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	<title>Puducherry Archives - TIS Media</title>
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	<title>Puducherry Archives - TIS Media</title>
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		<title>आखिर राजनीतिक दलों से क्या चाहते हैं लोग</title>
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		<pubDate>Thu, 20 May 2021 10:40:51 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>यहाँ उल्लेखनीय है जिस ईवीएम और केन्द्रीय चुनाव आयोग पर ममता बनर्जी और उनकी पार्टी घोर अविश्वास व्यक्त करती आयी हैं, उसने उनकी झोली सीटों से भर दी है। फिर भी अपनी हार को लेकर वह चुनाव आयोग के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय जाने की धमकी दे रही हैं। ऐसे ही तमिलनाडु में तीसरी बार सत्ता &#8230;</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>हाल में देश के पाँच राज्यों में हुए विधानसभा के चुनावों के परिणाम आ ही गए हैं। इनमें केवल दो राज्यों तमिलनाडु और केन्द्र शासित राज्य पुडुचेरी में ही सत्ता बदली है, शेष तीन राज्यों असम, पश्चिम बंगाल और केरल में जनता ने पहले से सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों में ही अपना पुनः विश्वास व्यक्त किया है। इनमें से कुछ राज्यों में विशेष रूप से पश्चिम बंगाल के चुनावी परिणामो कों लेकर अधिकतर चुनावी पण्डितों के अनुमान गलत साबित हुए हैं। जहाँ पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल काँग्रेस(टीएमसी) को जितनी सीटें पर सफलता मिली हैं, उतने का अनुमान उनके चुनाव रणनीतिकार प्रशान्त किशोर के सिवाय किसी को नहीं था। हालाँकि वह ममता बनर्जी की पराजय के बारे में भविष्यवाणी करने में अवश्य विफल रहे हैं।
			</div>
		</div>
	
<p>यहाँ उल्लेखनीय है जिस ईवीएम और केन्द्रीय चुनाव आयोग पर ममता बनर्जी और उनकी पार्टी घोर अविश्वास व्यक्त करती आयी हैं, उसने उनकी झोली सीटों से भर दी है। फिर भी अपनी हार को लेकर वह चुनाव आयोग के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय जाने की धमकी दे रही हैं। ऐसे ही तमिलनाडु में तीसरी बार सत्ता पाने की उम्मीद लगा रही अन्ना डीएमके नेतृत्व वाले गठबन्धन को जितनी सीटों पर कामयाबी मिली है, उतनी का किसी ने अन्दाज नहीं लगाया था। यद्यपि इस राज्य में द्रमुक (डीएमके) के स्टालिन को भी आशा से अधिक सफलता मिली है, जिनकी पार्टी पिछले दस साल से सत्ता से बाहर थी। यद्यपि व्यक्ति केन्द्रित दोनों राजनीतिक दलों को वर्तमान में अपने स्थापित नेता एम. करुणानिधि और जयललित की अनुपस्थित चुनाव लड़ना पड़ा है, तथापि स्तालिन ने इस भारी चुनावी सफलता मजबूत नेता के रूप में स्वयं का स्थापित कर दिखाया है। केरल में एल.डी.एफ. की वापसी भी चैंकाने वाली है, क्योंकि इस राज्य में हर पाँच साल में जनता चुनाव में सत्ता बदलती आयी है, किन्तु इस बार उसने परम्परा बदल डाली है। पाडुचेरी में काँग्रेस -द्रमुक के सत्ता में आने के आसार कम ही नजर आ रहे थे। परिणाम भी लगभग वैसा ही आया है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-mamata-banerjee-and-narada-chit-fund-case/8542/">ममता दीदी का &#8221;खेला&#8221; चालू छे !</a></span></strong></span></p>
