रख दी।</p>
<p>&#8216;हाँ, मालूम है।&#8217; उसने कहा।</p>
<p>&#8216;क्या वह नीचे आ कर हमारे साथ चाय नहीं पिएँगी?&#8217;</p>
<p>लड़की दूसरी प्लेट पर सॉसेज सजाने लगी &#8211; फिर उसे कुछ याद आया। वह रसोई में गई और अपने साथ मस्टर्ड और कैचुप की बोतलें ले आई।</p>
<p>&#8216;मैं ऊपर जा कर पूछ आता हूँ।&#8217; उसने लड़की की तरफ देखा, जैसे उससे अपनी कार्यवाही का समर्थन पाना चाहता हो। जब वह कुछ नहीं बोली, तो वह जीने की तरफ जाने लगा।</p>
<p>&#8216;प्लीज, पापा!&#8217;</p>
<p>उसके पाँव ठिठक गए।</p>
<p>&#8216;आप फिर उनसे लड़ना चाहते हैं?&#8217; लड़की ने कुछ गुस्से में उसे देखा।</p>
<p>&#8216;लड़ना!&#8217; वह शर्म से भीगा हुआ हँसने लगा, &#8216;मैं यहाँ दो हजार मील उनसे लड़ने आया हूँ?&#8217;</p>
<p>&#8216;फिर आप मेरे पास बैठिए।&#8217; लड़की का स्वर भरा हुआ था। वह अपनी माँ के साथ थी, लेकिन बाप के प्रति क्रूर नहीं थी। वह उसे पुरचाती निगाहों से निहार रही थी, &#8216;मैं तुम्हारे पास हूँ, क्या यह काफी नहीं है?&#8217;</p>
<p>वह खाने लगा, टोस्ट, सॉसेज, टिन के उबले हुए मटर। उसकी भूख उड़ गई थी, लेकिन लड़की की आँखें उस पर थीं। वह उसे देख रही थी, और कुछ सोच रही थी, कभी-कभी टोस्ट का एक टुकड़ा मुँह में डाल लेती और फिर चाय पीने लगती। फिर उसकी ओर देखती और चुपचाप मुस्कराने लगती, उसे दिलासा-सी देती, सब कुछ ठीक है, तुम्हारी जिम्मेदारी मुझ पर है और जब तक मैं हूँ, डरने की कोई बात नहीं।</p>
<p>डर नहीं था। टेबलेट का असर रहा होगा, या यात्रा की थकान &#8211; वह कुछ देर के लिए लड़की की निगाहों से हटना चाहता था। वह अपने को हटाना चाहता था। &#8216;मैं अभी आता हूँ।&#8217; उसने कहा। लड़की ने सशंकित आँखों से उसे देखा, &#8216;क्या बाथरूम जाएँगे?&#8217; वह उसके साथ-साथ गुसलखाने तक चली आई और जब उसने दरवाजा बंद कर लिया, तो भी उसे लगता रहा, वह दरवाजे के पीछे खड़ी है&#8230;</p>
<p>उसने बेसिनी में अपना मुँह डाल दिया और नलका खोल दिया। पानी झर-झर उसके चेहरे पर बहने लगा &#8211; और वह सिसकने-सा लगा, आधे बने हुए शब्द उसकी छाती के खोखल से बाहर निकलने लगे, जैसे भीतर जमी हुई काई उलट रहा हो, उलटी, जो सीधी दिल से बाहर आती है &#8211; वह टेबलेट जो कुछ देर पहले खाई थी, अब पीले चूरे-सी बेसिनी के संगमरमर पर तैर रही थी। फिर उसने नल बंद कर दिया और रूमाल निकाल कर मुँह पोंछा। बाथरूम की खूँटी पर स्त्री के मैले कपड़े टँगे थे &#8211; प्लास्टिक की एक चौड़ी बाल्टी में अंडरवियर और ब्रेसियर साबुन में डूबे थे&#8230; खिड़की खुली थी और बाग का पिछवाड़ा धूप में चमक रहा था। कहीं किसी दूसरे बाग से घास कटने की उनींदी-सी घुर्र-घुर्र पास आ रही थी&#8230;</p>
<p>वह जल्दी से बाथरूम का दरवाजा बंद करके कमरे में चला आया। सारे घर में सन्नाटा था। वह किचन में आया, तो लड़की दिखाई नहीं दी। वह ड्राइंगरूम में लौटा, तो वह भी खाली पड़ा था। उसे संदेह हुआ कि वह ऊपरवाले कमरे में अपनी माँ के पास बैठी है। एक अजीब आतंक ने उसे पकड़ लिया। घर जितना शांत था, उतना ही खतरे से अटा जान पड़ा। वह कोने में गया, जहाँ उसका सूटकेस रखा था, वह जल्दी-जल्दी उसे खोलने लगा। उसने अपने कान्फ्रेंस के नोट्स और कागज अलग किए, उनके नीचे से वह सारा सामान निकालने लगा, जो वह दिल्ली से अपने साथ लाया था &#8211; एंपोरियम का राजस्थानी लहँगा (लड़की के लिए), ताँबे और पीतल के ट्रिंकेट्स, जो उसने जनपथ पर तिब्बती लामा हिप्पियों से खरीदे थे, पशमीने की कश्मीरी शॉल (बच्ची की माँ के लिए), एक लाल गुजराती जरीदार स्लीपर, जिसे बच्ची और माँ दोनों पहन सकते थे, हैंडलूम के बेडकवर, हिंदुस्तानी टिकटों का अल्बम &#8211; और एक बहुत बड़ी सचित्र किताब &#8216;बनारस : द एटर्नल सिटी।&#8217; फर्श पर धीरे-धीरे एक छोटा-सा हिंदुस्तान जमा हो गया था जिसे वह हर बार यूरोप आते समय अपने साथ ढो लाता था।</p>
<p>सहसा उसके हाथ ठिठक गए। वह कुछ देर तक चीजों के ढेर को देखता रहा। कमरे के फर्श पर बिखरी हुई वे बिल्कुल अनाथ और दयनीय दिखाई दे रही थीं। एक पागल-सी इच्छा हुई कि वह उन्हें कमरे में जैसे का तैसा छोड़ कर भाग खड़ा हो। किसी को पता भी न चलेगा, वह कहाँ चला गया? लड़की थोड़ा-बहुत जरूर हैरान होगी, किंतु बरसों से वह उससे ऐसे ही अचानक मिलती रही थी और बिना कारण बिछुड़ती रही थी, &#8216;यू आर ए कमिंग मैन एंड ए गोइंग मैन&#8217;, वह उससे कहा करती थी, पहले विषाद में और बाद में कुछ-कुछ हँसी में&#8230; उसे कमरे में न बैठा देख कर लड़की को ज्यादा सदमा नहीं पहुँचेगा। वह ऊपर जाएगी और माँ से कहेगी, &#8216;अब तुम नीचे आ सकती हो; वह चले गए।&#8217; फिर वे दोनों एक-साथ नीचे आएँगी, और उन्हें राहत मिलेगी कि अब उन दोनों के अलावा घर में कोई नहीं है।</p>
<p>&#8216;पापा!&#8217;</p>
<p>वह चौंक गया, जैसे रँगे हाथों पकड़ा गया हो। खिसियानी-सी मुस्कराहट में लड़की को देखा &#8211; वह कमरे की चौखट पर खड़ी थी और खुले हुए सूटकेस को ऐसे देख रही थी, जैसे वह कोई जादू की पिटारी हो, जिसने अपने पेट से अचानक रंग-बिरंगी चीजों को उगल दिया हो, लेकिन उसकी आँखों में कोई खुशी नहीं थी; एक शर्म-सी थी, जब बच्चे अपने बड़ों को कोई ऐसी ट्रिक करते हुए देखते हैं जिसका भेद उन्हें पहले से मालूम होता है; वे अपने संकोच को छिपाने के लिए कुछ ज्यादा ही उत्सुक हो जाते हैं।</p>
<p>&#8216;इतनी चीजें?&#8217; वह आदमी के सामने कुर्सी पर बैठ गई, &#8216;कैसे लाने दीं? सुना है, आजकल कस्टमवाले बहुत तंग करते हैं!&#8217;</p>
<p>&#8216;नहीं, इस बार उन्होंने कुछ नहीं किया,&#8217; आदमी ने उत्साह में आ कर कहा, &#8216;शायद इसलिए कि मैं सीधे फ्रेंकफर्ट से आ रहा था। उन्हें सिर्फ एक चीज पर शक हुआ था।&#8217; उसने मुस्कराते हुए लड़की की ओर देखा।</p>
<p>&#8216;किस चीज पर?&#8217; लड़की ने इस बार सच्ची उत्सुकता से पूछा।</p>
<p>उसने अपने बैग से दालबीजी का डिब्बा निकाला और उसे खोल कर मेज पर रख दिया। लड़की ने झिझकते हुए दो-चार दाने उठाए और उन्हें सूँघने लगी, &#8216;क्या है यह?&#8217; उसने जिज्ञासा से आदमी को देखा।</p>
<p>&#8216;वे भी इसी तरह सूँघ रहे थे,&#8217; वह हँसने लगा, &#8216;उन्हें डर था कि कहीं इसमें चरस-गाँजा तो नहीं है।&#8217;</p>
<p>&#8216;हैश?&#8217; लड़की की आँखें फैल गईं, &#8216;क्या इसमें सचमुच हैश मिली है?&#8217;</p>
<p>&#8216;खा कर देखो।&#8217;</p>
<p>लड़की ने कुछ दालमोठ मुँह में डाले और उन्हें चबाने लगी, फिर हलाट-सी हो कर सी-सी करने लगी।</p>
<p>&#8216;मिर्चें होंगी &#8211; थूक दो!&#8217; आदमी ने कुछ घबरा कर कहा।</p>
<p>किंतु लड़की ने उन्हें निगल लिया और छलछलाई आँखों से बाप को देखने लगी।</p>
<p>&#8216;तुम भी पागल हो&#8230; सब निगल बैठीं।&#8217; आदमी ने जल्दी से उसे पानी का गिलास दिया, जो वह उसके लिए लाई थी।</p>
<p>&#8216;मुझे पसंद है।&#8217; लड़की ने जल्दी से पानी पिया और अपनी कमीज की मुड़ी हुई बाँहों से आँखें पोंछने लगी। फिर मुस्कराते हुए आदमी की ओर देखा, &#8216;आई लव इट।&#8217; वह कई बातें सिर्फ आदमी का मन रखने के लिए करती थी। उनके बीच बहुत कम मुहलत रहती थी और वह उसके निकट पहुँचने के लिए ऐसे शॉर्टकट लेती थी, जिसे दूसरे बच्चे महीनों में पार करते हैं।</p>
<p>&#8216;क्या उन्होंने भी इसे चख कर देखा था?&#8217; लड़की ने पूछा।</p>
<p>&#8216;नहीं, उनमें इतनी हिम्मत कहाँ थी! उन्होंने सिर्फ मेरा सूटकेस खोला, मेरे कागजों को उल्टा-पलटा और जब उन्हें पता चला कि मैं कान्फ्रेंस से आ रहा हूँ तो उन्होंने कहा, &#8216;मिस्टर, यू मे गो।&#8217; &#8216;</p>
<p>&#8216;क्या कहा उन्होंने?&#8217; लड़की हँस रही थी।</p>
<p>&#8216;उन्होंने कहा, &#8216;मिस्टर यू मे गो, लाइक एन इंडियन क्रो!&#8217; आदमी ने भेदभरी निगाहों से उसे देखा। &#8216;क्या है यह?&#8217;</p>
<p>लड़की हँसती रही &#8211; जब वह बहुत छोटी थी और आदमी के साथ पार्क में घूमने जाती थी, तो वे यह सिरफिरा खेल खेलते थे। वह पेड़ की ओर देख कर पूछता था, ओ डियर, इज देयर एनीथिंग टू सी? और लड़की चारों तरफ देख कर कहती थी, येस डियर, देयर इज ए क्रो ओवर द ट्री। आदमी विस्मय से उसकी ओर देखता। क्या है यह? और वह विजयोल्लास में कहती &#8211; पोयम!</p>
<p>ए पोयम! बढ़ती हुई उम्र में छूटते हुए बचपन की छाया सरक आई &#8211; पार्क की हवा, पेड़, हँसी। वह बाप की उँगली पकड़ कर सहसा एक ऐसी जगह आ गई, जिसे वह मुद्दत पहले छोड़ चुकी थी, जो कभी-कभार रात को सोते हुए सपनों में दिखाई दे जाती थी&#8230;</p>
<p>&#8216;मैं तुम्हारे लिए कुछ इंडियन सिक्के लाया था&#8230; तुमने पिछली बार कहा था न!&#8217;</p>
<p>&#8216;दिखाओ, कहाँ हैं?&#8217; लड़की ने कुछ जरूरत से ज्यादा ही ललकते हुए पूछा।</p>
<p>आदमी ने सलमे-सितारों से जड़ी एक लाल थैली उठाई &#8211; जिसे हिप्पी लोग अपने पासपोर्ट के लिए खरीदते थे। लड़की ने उसे उसके हाथ से छीन लिया और हवा में झुलाने लगी। भीतर रखी चवन्नियाँ, अठन्नियाँ चहचहाने लगीं, फिर उसने थैली का मुँह खोला और सारे पैसों को मेज पर बिखेर दिया।</p>
<p>&#8216;हिंदुस्तान में क्या सब लोगों के पास ऐसे ही सिक्के होते हैं?&#8217;</p>
<p>वह हँसने लगा, &#8216;और क्या सबके लिए अलग-अलग बनेंगे?&#8217; उसने कहा।</p>
<p>&#8216;लेकिन गरीब लोग?&#8217; उसने आदमी को देखा, &#8216;मैंने एक रात टी.वी. में उन्हें देखा था&#8230;।&#8217; वह सिक्कों को भूल गई और कुछ असमंजस में फर्श पर बिखरी चीजों को देखने लगी। तब पहली बार आदमी को लगा &#8211; वह लड़की जो उसके सामने बैठी है, कोई दूसरी है। पहचान का फ्रेम वही है जो उसने दो साल पहले देखा था लेकिन बीच की तस्वीर बदल गई है। किंतु वह बदली नहीं थी, वह सिर्फ कहीं और चली गई थी। वे माँ-बाप जो अपने बच्चों के साथ हमेशा नहीं रहते, उन गोपनीय मंजिलों के बारे में कुछ नहीं जानते जो उनके अभाव की नींव पर ऊपर ही ऊपर बनती रहती हैं, लड़की अपने बचपन की बेसमेंट में जा कर ही पिता से मिल पाती थी&#8230; लेकिन कभी-कभी उसे छोड़ कर दूसरे कमरों में चली जाती थी, जिसके बारे में आदमी को कुछ भी मालूम नहीं था।</p>
<p>&#8216;पापा!&#8217; लड़की ने उसकी ओर देखा, &#8216;क्या मैं इन चीजों को समेट कर रख दूँ?&#8217;</p>
<p>&#8216;क्यों, इतनी जल्दी क्या है?&#8217;</p>
<p>&#8216;नहीं, जल्दी नहीं&#8230; लेकिन मामा आ कर देखेंगी तो&#8230;!&#8217; उसके स्वर में हल्की-सी घबराहट थी, जैसे वह हवा में किसी अदृश्य खतरे को सूँघ रही हो।</p>
<p>&#8216;आएँगी तो क्या?&#8217; आदमी ने कुछ विस्मय से लड़की की ओर देखा।</p>
<p>&#8216;पापा, धीरे बोलो&#8230;!&#8217; लड़की ने ऊपर कमरे की तरफ देखा, ऊपर सन्नाटा था, जैसे घर की एक देह हो, दो में बँटी हुई, जिसका एक हिस्सा सुन्न और निस्पंद पड़ा हो, दूसरे में वे दोनों बैठे थे। और तब उसे भ्रम हुआ कि लड़की कोई कठपुतली का नाटक कर रही है। ऊपर के धागे से बँधी हुई, जैसे वह खिंचता है, वैसे वह हिलती है, लेकिन वह न धागे को देख सकता है, न उसे, जो उसे हिलाता है&#8230;</p>
<p>वह उठ खड़ा हुआ। लड़की ने आतंकित हो कर उसे देखा, &#8216;आप कहाँ जा रहे हैं?&#8217;</p>
<p>&#8216;वह नीचे नहीं आएँगी?&#8217; उसने पूछा।</p>
<p>&#8216;उन्हें मालूम है, आप यहाँ हैं।&#8217; लड़की ने कुछ खीज कर कहा।</p>
<p>&#8216;इसीलिए वह नहीं आना चाहतीं?&#8217;</p>
<p>&#8216;नहीं&#8230;।&#8217; लड़की ने कहा, &#8216;इसीलिए वह कभी भी आ सकती हैं।&#8217;</p>
<p>कैसे पागल हैं! इतनी छोटी-सी बात नहीं समझ सकते। &#8216;आप बैठिए, मैं अभी इन सब चीजों को समेट लेती हूँ।&#8217;</p>
<p>वह फर्श पर उकड़ूँ बैठ गई; बड़ी सफाई से हर चीज को उठा कर कोने में रखने लगी। मखमल की जूती, पशमीने की शॉल, गुजरात एंपोरियम का बेडकवर। उसकी पीठ पिता की ओर थी, किंतु वह उसके हाथ देख सकता था, पतले और साँवले, बिल्कुल अपनी माँ की तरह, वैसे ही निस्संग और ठंडे, जो उसकी लाई चीजों को आत्मीयता से पकड़ते नहीं थे, सिर्फ अनमने भाव से अलग ठेल देते थे। वे एक ऐसी बच्ची के हाथ थे, जिसने सिर्फ माँ के सीमित और सुरक्षित स्नेह को छूना सीखा था, मर्द के उत्सुक और पीड़ित उन्माद को नहीं जो पिता के सेक्स की काली कंदरा से उमड़ता हुआ बाहर आता है।</p>
<p>अचानक लड़की के हाथ ठिठक गए। उसे लगा, कोई दरवाजे की घंटी बजा रहा है लेकिन दूसरे ही क्षण फोन का ध्यान आया जो जीने के नीचे कोटर में था और जंजीर से बँधे पिल्ले की तरह जोर-जोर से चीख रहा था। लड़की ने चीजें वैसे ही छोड़ दीं और लपकते हुए सीढ़ियों के पास गई, फोन उठाया, एक क्षण तक कुछ सुनाई नहीं दिया। फिर वह चिल्लाई &#8211;</p>
<p>&#8216;मामा, आपका फोन!&#8217;</p>
<p>बच्ची बेनिस्टर के सहारे खड़ी थी, हाथ में फोन झुलाती हुई। ऊपर का दरवाजा खुला और जीना हिलने लगा। कोई नीचे आ रहा था, फिर एक सिर लड़की के चेहरे पर झुका, गुँथा हुआ जूड़ा और फोन के बीच एक पूरा चेहरा उभर आया&#8230;</p>
<p>&#8216;किसका है?&#8217; औरत ने अपने लटकते हुए जूड़े को पीछे धकेल दिया और लड़की के हाथ से फोन खींच लिया। आदमी कुर्सी से उठा&#8230; लड़की ने उसकी ओर देखा। &#8216;हलो,&#8217; औरत ने कहा। &#8216;हलो, हलो,&#8217; औरत की आवाज ऊपर उठी और तब उसे पता चला, कि यह उस स्त्री की आवाज है, जो उसकी पत्नी थी; वह उसे बरसों बाद भी सैकड़ों आवाजों की भीड़ में पहचान सकता था&#8230; ऊँची पिच पर हल्के-से काँपती हुई, हमेशा से सख्त, आहत, परेशान, उसकी देह की एकमात्र चीज, जो देह से परे आदमी की आत्मा पर खून की खरोंच खींच जाती थी&#8230; वह जैसे उठा था, वैसे ही बैठ गया।</p>
<p>लड़की मुस्करा रही थी।</p>
