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	<title>Saadat Hasan Manto Archives - TIS Media</title>
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	<description>हर अक्षर सच, हर खबर निष्पक्ष </description>
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	<title>Saadat Hasan Manto Archives - TIS Media</title>
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		<title>टिटवाल का कुत्ता&#8230; आज की कहानी</title>
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		<pubDate>Sun, 20 Jun 2021 08:56:00 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Art and Literature]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>~सआदत हसन मंटो कई दिनों से दोनों तरफ से सिपाही अपने-अपने मोर्चे पर जमे हुए थे। दिन में इधर और उधर से दस-बारह गोलियाँ चल जातीं, जिनकी आवाज़ के साथ कोई इनसानी चीख बुलन्द नहीं होती थी। मौसम बहुत खुशनुमा था। हवा जंगली फूलों की महक में बसी हुई थी। पहाडिय़ों की ऊँचाइयों और ढलानों &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="color: #ff0000;">~सआदत हसन मंटो</span></h4>
<p>कई दिनों से दोनों तरफ से सिपाही अपने-अपने मोर्चे पर जमे हुए थे। दिन में इधर और उधर से दस-बारह गोलियाँ चल जातीं, जिनकी आवाज़ के साथ कोई इनसानी चीख बुलन्द नहीं होती थी। मौसम बहुत खुशनुमा था। हवा जंगली फूलों की महक में बसी हुई थी। पहाडिय़ों की ऊँचाइयों और ढलानों पर लड़ाई से बेखबर कुदरत, अपने रोज के काम-काज में व्यस्त थी। चिडिय़ाँ उसी तरह चहचहाती थीं। फूल उसी तरह खिल रहे थे और धीमी गति से उडऩे वाली मधुमक्खियाँ, उसी पुराने ढंग से उन पर ऊँघ-ऊँघ कर रस चूसती थीं।</p>
<p>जब गोलियाँ चलने पर पहाडिय़ों में आवाज़ गूँजती और चहचहाती हुई चिडिय़ाँ चौंककर उडऩे लगतीं, मानो किसी का हाथ साज के गलत तार से जा टकराया हो और उनके कानों को ठेस पहुँची हो। सितम्बर का अन्त अक्तूबर की शुरूआत से बड़े गुलाबी ढंग से गले मिल रहा था। ऐसा लगता था कि जाड़े और गर्मी में सुलह-सफाई हो रही है। नीले-नीले आसमान पर धुनी हुई रुई जैसे, पतले-पतले और हल्के-हल्के बादल यों तैरते थे, जैसे अपने सफेद बजरों में नदी की सैर कर रहे हैं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/kavve-aur-kala-pani-by-nirmal-verma/9208/"><strong>कव्वे और काला पानी&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>पहाड़ी मोर्चों पर दोनों ओर से सिपाही कई दिनों से बड़ी ऊब महसूस कर रहे थे कि कोई निर्णयात्मक बात क्यों नहीं होती। ऊबकर उनका जी चाहता कि मौका-बे-मौका एक-दूसरे को शेर सुनाएँ। कोई न सुने तो ऐसे ही गुनगुनाते रहें। वे पथरीली ज़मीन पर औंधे या सीधे लेटे रहते और जब हुक्म मिलता, एक-दो फायर कर देते।</p>
<p>दोनों मोर्चे बड़े सुरक्षित स्थान पर थे। गोलियाँ पूरे जोर से आतीं, और पत्थरों की ढाल से टकराकर, वहीं चित्त हो जातीं। दोनों पहाडिय़ों की ऊँचाई, जिन पर ये मोर्चे थे, लगभग एक ही जैसी थीं। बीच में छोटी-सी हरी-भरी घाटी थी, जिसके सीने पर एक नाला, मोटे साँप की तरह लोटता रहता था।</p>
<p>हवाई जहाजों का कोई खतरा नहीं था। तोपें न इनके पास थीं, न उनके पास, इसलिए दोनों तरफ बेखटके आग लगाई जाती थी। उससे धुएँ के बादल उठते और हवाओं में घुल-मिल जाते। रात को चूँकि बिलकुल खामोशी थी, इसलिए कभी-कभी दोनों मोर्चों के सिपाहियों को, किसी बात पर लगाए हुए, एक-दूसरे के ठहाके सुनाई दे जाते थे। कभी कोई लहर में आकर गाने लगता तो दूसरी आवाज़ गूँजती तो ऐसा लगता, मानो पहाडिय़ाँ सबक दोहरा रही हों।</p>
<p>चाय का दौर ख़त्म हो चुका था। पत्थरों के चूल्हे में चीड़ के हल्के-हल्के कोयले करीब-करीब ठंडे हो चुके थे। आसमान साफ था। मौसम में खुनकी थी। हवा में फूलों की महक नहीं थी, जैसे रात को उन्होंने अपने इत्रदान बन्द कर लिये थे। अलबत्ता, चीड़ के पसीने, यानी बिरोजे की बू थी। पर यह भी कुछ ऐसी नागवार नहीं थी। सब कम्बल ओढ़े सो रहे थे, पर कुछ इस तरह, कि हल्के-से इशारे पर उठकर लडऩे-मरने के लिए तैयार हो सकते थे। जमादार हरनाम सिंह खुद पहरे पर था। उसकी रासकोप घड़ी में दो बजे तो उसने गंडासिंह को जगाया और पहरे पर खड़ा कर दिया। उसका जी चाहता था कि सो जाएे, पर जब लेटा तो आँखों से नींद को इतना दूर पाया जितने कि आसमान में सितारे थे। जमादार हरनाम सिंह चित लेटा उनकी तरफ देखता रहा&#8230;और फिर गुनगुनाने लगा।</p>
<p>कुत्ती लेनी आ सितारेयाँ वाली&#8230;<br />
सितारेयाँ वाली&#8230;<br />
वे हरनाम सिंहा, ओ यारा, भावें तेरी महीं बिक जाएे<br />
और हरनाम सिंह को आसमान पर हर तरफ सितारों वाले जूते बिखरे नज़र आये जो झिलमिल-झिलमिल कर रहे थे।<br />
जुत्ती ले देआँ सितारेयाँ वाली&#8230;<br />
सितारेयाँ वाली&#8230;<br />
नी हरनाम कौर, ओ नारे, भावें मेरी महीं बिक जाए।</p>
<p>यह गाकर वह मुस्कराया; फिर यह सोचकर नींद नहीं आएगी, उसने उठकर और सबको जगा दिया। नार के जिक्र ने उसके दिमाग में हलचल पैदा कर दी थी। वह चाहता था कि ऊटपटाँग बातें हों, जिससे इस गीत की हरनामकौरी कैफियत पैदा हो जाए। चुनाँचे बातें शुरू हुई, पर उखड़ी-उखड़ी रहीं। बन्तासिंह, जो उन सब में कम उम्र था और जिसकी आवाज़ सबसे अच्छी थी, एक तरफ हटकर बैठा गया। बाकी अपनी जाहिरा तौर पर मजेदार बातें करते और जम्हाइयाँ लेते रहे। थोड़ी देर के बाद बन्तासिंह ने एकदम सोज़भरी आवाज़ में ‘हीर’ गाना शुरू कर दिया&#8230;</p>
<p>हीर आख्या जोगिया झूठ बोले, कौन रूठड़े यार मनाउँदा ई<br />
ऐसा कोई न मिलेया मैं ढूँढ़ थक्की जेहड़ा गयाँ नूँ मोड़ ल्याउँदा ई<br />
इक बाज तों काँग ने कूँज खोही बेक्खाँ चुप है कि कुरला..उँ..दा ई<br />
दुक्खाँ वालेयाँ नूँ गल्लाँ सुख दियाँ नी किस्से जोड़ जहान सुनाउँदा ई<br />
फिर कुछ रुक कर उसने हीर की इन बातों का जवाब, राँझे की ज़बान में गाया&#8230;<br />
जेहड़े बाज तो काँग ने कूँज खोही सब्र शुक्र कर बाज फनाह होया<br />
ऐवें हाल है एस फकीर दा नी, धन माल गया ते तबाह होया<br />
करें सिदक ते कम मालूम होवे तेरा रब्ब रसूल गवाह होया<br />
दुनिया छड्ड उदासियाँ पहन लइयाँ सैयद वारिसों हुन वारिस शाह होया</p>
<p>बन्तासिंह ने जिस तरह एकदम गाना शुरू किया था, उसी तरह वह एकदम खामोश हो गया।</p>
<p>ऐसा लगता था कि खाकी पहाडिय़ों ने भी उदासियाँ पहन ली हैं। जमादार हरनाम सिंह ने थोड़ी देर के बाद किसी अनदेखी चीज को मोटी-सी गाली दी और लेट गया। सहसा रात के आख़िरी पहर की उदास-उदास फिजा में एक कुत्ते के भौंकने की आवाज़ गूँजी। सब चौंक पड़े; आवाज़ करीब से आयी थी। सूबेदार हरनाम सिंह ने उठकर कहा, ‘‘यह कहाँ से आ गया, भौंकू?’’</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/bhagya-rekha-story-by-bhisham-sahni/9189/"><strong>भाग्य-रेखा&#8230; पढ़िए आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>कुत्ता फिर भौंका। अब उसकी आवाज़ और भी नज़दीक से आयी थी। कुछ पलों के बाद, दूर झाडिय़ों में आहट हुई। बन्तासिंह उठा और उसकी तरफ बढ़ा। जब वापस आया तो उसके साथ एक आवारा-सा कुत्ता था, जिसकी दुम हिल रही थी। वह मुस्कराया, ‘‘जमादार साहब! मैं ‘हूकम्ज इधर’ बोला तो कहने लगा—मैं हूँ चपड़ झुनझुन।’’</p>
<p>सब हँसने लगे। जमादार हरनाम सिंह ने कुत्ते को पुचकारा, ‘‘इधर आ चपड़ झुनझुन।’’</p>
<p>कुत्ता दुम हिलाता, हरनाम सिंह के पास चला गया और यह समझकर कि शायद खाने की कोई चीज फेंकी गयी है, ज़मीन के पत्थर सूँघने लगा। जमादार हरनाम सिंह ने थैला खोलकर एक बिस्कुट निकाला और उसकी तरफ फेंका। कुत्ते ने उसे सूँघकर मुँह खोला, लेकिन हरनाम सिंह ने लपककर उसे उठा लिया, ‘‘ठहर कहीं पाकिस्तानी तो नहीं।’’ सब हँसने लगे। सरदार बन्तासिंह ने आगे बढक़र कुत्ते की पीठ पर हाथ फेरा और जमादार हरनाम सिंह से कहा, ‘‘नहीं जमादार साहब, चपड़ झुनझुन हिंदुस्तानी है।’’</p>
<p>जमादार हरनामसिंह हँसा और कुत्ते से मुखातिब हुआ, ‘‘निशानी दिखा ओये।’’<br />
कुत्ता दुम हिलाने लगा। हरनाम सिंह ज़रा खुलकर हँसा, ‘‘यह कोई निशानी नहीं। दुम तो सारे कुत्ते हिलाते हैं।’’<br />
बन्दा सिंह ने कुत्ते की काँपती दुम पकड़ ली, ‘‘शरणार्थी है बेचारा।’’</p>
<p>जमादार हरनाम सिंह ने बिस्कुट फेंका, जो कुत्त ने झट दबोचा लिया। एक जवान ने अपने बूट की एड़ी से ज़मीन खोटते हुए कहा, ‘‘अब कुत्तों को भी या तो हिंदुस्तानी होना पड़ेगा। या पाकिस्तानी।’’</p>
<p>जमादार ने अपने थैले से एक और बिस्कुट निकाला और फेंका, ‘‘पाकिस्तानियों की तरह पाकिस्तानी कुत्ते भी गोली से उड़ा दिये जाएँगे।’’</p>
<p>एक ने जोर से नारा लगाया—‘‘हिन्दुस्तान ज़िन्दाबाद।’’</p>
<p>कुत्ता, जो बिस्कुट उठाने के लिए आगे बढ़ा था, डरकर पीछे हट गया। उसकी दुम टाँगों के अन्दर घुस गयी। जमादार हरनाम सिंह हँसा, ‘‘अपने नारे से क्यों डरता है। चपड़ झुनझुन&#8230;खा&#8230;ले, एक और ले।’’ उसने थैले से एक और बिस्कुट निकाल कर उसे दिया।</p>
<p>बातों-बातों में सुबह हो गयी। सूरज निकलने का इरादा ही कर रहा था कि चारों ओर उजाला हो गया। जिस तरह बटन दबाने से एकदम बिजली की रोशनी होती है, उसी तरह सूरज की किरणें देखते-ही-देखते, उस पहाड़ी इलाके में फैल गयीं, जिनका नाम टिटवाल था।</p>
<p>इस इलाके में काफी देर से लड़ाई चल रही थी। एक-एक पहाड़ी के लिए दर्जनों जवानों की जानें जाती थीं, फिर भी क़ब्जा गैर-यकीनी होता था। आज यह पहाड़ी उनके पास है, कल दुश्मन के पास, परसों फिर उनके क़ब्जे में इसके दूसरे दिन वह फिर दूसरों के पास चली जाती थी।</p>
<p>जमादार हरनाम सिंह ने दूरबीन लगाकर आसपास का जायजा लिया। सामने पहाड़ी में धुआँ उठ रहा था। इसका मतलब यह था कि चाय वगैरह तैयार हो रही है। इधर भी नाश्ते की फिक्र हो रही थी। आग सुलगायी जा रही थी। उधर वालों को भी निश्चय ही उधर से धुआँ उठता दिख रहा था।</p>
<p>नाश्ते पर सब जवानों ने थोड़ा-थोड़ा कुत्ते को दिया, जो उसने खूब पेट भरके खाया। सब उसमें दिलचस्पी ले रहे थे, जैसे वे उसको अपना दोस्त बनाना चाहते हों। पुचकार कर ‘चपड़ झुनझुन’ के नाम से पुकारता और उसे प्यार करता।</p>
