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	<title>K Vikram Rao Archives - TIS Media</title>
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	<title>K Vikram Rao Archives - TIS Media</title>
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		<title>Binny Roger शराफत की पिच पर सियासत ​की गुगली !</title>
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		<pubDate>Wed, 19 Oct 2022 13:30:56 +0000</pubDate>
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		<div class="box info  aligncenter">
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				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>कोई जब बेहूदगी करता था तो उससे आग्रह किया जाता रहा कि : &#8221;क्रिकेटर जैसा बनो।&#8221; दशकों पूर्व से ऐसी ही धारणा प्रचलित थी। क्रिकेट शराफत का पर्याय रहा। शऊर, सलीका, तमीज, शिष्टता आदि का। यह भद्रलोक का शौक अब फूहड़ हो गया है। सबूत चाहिये ? साल भर में ही सर्वोच्च न्यायालय को दो बार झिड़कना पड़ा क्रिकेट प्रबंधन बोर्ड (बीसीसीआई) को कि : &#8221;सुधरो, सज्जन बनो।&#8221; यह फटकार भी आई थी।
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<p>क्रिकेट के जन्मस्थल मुम्बई में पले न्यायमूर्ति धनंजय यशवंत चन्द्रचूड से जो अगले माह भारत के प्रधान न्यायधीश होंगे। इसी परिवेश में मृदु कन्नडभाषी रोजर बिन्नी के कल (18 अक्टूबर 2022) अध्यक्ष निर्विरोध चयनित हो जाने आस बंधी है कि क्रिकेट के अच्छे दिन पहले जैसे बहुरेंगे। शालीनता दोबारा प्रादुर्भूत होगी। इस राजसी क्रीड़ा में बादशाहत लौटेगी, जैसे अन्य &#8221;राजाओं&#8221; में आम में मिठास तथा गुलाब में सुवास। रोजर चार दशकों से क्रिकेट की दुनिया में सभी के चहेते रहें, अजातशत्रु रहे। लोकप्रिय भी। भले ही प्रदर्शन, आंकलन और आंकड़ों की तुलना में वे अधिक नहीं ठहर पायें। वे सलामी बैटर रहे, पर आठवें अथवा आखिर में भेजे जाने पर विरोध कभी भी नहीं किया। अपना चुनाव परिणाम घोषित होते ही उन्होंने सौरव गांगुली से सहयोग मांगा। गिलाशिकवे कतई नहीं किये। बस खिलाड़ियों के घायल होने से रोकने को तथा ग्राउंड की पिच सुधारने की बात की। उन्हें सरोकार बना दिया। उनका संकेत था तेज बालर जसप्रीत बुमराह की ओर, जो आस्ट्रेलिया में विश्वकप की टीम से कमर दर्द की वजह से बाहर हो गये।</p>
<p>बिन्नी की सादगी का यह आलम रहा कि बंगलौर छावनी में अपने बेंसन टाउन आवास से मेट्रो रेल से कब्बन पार्क तक यात्रा कर कर्नाटक क्रिकेट एसोसिएशन कार्यालय जाते रहे। शेष समय अपने बान्दीपुर फार्म पर गुजारते है। वहां आम और नारियल उगाये। हाथी और तेंदुओं के आतंक से वहां भिड़ते रहते है। वे 2000 से (तब 19 वर्ष से कम वालों की टीम में चयनित थे) खेलते रहे है। यादगार रहा जब लंदन में विश्वकप में कपिल देव (1983) की कप्तानी में उन्होंने विकेट झटकने का कीर्तिमान रचा था। इसके लिये सदैव ​चर्चित रहे। एकदा वे चयन समिति के सदस्य थे जिसमें उनके पुत्र स्टुअर्ट पेश हो रहे थे। रोजर बाहर कमरे से निकल गये ताकि पक्षपात का आरोप आयद न हो। गौर कीजिये सुनील गावस्कर ने रोहन और तेंदुलकर ने अर्जुन को बढ़ाने की किस कदर जद्दोजहद की थी।</p>
<p>रोजर बिन्नी की तटस्थता और निष्पक्षता का नमूना रहा कि पांच सदस्यीय राष्ट्रीय चयन समिति की वे सर्वसम्मत पंसद थे। जबकि कुछ समय पूर्व वरिष्ठ मोहिन्दर अमरनाथ को बोर्ड ने हटाकर संदीप पाटिल को चयन समिति का अध्यक्ष नामित किया था। बिन्नी के बोर्ड के राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के पूर्व की नौटंकी का विवरण जानना भी आवश्यक है। हालांकि क्रिकेट बोर्डों में प्रदेशीय स्तर पर प्रदेशीय राजनेताओं की बन्दरबाट बढ़ती जा रही है। उदाहरणार्थ बिहार क्रिकेट संघ में लालूपुत्र तेजस्वी की, कश्मीर में फारुख अब्दुल्ला की जिन्हें हालही में सीबीआई ने फर्जीवाडा के आरोप में जिरह के लिये तलब किया था।</p>
<p>यूपीवालों के प्रसंग में लोगों को 1975 का मोहन नगर (गाजियाबाद) में रणजी ट्रॉफी का फाइनल हमेशा याद रहेगा। बिन्नी की कर्नाटक टीम ने यूपी को हराया था। तब गुंडप्पाराज विश्वनाथन दोहरा शतक लगाया था। बीएस चन्द्रशेखर ने दोनों पारी में कुल बारह विकेट झटके थे।</p>
<p>एक तरफ जहां रोजर बिन्नी बोर्ड के अध्यक्ष के निर्विवाद रूप से बिना हिचक के मुखिया चुने गये, वहीं पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी द्वारा इस अत्यधिक रुचिकर खेल में प्रदेशवाद का जहर घोलने की हर राष्ट्रप्रेमी भारतीय को बेहिचक कठोर शब्दों में भर्त्सना करनी चाहिये। ममता ने नरेन्द्र मोदी के लिये अपशब्द इस्तेमाल किये। उनके गृहमंत्री अमित शाह के पुत्र जय अमित शाह पर सौरव गांगुली को हटाने का दबाव डालने का जिक्र किया। कारण ? सौरव का &#8221;अपराध&#8221; था कि उन्होंने भाजपा का सदस्य बनने से इनकार कर दिया था।</p>
<p>ममता की मांग थी कि सौरव को पुन: अध्यक्ष न चुनना बंगाल के गौरव पर हमला है। मानों यह भारत नहीं बंगाल क्रिकेट बोर्ड हो। क्रिकेट सदैव सियासत से ऊपर रखा जाता रहा है। भले ही राजनेता राजीव शुक्ला सरीखे वोट का दांव खेलते रहे। ऐसा कानून नहीं है कि राजनेता बोर्ड में न रहे। महाबली शरदचन्द्र गोविन्दराव पवार (29 नवम्बर 2005) ने जगमोहन डालमिया को हराया था। खुद अध्यक्ष बने थे। उनके चेले प्रफुल्ल पटेल तो फुटबाल फेडरेशन में धांधली पर सर्वोच्च न्यायालय से डांट भी खा चुके हैं।</p>
<p>अत: नीतिगत निर्णय किया जाये कि खेल को दलगत राजनीति से ऊपर रखा जाये। ममता बनर्जी को भी विचार करना पड़ेगा कि उनकी तृणमूल पार्टी बंगला के बाहर अपना जनाधार तलाशे। हर विषय को राजनीति के रंगीन चश्मे से देखने में राष्ट्र को क्षति होगी। ममता जी, क्रिकेट को कृपया खेल ही रहने दीजिये। सियासत का मोहरा न बनाइये।</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>(<span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://tismedia.in/">TIS Media</a></span> परिवार के संरक्षक<span style="color: #ff0000;"> <a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के. विक्रम राव</a> </span>का शुमार देश के नामचीन पत्रकारों में होता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उन्होंने इमरजेंसी तक में स्वतंत्र आवाज के लिए जेल यात्रा की। महीनों की सजाएं भुगती। श्री राव,  वॉयस ऑफ अमेरिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनोमिक टाइम्स, फिल्मफेयर और इलस्ट्रेटेड वीकली में प्रमुख पदों पर रहने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड के संस्थापक संपादक भी रह चुके हैं। प्रेस की नियामक संस्था &#8216;भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य रहने के अलावा मजीठिया वेतन बोर्ड और मणिसाना वेतन बोर्ड के सदस्य के तौर पर पत्रकारों के हित में लंबा संघर्ष किया है। <span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के.विक्रम राव</a>,</span> फिलहाल इंडियन फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट <span style="color: #ff0000;">#IFWJ</span> के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)</strong></span></p>
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		<title>पैनी नजरः जिन्ना के जिन्न ने अखिलेश से छीना चुनावी मैदान</title>
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		<pubDate>Wed, 03 Nov 2021 02:14:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>यहां प्रसंग अखिलेश यादव का है। 1 नवम्बर 2021 को दिल्ली से लखनऊ यात्रा पर &#8221;विस्तारा वायु सेवा&#8221; के जहाज की सीट पांच—सी (उड़ान यूके/641 : अमौसी आगमन : दो बजकर 50 मिनट पर) मैं बैठा था। अखिलेश यादव आगे वाली सीट पर सहयात्री थे। कुशल क्षेम पूछा। तब तक मेरे मोबाईल (9415000909) पर खबर &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/state/uttar-pradesh/veteran-journalist-k-vikram-rao-reviewing-the-akhilesh-yadav-and-jinnah-controversy/11316/">पैनी नजरः जिन्ना के जिन्न ने अखिलेश से छीना चुनावी मैदान</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>यदि राजनेता फरमाये &#8221;हॉं&#8221;, तो समझिये &#8221;शायद&#8221;। अगर कहें : &#8221;शायद&#8221;, तो मतलब है &#8221;ना&#8221;। वह राजनेता ही नहीं है जो पहली दफा ही कह डाले &#8221;ना&#8221;। ठीक उलटी है महिला की बात। यदि वह कहे &#8221;ना&#8221;, तो भांप लीजिये &#8221;शायद&#8221;। अगर कहे &#8221;शायद&#8221; तो समझिये &#8221;हॉं&#8221;। वह नारी ही नहीं है जो सीधे &#8221;हॉं&#8221; बोल दे । अर्थात नेताजी वायु तत्व को भी ठोस पदार्थ बना देंगे। अपनी आधी सदी की पत्रकारिता में मेरी ऐसी ही प्रतीति रहीं।<span style="color: #0000ff;"> &#8211;</span> <span style="color: #ff0000;"><strong>के. विक्रम राव, पत्रकारिता के पुरोधा</strong></span>
			</div>
		</div>
	
<p>यहां प्रसंग अखिलेश यादव का है। 1 नवम्बर 2021 को दिल्ली से लखनऊ यात्रा पर &#8221;विस्तारा वायु सेवा&#8221; के जहाज की सीट पांच—सी (उड़ान यूके/641 : अमौसी आगमन : दो बजकर 50 मिनट पर) मैं बैठा था। अखिलेश यादव आगे वाली सीट पर सहयात्री थे। कुशल क्षेम पूछा। तब तक मेरे मोबाईल (9415000909) पर खबर कौंधी कि : &#8221;अखिलेश यादव का ऐलान है कि वे यूपी विधानसभा निर्वाचन के प्रत्याशी नहीं बनेंगे?&#8221; दोबारा उठकर उनसे पुष्टि करने गया कि क्या यह खबर सच है? उनका उत्तर था : &#8221;ऐसा नहीं कहा।&#8221; तो पत्रकार के नाते मैंने पूछा कि खण्डन करेंगे? क्योंकि मेरा मानना था कि इतिहास गवाह है कि सेनापति हरावल दस्ते में न हो, तो सेना (पार्टी) हार सकती है। कल शाम को ही एंकर शिल्पा तोमर ने बहस (जनतंत्र टीवी न्यूज चैनल) पर &#8221;सबसे बड़ा अखाड़ा&#8221; में इसी विषय पर बहस रखी थी। सपा विधायक राकेश प्रताप सिंह पार्टी प्रवक्ता थे। वे भी बोले कि &#8221;पार्टी का फैसला होना है।&#8221; बहस में पहला वक्ता मैं था। अत: मैंने हवाई जहाज में हुये संवाद का ब्यौरा दिया। फिर आज सुबह सपा नेता और एमर्जेंसी में मेरे जेल के साथी राजेंद्र चौधरी से पूछा ? वे स्पष्ट बोले : &#8221;चुनाव न लड़ने की कोई बात अखिलेश ने नहीं कही। केवल यही बताया था कि पार्टी ही निर्णय लेगी।&#8221; (इंडियन एक्सप्रेस : 2 नवम्बर 2021, तृतीय पृष्ठ : कालम दो से पांच) : पर चौधरी का वक्तव्य था कि अखिलेश ने पीटीआई से कतई नहीं कहा कि वे चुनाव नहीं लड़ेंगे।&#8221;</p>
