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	<title>Kamleshwar Archives - TIS Media</title>
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	<description>हर अक्षर सच, हर खबर निष्पक्ष </description>
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	<title>Kamleshwar Archives - TIS Media</title>
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		<title>कामरेड&#8230; आज की कहानी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[tismedia.in]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 04 Jul 2021 09:47:09 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Art and Literature]]></category>
		<category><![CDATA[Editorial]]></category>
		<category><![CDATA[Top Stories]]></category>
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		<category><![CDATA[Comrade Story]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>~कमलेश्वर &#8211;लाल हिन्द, कामरेड!&#8211;एक दूसरे कामरेड ने मुक्का दिखाते हुए कहा। लाल हिन्द&#8211;कहकर उन्होंने भी अपना मुक्का हवा में चला दिया। मैं चौंका, और वैसे भी लोग कामरेड़ों का नाम सुन कर चौंकते हैं! वास्तव में किसी हद तक यह सत्य भी है कि कामरेड की &#8216;रेड&#8217; से सरकार तक चौंक जाती है। इनकी &#8216;रेड&#8217; &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/comrade-story-by-kamleshwar/9668/">कामरेड&#8230; आज की कहानी</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="color: #ff0000;">~कमलेश्वर</span></h4>
<p>&#8211;लाल हिन्द, कामरेड!&#8211;एक दूसरे कामरेड ने मुक्का दिखाते हुए कहा। लाल हिन्द&#8211;कहकर उन्होंने भी अपना मुक्का हवा में चला दिया। मैं चौंका, और वैसे भी लोग कामरेड़ों का नाम सुन कर चौंकते हैं!</p>
<p>वास्तव में किसी हद तक यह सत्य भी है कि कामरेड की &#8216;रेड&#8217; से सरकार तक चौंक जाती है। इनकी &#8216;रेड&#8217; भी बड़े मजे की होती है, &#8216;रेड&#8217; की पहली मंजिल में ये हड़ताल, दूसरी में मारपीट, तीसरी में अनशन, चौथी में जेल-यात्रा तक की धमकी देते हैं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/gango-ka-jaya-story-by-bhisham-sahni/9630/"><strong>गंगो का जाया&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>मैं इस शहर में नया-नया ही पहुँचा था, बहुत कठिनाई से एक कमरा इस मुहल्ले में पा सका। दूसरे दिन ही देखा कि तमाम खद्दरधारियों का ताँता इस मुहल्ले में, ख़ास कर मेरी पतली-सी सँकरी गली में लगा रहता। अनुमान लगाया सम्भवत: कांग्रेस की किसी सभा का आयोजन हो रहा है, इस कारण कार्यकर्ता-लोगों की दौड़-धूप मची रहती है। लगभग एक महीना बीत जाने पर किसी विशेष सभा आदि की बात नहीं सुनाई दी। एक दिन मैंने साहस करके एक कामरेड को रोककर पूछा&#8211; श्रीमान, आप लोग यहां दिन भर क्यों चक्कर काटते हैं?</p>
<p>पहले तो वे कुछ नाराज़ से हुए, फिर बड़ी अदा से अपने पतले से रूखे बालों पर हाथ फेरकर बोले&#8211; आप शायद नए-नए यहां आए हैं।</p>
<p>&#8212; जी हां।&#8211;मैंने कहा।<br />
&#8212; तभी । आपका मकान कौन-सा है? &#8211;उन्होंने पूछा ।<br />
&#8212; वह! &#8211;मैंने इशारा करके उन्हें बता दिया।<br />
&#8212; यहां य़ह आपके मकान की बगल में हमारी पार्टी का &#8216;प्रॉविंशियल&#8217; ऑफिस है।<br />
&#8212; क्षमा कीजिएगा म़ुझे मालूम न था &#8211;मैं बोला&#8211; अच्छा नमस्ते।<br />
&#8211;अजी नमस्ते हो जाएगी, लेकिन आप करते क्या हैं? &#8211;कुछ ज़बरदस्ती-सी करते हुए वह बोले।<br />
&#8212; मैं तो विद्यार्थी हूँ।<br />
&#8211;अच्छा त़ो कभी-कभी मिला कीजिएगा, यहां ऑफ़िस में आ जाया कीजिए। कभी-कभी क़ुछ &#8216;पार्टी लिटरेचर&#8217; का अध्ययन कर लिया कीजिए।<br />
&#8211;धन्यवाद!</p>
<p>&#8211;अच्छा, लाल हिन्द &#8211;कहकर उन्होंने मेरे ऊपर मुक्का तान दिया। मैंने डरते-डरते दोनों करबद्ध करके अपनी अहिंसात्मक प्रवृत्ति का परिचय दिया।</p>
<p>मेरा जिन कामरेड से परिचय हुआ उनका पूरा नाम था कामरेड सत्यपाल। वे भी वहीं प्रान्तीय ऑफिस में डेरा डाले थे। किसी लिमिटेड कम्पनी में एजेंट थे। काम रहता था घूमने-फिरने का, इस कारण समाज-सेवा का व्रत लेने में कठिनाई न थी। पिताजी उनके यद्यपि रहते थे इसी शहर में और सम्भवत: हाईकोर्ट में दफ़्तरी थे, परन्तु उनको कुछ शर्म आती थी अपने पिता के साथ रहने में और इसी कारण उनसे किनारा करके यहां आ बसे थे।</p>
<p>सात बजे का भोंपू बज चुका था, दीवारों पर सूरज की किरणें पड़ने लगीं थीं। दूध लेने वाले अपने-अपने लोटे ले-लेकर घर से बाहर निकल चुके थे, गंगा-स्नान को जाने वाली यात्रियों की टोलियां मिलिटरी की भाँति पंक्ति में एक के पीछे एक गंगा मइया के नारे बुलन्द करती जा रही थीं। मोटे-पतले बेचारे अपनी-अपनी पेंट सम्भालते हाथ में टिफ़िन कैरियर लिए पुल की ओर बेतहाशा दौड़े चले जा रहे थे। धर्मशाला में चहल-पहल आरम्भ हो गई थी। नुक्कड़ के मिठाई वाले ने पत्थर के कोयले की अंगीठी सुलगा कर, जलेबी बनाने के लिए कड़ाही चढ़ाकर डालडा का पीपा उलट दिया था। पास बैठा, मैला-सा अंगोछा लपेटे नौकर बासी चाशनी में पड़े चींटे और मक्खियां बीन-बीन कर फेंक रहा था, पर हमारे कामरेड बारजे के एक पतले कोने में चादर लपेटे अच्छा ख़ासा पार्सल बने अपनी पांचवी नींद पूरी कर रहे थे। धीरे-धीरे सुबह से दौड़ते अख़बार वालों की चहल-पहल समाप्त हुई और रात भर से बन्द दुकानों के दरवाजे चरमरा कर खुलने आरम्भ हुए तो उन्होंने एक करवट बदली और यह सिद्ध किया कि उनमें अभी जान बाकी थी। थके घोड़े की भांति तीन-चार बार लोट लगा कर उन्होंने अपनी चादर केवल गर्दन तक हटा कर सिर खोला, नज़र आई केवल लम्बी-लम्बी रूखी जटाएं, जैसे कलकत्ते से आने वाले किसी व्यक्ति ने अपने &#8216;होलडोल&#8217; (होल्ड आल) में से नारियल निकाल दिया हो, और फिर उन्होंने वहीं से आवाज़ लगाई&#8211; इलाही!</p>
<p>&#8212; जी &#8211;इलाही ने भीतर से उत्तर दिया।<br />
&#8212; टी! कुछ अलसाये से वह बोले ।</p>
<p>&#8212; दूध नहीं हैं। &#8212; क्यों, क्या डेरी वाला अभी तक नहीं आया? तो आज से उससे मना करा दो, इतनी देर में दूध नहीं चाहिए, कल से न आए।</p>
<p>&#8212; उसने तो कल से ही देना बन्द कर दिया है प़न्द्रह दिन का हिसाब साफ़ करने को कह रहा था। &#8211;इलाही ने भीतर से कहा।<br />
&#8212; बकता है, पहली तारीख़ को डेढ़ रूपया दिया था, कल उससे हिसाब करके जो कुछ निकले तुम रख लेना और कल से दूध बन्द।<br />
&#8212; आज सत्ताइस तारीख हो गई। पहली तारीख को डेढ़ रूपया दिया था। हिसाब करके तुम रख लेना।<br />
कहकर इलाही खट-खट करता नीचे उतर गया ।</p>
<p>पाख़ाना जाने की किसे फुर्सत, खद्दर का कुर्ता चढ़ाकर, हाथ में पुराना अख़बार दबा कर उलझे हुए कामरेड नीचे उतर कर धर्मशाला के पास खड़े रिक्शे वालों के मजमें में समा गए। एक से बोले&#8211; क्यों इतवारी! उस दिन जो तुम्हारा रिक्शा &#8216;बस्ट&#8217; हुआ था उसे जुड़वाने के दाम मालिक ने ही दिए थे?</p>
<p>वह जवाब भी न दे पाया था कि कामरेड दूसरे से बोल पड़े&#8211; क्यों मंगू! उस साहब से चौक से यहां तक का एक रूपया वसूल कर पाया था नहीं । या सिर्फ चवन्नी ही दी उसने।</p>
<p>&#8212; अरे भइया सिरफ़ चवन्नी दी उसने ब़ड़ा जालिम था।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/deputy-collectory-story-by-amarkant/9593/"><strong>डिप्टी-कलक्टरी&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>&#8212; इन जालिमों के अत्याचार मिटाने को तुम्हें संगठित होना पड़ेगा, अपने हक के लिए तुम्हें लड़ना पड़ेगा. . .तुम्हारी क्या औक़ात है, क्या हस्ती है इसे तुम नहीं जानते। इनसे लड़ने को, अपनी मज़दूरी पूरी लेने को, अपने सड़ते बीवी-बच्चों, उनकी भूखी आत्माओं को शान्त करने के लिए, भर-पेट अन्न पाने के लिए तुम्हें ख़ून-पसीना एक करना होगा, एक साथ सबको खड़ा होना चाहिए स़बकी एक आवाज़ हो, एक मांग हो। अपनी ताकत को पहचानो! कल ही एक रिक्शा-मज़दूर यूनियन बनाओ। परसों से सारे शहर में हड़ताल कर दो। मैं और मेरे साथी तुम्हारा साथ देंगे। अपनी मांगों के परचे छपवाओ, सबसे चार-चार आने जमा कर लो, ये सब तुम लोगों के काम आएंगे। लेकिन बहुत जल्दी करो। अच्छा, अब मैं चलता हूँ। काम बहुत है। बिजली घर के मज़दूर मेरी राह देख रहे होंगे। तुम आज शाम को चन्दे का काम पूरा करके मुझ से मिल लेना सामने ऑफ़िस में! अच्छा साथियों लाल हिंद! &#8211;कहकर बड़ी तेज़ी से कामरेड सत्यपाल अपने कमरे में आकर पड़ी चादर को धीरे-धीरे तह करने लगे।</p>
<p>दस बजे के लगभग कामरेड अपना बिजलीघर वाला काल्पनिक काम समाप्त करने को, खद्दर का पजामा-कुरता पहने, हैंडबैग दबाये, &#8216;बाटा&#8217; चप्पलें फड़फड़ाते उलझे से उतर पड़े और फटर-फटर करते शहर की ख़ास-ख़ास सड़कों, दीवारों पर दवाइयों, पेन बाम और सिनेमा के विज्ञापन पढ़ते &#8211; &#8216;डाक बंगला&#8217; वास्ती, सुरैया त़ीन मैटनी, साढ़े दस, एक व तीन बजे शाम को रीजेंट थियेटर में &#8211; जैसे थके-मांदे फुटपाथ से होते-होते &#8216;वाटर-वर्क्स&#8217; के फाटक से जा टकराए। चपरासी से बोले&#8211; क्यों भाई ।</p>
<p>&#8212; कहाँ जाना चाहते हैं साहब! अन्दर जाने का हुक्म नहीं हैं। &#8211;फाटक पर खड़े चपरासी ने पूछते हुए कोरा-सा ज़वाब दिया।</p>
<p>थकान से चूर बेचारे सामने के बाग में जा कर लान पर बैठकर &#8216;हिन्द में लाल क्रान्ति&#8217; की रूपरेखा बनाते-बनाते, हैंडबैग का तकिया लगा कर सो गए। शाम को जब ऑफ़िस लौटे तो मंगू को बैठे पाया, तपाक से बोले&#8211; क्या बताऊं, &#8216;वाटर वर्क्स&#8217; में बड़ी धांधली है, सबके सब पीछे पड़ गए&#8230; ऐसा उलझाते हैं कि छोड़ते ही नहीं द़ेर तो नहीं हुई तुम्हें आए।</p>
<p>&#8212; नहीं भइया, आज तुम्हारी जोश की बातों ने हममें जान डाल दी, यह छ: रूपए जमा कर लिए हैं, इन्हें रखकर कल से आप हमारा काम शुरू कर दीजिए और कल ही हम फिर कुछ और जमा कर लेंगे।</p>
<p>&#8212; अच्छा-अच्छा ठीक है, लाओ। पन्द्रह दिन में देखो क्या उलट-पुलट होती है&#8230; आज तारीख़ है सत्ताइस! ठीक है। यह पूँजीवादी सरकार पन्द्रह तारीख को आज़ादी की सालगिरह मनाने जा रही है जबकि हमारे गरीब मज़दूरों की मौत की सालगिरह मन रही हैं। मैं कल फिर तुमसे मिलूंगा! अच्छा, अभी तो मुझे प्रेस जाना है, कुछ खास &#8216;ख़बर&#8217; निकलवानी है। अच्छा चलूँ, लाल हिन्द!</p>