<p>शाम के करीब, दूसरी तरफ, पाकिस्तानी मोर्चे में, सूबेदार हिम्मत खाँ अपनी बड़ी-बड़ी मूँछों को, जिनके साथ बेशुमार कहानियाँ जुड़ी हुई थीं, मरोड़े दे-देकर, टिटवाल के नक्शे को बड़े ध्यान से देख रहा था। उसके साथ ही वायरलैस आपरेटर बैठा था और सूबेदार हिम्मत खाँ के लिए प्लाटून कमांडर के निर्देश प्राप्त कर रहा था। कुछ दूर, एक पत्थर से टेक लगाये और अपनी बन्दूक लिये, बशीर धीमे-धीमे गुनगुना रहा था&#8230;</p>
<p>‘‘चन्न कित्थे गवाई आयी रात वे&#8230;<br />
चन्न कित्थे गवाई आयी&#8230;’’</p>
<p>बशीर ने मजे में आकर आवाज़ ज़रा ऊँची की तो सूबेदार हिम्मत खाँ की कडक़दार आवाज़ बुलन्द हुई—‘‘ओये, कहाँ रहा है तू रात-भर?’’</p>
<p>बशीर ने सवालिया नज़रों से हिम्मत खाँ को देखना शुरू किया, तो बशीर की बजाय किसी और से मुखातिब था, ‘‘बता ओये।’’</p>
<p>बशीर ने देखा—कुछ फासले पर वह आवारा कुत्ता बैठा था, जो कुछ दिन हुए उनके मोर्चे में बिन बुलाये मेहमान की तरह आया था और वहीं टिक गया था। बशीर मुस्कराया और कुत्ते को सम्बोधित कर बोला—</p>
<p>‘‘चन्न कित्थे गँवाई आयी रात ये<br />
चन्न कित्थे गँवाई आयी&#8230;’’</p>
<p>कुत्ते ने जोर से दुम हिलाना शुरू किया, जिससे पथरीली ज़मीन पर झाड़ू-सी फिरने लगी।</p>
<p>सूबेदार हिम्मत खाँ ने एक कंकड़ उठाकर कुत्ते की तरफ फेंका, ‘‘साले को दुम हिलाने के सिवा और कुछ नहीं आता!’’</p>
<p>बशीर ने एकदम कुत्ते की तरफ गौर से देखा, ‘‘इसकी गर्दन में क्या है?’’ यह कहकर वह उठा, पर इससे पहले एक और जवान के कुत्ते को पकडक़र, उसकी गर्दन में बँधी हुई रस्सी उतारी। उसमें गत्ते का एक टुकड़ा पिरोया हुआ था, जिस पर कुछ लिखा था। सूबेदार हिम्मत खाँ ने यह टुकड़ा लिया और अपने जवानों से कहा—‘‘&#8230;&#8230;&#8230; हैं। जानता है तुममें से कोई पढऩा?’’</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/kasbe-ka-aadmi-story-by-kamleshwar/9162/"><strong>क़सबे का आदमी&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>बशीर ने आगे बढक़र गत्ते का टुकड़ा लिया, ‘‘हाँ&#8230;कुछ-कुछ पढ़ लेता हूँ।’’ और उसने बड़ी मुश्किल से अक्षर जोड़-जोडक़र यह पढ़ा—‘‘चप&#8230;चपड़ झुन&#8230;झुन&#8230;चपड़ झुनझुन&#8230;यह क्या हुआ?’’</p>
<p>सूबेदार हिम्मत खाँ ने अपनी बड़ी-बड़ी ऐतिहासिक मूँछों को ज़बरदस्त मरोड़ दिया, ‘‘कोडवर्ड होगा कोई।’’ फिर उसने बशीर से पूछा, ‘‘कुछ और लिखा है बशीरे?’’</p>
<p>बशीर ने, जो अक्षर जोडऩे में लगा था, जवाब दिया, ‘‘जी हाँ&#8230;यह&#8230; यह&#8230;हिन&#8230;हिन्द&#8230;हिंदुस्तानी&#8230;यह हिंदुस्तानी कुत्ता है।’’</p>
<p>सूबेदार हिम्मत खाँ ने सोचना शुरू किया, ‘‘मतलब क्या हुआ इसका? क्या पढ़ा था तुमने—चपड़&#8230;?’’<br />
बशीर ने जवाब दिया, ‘‘चपड़ झुनझुन।’’<br />
एक जवान ने बहुत बुद्धिमान बनते हुए कहा, ‘‘जो बात है, इसी में है।’’<br />
सूबेदार हिम्मत खाँ को यह बात माकूल लगी, ‘‘हाँ, कुछ ऐसा ही लगता है।’’<br />
बशीर ने गत्ते पर लिखी हुई पूरी इबारत पढ़ी—‘‘चपर झुनझुन&#8230;यह हिंदुस्तानी कुत्ता है।’’</p>
<p>सूबेदार हिम्मत खाँ ने वायरलैस सेट लिया और कानो पर हैडफोन लगामर प्लाटून कमांडर से खुद उस कुत्ते के बारे में बातचीत की। वह कैसे आया था, किस तरह उनके पास कई दिन पड़ा रहा, फिर एकाएक गायब हो गया और रात-भर गायब रहा। अब आया है तो उसके गले में एक रस्सी नज़र आयी, जिसमें गत्ते पर एक टुकड़ा था। उस पर जो इबारत लिखी थी, वह उसने तीन-चार बार दोहराकर प्लाटून कमांडर को सुनायी, पर कोई नतीजा हासिल न हुआ।</p>
<p>बशीर अलग कुत्ते के पास बैठकर उसे कभी पुचकार कर, कभी डरा-धमकाकर पूछता रहा कि वह रात कहाँ गायब रहा था और उसके गले में वह रस्सी और गत्ते का टुकड़ा किसने बाँधा था, पर कोई मनचाहा जवाब न मिला। वह जो सवाल न करता, उसके जवाब में कुत्ता अपनी दुम हिला देता। आखिर गुस्से में आकर बशीर ने उसे पकड़ लिया और जोर का झटका दिया। कुत्ता तकलीफ़ के कारण ‘चाऊँ-चाऊँ’ करने लगा।</p>
<p>वायरलैस से निपटकर सूबेदार हिम्मत खाँ ने कुछ देर नक्शे को गौर से देखा और फिर निर्णयात्मक भाव से उठा और सिगरेट की डिबिया का ढकना खोलकर बशीर को दिया, ‘‘बशीरे, लिख इस पर गुरमुखी में&#8230;उन कीड़े-ककोड़ों में&#8230;’’</p>
<p>बशीर ने सिगरेट की डिबिया का गत्ता लिया और पूछा—‘‘क्या लिखूँ सूबेदार साहब?’’</p>
<p>सूबेदार हिम्मत खाँ ने मूँछों को मरोड़े देकर सोचना शुरू किया, ‘‘लिख दे&#8230;बस, लिख दे।’’ यह कहकर उसने जेब से पेंसिल निकालकर बशीर को दी, ‘‘क्या लिखना चाहिए?’’ उसने जैसे खुद से पूछा।</p>
<p>बशीर पेंसिल की नोक को होंठ से लगाकर सोचने लगा, फिर एकदम सवालिया अन्दाज में बोला—‘‘सपड़ सुनसुन&#8230;?’’ लेकिन फौरन ही सन्तुष्ट होकर उसने निर्णय-भरे लहजे में कहा—‘‘चपड़ झुनझुन का जवाब सपड़ सुनसुन ही हो सकता है&#8230;क्या याद करेंगे अपनी माँ के सिखड़े।’’</p>
<p>बशीर ने पेंसिल सिगरेट की डिबिया पर जमायी, ‘‘सपड़ सुनसुन!’’</p>
<p>‘‘सोला आने! लिख&#8230;सप&#8230;सपड़&#8230;सुनसुन।’’ यह कहकर सूबेदार हिम्मत खाँ ने जोर का ठहाका लगाया,’’ और आगे लिखा, ‘‘यह&#8230;पाकिस्तानी कुत्ता है।’’</p>
<p>सूबेदार हिम्मत खाँ ने गत्ता बशीर के हाथ से ले लिया। पेंसिल से उसमें एक छेद किया और रस्सी में पिरोकर कुत्ते की तरफ बढ़ा, ले जा यह अपनी औलाद के पास।’’</p>
<p>यह सुनकर सब जवान खूब हँसे। सूबेदार हिम्मत खाँ ने कुत्ते के गले में रस्सी बाँध दी। वह इस बीच अपनी दुम हिलाता रहा। इसके बाद सूबेदार ने उसे कुछ खाने को दिया और नसीहत करने के अन्दाज़ में कहा—‘‘देखो दोस्त, गद्दारी मत करना&#8230;याद रखो, गद्दारी की सजा मौत होती है।’’</p>
<p>कुत्ता दुम हिलाता रहा। जब वह अच्छी तरह खा चुका तो सूबेदार हिम्मत खाँ ने रस्सी से पकडक़र उसका रुख पहाड़ी की इकलौती पगडंडी की तरफ फेरा और कहा, ‘‘जाओ, हमारा खत दुश्मनों तक पहुँचा दो&#8230;मगर देखो, वापस आ जाना&#8230;यह तुम्हारे अफसर का हुक्म है, समझे?’’</p>
<p>कुत्ते ने अपनी दुम हिलायी और आहिस्ता-आहिस्ता पगडण्डी पर, जो बल खाती हुई, नीचे पहाड़ी के दामन में जाती थी, चलने लगा। सूबेदार हिम्मत खाँ ने अपनी बन्दूक उठायी और हवा में फायर किया।</p>
<p>फायर और उसकी गूँज दूसरी तरफ हिन्दुस्तानियों के मोर्चे में सुनी गयी। इसका मतलब उनकी समझ में न आया। जमादार हरनाम सिंहा पता नहीं किस बात पर चिड़चिड़ा हो रहा था, यह आवाज़ सुनकर और भी चिड़चिड़ा हो गया। उसने फायर का हुक्म दे दिया। आधा घंटे तक दोनों मोर्चों से गोलियों के बेकार बारिश होती रही। जब इस शगल से उकता गया तो जमादार हरनाम सिंह ने फायर बन्द करा दिया और दाढ़ी में कंघी करनी शुरू कर दी। इससे छुट्टी पाकर उसने जाली के अन्दर सारे बाल बड़े सलीके से जमाये और बन्ता सिंह से पूछा, ‘‘ओय बन्ता सिंहा! चपड़ झुनझुन कहाँ गया?’’</p>
<p>दन्ता सिंह ने चीड़ की भूखी लकड़ी से बिरोजे को अपने नाखूनों से अलग करते हुए कहा, ‘‘पता नहीं।’’<br />
जमादार हरनाम सिंह ने कहा, ‘‘कुत्ते को घी हजम नहीं हुआ?’’<br />
बन्ता सिंह इस मुहावरे का मतलब नहीं समझा, ‘‘हमने तो उसे घी की कोई चीज नहीं खिलायी थी।’’<br />
यह सुनकर जमादार हरनाम सिंह बड़े जोर से हँसा, ‘‘ओये अनपढ़! तेरे साथ तो बात करना, पंचानबे का घाटा है।’’<br />
तभी वह सिपाही, जो पहरे पर था और दूरबीन लगाए, इधर-उधर देख रहा था, एकदम चिल्लाया, ‘‘वह&#8230;वह आ रहा है।’’<br />
सब चौंक पड़े। जमादार हरनाम सिंह ने पूछा, ‘‘कौन?’’<br />
पहरे के सिपाही ने कहा, ‘‘क्या नाम था उसका—चपड़ झुनझुन!’’<br />
‘‘चपड़ झुनझुन?’’ यह कह कर जमादार हरनाम सिंह उठा, ‘‘क्या कर रहा है वो?’’<br />
पहरे के सिपाही ने जवाब दिया, ‘‘आ रहा है।’’</p>
<p>जमादार हरनाम सिंह ने दूरबीन उसके हाथ से ली और देखना शुरू किया, इधर ही आ रहा है।&#8230;रस्सी बँधी हुई है गले में&#8230;लेकिन यह तो उधर से आ रहा है, दुश्मन के मोर्चे से।’’ कह कर उसने कुत्ते की माँ को बहुत बड़ी गाली दी। इसके बाद उसने बन्दूक उठायी और निशाना बाँधकर फायर किया। निशान चूक गया। गोली कुत्ते के कुछ फासले पर पत्थरों की किरचें उड़ाती, ज़मीन में दफन हो गयी। कुत्ता सहम कर रुक गया।</p>
<p>दूसरे मोर्चे में सूबेदार हिम्मत खाँ ने दूरबीन में से देखा कि कुत्ता पगडंडी पर खड़ा है। एक और फायर हुआ तो वह दुम दबाकर उल्टी तरफ भागा—सूबेदार हिम्मत खाँ के मोर्चे की तरफ। सूबेदार ने जोर से पुकारा, ‘‘बहादुर, डरा नहीं करते&#8230;चल वापस।’’ और उसने डराने के लिए एक फायर किया। कुत्ता रुक गया। उधर से जमादार हरनाम सिंह ने बन्दूक चलाई। गोली कुत्ते के कान के पास से सनसनाती हुई गुजर गयी। उसने उछलकर ज़ोर-ज़ोर से दोनों कान फटफटाने शुरू किये। उधर से सूबेदार हिम्मत खाँ ने दूसरा फायर किया। गोली उसके अगले पंजों के पास पत्थरों में धँस गयी। बौखलाकर कभी वह इधर दौड़ा, कभी उधर। उसकी इस बौखलाहट से हिम्मत खाँ और हरनाम सिंह, दोनों बहुत खुश हुए और खूब ठहाके लगाते रहे। कुत्ते ने जमादार हरनाम सिंह के मोर्चे की तरफ भागना शुरू किया। उसने यह देखा तो बड़े ताव में आकर मोटी-सी गाली दी और अच्छी तरह निशान बाँधकर फायर किया। गोली कुत्ते की टाँग में लगी। आसमान को चीरती हुई एक चीख बुलन्द हुई। कुत्ते ने अपना रुख बदला। लँगड़ा-लँगड़ाकर सूबेदार हिम्मत खाँ के मोर्चे कि तरफ दौडऩे लगा तो उधर से भी फायर हुआ, पर वह सिर्फ डराने के लिए किया गया था। हिम्मत ख़ाँ फायर करते ही चिल्लाया, ‘‘बहादुर&#8230;बहादुर परवाह नहीं किया करते ज़ख्मों की। खेल जाओ अपनी जान पर&#8230;जाओ&#8230;जाओ।’’</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/kabuliwala-story-by-rabindranath-tagore/9139/"><strong>काबुलीवाला&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>कुत्ता फायर से घबराकर मुड़ा। उसकी एक टाँग बिल्कुल बेकार हो गयी थी। बाकी तीन टाँगों की मदद से उसने खुद को चन्द कदम दूसरी ओर घसीटा था कि जमादार हरनाम सिंह ने निशाना ताककर गोली चलाई, जिसने उसे वहीं ढेर कर दिया।</p>