<p>अब मेरी एमए (लखनऊ विश्वविद्यालय, 1960) की पढ़ाई काम आ गयी। फ्रेंच राष्ट्रपति (1962) चार्ल्स दगाल पर की गयी दार्शनिक टिप्पणी याद किया। &#8221;राजनेता अचंभित हो जाता है जब उसकी बात को श्रोता जस का तस सच मान बैठता है।&#8221; शेक्सपियर की तो बड़ी सटीक उक्ति थी कि &#8221;राजनेता तो ईश्वर को भी दरकिनार कर जाता है।&#8221; वस्तुत: &#8221;जननायक अगली पीढ़ी की सोचता है। राजनेता आगामी निर्वाचन की&#8221;। अर्थात पार्टी की ईमानदारी, पार्टी की आवश्यकतायें निर्धारित करती है। एक अवधारणा मेरे तथा अखिलेश के प्रणेता राममनोहर लोहिया ने प्रतिस्थापित की थी कि राजनीति विधानसभा और संसद भवन के आगे भी होती है।</p>
<p>अब आयें उस छपे, विवेकहीन प्रेस वक्तव्य पर जो आज प्रकाशित हुआ है। वह प्रात: सत्रह दैनिकों में था जो मैं नित्य बांचता हूं। छह अंग्रेजी : मेरा पुराना अखबार टाइम्स आफ इंडिया, दि हिन्दू, इंडियन एक्सप्रेस, पायोनियर, हिन्दुस्तान टाइम्स तथा दि स्टेट्समैन तथा नौ हिंदी दैनिक में प्र​काशित रपट थी कि अखिलेश यादव ने हरदोई में परसों कहा था : &#8221;पटेल, गांधी, नेहरु, डा. अंबेडकर और जिन्ना सभी एक साथ भारत की आजादी के लिये लड़े थे (अमर उजाला : तृतीय पृष्ठ: लीड स्टोरी: दो से पांच कालम : 2 नवम्बर 2021)। यदि अखिलेश यादव ने डा. राममनोहर लोहिया की मशहूर पुस्तक &#8221;गिल्टी मैन आफ इंडियास पार्टीशन&#8221; (भारत के विभाजन के दोषी जन) पढ़ी होती तो सपने में भी वे भूलकर जिन्ना को बापू के साथ जोड़ने की गलती, बल्कि गुनाह कभी न कर बैठते। परेशानी का सबब यह है कि राजनेता अपने जन्म के पहले छपी किताबें पढ़ता नहीं है। राहुल तथा प्रियंका तो इतनी जहमत भी नहीं उठाते।</p>
<p>अखिलेश को तनिक को बताता चलूं कि मोहम्मद अली जिन्ना खूनी था, जल्लाद भी। उसके निर्देश पर 14 अगस्त 1946 के दिन कोलकता में हजारों हिन्दुओं की लाशों से मुसलमानों ने शहर पाट दिया था। अनगिनत बांग्ला रमणियों का बलात्कार किया था। घर जलाये थे, सो दीगर! पश्चिम पंजाब में अलग से मारा। तो यही जिन्ना था जिसके दादा पूंजाभाई जीणा एक गुजराती मछुआरे थे। शाकाहारी काठियावाडी हिन्दुओं ने उनका कारोबार खत्म करा दिया था, तो नाराजगी में उन्होंने कलमा पढ़ लिया। जिन्ना खुद खोजा (शिया) मुसलमान था, पारसी बीवी लाया था। शूकर मांस उन का बड़ा पंसदीदा खाद्य था। कभी न मस्जिद गया, न नमाज अता की। कुरान तो पढ़ी ही नहीं। एक और बात अखिलेश को ज्ञात हो कि जब राष्ट्रभक्त निहत्थे सत्याग्रहियों को ब्रिटिश पुलिस गोलियों से भून रही थी तो डा. भीमराव रामजी आंबेडकर अंग्रेज वायसराय की सरकार के श्रम मंत्री थे। साम्राज्यवादी जुल्मों के मूक दर्शक रहे।</p>

		<div class="clearfix"></div>
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			<div class="author-avatar">
				<img decoding="async" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/11/k-vikram-rao.jpg" alt="के. विक्रम राव" class="author-avatar-img" width="111" height="111" />
			</div>
			<div class="author-info">
				<h4>के. विक्रम राव</h4>TIS Media परिवार के संरक्षक के. विक्रम राव का शुमार देश के नामचीन पत्रकारों में होता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उन्होंने इमरजेंसी तक में स्वतंत्र आवाज के लिए जेल यात्रा की। महीनों की सजाएं भुगती। श्री राव,  वॉयस ऑफ अमेरिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनोमिक टाइम्स, फिल्मफेयर और इलस्ट्रेटेड वीकली में प्रमुख पदों पर रहने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड के संस्थापक संपादक भी रह चुके हैं। प्रेस की नियामक संस्था &#8216;भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य रहने के अलावा मजीठिया वेतन बोर्ड और मणिसाना वेतन बोर्ड के सदस्य के तौर पर पत्रकारों के हित में लंबा संघर्ष किया है। के.विक्रम राव, फिलहाल इंडियन फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट #IFWJ के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। संपर्कः K Vikram Rao, Mobile: 9415000909, E-mail: k.vikramrao@gmail.com
			</div>
		</div>
	Akhilesh Yadav, Samajwadi Party, Mulayam Singh, Mohammad Ali Jinnah, Uttar Pradesh Assembly Elections, UP Elections 2022, K Vikram Rao,</p>
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		<title>रंगभेद से इस्लाम भी मुक्त नहीं है, बस इसी गुत्थी को सुलझाना अब्दुल रज्जाक की कृति का मूलाधार</title>
		<link>https://tismedia.in/editorial/article/k-vikram-rao-analyzing-the-journey-of-abdul-razak-gurnah-wins-the-2021-nobel-prize-in-literature/10857/?utm_source=rss&#038;utm_medium=rss&#038;utm_campaign=k-vikram-rao-analyzing-the-journey-of-abdul-razak-gurnah-wins-the-2021-nobel-prize-in-literature</link>
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		<pubDate>Fri, 08 Oct 2021 16:02:33 +0000</pubDate>
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<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/k-vikram-rao-analyzing-the-journey-of-abdul-razak-gurnah-wins-the-2021-nobel-prize-in-literature/10857/">रंगभेद से इस्लाम भी मुक्त नहीं है, बस इसी गुत्थी को सुलझाना अब्दुल रज्जाक की कृति का मूलाधार</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<div class="kvgmc6g5 cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q"></div>
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<div dir="auto">इस वर्ष के साहित्यवाले नोबेल पारितोष से नवाजे गये अश्वेत अफ्रीकी प्रोफेसर अब्दुल रज्जाक गुर्नाह के माध्यम से विश्व के आमजन की विपदा पर मनन होगा। विषय है : विस्थापित, निष्कासित, शरणार्थी, पलायन कर रहे लोग, (काबुल, म्यांमार, हांगकांग के ताजा संदर्भ में)। अपनी किशोरावस्था में अब्दुल रज्जाक स्वभूमि जंजीबार द्वीप में नस्ली उथल—पुथल से उत्पीड़ित हो चुके थे। गोरे अरब मुसलमानों द्वारा समधर्मी अश्वेतों (हब्शी) को संतप्त करना उनकी एक विषादभरी प्रतीति थी। हालांकि इस्लाम समतामूलक मजहब है, जहां कलमा पढ़ते ही सब समान हो जाते हैं। हिन्दुओं जैसा भेदभाव नहीं। पर यह सरासर झूठ निकला। त्वचा के रंगभेद से इस्लाम भी मुक्त नहीं है। बस इसी गुत्थी को सुलझाना ही अब्दुल रज्जाक की कृति का मूलाधार रहा।</div>
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<div dir="auto">फिलवक्त प्रोफेसर अब्दुल रज्जाक को जानकर उनकी मातृभूमि जंजीबार (तंगानियाका) और भारत के अत्यन्त आत्मीय प्रसंग अनायास मस्तिष्क पटल पर उभर आतें हैं। पड़ोसी राष्ट्र रहे तंगानियाका और द्वीप राष्ट्र जंजीबार दो सदियों के बाद यूरोपीय साम्राज्यवादियों से स्वतंत्र होकर तंजानिया नामक गणराज्य बने थे। तब राष्ट्रपति जूलियस नेरेरे की रहनुमाई में भारत का वह प्रगाढ़ मित्र बना था। नेरेरे &#8221;अफ्रीकी गांधी&#8221; कहलाये। अंहिसा के अनन्य आराधक राष्ट्रपति नेरेरे कई मायनों में नेलसन मण्डेला से भी अधिक वरीय रहे। महात्मा गांधी शांति पुरस्कार और नेहरु एवार्ड से भारत द्वारा सम्मानित नेरेरे अफ्रीकी स्वाधीनता क्रान्ति के सृजक रहे। उनका राष्ट्रीय चिंतन था &#8221;उजामा&#8221; (देश एक ही परिवार)। किन्तु यह भारत में प्रचलित विकृति (वंशवाद) जैसी नहीं है। समतावादी समाज का पर्याय बना। नेरेरे की इसी उक्ति से प्रोफेसर अब्दुल रज्जाक अनुप्राणित रहे। वे कहते थे : &#8221;गरीबी से भागना शिक्षा का लक्ष्य नहीं है। गरीबी से लड़ना है।&#8221; उसी दौर में &#8221;गरीबी हटाओ&#8221; के नारे पर इन्दिरा गांधी पांचवीं लोकसभा (1971) का चुनाव लड़ रहीं थीं। जब वे राजधानी दारे सलाम गयीं थीं तो राष्ट्रपति नेरेरे ने भारतीय प्रधानमंत्री को मोर—मोरनी का जोड़ा भेंट दिया था। नेरेरे और प्रो. अब्दुल रज्जाक दोनों अश्वेत थे पर उनका धर्म पृथक था। ईसाई और इस्लाम।</div>
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<div dir="auto">अपनी पुरस्कृत रचना &#8221;पेराडाइज&#8221; (बहिश्त) में अब्दुल रज्जाक इस्लाम के दूसरे पहलू पर भी गौर करते हैं। वे सैटानिक वर्सेज के लेखक सलमान रश्दी के साथी रहे। उनके उपन्यास का पात्र अजीज चाचा अपने सगे भतीजे यूसुफ को एक व्यापारी के पास रेहन रख देता है क्योंकि उसका उधार वह चुका नहीं पाया था। वह सौदागर भी सूद की राशि का भुगतान होने तक इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता है। जबकि इस्लाम में व्याज लेना गुनाह है। इसीलिये नेक मुसलमान बैंक खातों में जमा राशि पर सूद भी नकारते हैं। इतनी ऊंचाई छूने के बाद भी अब्दुल रज्जाक अपनी जन्मभूमि जंजीबार में पर्याप्त प्रतिष्ठा, सम्मान और पहचान नहीं हासिल कर पाये। उनकी भांजी अभी तंजानिया के शिक्षा मंत्री की बीवी है। पर अब्दुल रज्जाक की पुस्तकें वहां प्रसारित नहीं हुईं हैं।</div>
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<div dir="auto">यह नोबेल विजेता उल्लेख भी करता रहा कि तंजानिया और भारत का अतीत यूरोपीय साम्राज्यवादियों से ग्रसित रहा। जब पुर्तगाल सम्राट ने गोवा कब्जियाया था उसी कालखण्ड में जंजीबार—तंगानियका को भी उसने अपना उपनिवेश बनाया था। पुर्तगाली, फ्रांसीसी, फिर अंग्रेज बारी—बारी से इन भूस्थलों का औपनिवेशक शोषण करते रहे। प्रथम विश्व युद्ध (1914) में जर्मन सम्राट कैसर विल्हेम ने भी इस द्वीप राष्ट्र को अपना गुलाम बनाया था। शोषण किया था। तब भारत बच गया था।</div>
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<div dir="auto">प्रोफेसर अब्दुल रज्जाक गुर्नाह के इंग्लैण्ड के कैन्ट विश्वविद्यालय में उत्तर—उपनिवेश युग के साहित्य के निष्णात हैं। उनकी डाक्टरेट का विषय भी अंग्रेजी साहित्य की इसी विधा पर है। भारत भी ब्रिटिश उपनिवेश रहा तो था, इसीलिये स्वातंत्र्योत्तर इंग्लिश साहित्य के कई भारतीय लेखक रहे। जैसे आरके नारायण (गाइड, उपन्यास के रचयिता), रवीन्द्रनाथ ठाकुर, विक्रम सेठ, राजा राव, भवानी भट्टाचार्य, मुल्कराज आनन्द, अनिता देसाई, मनोहर मलगांवकर, चेतन भगत आदि। इसी प्रकार राष्ट्रमंडल देशों में कनाडा, आस्ट्रेलिया, जमाइका आदि में भारतीय मूल के लेखक रहे हैं। अर्थात गैरब्रिटिश इंग्लिश लेखकों का अब अलग वैश्विक समाज है। प्रो. अब्दुल रज्जाक को उनमें शीर्ष पद मिल गया है। भारत के साहित्य प्रेमियों को इस उपलब्धि पर गर्व होगा।</div>