<p>फिर वे दौड़े-दौड़े पान वाले की दुकान पर पहुँचे और बड़े गर्व से बोले&#8211; हां जी श्यामलाल, तुम्हारा कितना पैसा बाकी है।</p>
<p>&#8212; चार रूपये तीन आने!<br />
&#8212; मुझे तो हिसाब याद नहीं, ख़ैर तुम्हारे विश्वास पर, यह लो चार रूपये&#8230; तीन आने फिर कभी&#8230; अरे कल ही लेना।</p>
<p>&#8212; बहुत अच्छा साहब। &#8211;कहकर उसने चार रूपए सन्दूकची में डाल दिए। रिक्शा किया प्रेस पहुँचे। रिक्शे वाले को रूपये का नोट देते बोले&#8211; लाओ, ग्यारह आने लौटाओ।</p>
<p>&#8212; बाबू, आठ आने हुए यहां तक के।</p>
<p>&#8212; शर्म नहीं आती आठ आने मांगते, कुल दो मील तो प्रेस है&#8230; लाओ ग्यारह आने वापिस करो, टकसाल लगा रखी है क्या जो पैसे बना-बनाकर तुम्हें लुटाया करूँ?</p>
<p>&#8212; आठ आना मजूरी है बाबू&#8230; कोई ज्यादा नहीं मांगे।<br />
&#8212; अच्छा-अच्छा, ला दस आने लौटाल।<br />
&#8212; बड़े जालिम हो बाबू, गरीब का पेट काटते हो। &#8211;रिक्शेवाले ने पैसे देते हुए कहा।<br />
&#8212; गरीब में नौ मन चर्बी होती है! &#8211;और पैसे गिनते-गिनते कामरेड प्रेस में घुस गए। छ: रूपये में से एक रूपया दस आना शेष था।<br />
भीतर पहुँच कर बड़े शिष्टाचार से सम्पादक जी से बोले&#8211; एक विशेष समाचार छापना है।<br />
&#8212; स्थान तो रिक्त नहीं हैं, पर समाचार क्या है? &#8211;सम्पादक बोले।<br />
&#8212; कामरेड सत्यपाल का एक विशेष उल्लेखनीय समाचार है।<br />
&#8212; क्षमा कीजियेगा। चौथे पृष्ठ पर विज्ञापन के कालम खाली है, उन्हीं में विज्ञापन की दर पर छप सकेगा।<br />
&#8212; बड़ी कृपा होगी यदि आप ऐसे ही छाप दें।<br />
&#8212; असमर्थता है मित्र, केवल दो रूपए पड़ेंगे, विज्ञापन की दर पर जाएगा।<br />
&#8212; अच्छा डेढ़ रूपया रखिए, धन्यवाद।</p>
<p>थोड़ी देर बाद कामरेड अपने कुरते की जेब में हाथ डाले चौकोर दुअन्नी के चारों कानों पर हाथ फेरते प्रसन्न से लौट आए। दूसरे दिन स्थानीय दैनिक में था &#8211;कामरेड सत्यपाल का तूफ़ानी कार्य; रिक्शा मज़दूर यूनियन का जन्म! और कुछ थोड़ा-सा विवरण। और आज सुबह कामरेड पुराने अख़बार के स्थान पर ताजा अख़बार लिए चौथा पृष्ठ ऊपर किए रिक्शेवालों के मजमे में थे।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/corona-ka-sabak-story-by-ravi-shankar-sharma/9546/"><strong>कोरोना का सबक&#8230; बाल कहानी</strong></a></span></p>
<p>धीरे-धीरे काम बढ़ रहा था, दिन निकल रहे थे। सोलह अगस्त था। बेचारे कामरेड पन्द्रह अगस्त के उत्सव के उपलक्ष्य में जाली रसीदें काट-काट कर चन्दा जमा करने के जुर्म में दो सिपाहियों के साथ कोतवाली की ओर चले जा रहे थे तो यूनियन के एक रिक्शेवाले ने देखकर आश्चर्य से पूछा&#8211; कामरेड, यह क्या?</p>
<p>&#8212; अरे भाई! ग़रीबों के लिए जो बोलता है उसका यही हाल होता है, मैं ग़रीबों के लिए बोला, यह अंज़ाम मिला, परन्तु चिन्ता नहीं, ग़रीबों को मिले रोटी तो मेरी जान सस्ती है. . .लाल हिन्द जिन्दाबाद!</p>
<p>और सच्चाई कामरेड की लच्छेदार बातों में दुबक कर रह गई, वह फिर चीख पड़े&#8211;लाल हिन्द जिन्दाबाद!<br />
दो-तीन रिक्शेवाले चीख उठे&#8211; लाल हिन्द ज़िन्दाबाद! कामरेड सत्यपाल ज़िन्दाबाद!! ज़िन्दाबाद!!!</p>
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		<title>दिल्ली में एक मौत&#8230; पढ़िए आज की कहानी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[tismedia.in]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 26 Jun 2021 10:16:56 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>~कमलेश्वर मैं चुपचाप खडा सब देख रहा हूँ और अब न जाने क्यों मुझे मन में लग रहा है कि दीवानचंद की शवयात्रा में कम से कम मुझे तो शामिल हो ही जाना चाहिए था। उनके लडके से मेरी खासी जान-पहचान है और ऐसे मौके पर तो दुश्मन का साथ भी दिया जाता है। सर्दी &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/dilli-mein-ek-maut-story-by-kamleshwar/9424/">दिल्ली में एक मौत&#8230; पढ़िए आज की कहानी</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="color: #ff0000;">~कमलेश्वर</span></h4>
<p><span style="color: #000000;">मैं चुपचाप खडा सब देख रहा हूँ और अब न जाने क्यों मुझे मन में लग रहा है कि दीवानचंद की शवयात्रा में कम से कम मुझे तो शामिल हो ही जाना चाहिए था। उनके लडके से मेरी खासी जान-पहचान है और ऐसे मौके पर तो दुश्मन का साथ भी दिया जाता है। सर्दी की वजह से मेरी हिम्मत छूट रही है&#8230; पर मन में कहीं शवयात्रा में शामिल होने की बात भीतर ही भीतर कोंच रही है।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
चारों तरफ कुहरा छाया हुआ है। सुबह के नौ बजे हैं, लेकिन पूरी दिल्ली धुँध में लिपटी हुई है। सडकें नम हैं। पेड भीगे हुए हैं। कुछ भी साफ दिखाई नहीं देता। जिंदगी की हलचल का पता आवाजों से लग रहा है। ये आवाजें कानों में बस गई हैं। घर के हर हिस्से से आवाजें आ रही हैं। वासवानी के नौकर ने रोज की तरह स्टोव जला दिया है, उसकी सनसनाहट दीवार के पार से आ रही है। बगल वाले कमरे में अतुल मवानी जूते पर पालिश कर रहा है&#8230; ऊपर सरदारजी मूँछों पर फिक्सो लगा रहे हैं&#8230; उनकी खिडकी के परदे के पार जलता हुआ बल्ब बडे मोती की तरह चमक रहा है। सब दरवाजे बंद हैं, सब खिडकियों पर परदे हैं, लेकिन हर हिस्से में जिंदगी की खनक है। तिमंजिले पर वासवानी ने बाथरूम का दरवाजा बंद किया है और पाइप खोल दिया है&#8230;</span></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/balako-ka-chor-story-by-sarat-chandra-chattopadhyay/9367/"><strong>बालकों का चोर&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p><span style="color: #000000;">कुहरे में बसें दौड रही हैं। जूँ-जूँ करते भारी टायरों की आवाजें दूर से नजदीक आती हैं और फिर दूर होती जाती हैं। मोटर-रिक्शे बेतहाशा भागे चले जा रहे हैं। टैक्सी का मीटर अभी किसी ने डाउन किया है। पडोस के डॉक्टर के यहाँ फोन की घंटी बज रही है। और पिछवाडे गली से गुजरती हुई कुछ लडकियाँ सुबह की शिफ्ट पर जा रही हैं।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
सख्त सर्दी है। सडकें ठिठुरी हुई हैं और कोहरे के बादलों को चीरती हुई कारें और बसें हॉर्न बजाती हुई भाग रही हैं। सडकों और पटरियों पर भीड है,पर कुहरे में लिपटा हुआ हर आदमी भटकती हुई रूह की तरह लग रहा है।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
वे रूहें चुपचाप धुँध के समुद्र में बढती जा रही हैं&#8230; बसों में भीड है। लोग ठंडी सीटों पर सिकुडे हुए बैठे हैं और कुछ लोग बीच में ही ईसा की तरह सलीब पर लटके हुए हैं बाँहें पसारे, उनकी हथेलियों में कीलें नहीं, बस की बर्फीली, चमकदार छडें हैं।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
और ऐसे में दूर से एक अर्थी सडक पर चली आ रही है। इस अर्थी की खबर अखबार में है। मैंने अभी-अभी पढी है। इसी मौत की खबर होगी। अखबार में छपा है आज रात करोलबाग के मशहूर और लोकप्रिय बिजनेस मैगनेट सेठ दीवानचंद की मौत इरविन अस्पताल में हो गई। उनका शव कोठी पर ले आया गया है। कल सुबह नौ बजे उनकी अर्थी आर्य समाज रोड से होती हुई पंचकुइयाँ श्मशान-भूमि में दाह-संस्कार के लिए जाएगी।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
और इस वक्त सडक पर आती हुई यह अर्थी उन्हीं की होगी। कुछ लोग टोपियाँ लगाए और मफलर बाँधे हुए खामोशी से पीछे-पीछे आ रहे हैं। उनकी चाल बहुत धीमी है। कुछ दिखाई पड रहा है, कुछ नहीं दिखाई पड रहा है, पर मुझे ऐसा लगता है अर्थी के पीछे कुछ आदमी हैं।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
मेरे दरवाजे पर दस्तक होती है। मैं अखबार एक तरफ रखकर दरवाजा खोलता हूँ। अतुल मवानी सामने खडा है। &#8216;यार, क्या मुसीबत है, आज कोई आयरन करने वाला भी नहीं आया, जरा अपना आयरन देना। अतुल कहता है तो मुझे तसल्ली होती है। नहीं तो उसका चेहरा देखते ही मुझे खटका हुआ था कि कहीं शवयात्रा में जाने का बवाल न खडा कर दे। मैं उसे फौरन आयरन दे देता हूँ और निश्चिंत हो जाता हूँ कि अतुल अब अपनी पेंट पर लोहा करेगा और दूतावासों के चक्कर काटने के लिए निकल जाएगा।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
जब से मैंने अखबार में सेठ दीवानचंद की मौत की खबर पढी थी, मुझे हर क्षण यही खटका लगा था कि कहीं कोई आकर इस सर्दी में शव के साथ जाने की बात न कह दे। बिल्डिंग के सभी लोग उनसे परिचित थे और सभी शरीफ, दुनियादार आदमी थे।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
तभी सरदारजी का नौकर जीने से भडभडाता हुआ आया और दरवाजा खोलकर बाहर जाने लगा। अपने मन को और सहारा देने के लिए मैंने उसे पुकारा, &#8216;धर्मा! कहाँ जा रहा है? &#8216;सरदारजी के लिए मक्खन लेने, उसने वहीं से जवाब दिया तो लगे हाथों लपककर मैंने भी अपनी सिगरेट मँगवाने के लिए उसे पैसे थमा दिए।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
सरदारजी नाश्ते के लिए मक्खन मँगवा रहे हैं, इसका मतलब है वे भी शवयात्रा में शामिल नहीं हो रहे हैं। मुझे कुछ और राहत मिली। जब अतुल मवानी और सरदारजी का इरादा शवयात्रा में जाने का नहीं है तो मेरा कोई सवाल ही नहीं उठता। इन दोनों का या वासवानी परिवार का ही सेठ दीवानचंद के यहाँ ज्यादा आना-जाना था। मेरी तो चार-पाँच बार की मुलाकात भर थी। अगर ये लोग ही शामिल नहीं हो रहे हैं तो मेरा सवाल ही नहीं उठता।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
सामने बारजे पर मुझे मिसेस वासवानी दिखाई पडती हैं। उनके खूबसूरत चेहरे पर अजीब-सी सफेदी और होंठों पर पिछली शाम की लिपस्टिक की हल्की लाली अभी भी मौजूद थी। गाउन पहने हुए ही वे निकली हैं और अपना जूडा बाँध रही हैं। उनकी आवाज सुनाई पडती है, &#8216;डार्लिंग, जरा मुझे पेस्ट देना, प्लीज&#8230;</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
मुझे और राहत मिलती है। इसका मतलब है कि मिस्टर वासवानी भी मैयत में शामिल नहीं हो रहे हैं।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
दूर आर्य समाज रोड पर वह अर्थी बहुत आहिस्ता-आहिस्ता बढती आ रही है&#8230;</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
अतुल मवानी मुझे आयरन लौटाने आता है। मैं आयरन लेकर दरवाजा बंद कर लेना चाहता हूँ, पर वह भीतर आकर खडा हो जाता है और कहता है, &#8216;तुमने सुना, दीवानचंदजी की कल मौत हो गई है।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
