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	<title>teachers day Archives - TIS Media</title>
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	<description>हर अक्षर सच, हर खबर निष्पक्ष </description>
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	<title>teachers day Archives - TIS Media</title>
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		<title>शिक्षक दिवस पर एलन में एएसडब्ल्यूएस ने शिविर लगा कर किया 215 यूनिट रक्तदान</title>
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		<pubDate>Sun, 05 Sep 2021 16:37:47 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>TISMedia@Kota एलन कॅरियर इंस्टीट्यूट सामाजिक सरोकारों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता आ रहा है। रविवार को शिक्षक दिवस के मौके पर एलन स्टूडेंट्स वेलफेयर सोसायटी (एएसडब्ल्यूएस) की ओर से रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया। जिसमें 215 यूनिट रक्तदान हुआ। Watch Video: खुल गई कोचिंग मचल उठा कोटा&#8230; शिविर बारां रोड़ स्थित एलन सुपथ कैम्पस, लैंडमार्क &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/kota-coaching/teachers-of-allen-career-institute-donated-blood-on-the-occasion-of-teachers-day/10607/">शिक्षक दिवस पर एलन में एएसडब्ल्यूएस ने शिविर लगा कर किया 215 यूनिट रक्तदान</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<div><span style="color: #ff0000;"><strong>TISMedia@Kota</strong></span> एलन कॅरियर इंस्टीट्यूट सामाजिक सरोकारों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता आ रहा है। रविवार को शिक्षक दिवस के मौके पर एलन स्टूडेंट्स वेलफेयर सोसायटी (एएसडब्ल्यूएस) की ओर से रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया। जिसमें 215 यूनिट रक्तदान हुआ।</div>
<div></div>
<div><strong>Watch Video: <a href="https://youtu.be/eXd4qkWVJyA">खुल गई कोचिंग मचल उठा कोटा&#8230;</a></strong></div>
<div></div>
<div>शिविर बारां रोड़ स्थित एलन सुपथ कैम्पस, लैंडमार्क सिटी स्थित एलन सम्यक कैम्पस, जवाहर नगर स्थित एलन सत्यार्थ कैम्पस, राजीव गांधी नगर स्थित एलन समर्थ कैम्पस एवं बंसल टाॅवर स्थित रिलाॅयबल इंस्टीट्यूट में आयोजित किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्जवलन से की गई।</div>
<div></div>
<div><strong>Watch Video: <a href="https://youtu.be/uxVIFsmtAY8">कोटा तैयार है&#8230; </a></strong></div>
<div></div>
<div>एलन करियर इंस्टीट्यूट के निदेशक एवं एएसडब्ल्यूएस के संस्थापक अध्यक्ष नवीन माहेश्वरी ने भी रक्तदान कर फैकल्टीज व कर्मचारियों का उत्साहवर्द्धन किया। माहेश्वरी ने इस मौके पर कहा कि रक्तदान के लिए सभी को आगे आना चाहिए। आपका रक्त किसी को जीवनदान दे सकता है। एएसडब्ल्यूएस के अध्यक्ष मुकेश सारस्वत ने बताया कि शिविर कृष्णा रोटरी ब्लड बैंक के सहयोग से आयोजित किया गया। जिसमें फैकल्टीज एवं कर्मचारियों ने उत्साह के साथ रक्तदान किया। सारस्वत ने बताया कि शहर में डेंगू व अन्य मौसमी बीमारियां चल रही है। ऐसे में शहर में रक्त की कमी नहीं हो। जरूरत पर हर मरीज को सुविधा से रक्त उपलब्ध हो सके। इसी के तहत हर वर्ष एलन स्टूडेंट्स वेलफेयर सोसायटी द्वारा रक्तदान शिविर का आयोजन किया जाता है।</div>
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		<title>शिक्षक दिवसः शिक्षा, समाज और भावी पीढ़ियों का संसार यानि उम्मीदों का जहां और भी है&#8230;</title>
		<link>https://tismedia.in/editorial/article/teachers-day-special-article-by-vivek-kumar-mishra/10600/?utm_source=rss&#038;utm_medium=rss&#038;utm_campaign=teachers-day-special-article-by-vivek-kumar-mishra</link>
