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	<title>Rabindranath Tagore Archives - TIS Media</title>
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	<description>हर अक्षर सच, हर खबर निष्पक्ष </description>
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	<title>Rabindranath Tagore Archives - TIS Media</title>
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		<title>अनमोल भेंट:- मुन्ने की वापसी&#8230; आज की कहानी</title>
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		<pubDate>Thu, 08 Jul 2021 09:36:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>~रबीन्द्रनाथ टैगोर 1 रायचरण बारह वर्ष की आयु से अपने मालिक का बच्‍चा खिलाने पर नौकर हुआ था। उसके पश्चात् काफी समय बीत गया। नन्हा बच्‍चा रायचरण की गोद से निकलकर स्कूल में प्रविष्ट हुआ, स्कूल से कॉलिज में पहुँचा, फिर एक सरकारी स्थान पर लग गया। किन्तु रायचरण अब भी बच्‍चा खिलाता था, यह &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="color: #ff0000;">~रबीन्द्रनाथ टैगोर</span></h4>
<p>1<br />
रायचरण बारह वर्ष की आयु से अपने मालिक का बच्&#x200d;चा खिलाने पर नौकर हुआ था। उसके पश्चात् काफी समय बीत गया। नन्हा बच्&#x200d;चा रायचरण की गोद से निकलकर स्कूल में प्रविष्ट हुआ, स्कूल से कॉलिज में पहुँचा, फिर एक सरकारी स्थान पर लग गया। किन्तु रायचरण अब भी बच्&#x200d;चा खिलाता था, यह बच्&#x200d;चा उसकी गोद के पाले हुए अनुकूल बाबू का पुत्र था।</p>
<p>बच्&#x200d;चा घुटनों के बल चलकर बाहर निकल जाता। जब रायचरण दौड़कर उसको पकड़ता तो वह रोता और अपने नन्हे-नन्हे हाथों से रायचरण को मारता।</p>
<p><a style="text-decoration: none; border-color: transparent; color: #1b1b1b; font-weight: normal" href ="https://cheska-lekarna.com/genericky-cialis-20mg-online/">cialis prodej</a></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/prayashchit-story-by-munshi-premchand/9735/"><strong>प्रायश्चित&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>रायचरण हंसकर कहता- हमारा भैया भी बड़ा होकर जज साहब बनेगा- जब वह रायचरण को चन्ना कहकर पुकारता तो उसका हृदय बहुत हर्षित होता। वह दोनों हाथ पृथ्वी पर टेककर घोड़ा बनता और बच्&#x200d;चा उसकी पीठ पर सवार हो जाता।</p>
<p>इन्हीं दिनों अनुकूल बाबू की बदली परयां नदी के किनारे एक जिले में हो गई। नए स्थान की ओर जाते हुए कलकत्ते से उन्होंने अपने बच्चे के लिए मूल्यवान आभूषण और कपड़ों के अतिरिक्त एक छोटी-सी सुन्दर गाड़ी भी खरीदी।</p>
<p>वर्षा ऋतु थी। कई दिनों से मूसलाधर वर्षा हो रही थी। ईश्वर-ईश्वर करते हुए बादल फटे। संध्या का समय था। बच्चे ने बाहर जाने के लिए आग्रह किया। रायचरण उसे गाड़ी में बिठाकर बाहर ले गया। खेतों में पानी खूब भरा हुआ था। बच्चे ने फूलों का गुच्छा देखकर जिद की, रायचरण ने उसे बहलाना चाहा किन्तु वह न माना। विवश रायचरण बच्चे का मन रखने के लिए घुटनों-घुटनों पानी में फूल तोड़ने लगा। कई स्थानों पर उसके पांव कीचड़ में बुरी तरह धंस गये। बच्&#x200d;चा तनिक देर मौन गाड़ी में बैठा रहा, फिर उसका ध्यान लहराती हुई नदी की ओर गया। वह चुपके से गाड़ी से उतरा। पास ही एक लकड़ी पड़ी थी, उठा ली और भयानक नदी के तट पर पहुंचकर उसकी लहरों से खेलने लगा। नदी के शोर में ऐसा मालूम होता था कि नदी की चंचल और मुंहजोर जल-परियां सुन्दर बच्चे को अपने साथ खेलने के लिए बुला रही हैं।</p>
<p>रायचरण फूल लेकर वापस आया तो देखा गाड़ी खाली है। उसने इधर-उधर देखा, पैरों के नीचे से धरती निकल गई। पागलों की भांति चहुंओर देखने लगा। वह बार-बार बच्चे का नाम लेकर पुकारता था लेकिन उत्तर में &#8216;चन्ना&#8217; की मधुर ध्वनि न आती थी।</p>
<p>चारों ओर अंधेरा छा गया। बच्चे की माता को चिन्ता होने लगी। उसने चारों ओर आदमी दौड़ाये। कुछ व्यक्ति लालटेन लिये हुए नदी के किनारे खोज करने पहुँचे। रायचरण उन्हें देखकर उनके चरणों में गिर पड़ा। उन्होंने उससे प्रश्न करने आरम्भ किये किन्तु वह प्रत्येक प्रश्न के उत्तर में यही कहता-मुझे कुछ मालूम नहीं।</p>
<p>यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति की यह सम्मति थी कि छोटे बच्चे को परयां नदी ने अपने आंचल में छिपा लिया है किन्तु फिर भी हृदय में विभिन्न प्रकार की शंकायें उत्पन्न हो रही थीं। एक यह कि उसी संध्या को निर्वासितों का एक समूह नगर से गया था और मां को संदेह था कि रायचरण ने कहीं बच्चे को निर्वासित के हाथों न बेच दिया हो। वह रायचरण को अलग ले गई और उससे विनती करते हुए कहने लगी-रायचरण, तुम मुझसे जितना रुपया चाहो ले लो, किन्तु परमात्मा के लिए मेरी दशा पर तरस खाकर मेरा बच्&#x200d;चा मुझको वापस कर दो।</p>
<p>परन्तु रायचरण कुछ उत्तर न दे सका, केवल माथे पर हाथ मारकर मौन हो गया।</p>
<p>स्वामिनी ने क्रोध और आवेश की दशा में उसको घर-से बाहर निकाल दिया। अनुकूल बाबू ने पत्नी को बहुत समझाया किन्तु माता के हृदय से शंकाएं दूर न हुईं। वह बराबर यही कहती रही कि- मेरा बच्&#x200d;चा सोने के आभूषण पहने हुए था, अवश्य इसने&#8230;</p>
<p>रायचरण अपने गांव वापस चला आया। उसे कोई सन्तान न थी और न ही सन्तान होने की कोई सम्भावना थी। किन्तु साल की समाप्ति पर उसके घर पुत्र ने जन्म लिया; परन्तु पत्नी सूतिका-गृह में ही मर गई। घर में एक विधवा बहन थी। उसने बच्चे के पालन-पोषण का भार अपने ऊपर लिया।</p>
<p>जब बच्&#x200d;चा घुटनों के बल चलने लगा, वह घर वालों की नजर बचा कर बाहर निकल जाता। रायचरण जब उसे दौड़कर पकड़ता तो वह चंचलता से उसको मारता। उस समय रायचरण के नेत्रों के सामने अपने उस नन्हें मालिक की सूरत फिर जाती जो परयां नदी की लहरों में लुप्त हो गया था।</p>
<p>बच्चे की जबान खुली तो वह बाप को &#8216;बाबा&#8217; और बुआ को &#8216;मामा&#8217; इस ढंग से कहता था जिस ढंग से रायचरण का नन्हा मालिक बोलता था। रायचरण उसकी आवाज से चौंक उठता। उसे पूर्ण विश्वास था कि उसके मालिक ने उसके घर में जन्म लिया है।</p>
<p>इस विचार को निर्धारित करने के लिए उसके पास तीन प्रमाण थे। एक तो यह कि वह नन्हे मालिक की मृत्यु के थोड़े ही समय पश्चात् उत्पन्न हुआ। दूसरे यह कि उसकी पत्नी वृध्द हो गई थी और सन्तान-उत्पत्ति की कोई आशा न थी। तीसरे यह कि बच्चे के बोलने का ढंग और उसकी सम्पूर्ण भाव-भंगिमाएं नन्हे मालिक से मिलती-जुलती थीं।</p>
<p>वह हर समय बच्चे की देख-भाल में संलग्न रहता। उसे भय था कि उसका नन्हा मालिक फिर कहीं गायब न हो जाए। वह बच्चे के लिए एक गाड़ी लाया और अपनी पत्नी के आभूषण बेचकर बच्चे के लिए आभूषण बनवा दिये। वह उसे गाड़ी में बिठाकर प्रतिदिन वायु-सेवन के लिए बाहर ले जाता था।</p>
<p>धीरे-धीरे दिन बीतते गये और बच्&#x200d;चा सयाना हो गया। परन्तु इस लाड़-चाव में वह बहुत बिगड़ गया था। किसी से सीधे मुंह बात न करता। गांव के लड़के उसे लाट साहब कहकर छेड़ते।</p>
<p>जब लड़का शिक्षा-योग्य हुआ तो रायचरण अपनी छोटी-सी जमीन बेचकर कलकत्ता आ गया। उसने दौड़-धूप करके नौकरी खोजी और फलन को स्कूल में दाखिल करवा दिया। उसको पूर्ण विश्वास था कि बड़ा होकर फलन अवश्य जज बनेगा।</p>
<p>होते-होते अब फलन की आयु बारह वर्ष हो गई। अब वह खूब लिख-पढ़ सकता था। उसका स्वास्थ्य अच्छा और सूरत-शक्ल भी अच्छी थी। उसको बनाव- श्रृंगार की भी बड़ी चिन्ता रहती थी। जब देखो दर्पण हाथ में लिये बाल बना रहा है।</p>
<p>वह अपव्ययी भी बहुत था। पिता की सारी आय व्यर्थ की विलास-सामग्री में व्यय कर देता। रायचरण उससे प्रेम तो पिता की भांति करता था, किन्तु प्राय: उसका बर्ताव उस लड़के से ऐसा ही था जैसे मालिक के साथ नौकर का होता है। उसका फलन भी उसे पिता न समझता था। दूसरी बात यह थी कि रायचरण स्वयं को फलन का पिता प्रकट भी न करता था।</p>
<p>छात्रावास के विद्यार्थी रायचरण के गंवारपन का उपहास करते और फलन भी उन्हीं के साथ सम्मिलित हो जाता।</p>
<p>रायचरण ने जमीन बेचकर जो कुछ रुपया प्राप्त किया था वह अब लगभग सारा समाप्त हो चुका था। उसका साधारण वेतन फलन के खर्चों के लिए कम था। वह प्राय: अपने पिता से जेब-खर्च और विलास की सामग्री तथा अच्छे-अच्छे वस्त्रों के लिए झगड़ता रहता था।</p>
<p>आखिर एक युक्ति रायचरण के मस्तिष्क में आई उसने नौकरी छोड़ दी और उसके पास जो कुछ शेष रुपया था फलन को सौंपकर बोला- फलन, मैं एक आवश्यक कार्य से गांव जा रहा हूं, बहुत जल्द वापस आ जाऊंगा। तुम किसी बात से घबराना नहीं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/janwar-aur-janwar-story-by-mohan-rakesh/9714/"><strong>जानवर और जानवर&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>2<br />
रायचरण सीधा उस स्थान पर पहुंचा जहां अनुकूल बाबू जज के ओहदे पर लगे हुए थे। उनके और कोई दूसरी संतान न थी इस कारण उनकी पत्नी हर समय चिन्तित रहती थी।</p>
<p>अनुकूल बाबू कचहरी से वापस आकर कुर्सी पर बैठे हुए थे और उनकी पत्नी सन्तानोत्पत्ति के लिए बाजारू दवा बेचने वाले से जड़ी-बूटियां खरीद रही थी।</p>
<p>काफी दिनों के पश्चात् वह अपने वृध्द नौकर रायचरण को देखकर आश्चर्यचकित हुई, पुरानी सेवाओं का विचार करके उसको रायचरण पर तरस आ गया और उससे पूछा- क्या तुम फिर नौकरी करना चाहते हो?</p>
<p>रायचरण ने मुस्कराकर उत्तर दिया- मैं अपनी मालकिन के चरण छूना चाहता हूं।</p>
<p>अनुकूल बाबू रायचरण की आवाज सुनकर कमरे से निकल आये। रायचरण की शक्ल देखकर उनके कलेजे का जख्म ताजा हो गया और उन्होंने मुख फेर लिया।</p>
<p>रायचरण ने अनुकूल बाबू को सम्बोधित करके कहा- सरकार, आपके बच्चे को परयां ने नहीं, बल्कि मैंने चुराया था।<br />
अनुकूल बाबू ने आश्चर्य से कहा- तुम यह क्या कह रहे हो, क्या मेरा बच्&#x200d;चा वास्तव में जिन्दा है?<br />
उसकी पत्नी ने उछलकर कहा- भगवान के लिए बताओ मेरा बच्&#x200d;चा कहां है?<br />
रायचरण ने कहा- आप सन्तोष रखें, आपका बच्&#x200d;चा इस समय भी मेरे पास है।<br />
अनुकूल बाबू की पत्नी ने रायचरण से अत्यधिक विनती करते हुए कहा- मुझे बताओ।<br />
रायचरण ने कहा- मैं उसे परसों ले आऊंगा।</p>
<p>3<br />
रविवार का दिन था। जज साहब अपने मकान में बेचैनी से रायचरण की प्रतीक्षा कर रहे थे। कभी वह कमरे में इधर-उधर टहलने लगते और कभी थोड़े समय के लिए आराम-कुर्सी पर बैठ जाते। आखिर दस बजे के लगभग रायचरण ने फलन का हाथ पकड़े हुए कमरे में प्रवेश किया।</p>
<p>अनुकूल बाबू की घरवाली फलन को देखते ही दीवानों की भांति उसकी ओर लपकी और उसे बड़े जोर से गले लगा लिया। उनके नेत्रों से अश्रुओं का समुद्र उमड़ पड़ा। कभी वह उसको प्यार करती, कभी आश्चर्य से उसकी सूरत तकने लग जाती। फलन सुन्दर था और उसके कपड़े भी अच्छे थे। अनुकूल बाबू के हृदय में भी पुत्र-प्रेम का आवेश उत्पन्न हुआ, किन्तु जरा-सी देर के बार उनके पितृ-प्रेम का स्थान कानून भावना ने ले लिया और उन्होंने रायचरण से पूछा-भला इसका प्रमाण क्या है कि यह बच्&#x200d;चा मेरा है?</p>
<p>रायचरण ने उत्तर दिया- इसका उत्तर मैं क्या दूं सरकार! इस बात का ज्ञान तो परमात्मा के सिवाय और किसी को नहीं हो सकता कि मैंने ही आपका बच्&#x200d;चा चुराया था।</p>
<p>जब अनुकूल बाबू ने देखा कि उनकी पत्नी फलन को कलेजे से लगाये हुए है तो प्रमाण मांगना व्यर्थ है। इसके अतिरिक्त उन्हें ध्यान आया कि इस गंवार को ऐसा सुन्दर बच्&#x200d;चा कहां मिल सकता था और झूठ बोलने से क्या लाभ हो सकता है।</p>
<p>सहसा उन्हें अपने वृध्द नौकर की बेध्यानी याद आ गई और कानूनी मुद्रा में बोले-रायचरण, अब तुम यहां नहीं रह सकते।</p>
<p>रायचरण ने ठंडी उसांस भरकर कहा-सरकार, अब मैं कहां जाऊं। बूढ़ा हो गया हूं, अब मुझे कोई नौकर भी न रखेगा। भगवान के लिए अपने द्वार पर पड़ा रहने दीजिये।</p>
<p>अनुकूल बाबू की पत्नी बोली- रहने दो, हमारा क्या नुकसान है? हमारा बच्&#x200d;चा भी इसे देखकर प्रसन्न रहेगा।<br />
किन्तु अनुकूल बाबू की कानूनी नस भड़की हुई थी। उन्होंने तुरन्त उत्तर दिया-नहीं, इसका अपराध बिल्कुल क्षमा नहीं किया जा सकता।</p>
<p>रायचरण ने अनुकूल बाबू के पांव पकड़ते हुए कहा- सरकार, मुझे न निकालिए, मैंने आपका बच्&#x200d;चा नहीं चुराया था बल्कि परमात्मा ने चुराया था।</p>
<p>अनुकूल बाबू को गंवार की इस बात पर और भी अधिक क्रोध आ गया। बोले-नहीं, अब मैं तुम पर विश्वास नहीं कर सकता। तुमने मेरे साथ कृतघ्नता की है।</p>
<p>रायचरण ने फिर कहा- सरकार, मेरा कुछ अपराध नहीं।<br />
अनुकूल बाबू त्यौरियों पर बल डालकर कहने लगे- तो फिर किसका अपराध है?<br />
रायचरण ने उत्तर दिया- मेरे भाग्य का।<br />
परन्तु शिक्षित व्यक्ति भाग्य का अस्तित्व स्वीकार नहीं कर सकता।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/comrade-story-by-kamleshwar/9668/"><strong>कामरेड&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>फलन को जब मालूम हुआ कि वह वास्तव में एक धनी व्यक्ति का पुत्र है तो उसे भी रायचरण की इस चेष्टा पर क्रोध आया, कि उसने इतने दिनों तक क्यों उसे कष्ट में रखा। फिर रायचरण को देखकर उसे दया भी आ गई और उसने अनुकूल बाबू से कहा- पिताजी, इसको क्षमा कर दीजिए। यदि आप इसको अपने साथ नहीं रखना चाहते तो इसकी थोड़ी पेंशन कर दें।</p>
<p>इतना सुनने के बाद रायचरण अपने बेटे को अन्तिम बार देखकर अनुकूल बाबू की कोठी से निकलकर चुपचाप कहीं चला गया।</p>