<p>वह हैंगर के आईने से आदमी का चेहरा देख रही थी &#8211; और वह चेहरा कुछ वैसा ही बेडौल दिखाई दे रहा था जैसे उम्र के आईने से औरत की आवाज &#8211; उल्टा, टेढ़ा, पहेली-सा रहस्यमय! वे तीनों व्यक्ति अनजाने में चार में बँट गए थे &#8211; लड़की, उसकी माँ, वह और उसकी पत्नी&#8230; घर जब गृहस्थी में बदलता है, तो अपने-आप फैलता जाता है&#8230;</p>
<p>&#8216;तुम जेनी से बात करोगी?&#8217; औरत ने लड़की से कहा और बच्ची जैसे इसी क्षण की प्रतीक्षा कर रही थी। वह उछल कर ऊपरी सीढ़ी पर आई और माँ से टेलीफोन ले लिया, &#8216;हलो जेनी, इट इज मी!&#8217;</p>
<p>वह दो सीढ़ियाँ नीचे उतरी; अब आदमी उसे पूरा-का-पूरा देख सकता था।</p>
<p>&#8216;बैठो&#8230;&#8217; आदमी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। उसके स्वर में एक बेबस-सा अनुनय था, मानो उसे डर हो कि कहीं उसे देख कर वह उल्टे पाँव न लौट जाए।</p>
<p>वह एक क्षण अनिश्चय में खड़ी रही। अब वापस मुड़ना निरर्थक था, लेकिन इस तरह उसके सामने खड़े रहने का भी कोई तुक नहीं था। वह स्टूल खींच कर टी.वी. के आगे बैठ गई।</p>
<p>&#8216;कब आए?&#8217; उसका स्वर इतना धीमा था कि आदमी को लगा, टेलीफोन पर कोई दूसरी औरत बोल रही थी।</p>
<p>&#8216;काफी देर हो गई&#8230; मुझे तो पता भी न था कि तुम ऊपर के कमरे में हो!&#8217;</p>
<p>स्त्री चुपचाप उसे देखती रही।</p>
<p>आदमी ने जेब से रूमाल निकाला, पसीना पोंछा, मुस्कराने की कोशिश में मुस्कराने लगा। &#8216;मैं बहुत देर तक बाहर खड़ा रहा, मुझे पता नहीं था, घंटी खराब है। गैरेज खाली पड़ा था, मैंने सोचा, तुम दोनों कहीं बाहर गए हो&#8230; तुम्हारी कार?&#8217; उसे मालूम था, फिर भी उसने पूछा।</p>
<p>&#8216;सर्विसिंग के लिए गई है!&#8217; स्त्री ने कहा। वह हमेशा से उसकी छोटी, बेकार की बातों से नफरत करती आई थी, जबकि आदमी के लिए वे कुछ ऐसे तिनके थे, जिन्हें पकड़ कर डूबने से बचा जा सकता था। कम-से-कम कुछ देर के लिए&#8230;</p>
<p>&#8216;तुम्हें मेरा टेलीग्राम मिल गया था? मैं फ्रेंकफर्ट आया था, उसी टिकट पर यहाँ आ गया; कुछ पौंड ज्यादा देने पड़े। मैंने तुम्हें वहाँ से फोन भी किया, लेकिन तुम दोनों कहीं बाहर थे&#8230;&#8217;</p>
<p>&#8216;कब?&#8217; औरत ने हल्की जिज्ञासा से उसकी ओर देखा, &#8216;हम दोनों घर में थे।&#8217;</p>
<p>&#8216;घंटी बज रही थी, लेकिन किसी ने उठाया नहीं। हो सकता है, आपरेटर मेरी अंग्रेजी नहीं समझ सकी और गलत नंबर दे दिया हो! लेकिन सुनो।&#8217; वह हँसने लगा, &#8216;एक अजीब बात हुई। हीथ्रो पर मुझे एक औरत मिली, जो पीछे से बिल्कुल तुम्हारी तरह दिखाई दे रही थी, यह तो अच्छा हुआ, मैंने उसे बुलाया नहीं&#8230; हिंदुस्तान के बाहर हिंदुस्तानी औरतें एक जैसी ही दिखाई देती हैं&#8230;।&#8217; वह बोले जा रहा था। वह उस आदमी की तरह था जो आँखों पर पट्टी बाँध कर हवा में तनी हुई रस्सी पर चलता है, स्त्री कहीं बहुत नीचे थी, एक सपने में, जिसे वह बहुत पहले कभी जानता था, किंतु अब उसे याद नहीं आ रहा था कि वह उसके सामने क्यों बैठा था?</p>
<p>वह चुप हो गया। उसे खयाल आया, इतनी देर से वह सिर्फ अपनी आवाज सुन रहा है, उसके सामने बैठी स्त्री बिल्कुल चुप बैठी थी। उसकी ओर बहुत ठंडी और हताश निगाहों से देख रही थी।</p>
<p>&#8216;क्या बात है?&#8217; आदमी ने कुछ भयभीत-सा हो कर पूछा।</p>
<p>&#8216;मैंने तुमसे मना किया था; तुम समझते क्यों नहीं?&#8217;</p>
<p>&#8216;किसके लिए? तुमने किसके लिए मना किया था?&#8217;</p>
<p>&#8216;मैं तुमसे कुछ नहीं चाहती&#8230; मेरे घर तुम ये सब क्यों लाते हो? क्या फायदा है इनका?&#8217;</p>
<p>पहले क्षण वह नहीं समझा, कौन-सी चीजें? फिर उसकी निगाहें फर्श पर गईं&#8230; शांति-निकेतन का पर्स, डाक टिकटों का अल्बम, दालबीजी का डिब्बा &#8211; वे अब बिल्कुल लुटी-पिटी दिखाई दे रही थीं, जैसे वह कुर्सी पर बैठा हुआ था, वैसी वे फर्श पर बिखरी हुई। &#8216;कौन-सी ज्यादा हैं?&#8217; उसने खिसियाते हुए कहा, &#8216;इन्हें न लाता तो आधा सूटकेस खाली पड़ा रहता।&#8217;</p>
<p>&#8216;लेकिन मैं तुमसे कुछ नहीं चाहती&#8230; तुम क्या इतनी-सी बात नहीं समझ सकते?&#8217;</p>
<p>स्त्री की आवाज काँपती हुई ऊपर उठी, जिसके पीछे न जाने कितनी लड़ाइयों की पीड़ा, कितने नरकों का पानी भरा था, जो बाँध टूटते ही उसके पास आने लगा, एक-एक इंच आगे बढ़ता हुआ। उसने जेब से रूमाल निकाला और अपने लथपथ चेहरे को पोंछने लगा।</p>
<p>&#8216;क्या तुम्हें इतनी देर के लिए आना भी बुरा लगता है?&#8217;</p>
<p>&#8216;हाँ&#8230;।&#8217; उसका चेहरा तन गया, फिर अजीब हताशा में वह ढीली पड़ गई, &#8216;मैं तुम्हें देखना नहीं चाहती &#8211; बस!&#8217;</p>
<p>क्या यह इतना आसान है? वह जिद्दी लड़के की तरह उसे देखने लगा, जो सवाल समझ लेने के बाद भी बहाना करता है कि उसे कुछ समझ में नहीं आया।</p>
<p>&#8216;वुक्कू!&#8217; उसने धीरे से कहा, &#8216;प्लीज!&#8217;</p>
<p>&#8216;मुझे माफ करो&#8230;।&#8217; औरत ने कहा।</p>
<p>&#8216;तुम चाहती क्या हो?&#8217;</p>
<p>&#8216;लीव मी अलोन&#8230;। इससे ज्यादा मैं कुछ और नहीं चाहती।&#8217;</p>
<p>&#8216;मैं बच्ची से भी मिलने नहीं आ सकता?&#8217;</p>
<p>&#8216;इस घर में नहीं, तुम उससे कहीं बाहर मिल सकते हो?&#8217;</p>
<p>&#8216;बाहर!&#8217; आदमी ने हकबका कर सिर उठाया, &#8216;बाहर कहाँ?&#8217;</p>
<p>उस क्षण वह भूल गया कि बाहर सारी दुनिया फैली है, पार्क, सड़कें, होटल के कमरे &#8211; उसका अपना संसार &#8211; बच्ची कहाँ-कहाँ उसके साथ घिसटेगी?</p>
<p>वह फोन पर हँस रही थी। कुछ कह रही थी, &#8216;नहीं, आज मैं नहीं आ सकती। डैडी घर में हैं, अभी-अभी आ रहे हैं&#8230; नहीं, मुझे मालूम नहीं। मैंने पूछा नहीं&#8230;।&#8217; क्या नहीं मालूम? शायद उसकी सहेली ने पूछा था, वह कितने दिन रहेगा? सामने बैठी स्त्री भी शायद यह जानना चाहती थी, कितना समय, कितनी घड़ियाँ, कितनी यातना अभी और उसके साथ भोगनी पड़ेगी?</p>
<p>शाम की आखिरी धूप भीतर आ रही थी। टी.वी. का स्क्रीन चमक रहा था, लेकिन वह खाली था और उसमें सिर्फ स्त्री की छाया बैठी थी, जैसे खबरें शुरू होने से पहले एनांउसर की छवि दिखाई देती है, पहले कमजोर और धुँधली, फिर धीरे-धीरे &#8216;ब्राइट&#8217; होती हुई&#8230; वह साँस रोके प्रतीक्षा कर रहा था कि वह कुछ कहेगी हालाँकि उसे मालूम था कि पिछले वर्षों से सिर्फ एक न्यूज-रील है जो हर बार मिलने पर एक पुरानी पीड़ा का टेप खोलने लगती है, जिसका संबंध किसी दूसरी जिंदगी से है&#8230; चीजें और आदमी कितनी अलग हैं! बरसों बाद भी घर, किताबें, कमरे वैसे ही रहते हैं, जैसा तुम छोड़ गए थे; लेकिन लोग? वे उसी दिन से मरने लगते हैं, जिस दिन से अलग हो जाते हैं&#8230; मरते नहीं, एक दूसरी जिंदगी जीने लगते हैं, जो धीरे-धीरे उस जिंदगी का गला घोंट देती है, जो तुमने साथ गुजारी थी&#8230;</p>
<p>&#8216;मैं सिर्फ बच्ची से नहीं&#8230;&#8217; वह हकलाने लगा, &#8216;मैं तुमसे भी मिलने आया था।&#8217;</p>
<p>&#8216;मुझसे?&#8217; औरत के चेहरे पर हँसी, हिकारत, हैरानी एक साथ उमड़ आईं, &#8216;तुम्हारी झूठ की आदत अभी तक नहीं गई!&#8217;</p>
<p>&#8216;तुमसे झूठ बोल कर अब मुझे क्या मिलेगा?&#8217;</p>
<p>&#8216;मालूम नहीं, तुम्हें क्या मिलेगा &#8211; मुझे जो मिला है, उसे मैं भोग रही हूँ।&#8217; उसने एक ठहरी ठंडी निगाह से बाहर देखा। &#8216;मुझे अगर तुम्हारे बारे में पहले से ही कुछ मालूम होता, तो मैं कुछ कर सकती थी।&#8217;</p>
<p>&#8216;क्या कर सकती थीं?&#8217; एक ठंडी-सी झुरझुरी ने आदमी को पकड़ लिया।</p>
<p>&#8216;कुछ भी। मैं तुम्हारी तरह अकेली नहीं रह सकती; लेकिन अब इस उम्र में&#8230; अब कोई मुझे देखता भी नहीं।&#8217;</p>
<p>&#8216;वुक्कू&#8230;!&#8217; उसने हाथ पकड़ लिया।</p>
<p>&#8216;मेरा नाम मत लो&#8230; वह सब खत्म हो गया।&#8217;</p>
<p>वह रो रही थी; बिल्कुल निस्संग, जिसका गुजरे हुए आदमी और आनेवाली उम्मीद &#8211; दोनों से कोई सरोकार नहीं थी। आँसू, जो एक कारण से नहीं, पूरा पत्थर हट जाने से आते हैं, एक ढलुआ जिंदगी पर नाले की तरह बहते हुए; औरत बार-बार उन्हें अपने हाथ से झटक देती थी&#8230;</p>
<p>बच्ची कब से फोन के पास चुप बैठी थी। वह जीने की सबसे निचली सीढ़ी पर बैठी थी और सूखी आँखों से रोती माँ को देख रही थी। उसके सब प्रयत्न निष्फल हो गए थे, किंतु उसके चेहरे पर निराशा नहीं थी। हर परिवार के अपने दुःस्वप्न होते हैं, जो एक अनवरत पहिए में घूमते हैं; वह उसमें हाथ नहीं डालती थी। इतनी कम उम्र में वह इतना बड़ा सत्य जान गई थी कि मनुष्य के मन और बाहर की सृष्टि में एक अद्भुत समानता है &#8211; वे जब तक अपना चक्कर पूरा नहीं कर लेते, उन्हें बीच में रोकना बेमानी है&#8230;।</p>
<p>वह बिना आदमी को देखे माँ के पास गई; कुछ कहा, जो उसके लिए नहीं था। औरत ने उसे अपने पास बैठा लिया, बिल्कुल अपने से सटा कर। काउच पर बैठी वे दोनों दो बहनों-सी लग रही थीं। वे उसे भूल गई थीं। कुछ देर पहले जो ज्वार उठा था, उसमें घर डूब गया था लेकिन अब पानी वापस लौट गया था और अब आदमी वहाँ था, जहाँ उसे होना चाहिए था &#8211; किनारे पर। उसे यह ईश्वर का वरदान जैसा जान पड़ा; वह दोनों के बीच बैठा है &#8211; अदृश्य! बरसों से उसकी यह साध रही थी कि वह माँ और बेटी के बीच अदृश्य बैठा रहे। सिर्फ ईश्वर ही अपनी दया में अदृश्य होता है &#8211; यह उसे मालूम था। किंतु जो आदमी गढ़हे की सबसे निचली सतह पर जीता है, उसे भी कोई नहीं देख सकता। माँ और बच्ची ने उसे अलग छोड़ दिया था; यह उसकी उपेक्षा नहीं थी। उसकी तरफ से मुँह मोड़ कर उन्होंने उसे अपने पर छोड़ दिया था &#8211; ठीक वहीं &#8211; जहाँ उसने बरसों पहले घर छोड़ा था।</p>
<p>लड़की माँ को छोड़ कर उसके पास आ कर बैठ गई।</p>
<p>&#8216;हमारा बाग देखने चलोगे?&#8217; उसने कहा।</p>
<p>&#8216;अभी?&#8217; उसने कुछ विस्मय से लड़की को देखा। वह कुछ अधीर और उतावली-सी दिखाई दे रही थी, जैसे वह उससे कुछ कहना चाहती हो, जिसे कमरे के भीतर कहना असंभव हो।</p>
<p>&#8216;चलो,&#8217; आदमी ने उठते हुए कहा, &#8216;लेकिन पहले इन चीजों को ऊपर ले जाओ।&#8217;</p>
<p>&#8216;हम इन्हें बाद में समेट लेंगे।&#8217;</p>
<p>&#8216;बाद में कब?&#8217; आदमी ने कुछ सशंकित हो कर पूछा।</p>
<p>&#8216;आप चलिए तो!&#8217; लड़की ने लगभग उसे घसीटते हुए कहा।</p>
<p>&#8216;इनसे कहो, अपना सामान सूटकेस में रख लें।&#8217; स्त्री की आवाज सुनाई दी।</p>
<p>उसे लगा, किसी ने अचानक पीछे से धक्का दिया हो। वह चमक कर पीछे मुड़ा, &#8216;क्यों?&#8217;</p>
<p>&#8216;मुझे इनकी कोई जरूरत नहीं है।&#8217;</p>
<p>उसके भीतर एक लपलपाता अंधड़ उठने लगा, &#8216;मैं नहीं ले जाऊँगा, तुम चाहो तो इन्हें बाहर फेंक सकती हो।&#8217;</p>
<p>&#8216;बाहर?&#8217; स्त्री की आवाज थरथरा रही थी, &#8216;मैं इनके साथ तुम्हें भी बाहर फेंक सकती हूँ।&#8217; रोने के बाद उसकी आँखें चमक रही थीं; गालों का गीलापन सूखे काँच-सा जम गया था, जो पोंछे हुए नहीं, सूखे हुए आँसुओं से उभर कर आता है।</p>
<p>&#8216;क्या हम बाग देखने नहीं चलेंगे?&#8217; बच्ची ने उसका हाथ खींचा &#8211; और वह उसके साथ चलने लगा। वह कुछ भी नहीं देख रहा था। घास, क्यारियाँ और पेड़ एक गूँगी फिल्म की तरह चल रहे थे। सिर्फ उसकी पत्नी की आवाज एक भुतैली कमेंट्री की तरह गूँज रही थी &#8211; बाहर, बाहर!</p>
<p>&#8216;आप ममी के साथ बहस क्यों करते हैं?&#8217; लड़की ने कहा।</p>
<p>&#8216;मैंने बहस कहाँ की?&#8217; उसने बच्ची को देखा &#8211; जैसे वह भी उसकी दुश्मन हो।</p>
<p>&#8216;आप करते हैं।&#8217; लड़की का स्वर अजीब-सा हठीला हो आया था। वह अंग्रेजी में &#8216;यू&#8217; कहती थी, जिसका मतलब प्यार में &#8216;तुम&#8217; होता था और नाराजगी में &#8216;आप&#8217;। अंग्रेजी सर्वनाम की यह संदिग्धता बाप-बेटी के रिश्ते को हवा में टाँगे रहती थी, कभी बहुत पास, कभी बहुत पराया &#8211; जिसका सही अंदाज उसे सिर्फ लड़की की टोन में टटोलना पड़ता था। एक अजीब-से भय ने आदमी को पकड़ लिया। वह एक ही समय में माँ और बच्ची दोनों को नहीं खोना चाहता था।</p>
<p>&#8216;बड़ा प्यारा बाग है,&#8217; उसने फुसलाते हुए कहा, &#8216;क्या माली आता है?&#8217;</p>
<p>&#8216;नहीं, माली नहीं।&#8217; लड़की ने उत्साह से कहा, &#8216;मैं शाम को पानी देती हूँ और छुट्टी के दिन ममी घास काटती हैं&#8230; इधर आओ, मैं तुम्हें एक चीज दिखाती हूँ।&#8217;</p>
<p>वह उसके पीछे-पीछे चलने लगा। लॉन बहुत छोटा था &#8211; हरा, पीला, मखमली। पीछे गैराज था और दोनों तरफ झाड़ियों की फेंस लगी थी। बीच में एक घना, बूढ़ा, विलो खड़ा था। लड़की पेड़ के पीछे छिप-सी गई, फिर उसकी आवाज सुनाई दी, &#8216;कहाँ हो तुम?&#8217;</p>
<p>वह चुपचाप, दबे-पाँवों से पेड़ के पीछे चला आया और हैरान-सा खड़ा रहा। विलो और फेंस के बीच काली लकड़ी का बाड़ा था, जिसके दरवाजे से एक खरगोश बाहर झाँक रहा था; दूसरा खरगोश लड़की की गोद में था। वह उसे ऐसे सहला रही थी, जैसे वह ऊन का गोला हो, जो कभी भी हाथ से छूट कर झाड़ियों में गुम हो जाएगा।</p>
<p>&#8216;ये हमने अभी पाले हैं&#8230; पहले दो थे, अब चार।&#8217;</p>
<p>&#8216;बाकी कहाँ हैं?&#8217;</p>
<p>&#8216;बाड़े के भीतर&#8230; वे अभी बहुत छोटे हैं।&#8217;</p>
<p>पहले उसका मन भी खरगोश को छूने के लिए हुआ, किंतु उसका हाथ अपने-आप बच्ची के सिर पर चला गया और वह धीरे-धीरे उसके भूरे, छोटे बालों से खेलने लगा। लड़की चुप खड़ी रही और खरगोश अपनी नाक सिकोड़ता हुआ उसकी ओर ताक रहा था।</p>
<p>&#8216;पापा?&#8217; लड़की ने बिना सिर उठाए धीरे से कहा, &#8216;क्या आपने डे-रिटर्न का टिकट लिया है?&#8217;</p>
<p>&#8216;नहीं; क्यों?&#8217;</p>