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		<pubDate>Sun, 05 Sep 2021 15:11:28 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>किसी भी समाज की प्रगति शिक्षा की संरचना पर निर्भर करती है &#8230;समाज के विकास को तब तक नहीं समझा जा सकता जब तक हम शिक्षा के ढ़ांचे को समझने की ईमानदार कोशिश नहीं करते । शिक्षा की प्राथमिकता सरकार की चिंता में होना ही चाहिए &#8230;यदि हम शिक्षा के ढ़ांचे को व्यवस्थित कर लेते &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
		<div class="box info  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span><span style="color: #ff0000;"><strong>आज यदि शिक्षा के क्षेत्र में कोई बड़ा काम करना है तो वह यह होगा कि बच्चों की कल्पना शक्ति को जागृत किया जाये &#8230;वह कुछ मौलिक सोचे &#8230;जो है उसमें बदलाव लाने की परिकल्पना करें । वस्तुनिष्ठ और बहुविकल्पीय प्रश्नों की जगह लिखित उत्तर और दिये गये विषय पर विचार प्रधान मौलिक आलेख से ही बच्चों के ज्ञान व कौशल को जांचा जाये।<span style="color: #000000;"> नए दौर की व्यवस्था में शिक्षा के लिए जगह तलाश रहे हैं&#8230; वरिष्ठ शिक्षक एवं लेखक विवेक कुमार मिश्र</span></strong></span> 
			</div>
		</div>
	
<p>किसी भी समाज की प्रगति शिक्षा की संरचना पर निर्भर करती है &#8230;समाज के विकास को तब तक नहीं समझा जा सकता जब तक हम शिक्षा के ढ़ांचे को समझने की ईमानदार कोशिश नहीं करते । शिक्षा की प्राथमिकता सरकार की चिंता में होना ही चाहिए &#8230;यदि हम शिक्षा के ढ़ांचे को व्यवस्थित कर लेते हैं तो स्वाभाविक है कि हम अपने आधारभूत ढ़ांचे का ही निर्माण कर रहे हैं । शिक्षा के समाज में किसी प्रकार की अव्यवस्था की गुंजाइश नहीं होती &#8230;जो भी शिक्षित व्यक्तित्व है , वह सहज होगा , उसमें उतावलापन नहीं होगा , भागम भाग और भ्रम की गुंजाइश नहीं होगी , न ही वह अपने आपको सबसे उपर मानता । उसके भीतर समान भाव का लोकतांत्रिक व्यक्तित्व होता है जो सबकी प्रतिष्ठा करता है । शिक्षा से जहां हम अपने अधिकारों के प्रति सजग होते वहीं अपने कर्तव्य को भी पूरा करने की कोशिश करते हैं ।</p>
<p>एक शिक्षित व्यक्ति से हम किसी भी अवांछित कार्य की उम्मीद नहीं करते &#8230;उससे यह आशा की जाती है कि समाज पर वह भार न बने वल्कि समाज के लिए उपयोगी हो । स्व की चिंता करने से पहले वह दूसरों के बारे में सोचे । एक शिक्षित व्यक्ति पूरी संरचना के लिए मूल्यवान होता है । उसका समाज में अपने ढ़ंग से दाय होता है वह कुछ गलत नहीं करता , उसका कार्य व्यवस्थित तरीकें से होता है । इतना ही नहीं वह जो करता उसमें एक जिम्मेदारी का भाव होता है । शिक्षित व्यक्ति से समाज उम्मीद करता है कि वह समाज की प्रगति के लिए काम करें । उसके क्रियाकलाप में जिम्मेदारी का भाव हो साथ ही जो कुछ वह करता है उसे सम्मान की नजर से देखा जाता है । एक शिक्षित व्यक्ति से समाज और राष्ट्र जिम्मेदार नागरिक के रूप में व्यवहार करता है । जहां तक व्यक्तित्व निर्माण की बात है तो घर से शुरू होकर स्कूल तक बात आती है&#8230;.यहीं पर जीवन का आधारभूत ढ़ांचा विकसित होता है । शिक्षा की पहली पाठशाला मां होती है &#8230;मां से होते हुए शिक्षा का संसार घर और पास &#8211; पड़ोस से होते हुए स्कूल तक।</p>
<p>स्कूल जाने से पहले बालक जो कुछ सीखता है उसमें माता &#8211; पिता की भूमिका और पड़ोस का संसार केन्द्र में होता है । यहां पालन &#8211; पोषण ही भावी संसार के जिम्मेदार नागरिक को रचने का काम करते हैं । परिवार के परिसर से होता हुआ बच्चा स्कूल की दुनिया में आता है जहां उसे अपने आस &#8211; पास से लेकर संसार का परिचय होता है । स्कूल की दुनिया बच्चे के लिए अजनबी न हो , स्कूल को वह अपना ही संंसार माने इसके लिए जरूरी है कि स्कूल आस &#8211; पास और पारिवारिक वातावरण की तरह हो तो बच्चों में सीखने &#8211; समझने की क्षमता कई गुना बढ़ जाती है । स्कूल का परिवेश शांत व सुसंस्कृत होना चाहिए । किसी तरह के डर का वातावरण नहीं होना चाहिए । एक बालक के भीतर बीज रूप में जो संस्कार , जो भाव यहां पड़ जाते हैं &#8230;.उसे वह पूरे जीवन धारण किये रहता है । बालक को यहां ऐसा वातावरण मिलना चाहिए कि वह निर्भय होकर अपनी बात रख सकें । उसे सुनने और समझने का अवसर मिलना चाहिए ।</p>