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<div dir="auto"><span style="color: #000000;"><strong>(<span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://tismedia.in/">TIS Media</a></span> परिवार के संरक्षक<span style="color: #ff0000;"> <a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के. विक्रम राव</a> </span>का शुमार देश के नामचीन पत्रकारों में होता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उन्होंने इमरजेंसी तक में स्वतंत्र आवाज के लिए जेल यात्रा की। महीनों की सजाएं भुगती। श्री राव,  वॉयस ऑफ अमेरिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनोमिक टाइम्स, फिल्मफेयर और इलस्ट्रेटेड वीकली में प्रमुख पदों पर रहने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड के संस्थापक संपादक भी रह चुके हैं। प्रेस की नियामक संस्था &#8216;भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य रहने के अलावा मजीठिया वेतन बोर्ड और मणिसाना वेतन बोर्ड के सदस्य के तौर पर पत्रकारों के हित में लंबा संघर्ष किया है। <span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के.विक्रम राव</a>,</span> फिलहाल इंडियन फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट <span style="color: #ff0000;">#IFWJ</span> के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)</strong></span></div>
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		<title>पीएम जिसने भारत बचाया</title>
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		<dc:creator><![CDATA[tismedia.in]]></dc:creator>
		<pubDate>Wed, 30 Jun 2021 08:47:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>विडम्बना तो यह थी कि उनके सगे काका (संजय गांधी) जो कभी भी किसी भी राजपद पर नहीं रहे, की समाधि राजघाट परिसर में बनी&#124; केवल पांच महीने रहे प्रधान मंत्री, जो लोकसभा में बैठे ही नहीं, (चरण सिंह) के लिये किसान घाट बन गया&#124; सात माह राजीव–कांग्रेस की बैसाखी पर प्रधान मंत्री पद कब्जियाये &#8230;</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
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				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>आज (28 जून) स्व. पीवी नरसिम्हा राव की जन्मशती है। गमनीय है कि पाँच वर्ष तक अल्पमतवाली कांग्रेस सरकार को चलानेवाले नरसिम्हा राव ने दस जनपथ के इशारे पर थिरकने से इनकार कर दिया था| हालांकि सरदार मनमोहन सिंह सोनिया गांधी की उँगलियों पर दस वर्ष तक भांगड़ा करते रहे| ऐसे इतिहास-पुरुष के जन्मोत्सव से पार्टी मुखिया राहुल गांधी को कोई सरोकार भी नहीं है|
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<p>विडम्बना तो यह थी कि उनके सगे काका (संजय गांधी) जो कभी भी किसी भी राजपद पर नहीं रहे, की समाधि राजघाट परिसर में बनी| केवल पांच महीने रहे प्रधान मंत्री, जो लोकसभा में बैठे ही नहीं, (चरण सिंह) के लिये किसान घाट बन गया| सात माह राजीव–कांग्रेस की बैसाखी पर प्रधान मंत्री पद कब्जियाये ठाकुर चंद्रशेखर सिंह का भी एकता स्थल पर अंतिम संस्कार किया गया| मगर सम्पूर्ण पांच साल की अवधि तक प्रधानमंत्री रहे पीवी नरसिम्हा राव का शव सोनिया गांधी ने सीधे हैदराबाद रवाना करा दिया था| दिल्ली में उनके नाम कोई स्मारक नहीं, कोई गली नहीं|</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE:<span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-difference-in-press-during-emergency-and-now/9504/"> प्रेस पर प्रेशर कितना ? तब और अब!</a></span></strong></span></p>
<p>कल्पना कीजिए कि ताशकन्द में अकाल मृत्यु (1966) और लोकसभाई चुनाव (1996) में कांग्रेस की पराजय न होती तो लाल बहादुर शास्त्री और नरसिम्हा राव पार्टी की दिशा बदल देते। तब नेहरू परिवार बस एक याद मात्र रह जाता। इतिहास का मात्र एक फुटनोट।</p>
<p>सोनिया गांधी और उनकी पार्टी ने नरसिम्हा राव के साथ जो व्यवहार किया है वह कोई राजनेता अपने घोर शत्रु के साथ भी नहीं कर सकता है। सोनिया की सोच को प्रतिबिंबित करती एक घटना पर बने अखबारी कार्टून का जिक्र समीचीन होगा। उस कार्टून में दिखाया गया था कि ग्रामीण रोजगार योजना (नरेगा) का नाम मनरेगा क्यों कर दिया गया। मनमोहन सिंह सरकार को आशंका हुई होगी कि एन.आर.ई.जी.ए. कही नरसिम्हा राव इम्प्लायमेन्ट गारन्टी योजना न कहलाने लग जाए। अतः महात्मा गांधी का नाम जोड़ दिया गया। मजाक ही सही पर इस बात से सोनिया-नीत कांग्रेस पार्टी की खोटी नीयत उजागर हो जाती है। उनकी मानसिकता उभरती है जो राहुल गांधी की उक्ति में झलकी थी। उत्तर प्रदेश विधान सभा (2007) के चुनाव में कांग्रेस के इस तत्कालीन महामंत्री ने मुस्लिम बस्ती में प्रचार अभियान में कहा था कि यदि नेहरू-गांधी कुटुम्ब का कोई सदस्य दिसम्बर 1992 में प्रधान मंत्री रहता तो बाबरी मस्जिद न गिरती। मानो नरसिम्हा राव ने अपने प्रधानमंत्री कार्यालय से हथौड़ा-फावड़ा उन कारसेवकों को मुहय्या कराया था। जब राजीव गांधी की हत्या के बाद नरसिम्हा राव कांग्रेस अध्यक्ष बने और दसवीं लोकसभा चुनाव (1991) में प्रधानमंत्री बने थे तो कांग्रेसी दिग्गजों का अन्दाज था कि नरसिम्हा राव एक लघु कथा के फुटनोट हैं और शीघ्र ही सोनिया गांधी अपनी पारिवारिक जागीर संभाल लेंगी। किसे पता था कि नरसिम्हा राव एक लम्बे, नीरस ही सही, उपन्यास का रूप ले लेंगे और पूरे पांच वर्ष तक प्रधान मंत्री पद पर डटे रहेंगे। नेहरू परिवार के बाहर का प्रथम कांग्रेसी था जो इस पद पर पूरी अवधि तक रहा।</p>
<p>तभी तंग आकर अर्जुन सिंह, नारायणदत्त तिवारी आदि ने कांग्रेस छोड़कर नई पार्टी बना ली थी। सोनिया गांधी का वरदहस्त उनपर था। मगर भिण्ड के राजपूत और कुमाऊं के द्विज मिलकर भी तेलंगाना के इस नियोगी ब्राम्हण का समरनीति में बराबरी नहीं कर पाये। किनारे पड़ गये। नरसिम्हा राव ने अपने पत्ते ढंग से फेटे और बांटे थे। इन्दिरा गांधी ने उन्हें अक्षम मुख्यमंत्री मानकर 1973 में तेलंगाना आन्दोलन के समय बर्खास्त कर दिया था। मगर शीघ्र ही उसी इन्दिरा गांधी ने दुबारा प्रधानमंत्री बनने पर नरसिम्हा राव को 14 जनवरी 1980 को प्रदेश स्तर से उठाकर सीधे विदेश मंत्री बना दिया। जब पंजाब आतंकवाद से धधक रहा था, दार्जिलिंग में गुरखा और मिजोरम में अलगाववादी समस्या पैदा कर रहे थे, तो इन्दिरा गांधी ने नरसिम्हा राव को गृहमंत्री बनाया था। तभी आया अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर में सेना का प्रवेश और नरसिम्हा राव पर इन्दिरा सरकार को फिर से बचाने का दायित्व। इन्दिरा गांधी की हत्या के चन्द घण्टों बाद ही हैदराबाद से नरसिम्हा राव को वायुसेना के विमान से दिल्ली लाया गया था। तब सिख-विरोधी दंगों से दिल्ली जल रही थी। बाद में राजीव गांधी ने उन्हें रक्षा तथा मानव संसाधन मंत्री बनाया। इतने सब महत्वपूर्ण पद संभालने के बाद भी नरसिम्हा राव पर हिन्दीभाषी कांग्रेसी सन्देह करते रहे। इसका कारण था हिन्दी का सम्यक ज्ञान, सही शब्द, त्रुटिहीन उच्चारण, उम्दा शैली और उच्च साहित्य की दृष्टि से नरसिम्हा राव उन हिन्दी-भाषी कांग्रेसियों से कहीं ऊपर थे, उत्कृष्ट थे। संस्कृत और फारसी भी धड़ल्ले से बोलते थे। मुझे याद है तब गोरखपुर विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग के अध्यक्ष ने कहा कि नरसिम्हा राव सारे प्रधान मंत्रियों से कहीं बड़े भाषाविद तथा हिन्दी के जानकार हैं। उन्हें मैंने टोका था कि यदि भाषा का ज्ञान ही खास अर्हता है तो फिर हिन्दी मास्टर ही प्रधान मंत्री बना दिया जाय। मगर नरसिम्हा राव ने सिद्ध कर दिया कि प्रवाहमयी हिन्दी बोलना एक योग्यता ही होती है। तो प्रश्न उठता है, “आखिर नरसिम्हा राव की खता क्या थी कि कांग्रेसी उन्हें अपना न सकें|” पहला तो यही कि नरसिम्हा राव की अध्यक्षता वाली कांग्रेस यदि ग्यारहवीं लोकसभा (1996) में बहुमत पा जाती तो नेहरू-गांधी परिवार को तब सर्वोदय शिविर का संचालन कार्य मिलता, या वह व्यापार, वाणिज्य के धंधे में चला जाता। वह इतना आध्यात्मिक कभी रहा नहीं कि हिमालय पर चला जाता। सत्ता और राजनीति के हाशिये पर तब तक वह चला ही गया था।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/india/contribution-of-indian-legend-journalists-gyan-sagar-verma-and-viren-dangwal-in-emergency/9398/">ज्ञान सागर वर्माः देश का इकलौता पत्रकार जिसने इंटेलीजेंस की आंखों में धूल झोंककर छापी थी सरकार के खिलाफ खबर</a></span></strong></span></p>
<p>लेकिन नरसिम्हा राव की कुछ उपलब्धियों का उल्लेख हो तो नाटककार जार्ज बर्नार्ड शा की उक्ति चरितार्थ होती है कि “जन्म पर सभी समान होते हैं। बस मौत पर पता चलता है कि कौन ऊंचाई तक उठा।” नरसिम्हा राव ने जो विशेष कार्य किये वह तो भारी थे अतः डूब गये, मगर जो विफलतायें थी, वे हलकी थीं, अतः सतह पर दिखती रहीं। जैसे अयोध्या प्रकरण। सन्तों से प्रवाहमय संस्कृत में संवाद कर प्रधानमंत्री ने उन्हें कारसेवा टालने हेतु मना भी लिया था। पर भड़काने में माहिर कल्याण सिंह की सरकार के सामने केन्द्र की कांग्रेस सरकार उन्नीस पड़ गई। नरसिम्हा राव ने लोकसभा में कहा भी था कि रामभक्तों (भाजपा) से तो सामना कर सकते थे, पर भगवान राम से नहीं। जनता दोनों के मध्य अन्तर नहीं कर पाई और कांग्रेस पार्टी की रामविरोधी छवि बन गई। वह चुनाव हार गई।</p>
<p>नरसिम्हा राव के व्यक्तित्व के सम्यक ऐतिहासिक आंकलन में अभी समय लगेगा। मगर इतना कहा जा सकता है कि तीन कृतियों से वे याद किए जाएंगे। पंजाब में उग्रवाद चरम पर था। रोज लोग मर रहे थे। एक समय तो लगता था कि अन्तर्राष्ट्रीय सीमा अमृतसर से खिसककर अम्बाला तक आ जाएगी। खालिस्तान यथार्थ लगता था। तभी मुख्यमंत्री बेअन्त सिंह और पुलिस मुखिया के.पी.एस. गिल को पूर्ण स्वाधिकार देकर नरसिम्हा राव ने पंजाब को भारत के लिए बचा लिया। उसके पहले राज्यपाल रहकर भी अर्जुन सिंह पंजाब को कटते देख रहे थे। देश का विकास दर जो आज चोटी पर चढ़ रहा है, यह भी नरसिम्हा राव की देन है। एक कुशल सरकारी मुलाजिम सरदार मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री नियुक्त कर नरसिम्हा राव ने आर्थिक चमत्कार कर दिखाया। मनमोहन सिंह इसे स्वीकार चुके हैं। तीसरा राष्ट्रहित का काम नरसिम्हा राव ने किया कि गुप्तचर संगठन रॉ को पूरी छूट दे दी कि पाकिस्तान की धरती से उपजते आतंकी योजनाओं का बेलौस, मुंहतोड़ जवाब दें। अर्थात् यदि पाकिस्तानी आतंकी दिल्ली में एक विस्फोट करेंगे तो लाहौर और कराची में दो दो विस्फोट होंगे। इस्लामाबाद समझ गया कि नरसिम्हा राव ने विजयनगर (आन्ध्र) सम्राट कृष्णदेव राय से इतिहास सीखा है जिसने मुस्लिम हमलावरों को उन्हीं के प्रदेश में हराया।</p>