<p>&#8216;ऐसे ही; यहाँ वापसी का टिकट बहुत सस्ता मिल जाता है।&#8217;</p>
<p>क्या उसने यही पूछने के लिए उसे यहाँ बुलाया था? उसने धीरे से अपना हाथ लड़की के सिर से हटा लिया।</p>
<p>&#8216;आप रात को कहाँ रहेंगे?&#8217; लड़की का स्वर बिल्कुल भावहीन था।</p>
<p>&#8216;अगर मैं यहीं रहूँ तो?&#8217;</p>
<p>लड़की ने धीरे से खरगोश को बाड़े में रख दिया और खट से दरवाजा बंद कर दिया।</p>
<p>&#8216;मैं हँसी कर रहा था,&#8217; उसने हँस कर कहा, &#8216;मैं आखिरी ट्रेन से लौट जाऊँगा।&#8217;</p>
<p>लड़की ने मुड़ कर उसकी ओर देखा, &#8216;यहाँ दो-तीन अच्छे होटल भी हैं&#8230;। मैं अभी फोन करके पूछ लेती हूँ।&#8217; बच्ची का स्वर बहुत कोमल हो आया। यह जानते ही कि वह रात को घर में नहीं ठहरेगा, वह माँ से हट कर आदमी के साथ हो गई; धीरे से उसका हाथ पकड़ा, उसे वैसे ही सहलाने लगी, जैसे अभी कुछ देर पहले खरगोश को सहला रही थी। लेकिन आदमी का हाथ पसीने से तरबतर था।</p>
<p>&#8216;सुनो, मैं अगली छुट्टियों में इंडिया आऊँगी &#8211; इस बार पक्का है।&#8217;</p>
<p>उसे कुछ आश्चर्य हुआ कि आदमी ने कुछ नहीं कहा; सिर्फ बाड़े में खरगोशों की खटर-पटर सुनाई दे रही थी।</p>
<p>&#8216;पापा&#8230; तुम कुछ बोलते क्यों नहीं?&#8217;</p>
<p>&#8216;तुम हर साल यही कहती हो।&#8217;</p>
<p>&#8216;कहती हूँ&#8230; लेकिन इस बार मैं आऊँगी, डोंट यू बिलीव मी?&#8230; भीतर चलें? ममी हैरान हो रही होंगी कि हम कहाँ रह गए।&#8217;</p>
<p>अगस्त का अँधेरा चुपचाप चला आया था। हवा में विलो की पत्तियाँ सरसरा रही थीं। कमरों के परदे गिरा दिए गए थे, लेकिन रसोई का दरवाजा खुला था। लड़की भागते हुए भीतर गई और सिंक का नल खोल कर हाथ धोने लगी। वह उसके पीछे आ कर खड़ा हो गया; सिंक के ऊपर आईने में उसने अपना चेहरा देखा &#8211; रूखी गर्द और बढ़ी हुई दाढ़ी और सुर्ख आँखों के बीच उसकी ओर हैरत में ताकता हुआ &#8211; नहीं, तुम्हारे लिए कोई उम्मीद नहीं&#8230;</p>
<p>पापा, क्या तुम अब भी अपने-आपसे बोलते हो?&#8217; लड़की ने पानी में भीगा अपना चेहरा उठाया &#8211; वह शीशे में उसे देख रही थी।</p>
<p>&#8216;हाँ, लेकिन अब मुझे कोई सुनता नहीं&#8230;।&#8217; उसने धीरे से बच्ची के कंधे पर हाथ रखा, &#8216;क्या फ्रिज में सोडा होगा?&#8217;</p>
<p>&#8216;तुम भीतर चलो, मैं अभी लाती हूँ।&#8217;</p>
<p>कमरे में कोई न था। उसकी चीजें बटोर दी गई थीं। सूटकेस कोने में खड़ा था; जब वे बाग में थे, उसकी पत्नी ने शायद उन सब चीजों को देखा होगा; उन्हें छुआ होगा। वह उससे चाहे कितनी नाराज क्यों न हो &#8211; चीजों की बात अलग थी। वह उन्हें ऊपर नहीं ले गई थी, लेकिन दुबारा सूटकेस में डालने की हिम्मत नहीं की थी&#8230; उसने उन्हें अपने भाग्य पर छोड़ दिया था।</p>
<p>कुछ देर बाद जब बच्ची सोडा और गिलास ले कर आई, तो उसे सहसा पता नहीं चला कि वह कहाँ बैठा है। कमरे में अँधेरा था &#8211; पूरा अँधेरा नहीं &#8211; सिर्फ इतना, जिसमें कमरे में बैठा आदमी चीजों के बीच चीज-जैसा दिखाई देता है, &#8216;पापा&#8230; तुमने बत्ती नहीं जलाई?&#8217;</p>
<p>&#8216;अभी जलाता हूँ&#8230;।&#8217; वह उठा और स्विच को ढूँढ़ने लगा, बच्ची ने सोडा और गिलास मेज पर रख दिया और टेबुल लैंप जला दिया।</p>
<p>&#8216;ममी कहाँ हैं?&#8217;</p>
<p>&#8216;वह नहा रही हैं, अभी आती होंगी।&#8217;</p>
<p>उसने अपने बैग से व्हिस्की निकाली, जो उसने फ्रेंकफर्ट के एयरपोर्ट पर खरीदी थी&#8230; गिलास में डालते हुए उसके हाथ ठिठक गए, &#8216;तुम्हारी जिंजर-एल कहाँ है?&#8217;</p>
<p>&#8216;मैं अब असली बियर पीती हूँ।&#8217; लड़की ने हँस कर उसकी ओर देखा, &#8216;तुम्हें बर्फ चाहिए?&#8217;</p>
<p>&#8216;नहीं&#8230; लेकिन तुम जा कहाँ रही हो?&#8217;</p>
<p>&#8216;बाड़े में खाना डालने&#8230; नहीं तो वे एक-दूसरे को मार खाएँगे।&#8217;</p>
<p>वह बाहर गई तो खुले दरवाजे से बाग का अँधेरा दिखाई दिया &#8211; तारों की पीली तलछट में झिलमिलाता हुआ। हवा नहीं था। बाहर का सन्नाटा घर की अदृश्य आवाजों के भीतर से छन कर आता था। उसे लगा, वह अपने घर में बैठा है और जो कभी बरसों पहले होता था, वह अब हो रहा है। वह शॉवर के नीचे गुनगुनाती रहती थी और जब वह बालों पर तौलिया साफे की तरह बाँध कर बाहर निकलती थी, तब पानी की बूँदें बाथरूम से ले कर उसके कमरे तक एक लकीर बनाती जाती थीं &#8211; पता नहीं वह लकीर कहाँ बीच में सूख गई? कौन-सी जगह, किस खास मोड़ पर वह चीज हाथ से छूट गई, जिसे वह कभी दोबारा नहीं पकड़ सका?</p>
<p>उसने कुछ और व्हिस्की डाली; हालाँकि गिलास अभी खाली नहीं हुआ था। उसे कुछ अजीब लगा कि पिछली रात भी यही घड़ी थी जब वह पी रहा था, लेकिन तब वह हवा में था। जब उसे एयर-होस्टेज की आवाज सुनाई दी कि हम चैनल पार कर रहे हैं तो उसने हवाई जहाज की खिड़की से नीचे देखा &#8211; कुछ भी दिखाई नहीं देता था &#8211; न समुद्र, न लाइटहाउस, सिर्फ अँधेरा, अँधेरे में बहता हुआ अँधेरा &#8211; फिर कुछ भी नहीं। और तब नीचे अँधेरे में झाँकते हुए उसे खयाल आया कि वह चैनल जो नीचे कहीं दिखाई नहीं देता था, असल में कहीं भीतर है &#8211; उसकी एक जिंदगी से दूसरी जिंदगी तक फैला हुआ; जिसे वह हमेशा पार करता रहेगा, कभी इधर, कभी उधर, कहीं का भी नहीं, न कहीं से आता हुआ, न कहीं पहुँचता हुआ&#8230;।</p>
<p>&#8216;बिंदु कहाँ है?&#8217; उसने चौंक कर ऊपर देखा, वह वहाँ कब से खड़ी थी, उसे पता नहीं चला था। &#8216;बाहर बाग में,&#8217; उसने कहा, &#8216;खरगोशों को खाना देने।&#8217;</p>
<p>वह अलग खड़ी थी, बेनिस्टर के नीचे। नहाने के बाद उसने एक लंबी मैक्सी पहन ली थी&#8230;। बाल खुले थे। चेहरा बहुत धुला और चमकीला-सा लग रहा था। वह मेज पर रखे उसके गिलास को देख रही थी। उसका चेहरा शांत था; शॉवर ने जैसे न केवल उसके चेहरे को, बल्कि उसके संताप को भी धो डाला था।</p>
<p>&#8216;बर्फ भी रखी है।&#8217; उसने कहा।</p>
<p>&#8216;नहीं, मैंने सोडा ले लिया; तुम्हारे लिए एक बना दूँ?&#8217;</p>
<p>उसने सिर हिलाया, जिसका मतलब कुछ भी था, उसे मालूम था कि गर्म पानी से नहाने के बाद उसे कुछ ठंडा पीना अच्छा लगता था। अर्से बाद भी वह उसकी आदतें नहीं भूला था, बल्कि उन आदतों के सहारे ही दोनों के बीच पुरानी पहचान लौट आती थी। वह रसोई में गया और उसके लिए एक गिलास ले आया। उसमें थोड़ी-सी बर्फ डाली। जब व्हिस्की मिलाने लगा, तो उसकी आवाज सुनाई दी, &#8216;बस, इतनी काफी है।&#8217;</p>
<p>वह धुली हुई आवाज थी, जिसमें कोई रंग नहीं था, न स्नेह का, न नाराजगी का &#8211; एक शांत और तटस्थ आवाज। वह सीढ़ियों से हट कर कुर्सी के पास चली आई थी।</p>
<p>&#8216;तुम बैठोगी नहीं?&#8217; उसने कुछ चिंतित हो कर पूछा।</p>
<p>उसने अपना गिलास उठाया और वहीं स्टूल पर बैठ गई, जहाँ दुपहर को बैठी थी। टी.वी. के पास लेकिन टेबुल-लैंप से दूर &#8211; जहाँ सिर्फ रोशनी की एक पतली-सी झाँई, उस तक पहुँच रही थी।</p>
<p>कुछ देर तक दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला, फिर स्त्री की आवाज सुनाई दी, &#8216;घर में सब लोग कैसे हैं?&#8217;</p>
<p>&#8216;ठीक हैं&#8230; ये सब चीजें उन्होंने ही भेजी हैं।&#8217;</p>
<p>&#8216;मुझे मालूम है,&#8217; औरत ने कुछ थके स्वर में कहा, &#8216;क्यों उन बेचारों को तंग करते हो? तुम ढो-ढो कर इन चीजों को लाते हो और वे यहाँ बेकार पड़ी रहती हैं।&#8217;</p>
<p>&#8216;वे यही कर सकते हैं,&#8217; उसने कहा, &#8216;तुम बरसों से वहाँ गई नहीं; वे बहुत याद करते हैं।&#8217;</p>
<p>&#8216;अब जाने का कोई फायदा है?&#8217; उसने गिलास से लंबा घूँट लिया, &#8216;मेरा अब उनसे कोई रिश्ता नहीं।&#8217;</p>
<p>&#8216;तुम बच्ची के साथ तो आ सकती हो, उसने अभी तक हिंदुस्तान नहीं देखा।&#8217;</p>
<p>वह कुछ देर चुप रही&#8230; फिर धीरे से कहा, &#8216;अगले साल वह चौदह वर्ष की हो जाएगी&#8230; कानून के मुताबिक तब वह कहीं भी जा सकती है।&#8217;</p>
<p>&#8216;मैं कानून की बात नहीं कर रहा; तुम्हारे बिना वह कहीं नहीं जाएगी।&#8217;</p>
<p>स्त्री ने गिलास की भीगी सतह से आदमी को देखा, &#8216;मेरा बस चले तो उसे वहाँ कभी न भेजूँ।&#8217;</p>
<p>&#8216;क्यों?&#8217; आदमी ने उसकी ओर देखा।</p>
<p>वह धीरे से हँसी, &#8216;क्या हम दो हिंदुस्तानी उसके लिए काफी नहीं हैं?&#8217;</p>
<p>वह बैठा रहा। कुछ देर बाद रसोई का दरवाजा खुला, लड़की भीतर आई, चुपचाप दोनों को देखा और फिर जीने के पास चली गई जहाँ टेलीफोन रखा था।</p>
<p>&#8216;किसे कर रही हो?&#8217; औरत ने पूछा।</p>
<p>लड़की चुप रही, फोन का डायल घुमाने लगी।</p>
<p>आदमी उठा, उसकी ओर देखा, &#8216;थोड़ा-सा और लोगी?&#8217;</p>
<p>&#8216;नहीं&#8230;।&#8217; उसने सिर हिलाया। आदमी धीरे-धीरे अपने गिलास में डालने लगा।</p>
<p>&#8216;क्या बहुत पीने लगे हो?&#8217; औरत ने कहा।</p>
<p>&#8216;नहीं&#8230;।&#8217; आदमी ने सिर हिलाया, &#8216;सफर में कुछ ज्यादा ही हो जाता है।&#8217;</p>
<p>&#8216;मैंने सोचा था, अब तक तुमने घर बसा लिया होगा।&#8217;</p>
<p>&#8216;कैसे?&#8217; उसने स्त्री को देखा, &#8216;तुम्हें यह कैसे भ्रम हुआ?&#8217;</p>
<p>औरत कुछ देर तक नीरव आँखों से उसे देखती रही, &#8216;क्यों, उस लड़की का क्या हुआ? वह तुम्हारे साथ नहीं रहती?&#8217; स्त्री के स्वर में कोई उत्तेजना नहीं थी, न क्लेश की कोई छाया थी&#8230; जैसे दो व्यक्ति मुद्दत बाद किसी ऐसी घटना की चर्चा कर रहे हों जिसने एक झटके से दोनों को अलग छोरों पर फेंक दिया था।</p>
<p>&#8216;मैं अकेला रहता हूँ&#8230; माँ के साथ।&#8217; उसने कहा।</p>
<p>औरत ने तनिक विस्मय से उसे देखा, &#8216;क्या बात हुई?&#8217;</p>
<p>&#8216;कुछ नहीं&#8230; मैं शायद साथ रहने के काबिल नहीं हूँ।&#8217; उसका स्वर असाधारण रूप से धीमा हो आया, जैसे वह उसे अपनी किसी गुप्त बीमारी के बारे में बता रहा हो, &#8216;तुम हैरान हो? लेकिन ऐसे लोग होते हैं&#8230;&#8217; वह कुछ और कहना चाहता था, प्रेम के बारे में, वफादारी के बारे में, विश्वास और धोखे के बारे में; कोई बड़ा सत्य, जो बहुत-से झूठों से मिल कर बनता है, व्हिस्की की धुंध में बिजली की तरह कौंधता है और दूसरे क्षण हमेशा के लिए अँधेरे में लोप हो जाता है&#8230;</p>
<p>लड़की शायद इस क्षण की ही प्रतीक्षा कर रही थी; वह टेलीफोन से उठ कर आदमी के पास आई, एक बार माँ को देखा, वह टेबुल-लैंप के पीछे अँधेरे के आधे कोने में छिप गई थीं, और आदमी? वह गिलास के पीछे सिर्फ एक डबडबाता-सा धब्बा बन कर रह गया था।</p>
<p>&#8216;पापा,&#8217; लड़की के हाथ में कागज का पुरजा था, &#8216;यह होटल का नाम है, टैक्सी तुम्हें सिर्फ दस मिनट में पहुँचा देगी।&#8217;</p>
<p>उसने लड़की को अपने पास खींच लिया और कागज जेब में रख लिया। कुछ देर तक तीनों चुप बैठे रहे, जैसे बरसों पहले यात्रा पर निकलने से पहले घर के सब प्राणी एक साथ सिमट कर चुप बैठ जाते थे। बाहर बहुत-से तारे निकल आए थे, जिसमें बूढ़ी, विलो, झाड़ियाँ और खरगोशों का बाड़ा एक निस्पंद पीले आलोक में पास-पास सरक आए थे।</p>
<p>उसने अपना गिलास मेज पर रखा, फिर धीरे से लड़की को चूमा, अपना सूटकेस उठाया और जब लड़की ने दरवाजा खोला, तो वह क्षण भर देहरी पर ठिठक गया, &#8216;मैं चलता हूँ।&#8217; उसने कहा। पता नहीं, यह बात उसने किससे कही थी, किंतु जहाँ वह बैठी थी, वहाँ से कोई आवाज नहीं आई। वहाँ उतनी ही घनी चुप्पी थी, जितनी बाहर अँधेरे में, जहाँ वह जा रहा था।</p>
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		<title>चली कहानीः अज्ञेय की कहानी- शान्ति हँसी थी</title>
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		<pubDate>Tue, 26 Oct 2021 02:47:59 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>“जानकीदास, मुजरिम, तुम पर जुर्म लगाया जाता है कि तुमने तारीख 14 दिसम्बर को शाम के आठ बजे हालीवुड पार्क के दरवाज़े पर दंगा किया; और कि तुम्हारी रोज़ी का कोई ज़रिया नहीं है। बोलो, तुम्हें जवाब में कुछ कहना है?” जवाब के बदले जानकीदास को टुकुर-टुकुर अपनी ओर देखता पाकर न जाने क्यों मजिस्ट्रेट-पसीज &#8230;</p>
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				<h4>About the author</h4><span style="color: #ff0000;"><strong>सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन</strong></span> <strong>&#8220;<span style="color: #0000ff;">अज्ञेय</span>&#8220;</strong> (<span style="color: #0000ff;"><strong>7 मार्च,1911-4 अप्रैल,1987</strong></span>) <span style="color: #ff0000;"><strong>कवि, कथाकार, ललित-निबन्धकार, सम्पादक और सफल अध्यापक थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के कुशीनगर में हुआ। बचपन लखनऊ, कश्मीर, बिहारऔर मद्रास में बीता। प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा पिता की देख रेख में घर पर ही संस्कृत, फारसी, अंग्रेजी और बांग्ला भाषा व साहित्य के अध्ययन के साथ हुई। बी.एस.सी. करके अंग्रेजी में एम.ए. करते समय क्रांतिकारी आन्दोलन से जुड़ गये। 1930 से 1936 तक विभिन्न जेलों में कटे। आप पत्र, पत्रिकायों से भी जुड़े रहे । 1964 में आँगन के पार द्वार पर उन्हें साहित्य अकादमी का और 1978 में कितनी नावों में कितनी बार पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला । आपके कहानी संग्रह: विपथगा 1937, परम्परा 1944, कोठरी की बात 1945, शरणार्थी 1948, जयदोल 1951 और आपने उपन्यास, यात्रा वृतान्त, निबंध संग्रह, आलोचना, संस्मरण, डायरियां, विचार गद्य: और नाटक भी लिखे।</strong></span>
			</div>
		</div>
	