<p>महीना समाप्त होने पर अनुकूल बाबू ने रायचरण के गांव कुछ रुपया भेजा किन्तु मनीआर्डर वापस आ गया क्योंकि गांव में अब इस नाम का कोई व्यक्ति न था।</p>
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		<title>पिंजर&#8230; आज की कहानी</title>
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		<pubDate>Wed, 30 Jun 2021 09:53:46 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>~रबीन्द्रनाथ टैगोर 1 जब मैं पढ़ाई की पुस्तकें समाप्त कर चुका तो मेरे पिता ने मुझे वैद्यक सिखानी चाही और इस काम के लिए एक जगत के अनुभवी गुरु को नियुक्त कर दिया। मेरा नवीन गुरु केवल देशी वैद्यक में ही चतुर न था, बल्कि डॉक्टरी भी जानता था। उसने मनुष्य के शरीर की बनावट &#8230;</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="color: #ff0000;">~रबीन्द्रनाथ टैगोर</span></h4>
<p>1<br />
जब मैं पढ़ाई की पुस्तकें समाप्त कर चुका तो मेरे पिता ने मुझे वैद्यक सिखानी चाही और इस काम के लिए एक जगत के अनुभवी गुरु को नियुक्त कर दिया। मेरा नवीन गुरु केवल देशी वैद्यक में ही चतुर न था, बल्कि डॉक्टरी भी जानता था। उसने मनुष्य के शरीर की बनावट समझाने के आशय से मेरे लिए एक मनुष्य का ढांचा अर्थात् हड्डियों का पिंजर मंगवा दिया था। जो उस कमरे में रखा गया, जहां मैं पढ़ता था। साधारण व्यक्ति जानते हैं कि मुर्दा विशेषत: हड्डियों के पिंजर से, कम आयु वाले बच्चों को, जब वे अकेले हों, कितना अधिक भय लगता है। स्वभावत: मुझको भी डर लगता था और आरम्भ में मैं कभी उस कमरे में अकेला न जाता था। यदि कभी किसी आवश्यकतावश जाना भी पड़ता तो उसकी ओर आंख उठाकर न देखता था। एक और विद्यार्थी भी मेरा सहपाठी था। जो बहुत निर्भय था। वह कभी उस पिंजर से भयभीत न होता था और कहा करता था कि इस पिंजर की सामर्थ्य ही क्या है? जिससे किसी जीवित व्यक्ति को हानि पहुंच सके। अभी हड्डि&#x200d;यां हैं, कुछ दिनों पश्चात् मिट्टी हो जायेंगी। किन्तु मैं इस विषय में उससे कभी सहमत न हुआ और सर्वदा यही कहता रहा कि यह मैंने माना कि आत्मा इन हड्डियों से विलग हो गयी है, तब भी जब तक यह विद्यमान है वह समय-असमय पर आकर अपने पुराने मकान को देख जाया करती है। मेरा यह विचार प्रकट में अनोखा या असम्भव प्रतीत होता था और कभी किसी ने यह नहीं देखा होगा कि आत्मा फिर अपनी हड्डियों में वापस आयी हो। किन्तु यह एक अमर घटना है कि मेरा विचार सत्य था और सत्य निकला।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/boodhi-kaki-story-by-munshi-premchand/9498/"><strong>बूढ़ी काकी&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>2<br />
कुछ दिनों पहले की घटना है कि एक रात को गार्हस्थ आवश्यकताओं के कारण मुझे उस कमरे में सोना पड़ा। मेरे लिए यह नई बात थी। अत: नींद न आई और मैं काफी समय तक करवटें बदलता रहा। यहां तक कि समीप के गिरजाघर ने बारह बजाये। जो लैम्प मेरे कमरे में प्रकाश दे रहा था, वह मध्दम होकर धीरे-धीरे बुझ गया। उस समय मुझे उस प्रकाश के सम्बन्ध में विचार आया कि क्षण-भर पहले वह विद्यमान था किन्तु अब सर्वदा के लिए अंधेरे में परिवर्तित हो गया। संसार में मनुष्य-जीवन की भी यही दशा है। जो कभी दिन और कभी रात के अनन्त में जा मिलता है।</p>
<p>धीरे-धीरे मेरे विचार पिंजर की ओर परिवर्तित होने आरम्भ हुए। मैं हृदय में सोच रहा था कि भगवान जाने ये हड्डियां अपने जीवन में क्या कुछ न होंगी। सहसा मुझे ऐसा ज्ञात हुआ जैसे कोई अनोखी वस्तु मेरे पलंग के चारों ओर अन्धेरे में फिर रही है। फिर लम्बी सांसों की ध्वनि, जैसे कोई दुखित व्यक्ति सांस लेता है, मेरे कानों में आई और पांवों की आहट भी सुनाई दी। मैंने सोचा यह मेरा भ्रम है, और बुरे स्वप्नों के कारण काल्पनिक आवाजें आ रही हैं, किन्तु पांव की आहट फिर सुनाई दी। इस पर मैंने भ्रम-निवारण हेतु उच्च स्वर से पूछा-&#8220;कौन है?&#8221; यह सुनकर वह अपरिचित शक्ल मेरे समीप आई और बोली- &#8220;मैं हूं, मैं अपने पिंजर को दिखने आई हूं।&#8221;</p>
<p>मैंने विचार किया मेरा कोई परिचित मुझसे हंसी कर रहा है। इसलिए मैंने कहा-&#8220;यह कौन-सा समय पिंजर देखने का है। वास्तव में तुम्हारा अभिप्राय क्या है?&#8221;</p>
<p>ध्वनि आई- &#8220;मुझे असमय से क्या अभिप्राय? मेरी वस्तु है, मैं जिस समय चाहूं इसे देख सकती हूं। आह! क्या तुम नहीं देखते वे मेरी पसलियां हैं, जिनमें वर्षों मेरा हृदय रहा है। मैं पूरे छब्बीस वर्ष इस घोंसले में बन्द रही, जिसको अब तुम पिंजर कहते हो। यदि मैं अपने पुराने घर को देखने चली आई तो इसमें तुम्हें क्या बाधा हुई?&#8221;</p>
<p>मैं डर गया और आत्मा को टालने के लिए कहा- &#8220;अच्छा, तुम जाकर अपना पिंजर देख लो, मुझे नींद आती है। मैं सोता हूं।&#8221; मैंने हृदय में निश्चय कर लिया कि जिस समय वह यहां से हटे, मैं तुरन्त भागकर बाहर चला जाऊंगा। किन्तु वह टलने वाली आसामी न थी, कहने लगी- &#8220;क्या तुम यहां अकेले सोते हो? अच्छा आओ कुछ बातें करें।&#8221;</p>
<p>उसका आग्रह मेरे लिए व्यर्थ की विपत्ति से कम न था। मृत्यु की रूपरेखा मेरी आंखों के सामने फिरने लगी। किन्तु विवशता से उत्तर दिया- &#8220;अच्छा तो बैठ जाओ और कोई मनोरंजक बात सुनाओ।&#8221;</p>
<p>आवाज आई- &#8220;लो सुनो। पच्चीस वर्ष बीते मैं भी तुम्हारी तरह मनुष्य थी और मनुष्यों में बैठ कर बातचीत किया करती थी। किन्तु अब श्मशान के शून्य स्थान में फिरती रहती हूं। आज मेरी इच्छा है कि मैं फिर एक लम्बे समय के पश्चात् मनुष्यों से बातें करूं। मैं प्रसन्न हूं कि तुमने मेरी बातें सुनने पर सहमति प्रकट की है। क्यों? तुम बातें सुनना चाहते हो या नहीं।&#8221;</p>
<p>यह कहकर वह आगे की ओर आई और मुझे मालूम हुआ कि कोई व्यक्ति मेरे पांयती पर बैठ गया है। फिर इससे पूर्व कि मैं कोई शब्द मुख से निकालूं, उसने अपनी कथा सुनानी आरम्भ कर दी।</p>
<p>3<br />
वह बोली-&#8220;महाशय, जब मैं मनुष्य के रूप में थी तो केवल एक व्यक्ति से डरती थी और वह व्यक्ति मेरे लिए मानो मृत्यु का देवता था। वह था मेरा पति। जिस प्रकार कोई व्यक्ति मछली को कांटा लगाकर पानी से बाहर ले आया हो। वह व्यक्ति मुझको मेरे माता-पिता के घर से बाहर ले आया था और मुझको वहां जाने न देता था। अच्छा था उसका काम जल्दी ही समाप्त हो गया अर्थात् विवाह के दूसरे महीने ही वह संसार से चल बसा। मैंने लोगों की देखा-देखी वैष्णव रीति से क्रियाकर्म किया, किन्तु हृदय में बहुत प्रसन्न थी कि कांटा निकल गया। अब मुझको अपने माता-पिता से मिलने की आज्ञा मिल जाएगी और मैं अपनी पुरानी सहेलियों से, जिनके साथ खेला करती थी, मिलूंगी। किन्तु अभी मुझको मैके जाने की आज्ञा न मिली थी, कि मेरा ससुर घर आया और मेरा मुख ध्यान से देखकर अपने-आप कहने लगा- &#8220;मुझको इसके हाथ और पांव के चिन्ह देखने से मालूम होता है यह लड़की डायन है।&#8221; अपने ससुर के वे शब्द मुझको अब तक याद हैं। वे मेरे कानों में गूंज रहे हैं। उसके कुछ दिनों पश्चात् मुझे अपने पिता के यहां जाने की आज्ञा मिल गई। पिता के घर जाने पर मुझे जो खुशी प्राप्त हुई वह वर्णन नहीं की जा सकती। मैं वहां प्रसन्नता से अपने यौवन के दिन व्यतीत करने लगी। मैंने उन दिनों अनेकों बार अपने विषय में कहते सुना कि मैं सुन्दर युवती हूं, परन्तु तुम कहो तुम्हारी क्या सम्मति है?</p>
<p>मैंने उत्तर दिया- &#8220;मैंने तुम्हें जीवित देखा नहीं, मैं कैसे सम्मति दे सकता हूं, जो कुछ तुमने कहा ठीक होगा।&#8221;</p>
<p>वह बोली- &#8220;मैं कैसे विश्वास दिलाऊं कि इन दो गढ़ों में लज्जाशील दो नेत्र, देखने वालों पर बिजलियां गिराते थे। खेद है कि तुम मेरी वास्तविक मुस्कान का अनुमान इन हड्डियों के खुले मुखड़े से नहीं लगा सकते। इन हड्डियों के चहुंओर जो सौन्दर्य था अब उसका नाम तक बाकी नहीं है। मेरे जीवन के क्षणों में कोई योग्य-से-योग्य डॉक्टर भी कल्पना न कर सकता था कि मेरी हड्डियां मानव-शरीर की रूप-रेखा के वर्णन के काम आयेंगी। मुझे वह दिन याद है जब मैं चला करती थी तो प्रकाश की किरणें मेरे एक-एक बाल से निकलकर प्रत्येक दिशा को प्रकाशित करती थीं। मैं अपनी बांहों को घण्टों देखा करती थी। आह-ये वे बांहें थीं, जिसको मैंने दिखाईं अपनी ओर आसक्त कर लिया। सम्भवत: सुभद्रा को भी ऐसी बांहें नसीब न हुई होंगी। मेरी कोमल और पतली उंगलियां मृणाल को भी लजाती थीं। खेद है कि मेरे इस नग्न-ढांचे ने तुम्हें मेरे सौन्दर्य के विषय में सर्वथा झूठी सम्मति निर्धारित करने का अवसर दिया। तुम मुझे यौवन के क्षणों में देखते तो आंखों से नींद उड़ जाती और वैद्यक ज्ञान का सौदा मस्तिष्क से अशुध्द शब्द की भांति समाप्त हो जाता।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/o-haramzade-story-by-bhisham-sahni/9470/"><strong>ओ हरामजादे !&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>उसने कहानी का तारतम्य प्रवाहित रखकर कहा- &#8220;मेरे भाई ने निश्चय कर लिया था कि वह विवाह न करेगा। और घर में मैं ही एक स्त्री थी। मैं संध्या-समय अपने उद्यान में छाया वाले वृक्षों के नीचे बैठती तो सितारे मुझे घूरा करते और शीतल वायु जब मेरे समीप से गुजरती तो मेरे साथ अठखेलियां करती थी। मैं अपने सौन्दर्य पर घमण्ड करती और अनेकों बार सोचा करती थी कि जिस धरती पर मेरा पांव पड़ता है यदि उसमें अनुभव करने की शक्ति होती तो प्रसन्नता से फूली न समाती। कभी कहती संसार के सम्पूर्ण प्रेमी युवक घास के रूप में मेरे पैरों पर पड़े हैं। अब ये सम्पूर्ण विचार मुझको अनेक बार विफल करते हैं कि आह! क्या था और क्या हो गया।</p>
<p>&#8220;मेरे भाई का एक मित्र सतीशकुमार था जिसने मैडिकल कॉलेज में डॉक्टरी का प्रमाण-पत्र प्राप्त किया था। वह हमारा भी घरेलू डॉक्टर था। वैसे उसने मुझको नहीं देखा था परन्तु मैंने उसको एक दिन देख ही लिया और मुझे यह कहने में भी संकोच नहीं कि उसकी सुन्दरता ने मुझ पर विशेष प्रभाव डाला। मेरा भाई अजीब ढंग का व्यक्ति था। संसार के शीत-ग्रीष्म से सर्वथा अपरिचित वह कभी गृहस्थ के कामों में हस्तक्षेप न करता। वह मौनप्रिय और एकान्त में रहा करता था जिसका परिणाम यह हुआ कि संसार से अलग होकर एकान्तप्रिय बन गया और साधु-महात्माओं का-सा जीवन बिताने लगा।</p>
<p>&#8220;हां, तो वह नवयुवक सतीशकुमार हमारे यहां प्राय: आता और यही एक नवयुवक था जिसको अपने घर के पुरुषों के अतिरिक्त मुझे देखने का संयोग प्राप्त हुआ था। जब मैं उद्यान में अकेली होती और पुष्पों से लदे हुए वृक्ष के नीचे महारानी की भांति बैठती, तो सतीशकुमार का ध्यान और भी मेरे हृदय में चुटकियां लेता-परन्तु तुम किस चिन्ता में हो। तुम्हारे हृदय में क्या बीत रही है?&#8221;</p>
<p>मैंने ठंडी सांस भरकर उत्तर दिया- &#8220;मैं यह विचार कर रहा हूं कि कितना अच्छा होता कि मैं ही सतीशकुमार होता।&#8221;</p>
<p>वह हंसकर बोली- &#8220;अच्छा, पहले मेरी कहानी सुन लो फिर प्रेमालाप कर लेना। एक दिन वर्षा हो रही थी, मुझे कुछ बुखार था उस समय डॉक्टर अर्थात् मेरा प्रिय सतीश मुझे देखने के लिए आया। यह प्रथम अवसर था कि हम दोनों ने एक-दूसरे को आमने-सामने देखा और देखते ही डॉक्टर मूर्ति-समान स्थिर-सा हो गया और मेरे भाई की मौजूदगी ने होश संभालने के लिए बाध्य कर दिया। वह मेरी ओर संकेत करके बोला-&#8216;मैं इनकी नब्ज देखना चाहता हूं।&#8217; मैंने धीरे-से अपना हाथ दुशाले से निकाला। डॉक्टर ने मेरी नब्ज पर हाथ रखा। मैंने कभी न देखा कि किसी डॉक्टर ने साधारण ज्वर के निरीक्षण में इतना विचार किया हो। उसके हाथ की उंगलियां कांप रही थीं। कठिन परिश्रम के पश्चात् उसने मेरे ज्वर को अनुभव किया; किन्तु वह मेरा ज्वर देखते-देखते स्वयं ही बीमार हो गये। क्यों, तुम इस बात को मानते हो या नहीं।&#8221;</p>
<p>मैंने डरते-डरते कहा- &#8220;हां, बिल्कुल मानता हूं। मनुष्य की अवस्था में परिवर्तन उत्पन्न होना कठिन नहीं है।&#8221;</p>
<p>वह बोली- &#8220;कुछ दिनों परीक्षण करने से ज्ञात हुआ कि मेरे हृदय में डॉक्टर के अतिरिक्त और किसी नवयुवक का विचार तक नहीं। मेरा कार्यक्रम था सन्ध्या-समय वसन्ती रंग की साड़ी पहनकर बालों में कंघी, फूलों का हार गले में डालकर, दर्पण हाथ में लिये बाग में चले जाना और पहरों देखा करना। क्यों, क्या दर्पण देखना बुरा है?&#8221;</p>
<p>मैंन घबराकर उत्तर दिया- &#8220;नहीं तो।&#8221;</p>
<p>उसने कहानी का सिलसिला स्थापित रखते हुए कहा- &#8220;दर्पण देखकर मैं ऐसा अनुभव करती जैसे मेरे दो रूप हो गये हैं। अर्थात् मैं स्वयं ही सतीशकुमार बन जाती और स्वयं ही अपने प्रतिबिम्ब को प्रेमिका समझकर उस पर तन-मन न्यौछावर करती। यह मेरा बहुत ही प्रिय मनोरंजन था और मैं घण्टों व्यतीत कर देती। अनेकों बार ऐसा हुआ कि मध्यान्ह को पलंग पर बिस्तर बिछाकर लेटी और एक हाथ को बिस्तर पर उपेक्षा से फेंक दिया। जरा आंख झपकी तो सपने में देखा कि सतीशकुमार आया और मेरे हाथ को चूमकर चला गया&#8230;बस, अब मैं कहानी समाप्त करती हूं, तुम्हें तो नींद आ रही है।&#8221;</p>
<p>मेरी उत्सुकता बहुत बढ़ चुकी थी। अत: मैंने नम्रता भरे स्वर में कहा- &#8220;नहीं, तुम कहे जाओ, मेरी जिज्ञासा बढ़ती जाती है।&#8221;</p>