&#8216;मैंने अभी अखबार में पढा है, मैं सीधा-सा जवाब देता हूँ, ताकि मौत की बात आगे न बढे। अतुल मवानी के चेहरे पर सफेदी झलक रही है, वह शेव कर चुका है। वह आगे कहता है, &#8216;बडे भले आदमी थे दीवानचंद।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
यह सुनकर मुझे लगता है कि अगर बात आगे बढ गई तो अभी शवयात्रा में शामिल होने की नैतिक जिम्मेदारी हो जाएगी, इसलिए मैं कहता हूँ, &#8216;तुम्हारे उस काम का क्या हुआ?</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
&#8216;बस, मशीन आने भर की देर है। आते ही अपना कमीशन तो खडा हो जाएगा। यह कमीशन का काम भी बडा बेहूदा है। पर किया क्या जाए? आठ-दस मशीनें मेरे थ्रू निकल गईं तो अपना बिजनेस शुरू कर दूँगा। अतुल मवानी कह रहा है, &#8216;भई, शुरू-शुरू में जब मैं यहाँ आया था तो दीवानचंदजी ने बडी मदद की थी मेरी। उन्हीं की वजह से कुछ काम-धाम मिल गया था। लोग बहुत मानते थे उन्हें।</span></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/bhikharin-story-by-rabindranath-tagore/9318/"><strong>भिखारिन&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p><span style="color: #000000;">फिर दीवानचंद का नाम सुनते ही मेरे कान खडे हो जाते हैं। तभी खिडकी से सरदारजी सिर निकालकर पूछने लगते हैं, &#8216;मिस्टर मवानी! कितने बजे चलना है?</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
&#8216;वक्त तो नौ बजे का था, शायद सर्दी और कुहरे की वजह से कुछ देर हो जाए। वह कह रहा है और मुझे लगता है कि यह बात शवयात्रा के बारे में ही है।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
सरदारजी का नौकर धर्मा मुझे सिगरेट देकर जा चुका है और ऊपर मेज पर चाय लगा रहा है। तभी मिसेज वासवानी की आवाज सुनाई पडती है, &#8216;मेरे खयाल से प्रमिला वहाँ जरूर पहुँचेगी, क्यों डार्लिंग?</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
&#8216;पहुँचना तो चाहिए। &#8230;तुम जरा जल्दी तैयार हो जाओ। कहते हुए मिस्टर वासवानी बारजे से गुजर गए हैं।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
अतुल मुझसे पूछ रहा है, &#8216;शाम को कॉफी-हाउस की तरफ आना होगा?</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
&#8216;शायद चला आऊँ, कहते हुए मैं कम्बल लपेट लेता हूँ और वह वापस अपने कमरे में चला जाता है। आधे मिनट बाद ही उसकी आवाज फिर आती है, &#8216;भई, बिजली आ रही है? मैं जवाब दे देता हूँ, &#8216;हाँ, आ रही है। मैं जानता हूँ कि वह इलेक्ट्रिक रॉड से पानी गर्म कर रहा है, इसीलिए उसने यह पूछा है।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
&#8216;पॉलिश! बूट पॉलिश वाला लडका हर रोज की तरह अदब से आवाज लगाता है और सरदारजी उसे ऊपर पुकार लेते हैं। लडका बाहर बैठकर पॉलिश करने लगता है और वह अपने नौकर को हिदायतें दे रहे हैं, &#8216;खाना ठीक एक बजे लेकर आना।&#8230; पापड भूनकर लाना और सलाद भी बना लेना&#8230;। मैं जानता हूँ सरदारजी का नौकर कभी वक्त से खाना नहीं पहुँचाता और न उनके मन की चीजें ही पकाता है।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
बाहर सडक पर कुहरा अभी भी घना है। सूरज की किरणों का पता नहीं है। कुलचे-छोलेवाले वैष्णव ने अपनी रेढी लाकर खडी कर ली है। रोज की तरह वह प्लेटें सजा रहा है, उनकी खनखनाहट की आवाज आ रही है।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
सात नंबर की बस छूट रही है। सूलियों पर लटके ईसा उसमें चले जा रहे हैं और क्यू में खडे और लोगों को कंडक्टर पेशगी टिकट बाँट रहा है। हर बार जब भी वह पैसे वापस करता है तो रेजगारी की खनक यहाँ तक आती है। धँध में लिपटी रूहों के बीच काली वर्दी वाला कंडक्टर शैतान की तरह लग रहा है।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
और अर्थी अब कुछ और पास आ गई है।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
&#8216;नीली साडी पहन लूँ? मिसेज वासवानी पूछ रही हैं।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
वासवानी के जवाब देने की घुटी-घुटी आवाज से लग रहा है कि वह टाई की नॉट ठीक कर रहा है।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
सरदारजी के नौकर ने उनका सूट ब्रुश से साफ करके हैंगर पर लटका दिया है। और सरदारजी शीशे के सामने खडे पगडी बाँध रहे हैं।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
अतुल मवानी फिर मेरे सामने से निकला है। पोर्टफोलियो उसके हाथ में है। पिछले महीने बनवाया हुआ सूट उसने पहन रखा है। उसके चेहरे पर ताजगी है और जूतों पर चमक। आते ही वह मुझे पूछता है, &#8216;तुम नहीं चल रहे हो? और मैं जब तक पूछूँ कि कहाँ चलने को वह पूछ रहा है, वह सरदारजी को आवाज लगाता है, &#8216;आइए, सरदारजी! अब देर हो रही है। दस बज चुका है।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
दो मिनट बाद ही सरदारजी तैयार होकर नीचे आते हैं कि वासवानी ऊपर से ही मवानी का सूट देखकर पूछता है, &#8216;ये सूट किधर सिलवाया?</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
&#8216;उधर खान मार्केट में।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
&#8216;बहुत अच्छा सिला है। टेलर का पता हमें भी देना। फिर वह अपनी मिसेज को पुकारता है, &#8216;अब आ जाओ, डियर!&#8230; अच्छा मैं नीचे खडा हूँ तुम आओ। कहता हुआ वह भी मवानी और सरदारजी के पास आ जाता है और सूट को हाथ लगाते हुए पूछता है, &#8216;लाइनिंग इंडियन है।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
&#8216;इंग्लिश!</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
&#8216;बहुत अच्छा फिटिंग है! कहते हुए वह टेलर का पता डायरी में नोट करता है। मिसेज वासवानी बारजे पर दिखाई पडती हैं।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
अर्थी अब सडक पर ठीक मेरे कमरे के नीचे है। उसके साथ कुछेक आदमी हैं, एक-दो कारें भी हैं, जो धीरे-धीरे रेंग रही हैं। लोग बातों में मशगूल हैं।</span></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/bahadur-story-by-amarkant/9282/"><strong>बहादुर&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p><span style="color: #000000;">मिसेज वासवानी जूडे में फूल लगाते हुए नीचे उतरती हैं तो सरदारजी अपनी जेब का रुमाल ठीक करने लगते हैं। और इससे पहले कि वे लोग बाहर जाएँ वासवानी मुझसे पूछता है, &#8216;आप नहीं चल रहे?</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
&#8216;आप चलिए मैं आ रहा हूँ मैं कहता हूँ पर दूसरे ही क्षण मुझे लगता है कि उसने मुझसे कहाँ चलने को कहा है? मैं अभी खडा सोच ही रहा रहा हूँ कि वे चारों घर के बाहर हो जाते हैं। अर्थी कुछ और आगे निकल गई है। एक कार पीछे से आती है और अर्थी के पास धीमी होती है। चलाने वाले साहब शवयात्रा में पैदल चलने वाले एक आदमी से कुछ बात करते हैं और कार सर्र से आगे बढ जाती है। अर्थी के साथ पीछे जाने वाली दोनों कारें भी उसी कार के पीछे सरसराती हुई चली जाती हैं।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
मिसेज वासवानी और वे तीनों लोग टैक्सी स्टैंड की ओर जा रहे हैं। मैं उन्हें देखता रहता हूँ। मिसेज वासवानी ने फर-कालर डाल रखा है। और शायद सरदारजी अपने चमडे के दास्ताने पहने हैं और वे चारों टैक्सी में बैठ जाते हैं। अब टैक्सी इधर ही आ रही है और उसमें से खिलखिलाने की आवाज मुझे सुनाई पड रही है। वासवानी आगे सडक पर जाती अर्थी की ओर इशारा करते हुए ड्राइवर को कुछ बता रहा है।&#8230;</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
मैं चुपचाप खडा सब देख रहा हूँ और अब न जाने क्यों मुझे मन में लग रहा है कि दीवानचंद की शवयात्रा में कम से कम मुझे तो शामिल हो ही जाना चाहिए था। उनके लडके से मेरी खासी जान-पहचान है और ऐसे मौके पर तो दुश्मन का साथ भी दिया जाता है। सर्दी की वजह से मेरी हिम्मत छूट रही है&#8230; पर मन में कहीं शवयात्रा में शामिल होने की बात भीतर ही भीतर कोंच रही है।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
उन चारों की टैक्सी अर्थी के पास धीमी होती है। मवानी गर्दन निकालकर कुछ कहता है और दाहिने से रास्ता काटते हुए टैक्सी आगे बढ जाती है।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
मुझे धक्का-सा लगता है और मैं ओवरकोट पहनकर, चप्पलें डालकर नीचे उतर आता हूँ। मुझे मेरे कदम अपने आप अर्थी के पास पहुँचा देते हैं, और मैं चुपचाप उसके पीछे-पीछे चलने लगता हूँ। चार आदमी कंधा दिए हुए हैं और सात आदमी साथ चल रहे हैं सातवाँ मैं ही हूँ।और मैं सोच रहा हूँ कि आदमी के मरते ही कितना फर्क पड जाता है। पिछले साल ही दीवानचंद ने अपनी लडकी की शादी की थी तो हजारों की भीड थी। कोठी के बाहर कारों की लाइन लगी हुई थी&#8230; मैं अर्थी के साथ-साथ लिंक रोड पर पहुँच चुका हूँ। अगले मोड पर ही पंचकुइयाँ श्मशान भूमि है।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
और जैसे ही अर्थी मोड पर घूमती है, लोगों की भीड और कारों की कतार मुझे दिखाई देने लगती है। कुछ स्कूटर भी खडे हैं। औरतों की भीड एक तरफ खडी है। उनकी बातों की ऊँची ध्वनियाँ सुनाई पड रही हैं। उनके खडे होने में वही लचक है जो कनॉट प्लेस में दिखाई पडती है। सभी के जूडों के स्टाइल अलग-अलग हैं। मर्दों की भीड से सिगरेट का धुआँ उठ-उठकर कुहरे में घुला जा रहा है और बात करती हुई औरतों के लाल-लाल होंठ और सफेद दाँत चमक रहे हैं और उनकी आँखों में एक गरूर है&#8230;</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
अर्थी को बाहर बने चबूतरे पर रख दिया गया है। अब खामोशी छा गई है। इधर-उधर बिखरी हुई भीड शव के इर्द-गिर्द जमा हो गई है और कारों के शोफर हाथों में फूलों के गुलदस्ते और मालाएँ लिए अपनी मालकिनों की नजरों का इंतजार कर रहे हैं।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
मेरी नजर वासवानी पर पडती है। वह अपनी मिसेज को आँख के इशारे से शव के पास जाने को कह रहा है और वह है कि एक औरत के साथ खडी बात कर रही है। सरदारजी और अतुल मवानी भी वहीं खडे हुए हैं।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
शव का मुँह खोल दिया गया है और अब औरतें फूल और मालाएँ उसके इर्द-गिर्द रखती जा रही हैं। शोफर खाली होकर अब कारों के पास खडे सिगरेट पी रहे हैं।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