<p>मगर जीते जी नरसिम्हा राव की जो दुर्गति कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने की वह हृदय विदारक है। उससे ज्यादा खराब उनके निधन पर किया गया बर्ताव रहा है। नरसिम्हा राव के शव को सीधे हैदराबाद रवाना कर दिया ताकि कहीं राजघाट के आसपास उनका स्मारक न बनाना पड़े। पूरे पांच साल तक प्रधान मंत्री रहे व्यक्ति के शव को अकबर रोड वाले कांग्रेस पार्टी कार्यालय के परिसर के भीतर तक नहीं लाया गया। बाहर फुटपाथ पर ही रखा गया। और तो और अधजली लाश को मिट्टी का तेल डालकर शेष संस्कार कार्य किया गया था।</p>
<p>इसी विचारक्रम में याद आती है एक बात दस बरस पुरानी। अपनी अकर्मण्यता और लिबलिबेपन के कारण नरसिम्हा राव ने कांग्रेस पार्टी को ड्राइवर सीट से उतार कर केन्द्र सरकार में कन्डक्टर बना डाला था। उस वक्त सत्ता के खेल में ताल ठोकनेवाले कांग्रेसी ताली पीटते रहे। खाता-बही संभालने वाले बक्सर के पंसारी सीताराम केसरी ने वरिष्ठ और विद्वान नरसिम्हा राव से गद्दी छीन ली थी। खुद पार्टी अध्यक्ष बन गये। मगर इतिहास ने तब स्वयं को दुहराया। दो वर्ष बाद सोनिया गांधी ने अपने दल बल सहित कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष के कमरे का ताला तोड़कर खुद कुर्सी हथिया ली। सीताराम केसरी ने बस इतना विरोध में कहा कि यदि सोनियाजी इशारा कर देती तो वे खुद बोरिया-बिस्तर समेट लेते। सेवक अपनी औकात समझता है। तो बिना किसी चुनाव प्रक्रिया के, बिना नामांकन के, बिना वैध मतदान के, सोनिया गांधी स्वयंभू पार्टी मुखिया बन गईं थीं। सवा सौ साल की विरासत पर सात साल के बल पर काबिज हो गई।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/state/uttar-pradesh/virendra-atal-was-brutally-tortured-by-the-police-during-the-emergency/9382/">आपातकाल, यातनाएं और अटल: पुलिस ने प्लास से खींच लिए थे सारे नाखून, हिल गई थी पूरी दुनिया</a></span></strong></span></p>
<p>नरसिम्हा राव कितने भ्रष्ट रहे? वे प्रधानमंत्री रहे किन्तु अपने पुत्र को केवल पैट्रोल पम्प ही दिला पाये। हर्षद मेहता के वकील राम जेठमलानी ने मुम्बई के पत्रकारों को दर्शाया कि उनके मुवक्किल ने सन्दूक में एक करोड़ नोट कैसे लपेट कर नरसिम्हा राव को दिये थे। अर्थात जिसके एक इशारे पर शेयर मार्केट में अरबों का वारा-न्यारा हो जाए उस प्रधान मंत्री ने केवल एक करोड़ में सन्तुष्टि कर ली? वे असहाय इतने थे कि इस भाषाज्ञानी प्रधानमंत्री को अपनी आत्मकथा रूपी उपन्यास के प्रकाशक को स्वयं खोजना पड़ा था। नक्सलियों से अपने खेतों को बचाने में विफल रहे, नरसिम्हा राव दिल्ली में मात्र एक फ्लैट ही बीस साल में साझेदारी में ही खरीद पाये। तो मानना पड़ेगा कि नरसिम्हा राव आखिर अपनी दक्षता, क्षमता, हनक, रुतबा, रसूख और पहुंच में सोनिया के सामने कहीं आसपास भी नहीं फटकते। मगर आज दिख रहा है कि पूरा कुनबा माँ, बेटा और बेटी दया खोज रहे हैं। कब मोदी की दृष्टि वक्र हो जाय। दामाद वाड्रा की हालत इसका प्रमाण है|</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>(<span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://tismedia.in/">TIS Media</a></span> परिवार के संरक्षक<span style="color: #ff0000;"> <a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के. विक्रम राव</a> </span>का शुमार देश के नामचीन पत्रकारों में होता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उन्होंने इमरजेंसी तक में स्वतंत्र आवाज के लिए जेल यात्रा की। महीनों की सजाएं भुगती। श्री राव,  वॉयस ऑफ अमेरिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनोमिक टाइम्स, फिल्मफेयर और इलस्ट्रेटेड वीकली में प्रमुख पदों पर रहने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड के संस्थापक संपादक भी रह चुके हैं। प्रेस की नियामक संस्था &#8216;भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य रहने के अलावा मजीठिया वेतन बोर्ड और मणिसाना वेतन बोर्ड के सदस्य के तौर पर पत्रकारों के हित में लंबा संघर्ष किया है। <span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के.विक्रम राव</a>,</span> फिलहाल इंडियन फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट <span style="color: #ff0000;">#IFWJ</span> के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)</strong></span></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-former-prime-minister-p-v-narasimha-rao/9518/">पीएम जिसने भारत बचाया</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>प्रेस पर प्रेशर कितना ? तब और अब!</title>
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		<pubDate>Tue, 29 Jun 2021 11:45:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>मसलन आपातकाल जैसी लोमहर्षक वारदातें यदि आज होतीं, तो वर्तमान मीडिया क्या सत्तावानों के, पुलिसवालों के, राजनेताओं के, समाज के कर्णधारों के परखमें और पुर्जें नहीं उड़ा देते? अत्याचारियों की धज्जियां ढूंढे नहीं मिलती। तो इन पुराने हैवानी हादसों पर गौर करें। दो घटनाओं का उल्लेख करें। आपातकाल में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. रघुवंश &#8230;</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
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				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>कई दफा सुना। बहुत बार पढ़ा भी। अब मितली सी होने लगती है। वितृष्णा और जुगुप्सा भी। कथित जनवादी, प्रगतिशालि, अर्थात वामपंथी और सोनिया—कांग्रेसी दोहराते रहते है, चीखते भी हैं कि आज आपातकाल से भी बदतर स्थिति हो गयी है। अत: तार्किक होगा कि खूंखार टीवी एंकर, खोजी खबरिये और जुझारु—मीडियाकर्मियों की तब (25 जून 1975 से 21 मार्च 1977) और आज की कार्यशैली की तनिक तुलना करें।
			</div>
		</div>
	
<p>मसलन आपातकाल जैसी लोमहर्षक वारदातें यदि आज होतीं, तो वर्तमान मीडिया क्या सत्तावानों के, पुलिसवालों के, राजनेताओं के, समाज के कर्णधारों के परखमें और पुर्जें नहीं उड़ा देते? अत्याचारियों की धज्जियां ढूंढे नहीं मिलती। तो इन पुराने हैवानी हादसों पर गौर करें। दो घटनाओं का उल्लेख करें। आपातकाल में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. रघुवंश को नजरबंद कर जेल में सड़ाया गया। उनपर इल्जाम लगा था कि वे खंभे पर चढ़कर संचार के तार काट रहे थे। डॉ. रघुवंश जन्मजात लुंज थे। वे बाल्यावस्था से ही अपने पैरों की उंगलियों के बल लिखा करते थे। कालीकट (केरल) के इंजीनियरिंग के छात्र वी. राजन को नक्सलवादी कहकर कैद किया गया था। टांगों को लोहे की चादर से कुचला गया। वह मर गया। पुलिस ने इस हरकत से साफ इनकार कर दिया था। मगर न्यायालय ने सच्चाई ढूंढ ही ली। मुख्यमंत्री के. करुणाकरण को त्यागपत्र देना ही पड़ा।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE:<span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/india/contribution-of-indian-legend-journalists-gyan-sagar-verma-and-viren-dangwal-in-emergency/9398/"> ज्ञान सागर वर्माः देश का इकलौता पत्रकार जिसने इंटेलीजेंस की आंखों में धूल झोंककर छापी थी सरकार के खिलाफ खबर</a></span></strong></span></p>
<p>मध्य प्रदेश की एक पुलिस हिरासत में मां और बेटे को विवस्त्र करके साथ सुलाया गया था। सत्तारुढ मां—बेटे (संजय गांधी) इस पर मौन रहे। भारत के प्रधान न्यायाधीश जेसी शाह के न्यायिक आयोग ने इन वारदातों के विवरण को सार्वजनिक कर दिया था। अखबारों की बिजली काटकर 26 जून 1975 को दैनिक ही नहीं छपने दिये गये थे। ढेर सारे ऐसे हादसे हुये थे। जैसे खेतों में ही किसानों की नसबंदी करा दी। जनसंख्या नियंत्रण का अभियान था। मुसलमानों, खासकर जामा मस्जिद और तुर्कमानगेट पर जो पुलिस ने किया, वह तो जघन्य था। तात्पर्य यह है कि इतना नृशंस, क्रूरतम और अमानविक जुल्म तब ढाया गया था। क्या आज के भारत में ऐसी घटनायें संभव हैं? कहीं जिक्र होता भी हैं? अगर कहीं किसी सिरफिरे पुलिसवाले अथवा राजमद में सत्तासीन व्यक्ति ने ऐसा करे भी तो वह क्या बच पायेगा? मुक्त टीवी बहस में उसकी बधिया उखाड़ दी जायेगी। बोटी—बोटी हो जायेगी। तो फिर क्या औचित्य है यह चिल्लपों करने का कि इन्दिरा गांधी वाली इमर्जेंसी अब मोदी राज में वापस लौट आयी है। विचारणीय बात यह है कि ऐसी बेतुकी बातें वे करते है जो एमर्जेंसी के समय या बाद में जन्मे हैं। राहुल गांधी और उनकी भगिनी प्रियंका वाड्रा तीन और चार साल के शिशु थे जब उनकी दादी तानाशाह बन बैठीं थीं।</p>
<p>वस्तुस्थिति यह है कि आज तक आपातकाल के अपराधियों ने न तो कोई दण्ड भुगता, न उनलोगों ने कभी यातना देखी। अत: दिमागी बेईमानी होगी यह कहना कि आपातकाल जैसी स्थिति आज भी है। जन अदालत का फैसला 1977 में देखा गया। रायबरेली की जनता द्वारा प्रधानमंत्री के चुनाव पर दिये गये जनादेश को याद करें।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE:<span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/state/uttar-pradesh/virendra-atal-was-brutally-tortured-by-the-police-during-the-emergency/9382/"> आपातकाल, यातनाएं और अटल: पुलिस ने प्लास से खींच लिए थे सारे नाखून, हिल गई थी पूरी दुनिया</a></span></strong></span></p>
<p>मीडिया का हाल उस वक्त कैसा था? लालकृष्ण आडवाणी (मोरारजी काबीना के सूचना एवं प्रसारण मंत्री) ने बेहतरीन बात कही पत्रकारों से : &#8221;इंदिरा गांधी ने तो आप लोगों से झुकने के लिये कहा था और आज लोग लगे रेंगने!&#8221; क्या वर्तमान युग में ऐसा मुमकिन है? हुजुम है आज जांबाज पत्रकारों का जो पलटवार करेंगे, झुकने की तो बात है ही नहीं। आज सेंसरशिप कोई सरकार लगा सकती है? तत्काल उसे तोड़ा जायेगा। हां, जिन मीडिया मालिकों का व्यवसायिक हित है वे जरुर उसके संवाददाताओं को धमकायेंगे, परेशान करेंगे। खबर दबायेंगे।</p>