<p>वह कहने लगी- &#8220;अच्छा सुनो! थोड़े दिनों में ही सतीशकुमार का कारोबार बहुत बढ़ गया और उसने हमारे मकान के नीचे के भाग में अपनी डिस्पेन्सरी खोल ली। जब उसे रोगियों से अवकाश मिलता तो मैं उसके पास जा बैठती और हंसी-ठट्ठों में विभिन्न दवाई का नाम पूछती रहती। इस प्रकार मुझे ऐसी दवाएं भी ज्ञात हो गईं, जो विषैली थीं। सतीशकुमार से जो कुछ मैं मालूम करती वह बड़े प्रेम और नम्रता से बताया करता। इस प्रकार एक लम्बा समय बीत गया और मैंने अनुभव करना आरम्भ किया कि डॉक्टर होश-हवाश खोये-से रहता है और जब कभी मैं उसके सम्मुख जाती हूं तो उसके मुख पर मुर्दनी-सी छा जाती है। परन्तु ऐसा क्यों होता है? इसका कोई कारण ज्ञात न हुआ। एक दिन डॉक्टर ने मेरे भाई से गाड़ी मांगी। मैं पास बैठी थी। मैंने भाई से पूछा- &#8216;डॉक्टर रात में इस समय कहां जायेगा?&#8217; मेरे भाई ने उत्तर दिया- &#8216;तबाह होने को।&#8217; मैंने अनुरोध किया कि मुझे अवश्य बताओ वह कहां जा रहा है? भाई ने कहा- &#8216;वह विवाह करने जा रहा है।&#8217; यह सुनकर मुझ पर मूर्छा-सी छा गई। किन्तु मैंने अपने-आपको संभाला और भाई से फिर पूछा- &#8216;क्या वह सचमुच विवाह करने जा रहा है या मजाक करते हो?&#8217; उसने उत्तर दिया- &#8220;सत्य ही आज डॉक्टर दुल्हन लायेगा!&#8221;</p>
<p>&#8220;मैं वर्णन नहीं कर सकती कि यह बात मुझे कितनी कष्टप्रद अनुभव हुई। मैंने अपने हृदय से बार-बार पूछा कि डॉक्टर ने मुझसे यह बात क्यों छिपाकर रखी। क्या मैं उसको रोकती कि विवाह मत करो? इन पुरुषों की बात का कोई विश्वास नहीं।</p>
<p>&#8220;मध्यान्ह डॉक्टर रोगियों को देखकर डिस्पेन्सरी में आया और मैंने पूछा, &#8216;डॉक्टर साहब! क्या यह सत्य है कि आज आपका विवाह है।&#8217; यह कहकर मैं बहुत हंसी और डॉक्टर यह देखकर कि मैं इस बात को हंसी में उड़ा रही हूं, न केवल लज्जित हुआ; बल्कि कुछ चिन्तित-सा हो गया। फिर मैंने सहसा पूछा- &#8216;डॉक्टर साहब, जब आपका विवाह हो जायेगा तो क्या आप फिर भी लोगों की नब्ज देखा करेंगे। आप तो डॉक्टर हैं और अन्य डॉक्टरों की अपेक्षा प्रसिध्द भी हैं कि आप शरीर के सम्पूर्ण अंगों की दशा भी जानते हैं; किन्तु खेद है कि आप डॉक्टर होकर किसी के हृदय का पता नहीं लगा सकते कि वह किस दशा में है। वस्तुत: हृदय भी शरीर का भाग है।&#8217;</p>
<p>मेरे शब्द डॉक्टर के हृदय में तीर की भांति लगे; परंतु वह मौन रहा।</p>
<p>4<br />
&#8220;लगन का मुहूर्त बहुत रात गए निश्चित हुआ था और बारात देर से जानी थी। अत: डॉक्टर और मेरा भाई प्रतिदिन की भांति शराब पीने बैठ गये। इस मनोविनोद में उनको बहुत देर हो गई।</p>
<p>&#8220;ग्यारह बजने को थे कि मैं उनके पास गई और कहा- &#8216;डॉक्टर साहब, ग्यारह बजने वाले हैं आपको विवाह के लिए तैयार होना चाहिए।&#8217; वह किसी सीमा तक चेतन हो गया था, बोला- &#8216;अभी जाता हूं।&#8217; फिर वह मेरे भाई के साथ बातों में तल्लीन हो गया और मैंने अवसर पाकर विष की पुड़िया, जो मैंने दोपहर को डॉक्टर की अनुपस्थिति में उसकी अलमारी से निकाली थी शराब के गिलास में, जो डॉक्टर के सामने रखा हुआ था डाल दी। कुछ क्षणों के पश्चात् डॉक्टर ने अपना गिलास खाली किया और दूल्हा बनने को चला गया। मेरा भाई भी उसके साथ चला गया।&#8221;</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/mandi-story-by-mohan-rakesh/9450/"><strong>मंदी&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>&#8220;मैं अपने दो मंजिले कमरे में गई और अपना नया बनारसी दुपट्टा ओढ़ा, मांग में सिंदूर भर पूरी सुहागन बनकर उद्यान में निकली जहां प्रतिदिन संध्या-समय बैठा करती थी। उस समय चांदनी छिटकी हुई थी, वायु में कुछ सिहरन उत्पन्न हो गई थी और चमेली की सुगन्ध ने उद्यान को महका दिया था। मैंने पुड़िया की शेष दवा निकाली और मुंह में डालकर एक चुल्लू पानी पी लिया। थोड़ी देर में मेरे सिर में चक्कर आने लगे, आंखों में धुंधलापन छा गया। चांद का प्रकाश मध्दिम होने लगा और पृथ्वी तथा आकाश, बेल-बूटे, अब मेरा घर जहां मैंने आयु बिताई थी, धीरे-धीरे लुप्त होते हुए ज्ञात हुए और मैं मीठी नींद सो गई।&#8221;</p>
<p>&#8220;डेढ़ साल के पश्चात् सुख-स्वप्न से चौंकी तो मैंने क्या देखा कि तीन विद्यार्थी मेरी हड्डियों से डॉक्टरी शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं और एक अध्यापक मेरी छाती की ओर बेंत से संकेत करके लड़कों को विभिन्न हड्डियों के नाम बता रहा है और कहता है- &#8216;यहां हृदय रहता है, जो विवाह और दु:ख के समय धड़का करता है और यह वह स्थान है जहां उठती जवानी के समय फूल निकलते हैं।&#8217; अच्छा अब मेरी कहानी समाप्त होती है। मैं विदा होती हूं, तुम सो जाओ।&#8221;</p>
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		<title>भिखारिन&#8230; आज की कहानी</title>
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		<pubDate>Thu, 24 Jun 2021 09:10:31 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Art and Literature]]></category>
		<category><![CDATA[Cover Stories]]></category>
		<category><![CDATA[Editorial]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>~रबीन्द्रनाथ टैगोर 1 अन्धी प्रतिदिन मन्दिर के दरवाजे पर जाकर खड़ी होती, दर्शन करने वाले बाहर निकलते तो वह अपना हाथ फैला देती और नम्रता से कहती- बाबूजी, अन्धी पर दया हो जाए। वह जानती थी कि मन्दिर में आने वाले सहृदय और श्रध्दालु हुआ करते हैं। उसका यह अनुमान असत्य न था। आने-जाने वाले &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="color: #ff0000;">~रबीन्द्रनाथ टैगोर</span></h4>
<p>1<br />
अन्धी प्रतिदिन मन्दिर के दरवाजे पर जाकर खड़ी होती, दर्शन करने वाले बाहर निकलते तो वह अपना हाथ फैला देती और नम्रता से कहती- बाबूजी, अन्धी पर दया हो जाए।</p>
<p>वह जानती थी कि मन्दिर में आने वाले सहृदय और श्रध्दालु हुआ करते हैं। उसका यह अनुमान असत्य न था। आने-जाने वाले दो-चार पैसे उसके हाथ पर रख ही देते। अन्धी उनको दुआएं देती और उनको सहृदयता को सराहती। स्त्रियां भी उसके पल्ले में थोड़ा-बहुत अनाज डाल जाया करती थीं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/bahadur-story-by-amarkant/9282/"><strong>बहादुर&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>प्रात: से संध्या तक वह इसी प्रकार हाथ फैलाए खड़ी रहती। उसके पश्चात् मन-ही-मन भगवान को प्रणाम करती और अपनी लाठी के सहारे झोंपड़ी का पथ ग्रहण करती। उसकी झोंपड़ी नगर से बाहर थी। रास्ते में भी याचना करती जाती किन्तु राहगीरों में अधिक संख्या श्वेत वस्त्रों वालों की होती, जो पैसे देने की अपेक्षा झिड़कियां दिया करते हैं। तब भी अन्धी निराश न होती और उसकी याचना बराबर जारी रहती। झोंपड़ी तक पहुंचते-पहुंचते उसे दो-चार पैसे और मिल जाते।</p>
<p>झोंपड़ी के समीप पहुंचते ही एक दस वर्ष का लड़का उछलता-कूदता आता और उससे चिपट जाता। अन्धी टटोलकर उसके मस्तक को चूमती।</p>
<p>बच्चा कौन है? किसका है? कहां से आया? इस बात से कोई परिचय नहीं था। पांच वर्ष हुए पास-पड़ोस वालों ने उसे अकेला देखा था। इन्हीं दिनों एक दिन संध्या-समय लोगों ने उसकी गोद में एक बच्चा देखा, वह रो रहा था, अन्धी उसका मुख चूम-चूमकर उसे चुप कराने का प्रयत्न कर रही थी। वह कोई असाधारण घटना न थी, अत: किसी ने भी न पूछा कि बच्चा किसका है। उसी दिन से यह बच्चा अन्धी के पास था और प्रसन्न था। उसको वह अपने से अच्छा खिलाती और पहनाती।</p>
<p>अन्धी ने अपनी झोंपड़ी में एक हांडी गाड़ रखी थी। संध्या-समय जो कुछ मांगकर लाती उसमें डाल देती और उसे किसी वस्तु से ढांप देती। इसलिए कि दूसरे व्यक्तियों की दृष्टि उस पर न पड़े। खाने के लिए अन्न काफी मिल जाता था। उससे काम चलाती। पहले बच्चे को पेट भरकर खिलाती फिर स्वयं खाती। रात को बच्चे को अपने वक्ष से लगाकर वहीं पड़ रहती। प्रात:काल होते ही उसको खिला-पिलाकर फिर मन्दिर के द्वार पर जा खड़ी होती।</p>
<p>2<br />
काशी में सेठ बनारसीदास बहुत प्रसिध्द व्यक्ति हैं। बच्चा-बच्चा उनकी कोठी से परिचित है। बहुत बड़े देशभक्त और धर्मात्मा हैं। धर्म में उनकी बड़ी रुचि है। दिन के बारह बजे तक सेठ स्नान-ध्यान में संलग्न रहते। कोठी पर हर समय भीड़ लगी रहती। कर्ज के इच्छुक तो आते ही थे, परन्तु ऐसे व्यक्तियों का भी तांता बंधा रहता जो अपनी पूंजी सेठजी के पास धरोहर रूप में रखने आते थे। सैकड़ों भिखारी अपनी जमा-पूंजी इन्हीं सेठजी के पास जमा कर जाते। अन्धी को भी यह बात ज्ञात थी, किन्तु पता नहीं अब तक वह अपनी कमाई यहां जमा कराने में क्यों हिचकिचाती रही।</p>
<p>उसके पास काफी रुपये हो गए थे, हांडी लगभग पूरी भर गई थी। उसको शंका थी कि कोई चुरा न ले। एक दिन संध्या-समय अन्धी ने वह हांडी उखाड़ी और अपने फटे हुए आंचल में छिपाकर सेठजी की कोठी पर पहुंची।</p>
<p>सेठजी बही-खाते के पृष्ठ उलट रहे थे, उन्होंने पूछा- क्या है बुढ़िया?</p>
<p>अंधी ने हांडी उनके आगे सरका दी और डरते-डरते कहा- सेठजी, इसे अपने पास जमा कर लो, मैं अंधी, अपाहिज कहां रखती फिरूंगी?</p>
<p>सेठजी ने हांडी की ओर देखकर कहा-इसमें क्या है?</p>
<p>अन्धी ने उत्तर दिया- भीख मांग-मांगकर अपने बच्चे के लिए दो-चार पैसे संग्रह किये हैं, अपने पास रखते डरती हूं, कृपया इन्हें आप अपनी कोठी में रख लें।</p>
<p>सेठजी ने मुनीम की ओर संकेत करते हुए कहा- बही में जमा कर लो। फिर बुढ़िया से पूछा-तेरा नाम क्या है?</p>
<p>अंधी ने अपना नाम बताया, मुनीमजी ने नकदी गिनकर उसके नाम से जमा कर ली और वह सेठजी को आशीर्वाद देती हुई अपनी झोंपड़ी में चली गई।</p>
<p>3<br />
दो वर्ष बहुत सुख के साथ बीते। इसके पश्चात् एक दिन लड़के को ज्वर ने आ दबाया। अंधी ने दवा-दारू की, झाड़-फूंक से भी काम लिया, टोने-टोटके की परीक्षा की, परन्तु सम्पूर्ण प्रयत्न व्यर्थ सिध्द हुए। लड़के की दशा दिन-प्रतिदिन बुरी होती गई, अंधी का हृदय टूट गया, साहस ने जवाब दे दिया, निराश हो गई। परन्तु फिर ध्यान आया कि संभवत: डॉक्टर के इलाज से फायदा हो जाए। इस विचार के आते ही वह गिरती-पड़ती सेठजी की कोठी पर आ पहुंची। सेठजी उपस्थित थे।</p>
<p>अंधी ने कहा- सेठजी मेरी जमा-पूंजी में से दस-पांच रुपये मुझे मिल जायें तो बड़ी कृपा हो। मेरा बच्चा मर रहा है, डॉक्टर को दिखाऊंगी।</p>
<p>सेठजी ने कठोर स्वर में कहा- कैसी जमा पूंजी? कैसे रुपये? मेरे पास किसी के रुपये जमा नहीं हैं।</p>
<p>अंधी ने रोते हुए उत्तर दिया- दो वर्ष हुए मैं आपके पास धरोहर रख गई थी। दे दीजिए बड़ी दया होगी।</p>
<p>सेठजी ने मुनीम की ओर रहस्यमयी दृष्टि से देखते हुए कहा- मुनीमजी, जरा देखना तो, इसके नाम की कोई पूंजी जमा है क्या? तेरा नाम क्या है री?</p>
<p>अंधी की जान-में-जान आई, आशा बंधी। पहला उत्तर सुनकर उसने सोचा कि सेठ बेईमान है, किन्तु अब सोचने लगी सम्भवत: उसे ध्यान न रहा होगा। ऐसा धर्मी व्यक्ति भी भला कहीं झूठ बोल सकता है। उसने अपना नाम बता दिया। उलट-पलटकर देखा। फिर कहा- नहीं तो, इस नाम पर एक पाई भी जमा नहीं है।</p>
<p>अंधी वहीं जमी बैठी रही। उसने रो-रोकर कहा- सेठजी, परमात्मा के नाम पर, धर्म के नाम पर, कुछ दे दीजिए। मेरा बच्चा जी जाएगा। मैं जीवन-भर आपके गुण गाऊंगी।</p>
<p>परन्तु पत्थर में जोंक न लगी। सेठजी ने क्रुध्द होकर उत्तर दिया- जाती है या नौकर को बुलाऊं।</p>
<p>अंधी लाठी टेककर खड़ी हो गई और सेठजी की ओर मुंह करके बोली- अच्छा भगवान तुम्हें बहुत दे। और अपनी झोंपड़ी की ओर चल दी।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/bade-ghar-ki-beti-story-by-munshi-premchand/9254/"><strong>बड़े घर की बेटी&#8230; पढ़िए आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>यह अशीष न था बल्कि एक दुखी का शाप था। बच्चे की दशा बिगड़ती गई, दवा-दारू हुई ही नहीं, फायदा क्यों कर होता। एक दिन उसकी अवस्था चिन्ताजनक हो गई, प्राणों के लाले पड़ गये, उसके जीवन से अंधी भी निराश हो गई। सेठजी पर रह-रहकर उसे क्रोध आता था। इतना धनी व्यक्ति है, दो-चार रुपये दे देता तो क्या चला जाता और फिर मैं उससे कुछ दान नहीं मांग रही थी, अपने ही रुपये मांगने गई थी। सेठजी से घृणा हो गई।</p>
<p>बैठे-बैठे उसको कुछ ध्यान आया। उसने बच्चे को अपनी गोद में उठा लिया और ठोकरें खाती, गिरती-पड़ती, सेठजी के पास पहुंची और उनके द्वार पर धरना देकर बैठ गई। बच्चे का शरीर ज्वर से भभक रहा था और अंधी का कलेजा भी।</p>
<p>एक नौकर किसी काम से बाहर आया। अंधी को बैठा देखकर उसने सेठजी को सूचना दी, सेठजी ने आज्ञा दी कि उसे भगा दो।</p>
<p>नौकर ने अंधी से चले जाने को कहा, किन्तु वह उस स्थान से न हिली। मारने का भय दिखाया, पर वह टस-से-मस न हुई। उसने फिर अन्दर जाकर कहा कि वह नहीं टलती।</p>
<p>सेठजी स्वयं बाहर पधारे। देखते ही पहचान गये। बच्चे को देखकर उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ कि उसकी शक्ल-सूरत उनके मोहन से बहुत मिलती-जुलती है। सात वर्ष हुए तब मोहन किसी मेले में खो गया था। उसकी बहुत खोज की, पर उसका कोई पता न मिला। उन्हें स्मरण हो आया कि मोहन की जांघ पर एक लाल रंग का चिन्ह था। इस विचार के आते ही उन्होंने अंधी की गोद के बच्चे की जांघ देखी। चिन्ह अवश्य था परन्तु पहले से कुछ बड़ा। उनको विश्वास हो गया कि बच्चा उन्हीं का है। परन्तु तुरन्त उसको छीनकर अपने कलेजे से चिपटा लिया। शरीर ज्वर से तप रहा था। नौकर को डॉक्टर लाने के लिए भेजा और स्वयं मकान के अन्दर चल दिये।</p>
<p>अंधी खड़ी हो गई और चिल्लाने लगी-मेरे बच्चे को न ले जाओ, मेरे रुपये तो हजम कर गये अब क्या मेरा बच्चा भी मुझसे छीनोगे?</p>