एक महिला माला रखकर कोट की जेब से रुमाल निकालती है और आँखों पर रखकर नाक सुरसुराने लगती है और पीछे हट जाती है।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
और अब सभी औरतों ने रुमाल निकाल लिए हैं और उनकी नाकों से आवाजें आ रही हैं।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
कुछ आदमियों ने अगरबत्तियाँ जलाकर शव के सिरहाने रख दी हैं। वे निश्चल खडे हैं।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
आवाजों से लग रहा है औरतों के दिल को ज्यादा सदमा पहुँचा है।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
अतुल मवानी अपने पोर्टफोलियो से कोई कागज निकालकर वासवानी को दिखा रहा है। मेरे खयाल से वह पासपोर्ट का फॉर्म है।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
अब शव को भीतर श्मशान भूमि में ले जाया जा रहा है। भीड फाटक के बाहर खडी देख रही है। शोफरों ने सिगरेटें या तो पी ली हैं या बुझा दी हैं और वे अपनी-अपनी कारों के पास तैनात हैं।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
शव अब भीतर पहुँच चुका है।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
मातमपुरसी के लिए आए हुए आदमी और औरतें अब बाहर की तरफ लौट रहे हैं। कारों के दरवाजे खुलने और बंद होने की आवाजें आ रही हैं। स्कूटर स्टार्ट हो रहे हैं। और कुछ लोग रीडिंग रोड, बस-स्टॉप की ओर बढ रहे हैं।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
कुहरा अभी भी घना है। सडक से बसें गुजर रही हैं और मिसेज वासवानी कह रही हैं, &#8216;प्रमिला ने शाम को बुलाया है, चलोगे न डियर? कार आ जाएगी। ठीक है न?</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
वासवानी स्वीकृति में सिर हिला रहा है।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
कारों में जाती हुई औरतें मुस्कराते हुए एक-दूसरे से बिदा ले रही हैं और बाय-बाय की कुछेक आवाजें आ रही हैं। कारें स्टार्ट होकर जा रही हैं।</span></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/bade-ghar-ki-beti-story-by-munshi-premchand/9254/"><strong>बड़े घर की बेटी&#8230; पढ़िए आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p><span style="color: #000000;">अतुल मवानी और सरदारजी भी रीडिंग रोड, बस स्टॉप की ओर बढ गए हैं और मैं खडा सोच रहा हूँ कि अगर मैं भी तैयार होकर आया होता तो यहीं से सीधा काम पर निकल जाता। लेकिन अब तो साढे ग्यारह बज चुके हैं।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
चिता में आग लगा दी गई है और चार-पाँच आदमी पेड के नीचे पडी बैंच पर बैठे हुए हैं। मेरी तरह वे भी यूँ ही चले आए हैं। उन्होंने जरूर छुट्टी ले रखी होगी, नहीं तो वे भी तैयार होकर आते।</span><br />
<span style="color: #000000;"><br />
मेरी समझ में नहीं आ रहा है कि घर जाकर तैयार होकर दफ्तर जाऊँ या अब एक मौत का बहाना बनाकर आज की छुट्टी ले लूँ आखिर मौत तो हुई ही है और मैं शवयात्रा में शामिल भी हुआ हूँ।</span></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/dilli-mein-ek-maut-story-by-kamleshwar/9424/">दिल्ली में एक मौत&#8230; पढ़िए आज की कहानी</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>क़सबे का आदमी&#8230; आज की कहानी</title>
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		<pubDate>Thu, 17 Jun 2021 09:33:12 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>~कमलेश्वर सुबह पाँच बजे गाड़ी मिली। उसने एक कंपार्टमेंट में अपना बिस्तर लगा दिया। समय पर गाड़ी ने झाँसी छोड़ा और छह बजते-बजते डिब्बे में सुबह की रोशनी और ठंडक भरने लगी। हवा ने उसे कुछ गुदगुदाया। बाहर के दृश्य साफ़ हो रहे थे, जैसे कोई चित्रित कलाकृति पर से धीरे-धीरे ड्रेसिंग पेपर हटाता जा &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/kasbe-ka-aadmi-story-by-kamleshwar/9162/">क़सबे का आदमी&#8230; आज की कहानी</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="color: #ff0000;">~कमलेश्वर</span></h4>
<p>सुबह पाँच बजे गाड़ी मिली। उसने एक कंपार्टमेंट में अपना बिस्तर लगा दिया। समय पर गाड़ी ने झाँसी छोड़ा और छह बजते-बजते डिब्बे में सुबह की रोशनी और ठंडक भरने लगी। हवा ने उसे कुछ गुदगुदाया। बाहर के दृश्य साफ़ हो रहे थे, जैसे कोई चित्रित कलाकृति पर से धीरे-धीरे ड्रेसिंग पेपर हटाता जा रहा हो। उसे यह सब बहुत भला-सा लगा। उसने अपनी चादर टाँगों पर डाल ली। पैर सिकोड़कर बैठा ही था कि आवाज़ सुनाई दी, &#8220;पढ़ो पटे सित्तारम स़ित्तारम. . . &#8221;</p>
<p>उसने मुड़कर देखा, तो प्रवचनकर्ता की पीठ दिखाई दी। कोई ख़ास जाड़ा तो नहीं था, पर तोते के मालिक, रूई का कोट, जिस पर बर्फ़ीनुमा सिलाई पड़ी थी और एक पतली मोहरी का पाजामा पहने नज़र आए। सिर पर टोपा भी था और सीट के सहारे एक मोटा-सा सोंटा भी टिका था। पर न तो उनकी शक्ल ही दिखाई दे रही थी और न तोता। फिर वही आवाज़ गूँज उठी, &#8220;पढ़ो पटे सित्तारम सित्तारम. . .&#8221;</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/kabuliwala-story-by-rabindranath-tagore/9139/"><strong>काबुलीवाला&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>सभी लोगों की आँखें उधर ही ताकने लग गईं। आख़िर उससे न रहा गया। वह उठकर उन्हें देखने के लिए खिड़की की ओर बढ़ा। वहाँ तोता भी था और उसका पिंजरा भी, और उसके हाथ में आटे की लोई भी, जिससे वे फुरती से गोलियाँ बनाते जा रहे थे और पक्षी को पुचकार-पुचकारकर खिलाते जा रहे थे। पर तोता पूरा तोता-चश्म ही था। उनकी बार-बार की मिन्नत के बावजूद उसका कंठ नहीं फूटा। गोलियाँ तो वह निगलता जा रहा था, पर ईश्वर का नाम उसकी ज़बान से नहीं फूट रहा था। लौटते में एक नज़र उसने उन पर और डाली, तो लगा, जैसे चेहरा पहचाना हुआ है।</p>
<p>वह अपनी सीट पर आकर बैठ गया। दिमाग़ पर बहुत ज़ोर डाला पर याद नहीं आया। तभी उन्होंने तोते की ओर से दृष्टि हटाकर शिवराज की ओर देखा, अंगूठा और तर्जनी निरंतर एक रफ़्तार से अब भी गोली को शक्ल प्रदान कर रहे थे। माथे पर लहरें डालते हुए और आँखों को गोल कर कुछ अजीब निरीह-सा मुँह बनाकर वे शिवराज को संबोधित करते हुए बोले, &#8220;शिब्बू शिवराज है न तू?&#8221;</p>
<p>और अपना नाम उनके मुँह से सुनते ही उसे सब याद आ गया। ये तो छोटे महराज हैं।</p>
<p>वे जाति के वैश्य थे, पर कर्म के कारण महराज पुकारे जाने लगे थे। म्युनिसिपालिटी की दूकानों के पासवाली इमली के नीचे बैठकर वे पानी पिलाया करते थे। क़स्बे की सबसे रौनकदार जगह वही थी। वहीं कुएँ पर छोटे अपनी टाँगें तोड़े, जाँघ तक धोती सरकाए, जनेऊ डाले, चुटिया फहराए, नंगे बदन टीन की टूटी कुरसी पर जमे रहते। गाँववाले पानी पीकर एक-आध पैसा उनके पैरों के बीच उसी कुरसी पर रखकर चल देते। पैसा पाकर वह सामर्थ्य-भर आशीर्वाद देते। जब एक कूल्हा दर्द करने लगता, तो दूसरी तरफ़ ज़ोर डालने के लिए थोड़ा-सा कसमसाते और इसमें अगर कहीं कुरसी ने खाल दाब ली, तो तीन-चार मिनिट लगातार कुरसी को गालियाँ देते रहते। लगे हाथों ननकू हलवाई को भी कोसते, जिसने प्याऊ के लिए यह कुरसी दी थी।</p>
<p>तब छोटे महराज की उमर कोई ख़ास नहीं थी, यही 35-36 के क़रीब रही होगी। छोटे महराज के बाप-दादा सोने-चांदी का काम करते थे। काफ़ी पुराना घर था, दूकान थी। पर जब बाप मरे, तो छोटे की उमर बहुत कम थी। माँ पहले ही स्वर्ग सिधार चुकी थीं। बाप के मरने के बाद दूर के रिश्ते की एक चाची आकर सब देखभाल करने लगीं। फिर बहुत बड़ी-सी चोरी हुई और छोटे का घर तबाह हो गया। चाची को तीरथ की सूझी, तो छोटे को साथ लेकर चल दीं। खर्चे की ज़रूरत पड़ने पर एक मुख़्तार से जब-तब रुपए मँगवाती रहीं। छोटे साथ थे, सो रसीद भेजते रहे। आख़िर जब तीरथ से वापस आए, तब पाँच-छह बरस मकान में और रहना हुआ। फिर मुख़्तार ने मूल और ब्याज के बदले एक दिन मकान कुर्क करा लिया, गवाही में छोटे के हाथ की रसीदें पेश कर दीं और औने-पौने में मकान झाड़ दिया। तब से उनकी चाची ने जनाने और अस्पताल में नौकरी कर ली और छोटे बिस्किटों का ठेला लगाने लगे और घूम-घूमकर बाज़ार की सड़कों पर चीखने लगे &#8211; &#8216;एक पैसे में पचास, पचास बिस्किट इनाम ज़ितना लगाओगे, उतना पाओगे -&#8216;</p>
<p>ठेले में मैदे के छोटे-छोटे बिस्किटों का ढेर लगा रहता। एक कोने पर एक बड़ी-सी फिरकनी रखी रहती, जिस पर नंबर के खाने बने रहते और उस पर एक सुई नाचती रहती। जब कोई पैसा लगाकर घुमानेवाला न मिलता, तो खड़े-खड़े स्वयं घुमाते रहते, जितना नंबर आता, उतने बिस्किट गिनते और फिर ढेर में डालकर अनाज की तरह रोरते रहते। कभी करारे-करारे बीस-पचीस छाँट लेते, सुई घुमाते, अंटी से एक पैसा निकालकर पैसा रखनेवाले फूल के कटोरे में झन्न से मारते और जितना नंबर आता, उतने गिनकर, बाकी ढेर के सुपुर्द कर जलपान कर लेते।</p>
<p>लेकिन इस तरह कैसे पेट पलता। फिर एक होम्योपैथिक डॉक्टर की दूकान को रोज़ सुबह खोलने तथा झाड़ने-पोंछने का काम ले लिया। दो-चार घरों का पानी बाँध लिया। तड़के उठकर चार-चार डोल खींचकर डाल आते और डॉक्टर की दूकान की सफ़ाई आदि करके कोने में पड़े मोढ़े पर इज़्ज़त से दोपहर तक बैठे रहते। डॉक्टर साहब की अनुपस्थिति में मरीज़ों के हालचाल पूछ लेते। कुछ देसी दवाइयों के नुस्खे बताते और जर्मन दवाइयों की अहमियत समझाते।</p>
<p>तभी से छोटे अपने को बहुत-कुछ, एक छोटा-मोटा वैद्य समझने लगे थे। मरीज़ की दशा देखते ही रोग का ऐलान कर देते। तमाम रोगों के इलाज पर उन्होंने दखल जमा लिया था। जब मोतियाबिंद हो जाने के कारण डॉक्टर साहब को दूकान बंद कर देनी पड़ी, तो छोटे अपनी कोठरी में ही एक छोटा-सा औषधालय खोलने का मन्सूबा बाँधने लगे। रतनलाल अत्तार के यहाँ से आठ-दस आने की जड़ी-बूटियाँ भी बँधवा लाए, जिन्हें घोंट-पीस और कपड़छन करके सफ़ेद शीशियों में भरा और ताक में सजा दिया। फ़सली बुखार, हरे-पीले दस्त, नाक-कान-सिर-दर्द की हुक्मी दवाइयाँ बाँटने का ऐलान भी कर दिया। पर गली के परिवारों का सहयोग न मिलने के कारण उन्होंने इस नेक इरादे को छोड़ दिया। सारी हकीमी दवाइयों को थोड़ा-थोड़ा करके चूरन की पुड़ियों में मिलाकर उन्होंने आख़िर अपने पैसे सीधे कर लिए।</p>
<p>इस तरह के न जाने कितने घरेलू धंधे उन्होंने चलाए। जन्म से वैश्य होते हुए भी प्रकृति से परोपकारी होने के कारण उन्हें ब्राह्मणत्व भी प्राप्त करना ही था। इसीलिए जब गली-टोले के लड़कों ने उन्हें प्याऊ पर बैठते देखा और चमकदार काली पीठ पर जनेऊ दिखाई पड़ा, वे वंशगत भावनाओं से अनजान, कर्मगत संस्कारों के आधार पर उन्हें महराज पुकारने लगे। तभी से छोटेलाल छोटे महराज हो गए।</p>