<p>सूबेदार हिम्मत खाँ ने अफसोस के साथ कहा—‘‘च&#8230;च&#8230;च&#8230;! शहीद हो गया बेचारा।’</p>
<p>जमादार हरनाम सिंह ने बन्दूक की गर्म-गर्म नाली अपने हाथ में ली और कहा, ‘वही मौत मरा, जो कुत्ते की होती है।’’</p>
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		<title>आम&#8230; पढ़िए आज की कहानी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[tismedia.in]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 11 Jun 2021 09:33:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Art and Literature]]></category>
		<category><![CDATA[Cover Stories]]></category>
		<category><![CDATA[Editorial]]></category>
		<category><![CDATA[Top Stories]]></category>
		<category><![CDATA[Aam]]></category>
		<category><![CDATA[Aam Story]]></category>
		<category><![CDATA[hindi news]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi Story]]></category>
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		<category><![CDATA[Saadat Hasan Manto]]></category>
		<category><![CDATA[Story By Saadat Hasan Manto]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>~सआदत हसन मंटो खज़ाने के तमाम कलर्क जानते थे कि मुंशी करीम बख़्श की रसाई बड़े साहब तक भी है। चुनांचे वो सब उस की इज़्ज़त करते थे। हर महीने पैंशन के काग़ज़ भरने और रुपया लेने के लिए जब वो खज़ाने में आता तो इस का काम इसी वजह से जल्द जल्द कर दिया &#8230;</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="color: #ff0000;">~सआदत हसन मंटो</span></h4>
<p>खज़ाने के तमाम कलर्क जानते थे कि मुंशी करीम बख़्श की रसाई बड़े साहब तक भी है। चुनांचे वो सब उस की इज़्ज़त करते थे। हर महीने पैंशन के काग़ज़ भरने और रुपया लेने के लिए जब वो खज़ाने में आता तो इस का काम इसी वजह से जल्द जल्द कर दिया जाता था। पच्चास रुपय उस को अपनी तीस साला ख़िदमात के इवज़ हर महीने सरकार की तरफ़ से मिलते थे। हर महीने दस दस के पाँच नोट वो अपने ख़फ़ीफ़ तौर पर काँपते हुए हाथों से पकड़ता और अपने पुराने वज़ा के लंबे कोट की अंदरूनी जेब में रख लेता। चश्मे में ख़ज़ानची की तरफ़ तशक्कुर भरी नज़रों से देखता और ये कह कर “अगर ज़िंदगी हुई तो अगले महीने फिर सलाम करने के लिए हाज़िर हूँगा” बड़े साहब के कमरे की तरफ़ चला जाता।</p>
<p>आठ बरस से इस का यही दस्तूर था। खज़ाने के क़रीब क़रीब हर क्लर्क को मालूम था कि मुंशी करीम बख़्श जो मुतालिबात-ए-ख़फ़ीफ़ा की कचहरी में कभी मुहाफ़िज़-ए-दफ़्तर हुआ करता था बेहद वज़ादार, शरीफ़ुत्तबा और हलीम आदमी है। मुंशी करीम बख़्श वाक़ई इन सिफ़ात का मालिक था। कचहरी में अपनी तवील मुलाज़मत के दौरान में आफ़िसरान बाला ने हमेशा उस की तारीफ़ की है। बाअज़ मुंसिफ़ों को तो मुंशी करीम बख़्श से मोहब्बत होगई थी। उस के ख़ुलूस का हर शख़्स क़ाइल था।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/apni-apni-daulat-story-by-kamleshwar/9026/"><strong>अपनी-अपनी दौलत&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>इस वक़्त मुंशी करीम बख़्श की उम्र पैंसठ से कुछ ऊपर थी। बुढ़ापे में आदमी उमूमन कमगो और हलीम हो जाता है मगर वो जवानी में भी ऐसी ही तबीयत का मालिक था। दूसरों की ख़िदमत करने का शौक़ इस उम्र में भी वैसे का वैसा ही क़ायम था।</p>
<p>खज़ाने का बड़ा अफ़्सर मुंशी करीम बख़्श के एक मुरब्बी और मेहरबान जज का लड़का था। जज साहब की वफ़ात पर उसे बहुत सदमा हुआ था अब वो हर महीने उन के लड़के को सलाम करने की ग़रज़ से ज़रूर मिलता था। इस से उसे बहुत तसकीन होती थी। मुंशी करीम बख़्श उन्हें छोटे जज साहब कहा करता था।</p>
<p>पैंशन के पच्चास रुपय जेब में डाल कर वह बरामदा तय करता और चक़ लगे कमरे के पास जा कर अपनी आमद की इत्तिला कराता। छोटे जज साहब उस को ज़्यादा देर तक बाहर खड़ा न रखते, फ़ौरन अंदर बुला लेते और सब काम छोड़कर उस से बातें शुरू करदेते।</p>
<p>“तशरीफ़ रखीए मुंशी साहब&#8230;&#8230;.. फ़रमाईए मिज़ाज कैसा है।”</p>
<p>“अल्लाह का लाख लाख शुक्र है&#8230;&#8230;..आपकी दुआ से बड़े मज़े में गुज़र रही है, मेरे लायक़ कोई ख़िदमत?”</p>
<p>“आप मुझे क्यों शर्मिंदा करते हैं। मेरे लायक़ कोई ख़िदमत हो तो फ़रमाईए। ख़िदमतगुज़ारी तो बंदे का काम है।”</p>
<p>“आप की बड़ी नवाज़िश है।”</p>
<p>इस क़िस्म की रस्मी गुफ़्तुगू के बाद मुंशी करीम जज साहब की मेहरबानियों का ज़िक्र छेड़ देता। उन के बुलंद किरदार की वज़ाहत बड़े फिदवियाना अंदाज़ में करता और बार बार कहता। “अल्लाह बख़्शे मरहूम फ़िरिश्ता खस्लत इंसान थे। ख़ुदा उन को करवट करवट जन्नत नसीब करे।”</p>
<p>मुंशी करीम बख़्श के लहजे में ख़ुशामद वग़ैरा की ज़र्रा भर मिलावट नहीं होती थी। वो जो कुछ कहता था। महसूस करके कहता था। इस के मुताल्लिक़ जज साहब के लड़के को जो अब खज़ाने के बड़े अफ़्सर थे अच्छी तरह मालूम था। यही वजह है कि वो उस को इज़्ज़त के साथ अपने पास बिठाते थे और देर तक इधर उधर की बातें करते रहते थे।</p>
<p>हर महीने दूसरी बातों के इलावा मुंशी करीम बख़्श के आम के बाग़ों का ज़िक्र भी आता था। मौसम आने पर जज साहब के लड़के की कोठी पर आमों का एक टोकरा पहुंच जाता था। मुंशी करीम बख़्श को ख़ुश करने के लिए वो हर महीने उस को याद-दहानी करा देते थे। “मुंशी साहब, देखें इस मौसम पर आमों का टोकरा भेजना न भोलीएगा।</p>
<p>पिछली बार आप ने जो आम भेजे थे उस में तो सिर्फ़ दो मेरे हिस्से में आए थे।”</p>
<p>कभी ये तीन हो जाते थे, कभी चार और कभी सिर्फ़ एक ही रह जाता था।</p>
<p>मुंशी करीम बख़्श ये सुन कर बहुत ख़ुश होता था। “हुज़ूर ऐसा कभी हो सकता है&#8230;&#8230;.. जूंही फ़सल तैय्यार हुई मैं फ़ौरन ही आप की ख़िदमत में टोकरा लेकर हाज़िर हो जाऊंगा&#8230;&#8230;.. दो कहीए दो हाज़िर करदूँ। ये बाग़ किस के हैं&#8230;&#8230;.. आप ही के तो हैं।”</p>
<p>कभी कभी छोटे जज साहब पूछ लिया करते थे। “मुंशी जी आप के बाग़ कहाँ हैं?”</p>
<p>“दुनिया नगर में हुज़ूर&#8230;&#8230;.. ज़्यादा नहीं हैं सिर्फ़ दो हैं। इस में से एक तो मैंने अपने छोटे भाई को दे रखा है जो इन दोनों का इंतिज़ाम वग़ैरा करता है।”</p>
<p>मई की पैंशन लेने के लिए मुंशी करीम बख़्श जून की दूसरी तारीख़ को खज़ाने गया दस दस के पाँच नोट अपने ख़फ़ीफ़ तौर पर काँपते हुए हाथों से कोट की अंदरूनी जेब में रख कर इस ने छोटे जज साहब के कमरा का रुख़ किया। हसब-ए-मामूल इन दोनों में वही रस्मी बातें होएं। आख़िर में आमों का ज़िक्र भी आया। जिस पर मुंशी करीम बख़्श ने कहा। “दुनिया नगर से चिट्ठी आई है कि अभी आमों के मुँह पर चीप नहीं आया। जूंही चीप आगया और फ़सल पक कर तैय्यार होगई मैं फ़ौरन पहला टोकरा लेकर आप की ख़िदमत में हाज़िर हो जाऊंगा&#8230;&#8230;.. छोटे जज साहब! इस दफ़ा ऐसे तोहफ़ा आम होंगे कि आप की तबीयत ख़ुश हो जाएगी। मलाई और शहद के घूँट न हूए तो मेरा ज़िम्मा। मैंने लिख दिया है कि छोटे जज साहब के लिए एक टोकरा खासतौर पर भरवा दिया जाये और सवारी गाड़ी से भेजा जाये ताकि जल्दी और एहतियात से पहुंचे। दस पंद्रह रोज़ आप को और इंतिज़ार करना पड़ेगा।”</p>
<p>छोटे जज साहब ने शुक्रिया अदा किया। मुंशी करीम बख़्श ने अपनी छतरी उठाई और ख़ुश ख़ुश घर वापिस आगया।</p>
<p>घर में उस की बीवी और बड़ी लड़की थी। ब्याह के दूसरे साल जिस का ख़ाविंद मर गया था। मुंशी करीम बख़्श की और कोई औलाद नहीं थी मगर उस मुख़्तसर से कुन्बे के बावजूद पच्चास रूपों में इस का गुज़र बहुत ही मुश्किल से होता था। इसी तंगी के बाइस उस की बीवी के तमाम ज़ेवर इन आठ बरसों में आहिस्ता आहिस्ता बिक गए थे।</p>
<p>मुंशी करीम बख़्श फ़ुज़ूलखर्च नहीं था। उस की बीवी और वो बड़े किफ़ायत शिआर थे मगर इस किफ़ायत शिआरी के बावस्फ़ तनख़्वाह में से एक पैसा भी उन के पास ना बचता था। उस की वजह सिर्फ़ ये थी कि मुंशी करीम बख़्श चंद आदमीयों की ख़िदमत करने में बेहद मुसर्रत महसूस करता था उन चंद ख़ासुलख़ास आदमीयों की ख़िदमतगुज़ारी में जिन से उसे दिली अक़ीदत थी।</p>
<p>इन ख़ास आदमीयों में से एक तो जज साहब के लड़के थे। दूसरे एक और अफ़्सर थे जो रिटायर हो कर अपनी ज़िंदगी का बक़ाया हिस्सा एक बहुत बड़ी कोठी में गुज़ार रहे थे। उन से मुंशी करीम बख़्श की मुलाक़ात हर रोज़ सुबह सवेरे कंपनी बाग़ में होती थी।</p>
<p>बाग़ की सैर के दौरान में मुंशी करीम बख़्श उन से हर रोज़ पिछले दिन की ख़बरें सुनता था। कभी कभी जब वो बीते हुए दिनों के तार छेड़ देता तो डिप्टी सुपरिन्टेन्डेन्ट साहब अपनी बहादुरी के क़िस्से सुनाना शुरू कर देते थे कि किस तरह उन्हों ने लायल पुर के जंगली इलाक़े में एक ख़ूँख़ार क़ातिल को पिस्तौल, ख़ंजर दिखाए बग़ैर गिरफ़्तार किया और किस तरह उन के रोब से एक डाकू सारा माल छोड़कर भाग गया।</p>
<p>कभी कभी मुंशी करीम बख़्श के आम के बाग़ों का भी ज़िक्र आजाता था। मुंशी साहब कहीए। “अब की दफ़ा फ़सल कैसी रहेगी।” फिर चलते चलते डिप्टी सुपरिन्टेन्डेन्ट साहब ये भी कहते। “पिछले साल आप ने जो आम भिजवाए थे बहुत ही अच्छे थे बेहद लज़ीज़ थे।”</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/bade-bhai-sahab-story-by-munshi-premchand/8999/"><strong>बड़े भाई साहब&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>“इंशाअल्लाह ख़ुदा के हुक्म से अब की दफ़ा भी ऐसे ही आम हाज़िर करूंगा।</p>
<p>एक ही बूटे के होंगे। वैसे ही लज़ीज़, बल्कि पहले से कुछ बढ़ चढ़ कर ही होंगे।”</p>
<p>उस आदमी को भी मुंशी करीम बख़्श हर साल मौसम पर एक टोकरा भेजता था। कोठी में टोकरा नौकरों के हवाले करके जब वो डिप्टी साहब से मिलता और वो इस का शुक्रिया अदा करते तो मुंशी करीम बख़्श निहायत इनकिसारी से काम लेते हुए कहता “डिप्टी साहब आप क्यों मुझे शर्मिंदा करते हैं&#8230;&#8230;.. अपने बाग़ हैं। अगर एक टोकरा यहां ले आया तो क्या होगया। बाज़ार से आप एक छोड़ कई टोकरे मंगवा सकते हैं&#8230;&#8230;.. ये आम चूँकि अपने बाग़ के हैं और बाग़ में सिर्फ़ एक बूटा है जिस के सब दाने घुलावट ख़ुशबू और मिठास में एक जैसे हैं इस लिए ये चंद तोहफ़े के तौर पर ले आया।”</p>