<p>यद्यपि इन राज्यों के लोगों के निर्णय पर किसी को भी प्रश्न उठाने का अधिकार नहीं है, तथापि चुनाव के दौरान इन राज्यों में सत्तारूढ़ दल में असम में भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबन्धन (एन.डी.ए.), पश्चिम बंगाल में तृणमूल काँग्रेस तथा केरल में वामपन्थी लोकतांत्रिक गठबन्धन (एलडीएफ) की सरकारों पर प्रतिपक्षीय राजनीतिक दलों ने उनकी नीतियों से लेकर कामकाज पर कई तरह के गम्भीर आरोप भी लगाए थे। फिर भी उनकी अनदेखी करते हुए वहाँ की जनता अगले पाँच साल के सत्ता सम्हालने के लिए उन्हें ही बेहतर मानते चुना। यह सवाल दूसरे राज्यों के लोगों को सोचने-विचारने पर अवश्य विवश करता है। असम में मुख्य विपक्षी दल काँग्रेस ने तत्कालीन राजग सरकार पर ‘नागरिकता संशोधन विधेयक’ (सी.ए.ए.) तथा एन.आर.सी. को राज्य के लोगों विशेष रूप से मुसलमानों को उग्र आन्दोलन के लिए पूरी शक्ति से भड़काया। इसमें उसका साथ कई कट्टर इस्लामिक संगठनों के नेताओं उसकी खुलकर मदद की। परिमाणमतः असम में मुसलमानों ने जगह उग्र और हिंसक आन्दोलन किये। यह राज्य कई महीने तक उस हिंसक आन्दोलन से ग्रस्त रहा है। इसमें जहाँ असमियाँ हिन्दुओं को सीएए के माध्यम से लगभग डेढ़ करोड़ बांग्लादेश से आए बंगला भाषी हिन्दुओं को नागरिकता मिलने से अपनी असमिया अस्मिता को खतरा दिखायी दे रहा था, तो दूसरी बांग्लादेशी मुसलमानों को भारत से खदेड़े जाने। उस समय उग्र आन्दोलन को देखते हुए तत्कालीन सरकार ने अपनी ओर से सीएए और एनआरसी पर शान्त रहना ही उचित समझा। लेकिन इस विधानसभा के चुनाव के समय काँग्रेस ने इस मुद्दे को फिर हवा दी और सत्ता में आने के बाद सीएए को खत्म करने का वादा भी किया। उससे भी आगे बढ़कर उद्योगपति राजनीतिक नेता बदरूद्दीन अजमल ने अपनी राजनीतिक पार्टी ‘युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रण्ट’(यूडीएफ) का काँग्रेस से गठजोड़ तैयार किया। सत्तारूढ़ भाजपा के सामने की कड़ी चुनौती दी। उन्होंने अपनी चुनावी सभाओं में खुले आम कहा कि इस बार लुंगी-टोपी वालों की सरकार बनेगी। ऐसा कहकर मजहबी आधार पर ध्रुवीकरण करने की पुरजोर कोशिश की। लेकिन उनकी पार्टी को मुस्लिम बहुल इलाकों में ही कुछ कामयाबी मिली। वह और उनकी साथी काँग्रेस से सत्ता के गणित से बहुत दूर गई। इस चुनावी नतीजे से स्पष्ट है कि राज्य की अधिकांश जनता सीएए और एनआरसी के पक्ष में है, जिसमें असम की अस्मिता और देश की सुरक्षा भी निहित है। इस तरह असम की जनता एक बार फिर भाजपा की अगुवाई वाले राजग पर भरोसा जताया है। इसका एक बड़ा कारण सरकार का सभी वर्गों और सभी क्षेत्र के विकास पर बगैर भेदभाव के ध्यान दिया जाना रहा है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/vikram-rao-of-veteran-journalist-reviewing-india-palestine-israel-relations/8487/">बड़ा सवालः इस्राइल से भारत की यारी पर इतना खौफ क्यों ?</a></span></strong></span></p>