<p>जिस इमली के नीचे वह बैठते थे, उस पर दैव की कृपा से महूक ने छत्ता धर लिया, तो एक दिन अंधियारे पाख में जाकर स्टेशन के पास से एक कंजर पकड़ लाए। छत्ता बटाई पर तै हो गया। पर छोटे महराज शहद का क्या करते। चलते वक़्त उसे कस दिया कि आधे दाम कल आ जाएँ। पर महीना-भर टल गया। झोंपड़ी पर तगादा करने पहुँचे। नगद पैसे तो मिले नहीं, अच्छी-ख़ासी डाँट लगाकर पैसों के बदले में तोता छाँट लिया। कंजर ने मिन्नत की कि तीनों तोते पेशगी दामों के हैं, इस बार जाएगा तो उनके लिए भी पकड़ लाएगा। पर छोटे न माने, दो-चार गालियाँ सुना दीं, तैश में बोले, &#8220;मेरे पैसे क्या हराम के थे, वह भी तो पेशगी में से ही हैं, ला निकाल जल्दी इस टुइयाँ को।&#8221; और तभी से यह तोता उनके पास है, जिसे जान की तरह चिपकाए रहते हैं।</p>
<p>शिवराज ने प्रसन्नता से उन्हें देखा। &#8216;पालांगे महाराज&#8217; कहकर बोला, &#8220;इधर निकल आएँ महाराज, बहुत जगह है।&#8221;</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/katil-story-by-munshi-premchand/9120/"><strong>क़ातिल&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>जब वह पास आकर बैठ गए तो उसने पूछा, &#8220;झाँसी किस्के यहाँ गए थे?&#8221; &#8220;यहीं एक ब्याह था, उसमें आए थे, आना पड़ा अ़पनी कहो लेकिन देख, पहचान कैसा। नज़र कमज़ोर है लला, पर अपने गली-कूचे के पले लोगों की तो महक बहुत अच्छी होती है. . .&#8221; और वे धीरे-धीरे गरदन हिलाने लगे। उँगलियों के बीच गोली अब भी नाच रही थी और पिंजरे में बैठा संतू गोली के लालच से मुँह खोलता, आँखें बंद करता, पर बोलता नहीं था।</p>
<p>&#8220;बदन तो तुम्हारा एकदम लटक गया है, पहले से चोथाई भी नहीं रहा&#8230;&#8221; शिवराज बोला। उसे कुछ दु:ख-सा हो रहा था, जब उसने पिछली मरतबा देखा था, तब कितने हट्टे-कट्टे थे। यों उमर का उतार तो था, पर इतना फ़र्क तो बहुत है। भला उमर बने-बनाए आदमी को इतनी जल्दी भी तोड़ सकती है! गाड़ी की चाल धीमी पड़ गई। छोटे महराज ने संतू के पिंजरे को तनिक ऊपर उठाया। उसकी ओर प्यार-भरी दृष्टि से निहारते रहे। तोता कुछ बोला। छोटे महराज के मुख पर मुसकान दौड़ गई। बड़े स्नेह से पुचकारते हुए शिवराज को बताने लगे, &#8220;इसका नाम संतू है! यानी संत ज़ब बोले तो बानी बोले, हाँ, संत बानी सित्ताराम!&#8221; इतना कहते-कहते वे अपनी ही बात में डूब गए।</p>
<p>गाड़ी रुकी, कोई मामूली-सा स्टेशन था। छोटे महराज ने पेट पर हाथ फेरा और सिर हिलाते हुए बोले, &#8220;देखो शिब्बू, कुछ खाने-पीने का डौल है यहाँ?&#8221; मिठाईवाला पास से गुज़रा, शिवराज ने रोक लिया। छोटे महराज बोले, &#8220;कुछ ठीक-ठाक हो तो पाव-आध पाव&#8230;</p>
<p>मिठाई लेकर पैसे शिवराज ने दे दिए। दोनों हाथों में दोना पकड़कर शिवराज के सामने करते हुए वह बोले, &#8220;लो शिब्बू, चखो तो ज़रा, अच्छी हो तो पाव-भर और ले लो।&#8221;</p>
<p>और इससे पहले कि शिवराज चखे, उन्होंने खुद पोपले मुँह में एक टुकड़ा डालते हुए अपनी राय प्रकट कर दी, &#8220;है तो अच्छी ब़ुलाओ उसे।&#8221;</p>
<p>शिवराज को बात कसक गई। वह चुप ही बैठा रहा। झाँककर मिठाईवाले को बुलाने की कोई दिखावटी चेष्टा भी उसने नहीं की। पर जैसे ही मिठाईवाला फिर गुज़रा, उनकी दृष्टि पड़ गई। उसे रोकते हुए बोले, &#8220;हाँ भाई, ज़रा पाव-भर और देना तो।&#8221; फिर शिवराज की ओर मुख़ातिब होकर बोले, &#8220;ले लो, शिब्बू असल में बात यह है कि मुझसे अब कोई ऐसी-वैसी चीज़ तो खाई नहीं जाती, दाँत ही नहीं रहे। खोया-वोया थोड़ा आसान रहता है न।&#8221; कहकर उन्होंने निष्काम भाव से खाना शुरू कर दिया।</p>
<p>पैसे उसने फिर दे दिए। खाते समय छोटे महराज का निरीह-सा मुँह और एकदम सट जानेवाले जबड़े देखकर उसे रहम आ गया। उनकी झुकी गरदन, बार-बार पलकों का झपकना और ज़रा-ज़रा करके खाना, जैसे सारे कार्य और तन की सारी भाव-भंगिमाओं में लाचारी थी। उन्होंने एक टुकड़ा पिंजरे में डाल दिया। तोते ने खा लिया। पुचकारते हुए उन्होंने फिर एक टुकड़ा डाल दिया। वे स्वयं खाते रहे और संतू को खिलाते रहे। फिर बात चल निकली और उसी के मध्य उनका स्टेशन भी आ गया।</p>
<p>स्टेशन से बाहर आने पर शिवराज और छोटे महराज एक ही इक्के में बैठ गए। दो सवारियाँ और हो गईं। इक्का चला तो हचकोला लगा। छोटे महराज अपने तोते के पिंजरे को पटरे से बाहर लटकाए किसी तरह बैठे रहे। अस्पताल के पास वह इक्के से उतर पड़े। संतू का पिंजरा पटरी पर रख दिया और झोले में से कुछ निकालते हुए कहने लगे, &#8220;मैं यहीं उतर जाता हूँ। चाची को ब्याह का हालचाल बताकर कोठरी पर आऊँगा! हाँ, तुमसे एक काम है। ये एक कपड़ा है सिलक का, वहीं शादी में मिला था। मेरे तो भला क्या काम आएगा, तुम अपने काम में ले आना!&#8221; बात खतम करते-करते वह कपड़ा झोले से निकालकर शिवराज की गोद में रख दिया।</p>
<p>शिवराज ने लेने से इनकार कर दिया। पर वे नहीं माने। शिवराज भी नहीं माना, तो बड़े झुंझलाकर कपड़ा इक्के में फेंककर संतू का पिंजरा, झोला और सोंटा लेकर बड़बड़ाते चल दिए, &#8220;अरे पूछो म़ेरे किसी काम का हो तो एक बात भी है। ज़िंदगी-भर में एक चीज़ दी, उससे भी इनकार स़ब वक्त की बातें हैं, रहम दिखाते हैं मुझ पर, तेरे बाप होते तो अभी इसी बात पर चटख जाती।&#8221; फिर मुड़कर ऊँचे स्वर में बोले, &#8220;पैसे नहीं हैं मेरे पास, इक्केवाले को दे देना।&#8221; और वे जनाने अस्पताल के फाटक में गुम हो गए।</p>
<p>दूसरे दिन सवेरे छोटे महराज अपनी कोठरी में दिखाई दिए। देहरी पर बैठे-बैठे कराह रहे थे। कभी-कभी बुरी तरह से खाँस उठते। साँस का दौरा पड़ गया था। गली से शिवराज निकला तो पिछले दिन वाली बात के कारण उसकी हिम्मत कुछ कहने की नहीं पड़ी। सोचा कतराकर निकल जाए, पर पैर ठिठक रहे थे। तभी हाँफते-हाँफते छोटे महराज बोले, &#8220;अरे शिब्बू!&#8221; फिर कराहकर टुकड़े-टुकड़े करके कहने लगे, &#8220;दौरा पड़ गया है, कल रात से, हाँ, अब कौन देखे संतू को। बड़ी ख़राब आदत है इसकी, गरदन सलाख से बाहर कर लेता है। रात-भर बिल्ली चक्कर काटती रही, बेटा। छन-भर को पलक नहीं लगी। अपने होश-हवास ठीक नहीं तो कौन रखवाली करे इसकी। अपने घर रख लो, बेफ़िकर हो जाऊँ।&#8221;</p>
<p>और इतना कहकर बुरी तरह हाँफने लगे। गले में कफ़ घड़घड़ा आया, तो औंधे होकर लेट रहे। पीठ बुरी तरह उठ-बैठ रही थी। शिवराज &#8216;अच्छा&#8217; कहकर पिंजरा उठाकर चलने लगा, तोते को एक बार पूरी आँख खोलकर उन्होंने ताका। उनकी गंदली-गंदली आँखों में एक अजीब विरह-मिश्रित तृप्ति थी। जैसे किसी बूढ़े ने अपनी लड़की विदा कर दी हो। सिर नीचा करके उन्होंने एक गहरी साँस खींची, जैसे बहुत भारी ऋण से उऋण हो गए हों।</p>
<p>तीन-चार दिन हो गए थे। छोटे महराज की हालत ख़राब होती जा रही थी। अकेले कोठरी में पड़े रहते। कोई पास बैठनेवाला भी नहीं था। चौथे दिन हालत कुछ ठीक नज़र आई। सरककर देहरी तक आए। घुटनों पर कोहनियाँ रखे और हथेलियों से सिर को साधे कुछ ठीक से बैठे थे। कभी कराह उठते, धाँस लगती तो खाँस उठते। पर उनके चेहरे पर अथाह शोक की छाया व्याप रही थी, जैसे किसी भारी गम़ में डूबे हों। उनकी आँखों में कुछ ऐसा भाव था, जैसे किसी ने उन्हें गहरा धोखा दिया हो, उनके कानों में बार-बार संतू की वह आवाज़ गूँज रही थी, जो उन्होंने दोपहर सुनी थी।</p>
<p>दोपहर संतू की कातर आवाज़ जब शिवराज के बरोठे से सुनाई दी तो वे घबरा गए थे कि कहीं बिल्ली की घात तो नहीं लग गई। बड़े परेशान रहे, पर उठना तो बस में नहीं था। शिवराज के घर की ओर बहुत देर आस लगाए रहे कि कोई निकले, तो पता चले। काफ़ी देर बाद मनुआ तोते के दो-तीन हरे-हरे पंखों का मुकुट बनाए माथे से बाँधे, दो-तीन बच्चों के साथ खेलता दिखाई पड़ा, देखते ही सनाका हो गया। संतू की पूँछ के लंबे-लंबे पंख! किसी तरह बुलाकर पूछा तो पता चला कि मुनुआ को राजा बनना था, सो उसने संतू की पूँछ पकड़ ली। बात की बात में दो-तीन पंख नुच आए।</p>
<p>छोटे महराज का जैसे सारा विश्वास उठ गया। ये लड़का तो उसे मार डालेगा! इस वक़्त तबीयत कुछ ठीक मालूम हुई, बड़ी मुश्किल से उन्होंने अपना डंडा पकड़ा, हिलते-काँपते शिवराज के बरोठे में पहुँचे और अपना तोता वापस माँग लाए। कोठरी में आकर उसकी बूची पूँछ देखते रहे, पर मुँह से कुछ बोले नहीं। संतू को पुचकारा तक नहीं।</p>
<p>शाम हो आई थी। तिराहे पर लालटेन जल गई थी। पूरी गली में उदास अंधियारा भरता जा रहा था। उन्होंने संतू के पिंजरे को भीतर रखकर कोठरी के दरवाज़े उढ़का लिए और फिर नहीं निकले। भीतर कुछ देर तक खुट-पुट करते रहे, फिर रात भर कोई आवाज़ नहीं आई।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/kamchor-story-by-ismat-chughtai/9095/"><strong>कामचोर&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>सवेरे शिवराज उधर से निकला तो कोठरी की ओर निगाह डाली।</p>
<p>दरवाज़े उसी तरह भिड़े थे। उसने धीरे से खोलकर झाँका, देखा महराज सो रहे थे। चुपचाप धीरे से दरवाज़ा बंद करने लगा, तो गली के रामनरायन बोल पड़े, &#8220;क्यों, आज नहीं उठे महराज अभी तक?&#8221;</p>
<p>और इतना कहते-कहते उन्होंने पूरे दरवाज़े खोल दिए। दोनों ने ग़ौर से देखा, तोते का पिंजरा सिरहाने रखा था, जिस पर कपड़ा था कि कहीं बिल्ली की घात न लग जाए, परंतु छोटे महराज का पिंजरा खाली पड़ा था, पंछी उड़ गया था।</p>
<p>छोटे महराज ने स्वयं तो नहीं पढ़ा था, पर रामलीला आदि में सुनने के कारण यह उनका पक्का विश्वास था कि अंतिम काल में यदि राम का नाम कानों में पड़ जाए तो मुक्ति मिल जाती है। पता नहीं, उनके अंतिम क्षणों में भी संतू तोते की वाणी फूटी थी या नहीं।</p>
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		<title>अपनी-अपनी दौलत&#8230; आज की कहानी</title>
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		<pubDate>Thu, 10 Jun 2021 11:02:20 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[Cover Stories]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>~कमलेश्वर पुराने ज़मींदार का पसीना छूट गया, यह सुनकर कि इनकमटैक्स विभाग का कोई अफसर आया है और उनके हिसाब-किताब के रजिस्टर और बही-खाते चेक करना चाहता है। अब क्या होगा मुनीम जी ? ज़मींदार ने घबरा कर कहा-कुछ करो मुनीम जी&#8230; -हुजूर ! मैं तो खुद घबरा गया हूँ&#8230;.मैंने इशारे से पेशकश भी की&#8230;चाहा &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="color: #ff0000;">~कमलेश्वर</span></h4>