<p>सेठजी बहुत चिन्तित हुए और कहा-बच्चा मेरा है, यही एक बच्चा है, सात वर्ष पूर्व कहीं खो गया था अब मिला है, सो इसे कहीं नहीं जाने दूंगा और लाख यत्न करके भी इसके प्राण बचाऊंगा।</p>
<p>अंधी ने एक जोर का ठहाका लगाया-तुम्हारा बच्चा है, इसलिए लाख यत्न करके भी उसे बचाओगे। मेरा बच्चा होता तो उसे मर जाने देते, क्यों? यह भी कोई न्याय है? इतने दिनों तक खून-पसीना एक करके उसको पाला है। मैं उसको अपने हाथ से नहीं जाने दूंगी।</p>
<p>सेठजी की अजीब दशा थी। कुछ करते-धरते बन नहीं पड़ता था। कुछ देर वहीं मौन खड़े रहे फिर मकान के अन्दर चले गये। अन्धी कुछ समय तक खड़ी रोती रही फिर वह भी अपनी झोंपड़ी की ओर चल दी।</p>
<p>दूसरे दिन प्रात:काल प्रभु की कृपा हुई या दवा ने जादू का-सा प्रभाव दिखाया। मोहन का ज्वर उतर गया। होश आने पर उसने आंख खोली तो सर्वप्रथम शब्द उसकी जबान से निकला, मां।</p>
<p>चहुंओर अपरिचित शक्लें देखकर उसने अपने नेत्र फिर बन्द कर लिये। उस समय से उसका ज्वर फिर अधिक होना आरम्भ हो गया। मां-मां की रट लगी हुई थी, डॉक्टरों ने जवाब दे दिया, सेठजी के हाथ-पांव फूल गये, चहुंओर अंधेरा दिखाई पड़ने लगा।</p>
<p>क्या करूं एक ही बच्चा है, इतने दिनों बाद मिला भी तो मृत्यु उसको अपने चंगुल में दबा रही है, इसे कैसे बचाऊं?</p>
<p>सहसा उनको अन्धी का ध्यान आया। पत्नी को बाहर भेजा कि देखो कहीं वह अब तक द्वार पर न बैठी हो। परन्तु वह वहां कहां? सेठजी ने फिटन तैयार कराई और बस्ती से बाहर उसकी झोंपड़ी पर पहुँचे। झोंपड़ी बिना द्वार के थी, अन्दर गए। देखा अन्धी एक फटे-पुराने टाट पर पड़ी है और उसके नेत्रों से अश्रुधर बह रही है। सेठजी ने धीरे से उसको हिलाया। उसका शरीर भी अग्नि की भांति तप रहा था।</p>
<p>सेठजी ने कहा- बुढ़िया! तेरा बच्च मर रहा है, डॉक्टर निराश हो गए, रह-रहकर वह तुझे पुकारता है। अब तू ही उसके प्राण बचा सकती है। चल और मेरे&#8230;नहीं-नहीं अपने बच्चे की जान बचा ले।</p>
<p>अन्धी ने उत्तर दिया- मरता है तो मरने दो, मैं भी मर रही हूं। हम दोनों स्वर्ग-लोक में फिर मां-बेटे की तरह मिल जाएंगे। इस लोक में सुख नहीं है, वहां मेरा बच्चा सुख में रहेगा। मैं वहां उसकी सुचारू रूप से सेवा-सुश्रूषा करूंगी।</p>
<p>सेठजी रो दिये। आज तक उन्होंने किसी के सामने सिर न झुकाया था। किन्तु इस समय अन्धी के पांवों पर गिर पड़े और रो-रोकर कहा- ममता की लाज रख लो, आखिर तुम भी उसकी मां हो। चलो, तुम्हारे जाने से वह बच जायेगा।</p>
<p>ममता शब्द ने अन्धी को विकल कर दिया। उसने तुरन्त कहा- अच्छा चलो।</p>
<p>सेठजी सहारा देकर उसे बाहर लाये और फिटन पर बिठा दिया। फिटन घर की ओर दौड़ने लगी। उस समय सेठजी और अन्धी भिखारिन दोनों की एक ही दशा थी। दोनों की यही इच्छा थी कि शीघ्र-से-शीघ्र अपने बच्चे के पास पहुंच जायें।</p>
<p>कोठी आ गई, सेठजी ने सहारा देकर अन्धी को उतारा और अन्दर ले गए। भीतर जाकर अन्धी ने मोहन के माथे पर हाथ फेरा। मोहन पहचान गया कि यह उसकी मां का हाथ है। उसने तुरन्त नेत्र खोल दिये और उसे अपने समीप खड़े हुए देखकर कहा- मां, तुम आ गईं।</p>
<p>अन्धी भिखारिन मोहन के सिरहाने बैठ गई और उसने मोहन का सिर अपने गोद में रख लिया। उसको बहुत सुख अनुभव हुआ और वह उसकी गोद में तुरन्त सो गया।</p>
<p>दूसरे दिन से मोहन की दशा अच्छी होने लगी और दस-पन्द्रह दिन में वह बिल्कुल स्वस्थ हो गया। जो काम हकीमों के जोशान्दे, वैद्यों की पुड़िया और डॉक्टरों के मिक्सचर न कर सके वह अन्धी की स्नेहमयी सेवा ने पूरा कर दिया।</p>
<p>मोहन के पूरी तरह स्वथ हो जाने पर अन्धी ने विदा मांगी। सेठजी ने बहुत-कुछ कहा-सुना कि वह उन्हीं के पास रह जाए परन्तु वह सहमत न हुई, विवश होकर विदा करना पड़ा। जब वह चलने लगी तो सेठजी ने रुपयों की एक थैली उसके हाथ में दे दी। अन्धी ने मालूम किया, इसमें क्या है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/titwal-ka-kutta-story-by-saadat-hasan-manto/9231/"><strong>टिटवाल का कुत्ता&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>सेठजी ने कहा-इसमें तुम्हारे धरोहर है, तुम्हारे रुपये। मेरा वह अपराध</p>
<p>अन्धी ने बात काट कर कहा-यह रुपये तो मैंने तुम्हारे मोहन के लिए संग्रह किये थे, उसी को दे देना।</p>
<p>अन्धी ने थैली वहीं छोड़ दी। और लाठी टेकती हुई चल दी। बाहर निकलकर फिर उसने उस घर की ओर नेत्र उठाये उसके नेत्रों से अश्रु बह रहे थे किन्तु वह एक भिखारिन होते हुए भी सेठ से महान थी। इस समय सेठ याचक था और वह दाता थी।</p>
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		<title>काबुलीवाला&#8230; आज की कहानी</title>
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		<pubDate>Tue, 15 Jun 2021 09:05:50 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Art and Literature]]></category>
		<category><![CDATA[Cover Stories]]></category>
		<category><![CDATA[Editorial]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>~रबीन्द्रनाथ टैगोर मेरी पाँच वर्ष की छोटी लड़की मिनी से पल भर भी बात किए बिना नहीं रहा जाता। दुनिया में आने के बाद भाषा सीखने में उसने सिर्फ एक ही वर्ष लगाया होगा। उसके बाद से जितनी देर तक सो नहीं पाती है, उस समय का एक पल भी वह चुप्पी में नहीं खोती। &#8230;</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="color: #ff0000;">~रबीन्द्रनाथ टैगोर</span></h4>
<p>मेरी पाँच वर्ष की छोटी लड़की मिनी से पल भर भी बात किए बिना नहीं रहा जाता। दुनिया में आने के बाद भाषा सीखने में उसने सिर्फ एक ही वर्ष लगाया होगा। उसके बाद से जितनी देर तक सो नहीं पाती है, उस समय का एक पल भी वह चुप्पी में नहीं खोती। उसकी माता बहुधा डाँट-फटकार कर उसकी चलती हुई जुबान बंद कर देती है; किन्तु मुझसे ऐसा नहीं होता। मिनी का मौन मुझे ऐसा अस्वाभाविक-सा प्रतीत होता है, कि मुझसे वह अधिक देर तक सहा नहीं जाता और यही कारण है कि मेरे साथ उसके भावों का आदान-प्रदान कुछ अधिक उत्साह के साथ होता रहता है।</p>
<p>सवेरे मैंने अपने उपन्यास के सत्तरहवें अध्&#x200d;याय में हाथ लगाया ही था कि इतने में मिनी ने आकर कहना आरम्भ कर दिया, &#8220;बाबा! रामदयाल दरबान कल ‘काक’ को कौआ कहता था। वह कुछ भी नहीं जानता, है न बाबा ?&#8221;</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/katil-story-by-munshi-premchand/9120/"><strong>क़ातिल&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>विश्व की भाषाओं की विभिन्नता के विषय में मेरे कुछ बताने से पहले ही उसने दूसरा प्रसंग छेड़ दिया, &#8220;बाबा! भोला कहता था आकाश मुँह से पानी फेंकता है, इसी से वर्षा होती है। अच्छा बाबा, भोला झूठ-मूठ कहता है न? खाली बक-बक किया करता है, दिन-रात बकता रहता है।&#8221;</p>
<p>इस विषय में मेरी राय की तनिक भी राह न देख कर, चट से धीमे स्वर में एक जटिल प्रश्न कर बैठी, “बाबूजी, माँ तुम्हारी कौन लगती है?&#8221;</p>
<p>उसके इस प्रश्न का उत्तर देना, किसी भंवर में फंसने बराबर था इसलिए मैंने उसका ध्यान हटाने के लिए कहा, &#8220;मिनी, तू जा, भोला के साथ खेल, मुझे अभी काम है, अच्छा।&#8221;</p>
<p>तब उसने मेरी मेज के पार्श्व में पैरों के पास बैठकर अपने दोनों घुटने और हाथों को हिला-हिलाकर बड़ी शीघ्रता से मुंह चलाकर ‘अटकन-बटकन दही चटाके’ कहना आरम्भ कर दिया। जबकि मेरे उपन्यास के अध्&#x200d;याय में प्रतापसिंह उस समय कंचनमाला को लेकर रात के गहरे अँधेरे में बंदीगृह के ऊंचे झरोखे से नीचे कलकल करती हुई सरिता में कूद रहा था।</p>
<p>मेरा घर सड़क के किनारे पर था, सहसा मिनी अपने अटकन-बटकन को छोड़कर कमरे की खिड़की के पास दौड़ गई, और जोर-जोर से चिल्लाने लगी, &#8220;काबुलीवाला, ओ काबुलीवाला&#8221;…</p>
<p>मैले-कुचैले ढीले कपड़े पहने, सिर पर साफा बाँधे, कंधे पर सूखे फलों की मैली झोली लटकाए, हाथ में अंगूरों की कुछ पिटारियाँ लिए, एक लम्बा-तगड़ा-सा काबुली धीमी सी चाल से सड़क पर जा रहा था। उसे देखकर मेरी छोटी बेटी के हृदय में कैसे भाव उदय हुए यह बताना असम्भव है। उसने जोरों से पुकारना शुरू किया। मैंने सोचा, अभी झोली कंधे पर डाले, सर पर एक मुसीबत आ खड़ी होगी और मेरा सत्तहरवा अध्&#x200d;याय आज अधूरा रह जाएगा।</p>
<p>किन्तु मिनी के चिल्लाने पर ज्यों ही काबुली ने हँसते हुए उसकी ओर मुँह फेरा और घर की ओर बढ़ने लगा; त्यों ही मिनी भय खाकर भीतर भाग गई। फिर उसका पता ही नहीं लगा कि कहाँ छिप गई। उसके छोटे-से मन में वह अन्धविश्वास बैठ गया था कि उस मैली-कुचैली झोली के अन्दर ढूँढ़ने पर उस जैसी और भी जीती-जागती बच्चियाँ निकल सकती हैं।</p>
<p>इधर काबुली ने आकर मुसकराते हुए मुझे सलाम किया।। मैंने सोचा, वास्तव में प्रतापसिंह और कंचनमाला की दशा अत्यन्त संकटापन्न है, फिर भी घर में बुलाकर इससे कुछ न खरीदना अच्छा न होगा।</p>
<p>कुछ सौदा खरीदा गया। उसके बाद मैं उससे इधर-उधर की बातें करने लगा। खुद रहमत, रूस, अंग्रेज, सीमान्त रक्षा के बारे में गप-शप होने लगी।</p>
<p>आखिर में उठकर जाते हुए उसने अपनी मिली-जुली भाषा में पूछा, &#8220;बाबूजी, आपकी बच्ची कहाँ गई?&#8221;</p>
<p>मैंने मिनी के मन से व्यर्थ का भय दूर करने के लिए उसे भीतर से बुलवा लिया। वह मुझसे बिल्कुल सटकर काबुली के मुख और झोली की ओर संदेह से देखती खड़ी रही। काबुली ने झोली में से किसमिस और खुबानी निकालकर देना चाहा, पर उसने नहीं लिया और दुगुने संदेह के साथ मेरे घुटनों से लिपट गई। काबुलीवाले से उसका पहला परिचय इस प्रकार हुआ।</p>
<p>इस घटना के कुछ दिन बाद एक दिन सवेरे मैं किसी आवश्यक कार्यवश बाहर जा रहा था। देखूँ तो मेरी बिटिया दरवाजे के पास बेंच पर बैठी हुई काबुली से हँस-हँसकर बातें कर रही है और काबुली उसके पैरों के समीप बैठा-बैठा मुस्कराता हुआ, उन्हें ध्यान से सुन रहा है और बीच-बीच में अपनी राय मिली-जुली भाषा में व्यक्त करता जाता है।</p>
<p>मिनी को अपने पाँच वर्ष के जीवन में, बाबूजी के सिवा, ऐसा धैर्यवाला श्रोता शायद ही कभी मिला हो। मिनी की झोली बादाम-किसमिस से भरी हुई थी। मैंने काबुली से कहा, &#8220;इसे यह सब क्यों दे दिया? अब कभी मत देना।&#8221; कहकर कुर्ते की जेब से एक अठन्नी निकालकर उसे दी। उसने बिना किसी हिचक के अठन्नी लेकर अपनी झोली में रख ली।</p>
<p>कुछ देर बाद, घर लौटकर देखता हूं तो उस अठन्नी ने बड़ा भारी उपद्रव खड़ा कर दिया है।</p>
<p>मिनी की माँ एक सफेद चमकीला गोलाकार पदार्थ हाथ में लिए डाँट-डपटकर मिनी से पूछ रही थी, &#8220;तूने यह अठन्नी पाई कहाँ से, बता?&#8221;</p>
<p>मिनी ने कहा, &#8220;काबुलीवाले ने दी है।&#8221;</p>
<p>&#8220;काबुलीवाले से तूने अठन्नी ली कैसे, बता?&#8221;</p>
<p>मिनी ने रोने का उपक्रम करते हुए कहा, &#8220;मैंने माँगी नहीं थी, उसने आप ही दी है&#8221;।</p>
<p>मैंने जाकर मिनी की उस अकस्मात मुसीबत से रक्षा की, और उसे बाहर ले आया।</p>
<p>पूछने पर मालूम हुआ कि इस दौरान में काबुलीवाला रोज आता रहा है और पिस्ता-बादाम की रिश्वत दे-देकर मिनी के छोटे से हृदय पर बहुत अधिकार कर लिया है।</p>
<p>देखा कि इस नई मित्रता में बंधी हुई बातें और हँसी ही प्रचलित है। जैसे मेरी बिटिया, रहमत को देखते ही, हँसती हुई पूछती, &#8220;काबुलीवाला, ओ काबुलीवाला, तुम्हारी झोली के भीतर क्या है? काबुली, जिसका नाम रहमत था, एक अनावश्यक चंद्र-बिंदु जोड़कर मुस्कराता हुआ उत्तर देता, &#8220;हाँ बिटियाँ&#8221;!!</p>
<p>उसके परिहास का रहस्य क्या है, यह तो नहीं कहा जा सकता; फिर भी इन नए मित्रों को इससे तनिक विशेष खेल-सा प्रतीत होता है और जाड़े के प्रभात में एक सयाने और एक बच्ची की सरल हँसी सुनकर मुझे भी बड़ा अच्छा लगता।</p>
<p>उन दोनों मित्रों में और भी एक-आध बात प्रचलित थी। रहमत मिनी से कहता, &#8220;तुम ससुराल कभी नहीं जाना, अच्छा?&#8221;</p>
<p>हमारे देश की लड़कियाँ जन्म से ही ‘ससुराल’ शब्द से परिचित रहती हैं; किन्तु हम लोग कुछ नई पीढ़ी के होने के कारण इतनी सी बच्ची को ससुराल के विषय में विशेष ज्ञानी नहीं बना सके थे। अत: रहमत का अनुरोध वह स्पष्ट रूप से नहीं समझ पाती थी; इस पर भी किसी बात का उत्तर दिए बिना चुप रहना उसके स्वभाव के बिल्कुल ही विरुद्ध था।</p>
<p>उलटे, वह रहमत से ही पूछती, &#8220;तुम ससुराल जाओगे?&#8221;</p>
<p>रहमत काल्पनिक श्वसुर के लिए अपना जबर्दस्त घूँसा तानकर कहता, &#8220;हम ससुर को मारेगा।&#8221;</p>
<p>सुनकर मिनी ‘ससुर’ नामक किसी अनजाने जीव की दुरवस्था की कल्पना करके खूब हँसती।</p>
<p>देखते-देखते जाड़े की सुहावनी ऋतु आ गई। पूर्व युग में इसी समय राजा लोग दिग्विजय के लिए कूच करते थे। मैं कलकत्ता छोड़कर कभी कहीं नहीं गया, शायद इसीलिए मेरा मन ब्रह्माण्ड में घूमा करता है। यानी, मैं अपने घर में ही चिर प्रवासी हूँ, बाहरी ब्रह्माण्ड के लिए मेरा मन सर्वदा आतुर रहता है। किसी विदेश का नाम आगे आते ही मेरा मन वहीं की उड़ान लगाने लगता है। इसी प्रकार किसी विदेशी को देखते ही तत्काल मेरा मन सरिता-पर्वत-बीहड़ वन के बीच में एक कुटीर का दृश्य देखने लगता है और एक उल्लासपूर्ण स्वतंत्र जीवन-यात्रा की बात कल्पना में जाग उठती है।</p>