<p>अब चर्चा करते हैं पश्चिम बंगाल की जहाँ भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव में राज्य की कुल 42 सीटों में 18 पर सफलता पायी थी, जिसमें तृणमूल काँग्रेस को 22 और 2 सीटों पर काँग्रेस का कामयाबी मिली थी। लोकसभा की सफलता के आधार पर भाजपा इस विधानसभा चुनाव में वर्तमान 3सीटों से एकदम 200 से अधिक जीतने की घोषणा करती फिर रही थी।ऐसा करने के लिए उसने पूरी शक्ति झौंक दी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जयप्रकाश नड्डा, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, केन्द्रीय मंत्री स्मृति ईरानी, वरिष्ठ नेता शहनवाज हुसैन, उ.प्र.के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत तमाम नेताओं की सभाएँ करायी गईं। इस बीच चुनावी हिंसा के कई घटनाएँ हुई, इनमें भाजपा समेत दूसरे दलों के कार्यकर्ता मारे गए। इन घटनाओं के लिए टीएमसी कार्यकर्ताओं पर आरोप लगते रहे, पर यह सिलसिला रुका नहीं। कभी ममता बनर्जी ने खुलकर राजनीतिक हिंसा और उसके करने वालों की खुलकर निन्दा तक नहीं की। इसी कारण चुनाव आयोग ने आठ चक्रों में इस राज्य चुनाव कराने का निर्णय लिया था, जिसकी ममता बनर्जी और दूसरे राजनीतिक दलों ने बहुत आलोचना की थी। उसने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर केन्द्र की जनहितकारी योजनाओं यथा-आयुष्मान स्वास्थ्य योजना, किसान सम्मान निधि आदि, को राज्य में लागू न करना, अल्पसंख्यक तुष्टीकरण, हिन्दुओं की हर तरह से उपेक्षा,राजनीतिक हिंसा, स्त्रियों की असुरक्षा, कोयला घोटाला, हर काम में दलाली (टोलाबाजी), गायों की तस्करी में मदद, अपरमित भ्रष्टाचार, घुसपैठिये बांग्लादेशी और रोहिग्या मुसलमानों को संरक्षण देकर देश की सुरक्षा को खतरे में डालने जैसे गम्भीर आरोप लगाए। यहाँ तक कि हिन्दुओं को अपने धार्मिक पर्व-उत्सवों यथा -दुर्गा पूजा, सरस्वती पूजा में प्रतिबन्ध लगाने से लेकर मुल्ला-मौलवियों को सरकार से वेतन तथा मुहर्रहम के जुलूस को तरजीह देने के आरोप भी लगाए। इतना ही नहीं, अपने भ्रष्टाचार में लिप्त भतीजे को न केवल राजनीति में अनावश्यक बढ़ावा देना,बल्कि उसके और उसकी पत्नी के भ्रष्टाचार करने के प्रमाण भी दिये। इस बीच उनके सांसद भतीजे और उसकी पत्नी ,तृणमूल के दूसरे नेताओं से पूछताछ की गई। बंगाल का हर तरह का विकास कर इसे फिर से ‘सोनार बंगला’बनाने का विश्वास दिलाया। फिर भी पश्चिम बंगाल के लोगों ने भाजपा के तमाम आरोपों, उसके सुशासन तथ सर्वांगीण विकास करने के वादे की अनदेखी करते हुए ममता बनर्जी के बंगाल की अस्मिता, बंगाल की बेटी, भाजपा को बाहरी लोगों की पार्टी और उनकी सरकार की जैसी भी कार्यशैली है,उसे बेहतर मानते हुए उन्हें जमकर वोट दिया। उसने भाजपा के प्रत्याशी केन्द्रीय मंत्रियों, सांसदों, पूर्व मंत्रियों, अभिनेता, अभिनेत्रियों को हराने में कोई कोताही नहीं की। ऐसे केरल में एलडीएफ सरकार के मुख्यमंत्री पी.