<p>“जानकीदास, मुजरिम, तुम पर जुर्म लगाया जाता है कि तुमने तारीख 14 दिसम्बर को शाम के आठ बजे हालीवुड पार्क के दरवाज़े पर दंगा किया; और कि तुम्हारी रोज़ी का कोई ज़रिया नहीं है। बोलो, तुम्हें जवाब में कुछ कहना है?”<br />
जवाब के बदले जानकीदास को टुकुर-टुकुर अपनी ओर देखता पाकर न जाने क्यों मजिस्ट्रेट-पसीज उठे। उन्होंने कहा, “जो कुछ तुम्हें जवाब में कहना हो, सोच लो। मैं तुम्हें पाँच मिनट की मोहलत देता हूँ।”<br />
पाँच मिनट!<br />
जानकीदास के वज्राहत मन को, मानो कोड़े की चोट-सा, मानो बिच्छू के डंक-सा यह एक फ़िकरा काटने लगा, बताने की फिजूल कोशिश करने लगा&#8230; पाँच मिनट।’<br />
पाँच मिनट।<br />
जैसे नदी के किनारे पड़ा हुआ कछुआ, पास कहीं खटका सुनकर तनिक-सा हिल जाता है और फिर वैसा ही रह जाता है लोंदे का लोंदा, वैसे ही जानकीदास के मन ने कहा, ‘शान्ति हँसी थी,’ और रह गया।<br />
पाँच मिनट।&#8230;<br />
कुछ कहना है अवश्य, सफ़ाई देनी है अवश्य&#8230;<br />
पाँच मिनट&#8230;<br />
शान्ति हँसी थी।<br />
कब? कहाँ? क्यों हँसी थी? और कौन है वह, क्यों है, मुझे क्या है उससे?&#8230;<br />
पाँच मिनट&#8230;<br />
उसे धीरे-धीरे याद-सा आने लगा। किन्तु याद की तरह नहीं। बुखार के बुरे सपनों की तरह।<br />
शान्ति ने रोटी उसके हाथ में थमाकर उसी में भाजी डालते-डालते कहा था,<br />
“इस वक़्त तो खा लेते हैं, उस बेर मेरी एकादशी है।”<br />
उसने पूछा था, “क्यों?”<br />
“क्यों क्या? तुम्हें खिला दूँगी&#8230;” और हँस दी थी।<br />
उस जून के लिए रोटी नहीं है, यह कहने के लिए हँस दी थी।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/knowledge/history-of-the-day/history-of-the-day-jammu-and-kashmir-was-merged-with-india-on-26-october/11176/">History of The Day: आजादी के 72 दिन बाद भारत का हिस्सा बना कश्मीर</a></strong></p>
<p>दोपहर में, सड़कों पर फिरता हुआ जानकीदास सोच रहा था, इतनी बड़ी दुनिया में, इतने कामों से भरी हुई दुनिया, में, क्या मेरे लिए कोई भी काम नहीं है? वह पढ़ा-लिखा था, अपने माँ-बाप से अधिक पढ़ा-लिखा था, पर उन्हें मरते समय तक कभी कष्ट नहीं हुआ था, चाहे धनी वे नहीं हुए, तब वह क्यों भूखा मरेगा? और शान्ति, उसकी बहिन भी हिन्दी पढ़ी है और काम कर सकती है।<br />
जहाँ-जहाँ से उसे आशा थी, वहाँ वह सब देख चुका था। बल्कि जहाँ आशा नहीं थी, वहाँ भी देख-देखकर वह लौट चुका था।<br />
अब उसे कहीं और जाने को नहीं था &#8211; सिवाय घर के। और वहाँ उस बेर के लिए रोटी नहीं थी और यह बताने को शान्ति हँसी थी &#8211; हँसी थी&#8230;<br />
तब तक, भले ही उसके मन में सम्पन्नता का, पढ़ाई का, दरजे का, इज्जत-आबरू का, बुर्जुआ मनोवृत्ति का, कुछ निशान भी बाक़ी रहा हो, तब नहीं रहा। उसके लिए कुछ नहीं रहा था। केवल एक बात रही थी कि उस बेर के लिए रोटी नहीं है और शान्ति हँसी थी।<br />
राह-चलते उसने देखा, दायीं ओर एक बड़ा-सा आँगन है, एक भव्य मकान का, जिसमें तीन-चार सुन्दर बच्चे खेल रहे हैं। एक ओर एक लड़की बिना आग के एक छोटे-से चूल्हे पर, लकड़ी की हंड़िया चढ़ाये रसोई पका रही है और खेलनेवाले लड़कों से कह रही है “आओ भइया रोटी तैयार है&#8230;”</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>चली कहनीः <a href="https://tismedia.in/category/entertainment/art-and-literature/">पढ़िए हर रोज एक नई कहानी</a></strong></span></p>
<p>वह एकाएक आँगन के भीतर हो लिया। लड़के सहम कर खड़े हो गये &#8211; शायद उसका मुँह देखकर।<br />
उसने एक लड़के से कहा, “बेटा, जाकर अपने पिता से पूछ दो, यहाँ कोई पढ़ाने का काम है?”<br />
लड़के ने कहा, “हम नहीं जाते। आप ही पूछ लो।”<br />
जानकीदास ने दूसरे लड़के से कहा, “तुम पूछ दोगे? बड़े अच्छे हो तुम&#8230;”<br />
उस लड़के ने एक बार अपने साथी की ओर देखा, मानो पूछ रहा हो, ‘मैं भी ना कह दूँ?’ लेकिन फिर भीतर चला गया और आकर बोला, “पिताजी कहते हैं, कोई काम नहीं है।”<br />
जानकीदास ने फिर कहा, “एक बार और पूछ आओ, कोई जिल्दसाज़ी का काम है? या बढ़ाई का? या और कोई?”<br />
लड़के ने कहा, “अब की तो पूछ लेता हूँ, फिर नहीं जाने का।” और भीतर चला गया। आकर बोला, “पिताजी कहते हैं, यहाँ से चले जाओ। कोई काम नहीं है। फ़िजूल सिर मत खाओ।”<br />
जानकीदास बाहर निकल आया।<br />
कोई पढ़ाने का काम है? किसी क़्लर्क की ज़रूरत है? जिल्दसाज़ की? बढ़ई की? रसोइया की? भिश्ती की? टहलुए की? मोची-मेहतर की?<br />
कोई ज़रूरत नहीं है। सबके अपने-अपने काम हैं, केवल जानकीदास की कोई ज़रूरत नहीं है।<br />
और उस बेर खाने को नहीं है, और शान्ति हँसी!<br />
शाम को हालीवुड पार्क के दरवाज़े के पास जो भीड़ खड़ी थी, उन्हीं में वह भी था। दुनिया है, घर है, शान्ति है, रोटी है, यह सब वह भूल गया था। भूल नहीं गया था, याद रखने की क्षमता, मन को इकट्ठा, अपने वश में रखने की सामर्थ्य वह खो बैठा था। न उसका कोई सोच था, न उसकी कोई इच्छा थी। यहाँ भीड़ थी, लोग खड़े थे &#8211; इसीलिए वह भी था।<br />
भीतर असंख्य बिजली की बत्तियाँ जगमगा रही थीं। बड़े-बड़े झूले, रंग-बिरंगी रोशनी में किसी स्वप्न-आकाश के तारों-से लग रहे थे। कहीं एक एक बहुत ऊँचा खम्भा था, जिसकी कुल लम्बाई नीली और लाल लैम्पों से सजी हुई थी। और उसके ऊपर एक तख्ता बँधा हुआ था।<br />
उसी के बारे में बातें हो रही थी। और जानकीदास मन्त्र-मुग्ध-सा सुन रहा था।<br />
“वह जो है न खम्भा, उसी पर से आदमी कूदता है। नीचे एक जलता हुआ तालाब होता है, उसी में।”<br />
“उससे पहले दूसरा खेल भी होता है, जिसमें कुत्ता कूदता है?”<br />
“नहीं, वह बाद में है। पहले साइकल पर से कूदनेवाला है। वह यहाँ से नहीं दीखता।”<br />
“वह कितने बजे होगा?”<br />
“अभी थोड़ी देर में होनवाला है &#8211; आठ बजे होता है।”<br />
“यह आवाज़ क्या है?”<br />
“अरे, जो वह गुम्बद में मोटर-साइकिल चलाता है, उसी की है।”<br />
जानकीदास का अपना कुछ नहीं था। इच्छा शक्ति भी नहीं। जो दूसरे सुनते थे, वह उसे सुना जाता था; जो दूसरे देखते थे, वह उसे दीख जाता था।<br />
“वह देखो!”<br />
झूले चलने लगे थे। चरखड़ियाँ घूमने लगी थीं। उन पर बैठे हुए लोग नहीं दीखते थे, पर प्रकाश में कभी-कभी उनके सिर चमक जाते थे और कभी किसी लड़की की तीखी और कुछ डरी-सी हँसी वहाँ तक पहुँच जाती थी &#8211; डरी-सी किन्तु प्रसन्न, आमोद-भरी&#8230;<br />
जानकीदास देखता था और सुनता था और निश्चल खड़ा भी उत्तेजित हो जाता था। वही क्यों, सारी भीड़ ही धीरे-धीरे उत्तेजित होती जा रही थी।<br />
तभी अन्दर कहीं बिगुल बजा। तीखा। किसी प्रकार की सोच या चिन्ता से मुक्त। पुकारता हुआ।<br />
किसी ने कहा, “अब होगा साइकिलवाला खेल। चलो, चलें अन्दर।”<br />
“तुम नहीं चलोगे?”<br />
“चलो!”<br />
“मैं भी चलता हूँ यार! यह तो देखना ही चाहिए&#8230;”<br />
“आओ न-जल्दी, फिर जगह नहीं रहेगी।”<br />
भीड़ दरवाज़े की ओर बढ़ी। उत्तेजना भी बढ़ी, फैली, फिर बढ़ी।<br />
जानकीदास भी साथ पहुँचा, टिकट-घर के दरवाज़े पर।<br />
लोग टिकट लेकर भीतर घुसने लगे। जानकीदास खड़ा देखने लगा।<br />
तभी एक लड़का एक छोटी लड़की का हाथ पकड़े, उसे घसीटता हुआ, जल्दी से टिकटघर पर पहुँचा और टिकट लेकर, उत्तेजना से भर्राये हुए स्वर में बोला, “कमला, अगर देर से पहुँचे तो याद रखना, मार डालूँगा! उमर में एक मौक़ा मिला है&#8230;”<br />
आगे जानकीदास नहीं सुन सका। वह लपककर टिकटघर पर पहुँचा। टिकट माँगी। ली। जेब में डाली। दूसरा हाथ अन्दर की जेब में डाला &#8211; पैसे निकालने के लिए &#8211; चार आने।<br />
डाला और पड़ा रहने दिया। निकाला नहीं, उत्तेजना टूट गयी।<br />
जेब में एक पैसा भी नहीं था।<br />
“मुजरिम, तुम्हें कुछ कहना है?”<br />
जानकीदास ने फिर एक बार दीन दृष्टि से मजिस्ट्रेट की ओर देख दिया, बोला नहीं। उसका मन कछुए की तरह तनिक और हिलकर बिलकुल जड़ हो गया।<br />
उस बेर उसने नहीं खायी थी, तो शान्ति ने खा ली होगी।<br />
मजिस्ट्रेट साहब सेकेंड-भर सोचकर बोले, “एक साल!”<br />
शान्ति हँसी थी। उस बेर के लिए रोटी नहीं है, यह कहने के लिए शान्ति हँसी थी।</p>
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		<title>चली कहानीः उसने कहा था- चंद्रधर शर्मा गुलेरी</title>
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		<pubDate>Mon, 25 Oct 2021 04:22:42 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>बड़े-बडे़ शहरों के इक्के-गाड़ी वालों की जबान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है और कान पक गए हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बू कार्ट वालों की बोली का मरहम लगावे। जबकि बड़े शहरों की चौड़ी सड़को पर घोड़े की पीठ को चाबुक से धुनते हुए इक्के वाले कभी घोड़े की &#8230;</p>
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				<h4>About the author</h4><strong><span style="color: #ff0000;">चन्द्रधर शर्मा &#8216;गुलेरी&#8217; <span style="color: #0000ff;">(1883 &#8211; 12 सितम्बर 1922)</span> हिन्दी के कथाकार, व्यंगकार, निबन्धकार तथा सम्पादक थे। उन्हें हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेज़ी, प्राकृत, बांग्ला, मराठी, जर्मन तथा फ्रेंच भाषाओं का ज्ञान था। उनकी रुचि धर्म, ज्योतिष इतिहास, पुरातत्त्व, दर्शन भाषाविज्ञान शिक्षाशास्त्र और साहित्य से लेकर संगीत, चित्रकला, लोककला, विज्ञान और राजनीति तथा समसामयिक सामाजिक स्थिति तथा रीति-नीति में थी। आम हिन्दी पाठक ही नहीं, विद्वानों का एक बड़ा वर्ग भी उन्हें अमर कहानी ‘उसने कहा था’ के रचनाकार के रूप में ही पहचानता है।</span></strong>
			</div>
		</div>
	
<p>बड़े-बडे़ शहरों के इक्के-गाड़ी वालों की जबान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है और कान पक गए हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बू कार्ट वालों की बोली का मरहम लगावे। जबकि बड़े शहरों की चौड़ी सड़को पर घोड़े की पीठ को चाबुक से धुनते हुए इक्के वाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट यौन-संबंध स्थिर करते हैं, कभी उसके गुप्त गुह्य अंगो से डाक्टर को लजाने वाला परिचय दिखाते हैं, कभी राह चलते पैदलों की आँखो के न होने पर तरस खाते हैं, कभी उनके पैरो की अंगुलियों के पोरों की चींथकर अपने ही को सताया हुआ बताते हैं और संसार भर की ग्लानि और क्षोभ के अवतार बने नाक की सीध चले जाते हैं,</p>
<p>तब अमृतसर में उनकी बिरादरी वाले तंग चक्करदार गलियों में हर एक लडढी वाले के लिए ठहर कर सब्र का समुद्र उमड़ा कर&#8211; बचो खालसाजी, हटो भाईज&#8217;, ठहरना भाई, आने दो लालाजी, हटो बाछा कहते हुए सफेद फेटों , खच्चरों और बतको, गन्ने और खोमचे और भारे वालों के जंगल से राह खेते हैं । क्या मजाल है कि जी और साहब बिना सुने किसी को हटना पड़े। यह बात नही कि उनकी जीभ चलती ही नही, चलती है पर मीठी छुरी की तरह महीन मार करती हुई। यदि कोई बुढ़िया बार-बार चिटौनी देने पर भी लीक से नही हटती तो उनकी वचनावली के ये नमूने हैं&#8211; हट जा जीणे जोगिए, हट जा करमाँ वालिए, हट जा, पुत्तां प्यारिए. बच जा लम्बी वालिए। समष्टि में इसका अर्थ हैं कि तू जीने योग्य है, तू भाग्योंवाली है, पुत्रो को प्यारी है, लम्बी उमर तेरे सामने है, तू क्यों मेरे पहियो के नीचे आना चाहती है? बच जा।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-11141" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-chandradhar-sharma-guleri-2.jpg" alt="tis media, chandradhar sharma guleri, Chali Kahani, Story Of The Day, Hindi Story, Chali Kahani, Story Of The Day, Hindi Story, Hindi Literature, Hindi Movies, Hindi Storytellers, हिंदी साहित्य, हिंदी साहित्यकार, हिंदी फिल्में, हिंदी के कहानीकार, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, चली कहानी, हिंदी कहानियां" width="850" height="550" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-chandradhar-sharma-guleri-2.jpg 850w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-chandradhar-sharma-guleri-2-300x194.jpg 300w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-chandradhar-sharma-guleri-2-768x497.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 850px) 100vw, 850px" /></p>
<p>ऐसे बम्बू कार्ट वालों के बीच में होकर एक लड़का और एक लड़की चौक की दुकान पर आ मिले। उसके बालों और इसके ढीले सुथने से जान पडता था कि दोनो सिख हैं। वह अपने मामा के केश धोने के लिए दही लेने आया था और यह रसोई के लिए बड़ियाँ। दुकानदार एक परदेशी से गुथ रहा था, जो सेर भर गीले पापड़ो की गड्डी गिने बिना हटता न था।<br />
&#8212; तेरा घर कहाँ है?<br />
&#8212; मगरे में। &#8230;और तेरा?<br />
&#8212; माँझे में, यहाँ कहाँ रहती है?<br />
&#8212; अतरसिंह की बैठक में, वह मेरे मामा होते हैं।<br />
&#8212; मैं भी मामा के आया हूँ, उनका घर गुरु बाजार में है।<br />
इतने में दुकानदार निबटा और इनका सौदा देने लगा। सौदा लेकर दोनो साथ-साथ चले। कुछ दूर जाकर लड़के ने मुसकरा कर पूछा&#8211; तेरी कुड़माई हो गई? इस पर लड़की कुछ आँखे चढ़ाकर &#8216;धत्&#8217; कहकर दौड़ गई और लड़का मुँह देखता रह गया।</p>
<p>दूसरे तीसरे दिन सब्जी वाले के यहाँ, या दूध वाले के यहाँ अकस्मात् दोनो मिल जाते। महीना भर यही हाल रहा। दो-तीन बार लड़के ने फिर पूछा&#8211; तेरे कुड़माई हो गई? और उत्तर में वही &#8216;धत्&#8217; मिला। एक दिन जब फिर लड़के ने वैसी ही हँसी में चिढ़ाने के लिए पूछा तो लड़की लड़के की संभावना के विरुद्ध बोली&#8211; हाँ, हो गई।<br />
&#8212; कब?<br />
&#8212; कल, देखते नही यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू। &#8230; लड़की भाग गई।<br />