<p>आम देने के बाद जब वो कोठी से बाहर निकलता तो उस के चेहरे पर तिमतिमाहट होती थी एक अजीब क़िस्म की रुहानी तसकीन उसे महसूस होती थी जो कई दिनों तक उस को मसरूर रखती थी।</p>
<p>मुंशी करीम बख़्श इकहरे जिस्म का आदमी था। बुढ़ापे ने उस के बदन को ढीला कर दिया था। मगर ये ढीलापन बदसूरत मालूम नहीं होता था। उस के पतले पतले हाथों की फूली हुई रगें सर का ख़फ़ीफ़ सा इर्तिआश और चेहरे की गहिरी लकीरें उस की मतानत-ओ-संजीदगी में इज़ाफ़ा करती थीं। ऐसा मालूम होता था कि बुढ़ापे ने उस को निखार दिया है। कपड़े भी वो साफ़ सुथरे पहनता था जिस से ये निखार उभर आता था।</p>
<p>उस के चेहरे का रंग सफेदी माइल ज़र्द था। पतले पतले होंट जो दाँत निकल जाने के बाद अंदर की तरफ़ सिमटे रहते थे, हल्के सुर्ख़ थे, ख़ून की इस कमी के बाइस उस के चेहरे पर ऐसी सफ़ाई पैदा होगई थी जो अच्छी तरह मुँह धोने के बाद थोड़ी देर तक क़ायम रहा करती है।</p>
<p>वो कमज़ोर ज़रूर था, पैंसठ बरस की उम्र में कौन कमज़ोर नहीं हो जाता मगर इस कमज़ोरी के बावजूद उस में कई कई मील पैदल चलने की हिम्मत थी। खासतौर पर जब आमों का मौसम आता तो वो डिप्टी साहब और छोटे जज साहब को आमों के टोकरे भेजने के लिए इतनी दौड़ धूप करता था कि बीस पच्चीस बरस के जवान आदमी भी क्या करेंगे। बड़े एहतिमाम से टोकरे खोले जाते थे। इन का घास फूस अलग किया जाता था। दाग़ी या गले सड़े दाने अलग किए जाते थे। और साफ़ सुथरे आम नए टोकरों में गिन कर डाले जाते थे। मुंशी करीम बख़्श एक बार फिर इत्मिनान करने की ख़ातिर उन को गिन लेता था ताकि बाद में शर्मिंदगी न उठानी पड़े।</p>
<p>आम निकालते और टोकरों में डालते वक़्त मुंशी करीम बख़्श की बहन और उसकी बीवी के मुँह में पानी भर आता। मगर वो दोनों ख़ामोश रहतीं। बड़े बड़े रस भरे ख़ूबसूरत आमों का ढेर देख कर जब इन में से कोई ये कहे बग़ैर न रह सकती। “क्या हर्ज है अगर इस टोकरे में से दो आम निकाल लिए जाएं।” तो मुंशी करीम बख़्श से ये जवाब मिलता। “और आजाऐंगे इतना बेताब होने की क्या ज़रूरत है।”</p>
<p>ये सुन कर वो दोनों चुप हो जातीं और अपना काम करती रहतीं।</p>
<p>जब मुंशी करीम बख़्श के घर में आमों के टोकरे आते थे तो गली के सारे आदमीयों को उस की ख़बर लग जाती थी। अबदुल्लाह नीचा बंद का लड़का जो कबूतर पालने का शौक़ीन था दूसरे रोज़ ही आ धमकता था और मुंशी करीम बख़्श की बीवी से कहता था। “ख़ाला में घास लेने के लिए आया हूँ। कल खालूजान आमों के दो टोकरे लाए थे इन में से जितनी घास निकली हो मुझे दे दीजीए।”</p>
<p>हमसाई नूरां जिस ने कई मुर्ग़ियां पाल रखी थीं, उसी रोज़ शाम को मिलने आजाती थी और इधर उधर की बातें करने के बाद कहा करती थी। “पिछले बरस जो तुम ने मुझे एक टोकरा दिया था बिलकुल टूट गया है। अब के भी एक टोकरा देदो तो बड़ी मेहरबानी होगी।”</p>
<p>दोनों टोकरे और उन की घास यूं चली जाती।</p>
<p>हस्ब-ए-मामूल इस दफ़ा भी आमों के दो टोकरे आए गले सड़ने दाने अलग किए गए जो अच्छे थे उन को मुंशी करीम बख़्श ने अपनी निगरानी में गिनवा कर नए टोकरों में रखवाया। बारह बजे पहले पहल ये काम ख़त्म होगया। चुनांचे दोनों टोकरे ग़ुसलख़ाने में ठंडी जगह रख दिए गए ताकि आम ख़राब ना हो जाएं।</p>
<p>उधर से मुतमइन हो कर दोपहर का खाना खाने के बाद मुंशी करीम बख़्श कमरे में चारपाई पर लेट गया।</p>
<p>जून के आख़िरी दिन थे। इस क़दर गर्मी थी कि दीवारें तवे की तरह तप रही थीं। वो गरमीयों में आम तौर पर ग़ुसलख़ाने के अंदर ठंडे फ़र्श पर चटाई बिछा कर लेटा करता था। यहां मोरी के रस्ते ठंडी ठंडी हवा भी आजाती थी लेकिन अब के इस में दो बड़े बड़े टोकरे पड़े थे। उस को गर्म कमरे ही में जो बिलकुल तनूर बना हुआ था छः बजे तक वक़्त गुज़ारना था।</p>
<p>हर साल गरमीयों के मौसम में जब आमों के ये टोकरे आते उसे एक दिन आग के बिस्तर पर गुज़ारना पड़ता था मगर वो इस तकलीफ़ को ख़ंदापेशानी से बर्दाश्त कर लेता था। क़रीबन पाँच घंटे तक छोटा सा पंखा बार बार पानी में तर करके झलता रहता। इंतिहाई कोशिश करता कि नींद आजाए मगर एक पल के लिए भी उसे आराम नसीब न होता। जून की गर्मी और ज़िद्दी क़िस्म की मक्खियां किसे सोने देती हैं।</p>
<p>आमों के टोकरे ग़ुसलख़ाने में रखवा कर जब वो गर्म कमरे में लेटा तो पंखा झलते झलते एक दम उस का सर चकराया। आँखों के सामने अंधेरा सा छाने लगा। फिर उसे ऐसा महसूस हुआ कि उस का सांस उखड़ रहा है और वो सारे का सारा गहिराईयों में उतर रहा है इस क़िस्म के दौरे उसे कई बार पड़ चुके थे इस लिए कि इस का दिल कमज़ोर था मगर ऐसा ज़बरदस्त दौरा पहले कभी नहीं पड़ा था। सांस लेने में उस को बड़ी दिक़्क़त महसूस होने लगी, सर बहुत ज़ोर से चकराने लगा। घबरा कर इस ने आवाज़ दी और अपनी बीवी को बुलाया।</p>
<p>ये आवाज़ सुन कर उस की बीवी और बहन दोनों दौड़ी दौड़ी अंदर आएं दोनों जानती थीं कि उसे इस क़िस्म के दौरे क्यों पड़ते हैं। फ़ौरन ही उस की बहन ने अबदुल्लाह नीचा बंद के लड़के को बुलाया और उस से कहा कि डाक्टर को बुला लाए ताकि वो ताक़त की सोई लगा दे। लेकिन चंद मिनटों ही में मुंशी करीम बख़्श की हालत बहुत ज़्यादा बिगड़ गई। इस का दिल डूबने लगा। बे-क़रारी इस क़दर बढ़ गई कि वो चारपाई पर मछली की तरह तड़पने लगा। उस की बीवी और बहन ने ये देख कर शोर बरपा कर दिया। जिस के बाइस इस के पास कई आदमी जमा होगए।</p>
<p>बहुत कोशिश की गई, उस की हालत ठीक हो जाये लेकिन कामयाबी नसीब न हुई। डाक्टर बुलाने के लिए तीन चार आदमी दौड़ाए गए थे लेकिन इस से पहले कि इन में से कोई वापिस आए मुंशी करीम बख़्श ज़िंदगी के आख़िरी सांस लेने लगा। बड़ी मुश्किल से करवट बदल कर उस ने अबदुल्लाह नीचा बंद को जो इस के पास ही बैठा था अपनी तरफ़ मुतवज्जा किया और डूबती हूई आवाज़ में कहा। “तुम सब लोग बाहर चले जाओ। मैं अपनी बीवी से कुछ कहना चाहता हूँ।”</p>
<p>सब लोग बाहर चले गए उस की बीवी और लड़की दोनों अंदर दाख़िल हुईं रो रो कर उन का बुरा हाल हो रहा था। मुंशी करीम बख़्श ने इशारे से अपनी बीवी को पास बुलाया और कहा। “दोनों टोकरे आज शाम ही डिप्टी साहब और छोटे जज साहब की कोठी पर ज़रूर पहुंच जाने चाहिऐं। पड़े पड़े ख़राब हो जाऐंगे।”</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/the-postmaster-story-by-rabindranath-tagore/8978/"><strong>पोस्टमास्टर&#8230; पढिए आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>इधर उधर देख कर इस ने बड़े धीमे लहजे में कहा। “देखो तुम्हें मेरी क़सम है मेरी मौत के बाद भी किसी को आमों का राज़ मालूम न हो। किसी से न कहना कि ये आम हम बाज़ार से ख़रीद कर लोगों को भेजते थे। कोई पूछे तो यही कहना कि दुनिया नगर में हमारे बाग़ हैं&#8230; बस&#8230; और देखो जब में मर जाऊं तो छोटे जज साहब और डिप्टी साहब को ज़रूर इत्तिला भेज देना।”</p>
<p>चंद लम्हात के बाद मुनशी करीम बख़्श मर गया, उस की मौत से डिप्टी साहब और छोटे साहब को लोगों ने मुत्तला कर दिया। मगर दोनों चंद नागुज़ीर मजबूरीयों के बाइस जनाज़े में शामिल न होसके।</p>
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		<title>रिश्वत&#8230; आज की कहानी</title>
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		<pubDate>Sun, 30 May 2021 10:02:55 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>~सआदत हसन मंटो अहमद दीन खाते पीते आदमी का लड़का था अपने हम-उम्र लड़कों में सब से ज़्यादा ख़ुश-पोश माना जाता था लेकिन एक वक़्त ऐसा भी आया कि वो बिलकुल ख़स्ता हाल हो गया। उस ने बी ए किया और अच्छी पोज़ीशन हासिल की वो बहुत ख़ुश था उस के वालिद ख़ान बहादुर अताउल्लाह &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="color: #ff0000;">~सआदत हसन मंटो</span></h4>
<p>अहमद दीन खाते पीते आदमी का लड़का था अपने हम-उम्र लड़कों में सब से ज़्यादा ख़ुश-पोश माना जाता था लेकिन एक वक़्त ऐसा भी आया कि वो बिलकुल ख़स्ता हाल हो गया।</p>
<p>उस ने बी ए किया और अच्छी पोज़ीशन हासिल की वो बहुत ख़ुश था उस के वालिद ख़ान बहादुर अताउल्लाह का इरादा था कि उसे आला तालीम के लिए विलायत भेजेंगे। पासपोर्ट ले लिया गया था सूट वग़ैरा भी बनवा लिए गए थे कि अचानक ख़ान बहादुर अताउल्लाह ने जो बहुत शरीफ़ आदमी थे, किसी दोस्त के कहने पर सट्टा खेलना शुरू कर दिया।</p>
<p>शुरू में उन्हें इस खेल में काफ़ी मुनाफ़ा हुआ वो ख़ुश थे कि चलो मेरे बेटे की आला तालीम का ख़र्च ही निकल आया मगर लालच बुरी बला है। उन्हों ने ये समझा कि उन की पुश्त पर चौगुनी है जीतते ही चले जाऐंगे।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/pachtawa-story-by-munshi-premchand/8808/"><strong>पछतावा&#8230; पढ़िए आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>उन का वो दोस्त जिस ने उन को इस रास्ते पर लगाया था बार बार उन से कहता था:<br />
“ख़ान साहब माशा-अल्लाह आप क़िस्मत के धनी हैं मिट्टी में भी हाथ डालें तो सोना बन जाये।”</p>
<p>और वो इस क़िस्म की चापलूसियों के ज़रिये ख़ान बहादुर से सौ दो सौ रुपय ऐंठ लेता। ख़ान बहादुर को भी कोई तकलीफ़ महसूस न होती इस लिए कि उन्हें बगै़र मेहनत के हज़ारों रुपय मिल रहे थे ।</p>
<p>अहमद दीन ज़हीन और बा-शुऊर लड़का था उस ने एक दिन अपने बाप से कहा:<br />
“अब्बा जी! ये आप ने जो सट्टा बाज़ी शुरू की है माफ़ कीजिएगा, उस का अंजाम अच्छा नहीं होगा ”<br />
ख़ान बहादुर ने तेज़ लहजे में उस से कहा:<br />
“बरखु़र्दार ! तुम्हें मेरे कामों में दख़ल देने की जुर्रत नहीं होनी चाहिए मैं जो कुछ कर रहा हूँ ठीक है जितना रुपया आरहा है, वो मैं अपने साथ क़ब्र में लेकर नहीं जाऊंगा। ये सब तुम्हारे काम आएगा ”</p>