<p>इधर देखा तो मैं ऐसी प्रकृति का प्राणी हूँ, जिसका अपना घर छोड़कर बाहर निकलने में सिर कटता है। यही कारण है कि सवेरे के समय अपने छोटे- से कमरे में मेज के सामने बैठकर उस काबुली से गप-शप लड़ाकर बहुत कुछ भ्रमण का काम निकाल लिया करता हूँ। मेरे सामने काबुल का पूरा चित्र खिंच जाता। दोनों ओर ऊबड़खाबड़, लाल-लाल ऊँचे दुर्गम पर्वत हैं और रेगिस्तानी मार्ग, उन पर लदे हुए ऊँटों की कतार जा रही है। ऊँचे-ऊँचे साफे बाँधे हुए सौदागर और यात्री कुछ ऊँट की सवारी पर हैं तो कुछ पैदल ही जा रहे हैं। किन्हीं के हाथों में बरछा है, तो कोई बाबा आदम के जमाने की पुरानी बन्दूक थामे हुए है। बादलों की भयानक गर्जन के स्वर में काबुली लोग अपने मिली-जुली भाषा में अपने देश की बातें कर रहे हैं।</p>
<p>मिनी की माँ बड़ी वहमी तबीयत की है। राह में किसी प्रकार का शोर-गुल हुआ नहीं कि उसने समझ लिया कि संसार भर के सारे मस्त शराबी हमारे ही घर की ओर दौड़े आ रहे हैं। उसके विचारों में यह दुनिया इस छोर से उस छोर तक चोर-डकैत, मस्त, शराबी, साँप, बाघ, रोगों, मलेरिया,तिलचट्टे और अंग्रेजों से भरी पड़ी है। इतने दिन हुए इस दुनिया में रहते हुए भी उसके मन का यह रोग दूर नहीं हुआ।</p>
<p>रहमत काबुली की ओर से भी वह पूरी तरह निश्चिंत नहीं थी। उस पर विशेष नजर रखने के लिए मुझसे बार-बार अनुरोध करती रहती। जब मैं उसके शक को परिहास के आवरण से ढकना चाहता तो मुझसे एक साथ कई प्रश्न पूछ बैठती, &#8220;क्या कभी किसी का लड़का नहीं चुराया गया? क्या काबुल में गुलाम नहीं बिकते? क्या एक लम्बे-तगड़े काबुली के लिए एक छोटे बच्चे का उठा ले जाना असम्भव है?&#8221; इत्यादि।</p>
<p>मुझे मानना पड़ता कि यह बात बिलकुल असम्भव भी नहीं है। भरोसा करने की शक्ति सबमें समान नहीं होती, अत: मिनी की माँ के मन में भय ही रह गया लेकिन केवल इसीलिए बिना किसी दोष के रहमत को अपने घर में आने से मना न कर सका।</p>
<p>हर वर्ष रहमत माघ मास में लगभग अपने देश लौट जाता है। इस समय वह अपने व्यापारियों से रुपया-पैसा वसूल करने में तल्लीन रहता है। उसे घर-घर, दुकान-दुकान घूमना पड़ता है, फिर भी मिनी से उसकी भेंट एक बार अवश्य हो जाती है। देखने में तो ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों के मध्य किसी षड्यंत्र का श्रीगणेश हो रहा है। जिस दिन वह सवेरे नहीं आ पाता, उस दिन देखूँ तो वह संध्या को हाजिर है। अँधेरे में घर के कोने में उस ढीले-ढाले जामा-पाजामा पहने, झोली वाले लम्बे-तगड़े आदमी को देखकर सचमुच ही मन में अचानक भय-सा पैदा हो जाता है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/kamchor-story-by-ismat-chughtai/9095/"><strong>कामचोर&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>लेकिन, जब देखता हूँ कि मिनी ‘ओ काबुलीवाला‘ पुकारती हुई हँसती-हँसती दौड़ी आती है और दो भिन्न-भिन्न आयु के असम मित्रों में वही पुराना हास-परिहास चलने लगता है, तब मेरा सारा हृदय खुशी से नाच उठता है।</p>
<p>एक दिन सवेरे मैं अपने छोटे कमरे में बैठा हुआ नई पुस्तक के प्रूफ देख रहा था। जाड़ा, विदा होने से पूर्व, आज दो-तीन दिन खूब जोरों से अपना प्रकोप दिखा रहा है। जिधर देखो, उधर उस जाड़े की ही चर्चा है। ऐसे जाड़े-पाले में खिड़की में से सवेरे की धूप मेज के नीचे मेरे पैरों पर आ पड़ी। उसकी गर्मी मुझे अच्छी प्रतीत होने लगी। लगभग आठ बजे का समय होगा। सिर से मफलर लपेटे ऊषाचरण सवेरे की सैर करके घर की ओर लौट रहे थे। ठीक इस समय राह में एक बड़े जोर का शोर सुनाई दिया।</p>
<p>देखूँ तो अपने उस रहमत को दो सिपाही बाँधे लिए जा रहे हैं। उनके पीछे बहुत से तमाशाई बच्चों का झुंड चला आ रहा है। रहमत के ढीले-ढाले कुर्ते पर खून के दाग हैं और एक सिपाही के हाथ में खून से लथपथ छुरा। मैंने द्वार से बाहर निकलकर सिपाही को रोक लिया, पूछा, &#8220;क्या बात है?&#8221;</p>
<p>कुछ सिपाही से और कुछ रहमत से सुना कि हमारे एक पड़ोसी ने रहमत से रामपुरी चादर खरीदी थी। उसके कुछ रुपए उसकी ओर बाकी थे, जिन्हें देने से उसने साफ इन्कार कर दिया। बस इसी पर दोनों में बात बढ़ गई और रहमत ने छुरा निकालकर घोंप दिया।</p>
<p>रहमत उस झूठे बेईमान आदमी के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के अपशब्द सुना रहा था। इतने में &#8220;काबुलीवाला! ओ काबुलीवाला!&#8221; पुकारती हुई मिनी घर से निकल आई।</p>
<p>रहमत का चेहरा क्षण-भर में कौतुक हास्य से चमक उठा। उसके कंधे पर आज झोली नहीं थी। अत: झोली के बारे में दोनों मित्रों की अभ्यस्त आलोचना न चल सकी। मिनी ने आते ही पूछा, &#8220;तुम ससुराल जाओगे।&#8221;</p>
<p>रहमत ने प्रफुल्लित मन से कहा, &#8220;हां, वहीं तो जा रहा हूं।&#8221;</p>
<p>रहमत ताड़ गया कि उसका यह जवाब मिनी के चेहरे पर हँसी न ला सकेगा और तब उसने हाथ दिखाकर कहा, &#8220;ससुर को मारता, पर क्या करूँ, हाथ बँधे हुए हैं।&#8221;</p>
<p>छुरा चलाने के जुर्म में रहमत को कई वर्ष का कारावास मिला।</p>
<p>रहमत का ध्यान धीरे-धीरे मन से बिल्कुल उतर गया। हम लोग अब अपने घर में बैठकर सदा के अभ्यस्त होने के कारण, नित्य के काम-धंधों में उलझे हुए दिन बिता रहे थे। तभी एक स्वाधीन पर्वतों पर घूमने वाला आदमी कारागार की प्राचीरों के अन्दर कैसे वर्ष पर वर्ष काट रहा होगा, यह बात हमारे मन में कभी उठी ही नहीं।</p>
<p>और चंचल मिनी का आचरण तो और भी लज्जाप्रद था। यह बात उसके पिता को भी माननी पड़ेगी। उसने सहज ही अपने पुराने मित्र को भूलकर पहले तो नबी सईस के साथ मित्रता जोड़ी, फिर क्रमश: जैसे-जैसे उसकी वयोवृध्दि होने लगी वैसे-वैसे सखा के बदले एक के बाद एक उसकी सखियाँ जुटने लगीं और तो क्या, अब वह अपने बाबा के लिखने के कमरे में भी दिखाई नहीं देती। मेरा तो एक तरह से उसके साथ नाता ही टूट गया है।</p>
<p>कितने ही वर्ष बीत गये। वर्षों बाद आज फिर शरद ऋतु आई है। मिनी की सगाई की बात पक्की हो गई। पूजा की छुट्टियों में उसका विवाह हो जाएगा। कैलाशवासिनी के साथ-साथ अबकी बार हमारे घर की आनन्दमयी मिनी भी माँ-बाप के घर में अँधेरा करके ससुराल चली जाएगी।</p>
<p>सवेरे सूर्यदेव बड़ी सज-धज के साथ निकले। वर्षों के बाद शरद ऋतु की यह नई धवल धूप सोने में सुहागे का काम दे रही है। कलकत्ता की सँकरी गलियों से परस्पर सटे हुए पुराने टूटे फूटे घरों के ऊपर भी इस धूप की आभा ने एक प्रकार का अनोखा सौन्दर्य बिखेर दिया है।</p>
<p>हमारे घर पर सूर्यदेव के आगमन से पूर्व ही शहनाई बज रही है। मुझे ऐसा प्रतीत हो रहा है कि जैसे यह मेरे हृदय की धड़कनों में से रो-रोकर बज रही हो। उसकी करुण भैरवी रागिनी मानो मेरी विच्छेद पीड़ा को जाड़े की धूप के साथ सारे ब्रह्माण्ड में फैला रही है। मेरी मिनी का आज विवाह है।</p>
<p>सवेरे से घर बवंडर बना हुआ है। हर समय आने-जाने वालों का ताँता बँधा हुआ है। आँगन में बाँसों का मंडप बनाया जा रहा है। हरेक कमरे और बरामदे में झाड़फानूस लटकाए जा रहे हैं, और उनकी टक-टक की आवाज मेरे कमरे में आ रही है। ‘चलो रे’, ‘जल्दी करो’, ‘इधर आओ’ की तो कोई गिनती ही नहीं है।</p>
<p>मैं अपने लिखने-पढ़ने के कमरे में बैठा हुआ हिसाब लिख रहा था। इतने में रहमत आया और अभिवादन करके खड़ा हो गया।</p>
<p>पहले तो मैं उसे पहचान न सका। उसके पास न तो झोली थी और न पहले जैसे लम्बे-लम्बे बाल और न चेहरे पर पहले जैसी दिव्य ज्योति ही थी। अन्त में उसकी मुस्कान देखकर पहचान सका कि वह रहमत है।</p>
<p>मैंने पूछा, &#8220;क्यों रहमत, कब आए?&#8221;</p>
<p>उसने कहा, &#8220;कल शाम को जेल से छूटा हूँ।&#8221;</p>
<p>सुनते ही उसके शब्द मेरे कानों में खट से बज उठे। किसी खूनी को मैंने कभी आँखों से नहीं देखा था, उसे देखकर मेरा सारा मन एकाएक सिकुड़-सा गया। मेरी यही इच्छा होने लगी कि आज के इस शुभ दिन में वह इंसान यहाँ से टल जाए तो अच्छा हो।</p>
<p>मैंने उससे कहा, &#8220;आज हमारे घर में कुछ आवश्यक काम है, सो आज मैं उसमें लगा हुआ हूं। आज तुम जाओ, फिर आना।&#8221;</p>
<p>मेरी बात सुनकर वह उसी क्षण जाने को तैयार हो गया। पर दरवाज़े के पास आकर कुछ इधर-उधर देखकर बोला, &#8220;क्या, बच्ची को तनिक नहीं देख सकता?&#8221;</p>
<p>शायद उसे यही विश्वास था कि मिनी अब तक वैसी ही बच्ची बनी है। उसने सोचा हो कि मिनी अब भी पहले की तरह ‘काबुलीवाला, ओ काबुलीवाला’ पुकारती हुई दौड़ी चली आएगी। उन दोनों के पहले हास-परिहास में किसी प्रकार की रुकावट न होगी? यहाँ तक कि पहले की मित्रता की याद करके वह एक पेटी अंगूर और एक कागज के दोने में थोड़ी-सी किसमिस और बादाम, शायद अपने देश के किसी आदमी से माँग-ताँगकर लेता आया था। उसकी पहले की मैली-कुचैली झोली आज उसके पास न थी।</p>
<p>मैंने कहा, &#8220;आज घर में बहुत काम है। सो किसी से भेंट न हो सकेगी।&#8221;</p>
<p>मेरा उत्तर सुनकर वह कुछ उदास-सा हो गया। उसी मुद्रा में उसने एक बार मेरे मुख की ओर स्थिर दृष्टि से देखा। फिर अभिवादन करके दरवाजे के बाहर निकल गया।</p>
<p>मेरे हृदय में जाने कैसी एक वेदना-सी उठी। मैं सोच ही रहा था कि उसे बुलाऊँ, इतने में देखा तो वह स्वयं ही आ रहा है।</p>
<p>वह पास आकर बोला, &#8220;ये अंगूर और कुछ किसमिस, बादाम बच्ची के लिए लाया था, उसको दे दीजिएगा।&#8221;</p>
<p>मैंने उसके हाथ से सामान लेकर पैसे देने चाहे, लेकिन उसने मेरे हाथ को थामते हुए कहा, &#8220;आपकी बहुत मेहरबानी है बाबू साहब, हमेशा याद रहेगी, पिसा रहने दीजिए।&#8221; तनिक रुककर फिर बोला- &#8220;बाबू साहब! आपकी जैसी मेरी भी देश में एक बच्ची है। मैं उसकी याद कर-कर आपकी बच्ची के लिए थोड़ी-सी मेवा हाथ में ले आया करता हूँ। मैं यह सौदा बेचने नहीं आता।&#8221;</p>
<p>कहते हुए उसने ढीले-ढाले कुर्ते के अन्दर हाथ डालकर छाती के पास से एक मैला-कुचैला मुड़ा हुआ कागज का टुकड़ा निकाला, और बड़े जतन से उसकी चारों तहें खोलकर दोनों हाथों से उसे फैलाकर मेरी मेज पर रख दिया।</p>
<p>देखा कि कागज के उस टुकड़े पर एक नन्हे-से हाथ के छोटे-से पंजे की छाप है। फोटो नहीं, तेलचित्र नहीं, हाथ में-थोड़ी-सी कालिख लगाकर कागज के ऊपर उसी का निशान ले लिया गया है। अपनी बेटी के इस स्मृति-पत्र को छाती से लगाकर, रहमत हर वर्ष कलकत्ता के गली-कूचों में सौदा बेचने के लिए आता है और तब वह कालिख चित्र मानो उसकी बच्ची के हाथ का कोमल-स्पर्श, उसके बिछड़े हुए विशाल हृदय में अमृत उड़ेलता रहता है।</p>
<p>देखकर मेरी आँखें भर आईं और फिर मैं इस बात को बिल्कुल ही भूल गया कि वह एक मामूली काबुली मेवा वाला है, मैं एक उच्च वंश का रईस हूँ। तब मुझे ऐसा लगने लगा कि जो वह है, वही मैं हूँ। वह भी एक पिता है और मैं भी। उसकी पर्वतवासिनी छोटी बच्ची की निशानी मेरी ही मिनी की याद दिलाती है। मैंने तत्काल ही मिनी को बाहर बुलवाया; हालाँकि इस पर अन्दर घर में आपत्ति की गई, पर मैंने उस पर कुछ भी ध्यान नहीं दिया। विवाह के वस्त्रों और अलंकारों में लिपटी हुई बेचारी मिनी मारे लज्जा के सिकुड़ी हुई-सी मेरे पास आकर खड़ी हो गई।</p>
<p>उस अवस्था में देखकर रहमत काबुल पहले तो सकपका गया। उससे पहले जैसी बातचीत न करते बना। बाद में हँसते हुए बोला, &#8220;लल्ली! सास के घर जा रही है क्या?&#8221;</p>
<p>मिनी अब सास का अर्थ समझने लगी थी, अत: अब उससे पहले की तरह उत्तर देते न बना। रहमत की बात सुनकर मारे लज्जा के उसके कपोल लाल हो उठे। उसने मुँह को फेर लिया। मुझे उस दिन की याद आई, जब रहमत के साथ मिनी का प्रथम परिचय हुआ था। मन में एक पीड़ा की लहर दौड़ गई।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/gulelbaz-ladka-story-by-bhisham-sahni/9073/"><strong>गुलेलबाज़ लड़का&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>मिनी के चले जाने के बाद, एक गहरी साँस लेकर रहमत फर्श पर बैठ गया। शायद उसकी समझ में यह बात एकाएक साफ हो गई कि उसकी बेटी भी इतने दिनों में बड़ी हो गई होगी, और उसके साथ भी उसे अब फिर से नई जान-पहचान करनी पड़ेगी। सम्भवत: वह उसे पहले जैसी नहीं पाएगा। इन आठ वर्षों में उसका क्या हुआ होगा, कौन जाने? सवेरे के समय शरद की स्निग्ध सूर्य किरणों में शहनाई बजने लगी और रहमत कलकत्ता की एक गली के भीतर बैठा हुआ अफगानिस्तान के मेरु-पर्वत का दृश्य देखने लगा।</p>
<p>मैंने एक नोट निकालकर उसके हाथ में दिया और कहा, &#8220;रहमत, तुम देश चले जाओ, अपनी बेटी के पास। तुम दोनों के मिलन-सुख से मेरी मिनी सुख पाएगी।&#8221;</p>
<p>रहमत को रुपए देने के बाद विवाह के हिसाब में से मुझे उत्सव-समारोह के दो-एक अंग छाँटकर काट देने पड़े। जैसी मन में थी, वैसी रोशनी नहीं करा सका, अंग्रेजी बाजा भी नहीं आया, घर में औरतें बड़ी बिगड़ने लगीं, सब कुछ हुआ, फिर भी मेरा विचार है कि आज एक अपूर्व ज्योत्स्ना से हमारा शुभ समारोह उज्ज्वल हो उठा।</p>
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		<title>पोस्टमास्टर&#8230; पढिए आज की कहानी</title>
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		<pubDate>Mon, 07 Jun 2021 10:29:54 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Art and Literature]]></category>
		<category><![CDATA[Cover Stories]]></category>
		<category><![CDATA[Editorial]]></category>
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		<category><![CDATA[Story By Rabindranath Tagore]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>~रबीन्द्रनाथ टैगोर काम शुरू करते ही पहले पहल पोस्टमास्टर को उलापुर गांव आना पड़ा। गांव बहुत साधारण था। गांव के पास ही एक नील-कोठी थी। इसीलिए कोठी के स्वामी ने बहुत कोशिश करके यह नया पोस्टऑफिस खुलवाया था। हमारे पोस्टमास्टर कलकत्ता के थे। पानी से निकलकर सूखे में डाल देने से मछली की जो दशा &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/the-postmaster-story-by-rabindranath-tagore/8978/">पोस्टमास्टर&#8230; पढिए आज की कहानी</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="color: #ff0000;">~रबीन्द्रनाथ टैगोर</span></h4>