विजयन की महिला अधिकारी के सोने की तस्करी में पकड़े जाने और उसके कई बार सरकार खर्चे पर जाने के कारण उनके इस तस्करी सम्मिलित होने के साथ-साथ राज्य में लव जिहाद, हिन्दुओं की असुरक्षा, राजनीतिक हिंसा, भ्रष्टाचार समेत कई आरोप भाजपा ने लगाए थे, पर इस राज्य की जनता ने एक बार फिर उन्हें सत्ता की कमान सौंप कर भाजपा आरोपों का दरकिनार कर दिया है। इस चुनाव में भाजपा अपने इकलौती सीट भी गंवा बैठी है, जिसने विधानसभा चुनाव जीतने पर देश में ‘मेट्रोमैन’ के नाम से विख्यात मुरलीधरन को मुख्यमंत्री बनाये जाने की घोषणा की थी, पर वह ही चुनाव हार गए। इस राज्य में वामपन्थियों की राजनीतिक हिंसा के सबसे अधिक शिकार भाजपा ,आर.एस.एस.,काँग्रेस आदि के नेता और कार्यकर्ता रहे हैं। अब आते हैं तमिलनाडु की सियासत पर। यहाँ हर पाँच साल के बाद सत्ता बदलने की परम्परा रही है,पर जयललिता ने यह इस रवायत को तोड़ा था।उनके निधन के बाद अन्नाद्रमुक में गुटबाजी शुरू हो गई, फिर मुख्यमंत्री पलानीस्वामी ने बेहतर तरीके से शासन चलाया। उन्होंने कोरोना संकट में पहले भी राज्य की जनता का हर तरह से ख्याल रखा था। इस बार भी वैसा ही कर रहे थे, किन्तु जनता ने पता नहीं,क्यों सियासी बदलाव करना जरूरी समझा, जबकि द्रमुक के नेताओं पर भ्रष्टाचार के काले दाग लगे हैं। अब जहाँ इस चुनाव में भाजपा असम में अपनी सत्ता बचाने और पश्चिम बंगाल में भले ही उसके अपनी सरकार बनाने का अरमान पूरा न हुआ हो, पर उसने 3से 77 सीट पाकर मुख्य और दमदार विपक्षी दल की हैसियत हासिल कर ली है। पुडुचेरी में उसे मिलजुल कर सत्ता में शामिल होने का अवसर भी मिल गया है,लेकिन काँग्रेस पश्चिम बंगाल में महज 1 सीट पा सकी है, जिसकी पिछली विधानसभा में 44 सीटें थी। इसके बाद भी वह पश्चिम बंगाल में अपने अस्तित्व की चिन्ता भूलाकर भाजपा की हार का जश्न मानने में जुटी है। उसका केरल और असम में सत्ता में आने का ख्वाब -ख्वाब ही रह गया, जहाँ हर नए विधानसभा के पश्चात् सत्ता बदलती आयी है। पाडुचेरी में उसका गठबन्धन सत्ता से दूर रह गया। फिर वह अपनी पराजय के कारण पर विचार सुधरने को तैयार नहीं है। यही उसकी बदकिस्मती है। अब वामदल सिर्फ केरल तक सीमित रह गए हैं, पश्चिम बंगाल में उनका लगभग सूपड़ा-साफ हो गया है। वैसे जनता कैसे-कैसे लोगों को चुनती है,ऐसे-ऐसे लोगों को धूल चटा देती है,यह सोच कर हैरानी होती है। इन पाँच राज्यों के विधान सभा चुनावों के परिणामों को दृष्टिगत रखते यह अनुमान लगाना मुश्किल की जनता आखिर क्या सोचकर अपना वोट/मत देती है?</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>(डाॅ.बचन सिंह सिकरवार, देश के कई प्रमुख हिंदी अखबारों में संपादकीय जिम्मेदारियों का निर्वहन कर चुके हैं। देश और दुनिया के प्रमुख समाचार पत्रों में राजनीतिक, अंतरराष्ट्रीय मसलों एवं समसामयिक विषयों पर उनके बेबाक लेख चार दशकों के निरंतर प्रकाशित हो रहे हैं। डॉ. सिकरवार नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट (इंडिया) के संस्थापक सदस्य भी हैं।)</strong></span></p>
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