<p>अहमद दीन ने बड़ी मासूमियत से पूछा:<br />
“लेकिन अब्बा जी, ये कब तक आता रहेगा हो सकता है कल को ये जाने भी लगे ”<br />
ख़ान बहादुर भिन्ना गए।<br />
“बको मत आता ही रहेगा।”<br />
रुपया आता रहा</p>
<p>लेकिन एक दिन ख़ान बहादुर ने कई हज़ार रुपय की रक़म दाओ पर लगा दी लेकिन नतीजा सिफ़र निकला दस हज़ार हाथ से देने पड़े</p>
<p>ताव में आकर उन्हों ने बीस हज़ार रुपय का सट्टा खेला उन को यक़ीन था कि सारी कसर पूरी हो जाएगी लेकिन सुबह जब उन्हों ने अख़बार देखा तो मालूम हुआ कि ये बीस हज़ार भी गए।</p>
<p>ख़ान बहादुर हिम्मत हारने वाले नहीं थे उन्हों ने अपना एक मकान गिरवी रख कर पच्चास हज़ार रुपय लिए, और सब का सब अल्लाह का नाम लेकर चांदी के सट्टे पर लगा दिए।</p>
<p>अल्लाह नाम तो ख़ैर अल्लाह का नाम है वो चांदी और सोने की मार्कीट पर क्या कंट्रोल कर सकता है सुबह हुई तो ख़ान बहादुर को मालूम हुआ कि चांदी का भाव एक दम गिर गया है उन को इस क़दर सदमा हुआ कि दल के दौरे पड़ने लगे।</p>
<p>अहमद दीन ने उन से कहा<br />
“अब्बा जी छोड़ दीजिए इस बकवास को ”<br />
ख़ान बहादुर ने बड़े ग़ुस्से में अपने बेटे से कहा:<br />
“तुम बकवास मत करो मैं जो कुछ कर रहा हूँ ठीक है।”<br />
अहमद दीन ने मोअद्दबाना कहा:<br />
“लेकिन अब्बा जान ये जो आप को दिल की तकलीफ़ शुरू हो गई है, इस की वजह क्या है?”<br />
“मुझे क्या मालूम अल्लाह बेहतर जानता है ऐसे आरिज़े इंसान को होते ही रहते हैं।”<br />
अहमद दीन ने कुछ देर सोचने के बाद कहा:</p>
<p>“जी हाँ इंसान को हर क़िस्म के आरिज़े होते रहते हैं लेकिन उन की कोई वजह भी तो होती है। मिसाल के तौर पर अगर आप कोई ऐसी चीज़ खा लें जिस में हैजे़ के जरासीम हों और ”</p>
<p>ख़ान बहादुर को अपने बेटे की ये गुफ़्तुगू पसंद नहीं थी।<br />
“तुम चले जाओ यहां से मेरा मग़्ज़ मत चाटो मैं हर चीज़ से वाक़िफ़ हूँ ”<br />
अहमद दीन ने कमरे से बाहर निकलते हुए कहा :<br />
“ये आप की ग़लत-फ़हमी है कोई इंसान भी हर चीज़ से वाक़िफ़ होने का दावा नहीं कर सकता।”<br />
अहमद दीन चला गया।</p>
<p>ख़ान बहादुर अंदरूनी तौर पर ख़ुद को बहुत बड़ा चुग़द समझने लगे थे। लेकिन वो अपने इस एहसास को अपने लड़के पर ज़ाहिर नहीं करना चाहते थे।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/parinde-story-by-nirmal-verma/8788/">परिंदे&#8230; आज की कहानी</a></span></strong></span></p>
<p>बिस्तर पर लेटे उन्हों ने बार बार ख़ुद से कहा:<br />
“ख़ान बहादुर अताउल्लाह तुम ख़ान बहादुर बने फिरते हो लेकिन अस्ल में तुम अव़्वल दर्जे के बेवक़ूफ़ हो।”<br />
“तुम अपने बेटे की बात पर कान क्यों नहीं धरते जबकि तुम जानते हो कि वो जो कुछ कह रहा है सही है।”<br />
“जितना रुपया तुम ने हासिल किया था, उस से दुगुना रुपया तुम ज़ाए कर चुके हो क्या ये दरुस्त है?”</p>
<p>ख़ान बहादुर झुँझला गए और बड़बड़ाने लगे:</p>
<p>“सब दरुस्त है सब दरुस्त है एक मैं ही ग़लत हूँ लेकिन मेरा ग़लत होना ही सही होगा बाअज़ औक़ात गलतियां भी सेहत का सामान मुहय्या कर देती हैं।”</p>
<p>पंद्रह दिन बिस्तर पर लेटे और ईलाज कराने के बाद जब वो किसी क़दर ही तंदरुस्त हुए तो उन्हों ने अपना एक और मकान बेच दिया ये पच्चीस हज़ार रुपय में बिका ।</p>
<p>ख़ानसाहब ने ये सब रुपय सट्टे पर लगा दिए। उन को पूरी उम्मीद थी कि वो अपनी अगली पिछली कसर पूरी कर लेंगे मगर क़िस्मत ने यावरी ना की और वो इन पच्चीस हज़ार रूपों से भी हाथ धो बैठे।</p>
<p>अहमद दीन पेच-ओ-ताब खा के रह गया उस की समझ में नहीं आता था कि अपने बाप को किस तरह समझाए वो उस की कोई बात सुनते ही नहीं थे।</p>
<p>अहमद दीन ने आख़िरी कोशिश की।</p>
<p>और एक दिन जब उस का बाप अपने कमरे में हुक़्क़ा पी रहा था और मालूम नहीं किस सोच में ग़र्क़ था कि उस से डरते डरते मुख़ातब हुआ:</p>
<p>“अब्बा जी ”<br />
ख़ान बहादुर साहब सोच में इस क़दर ग़र्क़ थे कि उन्हों ने अपने लड़के की आवाज़ ही नहीं सुनी।<br />
अहमद दीन ने आवाज़ को ज़रा बुलंद क्या:<br />
“अब्बा जी अब्बा जी !”<br />
ख़ान बहादुर चोंके।<br />
“क्या है ”<br />
“अहमद दीन काँप गया ”<br />
“कुछ नहीं अब्बा जी मुझे मुझे आप से एक बात कहना थी”<br />
ख़ान बहादुर ने हुक़्क़े की नड़ी अपने मुँह से जुदा की।<br />
“कहो, क्या कहना है।”<br />
अहमद दीन ने बड़ी लजाजत से कहा:<br />
“मुझे ये अर्ज़ करना है ये दरख़्वास्त करना थी कि आप सट्टा खेलना बंद कर दें ”<br />
हुक़्क़े का एक ज़ोरदार कश लेकर वो अहमद दीन पर बरस पड़े</p>
<p>“तुम कौन होते हो मुझे नसीहत करने वाले मैं जानूँ मेरा काम। क्या अब तक तुम्हारे ही मश्वरे से मैं सारे काम करता रहा हूँ देखो, मैं तुम से कहे देता हूँ कि आइन्दा मेरे मुआमले में कभी दख़ल न देना मुझे ये गुस्ताख़ी हरगिज़ पसंद नहीं समझे!”</p>
<p>अहमद दीन की गर्दन झुकी हुई थी:<br />
“जी मैं समझ गया ”<br />
और ये कह कर वो अपने बाप के कमरे से निकल गया।</p>
<p>सट्टे की लत शराब की आदत से भी कहीं ज़्यादा बुरी होती है। ख़ान बहादुर इस में कुछ ऐसे गिरफ़्तार हुए कि जायदाद सब की सब इस ख़तरनाक खेल की नज़र होगई।</p>
<p>मरहूम बीवी के ज़ेवर थे वो भी बिक गए और नतीजा इस का ये निकला कि उन के दिल के आरिज़े ने कुछ ऐसी शक्ल इख़्तियार की कि वो एक रोज़ सुबह सवेरे ग़ुस्ल-ख़ाने में दाख़िल होते ही धम से गिरे और एक सेकंड के अंदर अंदर दम तोड़ दिया।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/janaze-story-by-ismat-chughtai/8775/">जनाज़े&#8230; आज की कहानी</a></span></strong></span></p>
<p>अहमद दीन को ज़ाहिर है कि अपने बाप की वफ़ात का बहुत सदमा हुआ वो कई दिन निढाल रहा। उस की समझ में नहीं आता था कि क्या करे बी ए पास था आला तालीम हासिल करने के ख़्वाब देख रहा था मगर अब सारा नक़्शा ही बदल गया था। इस के बाप ने एक फूटी कोड़ी भी उस के लिए नहीं छोड़ी थी। मकान जिस में वो तन्हा रहता था रिहन था।</p>
<p>यहां से उस को कुछ अर्से के बाद निकलना पड़ा घर की मुख़्तलिफ़ चीज़ें बेच कर उस ने चार पाँच सौ रुपय हासिल किए और एक ग़लीज़ मुहल्ले में एक कमरा किराए पर ले लिया मगर पाँच सौ रुपय कब तक उस का साथ दे सकते थे। ज़्यादा से ज़्यादा एक बरस तक बड़ी किफ़ायत शिआरी से गुज़ारा कर लेता।</p>
<p>लेकिन उस के बाद क्या होता।<br />
अहमद दीन ने सोचा:<br />
“मुझे मुलाज़मत कर लेनी चाहिए!<br />
चाहे वो कैसी भी हो पच्चास साठ रुपय माहवार मिल जाएं तो गुज़ारा हो जाएगा।”</p>
<p>उस की माँ को मरे इतने ही बरस होगए थे जितने उस को जीते, अहमद दीन ने हालाँकि उस की शक्ल तक नहीं देखी थी न उस को दूध पीना नसीब हुआ था फिर भी वो अक्सर उस को याद कर के आँसू बहाता रहता</p>
<p>अहमद दीन ने मुलाज़मत हासिल करने की इंतिहाई कोशिश की मगर कामयाबी न हुई इतने बे-रोज़गार और बे-कार आदमी थे कि वो ख़ुद को इस बे-रोज़गारी और बे-कारी के समुंद्र में एक क़तरा समझता था।</p>
<p>लेकिन इस एहसास के बावजूद उस ने हिम्मत न हारी और अपनी तग-ओ-दो जारी रखी।</p>
<p>बहुत दिनों के बाद उसे मालूम हुआ कि अगर किसी अफ़्सर की मुट्ठी गर्म की जाये तो मुलाज़मत मिलने का इमकान पैदा हो सकता है लेकिन वो मुट्ठी गर्म करने का मसाला कहाँ से लाता।</p>
<p>एक दफ़्तर में जब वो मुलाज़मत के सिलसिले में गया तो हैड क्लर्क ने उस से शफ़ीक़ाना अंदाज़ में कहा:</p>
<p>“देखो बरखु़र्दार यूं ख़ाली खोली काम नहीं चलेगा जिस असामी के लिए तुम ने दरख़्वास्त दी है, उस के लिए पहले ही दो सौ पच्चास दरख़्वास्तें वसूल हो चुकी हैं मैं बड़ा साफ़ गो आदमी हूँ पाँच सौ रुपय अगर तुम दे सकते हो तो ये मुलाज़मत तुम्हें यक़ीनन मिल जाएगी ”</p>
<p>अब अहमद दीन पाँच सौ रुपय कहाँ से लाता उस के पास बमुश्किल बीस या तीस रुपय थे।</p>
<p>चुनांचे उस ने हैड क्लर्क से कहा:</p>
<p>“जनाब ! मेरे पास इतने रुपय नहीं आप मुलाज़मत दिलवा दीजिए तनख़्वाह में से आधी रक़म आप ले लिया करें।”</p>
<p>हैडक्लर्क हंसा</p>
<p>“तुम हमें बेवक़ूफ़ बनाते हो जाओ, चलते फिरते बनू ”</p>
<p>अहमद दीन बहुत देर तक चलता फिरता रहा मगर उसे इतमिनान से कहीं बैठने का मौक़ा न मिला। जहां जाता , रिश्वत का सवाल सामने होता दुनिया शायद रिश्वत ही की वजह से आलम-ए-वुजूद में आई है</p>
<p>शायद ख़ुदा को किसी ने रिश्वत दी हो और उस ने ये दुनिया बना दी हो।</p>
<p>अहमद दीन के पास जब पैसा भी न रहा तो मज़दूरी शुरू कर दी। बोझ उठाता और हर रोज़ दो रुपय कमा लेता।</p>
<p>महंगाई का ज़माना था गो दोनों वक़्त का खाना भटियार ख़ाने में खाता लेकिन उसे काफ़ी ख़र्च बर्दाश्त करना पड़ता ।</p>
<p>ज़्यादा से ज़्यादा एक आना बच रहता</p>
<p>अहमद दीन मज़दूरी करता मगर उस के दिल-ओ-दिमाग़ पर रिश्वत का चक्र घूमता रहता था ये एक बहुत बड़ी लानत थी और वो चाहता था कि इस से किसी तरह नजात हासिल करे और मज़दूरी छोड़कर कोई ऐसी मुलाज़मत इख़्तियार करे जो इस के शायान-ए-शान हो आख़िर वो बी ए पास था फ़रस्ट क्लास फ़रस्ट।</p>
<p>उस ने सोचा कि नमाज़ पढ़ना शुरू कर दे ख़ुदा से दुआ मांगे कि वो उस की सुने! चुनांचे उस ने बाक़ायदा पाँच वक़्त की नमाज़ शुरू कर दी। ये सिलसिला एक वक़्त तक जारी रहा मगर कोई नतीजा बरामद न हुआ।</p>
<p>इस दौरान में उस के पास तीस रुपय जमा हो चुके थे। सुबह की नमाज़ अदा करने के बाद वो डाक-ख़ाने गया तीस रुपय का पोस्टल आर्डर लिया और लिफाफे में डाल कर साथ ही एक रुका भी रख दिया जिस का मज़मून कुछ इस क़िस्म का था:।</p>
<p>“अल्लाह मियां मैं समझता हूँ तुम भी रिश्वत लेकर काम करते हो। मेरे पास तीस रुपय हैं जो तुम्हें भेज रहा हूँ मुझे कहीं अच्छी सी मुलाज़मत दिलवा दो बोझ उठा उठा कर मेरी कमर दोहरी होगई है।”</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/gulli-danda-story-by-munshi-premchand/8723/">गुल्&#x200d;ली-डंडा&#8230; आज की कहानी</a></span></strong></span></p>
<p>लिफाफे पर इस ने पता लिखा :</p>
<p>“बख़िदमत जनाब अल्लाह मियां मालिक-ए-कायनात”</p>