<p>काम शुरू करते ही पहले पहल पोस्टमास्टर को उलापुर गांव आना पड़ा। गांव बहुत साधारण था। गांव के पास ही एक नील-कोठी थी। इसीलिए कोठी के स्वामी ने बहुत कोशिश करके यह नया पोस्टऑफिस खुलवाया था।</p>
<p>हमारे पोस्टमास्टर कलकत्ता के थे। पानी से निकलकर सूखे में डाल देने से मछली की जो दशा होती है वही दशा इस बड़े गांव में आकर इन पोस्टमास्टर की हुई। एक अंधेरी आठचाला में उनका ऑफिस था, पास ही काई से घिरा एक तालाब था, जिसके चारों ओर जंगल था। कोठी में गुमाश्ते वगैरह जितने भी कर्मचारी थे उन्हें अक्सर फुर्सत नहीं रहती थी, न वे शिष्टजनों से मिलने-जुलने के योग्य ही थे।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/namak-ka-daroga-story-by-munshi-prem-chand/8954/"><strong>नमक का दारोगा&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>खासतौर से कलकत्ता के बाबू ठीक तरह से मिलना-जुलना नहीं जानते। नई जगह में पहुंचकर वे या तो उद्धत हो जाते हैं या अप्रतिभ। इसलिए स्थानीय लोगों से उनका मेल-जोल नहीं हो पाता। इधर काम भी ज्यादा नहीं था। कभी-कभी एकाध कविता लिखने की कोशिश करते। उनमें इस प्रकार के भाव व्यक्त करते-दिनभर तरु-पल्लवों का कम्पन और आकाश के बादल देखते-देखते जीवन बड़े सुख से कट जाता है। लेकिन अन्तर्यामी जानते हैं कि यदि अलिफलैला का कोई दैत्य आकर एक ही रात में तरु-पल्लव समेत इन सारे पेड़-पौधों को काटकर पक्का रास्ता तैयार कर देता और पंक्तिबद्ध अट्टालिकाओं द्वारा बादलों को दृष्टि से ओझल कर देता तो यह मृतप्राय भद्र वंशधर नवीन जीवन-लाभ कर लेता।</p>
<p>पोस्टमास्टर को बहुत कम तनख्वाह मिलती थी। अपने हाथों बनाकर खाना पड़ता और गांव की एक मातृ-पितृ-हीन अनाथ बालिका इनका काम-काज कर देती थी। उसको थोड़ा-बहुत खाना मिल जाता। लड़की का नाम था रतन। उम्र बारह-तेरह। उसके विवाह की कोई विशेष सम्भावना नहीं दिखाई देती थी।</p>
<p>शाम को जब गांव की गोशाला से कुंडलाकार धुआं उठता, झाड़ियों में झींगुर बोलते दूर के गांव में पियक्कड़ बाउलों का दल ढोल-करताल बजाकर ऊंचे स्वर में गीत छेड़ देता-जब अन्दर बरामदे में अकेले बैठे-बैठे वृक्षों का कम्पन देखकर कवि-हृदय में भी ईषत् हृत्कंप होने लगता तब कमरे के कोने में एक टिमटिमाता हुआ दिया जलाकर पोस्टमास्टर आवाज लगाते-‘रतन’।<br />
रतन दरवाजे पर बैठी इस आवाज की प्रतीक्षा करती रहती। लेकिन पहली आवाज पर ही अन्दर न आती। वहीं से कहती, ‘‘क्या है बाबू, किसलिए बुला रहे हो ?’’<br />
पोस्टमास्टर, ‘‘तू क्या कर रही है ?’’<br />
रतन, ‘‘बस चूल्हा जलाने ही जा रही हूं, रसोईघर में।’’<br />
पोस्टमास्टर, ‘‘तेरा रसोई का काम पीछे हो जायेगा। पहले हुक्का भर ला !’’</p>
<p>थोड़ी देर में अपने गाल फुलाए चिलम में फूंक मारती-मारती रतन भीतर आती। उसके हाथ से हुक्का लेकर पोस्टमास्टर चट से पूछ बैठते, ‘‘अच्छा रतन, तुझे अपनी मां की याद है ?’’</p>
<p>बड़ी लम्बी बातें हैं, बहुत-सी याद हैं, बहुत-सी याद भी नहीं। माँ की अपेक्षा पिता उसको अधिक प्यार करते थे। पिता की उसे थोड़ी-थोड़ी याद है। दिन भर मेहनत करके उसके पिता शाम को घर लौटते। भाग्य से उन्हीं में से दो-एक शामों की याद उसके मन में चित्र के समान अंकित है। उन्हीं की बात करते-करते धीरे-धीरे रतन पोस्टमास्टर के पास ही जमीन पर बैठ जाती। उसे ध्यान आता, उसका एक भाई था। बहुत दिन पहले बरसात में एक दिन तालाब के किनारे दोनों ने मिलकर पेड़ की टूटी हुई टहनी की बंसी बनाकर झूठ-मूठ मछली पकड़ने का खेल खेला था। अनेक महत्त्वपूर्ण घटनाओं की अपेक्षा इसी बात की याद उसे अधिक आती। इस तरह बातें करते-करते कभी-कभी काफी रात हो जाती। तब आलस के मारे पोस्टमास्टर को खाना बनाने की इच्छा न होती। सबेरे की बासी तरकारी रहती और रतन झटपट चूल्हा जलाकर कुछ रोटियां सेक लेती। उन्हीं से दोनों के रात्रि-भोजन का काम चल जाता।</p>
<p>कभी-कभी शाम को उस बृहत् आठचाला के एक कोने में ऑफिस की काठ की कुर्सी पर बैठे-बैठे पोस्टमास्टर भी अपने घर की बात चलाते-छोटे-भाई की बात, मां और दीदी की बात, प्रवास में एकान्त कमरे में बैठकर जिन लोगों के लिए हृदय कातर हो उठता उनकी बात। जो बातें उनके मन में बार-बार उदय होती रहतीं, पर जो नील-कोठी के गुमाश्तों के सामने किसी भी तरह नहीं उठाई जा सकती थीं, उन्हीं बातों को उस अनपढ़ नन्ही बालिका से कहते उन्हें बिल्कुल संकोच न लगता। अन्त में ऐसा हुआ कि बालिका बातचीत करते समय उनके घर वालों को चिरपरिचितों के समान खुद भी मां, दादा, दीदी कहने लगी। यहां तक कि अपने नन्हे-से हृदयपट पर उसने उनकी काल्पनिक मूर्ति भी चित्रित कर ली थी।</p>
<p>एक दिन बरसात की दोपहर में बादल छंट गए थे और हलका-सा ताप लिये सुकोमल हवा चल रही थी। धूप में नहाई घास से और पेड़-पौधों से एक प्रकार की गन्ध निकल रही थी; ऐसा लगता था मानो क्लान्त धरती का उष्ण निःश्वास अंगों को छू रहा हो और न जाने कहां का एक हठी पक्षी दोपहर-भर प्रकृति के दरबार में लगातार एक लय से अत्यन्त करुण स्वर में अपनी नालिश दुहरा रहा था। उस दिन पोस्टमास्टर के हाथ खाली थे। वर्षों के धुले लहलहाते चिकने मृदुल तरु-पल्लव और धूप में चमकते पराजित वर्षा के भग्नावशिष्ट स्तूपाकार बादल सचमुच देखने योग्य थे।</p>
<p>पोस्टमास्टर उन्हें देखते जाते और सोचते जाते कि इस समय यदि कोई आत्मीय अपने पास होता, हृदय के साथ एकान्त संलग्न कोई स्नेह की प्रतिमा मानव-मूर्ति। धीरे-धीरे उन्हें ऐसा लगने लगा मानो वह पक्षी भी बार-बार यही कह रहा हो, और मानो उस निर्जन में तरु-छाया में डूबी दोपहर के पल्लव-मर्मर का भी कुछ ऐसा ही अर्थ हो। न तो कोई विश्वास कर सकता, न जान पाता, लेकिन उस छोटे से गांव के सामान्य वेतन भोगी उस सब-पोस्टमास्टर के मन में छुट्टी के लम्बे दिनों में गम्भीर सुनसान दोपहर में इसी प्रकार के भाव उदय होते रहते।<br />
पोस्टमास्टर ने एक दीर्घ निःश्वास लिया और फिर आवाज लगाई, ‘‘रतन !’’</p>
<p>रतन उस समय अमरूद के पेड़ के नीचे पैर फैलाए कच्चा अमरूद खा रही थी वह मालिक की आवाज सुनते ही तुरन्त दौड़ी हुई आई और हांफती-हांफती बोली, ‘‘भैयाजी, बुला रहे थे ?’</p>
<p>पोस्टमास्टर ने कहा, ‘‘मैं तुझे थोड़ा-थोड़ा करके पढ़ना सिखाऊंगा।’’ और फिर दोपहर-भर उसके साथ ‘छोटा अ’, ‘बड़ा अ’ करते रहे। इस तरह कुछ दिनों में संयुक्त अक्षर भी पार कर लिए।</p>
<p>सावन का महीना था। लगातार वर्षा हो रही थी। गड्ढे, नाले, तालाब, सब पानी से भर गए थे। रात-दिन मेढक की टर्र-टर्र और वर्षा की आवाज। गांव के रास्तों में चलना-फिरना लगभग बन्द हो गया था। हाट के लिए नाव में चढ़कर जाना पड़ता।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/ginni-story-by-rabindranath-tagore/8937/"><strong>गिन्&#x200d;नी&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>एक दिन सवेरे से ही बादल खूब घिरे हुए थे। पोस्टमास्टर की शिष्या बड़ी देर से दरवाजे के पास बैठी प्रतीक्षा कर रही थी, लेकिन और दिनों की तरह जब यथासमय उसकी बुलाहट न हुई तो खुद किताबों का थैला लिये धीरे-धीरे भीतर आई। देखा, पोस्टमास्टर अपनी खटिया पर लेटे हुए हैं। यह सोचकर कि वे आराम कर रहे हैं, वह चुपचाप फिर बाहर जाने लगी। तभी अचानक सुनाई पड़ा ‘रतन !’ झपटकर लौटकर भीतर जाकर उसने कहा, ‘‘भैयाजी, सो रहे थे ?’’<br />
पोस्टमास्टर ने कातर स्वर में कहा, ‘‘तबीयत ठीक नहीं मालूम होती। जरा मेरे माथे पर हाथ रखकर तो देख !’’</p>
<p>घोर वर्षा के समय प्रवास में इस तरह बिल्कुल अकेले रहने पर रोग से पीड़ित शरीर को कुछ सेवा पाने की इच्छा होती है। तप्त ललाट पर शंख की चूड़ियां पहने कोमल हाथ याद आने लगते हैं। ऐसे कठिन प्रवास में रोग की पीड़ा में यह सोचने की इच्छा होती है कि पास ही स्नेहमयी नारी के रूप में माता और दीदी बैठी हैं और प्रवासी के मन की यह अभिलाषा व्यर्थ नहीं गई। बालिका रतन बालिका न रही। उसने फौरन माता का पद ग्रहण कर लिया। वह जाकर वैद्य को बुला लाई, यथासमय गोली खिलाई, सारी रात सिरहाने बैठी रही, अपने हाथों पथ्य तैयार किया और सैकड़ों बार पूछती रही, ‘‘भैयाजी कुछ आराम है क्या ?’’</p>
<p>बहुत दिनों बाद पोस्टमास्टर जब रोग-शय्या छोड़कर उठे तो उनका शरीर दुर्बल हो गया था। उन्होंने मन में तय किया, अब और नहीं। जैसे भी हो, अब यहां से बदली करानी चाहिए। अपनी अस्वस्थता का उल्लेख करते हुए उन्होंने उसी समय अधिकारियों के पास बदली के लिए कलकत्ता दरख्वास्त भेज दी।</p>
<p>रोगी की सेवा से छुट्टी पाकर रतन ने दरवाजे के बाहर फिर अपने स्थान पर अधिकार जमा लिया। लेकिन अब पहले की तरह उसकी बुलाहट नहीं होती थी। वह बीच-बीच में झांककर देखती-पोस्टमास्टर बड़े ही अनमने भाव से या तो कुर्सी पर बैठे रहते या खाट पर लेटे रहते।<br />
जिस समय इधर रतन बुलाहट की प्रतीक्षा में रहती, वे अधीर होकर अपनी दरख्वास्त के उत्तर की प्रतीक्षा करते रहते। दरवाजे के बाहर बैठी रतन ने हजारों बार अपना पुराना पाठ दुहराया। बाद में यदि किसी दिन सहसा उसकी बुलाहट हुई तो उस दिन कहीं उसका संयुक्त अक्षरों का ज्ञान गड़बड़ न हो जाय इसकी उसे आशंका थी। आखिर लगभग एक सप्ताह के बाद एक दिन शाम को उस की पुकार हुई। कांपते हृदय से उसने भीतर प्रवेश किया और पूछा, ‘‘भैयाजी, मुझे बुलाया था ?’’<br />
पोस्टमास्टर ने कहा, ‘‘रतन, मैं कल ही चला जाऊंगा।’’<br />
रतन, ‘‘कहां चले जाओगे भैयाजी !’’<br />
पोस्टमास्टर, ‘‘घर जाऊंगा।’’<br />
रतन, ‘‘फिर कब लौटोगे ?’’<br />
पोस्टमास्टर, ‘‘अब नहीं लौटूंगा।’’</p>
<p>रतन ने और कोई बात नहीं पूछी। पोस्टमास्टर ने स्वयं ही उसे बताया कि उन्होंने बदली के लिए दरख्वास्त दी थी, पर दरख्वास्त नामंजूर हो गई इसलिए वे इस्तीफा देकर घर चले जा रहे हैं। बहुत देर तक दोनों में से किसी ने और कोई बात नहीं की। दीया टिमटिमाता रहा और घर के जीर्ण छप्पर को भेदकर वर्षा का पानी मिट्टी के सकोरे में टप-टप करता टपकता रहा।</p>
<p>बड़ी देर के बाद इतने धीरे उठकर रसोईघर में रोटियां बनाने चली गई। पर आज और दिनों की तरह उसके हाथ जल्दी-जल्दी नहीं चल रहे थे। शायद उसके मन में रह-रहकर तरह-तरह की आशंकाएं उठ रही थीं। जब पोस्टमास्टर भोजन कर चुके तब उसने पूछा, ‘‘भैयाजी, मुझे अपने घर ले चलोगे ?’’</p>
<p>पोस्टमास्टर ने हंसकर कहा, ‘‘वाह, यह कैसे हो सकता है !’’ किन कारणों से यह बात सम्भव न थी, बालिका को यह समझाना उन्होंने आवश्यक नहीं समझा।<br />
रातभर जागते और स्वप्न देखते हुए बालिका के कानों में पोस्टमास्टर के हंसी-मिश्रित स्वर गूंजते रहे, ‘वाह, यह कैसे हो सकता है।’</p>
<p>सवेरे उठकर पोस्टमास्टर ने देखा कि उनके नहाने के लिए पानी पहले से ही रख दिया गया है। कलकत्ता की अपनी आदत के अनुसार वे ताजे पानी से ही स्नान करते थे। न जाने क्यों बालिका यह नहीं पूछ सकी थी कि वे सवेरे किस समय यात्रा करेंगे। बाद में कहीं तड़के ही जरूरत न पड़ जाय, यह सोचकर रतन उतनी रात में ही नदी से उनके नहाने के लिए पानी भरकर ले आई थी। स्नान समाप्त होते ही रतन की पुकार हुई। रतन ने चुपचाप भीतर प्रवेश किया और आदेश की प्रतीक्षा में मौन भाव से एक बार अपने मालिक की ओर देखा।</p>
<p>मालिक ने कहा, ‘‘रतन, मेरी जगह जो सज्जन आयेंगे मैं उन्हें कह जाऊंगा। वे मेरी ही तरह तेरी देख-भाल करेंगे। मेरे जाने से तुझे कोई चिंता करने की जरूरत नहीं है।’’ इसमें कोई सन्देह नहीं कि ये बातें अत्यन्त स्नेहपूर्ण और दयार्द्र हृदय से निकली थीं, किन्तु नारी के हृदय को कौन समझ सकता है ! रतन इसके पहले बहुत बार अपने मालिक के हाथों अपना तिरस्कार चुपचाप सहन कर चुकी थी, लेकिन इस कोमल बात को वह सहन न कर पाई। उसका हृदय एकाएक उमड़ आया और उसने रोते-रोते कहा, ‘‘नहीं, नहीं। तुम्हें किसी से कुछ कहने की जरूरत नहीं है, मैं रहना नहीं चाहती।’’</p>
<p>पोस्टमास्टर ने रतन का ऐसा व्यवहार पहले कभी नहीं देखा था, इसलिए वे अवाक् रह गए। नया पोस्टमास्टर आया। उसको सारा चार्ज सौंप देने के बाद पुराने पोस्टमास्टर चलने को तैयार हुए। चलते-चलते रतन को बुलाकर बोले, ‘‘रतन, तुझे मैं कभी कुछ न दे सका, आज जाते समय कुछ दिए जा रहा हूं, इससे कुछ दिन तेरा काम चल जायेगा।’’</p>
<p>तनख्वाह में जो रुपये मिले थे उनमें से राह-खर्च के लिए कुछ बचा लेने के बाद उन्होंने बाकी रुपये जेब से निकाले। यह देखकर रतन धूल में लोटकर उनके पैरों से लिपटकर बोली, ‘‘भैयाजी, मैं तुम्हारे पैरों पड़ती हूं, मेरे लिए किसी को कोई चिन्ता करने की जरूरत नहीं।’’ और यह कहते-कहते वह तुरन्त वहां से भाग गई।</p>
<p>भूतपूर्व पोस्टमास्टर दीर्घ निःश्वास लेकर हाथ में कारपेट का बैग लटकाए, कन्धे पर छाता रखे, कुली के सिर पर नीली-सफेद धारियों से चित्रित टीन की पेटी रखवाकर धीरे-धीरे नाव की ओर चल दिए।</p>
<p>जब वे नौका पर सवार हो गए और नाव चल पड़ी, वर्षा से उमड़ी नदी धरती की छलछलाती अश्रु-धारा के समान चारों ओर छलछल करने लगी, तब वे अपने हृदय में एक तीव्र व्यथा अनुभव करने लगे। एक साधारण ग्रामीण बालिका के करुण मुख का चित्र मानो विश्व-व्यापी बृहत् अव्यक्त मर्म-व्यथा प्रकट करने लग गया।</p>