लड़के ने घर की सीध ली। रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया, एक छाबड़ी वाले की दिन भर की कमाई खोई, एक कुत्ते को पत्थर मारा और गोभी वाले ठेले में दूध उंडेल दिया। सामने नहा कर आती हुई किसी वैष्णवी से टकरा कर अन्धे की उपाधि पाई। तब कहीं घर पहुँचा।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-11142" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-chandradhar-sharma-guleri-4.jpg" alt="" width="640" height="461" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-chandradhar-sharma-guleri-4.jpg 640w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-chandradhar-sharma-guleri-4-300x216.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></p>
<p>&#8212; होश में आओ। कयामत आयी है और लपटन साहब की वर्दी पहन कर आयी है।<br />
&#8212; क्या? &#8212; लपचन साहब या तो मारे गये हैं या कैद हो गये हैं। उनकी वर्दी पहन कर कोई जर्मन आया है। सूबेदार ने इसका मुँह नही देखा। मैने देखा है, और बातें की हैं। सौहरा साफ़ उर्दू बोलता है, पर किताबी उर्दू। और मुझे पीने को सिगरेट दिया है।<br />
&#8212; तो अब? &#8212; अब मारे गए। धोखा है। सूबेदार कीचड़ में चक्कर काटते फिरेंगे और यहाँ खाई पर धावा होगा उधर उन पर खुले में धावा होगा। उठो, एक काम करो। पलटन में पैरो के निशान देखते-देखते दौड़ जाओ। अभी बहुत दूर न गये होंगे। सूबेदार से कहो कि एकदम लौट आवें। खंदक की बात झूठ है। चले जाओ, खंदक के पीछे से ही निकल जाओ। पत्ता तक न खुड़के। देर मत करो।&#8217;<br />
&#8212; हुकुम तो यह है कि यहीं&#8230;<br />
&#8212; ऐसी तैसी हुकुम की! मेरा हुकुम है&#8230; जमादार लहनासिंह जो इस वक्त यहाँ सबसे बड़ा अफ़सर है, उसका हुकुम है। मैं लपटन साहब की ख़बर लेता हूँ।<br />
&#8212; पर यहाँ तो तुम आठ ही हो।<br />
&#8212; आठ नही, दस लाख। एक एक अकालिया सिख सवा लाख के बराबर होता है। चले जाओ।<br />
लौटकर खाई के मुहाने पर लहनासिंह दीवार से चिपक गया। उसने देखा कि लपटन साहब ने जेब से बेल के बराबर तीन गोले निकाले। तीनों को जगह-जगह खंदक की दीवारों में घुसेड़ दिया और तीनों में एक तार सा बाँध दिया। तार के आगे सूत की गुत्थी थी, जिसे सिगड़ी के पास रखा। बाहर की तरफ जाकर एक दियासलाई जलाकर गुत्थी रखने&#8230; बिजली की तरह दोनों हाथों से उलटी बन्दूक को उठाकर लहनासिंह ने साहब की कुहनी पर तानकर दे मारा । धमाके के साथ साहब के हाथ से दियासलाई गिर पड़ी । लहनासिंह ने एक कुन्दा साहब की गर्दन पर मारा और साहब &#8216;आँख! मीन गाट्ट&#8217; कहते हुए चित हो गये। लहनासिंह ने तीनो गोले बीनकर खंदक के बाहर फेंके और साहब को घसीटकर सिगड़ी के पास लिटाया। जेबों की तलाशी ली। तीन-चार लिफ़ाफ़े और एक डायरी निकाल कर उन्हे अपनी जेब के हवाले किया।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-11143" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-chandradhar-sharma-guleri-6.jpg" alt="" width="640" height="463" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-chandradhar-sharma-guleri-6.jpg 640w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-chandradhar-sharma-guleri-6-300x217.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></p>
<p>साहब की मूर्च्छा हटी। लहना सिह हँसकर बोला&#8211; क्यो, लपटन साहब, मिजाज कैसा है? आज मैंने बहुत बातें सीखीं । यह सीखा कि सिख सिगरेट पीते हैं । यह सीखा कि जगाधरी के जिले में नीलगायें होती हैं और उनके दो फुट चार इंच के सींग होते हैं । यह सीखा कि मुसलमान खानसामा मूर्तियो पर जल चढाते हैं और लपटन साहब खोते पर चढते हैं । पर यह तो कहो, ऐसी साफ़ उर्दू कहाँ से सीख आये? हमारे लपटन साहब तो बिना &#8216;डैम&#8217; के पाँच लफ़्ज भी नही बोला करते थे ।</p>
<p>लहनासिंह ने पतलून की जेबों की तलाशी नही ली थी। साहब ने मानो जाड़े से बचने के लिए दोनो हाथ जेबो में डाले। लहनासिंह कहता गया&#8211; चालाक तो बड़े हो, पर माँझे का लहना इतने बरस लपटन साहब के साथ रहा है। उसे चकमा देने के लिए चार आँखे चाहिएँ। तीन महीने हुए एक तुर्की मौलवी मेरे गाँव में आया था। औरतो को बच्चे होने का ताबीज बाँटता था और बच्चो को दवाई देता था। चौधरी के बड़ के नीचे मंजा बिछाकर हुक्का पीता रहता था और कहता था कि जर्मनी वाले बड़े पंडित हैं। वेद पढ़-पढ़ कर उसमे से विमान चलाने की विद्या जान गये हैं। गौ को नही मारते। हिन्दुस्तान में आ जायेंगे तो गोहत्या बन्द कर देगे। मंडी के बनियो को बहकाता था कि डाकखाने से रुपये निकाल लो, सरकार का राज्य जाने वाला है। डाक बाबू पोल्हू राम भी डर गया था। मैने मुल्ला की दाढी मूंड़ दी थी और गाँव से बाहर निकालकर कहा था कि जो मेरे गाँव में अब पैर रखा तो &#8212; साहब की जेब में से पिस्तौल चला और लहना की जाँघ में गोली लगी। इधर लहना की हेनरी मार्टिन के दो फ़ायरो ने साहब की कपाल-क्रिया कर दी।<br />
धडाका सुनकर सब दौड़ आये।<br />
बोधा चिल्लाया&#8211; क्या है?<br />
लहनासिंह में उसे तो यह कह कर सुला दिया कि &#8216;एक हडका कुत्ता आया था, मार दिया&#8217; और औरो से सब हाल कह दिया। बंदूके लेकर सब तैयार हो गये । लहना ने साफ़ा फाड़ कर घाव के दोनो तरफ पट्टियाँ कसकर बांधी । घाव माँस में ही था। पट्टियो के कसने से लूह बन्द हो गया।<br />
इतने में सत्तर जर्मन चिल्लाकर खाई में घुस पड़े। सिखो की बंदूको की बाढ ने पहले धावे को रोका। दूसरे को रोका। पर यहाँ थे आठ (लहना सिंह तक-तक कर मार रहा था। वह खड़ा था औऱ लेटे हुए थे) और वे सत्तर । अपने मुर्दा भाईयों के शरीर पर चढ़कर जर्मन आगे घुसे आते थे । थोड़े मिनटो में वे&#8230; अचानक आवाज आयी &#8212; &#8216;वाह गुरुजी की फतह ! वाहगुरु दी का खालसा!&#8217; और धड़ाधड़ बंदूको के फायर जर्मनो की पीठ पर पड़ने लगे। ऐन मौके पर जर्मन दो चक्कों के पाटों के बीच में आ गए। पीछे से सूबेदार हजारासिंह के जवान आग बरसाते थे और सामने से लहनासिंह के साथियों के संगीन चल रहे थे। पास आने पर पीछे वालो ने भी संगीन पिरोना शुरु कर दिया ।<br />
एक किलकारी और&#8211; &#8216;अकाल सिक्खाँ दी फौज आयी। वाह गुरु जी दी फतह! वाह गुरु जी दी खालसा! सत्त सिरी अकाल पुरुष! &#8216; और लड़ाई ख़तम हो गई। तिरसठ जर्मन या तो खेत रहे थे या कराह रहे थे। सिक्खो में पन्द्रह के प्राण गए। सूबेदार के दाहिने कन्धे में से गोली आर पार निकल गयी। लहनासिंह की पसली में एक गोली लगी। उसने घाव को खंदक की गीली मिट्टी से पूर लिया। और बाकी का साफ़ा कसकर कमर बन्द की तरह लपेट लिया। किसी को ख़बर नही हुई कि लहना के दूसरा घाव &#8212; भारी घाव &#8212; लगा है। लड़ाई के समय चांद निकल आया था। ऐसा चांद जिसके प्रकाश से संस्कृत कवियो का दिया हुआ &#8216;क्षयी&#8217; नाम सार्थक होता है। और हवा ऐसी चल रही थी जैसी कि बाणभट्ट की भाषा में &#8216;दंतवीणो पदेशाचार्य&#8217; कहलाती। वजीरासिंह कह रहा था कि कैसे मन-मनभर फ्रांस की भूमि मेरे बूटो से चिपक रही थी जब मैं दौडा दौडा सूबेदार के पीछे गया था। सूबेदार लहनासिह से सारा हाल सुन और कागजात पाकर उसकी तुरन्त बुद्धि को सराह रहे थे और कर रहे थे कि तू न होता तो आज सब मारे जाते। इस लड़ाई की आवाज़ तीन मील दाहिनी ओर की खाई वालों ने सुन ली थी। उन्होने पीछे टेलिफ़ोन कर दिया था। वहाँ से झटपट दो डाक्टर और दो बीमार ढोने की गाड़ियाँ चली, जो कोई डेढ घंटे के अन्दर अन्दर आ पहुँची। फील्ड अस्पताल नज़दीक था। सुबह होते-होते वहाँ पहुँच जाएंगे, इसलिए मामूली पट्टी बांधकर एक गाड़ी में घायल लिटाये गए और दूसरी में लाशें रखी गईं। सूबेदार ने लहनासिह की जाँघ में पट्टी बंधवानी चाही। बोधसिंह ज्वर से बर्रा रहा था। पर उसने यह कह कर टाल दिया कि थोड़ा घाव है, सवेरे देखा जायेगा। वह गाड़ी में लिटाया गया। लहना को छोडकर सूबेदार जाते नही थे। यह देख लहना ने कहा&#8211; तुम्हे बोधा की कसम हैं और सूबेदारनी जी की सौगन्द है तो इस गाड़ी में न चले जाओ।<br />
&#8212; और तुम?<br />
&#8212; मेरे लिए वहाँ पहुँचकर गाड़ी भेज देना। और जर्मन मुर्दो के लिए भी तो गाड़ियाँ आती होगीं। मेरा हाल बुरा नही हैं। देखते नही मैं खड़ा हूँ? वजीरासिंह मेरे पास है ही।<br />
&#8212; अच्छा, पर&#8230;<br />
&#8212; बोधा गाड़ी पर लेट गया। भला, आप भी चढ़ आओ। सुनिए तो, सूबेदारनी होराँ को चिट्ठी लिखो तो मेरा मत्था टेकना लिख देना।<br />
&#8212; और जब घर जाओ तो कह देना कि मुझ से जो उन्होने कहा था, वह मैंने कर दिया।<br />
गाड़ियाँ चल पड़ी थीं। सूबेदार ने चढ़ते-चढ़ते लहना का हाथ पकड़कर कहा&#8211; तूने मेरे और बोधा के प्राण बचाये हैं। लिखना कैसा? साथ ही घर चलेंगे। अपनी सूबेदारनी से तू ही कह देना। उसने क्या कहा था?<br />
&#8212; अब आप गाड़ी पर चढ़ जाओ। मैने जो कहा, वह लिख देना और कह भी देना।<br />
गाड़ी के जाते ही लहना लेट गया। &#8211;वजीरा, पानी पिला दे और मेरा कमरबन्द खोल दे। तर हो रहा है।<br />
मृत्यु के कुछ समय पहले स्मृति बहुत साफ़ हो जाती है। जन्मभर की घटनाएँ एक-एक करके सामने आती हैं। सारे दृश्यो के रंग साफ़ होते है, समय की धुन्ध बिल्कुल उन पर से हट जाती है। लहनासिंह बारह वर्ष का है। अमृतसर में मामा के यहाँ आया हुआ है। दहीवाले के यहाँ, सब्जीवाले के यहाँ, हर कहीं उसे आठ साल की लड़की मिल जाती है। जब वह पूछता है कि तेरी कुड़माई हो गई? तब वह &#8216;धत्&#8217; कहकर भाग जाती है। एक दिन उसने वैसे ही पूछा तो उसने कहा&#8211;हाँ, कल हो गयी, देखते नही, यह रेशम के फूलों वाला सालू? यह सुनते ही लहनासिंह को दुःख हुआ। क्रोध हुआ । क्यों हुआ?<br />
&#8212; वजीरासिंह पानी पिला दे।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-11140" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-79-Punjab-Infantry.jpg" alt="tis media, chandradhar sharma guleri, Chali Kahani, Story Of The Day, Hindi Story, Chali Kahani, Story Of The Day, Hindi Story, Hindi Literature, Hindi Movies, Hindi Storytellers, हिंदी साहित्य, हिंदी साहित्यकार, हिंदी फिल्में, हिंदी के कहानीकार, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, चली कहानी, हिंदी कहानियां" width="700" height="408" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-79-Punjab-Infantry.jpg 700w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-79-Punjab-Infantry-300x175.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 700px) 100vw, 700px" /></p>
<p>पच्चीस वर्ष बीत गये। अब लहनासिंह नं. 77 राइफ़ल्स में जमादार हो गया है। उस आठ वर्ष की कन्या का ध्यान ही न रहा, न मालूम वह कभी मिली थी या नही। सात दिन की छुट्टी लेकर ज़मीन के मुकदमे की पैरवी करने वह घर गया। वहाँ रेजीमेंट के अफ़सर की चिट्ठी मिली। फौरन चले आओ। साथ ही सूबेदार हजारासिंह की चिट्ठी मिली कि मैं और बोधासिंह भी लाम पर जाते हैं, लौटते हुए हमारे घर होते आना। साथ चलेंगे।<br />
सूबेदार का घर रास्ते में पड़ता था और सूबेदार उसे बहुत चाहता था। लहनासिंह सूबेदार के यहाँ पहुँचा। जब चलने लगे तब सूबेदार बेडे़ में निकल कर आया। बोला&#8211; लहनासिंह, सूबेदारनी तुमको जानती है। बुलाती है। जा मिल आ।<br />
लहनासिंह भीतर पहुँचा। सूबेदारनी मुझे जानती है? कब से? रेजीमेंट के क्वार्टरों में तो कभी सूबेदार के घर के लोग रहे नहीं। दरवाज़े पर जाकर &#8216;मत्था टेकना&#8217; कहा। असीस सुनी। लहनासिंह चुप।<br />
&#8212; मुझे पहचाना?<br />
&#8212; नहीं।<br />
&#8212; &#8216;तेरी कुड़माई हो गयी? &#8230; धत्&#8230; कल हो गयी&#8230; देखते नही, रेशमी बूटों वाला सालू&#8230; अमृतसर में&#8230;<br />
भावों की टकराहट से मूर्च्छा खुली। करवट बदली। पसली का घाव बह निकला।<br />
&#8212; वजीरासिंह, पानी पिला &#8212; उसने कहा था ।<br />
स्वप्न चल रहा हैं । सूबेदारनी कह रही है&#8211; मैने तेरे को आते ही पहचान लिया। एक काम कहती हूँ। मेरे तो भाग फूट गए। सरकार ने बहादुरी का खिताब दिया है, लायलपुर में ज़मीन दी है, आज नमकहलाली का मौक़ा आया है। पर सरकार ने हम तीमियो की एक घघरिया पलटन क्यो न बना दी जो मै भी सूबेदारजी के साथ चली जाती? एक बेटा है। फौज में भरती हुए उसे एक ही वर्ष हुआ। उसके पीछे चार और हुए, पर एक भी नही जिया । सूबेदारनी रोने लगी&#8211; अब दोनों जाते हैं । मेरे भाग! तुम्हें याद है, एक दिन टाँगे वाले का घोड़ा दहीवाले की दुकान के पास बिगड़ गया था। तुमने उस दिन मेरे प्राण बचाये थे। आप घोड़ो की लातो पर चले गये थे। और मुझे उठाकर दुकान के तख्त के पास खड़ा कर दिया था। ऐसे ही इन दोनों को बचाना। यह मेरी भिक्षा है। तुम्हारे आगे मैं आँचल पसारती हूँ।<br />
रोती-रोती सूबेदारनी ओबरी में चली गयी। लहनासिंह भी आँसू पोछता हुआ बाहर आया।<br />
&#8212; वजीरासिंह, पानी पिला &#8212; उसने कहा था।</p>
<p>लहना का सिर अपनी गोद में रखे वजीरासिंह बैठा है। जब मांगता है, तब पानी पिला देता है। आध घंटे तक लहना फिर चुप रहा, फिर बोला&#8211; कौन? कीरतसिंह?<br />
वजीरा ने कुछ समझकर कहा&#8211; हाँ।<br />
&#8212; भइया, मुझे और ऊँचा कर ले। अपने पट्ट पर मेरा सिर रख ले।<br />
वजीरा ने वैसा ही किया ।<br />
&#8212; हाँ, अब ठीक है। पानी पिला दे। बस। अब के हाड़ में यह आम खूब फलेगा। चाचा-भतीजा दोनों यहीँ बैठकर आम खाना। जितना बड़ा तेरा भतीजा है उतना ही बड़ा यह आम, जिस महीने उसका जन्म हुआ था उसी महीने मैने इसे लगाया था।<br />