<p>चंद रोज़ बाद अहमद दीन को एक ख़त मिला जो कायनात अख़बार के ऐडीटर की तरफ़ से था। उस का नाम मुहम्मद मियां था, ख़त के ज़रीये उस ने अहमद दीन को बुलाया था। वो कायनात के दफ़्तर गया जहां मुतर्जिम की हैसियत से सौ रुपया माहवार पर रख लिया गया।</p>
<p>अहमद दीन ने सोचा आख़िर रिश्वत काम आ ही गई।</p>
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		<title>टोबा टेक सिंह: आज पढ़िए मंटो की कहानी</title>
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		<pubDate>Mon, 17 May 2021 06:45:39 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211;  सआदत हसन मंटो बंटवारे के दो-तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदुस्तान की हुकूमतों को ख्याल आया कि अख्लाकी कैदियों की तरह पागलों का भी तबादला होना चाहिए, यानी जो मुसलमान पागल हिन्दुस्तान के पागलखानों में हैं उन्हें पाकिस्तान पहुंचा दिया जा और जो हिन्दू और सिख पाकिस्तान के पागलखानों में है उन्हें हिन्दुस्तान के &#8230;</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="color: #ff0000;"><strong>&#8211;  सआदत हसन मंटो</strong></span></h4>
<p>बंटवारे के दो-तीन साल बाद पाकिस्तान और हिंदुस्तान की हुकूमतों को ख्याल आया कि अख्लाकी कैदियों की तरह पागलों का भी तबादला होना चाहिए, यानी जो मुसलमान पागल हिन्दुस्तान के पागलखानों में हैं उन्हें पाकिस्तान पहुंचा दिया जा और जो हिन्दू और सिख पाकिस्तान के पागलखानों में है उन्हें हिन्दुस्तान के हवाले कर दिया जाय।</p>
<p>मालूम नहीं यह बात माकूल थी या गैर-माकूल थी। बहरहाल, दानिशमंदों के फैसले के मुताबिक इधर-उधर ऊँची सतह की कांफ्रेंसें हुई और आखिर एक दिन पागलों के तबादले के लिए मुकर्रर हो गया। अच्छी तरह छान बीन की गयी। वो मुसलमान पागल जिनके लवाहिकीन (सम्बन्धी) हिन्दुस्तान ही में थे वहीं रहने दिये गये थे। बाकी जो थे उनको सरहद पर रवाना कर दिया गया। यहां पाकिस्तान में चूंकि करीब-करीब तमाम हिन्दु सिख जा चुके थे इसलिए किसी को रखने-रखाने का सवाल ही न पैदा हुआ। जितने हिन्दू-सिख पागल थे सबके सब पुलिस की हिफाजत में सरहद पर पहुंचा दिये गये।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/main-kahanikar-nahin-jebkatra-hoon-story-by-saadat-hasan-manto/8328/"><strong>मैं कहानीकार नहीं</strong><strong>, जेबकतरा हूँ : सआदत हसन मंटो</strong></a></span></p>
<p>उधर का मालूम नहीं। लेकिन इधर लाहौर के पागलखानों में जब इस तबादले की खबर पहुंची तो बड़ी दिलचस्प चीमेगोइयां होने लगी। एक मुसलमान पागल जो बारह बरस से हर रोज बाकायदगी के साथ जमींदार पढ़ता था, उससे जब उसके एक दोस्त ने पूछा-</p>
<p>— मोल्हीसाब। ये पाकिस्तान क्या होता है ?</p>
<p>तो उसने बड़े गौरो फिक्र के बाद जवाब दिया-</p>
<p>— हिन्दुस्तान में एक ऐसी जगह है जहां उस्तरे बनते हैं।</p>
<p>जवाब सुनकर उसका दोस्त मुतमइन हो गया।</p>
<p>इसी तरह एक और सिख पागल ने एक दूसरे सिख पागल से पूछा—</p>
<p>सरदार जी हमें हिन्दुस्तान क्यों भेजा जा रहा है – हमें तो वहां की बोली नहीं आती।</p>
<p>दूसरा मुस्कराया-</p>
<p>—मुझे तो हिन्दुस्तान की बोली आती है – हिंदुस्तानी बड़े शैतानी आकड़ -आकड़ फिरते हैं।</p>
<p>एक मुसलमान पागल ने नहाते-नहाते ‘पाकिस्तान जिन्दाबाद’ का नारा इस जोर से बुलन्द किया कि फर्श पर फिसल कर गिरा और बेहोश हो गया।</p>
<p>बाज पागल ऐसे थे जो पागल नहीं थे। उनमें अकसरियत ऐसे कातिलों की थी जिनके रिश्तेदारों ने अफसरों को दे- दिलाकर पागलखाने भिजवा दिया था कि फांसी के फंदे से बच जायें। ये कुछ-कुछ समझते थे कि हिंदुस्तान क्या तकसीम हुआ और यह पाकिस्तान क्या है, लेकिन सही वाकेआत से ये भी बेखबर थे। अखबारों से कुछ पता नहीं चलता था और पहरेदार सिपाही अनपढ़ और जाहिल थे। उनकी गुफ्तगू (बातचीत) से भी वो कोई नतीजा बरआमद नहीं कर सकते थे। उनको सिर्फ इतना मालूम था कि एक आदमी मुहम्मद अली जिन्ना है, जिसको कायदे आजम कहते हैं। उसने मुसलमानों के लिए एक अलाहेदा मुल्क बनाया है जिसका नाम पाकिस्तान है। यह कहां है ? इसका महल-ए-वकू (स्थल) क्या है इसके मुतअल्लिक वह कुछ नहीं जानते थे। यही वजह है कि पागल खाने में वो सब पागल जिनका दिमाग पूरी तरह माउफ नहीं हुआ था, इस मखमसे में गिरफ्तार थे कि वो पाकिस्तान में हैं या हिन्दुस्तान में। अगर हिन्दुस्तान में हैं तो पाकिस्तान कहां है। अगर वो पाकिस्तान में है तो ये कैसे हो सकता है कि वो कुछ अरसा पहले यहां रहते हुए भी हिन्दुस्तान में थे। एक पागल तो पाकिस्तान और हिन्दुस्तान, और हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के चक्कर में कुछ ऐसा गिरफ्तार हुआ कि और ज्यादा पागल हो गया। झाडू देते-देते एक दिन दरख्त पर चढ़ गया और टहनी पर बैठ कर दो घंटे मुस्तकिल तकरीर करता रहा, जो पाकिस्तान और हिन्दुस्तान के नाजुक मसअले पर थी। सिपाहियों ने उसे नीचे उतरने को कहा तो वो और ऊपर चढ़ गया। डराया, धमकाया गया तो उसने कहा—</p>
<p>मैं न हिन्दुस्तान में रहना चाहता हूं न पाकिस्तान में। मैं इस दरख्त पर ही रहूंगा।</p>
<p>एक एम. एससी. पास रेडियो इंजीनियर में, जो मुसलमान था और दूसरे पागलों से बिल्कुल अलग-थलग, बाग की एक खास रविश पर सारा दिन खामोश टहलता रहता था, यह तब्दीली नमूदार हुई कि उसने तमाम कपड़े उतारकर दफादार के हवाले कर दिये और नंगधंडंग़ सारे बाग में चलना शुरू कर दिया।</p>
<p>यन्यूट के एक मौटे मुसलमान पागल ने, जो मुस्लिम लीग का एक सरगर्म कारकुन था और दिन में पन्द्रह-सोलह मरतबा नहाता था, यकलख्त यह आदत तर्क कर दी। उसका नाम मुहम्मद अली था। चुनांचे उसने एक दिन अपने जिंगले में ऐलान कर दिया कि वह कायदे आजम मोहम्मद अली जिन्ना है। उसकी देखादेखी एक सिख पागल मास्टर तारासिंह बन गया। करीब था कि उस जिंगले में खून-खराबा हो जाय, मगर दोनों को खतरनाग पागल करार देकर अलहदा-अलहदा बन्द कर दिया गया।</p>
<p>लाहौर का एक नौजवान हिन्दू वकील था जो मुहब्बत में मुब्तिला होकर पागल हो गया था। जब उसने सुना कि अमृतसर हिन्दुस्तान में चला गया है तो उसे बहुत दुख हुआ। इसी शहर की एक हिन्दू लड़की से उसे मुहब्बत हो गयी थी। गो उसने इस वकील को ठुकरा दिया था, मगर दीवानगी की हालत में भी वह उसको नहीं भूला था। चुनांचे वह उन तमाम मुस्लिम लीडरों को गालियां देता था, जिन्होंने मिल मिलाकर हिन्दुस्तान के दो टुकड़े कर दिये— उसकी महबूबा हिंदुस्तानी बन गयी और वह पाकिस्तानी।</p>
<p>जब तबादले की बात शुरू हुई तो वकील को कई पागलों ने समझाया कि वह दिल बुरा न करे,उसको हिन्दुस्तान वापस भेज दिया जायेगा। उस हिन्दुस्तान में जहां उसकी महबूबा रहती है। मगर वह लाहौर छोड़ना नहीं चाहता था– इस ख्याल से कि अमृतसर में उसकी प्रैक्टिस नहीं चलेगी।</p>
<p>यूरोपियन वार्ड में दो एंग्लो-इण्डियन पागल थे। उनको जब मालूम हुआ कि हिन्दुस्तान को आजाद करके अंग्रेज चले गये हैं तो उनको बहुत रंज हुआ। वह छुप-छुप कर इस मसअले पर गुफ्तगू करते रहते कि पागलखाने में उनकी हैसियत क्या होगी। यूरापियन वार्ड रहेगा या उड़ जायगा। ब्रेकफास्ट मिलेगा या नहीं। क्या उन्हें डबलरोटी के बजाय ब्लडी इण्डियन चपाती तो जहरमार नहीं करनी पड़ेगी?</p>
<p>एक सिख था जिसको पागलखाने में दाखिल हुए पन्द्रह बरस हो चुके थे। हर वक्त उसकी जबान पर अजीबोगरीब अल्फाज सुनने में आते थे, ‘ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी बाल आफ दी लालटेन।’ वो न दिन में सोता था न रात में। पहरेदारों का कहना था कि पन्द्रह बरस के तवील अर्से में एक एक लम्हे के लिए भी नहीं सोया। लेटा भी नहीं था। अलबना किसी दीवार के साथ टेक लगा लेता था।</p>
<p>हर वक्त खड़ा रहने से उसके पांव सूज गये थे। पिंडलियां भी फूल गयीं थीं। मगर इस जिस्मानी तकलीफ के बावजूद वह लेटकर आराम नहीं करता था। हिन्दुस्तान-पाकिस्तान और पागलों के तबादले के मुतअल्लिक जब कभी पागलखाने में गुफ्तगू होती थी तो वह गौर से सुनता था। कोई उससे पूछता कि उसका क्या खयाल है तो बड़ी संजीदगी से जवाब देता, ‘ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट।’</p>
<p>लेकिन बाद में आफ दी पाकिस्तान गवर्नमेंट की जगह आफ दी टोबा टेकसिंह गवर्नमेंट ने ले ली और उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेकसिंह कहां है जहां का वो रहने वाला है। लेकिन किसी को भी नहीं मालूम था कि वो पाकिस्तान में है या हिन्दुस्तान में। जो यह बताने की कोशिश करते थे वो खुद इस उलझाव में गिरफ्तार हो जाते थे कि स्याल कोटा पहले हिन्दुस्तान में होता था, पर अब सुना है कि पाकिस्तान में है। क्या पता है कि लाहौर जो अब पाकिस्तान में है कल हिन्दुस्तान में चला जायगा या सारा हिन्दुस्तान हीं पाकिस्तान बन जायेगा। और यह भी कौन सीने पर हाथ रखकर कह सकता था कि हिन्दुस्तान और पाकिस्तान दोनों किसी दिन सिरे से गायब नहीं हो जायेंगे।</p>
<p>उस सिख पागल के केस छिदरे होके बहुत मुख्तसर रह गये थे। चूंकि वह बहुत कम नहाता था इसलिए दाढ़ी और बाल आपस में जम गये थे जिनके बाइस (कारण) उसकी शक्ल बड़ी भयानक हो गयी थी। मगर आदमी बेजरर (अहानिकारक) था। पन्द्रह बरसों में उसने किसी से झगड़ा-फसाद नहीं किया था। पागलखाने के जो पुराने मुलाजिम थे वो उसके मुतअलिक इतना जानते थे कि टोबा टेकसिंह में उसकी कई जमीनें थीं। अच्छा खाता-पीता जमींदार था कि अचानक दिमाग उलट गया। उसके रिश्तेदार लोहे की मोटी-मोटी जंजीरों में उसे बांधकर लाये और पागलखाने में दाखिल करा गये।</p>
<p>महीने में एक बार मुलाकात के लिए ये लोग आते थे और उसकी खैर-खैरियत दरयाफ्त करके चले जाते थे। एक मुप्त तक ये सिलसिला जारी रहा, पर जब पाकिस्तान हिन्दुस्तान की गड़बड़ शुरू हुई तो उनका आना बन्द हो गया।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/art-culture/article-by-dr-mukti-parashar-on-the-entire-life-of-krishna-is-presented-in-the-kota-painting-style/8339/">कोटा चित्रशैली में प्रकृति संग कृष्ण जीवन का चित्रांकन</a></span></strong></span></p>