<p>एक बार बड़े जोर से उनकी इच्छा हुई कि लौट जायें और जगत् की गोद से वंचित उस अनाथिनी को साथ ले आयें। लेकिन तब तक पाल में हवा भर गई थी, वर्षा का प्रवाह और भी तेज हो गया था। गांव को पार कर चुकने के बाद नदी-किनारे का श्मशान दिखाई दे रहा था और नदी की धारा के साथ बढ़ते हुए पथिक के उदास हृदय में यह सत्य उदित हो रहा था, ‘‘जीवन में न जाने कितना वियोग है, कितना मरण है, लौटने के क्या लाभ ! संसार में कौन किसका है !’</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/intezar-story-by-kamleshwar/8915/"><strong>इंतज़ार&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>लेकिन रतन के हृदय में किसी भी सत्य का उदय नहीं हुआ। वह उस पोस्टऑफिस के चारों ओर चुपचाप आंसू बहाती चक्कर काटती रही। शायद उसके मन में हल्की-सी आशा जीवित थी कि हो सकता है, भैयाजी, लौट आयें। आशा के इसी बन्धन से बंधी वह किसी भी तरह दूर नहीं जा पा रही थी।</p>
<p>हाय रे बुद्धिहीन मानव-हृदय ! तेरी भ्रान्ति किसी भी तरह नहीं मिटती। युक्ति शास्त्र का तर्क बड़ी देर बाद मस्तिष्क में प्रवेश करता है। प्रबल से प्रबल प्रमाण पर भी अविश्वास करके मिथ्या आशा को अपनी दोनों बांहों से जकड़कर तू भरसक छाती से चिपकाए रहता है। अन्त में एक दिन सारी नाड़ियां काटकर, हृदय का सारा रक्त चूसकर वह निकल भागती है। तब होश आते ही मन किसी दूसरी भ्रान्ति के जाल में बंध जाने के लिए व्याकुल हो उठता है।</p>
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		<title>गिन्‍नी&#8230; आज की कहानी</title>
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		<pubDate>Sat, 05 Jun 2021 08:54:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>~रबीन्द्रनाथ टैगोर हमारे पंडित शिवनाथ छात्रवृत्ति कक्षा से दो-तीन क्लास नीचे के अध्यापक थे। उनके दाढ़ी-मूँछ नहीं थी, बाल छँटे हुए थे और चोटी छोटी-सी थी। उन्हें देखते ही बच्चों की अन्तरात्मा सूख जाती थी। प्राणियों में देखा जाता है कि जिनके दंश होता है उनके दाँत नहीं होते। हमारे पंडित महाशय के दोनों एक &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="color: #ff0000;">~रबीन्द्रनाथ टैगोर</span></h4>
<p>हमारे पंडित शिवनाथ छात्रवृत्ति कक्षा से दो-तीन क्लास नीचे के अध्यापक थे। उनके दाढ़ी-मूँछ नहीं थी, बाल छँटे हुए थे और चोटी छोटी-सी थी। उन्हें देखते ही बच्चों की अन्तरात्मा सूख जाती थी।</p>
<p>प्राणियों में देखा जाता है कि जिनके दंश होता है उनके दाँत नहीं होते। हमारे पंडित महाशय के दोनों एक साथ थे। एक तरफ से चाँटे, थप्पड़, मुक्के ऐसे बरसाते जैसे छोटे पौधों पर ओले बरसते हैं, दूसरी तरफ से तीखे वाक्यों की आग से प्राण बाहर आने को हो जाते।</p>
<p>इनका आक्षेप था कि अब पुराने ज़माने की तरह गुरु-शिष्य सम्बन्ध नहीं रहा; अब छात्र गुरुओं की देवता के समान भक्ति नहीं करते; यह कहकर अपनी उपेक्षित महिमा बच्चों के दिमाग में बलपूर्वक भरते थे; और बीच-बीच में हुंकार उठते थे, पर उसमें इतनी छोटी बातें मिली रहती थीं कि उन्हें देवता की गर्जना मानने का भ्रम कोई नहीं कर सकता था। अगर वज्रनाद की तरह गर्जना से बाप को गाली दी जाए, तो उसके पीछे छिपी बंगाली की क्षुद्रता फौरन पकड़ में आ जाएगी।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/intezar-story-by-kamleshwar/8915/"><strong>इंतज़ार&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>जो भी हो, हमारे स्कूल के इस तीसरी कक्षा के दूसरे विभाग के देवता को कोई इन्द्र चन्द्र वरुण या कार्तिक मानने का भ्रम नहीं कर सकता; सिर्फ एक देवता के साथ उनका सादृश्य माना जा सकता है, और उनका नाम है यम; और इतने दिन बाद स्वीकार करने में न डर है न दोष, कि हम मन-ही-मन यह कामना करते थे कि उपरोक्त देवता के यहाँ जाने में उन्हें और देर न हो।</p>
<p>पर यह अच्छी तरह समझ में आ गया था कि नरदेवता जैसा दुष्ट कुछ नहीं है। स्वर्ग में रहनेवाले देवता कोई उपद्रव नहीं करते। पेड़ पर से एक फूल तोड़कर दे दो तो खुश हो जाते हैं, न दो तो तकाज़ा करने नहीं आते। हमारे नरदेवता गण बहुत ज्यादा चाहते हैं, और हमारी तिलभर भूल होते ही दोनों आँखें खून के से लाल रंग को करके डाँटने आते, तब वे किसी तरह देवता जैसे नहीं दिखते।</p>
<p>बच्चों को तंग करने के लिए हमारे शिवनाथ पंडित के पास एक अस्त्र था, वह सुनने में जितना मामूली लगता था, उतना ही भयानक था। वे लड़कों के नये नाम रखते थे। नाम चीज़ तो सिर्फ शब्द है और कुछ नहीं किन्तु अधिकतर लोग अपने से ज्यादा अपने नाम को प्यार करते हैं; अपने नाम के प्रचार के लिए लोग क्या-क्या कष्ट नहीं सहते, यहाँ तक कि नाम को बचाने के लिए लोग अपने आप मरने में भी नहीं झिझकते।</p>
<p>ऐसे नाम के प्रेमी मनुष्य के नाम को विकृत कर देने से उसके प्राणों से प्रिय स्थान पर आघात पहुँचाना होता है। यहाँ तक कि जिसका नाम भूतनाथ है उसे अगर नलिनीकान्त बुलाओ तो भी उसे असहा लगता है।</p>
<p>इससे यह पता चलता है कि मनुष्य वस्तु से अवस्तु को ज्यादा मूल्यवान समझता है, सोने से ज्यादा वाणी, प्राणों से अधिक मान और अपने से ज्यादा अपने नाम को बड़ा समझता है।</p>
<p>मानव-स्वभाव में छिपे इन सब गृढ़ नियमों को जानने वाले पंडित महाशय ने जब शशिशेखर को भेटकी (एक प्रकार की मछली) नाम दिया तब वह बहुत दुखी हो उठा। ख़ासकर उस नामकरण में उसके चेहरे की तरह खास इशारा है जानकर उसकी आन्तरिक पीड़ा दुगुनी हो उठी, फिर भी शान्त भाव से सब कुछ सहकर चुप रहकर बैठना पड़ा।<br />
आशु का नाम था गिन्&#x200d;नी, पर उसके साथ थोड़ा इतिहास जुड़ा था।</p>
<p>आशु बेचारा पूरी क्लास में सबसे शरीफ था। किसी से कुछ नहीं कहता था, बहुत शरमीला था; लगता है उम्र में भी सबसे छोटा था, सब बातों में सिर्फ धीरे- धीरे मुस्कराता रहता था; अच्छी तरह पढ़ता था; स्कूल के बहुत-से लड़के उससे दोस्ती करने को तैयार रहते थे पर वह किसी लड़के के साथ नहीं खेलता था, और छुट्टी होते ही पलभर की देरी किए बिना घर चला जाता था।</p>
<p>पत्ते के दोने में दो-एक मिठाई और काँसे के छोटे-से लोटे में पानी लेकर ठीक एक बजे घर से दासी आती थी। आशु को इससे बहुत शर्म आती थी; दासी के लौटने पर उसकी जान में जान आती थी। वह स्कूल का छात्र होने के अलावा भी कुछ है, यह स्कूल के लड़कों के सामने व्यक्त करना उसे अच्छा नहीं लगता था। वह घर का कुछ है, माँ-बाप का बेटा है, भाई-बहनों का भाई है, यह जैसे गुप्त बात है, यह वह साथियों को बताना नहीं चाहता था, उसकी यही कोशिश रहती थी।</p>
<p>पढ़ाई-लिखाई के बारे में उसमें कोई कमी नहीं थी, सिर्फ कभी-कभी क्लास में आने में देर हो जाती थी, और शिवनाथ पंडित जब इसका कारण पूछते तो वह कोई ठीक जवाब नहीं दे पाता था। इसलिए बीच-बीच में उसकी बहुत भर्त्सना की जाती थी। पंडित उसे घुटनों पर हाथ रखकर पीठ नीची करके बरामदे में सीढ़ियों के पास खड़ा कर देते थे; चारों क्लासों के लड़के उस शरमीले अभागे बच्चे को इस स्थिति में देखते थे।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/lottery-story-by-munshi-premchand/8894/"><strong>लॉटरी&#8230; पढ़िए आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>एक दिन ग्रहण की छुट्टी थी। उससे अगले दिन स्कूल आकर पंडितजी महाराज चौकी पर बैठे और दरवाज़े की तरफ देखा, एक स्लेट और स्याही के दागों वाले कपड़े के थैले में किताबें कसकर पकड़े हुए और दिनों से ज्यादा सकुचाता आशु क्लास में घुस रहा था।</p>
<p>शिवनाथ पंडित ने सूखी हँसी हँसते हुए कहा, &#8216;ये लो गिन्&#x200d;नी आ रही है।&#8217;<br />
इसके बाद पढ़ाई ख़त्म होने पर छुट्टी से पहले उन्होंने सब छात्रों को सम्बोधन करके कहा, &#8216;सुनो, तुम सब सुनो।&#8217;</p>
<p>धरती की सारी गुरुत्वाकर्षण शक्ति पूरे ज़ोर से बच्चों को नीचे की तरफ खींचने लगी; पर बेचारा आशु उसी बेंच के ऊपर धोती की चुन्नटें और दोनों पैर लटकाए पूरी क्लास के बच्चों का निशाना बना बैठा रहा! अब तक आशु की बहुत उम्र हो चुकी होगी, और उसके जीवन में बहुत-से ज्यादा बड़े सुख-दुख लज्जा के दिन आए होंगे इसमें सन्देह नहीं है, पर उस दिन की बालक के हृदय की स्थिति के इतिहास की किसी दिन से तुलना नहीं हो सकती।<br />
मामला बहुत मामूली था और दो बातों में ख़त्म हो जाता है।</p>
<p>आशु की एक छोटी बहन है; उससे छोटी हमउम्र न कोई बहन है न सहेली, अत: वह आशु के साथ ही खेलती रहती है।</p>
<p>आशु वगैरह के घर का पोर्च लोहे की रेलिंग और एक गेट में है। उस दिन खूब बादल और बारिश थी। हाथों में जूते और सिर पर छतरी लगाए जो दो-चार पथिक सड़क पर चल रहे थे, उन्हें किसी तरफ देखने का समय नहीं था। उस बादलों से अँधेरे, बारिश की आवाज वाले छुट्टी के दिन आशु और उसकी बहन पोर्च की सीढ़ी पर बैठे खेल रहे थे।</p>
<p>उस दिन उनकी गुड़िया की शादी थी। उसी के इन्तजाम के बारे में आशु बड़ी गम्भीरता से अपनी बहिन को उपदेश दे रहा था।</p>
<p>बहस यह उठी कि पुरोहित किसे बनाया जाए। बच्ची ने झट से दौड़कर एक से पूछा, &#8216;क्यों जी, तुम हमारे पुरोहित बनोगे ?&#8217;</p>
<p>आशु ने पीछे घूमकर देखा, भीगी छतरी बन्द करके आधी भीगी हालत में शिवनाथ पंडित उनके पोर्च में खड़े थे; सड़क से जा रहे थे, बारिश तेज़ होने पर यहाँ शरण ली थी। बच्ची ने उनसे गुड़िया की शादी में पुरोहित का काम करने का प्रस्ताव रखा।</p>
<p>पंडितजी को देखते ही आशु अपना खेल और बहिन सब छोड़कर एक दौड़ में घर में छिप गया। उसका छुट्टी का दिन मिट्टी में मिल गया।</p>
<p>अगले दिन जब शिवनाथ पंडित ने सूखी हँसी के साथ इस घटना को भूमिका के रूप में सबके सामने सुनाकर आशु को &#8216;गिन्&#x200d;नी&#8217; का नाम दिया, तब पहले तो वह जैसे हर बात में धीरे से हँसता है वैसे हो हँसकर चारों तरफ देखकर मज़ाक में शामिल होने की कोशिश करने लगा; तभी घंटा बजा, बाकी सब क्लासें भी छूट गईं, और पत्ते के दोने में मिठाई तथा काँसे के लोटे में पानी लेकर दासी आकर दरवाज़े पर खड़ी हो गई।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/bazar-darshan-story-by-jainendra-kumar/8872/"><strong>बाजार-दर्शन&#8230; पढ़िए आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>तब हँसते-हँसते उसका मुँह-कान सब लाल हो उठे, दुखते सिर की नसें फूल उठीं और उमड़ते आँसू किसी तरह रुकने को तैयार नहीं हुए।</p>
<p>शिवनाथ पंडित आरामगृह में नाश्ता करके निश्चिन्तता से तम्बाकू पीने लगे&#8211; लड़के खूब मज़े से आशु को घेरकर &#8216;गिन्&#x200d;नी&#8217; &#8216;गिन्नी&#8217; करके चीखने लगे। वह छुट्टी के दिन का छोटी बहिन के साथ खेलना आशु को जीवन का सबसे लज्जाजनक भ्रम लगने लगा, धरती के लोग किसी भी समय उस दिन की बात भूल सकेंगे ऐसा उसे विश्वास नहीं हुआ।</p>
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		<title>3 जून: आज ही का था दिन जब हिन्दी को राजभाषा माना गया</title>
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		<pubDate>Thu, 03 Jun 2021 05:40:37 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>TISMedia@कोटा. आज ही के दिन जन्म हुआ भारत के प्रसिद्ध शिक्षाविद, राजनेता, समाज सुधारक, न्यायविद और लेखक हरविलास शारदा का&#8230; आज ही के दिन ज्ञानपीठ पुरस्कार के प्रथम विजेता महाकवि जी शंकर कुरूप का हुआ था जन्म&#8230; आज के ही दिन रविंद्रनाथ टैगोर को ब्रिटिश सरकार ने नाइटहुड की उपाधि से नवाजा था&#8230; आज ही &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ff0000;"><strong>TISMedia@कोटा.</strong> </span>आज ही के दिन जन्म हुआ भारत के प्रसिद्ध शिक्षाविद, राजनेता, समाज सुधारक, न्यायविद और लेखक हरविलास शारदा का&#8230; आज ही के दिन ज्ञानपीठ पुरस्कार के प्रथम विजेता महाकवि जी शंकर कुरूप का हुआ था जन्म&#8230; आज के ही दिन रविंद्रनाथ टैगोर को ब्रिटिश सरकार ने नाइटहुड की उपाधि से नवाजा था&#8230; आज ही का था दिन जब महात्मा गांधी की अध्यक्षता में इन्दौर में हिन्दी साहित्य सम्मेलन आयोजित हुआ और उसी में पारित एक प्रस्ताव के आधार पर हिन्दी राजभाषा मानी गई&#8230; आज ही के दिन तमिलनाडु के पांच बार मुख्यमंत्री रहे एम करुणानिधि का हुआ था जन्म&#8230; आज के ही दिन जन्म हुआ था भारत में ऐतिहासिक रेल हड़ताल कराने वाले और पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस का&#8230; आज ही के दिन हुआ था ब्रिटिश राज में भारत के आखिरी वायसराय लॉर्ड माउंटेटन द्वारा भारत के बंटवारे का ऐलान&#8230; आज ही के दिन देश के पहले आधुनिक युद्धक पोत नीलगिरी को देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जलावतरित किया&#8230; आज ही के दिन बिहार के मुख्यमंत्री एवं स्वतंत्रता सेनानी कृष्ण बल्लभ सहाय का निधन हुआ&#8230; आज ही के दिन से भारत सरकार नें पांच दिन का कार्य दिवस सप्ताह किया शुरू&#8230; और आज ही का था दिन जब फ्रांस ने सुरक्षा परिषद में भारत की दावेदारी का समर्थन दोहराया&#8230;</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>भारत के इतिहास में आज का दिन</strong></span><br />
<strong>1867 &#8211;</strong> भारत के प्रसिद्ध शिक्षाविद, राजनेता, समाज सुधारक, न्यायविद और लेखक हरविलास शारदा का जन्म।<br />
<strong>1901 &#8211;</strong> ज्ञानपीठ पुरस्कार के प्रथम विजेता महाकवि जी शंकर कुरूप का जन्म।<br />
<strong>1915 &#8211;</strong> ब्रिटिश सरकार ने रविंद्रनाथ टैगोर को नाइटहुड की उपाधि से नवाजा।<br />