<p>पुराने ज़मींदार का पसीना छूट गया, यह सुनकर कि इनकमटैक्स विभाग का कोई अफसर आया है और उनके हिसाब-किताब के रजिस्टर और बही-खाते चेक करना चाहता है।<br />
अब क्या होगा मुनीम जी ? ज़मींदार ने घबरा कर कहा-कुछ करो मुनीम जी&#8230;<br />
-हुजूर ! मैं तो खुद घबरा गया हूँ&#8230;.मैंने इशारे से पेशकश भी की&#8230;चाहा कि बला टल जाए। एक लाख तक की बात की, लेकिन वह तो टस-से-मस नहीं हो रहा है&#8230;मुनीम बोला।<br />
-तो ? हे भगवान&#8230;मेरी तो साँस उखड़ रही है&#8230;.<br />
तब तक रमुआ पानी ले आया। ज़मींदार ने पानी पिया&#8230;पर घबराहट कम न हुई।<br />
-हिन्दू है कि मुसलमान ?<br />
सिख है !</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/bade-bhai-sahab-story-by-munshi-premchand/8999/"><strong>बड़े भाई साहब&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>-तो अभी लस्सी-वस्सी पिलाओ। डिनर के लिए रोको। सोडा-पानी का इन्तज़ाम करो, फकीरे से बोल तीन-चार मुर्गे कटवाओ और उनसे कहो, हम सारा हिसाब दिखा देंगे, पर आप शहर से इतनी दूर से आए हैं&#8230;हमारे साथ ड़िनर करना तो मंजूर करें&#8230;<br />
मुनीम घबराया हुआ चला गया। पाँच मिनट बाद ही मुनीम अफसर को लेकर ज़मींदार साहब के प्राइवेट कमरे में आया। ज़मींदार साहब ने घबराहट छुपा कर, लपकते हुए उसका स्वागत किया। उसे खास चांदी वाली कुर्सी पर बैठाया।</p>
<p>—आइए हुज़ूर ! तशरीफ रखिए&#8230;यहाँ गाँव आने में तो आपको बड़ी तकलीफ होगी&#8230;.ज़मींदार साहब ने अदब से कहा।<br />
—अब क्या करें ज़मींदार साहब, हमें भी अपनी ड्यूटी करनी होती है। आना पड़ा&#8230;अफसर बोला।<br />
तब तक लस्सी के गिलास आ गए।<br />
-यह लीजिए हुज़ूर ! ज़मींदार साहब बोले—शाम को हम और आप ज़रा आराम से बैठेंगे&#8230;आप पहली बार तशरीफ लाए हैं&#8230;</p>
<p>-जी हाँ, जी हाँ&#8230;.लेकिन मुनीम से कहिए, पिछले तीन सालों के हिसाब-किताब के कागजात तैयार रखे&#8230;ज़मींदार के फिर पसीना छूट गया। उसने खुद को संभाला। पसीना पोंछ कर बोला—अरे हुज़ूर पहले शाम तो गुज़ारिए&#8230;.फिर रात को आराम फरमाइए&#8230;सुबह आप जैसा चाहेंगे, वैसा होगा&#8230;.<br />
तभी नौकर ने आकर मालिक को जानकारी दी-मालिक ! रात के लिए फकीरे के यहाँ से कटे मुर्गे आ गए हैं&#8230;मालकिन पूछ रही हैं कि चारों शोरबे वाले बनेंगे या आधे भुने हुए और आधे शोरबे वाले ?<br />
-बताइए हुजू़र; कैसा मुर्ग पसन्द करेंगे ? शोरबे का या भुना हुआ, या दोनों ! ज़मींदार साहब ने पूछा।<br />
इनकमटैक्स अफसर एकदम कच्चा पड़ गया। कहने लगा-ज़मींदार साहब मैं चलता हूँ&#8230;<br />
-अरे क्यों ? कहाँ ? हमसे कोई गलती हो गई क्या ?</p>
<p>-नहीं, नहीं, लेकिन आपके साथ बैठकर मुर्ग खाने की मेरी औकात नहीं है। वैसे आपके मुनीम जी ने मुझे एक लाख देने की पेशकश की थी। लेकिन मैं अब आप से अपना इनाम लेकर जाना चाहता हूँ !<br />
ज़मींदार और सारे कारकुन चौंके कि आखिर यह माजरा क्या है?<br />
ज़मींदार साहब भी चौंके ।<br />
-लेकिन आप&#8230;?<br />
-हुजू़र ! मैं एक लाख रुपये की रिश्वत लेकर भी जा सकता था। पर नहीं, मुझे तो आपसे बस अपना इनाम चाहिए !<br />
-इनाम !</p>
<p>-जी हुज़ूर! मैं इनकमटैक्&#x200d;स अफसर नहीं, मैं तो आपकी रियासत का बहुरूपिया किशनलाल हूँ। सोचा, अपनी कला दिखाकर आपसे ही कुछ इनाम हासिल किया जाए&#8230;.</p>
<p>ज़मींदार भड़क गया-तो तू किशनू धानुक है&#8230;रामू धानुक का आवारा बेटा! अरे हरामजादे, तेरी वजह से मुझे हार्ट-अटैक भी हो सकता था&#8230;.तेरा इनाम-विनाम तो गया भाड़-चूल्हे में। अगर सदमे से मुझे कुछ हो जाता तो?&#8230;मैं हुक्म देता हूँ, हमारी रियासत छोड़ कर कहीं भी चला जा। यहाँ दिखाई दिया तो मैं तेरे हाथ-पैर तुड़वा दूँगा!</p>
<p>बहुरूपिये कलाकार किशनलाल को इनाम तो नहीं ही मिला, डर के मारे उसे वह कस्बा भी छोड़ना पड़ा।</p>
<p>फिर कई बरस बाद ज़मींदार के उसी गाँव में एक बूढ़ा साधु आया। वह एक पीपल के पेड़ के नीचे धूनी रमा के बैठ गया। वह किसी से कुछ माँगता नहीं था। उसके प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ने लगा। वह थोड़ा प्रवचन भी देने लगा। लोगों ने उसकी कुटिया बनवाने की बात की तो उसने मना कर दिया। वह जाड़े, गर्मी, बरसात में वहीं पीपल के नीचे बैठा ध्यान, भजन, प्रवचन में खोया रहता। उसकी कीर्ति फैलने लगी। दूर-दूर क्षेत्रों से लोग उसके दर्शन करने आने लगे।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/the-postmaster-story-by-rabindranath-tagore/8978/"><strong>पोस्टमास्टर&#8230; पढिए आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>एक दिन ज़मींदारिन भी उसके दर्शन करने आईं। उन्होंने श्रद्धा से दक्षिणा दी। साधु ने वह धन ग्राम पंचायत को दान में दे दिया। प्रवचन देते समय उसने कहा-यह धन मेरा अर्जित धन नहीं था। मैंने इसे अपने श्रम से नहीं कमाया था&#8230;यह समाज का धन है, उसी तरह समाज के पास लौट जाना चाहिए जैसे वर्षा का जल सागर में लौट जाता है&#8230;&#8230;</p>
<p>श्रद्धालुओं की भीड़ बढ़ने लगी। ज़मींदारिन रोज उसके दर्शन करने आने लगीं। एक दिन उन्होंने ज़मींदार साहब से कहा-क्यों न हम साधु जी को हवेली में ले आएं। वे जाड़े, गर्मी, बरसात में वहीं पीपल के नीचे बैठे रहते हैं, बारिश के दिनों में वहाँ बहुत कीचड़ हो जाती है। भक्तों को बड़ी असुविधा होती है।<br />
ज़मींदार साहब ने हां कर दी, बड़ी धूम-धाम से ज़मींदारिन साधु महाराज को हवेली में ले आईं। भक्त वहीं आने लगे।</p>
<p>ज़मींदारिन ने भक्तों के लिए भण्डारा शुरू करवा दिया। प्रवचन देते समय साधु महाराज ने कहा&#8230;पेट तो पशु भी भर लेता है&#8230;पर मनुष्य के पास एक और पेट होता है, वह है विद्या और ज्ञान का खाली पेट! यदि वह नहीं भरता तो भण्डारे का भोजन व्यर्थ चला जाता है।</p>
<p>ज़मींदार-ज़मींदारिन ने साधु की बात को समझा। उन्होंने ग्राम पंचायत को धन दे कर गाँव में एक पाठशाला खुलवा दी। पर एक समस्या सामने आई। उसमें पढ़ने के लिए बच्चे आते ही नहीं थे। तब साधु ने एक दिन प्रवचन में कहा-जो भक्त मेरे दर्शनों के लिए आते हैं, यदि वे अपने बच्चों को पाठशाला में नहीं भेजते तो उनसे मेरा निवेदन है कि वे मेरे दर्शन के लिए न आएँ!<br />
साधु महाराज की बात का असर हुआ। पाठशाला में बच्चे पहुँचने लगे। भक्तों की भीड़ भी और बढ़ने लगी।</p>
<p>ज़मींदार और ज़मींदारिन ने दुनिया का दूसरा चेहरा देखा। और एक रात, जब सारे भक्त जा चुके थे, उन्होंने अपनी सारी धन-सम्पदा लाकर साधु महाराज के चरणों में रख दी-महाराज! आप जैसे चाहें, हमारी इस अकूत सम्पदा और सम्पत्ति का उपयोग करें।</p>
<p>दूसरे दिन सुबह भक्त आने लगे पर साधु का कहीं पता नहीं था। ज़मींदार और ज़मींदारिन सकते में आ गए। पूरी हवेली की तलाशी ली गई। उस साधु की परछाईं तक वहाँ नहीं थी। वह साधु सारी धन-सम्पदा लेकर चम्पत हो चुका था। ज़मींदार और ज़मींदारिन के साथ बहुत बड़ा धोखा हुआ था। तभी भक्तों की उत्तेजित और नाराज भीड़ में वही पुराना बहुरूपिया किशनलाल दिखाई दिया। ज़मींदार का गुस्सा तो सातवें आसमान पर था ही। वे भड़क उठे-<br />
-इतने बरसों बाद किशनू तू यहाँ! मैंने तो तुझे देश निकाला दिया था। तू यहाँ क्या करने आया है?<br />
-हुज़ूर! मैं अपना इनाम लेने आया हूँ!-किशनलाल ने अदब से कहा।<br />
-कौन सा इनाम? किस बात का इनाम?<br />
-हुजूर! पिछला इनाम भी, जो आपने नहीं दिया था और इस बार का इनाम भी!<br />
-इस बार का इनाम!-लोग भौंचक्के थे।<br />
-जी हुज़ूर! वो साधु मैं ही तो था, जिसे कल रात आपने सारा खजाना सौंप दिया था!</p>
<p>लोगों को विश्वास नहीं हुआ। ताज्जुब से ज़मींदार ने पूछा-तू ही वह साधु था?<br />
-जी हुज़ूर!<br />
-तो वो सारी धन-दौलत कहाँ है जो मैंने तेरे हवाले की थी।<br />
-हुज़ूर! वो सारी दौलत हवेली की पिछवाड़े वाली कोठरी में सही- सलामत रखी है!</p>
<p>नौकर-चाकर दौड़ पड़े। वे खजानेवाली गठरी उठा के ले आए। वह उसी की साधुवाली धोती में बँधी थी। गठरी खोल के देखी गई। सारी दौलत के साथ ही उस में उसकी दाढ़ी-मूंछ भी रखी थी। उसका गेरुआ कुर्ता और रुद्राक्ष की माला और अन्य मालाएँ भी, जो वह साधु के रूप में पहनता था।</p>
<p>भक्तों की पूरी भीड़ ने राहत की साँस ली। ज़मींदार-ज़मींदारिन उसे ताज्जुब से देख रहे थे।<br />
-अरे पागल! तब तू इनाम क्&#x200d;यों माँग रहा था? तू तो यह सारी दौलत लेकर भाग भी सकता था।<br />
-भाग तो मैं जरूर सकता था हुज़ूर&#8230;लेकिन तब साधुओं पर से लोगों का विश्वास उठ जाता हुज़ूर&#8230;</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/namak-ka-daroga-story-by-munshi-prem-chand/8954/"><strong>नमक का दारोगा&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>लोगों ने उसे आँखें फाड़-फाड़ कर आश्चर्य से देखा। ज़मींदार और ज़मींदारिन ने भी। सबकी आंखों में अचरज था। कितना बेवकूफ आदमी है यह&#8230;अपनी सच्चाई न बताता और सारा खजाना लेकर भाग जाता तो ज़मींदार भी क्&#x200d;या कर लेता&#8230;<br />
किशनू बहुरूपिया अपने इनाम के इन्तज़ार में चुपचाप खड़ा था।<br />
तभी ज़मींदार साहब ने कहा-किशनू! यह जो तेरे साधु के कपड़े, मालाएँ वगैरह पड़ी हैं, इन्हें तो उठा ले!<br />
-वो तो मैं उठा लूँगा&#8230;.पर मेरा इनाम? वह तो दे दीजिए!<br />
-सचमुच हमें तेरी अकल पर बड़ा तरस आ रहा है किशनू&#8230;. ज़मींदार साहब बोले-तू सचमुच मूरख है।-</p>
<p>-हुजूर! आखिर मैं कलाकार हूँ न&#8230;हम मूरखों से ही यह दुनिया चलती है&#8230;. मुझे तो सिर्फ अपना इनाम चाहिए! आपकी धन-दौलत नहीं&#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/apni-apni-daulat-story-by-kamleshwar/9026/">अपनी-अपनी दौलत&#8230; आज की कहानी</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>इंतज़ार&#8230; आज की कहानी</title>
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		<pubDate>Fri, 04 Jun 2021 10:45:24 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Art and Literature]]></category>
		<category><![CDATA[Cover Stories]]></category>
		<category><![CDATA[Editorial]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>~कमलेश्वर रात अँधेरी थी और डरावनी भी। झाड़ियों में से अँधेरा झर रहा था और पथरीली ज़मीन में जगह-जगह गढ़े हुए पत्थर मेंढ़कों की तरह बैठे हुए थे। बिजिलांते के बूटों की आवाज़ से दहशत और बढ़ जाती थी। हवा हमेशा की तरह वीतराग थी…लोगों में सनसनी या दहशत दौड़ जाती है पर हवा उसी &#8230;</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="color: #ff0000;"><strong>~कमलेश्वर</strong></span></h4>