<p>स्वयं अपना उदाहरण 1976 का पेश करुं । प्रतिरोध की आवाज इर्मेंजेंसी (1975-77) में पूरी तरह कानून कुचल दिया गया था। मीडिया सरकारी माध्यम मात्र बन गया था। अधिनायकवाद के विरोधी जेलों में ठूंस दिये गये थे। समूचा भारत गूंगा बना दिया गया था। न्यायतंत्र नंपुसक बना डाला गया था। हालांकि उसके कान और आँख ठीक थे। उस दौर में हम पच्चीस सामान्य भारतीयों ने देश के इतिहास में सबसे जालिम, खूंखार और मेधाहीन तानाशाही का सक्रिय विरोध करने की छोटी सी कोशिश की थी। पुलिस ने इसे &#8221;बड़ौदा डायनामाइट षडयंत्र&#8221; का नाम दिया था। सजा थी फांसी। तब मैं बड़ौदा में &#8221;टाइम्स आफ इन्डिया&#8221; का संवाददाता था। मेरा आवास हमारी भूमिगत प्रतिरोधात्मक गतिविधियों का केन्द्र था। हम सब की गिरफ्तारी के बाद कुछ लोग समझे थे कि बगावत की एक और कोशिश नाकाम हो गई थी। पर ऐसा हुआ नहीं था।</p>
<p>रायबरेली के वोटरों ने हमारा मकसद पूरा किया। तब तानाशाह पहले कोर्ट (इलाहाबाद) से, फिर वोट (रायबरेली, 20 मार्च 1977) से हारीं। हम सब रिहा हो गये। भारत दुबारा आज़ाद हुआ। अब वैसी (25 जून 1975) तानाशाही फिर कभी नहीं लौटेगी। मगर आजादी किसी की कभी बरकरार नहीं रहती है, सिवाय उनके जो सचेत रहते हैं। मेरे लिये यह आवश्यक है, स्वाभाविक भी, क्योंकि मेहनतकश पत्रकार के नाते समतामूलक समाज का सृजन मेरा भी सपना है। इसीलिए हर जगह प्रतिरोध की लौ हम जलाना चाहते हैं। जनवादी संघर्ष का अलख हम जगाना चाहते हैं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE:<span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-journalism-in-this-era-what-is-journalism-how-it-is-now-a-days/9128/"> मुमकिन, माना मीडिया ने! नामुमकिन कर डाला योगीजी ने !!</a></span></strong></span></p>
<p>उसी दौर का वृतांत है। बड़ौदा जेल में गुजरात के डीजी (पुलिस) पीएन राइटर मुझसे जिरह करने आये। उनका प्रश्न था : &#8221;जब समूचे भारत के पत्रकार पटरी पर आ गये थे, तो आप (दो संतानों के पिता) को क्या सूझी थी कि इंदिरा गांधी के विरोध में बगावत का परचम लहराये?&#8221; मेरा उत्तर सामान्य था। वे भी &#8221;टाइम्स आफ इंडिया&#8221; के पाठक थे। मैंने पूछा : &#8221; डीजीपी साहब, 25 जून 1975, प्रेस सेंसरशिप लगाये जाने के पूर्व &#8221;टाइम्स&#8221; पढ़ने में कितना समय लगाते थे? वे बोले : &#8221; सोलह पृष्ठ पढ़ने में करीब बीस—बाईस मिनट लगते थे।&#8221; मेरा अगला प्रश्न था : &#8221;जून 25 के बाद, जब सेंसरशिप लागू हो गयी थी, तब?&#8221; उनका जवाब था : &#8221;अब करीब दस मिनट।&#8221; मैं बोला : &#8221;साहब! आपके दस मिनट वापस लाने के लिये मैं जेल में आया हूं।&#8221; बस मेरा पुलिसिया इंटरोगेशन खत्म हो गया। क्या आज कहीं पत्रकारिता में ऐसी स्थिति की लेशमात्र भी आशंका है? संभव भी हो सकती है? यर्थार्थवादी दृष्टि अपनाये। नयी पीढ़ी के, खासकर युवा श्रमजीवी पत्रकार कायर नहीं हैं। बस यही सम्यक टिप्पणी है: इंदिरा शासन के दौर की मीडिया पर और आज के टीवी—अखबारों पर। निरंकुशता के सोपान पर इंदिरा गांधी से नरेन्द्र मोदी बहुत निचले पायदान पर हैं।</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>(<span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://tismedia.in/">TIS Media</a></span> परिवार के संरक्षक<span style="color: #ff0000;"> <a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के. विक्रम राव</a> </span>का शुमार देश के नामचीन पत्रकारों में होता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उन्होंने इमरजेंसी तक में स्वतंत्र आवाज के लिए जेल यात्रा की। महीनों की सजाएं भुगती। श्री राव,  वॉयस ऑफ अमेरिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनोमिक टाइम्स, फिल्मफेयर और इलस्ट्रेटेड वीकली में प्रमुख पदों पर रहने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड के संस्थापक संपादक भी रह चुके हैं। प्रेस की नियामक संस्था &#8216;भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य रहने के अलावा मजीठिया वेतन बोर्ड और मणिसाना वेतन बोर्ड के सदस्य के तौर पर पत्रकारों के हित में लंबा संघर्ष किया है। <span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के.विक्रम राव</a>,</span> फिलहाल इंडियन फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट <span style="color: #ff0000;">#IFWJ</span> के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)</strong></span></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-difference-in-press-during-emergency-and-now/9504/">प्रेस पर प्रेशर कितना ? तब और अब!</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>बड़ा सवालः इस्राइल से भारत की यारी पर इतना खौफ क्यों ?</title>
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		<pubDate>Wed, 19 May 2021 08:36:48 +0000</pubDate>
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<li><span style="color: #ff0000;"><strong>के. विक्रम राव</strong></span></li>
</ul>
<p>अरब आतंकी गिरोह &#8221;हरकत—अल—मुक्वाम—अल—इस्लामी&#8221; (हमास) के राकेट के हमले से गाजा सीमावर्ती इलाके में सेवारत नर्स 32—वर्षीया सौम्या की 11 मई 2021 की रात मृत्यु हो गयी। अगले ही दिन विश्व नर्स दिवस था। उसकी अस्सी वर्षीया यहूदी मरीज भी बुरी तरह घायल हो गयी। आक्रमण के वक्त सौम्या अपने नौ वर्षीय पुत्र के हालचाल फोन पर अपने पति संतोष से ले रही थी। पति ने विस्फोट सुना और फोन खामोश हो गया। पांच हजार किलोमीटर दूर केरल के हरित जिले इदुक्की के ग्राम कीरीथाडु में अपने कुटुम्ब को छोड़कर सौम्या जीविका हेतु इस्राइल नौ साल पूर्व आयी थी। हालांकि इदुक्की के कांग्रेसी सांसद एएम कुरियाकोस को विदेश राज्य मंत्री तथा केरल भाजपा अध्यक्ष वी. मुरलीधरन ने सौम्या के शव को जल्द से जल्द भारत लाने की कोशिशें की, जो सफल भी रहीं।</p>
<p>मंथन का मुद्दा यहां यह है कि इस्लामी आतंक से विश्व कब तक संतप्त रहेगा? इस्राइल से भारत के रिश्ते पांच दशकों से कटे रहे। कारण बस इतना था कि यहूदी गणराज्य से नातेदारी जो भी भारतीय पार्टी करती है हिन्दुस्तानी मुसलमान उसे वोट नहीं देते। फिलिस्तीन का मसला कश्मीर जैसा बना दिया गया। दोनों मजहबी पृथकवाद के शिकार रहे। सेक्युलर भारत के किसी भी राजनेता में इतना पुंसत्व नहीं रहा कि वह कहे कि विदेश नीति का एकमात्र आधार राष्ट्रहित होता है, मजहबी अथवा भौगोलिक दबाव नहीं। लेकिन इस्राइल—नीति की बाबत सीधा वोट से रिश्ता हो गया। जब 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी थी तो इस्राइल के विदेश मंत्री जनरल मोशे दयान दिल्ली लुकेछिपे आये थे। अटल बिहारी वाजपेयी, विदेश मंत्री, सूरज ढले रात के अंधेरे में सिरी फोर्ट के परिसर में उनसे मिले थे। मजबूत इच्छाशक्ति के धनी प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने तब कहा था कि यदि वे और अटलजी रोशनी में इस यहूदी राजनयिक से मिलते तो जनता पार्टी की सरकार ही गिर जाती। मोशे दयान की इस गुपचुप यात्रा को तब कांग्रेसी संपादक एमजे अकबर ने अपने दैनिक &#8221;दि टेलीग्राफ&#8221; में साया किया था। तो ऐसी सियासी धौंस रही पचास वर्ष तक  इन वोट बैंक के मालिकों की भारतीय कूटनीति पर!</p>
<p>भला हो कांग्रेसी प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव का जिन्होंने (1992) इस्राइल को मान्यता दी और उसका राजदूतावास खुलवाया। फिर जो भी प्रधानमंत्री आये खासकर वामपंथी इन्द्र कुमार गुजराल आदि ने इस्राइल से रिश्ते उदासीन ही रखे। नरेन्द्र मोदी ने सारा श्रेय ले लिया, जब उन्होंने इस्राइल के प्रधानमंत्री को भारत आमंत्रित किया और स्वयं राजधानी तेलअविव और पवित्र जेरुशलेम गये। मोदी ने तेलअविव में कहा भी था कि : &#8221;इतिहास के इस संकोच&#8221; को उन्होंने मिटा दिया। प्रधानमंत्री को कहना चाहिये था कि वे किसी वोट बैंक के कैदी नहीं हो सकते, भले ही वह अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक। भारत की विदेश नीति को कोई भी आतंकी गुट भयभीत नहीं कर सकता। लेकिन, अब राष्ट्रस्तर पर बहस होनी चाहिये और जो दोषी हैं इस्राइल से रिश्ता न रखने के उन अपराधियों को इतिहास के कटघरों में खड़ा किया जाये। संयुक्त राष्ट्र समिति में 1949 में इस्राइल गणराज्य को सदस्य बनाने का प्रस्ताव आया था। जवाहरलाल नेहरु के आदेश पर भारत ने इस्राइल के विरुद्ध वोट दिया। सारे इस्लामी राष्ट्रों ने भी विरोध किया था। इन्हीं इस्लामी राष्ट्रों ने कश्मीर के मसले पर पाकिस्तान के पक्ष में वोट दिया था।</p>
<p>एक दकियानूसी मजहबी जमात है, जिसका नाम है &#8221;आर्गेनिजेशन आफ इस्लामी कंट्रीज।&#8221; जब मुस्लिम फिलीस्तीन का विभाजन कर नया राष्ट्र इस्राइल का गठन हो रहा था तो सारे मुस्लिम देशों ने जमकर मुखालफत की थी और शाश्वत हिंसक युद्ध की धमकी भी दी। मगर जब ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा विशाल भारत का विभाजन कर पश्चिमी तथा पूर्वी पाकिस्तान (आज बांग्लादेश) बन रहा था तो सारे इस्लामी राष्ट्रों ने तकसीम का स्वागत किया था। आज तक कश्मीर को ये राष्ट्र समूह पाकिस्तानी ही मानता है। &#8221;सारे जहान से अच्छा&#8221; पंक्तियों  के रचयिता अलामा मोहम्मद इकबाल ने 1909 में लिखा था कि : &#8221;जो मुसलमान जिहादी नहीं है, वे सब यहूदियों की भांति कायर हैं।&#8221; वजह यह थी कि औसत यहूदी व्यापारी है और शांतिप्रिय होता है। हालांकि पंथनिरपेक्ष गणराज्य के उपराष्ट्रपति पद का दशक तक आनन्द उठाने वाले मियां मोहम्मद हामिद अंसारी राज्यसभा में इस्राइल का विरोध ही करते रहे।</p>
<p>भारतीय मुस्लिमों से अपेक्षा रही थी कि वे मिल्लत को समझायेंगे कि इस्राइल से मदद भारतहित में है। पर ऐसा प्रयास कभी भी नहीं किया गया। मसलन इस्राइल अब 5 जी में सहयोग कर मुम्बई अस्पताल के मरीज का शल्य चिकित्सा तेलअविव में बैठकर संचालित कर सकता है। भारत को कृषि, जलसिंचन, रेगिस्तान को हराभरा बनाने, खाद्य सुरक्षा आदि में सहयोग दे सकता हे। सुरंग खोदने में उसे दक्षता है। पाकिस्तान सीमा पर इस तकनीक द्वारा वह घुसपैठियों को बाधित कर सकता है। इस्राइल के पास राडार व्यवस्था है, जिससे जंगलों में छिपे नक्सली आतंकियों का पता लगाया जा सकता है।</p>