वजीरासिंह के आँसू टप-टप टपक रहे थे। कुछ दिन पीछे लोगों ने अख़बारो में पढ़ा&#8212;<br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>फ्रांस और बेलजियम&#8211; 67वीं सूची&#8211; मैदान में घावों से मरा &#8212; न. 77 सिख राइफल्स जमादार लहना सिंह ।</strong></span></p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>चली कहानीः धर्मवीर भारती की &#8220;गुलकी बन्नो&#8221;</title>
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		<pubDate>Thu, 21 Oct 2021 03:40:26 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[Cover Stories]]></category>
		<category><![CDATA[Chali Kahani]]></category>
		<category><![CDATA[Dharamveer Bharti]]></category>
		<category><![CDATA[Gulki Banno]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi Literature]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi Stories]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi Storytellers]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>‘‘ऐ मर कलमुँहे !’ अकस्मात् घेघा बुआ ने कूड़ा फेंकने के लिए दरवाजा खोला और चौतरे पर बैठे मिरवा को गाते हुए देखकर कहा, ‘‘तोरे पेट में फोनोगिराफ उलियान बा का, जौन भिनसार भवा कि तान तोड़ै लाग ? राम जानै, रात के कैसन एकरा दीदा लागत है !’’ मारे डर के कि कहीं घेघा &#8230;</p>
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		<div class="about-author about-author-box container-wrapper">
			<div class="author-avatar">
				<img loading="lazy" decoding="async" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/bharati.jpg" alt="धर्मवीर भारती " class="author-avatar-img" width="111" height="111" />
			</div>
			<div class="author-info">
				<h4>धर्मवीर भारती </h4><strong><span style="color: #ff0000;">धर्मवीर भारती (२५ दिसंबर, १९२६- ४ सितंबर, १९९७) आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रमुख लेखक, कवि, नाटककार और सामाजिक विचारक थे। उनका जन्म इलाहाबाद के अतर सुइया मुहल्ले में हुआ। उनके पिता का नाम श्री चिरंजीव लाल वर्मा और माँ का श्रीमती चंदादेवी था। उन्होंने अध्यापन और पत्रकारिता क्षेत्र में कार्य किया । उनकी प्रमुख कृतियां हैं: काव्य रचनाएं : ठंडा लोहा, सात गीत-वर्ष, कनुप्रिया, सपना अभी भी, आद्यन्त, मेरी वाणी गैरिक वसना, कुछ लम्बी कविताएँ; कहानी संग्रह : मुर्दों का गाँव, स्वर्ग और पृथ्वी, चाँद और टूटे हुए लोग, बंद गली का आखिरी मकान, साँस की कलम से (समस्त कहानियाँ एक साथ) ; उपन्यास: गुनाहों का देवता, सूरज का सातवां घोड़ा, ग्यारह सपनों का देश, प्रारंभ व समापन; निबंध : ठेले पर हिमालय, पश्यंती; पद्य नाटक : अंधा युग; आलोचना : प्रगतिवाद : एक समीक्षा, मानव मूल्य और साहित्य</span></strong>। 
			</div>
		</div>
	
<p>‘‘<span style="color: #ff0000;"><strong>ऐ मर कलमुँहे</strong></span> !’ अकस्मात् घेघा बुआ ने कूड़ा फेंकने के लिए दरवाजा खोला और चौतरे पर बैठे मिरवा को गाते हुए देखकर कहा, ‘‘तोरे पेट में फोनोगिराफ उलियान बा का, जौन भिनसार भवा कि तान तोड़ै लाग ? राम जानै, रात के कैसन एकरा दीदा लागत है !’’ मारे डर के कि कहीं घेघा बुआ सारा कूड़ा उसी के सर पर न फेक दें, मिरवा थोड़ा खिसक गया और ज्यों ही घेघा बुआ अन्दर गयीं कि फिर चौतरे की सीढ़ी पर बैठ, पैर झुलाते हुए उसने उल्टा-सुल्टा गाना शुरू कर किया, ‘‘तुमें बछ याद कलते अम छनम तेरी कछम !’’ मिरवा की आवाज़ सुनकर जाने कहाँ से झबरी कुतिया भी कान-पूँछ झटकारते आ गयी और नीचे सड़क पर बैठकर मिरवा का गाना बिलकुल उसी अन्दाज़ में सुनने लगी जैसे हिज़ मास्टर्स वॉयस के रिकार्ड पर तसवीर बनी होती है।<br />
अभी सारी गली में सन्नाटा था। सबसे पहले मिरवा (असली नाम मिहिरलाल) जागता था और आँख मलते-मलते घेघा बुआ के चौतरे पर आ बैठता था। उसके बाद झबरी कुतिया, फिर मिरवा की छोटी बहन मटकी और उसके बाद एक-एक कर गली के तमाम बच्चे-खोंचेवाली का लड़का मेवा, ड्राइवर साहब की लड़की निरमल, मनीजर साहब के मुन्ना बाबू-सभी आ जुटते थे। जबसे गुलकी ने घेघा बुआ के चौतरे पर तरकारियों की दुकान रखी थी तब से यह जमावड़ा वहाँ होने लगा था। उसके पहले बच्चे हकीमजी के चौतरे पर खेलते थे। धूप निकलते गुलकी सट्टी से तरकारियाँ ख़रीदकर अपनी कुबड़ी पीठ पर लादे, डण्डा टेकती आती और अपनी दुकान फैला देती। मूली, नीबू, कद्दू, लौकी, घिया-बण्डा, कभी-कभी सस्ते फल ! मिरवा और मटकी जानकी उस्ताद के बच्चे थे जो एक भंयकर रोग में गल-गलकर मरे थे और दोनों बच्चे भी विकलांग, विक्षिप्त और रोगग्रस्त पैदा हुए थे। सिवा झबरी कुतिया के और कोई उनके पास नहीं बैठता था और सिवा गुलकी के कोई उन्हें अपनी देहरी या दुकान पर चढ़ने नहीं देता था।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">आज</span></strong> भी गुलकी को आते देखकर पहले मिरवा गाना छोड़कर, ‘‘छलाम गुलकी !’’ और मटकी अपने बढ़ी हुई तिल्लीवाले पेट पर से खिसकता हुआ जाँघिया सँभालते हुए बोली, ‘‘एक ठो मूली दै देव ! ए गुलकी !’’ गुलकी पता नहीं किस बात से खीजी हुई थी कि उसने मटकी को झिड़क दिया और अपनी दुकान लगाने लगी। झबरी भी पास गयी कि गुलकी ने डण्ड उठाया। दुकान लगाकर वह अपनी कुबड़ी पीठ दुहराकर बैठ गयी और जाने किसे बुड़बुड़ाकर गालियाँ देने लगी। मटकी एक क्षण चुपचाप रही फिर उसने रट लगाना शुरू किया, ‘‘एक मूली ! एक गुलकी !&#8230;एक’’ गुलकी ने फिर झिड़का तो चुप हो गयी और अलग हटकर लोलुप नेत्रों से सफेद धुली हुई मूलियों को देखने लगी। इस बार वह बोली नहीं। चुपचाप उन मूलियों की ओर हाथ बढ़ाया ही था कि गुलकी चीख़ी, ‘‘हाथ हटाओ। छूना मत। कोढ़िन कहीं की ! कहीं खाने-पीने की चीज देखी तो जोंक की तरह चिपक गयी, चल इधर !’’ मटकी पहले तो पीछे हटी पर फिर उसकी तृष्णा ऐसी अदम्य हो गयी कि उसने हाथ बढ़ाकर एक मूली खींच ली। गुलकी का मुँह तमतमा उठा और उसने बाँस की खपच्ची उठाकर उसके हाथ पर चट से दे मारी ! मूली नीचे गिरी और हाय ! हाय ! हाय !’’ कर दोनों हाथ झटकती हुई मटकी पाँव पटकपटक कर रोने लगी। ‘‘जावो अपने घर रोवो। हमारी दुकान पर मरने को गली-भर के बच्चे हैं-’’ गुलकी चीख़ी ! ‘‘दुकान दैके हम बिपता मोल लै लिया। छन-भर पूजा-भजन में भी कचरघाँव मची रहती है !’’ अन्दर से घेघा बुआ ने स्वर मिलाया। ख़ासा हंगामा मच गया कि इतने में झबरी भी खड़ी हो गयी और लगी उदात्त स्वर में भूँकने। ‘लेफ्ट राइट ! लेफ्ट राइट !’ चौराहे पर तीन-चार बच्चों का जूलूस चला आ रहा था। आगे-आगे दर्जा ‘ब’ में पढ़नेवाले मुन्ना बाबू नीम की सण्टी को झण्डे की तरह थामे जलूस का नेतृत्व कर रहे थे, पीछे थे मेवा और निरमल। जलूस आकर दूकान के सामने रूक गया। गुलकी सतर्क हो गयी। दुश्मन की ताक़त बढ़ गयी थी।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>मटकी</strong></span> खिसकते-खिसकते बोली, ‘‘हमके गुलकी मारिस है। हाय ! हाय ! हमके नरिया में ढकेल दिहिस। अरे बाप रे !’’ निरमल, मेवा, मुन्ना, सब पास आकर उसकी चोट देखने लगे। फिर मुन्ना ने ढकेलकर सबको पीछे हटा दिया और सण्टी लेकर तनकर खड़े हो गये। ‘‘किसने मारा है इसे !’’<br />
‘‘हम मारा है !’’ कुबड़ी गुलकी ने बड़े कष्ट से खड़े होकर कहा, ‘‘का करोगे ? हमें मारोगे !’’ मारोगे !’’ मारेंगे क्यों नहीं ?’’ मुन्ना बाबू ने अकड़कर कहा। गुलकी इसका कुछ जवाब देती कि बच्चे पास घिर आये। मटकी ने जीभ निकालकर मुँह बिराया, मेवा ने पीछे जाकर कहा, ‘‘ए कुबड़ी, ए कुबड़ी, अपना कूबड़ दिखाओ !’’ और एक मुट्ठी धूल उसकी पीठ पर छोड़कर भागा। गुलकी का मुँह तमतमा आया और रूँधे गले से कराहते हुए उसने पता नहीं क्या कहा। किन्तु उसके चेहरे पर भय की छाया बहुत गहरी हो रही थी। बच्चे सब एक-एक मुट्ठी धूल लेकर शोर मचाते हुए दौड़े कि अकस्मात् घेघा बुआ का स्वर सुनाई पड़ा, ‘‘ए मुन्ना बाबू, जात हौ कि अबहिन बहिनजी का बुलवाय के दुई-चार कनेठी दिलवायी !’’ ‘‘जाते तो हैं !’’ मुन्ना ने अकड़ते हुए कहा, ‘‘ए मिरवा, बिगुल बजाओ।’’ मिरवा ने दोनों हाथ मुँह पर रखकर कहा, ‘‘धुतु-धुतु-धू।’’ जलूस आगे चल पड़ा और कप्तान ने नारा लगाया:<br />
अपने देस में अपना राज !<br />
गुलकी की दुकान बाईकाट !</p>
<p>नारा लगाते हुए जलूस गली में मुड़ गया। कुबड़ी ने आँसू पोंछे, तरकारी पर से धूल झाड़ी और साग पर पानी के छींटे देने लगी।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">गुलकी</span></strong> की उम्र ज़्यादा नहीं थी। यही हद-से-हद पच्चीस-छब्बीस। पर चेहरे पर झुर्रियाँ आने लगी थीं और कमर के पास से वह इस तरह दोहरी हो गयी थी जैसे अस्सी वर्ष की बुढ़िया हो। बच्चों ने जब पहली बार उसे मुहल्ले में देखा तो उन्हें ताजुज्ब भी हुआ और थोड़ा भय भी। कहाँ से आयी ? कैसे आ गयी ? पहले कहाँ थी ? इसका उन्हें कुछ अनुमान नहीं था ? निरमल ने ज़रूर अपनी माँ को उसके पिता ड्राइवर से रात को कहते हुए सुना, ‘‘यह मुसीबत और खड़ी हो गयी। मरद ने निकाल दिया तो हम थोड़े ही यह ढोल गले बाँधेंगे। बाप अलग हम लोगों का रुपया खा गया। सुना चल बसा तो डरी कि कहीं मकान हम लोग न दखल कर लें और मरद को छोड़कर चली आयी। खबरदार जो चाभी दी तुमने !’’ ‘‘क्या छोटेपन की बात करती हो ! रूपया उसके बाप ने ले लिया तो क्या हम उसका मकान मार लेंगे ? चाभी हमने दे दी है। दस-पाँच दिन का नाज-पानी भेज दो उसके यहाँ।’’<br />
‘‘हाँ-हाँ, सारा घर उठा के भेज देव। सुन रही हो घेघा बुआ !’’<br />
‘‘तो का भवा बहू, अरे निरमल के बाबू से तो एकरे बाप की दाँत काटी रही।’’ घेघा बुआ की आवाज़ आयी-‘‘बेचारी बाप की अकेली सन्तान रही। एही के बियाह में मटियामेट हुई गवा। पर ऐसे कसाई के हाथ में दिहिस की पाँचै बरस में कूबड़ निकल आवा।’’<br />
‘‘साला यहाँ आवे तो हण्टर से ख़बर लूँ मैं।’’ ड्राइवर साहब बोले, ‘‘पाँच बरस बाद बाल-बच्चा हुआ। अब मरा हुआ बच्चा पैदा हुआ तो उसमें इसका क्या कसूर ! साले ने सीढ़ी से ढकेल दिया। जिन्दगी-भर के लिए हड्डी खराब हो गयी न ! अब कैसे गुजारा हो उसका ?’’<br />
‘‘बेटवा एको दुकान खुलवाय देव। हमरा चौतरा खाली पड़ा है। यही रूपया दुइ रूपया किराया दै देवा करै, दिन-भर अपना सौदा लगाय ले। हम का मना करित है ? एत्ता बड़ा चौतरा मुहल्लेवालन के काम न आयी तो का हम छाती पर धै लै जाब ! पर हाँ, मुला रुपया दै देव करै।’’</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">दूसरे</span></strong> दिन यह सनसनीख़ेज ख़बर बच्चों में फैल गयी। वैसे तो हकीमजी का चबूतरा पड़ा था, पर वह कच्चा था, उस पर छाजन नहीं थी। बुआ का चौतरा लम्बा था, उस पर पत्थर जुड़े थे। लकड़ी के खम्भे थे। उस पर टीन छायी थी। कई खेलों की सुविधा थी। खम्भों के पीछे किल-किल काँटे की लकीरें खींची जा सकती थीं। एक टाँग से उचक-उचककर बच्चे चिबिड्डी खेल सकते थे। पत्थर पर लकड़ी का पीढ़ा रखकर नीचे से मुड़ा हुआ तार घुमाकर रेलगाड़ी चला सकते थे। जब गुलकी ने अपनी दुकान के लिए चबूतरों के खम्भों में बाँस-बाँधे तो बच्चों को लगा कि उनके साम्राज्य में किसी अज्ञात शत्रु ने आकर क़िलेबन्दी कर ली है। वे सहमे हुए दूर से कुबड़ी गुलकी को देखा करते थे। निरमल ही उसकी एकमात्र संवाददाता थी और निरमल का एकमात्र विश्वस्त सूत्र था उसकी माँ। उससे जो सुना था उसके आधार पर निरमल ने सबको बताया था कि यह चोर है। इसका बाप सौ रूपया चुराकर भाग गया। यह भी उसके घर का सारा रूपया चुराने आयी है। ‘‘रूपया चुरायेगी तो यह भी मर जाएगी।’’ मुन्ना ने कहा, ‘‘भगवान सबको दण्ड देता है।’’ निरमल बोली ‘‘ससुराल में भी रूपया चुराये होगी।’’ मेवा बोला ‘‘अरे कूबड़ थोड़े है ! ओही रूपया बाँधे है पीठ पर। मनसेधू का रूपया है।’’ ‘‘सचमुच ?’’ निरमल ने अविश्वास से कहा। ‘‘और नहीं क्या कूबड़ थोड़ी है। है तो दिखावै।’’ मुन्ना द्वारा उत्साहित होकर मेवा पूछने ही जा रहा था कि देखा साबुनवाली सत्ती खड़ी बात कर रही है गुलकी से-कह रही थी, ‘‘अच्छा किया तुमने ! मेहनत से दुकान करो। अब कभी थूकने भी न जाना उसके यहाँ। हरामजादा, दूसरी औरत कर ले, चाहे दस और कर ले। सबका खून उसी के मत्थे चढ़ेगा। यहाँ कभी आवे तो कहलाना मुझसे। इसी चाकू से दोनों आँखें निकाल लूँगी !’’<br />
बच्चे डरकर पीछे हट गये। चलते-चलते सत्ती बोली, ‘‘कभी रूपये-पैसे की जरूरत हो तो बताना बहिना !’’</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">कुछ</span></strong> दिन बच्चे डरे रहे। पर अकस्मात् उन्हें यह सूझा कि सत्ती को यह कुबड़ी डराने के लिए बुलाती है। इसने उसके गु़स्से में आग में घी का काम किया। पर कर क्या सकते थे। अन्त में उन्होंने एक तरीक़ा ईजाद किया। वे एक बुढ़िया का खेल खेलते थे। उसको उन्होंने संशोधित किया। मटकी को लैमन जूस देने का लालच देकर कुबड़ी बनाया गया। वह उसी तरह पीठ दोहरी करके चलने लगी। बच्चों ने सवाल जवाब शुरू कियेः<br />
‘‘कुबड़ी-कुबड़ी का हेराना ?’’<br />
‘‘सुई हिरानी।’’<br />
‘‘सुई लैके का करबे’’<br />
‘‘कन्था सीबै! ’’<br />
‘‘कन्था सी के का करबे ?’’<br />
‘‘लकड़ी लाबै !’’<br />
‘‘लकड़ी लाय के का करबे ?’’<br />
‘‘भात पकइबे! ’’<br />
‘‘भात पकाये के का करबै ?’’<br />
‘‘भात खाबै !’’<br />
‘‘भात के बदले लात खाबै।’’<br />