<p>उसका नाम बिशन सिंह था। मगर सब उसे टोबा टेकसिंह कहते थे। उसको ये मालूम नहीं था कि दिन कौन-सा है, महीना कौन-सा है या कितने दिन बीत चुके हैं। लेकिन हर महीने जब उसके अजीज व अकारिब (सम्बन्धी) उससे मिलने के लिए आते तो उसे अपने आप पता चल जाता था। चुनांचे वो दफादार से कहता कि उसकी मुलाकात आ रही है। उस दिन वह अच्छी तरह नहाता, बदन पर खूब साबुन घिसता और सिर में तेल लगाकर कंघा करता। अपने कपड़े जो वह कभी इस्तेमाल नहीं करता था, निकलवा के पहनता और यूं सज-बन कर मिलने वालों के पास आता। वो उससे कुछ पूछते तो वह खामोश रहता या कभी-कभार ‘ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी वेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी लालटेन ‘ कह देता। उसकी एक लड़की थी जो हर महीने एक उंगली बढ़ती-बढ़ती पन्द्रह बरसों में जवान हो गयी थी। बिशन सिंह उसको पहचानता ही नहीं था। वह बच्ची थी जब भी आपने बाप को देखकर रोती थी, जवान हुई तब भी उसकी आंख में आंसू बहते थे। पाकिस्तान और हिन्दुस्तान का किस्सा शुरू हुआ तो उसने दूसरे पागलों से पूछना शुरू किया कि टोबा टेकसिंह कहां है। जब इत्मीनान बख्श (सन्तोषजनक) जवाब न मिला तो उसकी कुरेद दिन-ब- दिन बढ़ती गयी। अब मुलाकात नहीं आती है। पहले तो उसे अपने आप पता चल जाता था कि मिलने वाले आ रहे हैं, पर अब जैसे उसके दिल की आवाज भी बन्द हो गयी थी जो उसे उनकी आमद की खबर दे दिया करती थी।</p>
<p>उसकी बड़ी ख्वाहिश थी कि वो लोग आयें जो उससे हमदर्दी का इजहार करते थे ओर उसके लिए फल, मिठाइयां और कपड़े लाते थे। वो उनसे अगर पूछता कि टोबा टेकसिंह कहां है तो यकीनन वो उसे बता देते कि पाकिस्तान में है या हिन्दुस्तान में, क्योंकि उसका ख्याल था कि वो टोबा टेकसिंह ही से आते हैं जहां उसकी जमीनें हैं।</p>
<p>पागलखाने में एक पागल ऐसा भी था जो खुद को खुदा कहता था। उससे जब एक दिन बिशन सिंह ने पूछा कि टोबा टेकसिंह पाकिस्तान में है या हिन्दुस्तान में तो उसने हस्बेआदत (आदत के अनुसार) कहकहा लगाया और कहा—</p>
<p>वो न पाकिस्तान में है न हिन्दुस्तान में, इसलिए कि हमने अभी तक हुक्म नहीं लगाया।</p>
<p>बिशन सिंह ने इस खुदा से कई मरतबा बड़ी मिन्नत समाजत से कहा कि वो हुक्म दे दे ताकि झंझट खत्म हो, मगर वो बहुत मसरूफ था, इसलिए कि उसे ओर बेशुमार हुक्म देने थे। एक दिन तंग आकर वह उस पर बरस पड़ा, ‘ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ वाहे गुरूजी दा खलसा एन्ड वाहे गुरूजी की फतह। जो बोले सो निहाल सत सिरी अकाल।’ उसका शायद यह मतलब था कि तुम मुसलमान के खुदा हो, सिखों के खुदा होते तो जरूर मेरी सुनते। तबादले से कुछ दिन पहले टोबा टेकसिंह का एक मुसलमान दोस्त मुलाकात के लिए आया। पहले वह कभी नहीं आया था। जब बिशन सिंह ने उसे देखा तो एक तरफ हट गया और वापस आने लगा मगर सिपाहियों ने उसे रोका— ये तुमसे मिलने आया है – तुम्हारा दोस्त फजलदीन है।</p>
<p>बिशन सिंह ने फजलदीन को देखा और कुछ बड़बड़ाने लगा। फजलदीन ने आगे बढ़कर उसके कंधे पर हाथ रखा।</p>
<p>—मैं बहुत दिनों से सोच रहा था कि तुमसे मिलूं लेकिन फुर्सत ही न मिली। तुम्हारे सब आदमी खैरियत से चले गये थे मुझसे जितनी मदद हो सकी मैने की। तुम्हारी बेटी रूप कौर…. वह कुछ कहते कहते रूक गया। बिशन सिंह कुछ याद करने लगा—</p>
<p>बेटी रूप कौर।</p>
<p>फजलदीन ने रूक कर कहा।</p>
<p>हां वह भी ठीक ठाक है। उनके साथ ही चली गयी थी।</p>
<p>बिशन सिंह खामोश रहा। फजलदीन ने कहना शुरू किया—</p>
<p>उन्होंने मुझसे कहा था कि तुम्हारी खैर-खैरियत पूछता रहूं। अब मैंने सुना है कि तुम हिन्दुस्तान जा रहे हो। भाई बलबीर सिंह और भाई बिधावा सिंह से सलाम कहना— और बहन अमृत कौर से भी। भाई बलबीर से कहना फजलदीन राजी-खुशी है। वो भूरी भैंसे जो वो छोड़ गये थे उनमें से एक ने कट्टा दिया है दूसरी के कट्टी हुई थी पर वो छ: दिन की हो के मर गयी और और मेरे लायक जो खिदमत हो कहना, मै हर वक्त तैयार हूं और ये तुम्हारे लिए थोड़े से मरून्डे लाया हूं।</p>
<p>बिशन सिंह ने मरून्डे की पोटली लेकर पास खड़े सिपाही के हवाले कर दी और फजलदीन से पूछा— टोबा टेकसिंह कहां है?</p>
<p>टोबा टेकसिंह… उसने कद्रे हैरत से कहा कहां है! वहीं है, जहां था।</p>
<p>बिशन सिंह ने पूछा– पाकिस्तान में या हिन्दुस्तान में?</p>
<p>हिन्दुस्तान में…. नहीं-नहीं पाकिस्तान में….</p>
<p>फजलदीन बौखला सा गया। बिशन सिंह बड़बड़ाता हुआ चला गया— ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी पाकिस्तान एन्ड हिन्दुस्तान आफ दी हए फिटे मुंह।</p>
<p>तबादले की तैयारियां मुकम्मल हो चुकी थीं। इधर से उधर और उधर से इधर आने वाले पागलों की फेहरिस्तें (सूचियां) पहुंच गयी थीं, तबादले का दिन भी मुकरर्र हो गया था। सख्त सर्दियां थीं। जब लाहौर के पागलखाने से हिन्दू-सिख पागलों से भरी हुई लारियां पुलिस के मुहाफिज दस्ते के साथ् रवाना हुई तो मुतअल्लिका (संबंधित ) अफसर भी हमराह थे। वाहगा के बार्डर पर तरफैन के (दोनों तरफ से) सुपरिटेंडेंट एक दूसरे से मिले और इब्तेदाई कार्रवाई खत्म होने के बाद तबादला शुरू हो गया जो रात भर जारी रहा।</p>
<p>पागलों को लारियों से निकालना और उनको दूसरे अफसरों के हवाले करना बड़ा कठिन काम था। बाज तो बाहर निकलते ही नहीं थे। जो निकलने पर रजामन्द होते थे, उनको संभालना मुश्किल हो जाता था क्योंकि इधर-उधर भाग उठते थे। जो नंगे थे उनको कपड़े पहनाये जाते, तो वो फाड़कर अपने तन से जुदा कर देते क़ोई गालियां बक रहा है, कोई गा रहा है। आपस में लड़-झगड़ रहे हैं, रो रहे हैं, बक रहे हैं। कान पड़ी आवाज सुनायी नही देती थी– पागल औरतों का शेरोगोगा अलग था और सर्दी इतने कड़ाके की थी कि दांत बज रहे थे।</p>
<p>पागलों की अकसरियत इस तबादले के हक में नहीं थी। इसलिए कि उनकी समझ में आता था कि उन्हें अपनी जगह से उखाड़कर कहां फेंका जा रहा है। चन्द जो कुछ सोच रहे थे— ‘पाकिस्तान जिन्दाबाद’ के नारे लगा रहे थे। दो-तीन मरतबा फसाद होते-होते बचा, क्योंकि बाज मुसलमान और सिखों को ये नारे सुनकर तैश आ गया।</p>
<p>जब बिशन सिंह की बारी आयी ओर वाहगा के उस पार मुतअल्लका अफसर उसका नाम रजिस्टर में दर्ज करने लगा तो उसने पूछा— टोबा टेकसिंह कहां है? पाकिस्तान में या हिन्दुस्तान में? मुतअल्लका अफसर हंसा—पाकिस्तान में।</p>
<p>यह सुनकर बिशनसिंह उछलकर एक तरफ हटा और दौड़कर अपने बाकी मांदा साथियों के पास पहुंच गया। पाकिस्तानी सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया और दूसरी तरफ ले जाने लगे। मगर उसने चलने से इन्कार कर दिया, और जोर-जोर से चिल्लाने लगा— टोबा टेकसिंह कहां है ओपड़ी गुड़गुड़ दी एन्क्स दी बेध्याना विमन्ग दी वाल आफ दी टोबा टेकसिंह एन्ड पाकिस्तान।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/idgah-by-munshi-premchand/8218/"><strong>ईदगाह: वह कहानी</strong><strong>, </strong><strong>जो आज भी हमारे मन को झकझोरती है</strong></a></span></p>
<p>उसे बहुत समझाया गया कि देखों अब टोबा टेकसिंह हिन्दुस्तान में चला गया है। अगर नहीं गया तो उसे फौरन वहां भेज दिया जायगा। मगर वो न माना। जब उसको जबरदस्ती दूसरी तरफ ले जाने की कोशिश की गयी तो वह दरम्यान में एक जगह इस अन्दाज में अपनी सूजी हुई टांगों पर खड़ा हो गया जैसे अब उसे वहां से कोई ताकत नहीं हटा सकेगी।</p>
<p>आदमी चूंकि बेजरर था इसलिए उससे मजीद जबरदस्ती न की गयी। उसको वहीं खड़ा रहने दिया गया और बाकी काम होता रहा। सूरज निकलने से पहले साकित व साकिन बिशनसिंह हलक से एक फलक शगाफ चीख निकली — इधर-उधर से कई अफसर दौड़ आये और देखा कि वो आदमी जो पन्द्रह बरस तक दिन-रात अपनी टांगों पर खड़ा रहा, औंधे मुंह लेटा था। उधर खारदार तारों के पीछे हिन्दुस्तान था— इधर वैसे ही तारों के पीछे पाकिस्तान। दरमियान में जमीन के इस टुकड़े पर, जिसका कोई नाम नहीं था, टोबा टेकसिंह पड़ा था।</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/toba-tek-singh-story-by-saadat-hasan-manto/8354/">टोबा टेक सिंह: आज पढ़िए मंटो की कहानी</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>मैं कहानीकार नहीं, जेबकतरा हूँ : सआदत हसन मंटो</title>
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		<dc:creator><![CDATA[tismedia.in]]></dc:creator>
		<pubDate>Sun, 16 May 2021 08:13:55 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Art & Culture]]></category>
		<category><![CDATA[Art and Literature]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>-सआदत हसन मंटो कबूलनामा मेरी जिंदगी में तीन बड़ी घटनाएँ घटी हैं। पहली मेरे जन्म की, दूसरी मेरी शादी की और तीसरी मेरे कहानीकार बन जाने की। लेखक के तौर पर राजनीति में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है। लीडरों और दवाफरोशों को मैं एक ही नजर से देखता हूँ। लीडर और दवाफरोशी दोनों पेशे हैं। &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/main-kahanikar-nahin-jebkatra-hoon-story-by-saadat-hasan-manto/8328/">मैं कहानीकार नहीं, जेबकतरा हूँ : सआदत हसन मंटो</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="color: #ff0000;"><strong>-सआदत हसन मंटो</strong></span></h4>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>कबूलनामा</strong></span><br />
मेरी जिंदगी में तीन बड़ी घटनाएँ घटी हैं। पहली मेरे जन्म की, दूसरी मेरी शादी की और तीसरी मेरे कहानीकार बन जाने की।</p>
<p>लेखक के तौर पर राजनीति में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है। लीडरों और दवाफरोशों को मैं एक ही नजर से देखता हूँ। लीडर और दवाफरोशी दोनों पेशे हैं। राजनीति से मुझे उतनी ही दिलचस्पी है, जितनी गांधीजी को सिनेमा से थी। गांधीजी सिनेमा नहीं देखते थे, और मैं अखबार नहीं पढ़ता। दरअसल हम दोनों गलती करते हैं। गांधीजी को फिल्में जरूर देखनी चाहिए थीं, और मुझे अखबार जरूर पढ़ने चाहिए।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/idgah-by-munshi-premchand/8218/"><strong>ईदगाह: वह कहानी</strong><strong>, </strong><strong>जो आज भी हमारे मन को झकझोरती है</strong></a></span></p>