<p>एक खास बात। जितने भी अरब राष्ट्र हैं जो इस्राइल पर वीभत्स आक्रमण कर चुके है तथा आज भी उसे नेस्तानाबूद करने में ओवरटाइम करते है, सभी निजी तौर पर इस्राइल से तकनीकी और व्यापारी संबंध कायम कर रहे है। इन कट्टर इस्लामी देशों की लिस्ट में नाम है मोरक्को, बहरेइन, जोर्डन, अबू ढाबी, संयुक्त अरब अमीरात, सूडान इत्यादि। सबसे प्रथम है मिस्र जिसके नेता कर्नल जमाल अब्दुल नासिर ने सबसे पहले 7 जून 1967 के दिन संयुक्त अरब देशों के साथ इस्राइल पर हमला बोला था। सभी इस्लामी बिरादरी बुरी तरह पराजित हो गये थे। अचरज यह है कि कम्युनिस्ट चीन जो आज इस्लामी देशों का भाई बनता है, उसने 29 जनवरी 1992 को भारत द्वारा इस्राइल को मान्यता देने के एक महीने पहले ही इस्राइल को मान्यता देने तक की जल्दबाजी की थी। एक विशिष्टता और&#8230; इन अरब राष्ट्रों में वोट द्वारा नहीं, बन्दूक के बल पर सरकारें बनती है। इस्राइल में गत दो वर्षों में चार बार संसदीय मतदान हुआ। बहुमत की सरकार नहीं बन सकी थी। सवोच्च न्यायालय ने संसद के स्पीकर यूली एडेहस्टेइन को 25 मार्च 2020 के दिन त्यागपत्र देने पर विवश कर दिया  था, क्योंकि उन्होंने सदन को निलंबित कर दिया था।</p>
<p>अब देखिये भारत के विपक्षी दलों की निखालिस अवसरवादिता की एक झलक। संयुक्त राष्ट्र संघ में गाजा पर इस्राइल द्वारा प्रतिरोधात्मक  हमले (पुलिवामा टाइप) करने की निन्दा वाले प्रस्ताव का भारत ने समर्थन नहीं किया था। इस पर पीडीपी की कश्मीरी नेता महबूबा मुफ्ती ने लोकसभा में (15 जुलाई 2014) मोदी सरकार की आलोचना वाला प्रस्ताव पेश किया। इसका समर्थन किया तृणमूल कांग्रेस, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, समाजवादी पार्टी, मजलिसे इतिहादे मुसलमीन आदि ने संसदीय कार्य मंत्री वेंकैया नायडू से बहुमत द्वारा अस्वीकृत करा दिया। मगर परसों हमास के गाजा पट्टी पर घातक हमले की निन्दा अभी तक भारत में किसी ने नहीं की। सौम्या की शहादत को क्या यही श्रद्धांजलि है ? और कब तक जारी रहेगा यह सियासी अवसरवादिता का दौर&#8230; कब तक राष्ट्र से बढ़कर जाति और धर्म को तरजीह दी जाती रहेगी&#8230;!!!! निश्चित ही सवाल बड़ा है और आसानी से जवाब भी नहीं आने वाला&#8230; लेकिन हमें कोशिश करनी होगी कि कहीं जवाब तलाशने में इतनी देर न हो जाए कि हम राष्ट्र नहीं मजहबी ताकतों के तौर पर ही पहचाने जाने लगें&#8230;!!!!</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>(<span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://tismedia.in/">TIS Media</a></span> परिवार के संरक्षक<span style="color: #ff0000;"> <a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के. विक्रम राव</a> </span>का शुमार देश के नामचीन पत्रकारों में होता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उन्होंने इमरजेंसी तक में स्वतंत्र आवाज के लिए जेल यात्रा की। महीनों की सजाएं भुगती। श्री राव,  वॉयस ऑफ अमेरिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनोमिक टाइम्स, फिल्मफेयर और इलस्ट्रेटेड वीकली में प्रमुख पदों पर रहने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड के संस्थापक संपादक भी रह चुके हैं। प्रेस की नियामक संस्था &#8216;भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य रहने के अलावा मजीठिया वेतन बोर्ड और मणिसाना वेतन बोर्ड के सदस्य के तौर पर पत्रकारों के हित में लंबा संघर्ष किया है। <span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के.विक्रम राव</a>,</span> फिलहाल इंडियन फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट <span style="color: #ff0000;">#IFWJ</span> के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)</strong></span></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/vikram-rao-of-veteran-journalist-reviewing-india-palestine-israel-relations/8487/">बड़ा सवालः इस्राइल से भारत की यारी पर इतना खौफ क्यों ?</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>वॉटरगेट कांड: हिंदुस्तानी अखबारों में है इतना दम! जो सत्ता के शीर्ष को दे सके ऐसी चुनौती</title>
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		<pubDate>Sat, 01 May 2021 10:15:51 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>उस दौर में हीरो थे हमपेशेवर दो अदना रिपोर्टर—एक उन्नीस साल का तो दूसरा बीस का। तेज तर्रार थे, उभरती हुयी जवानी थी, इसीलिये निडर थे। फिर काहे का, किससे डर? उनके साहस से खोजी पत्रकारिता विश्व में कीर्ति के एवरेस्ट पर चढ़ गयी थी। मीडिया संस्थानों में भर्ती के नये रिकार्ड बन रहे थे। &#8230;</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
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				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>वाटरगेट ? राजधानी वाशिंगटन में पोटेमेक नदी के निकटवाला स्थल। स्मृति पटल को पोछिये। दमक कर याद आ जायेगा। ठीक पचास साल पुरानी (रविवार, 18 जून 1972 की) खबर है। तब सर्वशक्तिमान अमेरिका के महाबलशाली रिचर्ड मिलहाउस निक्सन पर विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के कार्यालय में सेंधमारी के कारण महाभियोग चला था। निक्सन ने लज्जा के मारे त्यागपत्र दे दिया था। जलील हुये। खलनायकी का इतिहास रचा।
			</div>
		</div>
	
<p>उस दौर में हीरो थे हमपेशेवर दो अदना रिपोर्टर—एक उन्नीस साल का तो दूसरा बीस का। तेज तर्रार थे, उभरती हुयी जवानी थी, इसीलिये निडर थे। फिर काहे का, किससे डर? उनके साहस से खोजी पत्रकारिता विश्व में कीर्ति के एवरेस्ट पर चढ़ गयी थी। मीडिया संस्थानों में भर्ती के नये रिकार्ड बन रहे थे। युवजन में सैनिक के बाद श्रमजीवी पत्रकार बनने की आकांक्षा कुलाचे भर रही थी। राष्ट्रपति को गिराने वाले इस युवाद्वय ने युगांतरकारी घटना को अंजाम दिया था। दुनिया के हम जैसे रिपोर्टरों के लिये वे सदा यादगार हैं। वाटरगेट साजिश को निर्भयता से पर्दाफाश करने वाले वाशिंगटन पोस्ट के पत्रकार युगों तक आराध्य रहेंगे। अनुकरणीय उदाहरण हैं।</p>
<p>आज यह घटना बरबस याद आ गयी। कारण है। इस कलंकपूर्ण वाटरगेट हादसे के मूल रचनाकार और रिचर्ड निक्सन के खास साथी जार्ज गार्डन लिड्डी का कल नब्बे वर्ष की आयु में वर्जीनिया में निधन हो गया। उनकी स्मृतिमात्र से पत्रकारी शौर्य की गाथा आखों के सामने आ गयी। मानों कल की बात हो। कल निधन तक अपने किये पर उनमें लेशमात्र पश्चाताप भी नहीं दिखा। बल्कि टीवी पर तेवर तर्रार भरे ही रहते थे। अपनी कार में शान से प्लेट लगाते थे : &#8221;एच—टू—गेट&#8221; (पानी का रासायिनिक फार्मूला है)। वाटरगेट काण्ड की बहादुरी को बिल्ला माने बैठे थे।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/128-journalists-died-in-last-one-year-out-of-which-77-journalists-died-in-april-2021/7594/"><strong>मुद्दा: आखिर क्यों काल के गाल में समा रहे हैं पत्रकार</strong><strong>, </strong><strong>सिर्फ अप्रैल महीने में </strong><strong>77 </strong><strong>की मौत</strong></a></span></p>
<p>सालो से जेल काटने के बाद उन्हें राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने माफी दे दी। तब ये साजिशकर्ता रिहा हुआ था। चार दशकों तक वे बेशर्मी से अपने वाटरगेट वाले हिम्मती कारनामें के किस्से टीवी पर सुनाते थे। बताते थे कि एडोल्फ हिटलर उनसे बात किया करता था।</p>
<p>क्या संयोग था। उस वर्ष (1971) ही मेरी मुम्बई से अहमदाबाद फिर बडोदरा पोस्टिंग हुयी। मेरी पहली ही स्टोरी &#8221;टाइम्स&#8221; के लिये थी कि &#8221;वाशिंगटन के वाटरगेट&#8221; की भांति बडोदरा में भी एक पानी गेट है। मगर वह केवल ऐतिहासिक द्वार है जो मांडवी मोहल्ले के पास है। वहां पानी की बूंद तक नहीं है। गायकवाड नरेशों ने बनवाया था। यह पानी गेट बडोदरा नगर की पूर्वी दिशा में किलाये—दौलताबाद के नाम से मशहूर है जो अजब तथा राजे झीलों के समीप है। इसे राजा खलील खान ने बनवाया था। इसमें जालीदार झरोखे पर कमल के निशान बने है। इसी पर एक झुका हुआ लोहे का छड़नुमा टुकड़ा लगा है जिसे बड़ौदा की नाक कहा जाता है।</p>
<p>फिलहाल राजधानी वाशिंगटन में छह इमारतों से बना बहुमंजलीय वाटरगेट होटल है। यहां की विशाल छठी मंजिल पर डेमोक्रेटिक पार्टी ने (1971) राष्ट्रपति चुनाव में अपना अभियान मुख्यालय खोला था। वहां दिवंगत गोर्डन लिड्डी ने कुछ बढ़ई लोगों की मदद से उस कार्यालय में जासूसी करने की योजना रची और विपक्षी के दस्तावेज चुराये थे। पुलिसिया जांच के दौरान चौकीदार फ्रैंक विल्स ने कुछ अजनबियों को सेंध मारते पकड़ा। पता चला वे सब सत्तारुढ रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक, गुप्तचर थे। गिरफ्तार हुये। वह दिन शनिवार था। तारीख 17 जून 1972 जब यह पांच सेंधमार पकड़े गये थे। दैनिक &#8221;वाशिंगटन पोस्ट&#8221; के रिपोर्टर कक्ष में फोन की घंटी बजी। संवादददाता एल्फ्रेड लीविस को सूचना मिली कि डेमोक्रेटिक पार्टी के कार्यालय में सेंधमार पकड़े गये। तभी यशस्वी संपादक बेन ब्रेडली ने नगर संस्करण संपादक बेर्री सुस्मेन को विवरण मंगाने का निर्देश दिया।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/citizen-journalist/the-public-is-also-responsible-for-this-covid-19-pandemic/7365/">दोषी तो मैं ही हूं&#8230;</a></span></strong></span></p>
<p>तब कार्यालय में बाब वुडवर्ड था। सक्षम संवाददाता जो रिपोर्टर बनने के पूर्व अमेरिकी नौसेना में नौ वर्ष तक सेवारत था। साथ में कार्ल बर्नस्टेइन था जो पुलिस की खबर लाता था। उस से संपादक को काफी हिचक थी क्योंकि वह दफ्तर को खर्चे का लम्बा चौड़ा बिल देता था, खूब वसूलता था। एक बार तो उसने किराये की मोटरकार ही गुमा दी और तगड़ी रकम प्रबंधन से ले ली। संपादक ने इन दोनों से वाटरगेट में गिरफ्तार सेंधमारों के बारे में जानकारी मंगाई और विस्तृत रपट भी।</p>
<p>दोनों द्वारा कर्मठ और प्राणपण से की गयी तफ्तीश साल भर चली। आखिर में पता चला कि शीर्ष पर राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन है जो राष्ट्रपति का चुनाव दोबारा लड़ने की तैयारी कर रहे थे। विपक्षी को बदनाम करने की मंशा से डेमेक्रेटिक पार्टी के दस्तावेज और गुप्त फैसलों की जानकारी हासिल की। बाकी रपट सब जानते ही हैं।</p>