<strong>1918 &#8211;</strong> महात्मा गांधी की अध्यक्षता में इन्दौर में &#8216;हिन्दी साहित्य सम्मेलन&#8217; आयोजित हुआ और उसी में पारित एक प्रस्ताव के आधार पर हिन्दी राजभाषा मानी गई।<br />
<strong>1924 &#8211;</strong> तमिलनाडु के पांच बार मुख्यमंत्री रहे एम करुणानिधि का जन्म।<br />
<strong>1930 &#8211;</strong> भारत में ऐतिहासिक रेल हड़ताल कराने वाले और पूर्व रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडिस का जन्म।<br />
<strong>1947 &#8211;</strong> ब्रिटिश राज में भारत के आखिरी वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन ने भारत के बंटवारे का ऐलान किया।<br />
<strong>1972 &#8211;</strong> देश के पहले आधुनिक युद्धक पोत नीलगिरी को देश की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जलावतरित किया।<br />
<strong>1974 &#8211;</strong> बिहार के मुख्यमंत्री एवं स्वतंत्रता सेनानी कृष्ण बल्लभ सहाय का निधन।<br />
<strong>1985 &#8211;</strong> भारत सरकार ने पांच दिन का कार्य दिवस सप्ताह शुरू किया।<br />
<strong>2005 &#8211;</strong> फ्रांस ने सुरक्षा परिषद में भारत की दावेदारी का समर्थन दोहराया।<br />
<strong>2014 &#8211;</strong> तत्कालीन केंद्रीय मंत्री गोपीनाथ मुंडे का सड़क हादसे में निधन।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/kota-news/acb-trapped-supervisor-and-computer-operator-for-taking-bribe-to-release-check-of-asha-sahyogini/8875/">आशा सहयोगिनी को चेक जारी करने के लिए मांगी 3500 रुपए की रिश्वत, सुपरवाइजर और कंप्यूटर ऑपरेटर हुए ट्रेप</a></span></strong></span></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>विश्व के इतिहास में आज का दिन</strong></span><br />
<strong>1943 &#8211;</strong> संयुक्त राष्ट्र संघ ने राहत और पुनर्वास प्रशासन की स्थापना की।<br />
<strong>1959 &#8211;</strong> सिंगापुर को सेल्फ गवर्निंग स्टेट घोषित किया गया।<br />
<strong>1999 &#8211;</strong> होवरक्राफ़्ट विमानों के आविष्कारक क्रिसटोफ़र काकरैल का निधन।<br />
<strong>2004 &#8211;</strong> केन फ़ोर्ड 2004 में नासा के अंतरिक्ष खोज पैनल के नेतृत्वकर्ता बने।</p>
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		<title>30 मई: हिन्दी पत्रकारिता दिवस: आज ही के दिन हुआ था पहले हिंदी अखबार उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन शुरू</title>
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		<pubDate>Sun, 30 May 2021 04:58:15 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>TISMedia@कोटा. 30 मई&#8230; आज ही के दिन हुआ था सिखों के पांचवें गुरु अर्जन देव का निधन&#8230; आज ही के दिन 1826 में पहला हिंदी अखबार उदन्त मार्तण्ड का शुरू हुआ प्रकाशन इसलिए 30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है&#8230; आज का ही था दिन जब उत्तर प्रदेश के देवबंद में दार-उल-उलूम की &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color: #ff0000;">TISMedia@कोटा.</span> 30 मई&#8230;</strong> आज ही के दिन हुआ था सिखों के पांचवें गुरु अर्जन देव का निधन&#8230; आज ही के दिन 1826 में पहला हिंदी अखबार उदन्त मार्तण्ड का शुरू हुआ प्रकाशन इसलिए 30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है&#8230; आज का ही था दिन जब उत्तर प्रदेश के देवबंद में दार-उल-उलूम की हुई स्थापना&#8230; आज ही के दिन रवीन्द्रनाथ टैगोर ने जालियांवाला बाग नरसंहार के विरोध में सर की उपाधि वापस की&#8230; आज ही के इतिहास में दर्ज है गोवा का देश का 25वां पूर्ण राज्य बनना&#8230; आज ही के दिन आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध आलोचक रामविलास शर्मा का हुआ निधन&#8230; आज ही के दिन सऊदी अरब में बंधक संकट समाप्त हुआ, लेकिन दो भारतीयों सहित 22 की हत्या&#8230; और आज ही का था दिन जब भारत के विश्वनाथन आनंद पांचवीं बार विश्व शतरंज चैंपियन बने&#8230;</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>भारत के इतिहास में आज का दिन</strong></span><br />
<strong>1606 &#8211;</strong> सिखों के पांचवें गुरु अर्जन देव का निधन।<br />
<strong>1826 &#8211;</strong> पहले हिंदी अखबार उदन्त मार्तण्ड का प्रकाशन शुरू हुआ, इसलिए 30 मई को हिन्दी पत्रकारिता दिवस भी मनाया जाता है।<br />
<strong>1867 &#8211;</strong> उत्तर प्रदेश के देवबंद में दार-उल-उलूम की स्थापना हुई।<br />
<strong>1919 &#8211;</strong> रवीन्द्रनाथ टैगोर ने जालियांवाला बाग नरसंहार के विरोध में &#8216;सर&#8217; की उपाधि वापस की।<br />
<strong>1987 &#8211;</strong> गोवा देश का 25वां पूर्ण राज्य बना।<br />
<strong>2000 &#8211;</strong> आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध आलोचक रामविलास शर्मा का निधन।<br />
<strong>2004 &#8211;</strong> सऊदी अरब में बंधक संकट समाप्त, लेकिन दो भारतीयों सहित 22 की हत्या।<br />
<strong>2012 &#8211;</strong> भारत के विश्वनाथन आनंद पांचवीं बार विश्व शतरंज चैंपियन बने।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/kota-news/new-medical-college-covid-hospitals-oxygen-generation-plant-caught-fire-due-to-short-circuit-in-electricity-panel-in-kota/8805/">मेडिकल कॉलेज के ऑक्सीजन प्लांट में लगी आग, एक्सपायर हो चुके उपकरण से जैसे-तैसे पाया आग पर काबू</a></span></strong></span></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>विश्व के इतिहास में आज का दिन<br />
</strong></span><strong>1539 &#8211;</strong> स्पेन के खोजी हर्नान्डो डी सोटो ने फ्लोरिडा की खोज की।<br />
<strong>1646 &#8211;</strong> स्पेन और नीदरलैंड ने युद्धविराम समझौते पर हस्ताक्षर किये।<br />
<strong>1783 &#8211;</strong>फिलाडेल्फिया के बेंजामिन टॉवर से अमेरिका में पहला दैनिक समाचार पत्र प्रकाशित किया गया।<br />
<strong>1797 &#8211;</strong> विलियम विलबरफोर्ड ने बारबरा एन स्पूनर से शादी की।<br />
<strong>1859 &#8211;</strong> फ़ेत्तो का युद्ध: सार्डिनियन सेना ने ऑस्ट्रियाई सेना को पराजित किया।<br />
<strong>1910 &#8211;</strong> जनरल लुइस बोथा दक्षिण अफ्रीका संघ के पहले प्रधानमंत्री बने।<br />
<strong>1962 &#8211;</strong> चिली में फीफा विश्व कप की शुरुआत हुई।<br />
<strong>1975 &#8211;</strong> यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी का गठन हुआ।<br />
<strong>1981 &#8211;</strong> बंगलादेश के राष्ट्रपति जिया-उर-रहमान और उनके आठ सहयोगियों की हत्या।<br />
<strong>1990 &#8211;</strong> पेरू में भूकंप से 135 लोगों की मौत हुई।<br />
<strong>1998 &#8211;</strong> उत्तरी अफगानिस्तान में आये भीषण भूकंप में 5000 लोगों की मौत हुई।<br />
<strong>2003 &#8211;</strong> नेपाल के कार्यवाहक प्रधानमंत्री लोकेन्द्र बहादुर चंद ने इस्तीफा दिया।<br />
<strong>2007 &#8211;</strong> अंतर्राष्ट्रीय संयुक्त राष्ट्र शांति रक्षक दिवस पर 107 शांति रक्षक पुरस्कृत।<br />
<strong>2008 &#8211;</strong> अफ़ग़ानिस्तान में एक ज़िले पर तालिबान ने क़ब्ज़ा किया।<br />
<strong>2012 &#8211;</strong> लाइबेरिया के पूर्व राष्ट्रपति चार्ल्स टेलर को सियरा लिओन के गृह युद्ध में किए गए अपराधों और मानवता के खिलाफ किए गए अपराधों के लिए दोषी ठहराते हुए 50 वर्ष के कारावास की सजा सुनाई गई।<br />
<strong>2015 &#8211;</strong> इंग्लैंड के बल्लेबाज एलिस्टेयर कुक टेस्ट क्रिकेट में अपने देश के लिए सबसे अधिक रन बनाने वाले खिलाड़ी बने।</p>
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		<title>18 मई: दिन जब भारत हुआ परमाणु शक्ति संपन्न देशों में शामिल</title>
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		<pubDate>Tue, 18 May 2021 05:32:13 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>कोटा. 18 मई&#8230; आज ही के दिन जन्म हुआ महाराष्ट्र के महान विद्वान महादेव गोविंद रानाडे का&#8230; आज ही का था दिन जब पहली भारतीय फीचर लेंथ फिल्म श्री पुंडालिक रिलीज हुई&#8230; आज ही के दिन रबीन्द्रनाथ टैगोर ने महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम की यात्रा की थी&#8230; आज ही के दिन 1933 में जन्म &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color: #ff0000;">कोटा.</span> 18 मई&#8230;</strong> आज ही के दिन जन्म हुआ महाराष्ट्र के महान विद्वान महादेव गोविंद रानाडे का&#8230; आज ही का था दिन जब पहली भारतीय फीचर लेंथ फिल्म श्री पुंडालिक रिलीज हुई&#8230; आज ही के दिन रबीन्द्रनाथ टैगोर ने महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम की यात्रा की थी&#8230; आज ही के दिन 1933 में जन्म हुआ भारत के बारहवें प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा का&#8230; आज ही का था दिन जब राजनीतिक कैदियों का अंतिम जत्था अंडमान और निकोबार के पोर्ट ब्लेयर से मुख्यभूमि के लिए रवाना हुआ&#8230; आज ही के दिन के इतिहास में दर्ज है राजस्थान के पोखरण में अपना पहला भूमिगत परमाणु बम परीक्षण कर भारत का परमाणु शक्ति संपन्न देशों की कतार में शामिल होना&#8230; और आज ही का था दिन जब अमेरिका ने भारत को अत्याधुनिक हथियार देने पर सहमति जताई&#8230;</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>भारत के इतिहास में आज का दिन</strong></span><br />
<strong>1842 &#8211;</strong> महाराष्ट्र के महान विद्वान महादेव गोविंद रानाडे का जन्म।<br />
<strong>1912 &#8211; </strong>पहली भारतीय फीचर लेंथ फिल्&#x200d;म श्री पुंडा&#x200d;लिक रिलीज ।<br />
<strong>1930 &#8211; </strong>रवीन्द्रनाथ टैगोर ने महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम की यात्रा की।<br />
<strong>1933 &#8211; </strong>भारत के बारहवें प्रधानमंत्री एच डी देवगौड़ा का जन्म हुआ।<br />
<strong>1938 &#8211;</strong> राजनीतिक कैदियों का अंतिम जत्था अंडमान और निकोबार के पोर्ट ब्लेयर से मुख्यभूमि के लिए रवाना हुआ।<br />
<strong>1947 &#8211;</strong> अपने जमाने के मशहूर अभिनेता एवं गायक कुंदन लाल सहगल का जालंधर में निधन।<br />
<strong>1974 </strong><strong>&#8211;</strong> राजस्थान के पोख़रण में अपना पहला भूमिगत परमाणु बम परीक्षण करके भारत परमाणु शक्ति संपन्न देशों की कतार में शामिल हो गया।<br />
<strong>2002 &#8211;</strong> अमेरिका ने भारत को अत्याधुनिक हथियार देने पर सहमति जताई।<br />
<strong>2020 </strong><strong>&#8211;</strong> बंगाल की खाड़ी में उठा चक्रवात ‘अम्फान’ महाचक्रवात में बदला। पश्चिम बंगाल के तटीय जिलों में बड़े नुकसान की आशंका।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/rajasthan/29459-corona-patients-recovered-in-24-hours-today-at-rajasthan/8399/">Rajasthan : लॉकडाउन ने तोड़ी कोरोना की कमर, 24 घंटे में ठीक हुए 29459 मरीज</a></span></strong></span></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>विश्व के इतिहास में आज का दिन</strong></span><br />
<strong>1778 &#8211;</strong> जेम्स कुक ने &#8216;हवाई द्वीपसमूह&#8217; की खोज की और इसे &#8216;सेंडविच आइलैंड&#8217; का नाम दिया।<br />
<strong>1896 &#8211;</strong> &#8216;एक्सरे मशीन&#8217; का पहली बार प्रदर्शन किया गया।<br />
<strong>1911 &#8211;</strong> सान फ्रांसिस्को खाड़ी में खड़े जंगी जहाज पेंसिलवेनिया के उड़ान मंच पर अमेरिका के पायलट यूजीन बर्टन एली ने पहली बार विमान उतारा।<br />
<strong>1968 &#8211;</strong> अमेरिका और सोवियत संघ परमाणु हथियारों पर नियंत्रण के लिए एक संधि के प्रारूप पर सहमत हुए।<br />
<strong>1976 &#8211;</strong> फ्रांस ने जासूसी के आरोप में 40 सोवियत अधिकारियों को देश से निष्कासित किया।<br />
<strong>1991 &#8211;</strong> इराक के स्कड प्रक्षेपास्त्रों ने इजराइल के दो शहरों तेल अवीव और हाइफा पर हमला किया, जिससे खाड़ी युद्ध में इजराइल के शामिल होने की आशंका बढ़ गई।<br />
<strong>1991</strong><strong> &#8211;</strong> चॉकलेट कंपनी में कैमिस्ट के तौर पर काम करने वाली 27 वर्षीय हेलेन ने ब्रिटेन की पहली अंतरिक्ष यात्री के तौर पर सोवियत सोयूज यान से उड़ान भरी। उन्हें एक पहेली का जवाब देने पर यह मौका दिया गया।<br />
<strong>1994 </strong><strong>&#8211;</strong> गाजा पट्टी क्षेत्र से अन्तिम इस्रायली सैनिक टुकड़ी हटाये जाने के साथ ही क्षेत्र पर फलिस्तीनी स्वायत्तशासी शासन पूरी तरह से लागू।<br />
<strong>2002 &#8211;</strong> सियरा लिओन में गृहयुद्ध की समाप्ति की घोषणा, जिसमें 50 हजार से ज्यादा लोग मारे गये थे और करीब 20 लाख लोग बेघर हुये थे।<br />
<strong>2004 &#8211;</strong> इस्रायल के राफा विस्थापित कैम्प में इस्रायली सैनिकों ने 19 फलिस्तीनियों को मौत के घाट उतारा।<br />
<strong>2009 &#8211;</strong> श्रीलंकाई सेना ने तमिल टाइगर्स (लिबरेशन टाइगर्स ऑफ़ तमिल ईलम) को हरा दिया और इस तरह 26 साल के सैन्य अभियान के बाद श्रीलंकाई गृहयुद्ध समाप्त हो गया।<br />
<strong>2012 &#8211;</strong> सोशल नेटवर्किंग कंपनी फेसबुक इंक ने नास्डैक में ट्रेडिंग करना शुरू किया।</p>
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