<p>मुझसे पूछा जाता है कि मैं कहानी कैसे लिखता हूँ। इसके जवाब में मैं कहूँगा कि अपने कमरे में सोफे पर बैठ जाता हूँ, कागज-कलम लेता हूँ और ‘बिस्मिल्ला’ कहकर कहानी शुरू कर देता हूँ। मेरी तीनों बेटियाँ शोर मचा रही होती हैं। मैं उन से बातें भी करता हूँ। उनके लड़ाई-झगड़े का फैसला भी करता हूँ। कोई मिलने वाला आ जाए तो उसकी खातिरदारी भी करता हूँ, पर कहानी भी लिखता रहता हूँ। सच पूछिए तो मैं वैसे ही कहानी लिखता हूँ, जैसे खाना खाता हूँ, नहाता हूँ, सिगरेट पिता हूँ और झक मारता हूँ।</p>
<p>अगर पूछा जाए कि मैं कहानी क्यों लिखता हूँ, तो कहूँगा कि शराब की तरह कहानी लिखने की भी लत पड़ गई है। मैं कहानी न लिखूँ, तो मुझे ऐसा लगता है कि मैंने कपड़े नहीं पहने हैं या गुसल नहीं किया है या शराब नहीं पी है। दरअसल मैं कहानी नहीं लिखता हूँ, बल्कि कहानी मुझे लिखती है। मैं बहुत कम-पढ़ा लिखा आदमी हूँ। वैसे तो मैंने दो दर्जन किताबें लिखी हैं और जिस पर आए दिन मुकदमे चलते रहते हैं। जब कलम मेरे हाथ में न हो, तो मैं सिर्फ सआदत हसन होता हूँ!</p>
<p>कहानी मेरे दिमाग में नहीं, मेरी जेब में होती है, जिसकी मुझे कोई खबर नहीं होती। मैं अपने दिमाग पर जोर देता हूँ कि कोई कहानी निकल आए। कहानी लिखने की बहुत कोशिश करता हूँ, पर कहानी दिमाग से बाहर नहीं निकलती। आखिर थक-हारकर बाँझ औरत की तरह लेट जाता हूँ। अनलिखी कहानी की कीमत पेशगी वसूल कर चुका हूँ, इसलिए बड़ी झुँझलाहट होती है। करवट बदलता हूँ। उठकर अपनी चिड़ियों को दाने डालता हूँ। बच्चियों को झूला झुलाता हूँ। घर का कूड़ा-करकट साफ करता हूँ, घर में इधर-उधर बिखरे नन्हें-मुन्ने जूते उठाकर एक जगह रखता हूँ, पर कमबख्त कहानी जो मेरी जेब में पड़ी होती है, मेरे दिमाग में नहीं आती और मैं तिलमिलाता रहता हूँ।</p>
<p>जब बहुत ही ज्यादा कोफ्त होती है, तो गुसलखाने में चला जाता हूँ, पर वहाँ से भी कुछ मिलता नहीं। सुना है कि हर बड़ा आदमी गुसलखाने में सोचता है। मुझे अपने तजुर्बे से पता लगा है कि मैं बड़ा आदमी नहीं हूँ, पर हैरानी है कि फिर भी मैं हिंदुस्तान और पाकिस्तान का बहुत बड़ा कहानीकार हूँ। इस बारे में मैं यही कह सकता हूँ कि या तो मेरे आलोचकों को खुशफहमी है या फिर मैं उनकी आँखों में धूल झोंक रहा हूँ।</p>
<p>ऐसे मौकों पर, जब कहानी नहीं ही लिखी जाती, तो कमी यह होता है कि मेरी बीवी मुझसे कहती है, ‘आप सोचिए नहीं, कलम उठाइए और लिखना शुरू कर दीजिए!’ मैं उसके कहने पर लिखना शुरू कर देता हूँ। उस समय दिमाग बिल्कुल खाली होता है, पर जेब भरी हुई होती है। तब अपने आप ही कोई कहानी उछलकर बाहर आ जाती है। उस नुक्ते से मैं खुद को कहानीकार नहीं, बल्कि जेबकतरा समझता हूँ जो अपनी जेब खुद काटता है और लोगों के हवाले कर देता है।</p>
<p>मैंने रेडियो के लिए जो नाटक लिखे, वे रोटी के उस मसले की पैदावार हैं, जो हर लेखक के सामने उस समय तक रहता है, जब तक वह पूरी तरह मानसिक तौर पर अपाहिज न हो जाए। मैं भूखा था, इसलिए मैंने यह नाटक लिखे। दाद इस बात की चाहता हूँ कि मेरे दिमाग ने मेरे पेट में घुसकर ऐसे हास्य-नाटक लिखे हैं, जो दूसरों को हँसाते हैं, पर मेरे होठों पर हल्की-सी मुस्कराहट भी पैदा नहीं कर सके।</p>
<p>रोटी और कला का रिश्ता कुछ अजीब-सा लगता है, पर क्या किया जाए! खुदाबंदताला को यही मंजूर है। यह गलत है कि खुदा हर चीज से खुद को निर्लिप्त रखता है और उसको किसी चीज की भूख नहीं है। दरअसल उसे भक्ति चाहिए और भक्ति बड़ी नर्म और नाजुक रोटी है, बल्कि चुपड़ी हुई रोटी है, जिस से ईश्वर अपना पेट भरता है। सआदत हसन मंटो लिखता है, क्योंकि वह ईश्वर जितना कहानीकार और कवि नहीं है। उसे रोटी की खातिर लिखना पड़ता है।</p>
<p>मैं जानता हूँ कि मेरी शख्सियत बहुत बड़ी है और उर्दू साहित्य में मेरा बहुत बड़ा नाम है। अगर यह खुशफहमी न हो तो जिंदगी और भी मुश्किल बन जाए। पर मेरे लिए यह एक तल्ख हकीकत है कि अपने मुल्क में, जिसे पाकिस्तान कहते हैं, मैं अपना सही स्थान ढूँढ़ नहीं पाया हूँ। यही वजह है कि मेरी रूह बेचैन रहती है। मैं कभी पागलखाने में और कभी अस्पताल में रहता हूँ।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-vineet-singh-on-charlie-hebdo-cartoon-on-hindu-gods/8277/"><strong>शार्ली हेब्दो ने फिर की नापाक हरकत</strong><strong>, </strong><strong>अब हिंदुओं की भावनाएं भड़काने की कोशिश</strong></a></span></p>
<p>मुझसे पूछा जाता है कि मैं शराब से अपना पीछा क्यों नहीं छुड़ा लेता? मैं अपनी जिंदगी का तीन-चौथाई हिस्सा बदपरहेजियों की भेंट चढ़ा चुका हूँ। अब तो यह हालत है कि परहेज शब्द ही मेरे लिए डिक्शनरी से गायब हो गया है।</p>
<p>मैं समझता हूँ कि जिंदगी अगर परहेज से गुजारी जाए, तो एक कैद है। अगर वह बदपरहेजियों में गुजारी जाए, तो भी कैद है। किसी-न-किसी तरह हमें इस जुर्राब के धागे का एक सिरा पकड़कर उसे उधेड़ते जाना है और बस!</p>
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		<title>11 मई: नवनिर्मित सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन का दिन</title>
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		<pubDate>Tue, 11 May 2021 05:22:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>कोटा. 11 मई&#8230; दिन जब मैसूर के शासक टीपू सुल्तान और अंग्रेजों के बीच संधि हुई&#8230; आज ही के दिन जन्म हुआ था साहित्य लेखक सआदत हसन मंटो का&#8230; आज का ही था दिन जब भारत की प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्यांगना मृणालिनी साराभाई का जन्म हुआ&#8230; आज के दिन ही ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग सर्विस ने अपनी हिंदी &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color: #ff0000;">कोटा.</span> 11 मई&#8230;</strong> दिन जब मैसूर के शासक टीपू सुल्तान और अंग्रेजों के बीच संधि हुई&#8230; आज ही के दिन जन्म हुआ था साहित्य लेखक सआदत हसन मंटो का&#8230; आज का ही था दिन जब भारत की प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्यांगना मृणालिनी साराभाई का जन्म हुआ&#8230; आज के दिन ही ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग सर्विस ने अपनी हिंदी सेवा की शुरूआत की&#8230; आज के इतिहास में ही दर्ज है नवनिर्मित सोमनाथ मंदिर का राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद द्वारा उद्घाटन&#8230; आज ही के दिन 1962 में सर्वपल्ली राधाकृष्णन को भारत का राष्ट्रपति चुना गया&#8230; आज ही का था दिन जब राजस्थान के पोखरण में परमाणु परीक्षण करने का ऐलान किया&#8230; और आज ही के दिन जनसंख्या घड़ी के मुताबिक भारत की जनसंख्या एक अरब पहुंची&#8230;</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>भारत के इतिहास में आज का दिन</strong></span><br />
<strong>1784 &#8211;</strong> अंग्रेजों और मैसूर के शासक टीपू सुल्तान के बीच संधि।<br />
<strong>1912 –</strong> एक साहित्य लेखक सआदत हसन मंटो का जन्म हुआ था.<br />
<strong>1918 –</strong> भारत की प्रसिद्ध शास्त्रीय नृत्यांगना मृणालिनी साराभाई का जन्म हुआ था.<br />
<strong>1940 &#8211;</strong> ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग सर्विस ने अपनी हिंदी सेवा की शुरुआत की।<br />
<strong>1951 &#8211;</strong> राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद ने नवनिर्मित सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन किया।<br />
<strong>1962 &#8211;</strong> सर्वपल्ली राधाकृष्णन को भारत का राष्ट्रपति चुना गया। उन्होंने डॉ. राजेन्द्र प्रसाद का स्थान लिया।<br />
<strong>1998 &#8211;</strong> भारत ने राजस्थान के पोखरण में तीन परमाणु परीक्षण करने का ऐलान किया।<br />
<strong>2000 &#8211;</strong> जनसंख्या घड़ी के मुताबिक भारत की जनसंख्या एक अरब पहुंची।<br />
<strong>2007 &#8211;</strong> उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में बहुजन समाज पार्टी ने बहुमत हासिल किया और पार्टी नेता मायावती ने मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/rajasthan/ambulance-was-not-found-to-corona-patient-dead-body-deliver-to-crematorium-in-jhalawar/8047/">मुख्यमंत्री जी! इलाज के लिए एंबुलेंस तो छोड़ो अंतिम संस्कार के लिए शव वाहन तक नहीं मिल रहा&#8230;</a></span></strong></span></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>विश्व के इतिहास में आज का दिन</strong></span><br />
<strong>1752 &#8211;</strong> अमेरिका के फिलाडेल्फिया में अग्नि बीमा पालिसी की शुरुआत की गई।<br />
<strong>1833 &#8211;</strong> अमेरिका से क्यूबेक जा रहे जहाज लेडी ऑफ द लेक के हिमखंड से टकराकर अटलांटिक महासागर में डूबने से 215 लोगों की मौत।<br />
<strong>1924 –</strong> गॉटलीव डेमलर और कार्ल बेंज ने मिलकर मर्सिडीज बेंज कंपनी बनाई थी।<br />
<strong>1965 &#8211;</strong> बांग्लादेश में चक्रवाती तूफान में 17 हजार लोगों की मौत।<br />
<strong>1988 &#8211;</strong> फ्रांस ने परमाणु परीक्षण किया।<br />
<strong>1995 &#8211;</strong> अमेरिका के न्यूयार्क शहर में 170 से अधिक देशों ने परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए।<br />
<strong>1998 &#8211;</strong> यूरोप की एकल मुद्रा यूरो का पहला सिक्का बना।<br />
<strong>2008 &#8211;</strong> न्यूयार्क के कॉर्नेल विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने देश का पहला जेनेटिकली मोडिफाइड मानव भ्रूण तैयार किया।<br />
<strong>2013 &#8211;</strong> तुर्की के रेहानली क्षेत्र में कार बम धमाकों में 43 लोगों की मौत हुई।</p>
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