<p>रात अँधेरी थी और डरावनी भी। झाड़ियों में से अँधेरा झर रहा था और पथरीली ज़मीन में जगह-जगह गढ़े हुए पत्थर मेंढ़कों की तरह बैठे हुए थे। बिजिलांते के बूटों की आवाज़ से दहशत और बढ़ जाती थी। हवा हमेशा की तरह वीतराग थी…लोगों में सनसनी या दहशत दौड़ जाती है पर हवा उसी तरह खामोश आवाज़ में गाती, सरसराती रहती है। हवा की आवाज़ तभी टूटती है जब बिजलांते टीम के बूट रेत या धूल के कार्पेंट पर सप्-सप् करते हैं या मेंढ़कनुमा बैठे छोटे-छोटे पत्थरों से टकरा जाते हैं…</p>
<p>पेरीज़ शहर के फ्रीटाउन इलाके के बाहर तुमाहोल की बस्ती जाग रही थी। लेकिन घरों में रोशनी नहीं थी। बिजिलांते के बूट रोशनी से बहुत घबराते हैं…जहाँ भी कोई रोशनी टिमटिमाती है तो वे उसे बुझाने के लिए, उस पर धावा करने के लिए दौड़ते हैं, लेकिन वे पत्थरों से घबराते हैं…या तो पत्थरों से उनके बूट टकराते हैं या पत्थर आकर उनकी कनपटी पर पड़ते हैं।</p>
<p>मेंढकों की तरह ज़मीन पर बैठे हुए पत्थर रात में कैसे उड़ने लगते हैं, यह रहस्य बिजिलांते की गश्ती टुकड़ियों की समझ में नहीं आता था।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/lottery-story-by-munshi-premchand/8894/"><strong>लॉटरी&#8230; पढ़िए आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>इसीलिए गश्त वाले एक सिपाही ने पादरी के सामने कहा था–रात में यह पत्थर उड़ते हैं…होली फादर! यह दैवी आपदा है…हमें जब फ्री टाउन इलाके के बाहर तुमाहोल की इस बस्ती में भेजा गया तो यह नहीं बताया गया था कि यहाँ भूत-प्रेत रहते हैं…हमसे कहा गया था–तुमाहोल में निगर्स रहते हैं…लेकिन यहाँ तो पत्थर उड़ते हैं…</p>
<p>झोंपड़ीनुमा चर्च में जलती मोमबत्तियों की रोशनी में काला पादरी मुस्कराया था–माई सन! तुमाहोल भूत-प्रेतों की बस्ती नहीं है…शैतान ने कहीं और जन्म लिया है…शैतान को पहचानो…तुम्हें शांति मिलेगी!</p>
<p>सिपाही अपनी सूजी आँख और कनपटी सहला रहा था। उसने अपनी नाक साफ की तो खून के कतरे देखकर वह घबरा गया था।</p>
<p>अस्पताल के डॉक्टर ने रिपोर्ट दी थी कि कैडिट थ्री-ज़ीरो-वन दिमागी रूप से कमज़ोर है। ताज्जुब है कि इस जैसे कायर को बिजिलांते में चुना गया। इसके दिमाग में भूत-प्रेत भर गए हैं और इसे पत्थर उड़ते हुए दिखाई देते हैं…अगर रानी के राज्य और गोरी सभ्यता की हमें रक्षा करनी है तो थ्री-ज़ीरो-वन जैसे कायरों और अंधविश्वासियों से भी हमें अपनी रक्षा करनी होगी!<br />
चीफ वह रिपोर्ट देखकर भड़क उठा–इज़ इट ए ब्लडी मेडिलक रिपोर्ट? डॉक्टर तक हमें राजनीतिक रिपोर्ट देने लगे हैं…तुम घायलों की रक्षा करो…गोरी सभ्यता की रक्षा के लिए हम तैनात किए गए हैं!<br />
लेकिन यह तो बहुत बाद की बात है। वह रात तो बहुत अँधेरी थी जिसमें स्तोम्पी सीपी ने तुमाहोल की बस्ती में पहला पत्थर उठाया था। हुआ यह था कि घर पर दो कमरों की फूस की झोंपड़ी को अगर कहा जा सके तो उस घर पर सौतेले बाप ने उसकी माँ को बहुत मारा था। इल्ज़ाम यह था कि स्तोम्पी सोवेतो में चल रहे विप्लव में शामिल हुआ था। सौतेला बाप उसकी माँ को पीटते हुए चीख रहा था–आज़ादी और बराबरी में भी चाहता हूँ…पर उसके लिए यह ज़रूरी नहीं कि जान खतरे में डाली जाए! तू कितना ईधन चूल्हे मे डालती है? बता! ज़रूरी है कि सारा ईधन एक बार ही डाल दिया जाए? बता और तेरा यह स्तोम्पी! बारह बरस का छोकरा स्तोम्पी–वहाँ–सोवेतो के विप्लव में शामिल होने गया था…खुद ही नहीं, छोटे भाई को भी साथ ले गया था।</p>
<p>माँ सिसक रही थी…बाद में उठकर वह खाना परोसने लगी थी। उसने दोनों बेटों को आवाज़ लगाई…पर स्तोम्पी का मन उचट चुका था। सिवा कुछ बर्तनों की आवाज़ के और कोई आवाज़ उस रात के पहले पहर में नहीं थी।<br />
बस, रात बहुत अँधेरी थी और माँ के मार खाने के बाद डरावनी भी हो गई थी। झाड़ियाँ और झुरमुट सुस्ताते हाथियों की तरह अँधेरे में हाँफ रहे थे कि तभी बाज़ार के कॉफे से मिरियम मकेबा की आवाज़ आई थी…मिरियम मकेबा के गीत के शब्द वीतराग हवा पर तैरते आए थे…ज्यूकबॉक्स में किसी ने सिक्का डाला होगा। स्तोम्पी सीपी को मिरियम मकेबा की आवाज़ और गीत बहुत पसंद हैं। जब भी कोई लड़का सिक्का हाथ में लेकर अपनी पसंद का गीत ढूँढ़ता तो स्तोम्पी सीपी उसे मिरियम मकेबा का गीत सुनने के लिए प्रेरित करता…उसके पास तो पैसे होने का सवाल ही नहीं उठता था। मिरियम मकेबा के गीत पर वह दिल खोलकर नाचता था…कॉफे के लोग भी उसके नाच में रम जाते थे और कभी-कभी खुद उठकर भी नाचने लगते थे।<br />
उस रात कॉफे से गीत की आवाज़ आई तो स्तोम्पी चुपचाप बाज़ार की ओर निकल गया। वह गीत उसे खींच रहा था। रास्ते तो उसके लिए जाने-पहचाने थे। और फिर वे इतने ऊबड़-खाबड़ भी नहीं। वह तो तुमाहोल में ही पैदा हुआ था पर दूसरे मोहल्ले में रहता था। जब उसका बाप मरा तो वह पाँच साल का था। फिर माँ ने दूसरी शादी कर ली तो वह इस मोहल्ले में चला आया।<br />
कॉफे में पहुँचकर स्तोम्पी ने देखा–कोई सात-आठ लोग जमा थे। उनमें से दो को उसने पहचाना। वे सोवेतो के विप्लवी दिनों में उसे दिखाई दिए थे। वह तो यूँ ही घूमता-घामता वहाँ पहुँचा था…उसे पता भी नहीं था कि विप्लव क्या होता है…लेकिन भीड़ बढ़ती ही जा रही थी। वैसे तो दुकानें बंद थीं पर जो खुली थीं, वे तड़ातड़ बंद होती जा रही थीं…लोग घरों से निकलकर नदी की तरह मेन स्ट्रीट पर उमड़ रहे थे…और विजिलांते के दस्ते बंदूके ताने शिकारियों की तरह तैयार खड़े थे, स्तोम्पी की समझ में तब कुछ-कुछ आने लगा था। उसका सौतेला बाप डरी-डरी आवाज़ में इन्हीं दस्तों की बात किया करता था…माँ को मारने के बाद वह खुद रोया करता था और बाद में उसे समझाता था कि डर के कारण उसके भीतर गुस्से का भूत जागता है…<br />
‘‘तुम्हें खदानों से डर लगता है?’’ माँ तब पूछती थी–‘‘खदानों के अंदर के अँधेरे से डर लगता है?<br />
‘‘नहीं…खदान में किस बात का डर! वहाँ तो बहुत आराम है, लेकिन धरती पर आते-आते जब बूटों की या गालियों की आवाज़ सुनाई देती है, तब डर लगता है।’’ सौतेला पिता तब बताता था।<br />
‘‘गालियाँ कौन देता है? ठेकेदार?’’ माँ आगे पूछती।</p>
<p>‘‘नहीं…ठेकेदार तो पैसा और शाबाशी देता है…अगर दिन-भर में पच्चीस ट्रॉली बजरी हमने काट ली तो वह साथ बैठकर कॉफी भी पिलाता है…गालियाँ तो विजिलांते के सिपाही देते हैं।’’ पिता बताता था।<br />
‘‘लेकिन तुम्हारा ठेकेदार तो गोरा है!’’<br />
‘‘तो उससे क्या हुआ। हर गोरा तो कामचोर या बदमाश नहीं होता…हमारा ठेकेदार हमसे काम लेना और हमें खुश रखना जानता है।’’<br />
‘‘तो सिपाही गालियाँ क्यों देते हैं?’’<br />
‘‘उन्हें शक है कि हमारी खदानों में विद्रोही शरण पाते हैं…वे विजिलांते से बचने के लिए खदानों में छुप जाते हैं और हम मज़दूर लोग उन्हें पनाह देते हैं!’’<br />
‘‘लेकिन तुम्हारे पास तो मज़दूर होने के परिचय-पत्र रहते हैं। क्या वे सिपाही तुम्हें नहीं पहचानते?’’<br />
‘‘हमें सिर्फ नंबर से पहचाना जाता है…अगर नंबर एकदम न बोला, या याद करने में देर लगी तो च्यूइंगम खाते विजलांते का बट हमारे…’’<br />
‘‘धीरे बोलो…जगह बताने की क्या ज़रूरत है कि बूट कहाँ पड़ता है…कुछ तो लिहाज करो…बच्चे जाग रहे हैं!’’<br />
‘‘क्या बोली!’’ पिता गुर्राया था।<br />
‘‘कहा न, धीरे बोलो!’’<br />
‘‘हरामज़ादी! यहाँ भी धीरे बोलने को कहती है। तेरे एक लात लगाऊँ वहाँ पर…वहीं पर…जहाँ…जहाँ मेरे पड़ी थी।’’<br />
और पिता ने दो-तीन लातें माँ के मार दी थी…माँ एकदम चीखकर कराहने लगी थी…और फिर पिता बिलख-बिलखकर रोने लगा था…माँ को सँभालने लगा था…फिर माँ ने खाना परोसा था। रेती के केकड़ों का शोरबा और जौ की रोटी जो वह तीन दिन पहले नानबाई की दुकान से लाई थी।<br />
रेती के केकड़े पकड़ने में स्तोम्पी माहिर था। अगर हवा न चल रही हो तो रेती पर उनके चलने के निशान कुछ देर बने रहते हैं। और फिर वे छेद तो दिखाई ही पड़ जाते हैं जिनमें वे टेढ़े होकर घुस जाते हैं…वे सागर के केकड़ों की तरह काले नहीं होते, वे रेत की तरह ही शर्बती होते हैं…कभी-कभी तो किसी छेद को खोदने से केकड़ों की पूरी बस्ती ही मिल जाती है…भयातुर केकड़े तब भागते हैं…कुछ रह जाते हैं, कुछ रेत में रास्ते बनाकर भीतर छुप जाते हैं।<br />
उस रात खाने के बाद पिता ने माँ को सीधा लिटा लिया था और उसकी दोनों टाँगों को फैलाकर वह उस जगह को सेंकता रहा था–जहाँ उसने माँ को मारा था। और खुद भी अपनी उस जगह को सेंकता रहा था जहाँ उसे विजिलांते ने मारा था। सेंकने के लिए पिता ने लैंप की लौ बहुत ऊँची कर ली थी, इसी से लैंप का शीशा चटक गया था तो माँ ने उसे कोसा था–‘‘दर्द तो ठीक हो जाएगा लेकिन यह शीशा कहाँ से आएगा?’’<br />
लंबी लौ के कारण शीशा तो उनके शरीर की तरह काला पड़ गया था, लेकिन उसकी चटकन ब्लेड की धार की तरह चमकने लगी थी।</p>
<p>सुबह अपने पिता को बिना बताए स्तोम्पी खदानों के इलाके में गया था…यूँ ही घूमता हुआ, पास जाने की हिम्मत तो नहीं थी…खदानों के इलाके में गया था…यूँ ही घूमता हुआ, पास जाने की हिम्मत तो नहीं थी…खदानों के अलग-अलग इलाके चहारदीवारियों या कँटीले तारों से घिरे हुए थे…गेट पर नए मज़दूर भर्ती के लिए खड़े थे…अपने-अपने सिटिज़न पास लिए हुए। संतरी उनको रोके हुए थे।<br />
स्तोम्पी पास तक तो नहीं जा सका इसलिए वह एक टीले पर चढ़कर देखता रहा था…खदानों के मुहाने छोटे-छोटे छेदों की तरह दिखाई दे रहे थे और उनमें उतरने वाले मज़दूर केकड़ों की तरह ही गायब होते जा रहे थे। कटी हुई बजरी लेकर आने वाली ट्रालियाँ तो बहुत बाद में ऊपर आती हैं। मज़दूर तो केकड़ों की तरह नीचे ही छिपे रहते हैं।<br />
लेकिन उस दिन स्तोम्पी ने मेन स्ट्रीट में लोगों को धरती के ऊपर देखा था। तब वह कुछ-कुछ समझ सका था और तभी अपने सौतेले पिता के प्रति उसके मन में कुछ अपनापन-सा उभरा था…<br />
और तब स्तोम्पी ने विजिलांते के शिकारी सिपाहियों को आँख उठाकर देखा था…और दौड़कर भीड़ के आगे खड़ा हो गया था। उसे देखकर तमाशबीन बच्चे भी धीरे-धीरे भीड़ के आगे आ गए थे और उमड़ती नदी की पहली लहर की तरह विजिलांते के दस्तों के सामने खड़े हो गए थे।<br />
विप्लवी आंदोलन के नेता ने चीखकर कहा था–‘‘बच्चों को पीछे हटाओ! यह कहाँ से आ गए?’’<br />
तो उसी ने बुजुर्ग साथी से कहा था–‘‘नही! ये दस-दस, बारह-बारह बरस के बच्चे हमसे ज़्यादा साहसी हैं। इनके पास केवल भविष्य है…इन्हें सिर्फ पाना है, कुछ खोना नहीं। हमारा वर्तमान हमें कायर बना सकता है…इन्हें नहीं…इनके पास केवल भविष्य है!’’<br />