और इसके पहले कि कुबड़ी बनी हुई मटकी कुछ कह सके, वे उसे जोर से लात मारते और मटकी मुँह के बल गिर पड़ती, उसकी कोहनिया और घुटने छिल जाते, आँख में आँसू आ जाते और ओठ दबाकर वह रूलाई रोकती। बच्चे खुशी से चिल्लाते, ‘‘मार डाला कुबड़ी को । मार डाला कुबड़ी को।’’ गुलकी यह सब देखती और मुँह फेर लेती।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">एक</span></strong> दिन जब इसी प्रकार मटकी को कुबड़ी बनाकर गुलकी की दुकान के सामने ले गये तो इसके पहले कि मटकी जबाव दे, उन्होंने ने अनचिते में इतनी ज़ोर से ढकेल दिया कि वह कुहनी भी न टेक सकी और सीधे मुँह के बल गिरी। नाक, होंठ और भौंह ख़ून से लथपथ हो गये। वह ‘‘हाय ! हाय !’’ कर इस बुरी तरह चीख़ी कि लड़के कुबड़ी मर गयी चिल्लाते हुए सहम गये और हतप्रभ हो गये। अकस्मात् उन्होंने देखा की गुलकी उठी । वे जान छोड़ भागे। पर गुलकी उठकर आयी, मटकी को गोद में लेकर पानी से उसका मुँह धोने लगी और धोती से खून पोंछने लगी। बच्चों ने पता नहीं क्या समझा कि वह मटकी को मार रही है, या क्या कर रही है कि वे अकस्मात् उस पर टूट पड़े। गुलकी की चीख़े सुनकर मुहल्ले के लोग आये तो उन्होंने देखा कि गुलकी के बाल बिखरे हैं और दाँत से ख़ून बह रहा है, अधउघारी चबूतरे से नीचे पड़ी है, और सारी तरकारी सड़क पर बिखरी है। घेघा बुआ ने उसे उठाया, धोती ठीक की और बिगड़कर बोलीं, ‘‘औकात रत्ती-भर नै, और तेहा पौवा-भर। आपन बखत देख कर चुप नै रहा जात। कहे लड़कन के मुँह लगत हो ?’’ लोगों ने पूछ तो कुछ नहीं बोली। जैसे उसे पाला मार गया हो। उसने चुपचाप अपनी दुकान ठीक की और दाँत से खू़न पोंछा, कुल्ला किया और बैठ गयी।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">उसके</span></strong> बाद अपने उस कृत्य से बच्चे जैसे खु़द सहम गये थे। बहुत दिन तक वे शान्त रहे। आज जब मेवा ने उसकी पीठ पर धूल फेंकी तो जैसे उसे खू़न चढ़ गया पर फिर न जाने वह क्या सोचकर चुप रह गयी और जब नारा लगाते जूलूस गली में मुड़ गया तो उसने आँसू पोंछे, पीठ पर से धूल झाड़ी और साग पर पानी छिड़कने लगी। लड़के का हैं गल्ली के राक्षस हैं !’’ घेघा बुआ बोलीं। ‘‘अरे उन्हें काहै कहो बुआ ! हमारा भाग भी खोटा है !’’ गुलकी ने गहरी साँस लेकर कहा&#8230;.।<br />
इस बार जो झड़ी लगी तो पाँच दिन तक लगातार सूरज के दर्शन नहीं हुए। बच्चे सब घर में क़ैद थे और गुलकी कभी दुकान लगाती थी, कभी नहीं, राम-राम करके तीसरे पहर झड़ी बन्द हुई। बच्चे हकीमजी के चौतरे पर जमा हो गये। मेवा बिलबोटी बीन लाया था और निरमल ने टपकी हुई निमकौड़ियाँ बीनकर दुकान लगा ली थी और गुलकी की तरह आवाज़ लगा रही थी, ‘‘ले खीरा, आलू, मूली, घिया, बण्डा !’’ थोड़ी देर में क़ाफी शिशु-ग्राहक दुकान पर जुट गये। अकस्मात् शोरगुल से चीरता हुआ बुआ के चौतरे से गीत का स्वर उठा बच्चों ने घूम कर देखा मिरवा और मटकी गुलकी की दुकान पर बैठे हैं। मटकी खीरा खा रही है और मिरवा झबरी का सर अपनी गोद में रखे बिलकुल उसकी आँखों में आँखें डालकर गा रहा है।<br />
तुरन्त मेवा गया और पता लगाकर लाया कि गुलकी ने दोनों को एक –एक अधन्ना दिया है दोनों मिलकर झबरी कुतिया के कीड़े निकाल रहे हैं। चौतरे पर हलचल मच गयी और मुन्ना ने कहा, ‘‘निरमल ! मिरवा-मटकी को एक भी निमकौड़ी मत देना। रहें उसी कुबड़ी के पास !’’ ‘‘हाँ जी !’’ निरमल ने आँख चमकाकर गोल मुंह करके कहा, ‘‘हमार अम्माँ कहत रहीं उन्हें छुयो न ! न साथ खायो, न खेलो। उन्हें बड़ी बुरी बीमारी है। आक थू !’’ मुन्ना ने उनकी ओर देखकर उबकायी जैसा मुँह बनाकर थूक दिया।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">गुलकी</span></strong> बैठी-बैठी सब समझ रही थी और जैसे इस निरर्थक घृणा में उसे कुछ रस-सा आने लगा था। उसने मिरवा से कहा, ‘‘तुम दोनों मिल के गाओ तो एक अधन्ना दें। खूब जोर से !’’ भाई-बहन दोनों ने गाना शुरू किया-माल कताली मल जाना, पल अकियाँ किछी से&#8230;’’ अकस्मात् पटाक से दरवाजा खुला और एक लोटा पानी दोनों के ऊपर फेंकती हुई घेघा बुआ गरजीं, दूर कलमुँहे। अबहिन बितौ-भर के नाहीं ना और पतुरियन के गाना गाबै लगे। न बहन का ख्याल, न बिटिया का। और ए कुबड़ी, हम तुहूँ से कहे देइत है कि हम चकलाखाना खोलै के बरे अपना चौतरा नहीं दिया रहा। हुँह ! चली हुँआ से मुजरा करावै।’’<br />
गुलकी ने पानी उधर छिटकाते हुए कहा, ‘‘बुआ बच्चे हैं। गा रहे हैं। कौन कसूर हो गया।’’<br />
‘‘ऐ हाँ ! बच्चे हैं। तुहूँ तो दूध पियत बच्ची हौ। कह दिया कि जबान न लड़ायों हमसे, हाँ ! हम बहुतै बुरी हैं। एक तो पाँच महीने से किराया नाहीं दियो और हियाँ दुनियाँ-भर के अन्धे-कोढ़ी बटुरे रहत हैं। चलौ उठायो अपनी दुकान हियाँ से। कल से न देखी हियाँ तुम्हें राम ! राम ! सब अघर्म की सन्तान राच्छस पैदा भये हैं मुहल्ले में ! धरतियौ नहीं फाटत कि मर बिलाय जाँय।’’<br />
गुलकी सन्न रह गयी। उसने किराया सचमुच पाँच महीने से नहीं दिया था। ब्रिक्री नहीं थी। मुहल्ले में उनसे कोई कुछ लेता ही नहीं था, पर इसके लिए बुआ निकाल देगी यह उसे कभी आशा नहीं थी। वैसे भी महीने में बीस दिन वह भूखी सोती थी। धोती में दस-दस पैबन्द थे। मकान गिर चुका था एक दालान में वह थेड़ी-सी जगह में सो जाती थी। पर दुकान तो वहाँ रखी नहीं जा सकती। उसने चाहा कि वह बुआ के पैर पकड़ ले, मिन्नत कर ले। पर बुआ ने जितनी जोर से दरवाजा खोला था उतनी ही जोर से बन्द कर दिया। जब से चौमास आया था, पुरवाई बही थी, उसकी पीठ में भयानक पीड़ा उठती थी। उसके पाँव काँपते थे। सट्टी में उस पर उधार बुरी तरह चढ़ गया था। पर अब होगा क्या ? वह मारे खीज के रोने लगी।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">इतने</span></strong> में कुछ खटपट हुई और उसने घुटनों से मुँह उठाकर देखा कि मौका पाकर मटकी ने एक फूट निकाल लिया है और मरभुखी की तरह उसे हबर-हबर खाती जा रही थी है, एक क्षण वह उसके फूलते-पचकते पेट को देखती रही, फिर ख्याल आते ही कि फूट पूरे दस पैसे का है, वह उबल पड़ी और सड़ासड़ तीन-चार खपच्ची मारते हुए बोली, ‘‘चोट्टी ! कुतिया ! तोरे बदन में कीड़ा पड़ें !’’ मटकी के हाथ से फूट गिर पड़ा पर वह नाली में से फूट के टुकड़े उठाते हुए भागी। न रोयी, न चीख़ी, क्योंकि मुँह में भी फूट भरा था। मिरवा हक्का-बक्का इस घटना को देख रहा था कि गुलकी उसी पर बरस पड़ी। सड़-सड़ उसने मिरवा को मारना शुरू किया, ‘‘भाग, यहाँ से हरामजादे !’’ मिरवा दर्द से तिलमिला उठा, ‘‘हमला पइछा देव तो जाई।’’ ‘‘देत हैं पैसा, ठहर तो।’’ सड़ ! सड़।&#8230; रोता हुआ। मिरवा चौतरे की ओर भागा।</p>
<p>निरमल की दुकान पर सन्नाटा छाया हुआ था। सब चुप उसी ओर देख रहे थे। मिरवा ने आकर कुबड़ी की शिकायत मुन्ना से की। और घूमकर बोला, ‘‘मेवा बता तो इसे !’ मेवा पहले हिचकिचाया, फिर बड़ी मुलायमियत से बोला, ‘‘मिरवा तुम्हें बीमारी हुई है न ! तो हम लोग तुम्हें नहीं छुएँगे । साथ नहीं खिलाएँगें तुम उधर बैठ जाओ।’’<br />
‘‘हम बीमाल हैं मुन्ना ?’’<br />
मुन्ना कुछ पिघला, ‘‘हाँ, हमें छूओ मत। निमकौड़ी खरीदना हो तो उधर बैठ जाओ हम दूर से फेंक देंगे। समझे !’’ मिरवा समझ गया सर हिलाया और अलग जाकर बैठ गया। मेवा ने निमकौड़ी उसके पास रख दी और चोट भूलकर पकी निमकौड़ी का बीजा निकाल कर छीलने लगा। इतने में उधर से घेघा बुआ की आवाज आयी, ‘‘ऐ मुन्ना !’’ तई तू लोग परे हो जाओ ! अबहिन पानी गिरी ऊपर से !’’ बच्चो ने ऊपर देखा। तिछत्ते पर घेघा बुआ मारे पानी के छप-छप करती घूम रही थीं। कूड़े से तिछत्ते की नाली बन्द थी और पानी भरा था। जिधर बुआ खड़ी थीं उसके ठीक नीचे गुलकी का सौदा था। बच्चे वहाँ से दूर थे पर गुलकी को सुनने के लिए बात बच्चों से कही गयी थी। गुलकी कराहती हुई उठी। कूबड़ की वजह से वह तनकर चिछत्ते की ओर देख भी नहीं सकती थी। उसने धरती की ओर देखा ऊपर बुआ से कहा, ‘‘इधर की नाली काहे खोल रही हो ? उधर की खोलो न !’’<br />
‘‘काहे उधर की खोली ! उधर हमारा चौका है कि नै !’’<br />
‘‘इधर हमारा सौदा लगा है।’’<br />
‘‘<span style="color: #ff0000;"><strong>ऐ है</strong> </span>!’’ बुआ हाथ चमका कर बोलीं, सौदा लगा है रानी साहब का ! किराया देय की दायीं हियाव फाटत है और टर्राय के दायीं नटई में गामा पहिलवान का जोर तो देखो ! सौदा लगा है तो हम का करी। नारी तो इहै खुली है !’’<br />
‘‘खोलो तो देखैं !’’ अकस्मात् गुलकी ने तड़प कर कहा। आज तक किसी ने उसका वह स्वर नहीं सुना था-‘‘पाँच महीने का दस रूपया नहीं दिया बेशक, पर हमारे घर की धन्नी निकाल के बसन्तू के हाथ किसने बेचा ? तुमने। पच्छिम ओर का दरवाजा चिरवा के किसने जलवाया ? तुमने। हम गरीब हैं। हमारा बाप नहीं है सारा मुहल्ला हमें मिल के मार डालो।’’<br />
‘‘हमें चोरी लगाती है। अरे कल की पैदा हुई।’’ बुआ मारे ग़ुस्से के खड़ी बोली बोलने लगी थीं।</p>
<p>बच्चे चुप खड़े थे। वे कुछ-कुछ सहमे हुए थे। कुबड़ी का यह रूप उन्होंने कभी न देखा न सोचा था<br />
‘‘हाँ ! हाँ ! हाँ। तुमने, ड्राइवर चाचा से, चाची ने सबने मिलके हमारा मकान उजाड़ा है। अब हमारी दुकान बहाय देव। देखेंगे हम भी। निरबल के भी भगवान हैं !’’<br />
‘‘ले ! ले ! ले ! भगवान हैं तो ले !’’ और बुआ ने पागलों की तरह दौड़कर नाली में जमा कूड़ा लकड़ी से ठेल दिया। छह इंच मोटी गन्दे पानी की धार धड़-धड़ करती हुई उसकी दुकान पर गिरने लगी। तरोइयाँ पहले नाली में गिरीं, फिर मूली, खीरे, साग, अदरक उछल-उछलकर दूर जा गिरे। गुलकी आँख फाड़े पागल-सी देखती रही और फिर दीवार पर सर पटककर हृदय-विदारक स्वर में डकराकर रो पड़ी, ‘‘अरे मोर बाबू, हमें कहाँ छोड़ गये ! अरे मोरी माई, पैदा होते ही हमें क्यों नहीं मार डाला ! अरे धरती मैया, हमें काहे नहीं लील लेती !’’<br />
सर खोले बाल बिखेरे छाती कूट-कूटकर वह रो रही थी और तिछत्ते का पिछले पहले नौ दिन का जमा पानी धड़-धड़ गिर रहा था।<br />
बच्चे चुप खड़े थे। अब तक जो हो रहा था, उनकी समझ में आ रहा था। पर आज यह क्या हो गया, यह उनकी समझ में नहीं आ सका । पर वे कुछ बोले नहीं। सिर्फ मटकी उधर गयी और नाली में बहता हुआ हरा खीरा निकालने लगी कि मुन्ना ने डाँटा, ‘‘खबरदार ! जो कुछ चुराया।’’ मटकी पीछे हट गयी। वे सब किसी अप्रत्याशित भय संवेदना या आशंका से जुड़-बटुरकर खड़े हो गये। सिर्फ़ मिरवा अलग सर झुकाये खड़ा था। झींसी फिर पड़ने लगी थी और वे एक-एक कर अपने घर चले गये।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">दूसरे</span></strong> दिन चौतरा ख़ाली थी। दुकान का बाँस उखड़वाकर बुआ ने नाँद में गाड़कर उस पर तुरई की लतर चढ़ा दी थी। उस दिन बच्चे आये पर उनकी हिम्मत चौतरे पर जाने की नहीं हुई। जैसे वहाँ कोई मर गया हो। बिलकुल सुनसान चौतरा था और फिर तो ऐसी झड़ी लगी कि बच्चों का निकलना बन्द। चौथे या पाँचवें दिन रात को भयानक वर्षा तो हो ही रही थी, पर बादल भी ऐसे गरज रहे थे कि मुन्ना अपनी खाट से उठकर अपनी माँ के पास घुस गया। बिजली चमकते ही जैसे कमरा रोशनी से नाच-नाच उठता था छत पर बूदों की पटर-पटर कुछ धीमी हुई, थोड़ी हवा भी चली और पेड़ों का हरहर सुनाई पड़ा कि इतने में धड़-धड़-धड़-धड़ाम ! भयानक आवाज़ हुई। माँ भी चौंक पड़ी। पर उठी नहीं। मुन्ना आँखें खोले अँधेरें में ताकने लगा। सहसा लगा मुहल्ले में कुछ लोग बातचीत कर रहे हैं घेघा बुआ की आवाज़ सुनाई पड़ी-‘‘किसका मकान गिर गया है रे’’ ‘‘गुलकी का !’’-किसी का दूरागत उत्तर आया। ‘‘अरे बाप रे ! दब गयी क्या ?’’ ‘‘नहीं, आज तो मेवा की माँ के यहाँ सोई है ! मुन्ना लेटा था और उसके ऊपर अँधेरे में यह सवाल-जवाब इधर-से-उधर और उधर-से-इधर आ रहे थे। वह फिर काँप उठा, माँ के पास घुस गया और सोते-सोते उसने साफ़ सुना-कुबड़ी फिर उसी तरह रो रही है, गला फाड़कर रो रही है ! कौन जाने मुन्ना के ही आँगन में बैठकर रो रही हो ! नींद में वह स्वर कभी दूर कभी पास आता हुआ लग रहा है जैसे कुबड़ी मुहल्ले के हर आँगन में जाकर रो रही है पर कोई सुन नहीं रहा है, सिवा मुन्ना के।<br />
बच्चों के मन में कोई बात इतनी गहरी लकीर बनाती कि उधर से उनका ध्यान हटे ही नहीं। सामने गुलकी थी तो वह एक समस्या थी, पर उसकी दुकान हट गयी, फिर वह जाकर साबुन वाली सत्ती के गलियारे में सोने लगी और दो-चार घरों से माँग-मूँगकर खाने लगी, उस गली में दिखती ही नहीं थी। बच्चे भी दूसरे कामों में व्यस्त हो गये। अब जाड़े आ रहे थे। उनका जमावड़ा सुबह न होकर तीसरे पहर होता था। जमा होने के बाद जूलूस निकलता था। और जिस जोशीले नारे से गली गूँज उठती थी वह था-‘घेघा बुआ को वोट दो।’’ पिछले दिनों म्युनिसिपैलिटी का चुनाव हुआ था और उसी में बच्चों ने यह नारा सीखा था। वैसे कभी-कभी बच्चों में दो पार्टियाँ भी होती थीं, पर दोनों को घेघा बुआ से अच्छा उम्मीदवार कोई नहीं मिलता था अतः दोनों गला फाड़-फाड़कर उनके ही लिए बोट माँगती थीं।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">उस</span></strong> दिन जब घेघा बुआ के धैर्य का बाँध टूट गया और नयी-नयी गालियों से विभूषित अपनी पहली इलेक्शन स्पीच देने ज्यों ही चौतरे पर अवतरित हुईं कि उन्हें डाकिया आता हुआ दिखाई पड़ा। वह अचकचाकर रूक गयीं। डाकिये के हाथ में एक पोस कार्ड था और वह गुलकी को ढूँढ़ रहा था। बुआ ने लपक कर पोस्टकार्ड लिया, एक साँस में पढ़ गयीं। उनकी आँखें मारे अचरज के फैल गयीं, और डाकिये को यह बताकर कि गुलकी सत्ती साबुनवाली के ओसारे में रहती है, वे झट से दौड़ी-दौड़ी निरमल की माँ ड्राइवर की पत्नी के यहाँ गयीं। बड़ी देर तक दोनों में सलाह-मशविरा होता रहा और अन्त में बुआ आयीं और उन्होंने मेवा को भेजा, ‘‘जा गुलकी को बुलाय ला !’’<br />
पर जब मेवा लौटा तो उसके साथ गुलकी नहीं वरन् सत्ती साबुनवाली थी और सदा की भाँति इस समय भी उसकी कमर से वह काले बेंट का चाकू लटक रहा था, जिससे वह साबुन की टिक्की काटकर दुकानदारों को देती थी। उसने आते ही भौं सिकोड़कर बुआ को देखा और कड़े स्वर में बोली, ‘‘क्यों बुलाया है गुलकी को ? तुम्हारा दस रूपये किराया बाकी था, तुमने पन्द्रह रूपये का सौदा उजाड़ दिया ! अब क्या काम है !’’ ‘‘अरे राम ! राम ! कैसा किराया बेटी ! अन्दर जाओ-अन्दर जाओ !’ बुआ के स्वर में असाधारण मुलायमियत थी। सत्ती के अन्दर जाते ही बुआ ने फटाक् से किवाड़ा बन्द कर लिये। बच्चों का कौतूहल बहुत बढ़ गया था। बुआ के चौके में एक झँझरी थी। सब बच्चे वहाँ पहुँचे और आँख लगाकर कनपटियों पर दोनों हथेलियाँ रखकर घण्टीवाला बाइसकोप देखने की मुद्रा में खड़े हो गये।<br />