<p>बस इतना और कि राष्ट्रपति निक्सन ने विशेषाधिकार के नियम की आड़ में अदालती कार्यवाही का विरोध किया। तब अमेरिका के प्रधान न्यायाधीश वोरेन ई. बर्गर ने निर्णय दिया था कि निक्सन के अक्षम्य अपराध को दंडित करना संवैधानिक मर्यादा की अनिवार्यता है। विवश होकर 8 अगस्त 1972 को शर्मसार राष्ट्रपति ने पदत्याग किया। महाभियोग से बच गये। उपराष्ट्रपति गेरार्ड फोर्ड 38वें राष्ट्रपति बने। निक्सन की यह दूसरी पराजय थी। वे 1960 में जान कैनेडी से हार चुके थे।</p>
<p>मगर रिचर्ड निक्सन का वह दौर ऐतिहासिक और अमेरिका के लिये बड़ा मुफीद था। माओ जेडोंग के आमंत्रण पर फरवरी 1972 में निक्सन कम्युनिस्ट चीन की यात्रा गये। तब तक सोवियत रुस से चीन किनारा कर चुका था। तभी वियतनाम की जनता अमेरिकी साम्राज्यवाद से मुक्ति के लिये संघर्ष कर रही थी। उस छोटे से स्वाभिमानी देश पर परमाणु बम गिराने का निर्णय निक्सन ने ले लिया था। रुस के जवाबी हमले से वह रुक गये। तभी भारतीय सेना पूर्वी पाकिस्तान की मुक्ति हेतु ढाका के निकट पहुंची थी। निक्सन ने अमेरिकी बेड़े का सांतवा जंगी जहाज रवाना कर दिया। मगर उसके पहुंचने के पूर्व ही पाकिस्तानी जनरल नियाजी तथा टिक्का खान ने आत्म समर्पण कर दिया।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/k-vikram-rao-challenges-of-marxist-communist-party-in-kerala-elections/6805/">केरलः माकपा को चुनौती दूसरी संतप्ता से !</a></span></strong></span></p>
<p>वाटरगेट के बारे में 8 फरवरी 1997, लगभग पच्चीस वर्षों बाद, पीटीआई ने वाशिंग्टन से मिले टेप पर आधारित एक खबर प्रकाशित की थी। इसके अनुसार निक्सन ने स्वयं अपने विपक्षी डेमोक्रेटिक प्रत्याशी एडवर्ड कैनेडी तथा एडमण्ड मस्की को बदनाम करने हेतु उस सेंधमारी का आदेश दिया था।</p>
<p>पांच दशक बीते। हम संवाददाता लोग &#8221;वाशिंगटन पोस्ट&#8221; के संपादक और दोनों खोजी रिपोर्टरों पर गर्व करते हैं। पर दो प्रश्न अनुत्तरित रह गये। पहला, वाटरगेट काण्ड पर सिवाय वाशिंगटन पोस्ट के शेष समाचार—पत्र और टीवी वाले खामोश क्यों बैठ गये थे ? दूसरा प्रश्न क्या भारतीय समाचारपत्र उद्योग में &#8221;पोस्ट&#8221; की कैथरीन ग्राहम सरीखी स्वामिनी तथा बेन ब्रेडली सदृश निडर संपादक कभी होगा जो सत्ता के शीर्ष को चुनौती दे सकें? कार्ल बर्नस्टेइन और बाब वुडवर्ड जैसे दिलदार रिपोर्टर तो कई मिल ही जायेंगे हैं।</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>(<span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://tismedia.in/">TIS Media</a></span> परिवार के संरक्षक<span style="color: #ff0000;"> <a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के. विक्रम राव</a> </span>का शुमार देश के नामचीन पत्रकारों में होता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उन्होंने इमरजेंसी तक में स्वतंत्र आवाज के लिए जेल यात्रा की। महीनों की सजाएं भुगती। श्री राव,  वॉयस ऑफ अमेरिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनोमिक टाइम्स, फिल्मफेयर और इलस्ट्रेटेड वीकली में प्रमुख पदों पर रहने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड के संस्थापक संपादक भी रह चुके हैं। प्रेस की नियामक संस्था &#8216;भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य रहने के अलावा मजीठिया वेतन बोर्ड और मणिसाना वेतन बोर्ड के सदस्य के तौर पर पत्रकारों के हित में लंबा संघर्ष किया है। <span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के.विक्रम राव</a>,</span> फिलहाल इंडियन फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट <span style="color: #ff0000;">#IFWJ</span> के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)</strong></span></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/five-decades-of-watergate-scandal/7600/">वॉटरगेट कांड: हिंदुस्तानी अखबारों में है इतना दम! जो सत्ता के शीर्ष को दे सके ऐसी चुनौती</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>केरलः माकपा को चुनौती दूसरी संतप्ता से !</title>
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		<pubDate>Fri, 16 Apr 2021 09:29:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>केरल मार्क्सवादी कम्युनिस्टों द्वारा उसके पति की हत्या से विधवा हुयी केके रमा भी अब विधानसभा का चुनाव लड़ रहीं हैं। सोनिया कांग्रेस—नीत संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा रमा का पूर्ण समर्थन कर रहा है। वडकर (कोजिकोड जिला) से माकपा के प्रतिकार में रमा अपना विरोध मतपेटियों द्वारा व्यक्त करेंगी।  &#8211; के. विक्रम राव रमा की गाथा &#8230;</p>
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<blockquote class="aligncenter quote-light "><p>केरल मार्क्सवादी कम्युनिस्टों द्वारा उसके पति की हत्या से विधवा हुयी केके रमा भी अब विधानसभा का चुनाव लड़ रहीं हैं। सोनिया कांग्रेस—नीत संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा रमा का पूर्ण समर्थन कर रहा है। वडकर (कोजिकोड जिला) से माकपा के प्रतिकार में रमा अपना विरोध मतपेटियों द्वारा व्यक्त करेंगी।  <cite> &#8211; के. विक्रम राव</cite></p></blockquote>
<div class="o9v6fnle cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q">
<div dir="auto"><span style="color: #ff0000;"><strong>रमा</strong></span> की गाथा बड़ी त्रासदी और विडंबना से भरी है। उसके स्वर्गीय पति टीजी चन्द्रशेखरन माकपा के जानेमाने नेता थे। स्टूडेन्ट फेडरेशन आफ इंडिया (एसएफआई) के क्रियाशील अगुवा रहे थे। माकपा के वरिष्ठों में थे। मगर माकपा मुख्यमंत्री पिनरायी वियजन के आलोचक थे। एक दिन (4 मई 2012) को वह ओचिंत्यन गांव से किसी विवाह समारोह में शिरकत कर मोटरबाइक पर घर लौट रहे थे, तो करीब पन्द्रह लोगों ने उन्हें काट डाला, टुकड़े—टुकड़े कर दिये। मुकदमा चला तो बारह हत्यारों को आजीवन कारावास हुआ। इनमें चार लोग माकपा के वरिष्ठ नेता थे। इस हत्या पर टिप्पणी करते पूर्व माकपा मुख्यमंत्री और राज्य के वरिष्ठतम कम्युनिस्ट नेता वीएस अच्युतानन्दन ने आक्रोश व्यक्त किया था और घोर भर्त्सना की थी। क्षेत्र में वर्षों से चन्द्रशेखरन अत्यधिक लोकप्रिय रहे। उनकी आलोचना थी कि विजयन ने माकपा को पांच सितारा संस्कृतिवाला बना दिया है। सर्वहारा की पार्टी नहीं रही। चन्द्रशेखरन खुलकर अपनी पार्टी की दक्षिणपंथी कार्यशैली की निंदा करते रहे। स्वाभाविक है पिनरायी विजयन से खुला मुकाबला हुआ। नतीजन अपनी जान गंवानी पड़ी। मगर माकपा सरकार ने हत्या पर खेद तक व्यक्त नहीं किया।</div>
</div>
<div class="o9v6fnle cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q">
<div dir="auto">चन्द्रशेखरन को जब माकपा से निष्कासित कर दिया गया था तो उन्होंने नया दल &#8221;क्रांतिकारी मार्क्सवादी पार्टी&#8221; बना ली। पूरे जिले में वे अत्यधिक जनप्रिय हो गये। तीव्र ईष्यावश उन्हें उनके ही पार्टी वालों ने हमेशा के लिये हटा दिया। अत: उनकी विधवा रमा अब चुनाव द्वारा माकपा से प्रतिशोध कर रही है। सोनिया—कांग्रेस ने यह सीट रमा के लिये छोड़ दिया है।</div>
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<div class="o9v6fnle cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q">
<div dir="auto">मगर माकपा और मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन को यह बर्दाश्त नहीं हुआ। माकपा ने चार निर्दलीय प्रत्याशियों से नामांकन दाखिल करा दिया। नौ उम्मीदवारों में चार रमा के नामाराशि है। अत: असली रमा की मुश्किल और मशक्कत बढ़ गयी है।</div>
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<div class="o9v6fnle cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q">
<div dir="auto"><strong><span style="color: #ff0000;">रमा</span> </strong>के विरोध में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा के एक घटक जनता दल (सेक्युलर) के प्रत्याशी हैं। भाजपा का भी एक है। यूं अमूमन केरल में शरारत के तौर पर कमजोर विपक्षी उम्मीदवार अपने सशक्त प्रत्याशी की नामाराशि वाले कई प्रत्याशियों के नामांकन दाखिल करा देतें हैं।</div>
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<div class="o9v6fnle cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q">
<div dir="auto">मसलन मशहूर कांग्रेसी प्रत्याशी शशि थरुर के विरुद्ध तिरुअनंतपुरम लोकसभा क्षेत्र से 2009 में दो और शशि थरुर नामक उम्मीदवार थे। दोनों को मिलाकर आठ हजार वोट मिले। हालांकि असली थरुर की जीत की मार्जिन दस हजार थी। हार से बच गये। मगर केरल प्रदेश कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष वीएम सुधीरन के नामवाले भी दो और 2004 निर्वाचन में चुनाव लड़ रहे थे। असली सुधीरन केवल एक हजार वोट से हारे, जबकि उनकी नामा​राशि वालों को 8281 वोट मिले थे। ये वोट शायद कांग्रेस अध्यक्ष को ही मिलते। वोटरों के भ्रम के कारण वे पराजित हो गये।</div>
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<div class="o9v6fnle cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q">
<div dir="auto">केरल विधानसभा निर्वाचन में कई अजूबे होते रहे है। माकपा मुख्यमंत्री विजयन का विरोध नब्बे—वर्षीय पूर्व सीएम वीएस अच्युतानन्द खुलकर कर रहे हैं। उनका मानना है कि मार्क्सवाद के चिंतन, दर्शन और सिद्धांतों को तिलांजलि देकर विजयन उसे दक्षिण पंथी, प्रतिक्रियावादी, पूंजीवादी ढर्रे पर ले जा रहे है।</div>
<div dir="auto"><strong><span style="color: #ff0000;">वे</span></strong> बार—बार मुख्यमंत्री की सोना तस्करी में लिप्तता की ओर इशारा करते है। इसलिये माकपा को अपार हानि हो रही है। मगर मसला यह है कि येचूरी सीताराम और प्रकाश करात जो स्वच्छतावादी है, इस गंदगी को क्यों सह रहे हैं? छह अप्रैल को उत्तर मिल जायेगा।</div>
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<div class="o9v6fnle cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q">
<div dir="auto"><strong><span style="color: #ff0000;">रमा</span> </strong>की उम्मीदवारी की तरह विधवा वी. भाग्यवती भी संघर्षशील हैं। वे मुख्यमंत्री के विरुद्ध धर्मादम क्षेत्र से निर्दलीय चुनाव लड़ रही है। उसकी नौ और तेरह वर्ष की दो पुत्रियों का माकपा के गुण्डों ने बलात्कार और हत्या कर दिया था। भाग्यवती भी जनता से न्याय पाने की अपील पर चुनाव लड़ रहीं हैं। वडकर और धर्मदम विधानसभा के परिणाम भले ही शहीदों की विधवाओं के माकूल न हों, पर माकपा की कचूमर निकल जायेगी।</div>