और उसके बाद क्या हुआ यह तो स्तोम्पी को भी नहीं मालूम…उसे तो होश तब आया जब उसने अपने को डिटेंशन लॉकअप में पाया। मारकाट के बाद उसकी मरहमपट्टी कर दी गई थी, लेकिन उसके शरीर में जगह-जगह दर्द था। तब उसे घर का लैंप बहुत याद आया था और सपने में उसने देखा था–उसका सौतेला पिता उसे जगह-जगह उसी तरह सेंक रहा था जैसे उसने माँ को सेंका था। आँख खुली तो देखा–डिटेंशन वार्ड में अँधेरा था। वहाँ कोई लैंप नहीं था, और न कोई लौ…</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/bazar-darshan-story-by-jainendra-kumar/8872/"><strong>बाजार-दर्शन&#8230; पढ़िए आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>दो महीने बाद स्तोम्पी को दो झापड़ मारकर छोड़ा गया। डिटेंशन कैंप का जेलर राउंड पर आया तो स्तोम्पी और दूसरे सात बच्चों को देखकर चीखा था–अबे गधो! नाबालिगों को बंद करके रखा है, ब्रिटिश कानून ग्रेट-ब्रिटेन में चाहे नेस्तनाबूद हो चुका हो लेकिन प्रीटोरिया की सरकार मानव-अधिकार और आधारभूत कानूनों की अभी भी रक्षा करती है…नाबालिगों को हम अदालत की आज्ञा बिना डिटेंशन में नहीं रख सकते! इन्हें इसी वक्त रिहा करो…नहीं तो मानव-अधिकारों के हनन का कलंक हम पर लग जाएगा। इन्हें छोड़ों…आज़ाद करो…सफर के पैसे देकर इन्हें घर भेजो…अभी…फौरन…<br />
और तह स्तोम्पी छोड़ा गया था। वह नहीं जानता था कि अब क्या करे? घर जाए या यहीं रुक जाए? उसे अंदाज था कि छोटे भाई ने घर लौटकर बता दिया होगा कि वह कहाँ है…<br />
और यह बात दोनों को पता हो गई थी–माँ को भी और सौतेले पिता को भी, लेकिन दोनों एक-दूसरे से इस बात को छुपाते रहे थे–और स्तोम्पी के इस तरह गायब होने को उसके आवारा हो जाने का नाम देते रहे थे और यही उन्होंने विजिलांते के दस्ते से भी कहा था, जो स्तोम्पी को पूछते हुए आया था।<br />
‘‘जी! उसका नाम स्तोम्पी सीपी है…उम्र बारह साल। वो मेरा सौतेला बेटा और मेरी पत्नी का बेटा है…वह शुरू में ही आवारा लग रहा है…घर से चीज़ें चुराकर भागता रहा है…जब भूखा मरने लगता है तो लौट आता है। इस वक्त हमें उसके बारे में कुछ भी पता नहीं कि वो कहाँ है! लौटकर अगर आया तो हम आपके पास रिपोर्ट करेंगे। उसे आपके सामने हाज़िर करेंगे। उसने हमें बहुत परेशान कर रखा है…और साब! हम तो वैसे ही बहुत परेशान लोग हैं…’’</p>
<p>विजिलांते बहुत संतुष्ट होकर लौट गए–ही नोज़ हिज़ पास्ट। प्रेज़ेंट एंड फ्यूचर। हमने इन निगर्स को सभ्य बनाया, रोज़गार दिया और चर्च दिया। इन्हें इनका ईश्वर दिया।<br />
और स्तोम्पी जब तुमाहोल में लौटकर आया तो वह पहले सीधे चर्च गया। काले पादरी ने उसे पहचाना और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा–‘‘माई सन! जो मन और तन से आज़ाद नहीं है वो किसी भी धर्म का बंदा नहीं है।’’<br />
काले पादरी की बात स्तोम्पी समझ ही नहीं पाया। उसने उसी तरह आंखें फाड़कर काले पादरी को देखा जैसे उसने मेन स्ट्रीट में विजिलांते के दस्तों को देखा था।<br />
वह झोंपड़ीनुमा चर्च से बाहर निकल आया था…मोमबत्तियों की रोशनी में काला पादरी बहुत संतुष्ट-सा मुस्करा रहा था।<br />
दूर कॉफे से तभी मिरियम मकेबा की पुकारती आवाज़ आई थी और स्तोम्पी उस तरफ खिंचा चला गया था। ज्यूकबॉक्स में किसी ने सिक्का डाला था और मिरियम मकेबा की आवाज एकदम फूट पड़ी थी–</p>
<p>‘‘आओ प्यार करो…<br />
तन के क्षणिक अनुराग से नहीं…<br />
वह भी ज़रूरी है…<br />
लेकिन पहले धरती से प्यार करो…<br />
इसके जंगलों, कछारों और हवा से प्यार करो…<br />
जब तक जंगल, पहाड़ और हवा आज़ाद नहीं हैं<br />
तब तक तुम्हारा तन भी आज़ाद नहीं है<br />
नश्वर तन को आज़ाद करो…<br />
आओ प्यार करो।…आओ प्यार करो!’’</p>
<p>शब्द और अर्थ स्तोम्पी की समझ में नहीं आते थे पर मिरियम मकेबा की आवाज़ के अर्थों में एक कशिश थी…वह पुकारती आवाज़ उसे खींचती थी…<br />
मिरियम मकेबा की आवाज़ के बीच उसे विजिलांते के दस्ते और काले पादरी के राहत देते वचन एक-से लगते थे। काले पादरी के वे वचन आज़ादी का आसरा देते हुए सहने और सहते जाने की सीख देते थे।<br />
लेकिन यह उसके सौतेले पिता ने नहीं किया। उसने स्तोम्पी को बाँहों में लेते हुए इतना ही कहा–‘‘स्तोम्पी बेटे! मैं वही चाहता हूँ जो तुम चाहते हो…लेकिन मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता! तुम्हारी माँ भी तुम्हें खोना नहीं चाहती…जिस दिन तुम खो जाओगे…हम दोनों अजनबी हो जाएँगे! हम तुम्हारा खो जाना…तुम्हारा समाप्त हो जाना बर्दाश्त नहीं कर पाएँगे! तुम बच्चों की विप्लवी सेना में सबसे आगे हो…लेकिन…’’<br />
इस लेकिन का उत्तर किसी के पास नहीं था। स्तोम्पी ने अपने सौतेले पिता से पूछा, ‘‘लेकिन?’’<br />
‘‘लेकिन…यही कि तुम विप्लव…इस क्रांति के पीछे रहो। तुम अभी बारह साल के हो…बहुत बड़ी उम्र है तुम्हारे पास।’’<br />
‘‘वे मुझे इसी उम्र पर रोके रखना चाहते हैं। वे मुझे इस उम्र से आगे बढ़ने नहीं देंगे।’’<br />
‘‘स्तोम्पी! तुम अपनी उम्र से ज़्यादा बड़ी बात कर रहे हो।’’ पिता चीखा था।<br />
‘‘अत्याचार और अन्याय सहने वालों की उम्र हमेशा बराबर होती है।’’ स्तोम्पी ने बुजुर्गो की तरह चीखकर कहा था–‘‘मैं ज़्यादा नहीं जानता, पर जब आप मां को मारते हैं तो मैं जानता हूँ वह मार कहाँ से आती है…’’</p>
<p>और यही वह रात थी जो अँधेरी और डरावनी थी जब विजिलांते टीम के बूट रेत या धूल के कार्पेट पर सप्-सप् कर रहे थे और कभी-कभी मेंढ़कनुमा बैठे हुए छोटे-छोटे पत्थरों से टकरा जाते थे।</p>
<p>मेंढ़कों की तरह ज़मीन पर बैठे हुए यह पत्थर रात में कैसे उड़ने लगे थे, यह रहस्य विजिलांते के गश्ती दस्तों की समझ में नहीं आया था।<br />
स्तोम्मी तो तब मिरियम मकेबा का गीत सुन रहा था…तभी एक आदमी दौड़ता आया था और उसने कॉफे के मालिक से हाँफते हुए कहा था–‘‘बत्ती बुझा दो…वे आ रहे हैं!’’ कॉफे की बत्ती फौरन गुल हो गई थी और उसे अँधेरे में कुछ लोग इधर-उधर निकल गए थे। ज्यूक बॉक्स से थोड़ी-सी हलकी रोशनी आ रही थी। आखिर वह रोशनी भी बंद कर दी गई और गीत की आवाज़ भी एकाएक बीच में टूट गई।<br />
स्तोम्पी की समझ में कुछ नहीं आया कि वह क्या करे। अँधेरे में पड़ी एक बेंच पर वह बैठ गया था। तभी विजिलांते का एक दस्ता आया था…</p>
<p>उनके हाथों में खदानों की टार्चे थीं और वे कॉफे में लोगों को ऐसे तलाश रहे थे जैसे खदान में केकड़ों को तलाश रहे हों। अपनी जल्दबाज़ी में उन्होंने बाहर बैठे स्तोम्पी को नहीं देखा था। लेकिन कॉफे का मालिक उन्हें मिल गया था। यही बहुत था। उन्होंने कॉफे के मालिक को बुरी तरह पीटा था…बिजली के तार काट दिए थे, सारे बर्तन फोड़ दिए थे और ज्यूकबॉक्स तोड़ दिया था।<br />
जब वे लौट रहे थे तो एक उड़ता हुआ पत्थर आया था…फिर बहुत-से पत्थर उड़ते हुए आए थे और कैडिट थ्री-ज़ीरो-वन की कनपटी से खून बहने लगा था। आँखें सूज गई थीं।<br />
उनके पास जानकारियाँ थीं…कैडिट थ्री-वन को चौकी पर जमा करके वे स्तोम्पी के घर पहुँचे थे। उन्होंने बूटों से दस्तक देकर उसके पिता और माँ को जगाया था। छोटा भाई अँधेरे में दुबक गया था। एक ने आगे बढ़कर कहा था :<br />
‘‘स्तोम्पी को बाहर निकालो!’’<br />
खदान की टार्च हाथ में देखकर उसका पिता तो पहले यही समझा था कि ठेकेदार आया है…लेकिन इस वक्त तो वह कभी नहीं आता। पिता समझ गया था।<br />
‘‘स्तोम्पी तो घर में नहीं है! वह खाने के वक्त भी नहीं था। पता नहीं कब कहाँ भाग जाता है…एकदम आवारा हो गया है।’’<br />
‘‘वो आवारा ही नहीं, खतरनाक हो गया है…उसने डेढ़ हज़ार बच्चों को पत्थर मारना सिखाया है।’’ विजिलांते का मुखिया चीखा था।<br />
‘‘यह तो वह बचपन से करता था।’’ पीछे खड़ी माँ ने दबी आवाज़ में कहा था–‘‘बचपन में वह मेंढकों को पत्थर मारा करता था…तब भी वो बहुत शैतान था…’’<br />
‘‘अब वो पूरा शैतान हो गया…डेविल! वो जब भी घर आए, हमारे हवाले कर दिया जाए। तुम रोज़ चौकी पर आकर हाज़िरी दिया करो…शाम होते ही!’’<br />
आदेश देकर विजिलांते लौट गए थे।<br />
लेकिन उस दिन से स्तोम्पी घर नहीं लौटा। माँ कभी-कभी रोती थी–‘‘उसे माँ की याद भी नहीं आती….सौतेला पिता भी पछताता था–वो कभी छुपकर मुझसे मिलने ही चला आता…’’</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/juloos-story-by-munshi-premchand/8848/"><strong>जुलूस&#8230; पढ़िए आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। वही हुआ जो ऐसे में होता है। वह रात भी अँधेरी थी। विजिलांते के बूटों की आवाज़ से दहशत और बढ़ गई थी…फिर चर्च की झोंपड़ी के पीछे गोलियाँ चली थीं। काला पादरी घबराकर बाहर आया था। तुमाहोल की बस्ती को साँप सूँघ गया था।<br />
बुरी तरह से घायल स्तोम्पी खून की मटमैली चादर पर तड़प रहा था।<br />
डर से थरथर काँपती चर्च की बुढ़िया टीचर एक मोमबत्ती थामे पास आई थी और उसे देखते ही डरी आवाज़ में चीख पड़ी थी–‘‘यह तो स्तोम्पी है! इस बच्चे को उन्होंने क्यों मार डाला!’’<br />
पादरी के चेहरे पर पूजा की उदासी थी।<br />
बुढ़िया टीचर ने तब उसके पास बैठते हुए पादरी से कहा था–‘‘स्तोम्पी के घर वालों को खबर कर दो…यह सिर्फ पाँच-सात मिनट का मेहमान है…’’<br />
‘‘नहीं! किसी को खबर मत करो…’’ कराहते हुए स्तोम्पी बोला था। तब तक पादरी पवित्र चल ले आया था।<br />
‘‘खबर करना तो ज़रूरी है…’’ पादरी बोला था।<br />
‘‘नहीं!’’ टूटती आवाज़ में स्तोम्पी ने कहा था–‘‘मेरी माँ सुनेगी तो रोएगी…उसे मत बताना कि मैं मारा गया हूँ। उससे यही कहना कि मैं…मैं डिटेंशन में हूँ…मुझे विजिलांते ने पकड़ लिया है…’’<br />
‘‘माइ सन…’’ पादरी की आँखों में आँसू थे।<br />
‘‘मुझे चुपचाप यहीं कहीं दफना देना…मगर मेरी माँ…मेरे पिता को मत बताना…उन्हें यही बताना–मैं डिटेंशन में हूँ…तब वे रोएँगे नहीं, मेरा इंतज़ार करेंगे…’’<br />
‘‘यस माई सन! जीसस क्राइस्ट ने भी यही कहा है–मैं मनुष्य का शरीर धारण करके फिर धरती पर जाऊँगा…मेरा इंतज़ार करना…’’<br />
‘‘मुझे जीसस क्राइस्ट का इंतज़ार नहीं है फादर…’’ कहते-कहते स्तोम्पी की आँखें पथरा गई थीं।<br />
बुढ़िया टीचर ने मोमबत्ती की काँपती लौ में और पास जाकर देखा…और कसमसाकर वहीं बैठ गई।<br />
काले पादरी ने अँधेरे में ही क्रास बनाया।<br />
रक्त की चादर पर स्तोम्पी पड़ा था।</p>
<p>उसकी पलकें बंद करने से पहले पादरी ने एक बार उसकी आँखों में देखा…तो बुढ़िया टीचर ने मोमबत्ती और पास कर दी। फिर उसने धीरे से बुदबुदा कर पूछा–‘‘इसे किसका इंतज़ार था?’’<br />
‘‘पता नहीं!’’</p>
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