अन्दर सत्ती गरज रही थी, ‘‘बुलाया है तो बुलाने दो। क्यों जाए गुलकी ? अब बड़ा खयाल आया है। इसलिए की उसकी रखैल को बच्चा हुआ है जो जाके गुलकी झाड़ू-बुहारू करे, खाना बनावे, बच्चा खिलावे, और वह मरद का बच्चा गुलकी की आँख के आगे रखैल के साथ गुलछर्रे उड़ावे !’’</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">निरमल</span></strong> की माँ बोलीं, ‘‘अपनी बिटिया, पर गुजर तो अपने आदमी के साथ करैगी न ! जब उसकी पत्नी आयी है तो गुलकी को जाना चाहिए। और मरद तो मरद। एक रखैल छोड़ दुई-दुई रखैल रख ले तो औरत उसे छोड़ देगी ? राम ! राम !’’<br />
‘‘नहीं, छोड़ नहीं देगी तो जाय कै लात खाएगी ?’’ सत्ती बोली।<br />
‘‘अरे बेटा !’’ बुआ बोलीं, ‘‘भगवान रहें न ? तौन मथुरापुरी में कुब्जा दासी के लात मारिन तो ओकर कूबर सीधा हुइ गवा। पती तो भगवान हैं बिटिया। ओका जाय देव !’’<br />
‘‘हाँ-हाँ, बड़ी हितू न बनिये ! उसके आदमी से आप लोग मुफ्त में गुलकी का मकान झटकना चाहती हैं। मैं सब समझती हूँ।’’<br />
निरमल की माँ का चेहरा ज़र्द पड़ गया। पर बुआ ने ऐसी कच्ची गोली नहीं खेली थी। वे डपटकर बोलीं, ‘‘खबरदार जो कच्ची जबान निकाल्यो ! तुम्हारा चरित्तर कौन नै जानता ! ओही छोकरा मानिक&#8230;’’<br />
जबान खींच लूँगी, ‘‘सत्ती गला फाड़कर चीख़ी जो आगे एक हरूफ़ कहा।’’ और उसका हाथ अपने चाकू पर गया-<br />
‘‘अरे ! अरे ! अरे !’’ बुआ सहमकर दस क़दम पीछे हट गयीं-‘‘तो का खून करबो का, कतल करबो का ?’’ सत्ती जैसे आयी थी वैसे ही चली गयी।<br />
तीसरे दिन बच्चों ने तय किया कि होरी बाबू के कुएँ पर चलकर बर्रें पकड़ी जायें। उन दिनों उनका जहर शान्त रहता है, बच्चे उन्हें पकड़कर उनका छोटा-सा काला डंक निकाल लेते और फिर डोरी में बाँधकर उन्हें उड़ाते हुए घूमते। मेवा, निरमल और मुन्ना एक-एक बर्रे उड़ाते हुए जब गली में पहुँचे तो देखा बुआ के चौतरे पर टीन की कुरसी डाले कोई आदमी बैठा है। उसकी अजब शक्ल थी। कान पर बड़े-बड़े बाल, मिचमिची आँखें, मोछा और तेल से चुचुआते हुए बाल। कमीज और धोती पर पुराना बदरंग बूट। मटकी हाथ फैलाये कह रही है, “एक डबल दै देव! एक दै देव ना?” मुन्ना को देखकर मटकी ताली बजा-बजाकर कहने लगी, “गुलकी का मनसेधू आवा है। ए मुन्ना बाबू! ई कुबड़ी का मनसेधू है।” फिर उधर मुड़कर- “एक डबल दै देव।” तीनों बच्चे कौतूहल में रुक गये। इतने में निरमल की माँ एक गिलास में चाय भरकर लायी और उसे देते-देते निरमल के हाथ में बर्रे देखकर उसे डाँटने लगी। फिर बर्रे छुड़ाकर निरमल को पास बुलाया और बोली, “बेटा, ई हमारी निरमला है। ए निरमल, जीजाजी हैं, हाथ जोड़ो! बेटा, गुलकी हमारी जात-बिरादरी की नहीं है तो का हुआ, हमारे लिए जैसे निरमल वैसे गुलकी। अरे, निरमल के बाबू और गुलकी के बाप की दाँत काटी रही। एक मकान बचा है उनकी चिहारी, और का?&#8221;; एक गहरी साँस लेकर निरमल की माँ ने कहा।<br />
“अरे तो का उन्हें कोई इनकार है?&#8221;; बुआ आ गयी थीं, “अरे सौ रुपये तुम दैवे किये रहय्यू, चलो तीन सौ और दै देव। अपने नाम कराय लेव?”<br />
“पाँच सौ से कम नहीं होगा?” उस आदमी का मुँह खुला, एक वाक्य निकला और मुँह फिर बन्द हो गया।<br />
“भवा! भवा! ऐ बेटा दामाद हौ, पाँच सौ कहबो तो का निरमल की माँ को इनकार है?”<br />
अकस्मात् वह आदमी उठकर खड़ा हो गया। आगे-आगे सत्ती चली आ रही थी | पीछे-पीछे गुलकी। सत्ती चौतरे के नीचे खड़ी हो गयी। बच्चे दूर हट गये। गुलकी ने सिर उठाकर देखा और अचकचाकर सर पर पल्ला डालकर माथे तक खींच लिया। सत्ती दो-एक क्षण उसकी ओर एकटक देखती रही और फिर गरजकर बोली, “यही कसाई है! गुलकी, आगे बढ़कर मार दो चपोटा इसके मुँह पर! खबरदार जो कोई बोला?&#8221;; बुआ चट से देहरी के अन्दर हो गयीं, निरमल की माँ की जैसे घिग्घी बँध गयी और वह आदमी हड़बड़ाकर पीछे हटने लगा।<br />
“बढ़ती क्यों नहीं गुलकी! बड़ा आया वहाँ से बिदा कराने?”<br />
गुलकी आगे बढ़ी ; सब सन्न थे ; सीढ़ी चढ़ी, उस आदमी के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। गुलकी चढ़ते-चढ़ते रुकी, सत्ती की ओर देखा, ठिठकी, अकस्मात् लपकी और फिर उस आदमी के पाँव पर गिर के फफक-फफककर रोने लगी, “हाय! हमें काहे को छोड़ दियौ! तुम्हारे सिवा हमारा लोक-परलोक और कौन है! अरे, हमरे मरै पर कौन चुल्लू भर पानी चढ़ायी।<br />
सत्ती का चेहरा स्याह पड़ गया। उसने बड़ी हिकारत से गुलकी की ओर देखा और गुस्से में थूक निगलते हुए कहा, “कुतिया!&#8221;; और तेजी से चली गयी। निरमल की मां और बुआ गुलकी के सर पर हाथ फेर-फेरकर कह रही थीं, “मत रो बिटिया! मत रो! सीता मैया भी तो बनवास भोगिन रहा। उठो गुलकी बेटा! धोती बदल लेव कंघी चोटी करो। पति के सामने ऐसे आना असगुन होता है। चलो!&#8221;;<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">गुलकी</span></strong> आँसू पोंछती-पोंछती निरमल की माँ के घर चली। बच्चे पीछे-पीछे चले तो बुआ ने डाँटा, “ऐ चलो एहर, हुँआ लड्डू बँट रहा है का?&#8221;;<br />
दूसरे दिन निरमल के बाबू (ड्राइवर साहब), गुलकी और जीजाजी दिन-भर कचहरी में रहे। शाम को लौटे तो निरमल की माँ ने पूछा, “पक्का कागज लिख गया?” “हाँ-हाँ रे, हाकिम, के सामने लिख गया।” फिर जरा निकट आकर फुसफुसाकर बोले, “मट्टी के मोल मकान मिला है। अब कल दोनों को बिदा करो।” “अरे, पहले सौ रुपये लाओ! बुआ का हिस्सा भी तो देना है?” निरमल की माँ उदास स्वर में बोली, “बड़ी चंट है बुढ़िया। गाड़-गाड़ के रख रही है, मर के साँप होयगी।&#8221;;<br />
सुबह निरमल की माँ के यहाँ मकान खरीदने की कथा थी। शंख, घण्टा-घड़ियाली, केले का पत्ता, पंजीरी, पंचामृत का आयोजन देखकर मुन्ना के अलावा सब बच्चे इकट्ठा थे। निरमल की माँ और निरमल के बाबू पीढ़े पर बैठे थे; गुलकी एक पीली धोती पहने माथे तक घूँघट काढ़े सुपारी काट रही थी और बच्चे झाँक-झाँककर देख रहे थे। मेवा ने पहुँचकर कहा, “ए गुलकी, ए गुलकी, जीजाजी के साथ जाओगी क्या?&#8221;; कुबड़ी ने झेंपकर कहा, “धत्त रे! ठिठोली करता है&#8221;; और लज्जा-भरी जो मुसकान किसी भी तरुणी के चेहरे पर मनमोहक लाली बनकर फैल जाती, उसके झुर्रियोंदार, बेडौल, नीरस चेहरे पर विचित्र रूप से बीभत्स लगने लगी। उसके काले पपड़ीदार होठ सिकुड़ गये, आँखों के कोने मिचमिचा उठे और अत्यन्त कुरुचिपूर्ण ढंग से उसने अपने पल्ले से सर ढाँक लिया और पीठ सीधी कर जैसे कूबड़ छिपाने का प्रयास करने लगी। मेवा पास ही बैठ गया। कुबड़ी ने पहले इधर-उधर देखा, फिर फुसफुसाकर मेवा से कहा, “क्यों रे! जीजाजी कैसे लगे तुझे?” मेवा ने असमंजस में या संकोच में पड़कर कोई जवाब नहीं दिया तो जैसे अपने को समझाते हुए गुलकी बोली, “कुछ भी होय। है तो अपना आदमी! हारे-गाढ़े कोई और काम आयेगा? औरत को दबाय के रखना ही चाहिए।” फिर थोड़ी देर चुप रहकर बोली, “मेवा भैया, सत्ती हमसे नाराज है। अपनी सगी बहन क्या करेगी जो सत्ती ने किया हमारे लिए। ये चाची और बुआ तो सब मतलब के साथी हैं हम क्या जानते नहीं? पर भैया अब जो कहो कि हम सत्ती के कहने से अपने मरद को छोड़ दें, सो नहीं हो सकता।” इतने में किसी का छोटा-सा बच्चा घुटनों के बल चलते-चलते मेवा के पास आकर बैठ गया। गुलकी क्षण-भर उसे देखती रही फिर बोली, “पति से हमने अपराध किया तो भगवान् ने बच्चा छीन लिया, अब भगवान् हमें छमा कर देंगे।” फिर कुछ क्षण के लिए चुप हो गयी। “क्षमा करेंगे तो दूसरी सन्तान देंगे?” “क्यों नहीं देंगे? तुम्हारे जीजाजी को भगवान् बनाये रखे। खोट तो हमी में है। फिर सन्तान होगी तब तो सौत का राज नहीं चलेगा।&#8221;;<br />
इतने में गुलकी ने देखा कि दरवाजे पर उसका आदमी खड़ा बुआ से कुछ बातें कर रहा है। गुलकी ने तुरत पल्ले से सर ढंका और लजाकर उधर पीठ कर ली। बोली, “राम! राम! कितने दुबरा गये हैं। हमारे बिना खाने-पीने का कौन ध्यान रखता! अरे, सौत तो अपने मतलब की होगी। ले भैया मेवा, जा दो बीड़ा पान दे आ जीजा को?” फिर उसके मुँह पर वही लाज की बीभत्स मुद्रा आयी- “तुझे कसम है, बताना मत किसने दिया है।”<br />
मेवा पान लेकर गया पर वहाँ किसी ने उसपर ध्यान ही नहीं दिया। वह आदमी बुआ से कह रहा था, “इसे ले तो जा रहे हैं, पर इतना कहे देते हैं, आप भी समझा दें उसे- कि रहना हो तो दासी बनकर रहे। न दूध की न पूत की, हमारे कौन काम की; पर हाँ औरतिया की सेवा करे, उसका बच्चा खिलावे, झाड़ू-बुहारू करे तो दो रोटी खाय पड़ी रहे। पर कभी उससे जबान लड़ाई तो खैर नहीं । हमारा हाथ बड़ा जालिम है। एक बार कूबड़ निकला, अगली बार परान निकलेगा।”<br />
“क्यों नहीं बेटा! क्यों नहीं?” बुआ बोलीं और उन्होंने मेवा के हाथ से पान लेकर अपने मुँह में दबा लिये।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">करीब</span></strong> तीन बजे इक्का लाने के लिए निरमल की माँ ने मेवा को भेजा। कथा की भीड़-भाड़ से उनका मूड़ पिराने; लगा था, अतः अकेली गुलकी सारी तैयारी कर रही थी। मटकी कोने में खड़ी थी। मिरवा और झबरी बाहर गुमसुम बैठे थे। निरमल की माँ ने बुआ को बुलवाकर पूछा कि बिदा-बिदाई में क्या करना होगा, तो बुआ मुँह बिगाड़कर बोलीं, “अरे कोई जात-बिरादरी की है का? एक लोटा में पानी भर के इकन्नी-दुअन्नी उतार के परजा-पजारू को दे दियो बस?” और फिर बुआ शाम को बियारी में लग गयीं।<br />
इक्का आते ही जैसे झबरी पागल-सी इधर-उधर दौड़ने लगी। उसे जाने कैसे आभास हो गया कि गुलकी जा रही है, सदा के लिए। मेवा ने अपने छोटे-छोटे हाथों से बड़ी-बड़ी गठरियाँ रखीं, मटकी और मिरवा चुपचाप आकर इक्के के पास खड़े हो गये। सर झुकाये पत्थर-सी चुप गुलकी निकली। आगे-आगे हाथ में पानी का भरा लोटा लिये निरमल थी। वह आदमी जाकर इक्के पर बैठ गया। “अब जल्दी करो!&#8221;; उसने भारी गले से कहा। गुलकी आगे बढ़ी, फिर रुकी और टेंट से दो अधन्नी निकाले- “ले मिरवा, ले मटकी?” मटकी जो हमेशा हाथ फैलाये रहती थी, इस समय जाने कैसा संकोच उसे आ गया कि वह हाथ नीचे कर दीवार से सट कर खड़ी हो गयी और सर हिलाकर बोली, “नहीं ?”–“नहीं बेटा! ले लो!” गुलकी ने पुचकारकर कहा। मिरवा-मटकी ने पैसे ले लिये और मिरवा बोला, “छलाम गुलकी! ए आदमी छलाम?&#8221;;<br />
“अब क्या गाड़ी छोड़नी है?” वह फिर भारी गले से बोला।<br />
“ठहरो बेटा, कहीं ऐसे दामाद की बिदाई होती है?” सहसा एक बिलकुल अजनबी किन्तु अत्यन्त मोटा स्वर सुनायी पड़ा। बच्चों ने अचरज से देखा, मुन्ना की माँ चली आ रही हैं। “हम तो मुन्ना का आसरा देख रहे थे कि स्कूल से आ जाये, उसे नाश्ता करा लें तो आयें, पर इक्का आ गया तो हमने समझा अब तू चली। अरे! निरमल की माँ, कहीं ऐसे बेटी की बिदाई होती है! लाओ जरा रोली घोलो जल्दी से, चावल लाओ, और सेन्दुर भी ले आना निरमल बेटा! तुम बेटा उतर आओ इक्के से!&#8221;;<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">निरमल</span></strong> की माँ का चेहरा स्याह पड़ गया था। बोलीं, “जितना हमसे बन पड़ा किया। किसी को दौलत का घमण्ड थोड़े ही दिखाना था?” “नहीं बहन! तुमने तो किया पर मुहल्ले की बिटिया तो सारे मुहल्ले की बिटिया होती है। हमारा भी तो फर्ज था। अरे माँ-बाप नहीं हैं तो मुहल्ला तो है। आओ बेटा?” और उन्होंने टीका करके आँचल के नीचे छिपाये हुए कुछ कपड़े और एक नारियल उसकी गोद में डालकर उसे चिपका लिया। गुलकी जो अभी तक पत्थर-सी चुप थी सहसा फूट पड़ी। उसे पहली बार लगा जैसे वह मायके से जा रही है। मायके से अपनी माँ को छोड़कर छोटे-छोटे भाई-बहनों को छोड़कर और वह अपने कर्कश फटे हुए गले से विचित्र स्वर से रो पड़ी।<br />
“ले अब चुप हो जा! तेरा भाई भी आ गया?” वे बोलीं। मुन्ना बस्ता लटकाये स्कूल से चला आ रहा था। कुबड़ी को अपनी माँ के कन्धे पर सर रखकर रोते देखकर वह बिल्कुल हतप्रभ-सा खड़ा हो गया- “आ बेटा, गुलकी जा रही है न आज! दीदी है न! बड़ी बहन है। चल पाँव छू ले! आ इधर?” माँ ने फिर कहा। मुन्ना और कुबड़ी के पाँव छुए? क्यों? क्यों? पर माँ की बात! एक क्षण में उसके मन में जैसे एक पूरा पहिया घूम गया और वह गुलकी की ओर बढ़ा। गुलकी ने दौड़कर उसे चिपका लिया और फूट पड़ी- “हाय मेरे भैया! अब हम जा रहे हैं! अब किससे लड़ोगे मुन्ना भैया? अरे मेरे वीरन, अब किससे लड़ोगे?” मुन्ना को लगा जैसे उसकी छोटी-छोटी पसलियों में एक बहुत बड़ा-सा आँसू जमा हो गया जो अब छलकने ही वाला है। इतने में उस आदमी ने फिर आवाज दी और गुलकी कराहकर मुन्ना की माँ का सहारा लेकर इक्के पर बैठ गयी। इक्का खड़-खड़ कर चल पड़ा। मुन्ना की माँ मुड़ी कि बुआ ने व्यंग्य किया, “एक आध गाना भी बिदाई का गाये जाओ बहन! गुलकी बन्नो ससुराल जा रही है!” मुन्ना की माँ ने कुछ जवाब नहीं दिया, मुन्ना से बोली, “जल्दी घर आना बेटा, नाश्ता रखा है?”<br />
पर<strong><span style="color: #ff0000;"> पागल</span></strong> मिरवा ने, जो बम्बे पर पाँव लटकाये बैठा था, जाने क्या सोचा कि वह सचमुच गला फाड़कर गाने लगा, “बन्नो डाले दुपट्टे का पल्ला, मुहल्ले से चली गयी राम?” यह उस मुहल्ले में हर लड़की की बिदा पर गाया जाता था। बुआ ने घुड़का तब भी वह चुप नहीं हुआ, उलटे मटकी बोली, “काहे न गावें, गुलकी नै पैसा दिया है?” और उसने भी सुर मिलाया, “बन्नो तली गयी लाम! बन्नो तली गयी लाम! बन्नो तली गयी लाम!”<br />
मुन्ना चुपचाप खड़ा रहा। मटकी डरते-डरते आयी- “मुन्ना बाबू! कुबड़ी ने अधन्ना दिया है, ले लें?”<br />
“ले ले” बड़ी मुश्किल से मुन्ना ने कहा और उसकी आँख में दो बड़े-बड़े आँसू डबडबा आये। उन्हीं आँसुओं की झिलमिल में कोशिश करके मुन्ना ने जाते हुए इक्के की ओर देखा। गुलकी आँसू पोंछते हुए परदा उठाकर मुड़-मुड़कर देख रही थी। मोड़ पर एक धचके से इक्का मुड़ा और फिर अदृश्य हो गया।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">सिर्फ</span></strong> झबरी सड़क तक इक्के के साथ गयी और फिर लौट गयी।</p>
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