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<div class="o9v6fnle cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q">
<div dir="auto"><span style="color: #000000;"><strong>(द इनसाइड स्टोरी परिवार के संरक्षक<span style="color: #ff0000;"> <a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के. विक्रम राव</a> </span>का शुमार देश के नामचीन पत्रकारों में होता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उन्होंने इमरजेंसी तक में स्वतंत्र आवाज के लिए जेल यात्रा की। महीनों की सजाएं भुगती। श्री राव,  वॉयस ऑफ अमेरिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनोमिक टाइम्स, फिल्मफेयर और इलस्ट्रेटेड वीकली में प्रमुख पदों पर रहने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड के संस्थापक संपादक भी रह चुके हैं। प्रेस की नियामक संस्था &#8216;भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य रहने के अलावा मजीठिया वेतन बोर्ड और मणिसाना वेतन बोर्ड के सदस्य के तौर पर पत्रकारों के हित में लंबा संघर्ष किया है। <span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के.विक्रम राव</a>,</span> फिलहाल इंडियन फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट #IFWJ के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। )</strong></span></div>
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		<title>कौन हैं जस्टिस एनवी रमण! एक पत्रकार जो बनेगा भारत का प्रधान न्यायाधीश</title>
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		<pubDate>Thu, 01 Apr 2021 10:55:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>बतौर पत्रकार शुरू किया था करियर  नागरिक स्वतंत्रता की इनकी पक्षधरता मई 1975 से ही दृढ़तर होती गयी। तब यह 18—वर्षीय युवा अविभाजित आंध्र—प्रदेश के कृष्णा जिला के अपने गांव पोन्नवरम में एक जनसभा को संबोधित करने के बाद घर आया। पिता ने उसे तत्काल मामा के शहर रवाना कर दिया। एक अतिरिक्त जोड़ा कपड़ा &#8230;</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
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				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>छात्र नेता और श्रमजीवी पत्रकार रहा एक किसान का बेटा चौंसठ वर्षीय नूतलपाटि वेंकट रमण भारत का 48वां प्रधान न्यायाधीश नामित हो गया है। 24 अप्रैल 2021 को यह तेलुगुभाषी विधिवेत्ता सर्वोच्च न्यायालय में नया पद संभालेंगे। इनका ताजातरीन निर्णय बड़ा जनवादी था। कश्मीर घाटी में इन्टरनेट पर से पाबंदियों को समाप्त करना। कारण बताया कि संवाददाता पर दबाव नहीं थोपना चाहिये।
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<p><span style="color: #ff0000;"><strong>बतौर पत्रकार शुरू किया था करियर </strong></span><br />
नागरिक स्वतंत्रता की इनकी पक्षधरता मई 1975 से ही दृढ़तर होती गयी। तब यह 18—वर्षीय युवा अविभाजित आंध्र—प्रदेश के कृष्णा जिला के अपने गांव पोन्नवरम में एक जनसभा को संबोधित करने के बाद घर आया। पिता ने उसे तत्काल मामा के शहर रवाना कर दिया। एक अतिरिक्त जोड़ा कपड़ा ले जाने को कहा। दस रुपये दिये। बस में बैठाया। उसी शाम प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत पर आपातकाल थोप दिया था। जेल भरायी चालू हो गई थी। किसान पिता को भनक लग गयी थी कि सत्ता—विरोधी और लोकतंत्र—समर्थक पुत्र को पुलिस शीघ्र ही कैद में डाल देगी। युवा वेंकट रमण को इस बात का गिला था कि उसे यात्रा के लिये मिले दस रुपये कम पड़ गये थे। मगर अपने लोकतंत्र बचाओ अभियान हेतु उन्हें समय पर्याप्त मिला। संघर्षरत रहे। अपने इस उद्देश्य से वे फिर कभी नहीं डिगे, कभी नहीं मुड़े। कानून की डिग्री लेकर जीविकोपार्जन के लिये बहुप्रसारित तेलुगु दैनिक &#8221;ईनाडु&#8221; में दो वर्ष संपादकीय काम किया। फिर वकालत। प्रगति ऐसी रही कि यह ग्रामीण युवा दिल्ली उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश बना। और उच्चतम न्यायालय के जज बने। तार्किक चरोमोत्कर्ष था। अब शीर्ष पद के समीप हैं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>इन फैसलों से बनी अगल पहचान </strong></span><br />
जज रमण साहब का एक विलक्षण आदेश था कि गृहणियों को भी उचित पारिश्रमिक मिले ताकि वे सब घरेलू श्रम पर मुआवजा पायें। वे बोले कि ग्रामीण महिलाओं को तो पशु चराना, खेत में हल चलाना, पौधा रोपण आदि भी करना पड़ता है। इस श्रम के मेहनताना की वे सुंसगत हकदार हैं। कर्नाटक के दलबदलू विधायकों वाली याचिका पर जज रमण ने संविधान के दसवें अनुच्छेद को कारगर बनाने का सुझाव दिया था। उनकी राय में विधानसभा के अध्यक्ष के पक्षपातपूर्ण रुख से मतदाताओं को ईमानदार सरकार नहीं मिल पा रही है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>विवादों से नाता</strong></span><br />
यूं भारत के प्रधान न्यायाधीश पर नियुक्ति सदैव विवाद से मुक्त नहीं रही। न्यायमूर्ति एएन राय को चन्द घंटों की सूचना पर ही प्रधान न्यायाधीश नियुक्त किया गया था। तीन अन्य वरिष्ठ जजों को पदावनत किया गया था। न्यायमूर्ति मिर्जा मोहम्मद हमीदुल्ला बेग को तो चन्द घंटों में प्रधान न्यायाधीश बनाया गया। प्रधानमंत्री पद से हटने (जनवरी 1977) के चन्द दिन पूर्व ही इन्दिरा गांधी ने यह करतब किया था। न्यायमूर्ति बहरुल इस्लाम को राज्यसभा में नामित किया गया ताकि कांग्रेसी मुख्यमंत्री डा. जगन्नाथ मिश्र को भ्रष्टाचार के अपराध से बचाया जा सके। यह समस्त अजूबे इन्दिरा गांधी शासन के दौर के है। महान प्रधान न्यायाधीशों की भी परम्परा रही कि वे सरकारों को गलत गिरफ्तारी पर फटकारते भी रहे। मोहम्मद हिदायतुल्लाह ने मुंगेर जेल से मधु लिमये द्वारा लिखे पोस्टकार्ड को बंदी प्रस्तुतिकरण याचिका मानकर बिहार सरकार को उन्हें रिहा करने का आदेश दिया था। प्रधान न्यायमूर्ति प्रफुल्लचन्द्र भगवती ने जनहित याचिका के रुप में सशक्त अधिकार ही प्रदान कर दिया था।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>बेदाग निकले रमन्ना </strong></span><br />
इसी प्रकार न्यायमूर्ति रमण के नियुक्ति पर भी एक अनावश्यक विवाद आंध्र के मुख्यमंत्री वाई.एस. जगनमोहन रेड्डि ने अपने शिकायती पत्र से खड़ा किया। प्रधान न्यायाधीश शरद अरविन्द बोबडे ने उसे निराधार बताकर खारिज कर दिया। आरोप था कि न्यायमूर्ति रमण की पुत्रियों ने नई राजधानी अमरावती में महंगी भूमि सस्ते में खरीदी। जगन मोहन रेड्डि स्वयं 31 मुकदमों का सामना कर रहें हैं। इनमें ग्यारह सीबीआई द्वारा हैं, छह केन्द्रीय प्रवर्तन निदेशालय द्वारा और 18 पुलिस विभाग द्वारा दर्ज हैं। जांच चल रही है। सभी भ्रष्टाचार से संबंधित हैं। उनके पिता स्व. डा. वाई.एस. राजशेखर रेड्डि के खिलाफ अकूत धनराशि कमाने का अभियोग लगा था। दैनिक &#8221;साक्षी&#8221; अखबार और खनन तथा भूमि से वे सब संबंधित थे। सत्तारुढ़ कांग्रेस सांसद एपी शंकर राव की याचिका पर तो आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने (10 अगस्त 2011) इनके मुख्यमंत्री पिता (राजशेखर) के खिलाफ सीबीआई जांच का निर्देश भी दे डाला था। बेटे को विरासत में ऐसे ही भ्रष्टाचार के मुकदमें मिले है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>जनप्रतिनिधियों के लिए शुरू की अलग अदालत </strong></span><br />
ऐसे बेहूदे आरोप वाली बात समझ में आती है क्योंकि न्यायमूर्ति रमण भ्रष्ट राजनेताओं के कोप के शिकार हो गये हैं। उनके एक अति महत्वपूर्ण निर्णय के फलस्वरुप सांसद तथा विधायकों के लिये विशेष अदालत गठित की जा चुकी है, जिसमें फैसलें बिना देर के दिये जायेंगे। इस आदेश के तुरंत बाद आंध्र प्रदेश शासन ने जगनमोहन रेड्डि के विरुद्ध चल रहे मुकदमों की वापसी शुरु कर दी। मगर यह प्रयास खत्म करना पड़ा। मुख्यमंत्री रुष्ट भी हो गये। जज रमण के इसी निर्देश का प्रभाव यूपी के विधायकों पर भी पड़ा। उनका निर्णय था कि सांसदों तथा विधायकों को मिले स्थगनादेश की पुनर्समीक्षा हो। निरस्त कराये जाये। निर्णय शीघ्र हो।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>स्वागत है चीफ </strong></span><br />
जज रमण का मत स्पष्ट है कि मूलाधिकारों की रक्षा हेतु जमानत याचिका पर राहत का फैसला सम्यक हो, त्वरित हो। आतंक और अवैध अपराधिक कानूनों के तहत यह स्वीकार्य नहीं हो सकता है कि जमानत पर रिहाई नहीं की जा सकती है। उनका यह निर्देश हम श्रमजीवी पत्रकारों को दिलासा दिलाता है कि : &#8221;उत्तरदायी सरकारों का दायित्व है कि वे प्रेस स्वाधीनता पर अंकुश लगाने से बाज आयें।&#8221; अर्थात संविधान की धारा 19 में निहित अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के जनवादी अधिकारों के सर्वोच्च प्रहरी के रुप में न्यायमूर्ति नूतलपाटि वेंकट रमण अब नये इतिहास रचने आयें हैं। मीडिया द्वारा स्वागत होगा।</p>
<p><strong>लेखक: के. विक्रम राव, राष्ट्रीय अध्यक्ष, फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट इंडिया  </strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>(द इनसाइड स्टोरी परिवार के संरक्षक के. विक्रम राव का शुमार देश के नामचीन पत्रकारों में होता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उन्होंने इमरजेंसी तक में स्वतंत्र आवाज के लिए जेल यात्रा की। महीनों की सजाएं भुगती। श्री राव,  वॉयस ऑफ अमेरिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनोमिक टाइम्स, फिल्मफेयर और इलस्ट्रेटेड वीकली में प्रमुख पदों पर रहने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड के संस्थापक संपादक भी रह चुके हैं। प्रेस की नियामक संस्था &#8216;भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य रहने के अलावा मजीठिया वेतन बोर्ड और मणिसाना वेतन बोर्ड के सदस्य के तौर पर पत्रकारों के हित में लंबा संघर्ष किया है।)</strong></span></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/who-is-justice-n-v-ramana-48th-chief-justice-of-india/5987/">कौन हैं जस्टिस एनवी रमण! एक पत्रकार जो बनेगा भारत का प्रधान न्यायाधीश</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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