<p>स्कूल के परिवेश में एक तरह का रचनात्मक अवसर हो , रचनात्मक वातावरण हो , यहां वह अपनी मेधा से कुछ नया कर सकें , इस नयेपन में ही जीवन के पाठ छिपे होते हैं &#8230;यहां जो कुछ संस्कार रूप में पड़ जाता वह मिटता नहीं । यहां की शिक्षा अमिट होती है , इसीलिए स्कूल की शिक्षा और स्कूल के शिक्षक का&#8230;. व्यक्तित्व निर्माण में अमूल्य योग बनता है । इस रूप में शिक्षक की भूमिका न केवल उपयोगी वल्कि बहुत ज्यादा मूल्यवान हो जाती है कि वह क्या कुछ सीखा रहा है &#8230;यहां बालक जो सीखेगा उसी पर , पूरे जीवन के आगे के साल चलते हैं । यहीं से पीढ़ियों का निर्माण होता है । यहीं वह भूमि है जहांं व्यक्तित्व निर्माण का अधिकतम हिस्सा पूरा हो जाता है &#8230;चरित्र की पाठशाला घर से शुरु होकर स्कूल तक निर्मित होती है । चरित्र निर्माण का कार्य घर के परिवेश से शुरु होकर स्कूल तक चलता है । चरित्र का निर्माण बीज रूप में यहीं होता है । वैसे देखा जाय तो चरित्र विरासत के रूप में बच्चे को माता &#8211; पिता / पालक से मिलता है । किसी भी चरित्र के निर्माण में परिवार के रोल को अनदेखा नहीं किया जा सकता।</p>
<p>चरित्र एक तरह से हम सबकी पारिवारिक विरासत है । इस खण्ड में हम क्या कुछ करते हैं किस तरह से भावी पीढ़ियों का निर्माण करते हैं । यह देखने की बात है कि हमारा शिक्षातंत्र कितना सजग होकर भावी पीढ़ियों के निर्माण में आगे आता है । शिक्षा से व्यक्ति का जहां इकाई के रूप में निर्माण होता है वहीं वह सामाजिक निर्माण का भी काम करती है । जो समाज पढ़ &#8211; लिखकर आगे निकल गया वह अपने समाज के भीतर जहां चेतना का निर्माण करता है वहीं सामाजिक जड़ता को दूर कर समाज को आगे ले चलने में भी अपनी अग्रणी भूमिका निभाता है । एक तरह से शैैक्षिक जाागरण ही शिक्षा और समाज के केन्द्र में होता है । एक भावी और बेहतर समाज के लिए हमें भविष्योन्मुखी शिक्षा पर विचार करना चाहिए&#8230;.जो विकास के साथ &#8211; साथ व्यक्तित्व के ढ़ांचे पर भी विचार कर रही हो । इस तरह से जीवन का निर्माण कर रही हो कि वर्तमान के शिलाखंड पर बैठकर हम भविष्य के आसमान को देख सके और जीवन का सही दिशा में निर्माण कर सके । यहां बच्चों के साथ जो शिक्षक हैं उनकी भूमिका बहुत बढ़ जाती है &#8230;स्कूली बच्चों के कोरे मन पर जो चित्र खींचा जायेगा वह बहुत गहरा उतरेगा । यहीं से उनके व्यक्तित्व का निर्माण होता है।</p>
<p>व्यक्तित्व का जो सिरा बचपन में आकार ले लेता वह कभी अपनी जगह नहीं छोड़ता । बचपन की सीख , आदर्श और पारिवारिक संस्कार जो परिवार व स्कूल से मिलते हैं उन्हीं में भावी संसार का जीवन और भविष्य छिपा होता है । व्यक्तित्व का जो रूप सामने आता उसमें हमारा बचपन ही झांकता है &#8230;व्यक्तित्व का बहुत बड़ा हिस्सा अनगढ़ तौर पर बचपन में ही आकार ले लेता है । जो राष्ट्र अपने बचपन की कद्र करता है स्वाभाविक है कि वहीं अपने भविष्य का मजबूत निर्माण भी करता है । बच्चे की प्राथमिक शिक्षा का जहां तक सवाल है , वह घरेलू परिवेश और जमीनी सच्चाइयों के बीच होना चाहिए । शिक्षा मूलतः बच्चे की मातृभाषा में दी जानी चाहिए &#8230;.मातृभाषा को सीखने के लिए अलग से प्रयास करने की जरूरत नहीं पड़ती यह बालक के भीतर जन्म से ही घर के आसपास से होते हुए आ जाती है &#8230;.इस भाषा में न केवल वह अपने आपकों अभिव्यक्त करता है वल्कि कुशलतापूर्वक अपने को सामने लाता है । आज जो शिक्षा हम दे रहे हैं वह शिक्षित तो कर रही है , पर संस्कारी नहीं बना रही है , न ही वह व्यक्तित्व को रच रही है &#8211; आज बच्चे के पास सूचनाओं का भंडार है ,ज्ञान की अथाह सामग्री भरी पड़ी है पर उस ज्ञान के साथ हमारा व्यक्तित्व कितना निर्मित हो रहा है यह देखना भी जरूरी है । यदि व्यक्तित्व निर्मित नहीं हो रहा है तो शिक्षा किस काम की &#8230;फिर तो शिक्षा संस्थान डिग्री देने के केन्द्र भर रह जायेंगे । इन डिग्रियों का क्या मोल यदि वे हमारे व्यक्तित्व को रचने मेंआगे न आयें।</p>
<p>डिग्री का तभी कोई अर्थ बनता जब वह उस अनुरूप कार्य करें&#8230;.हमारा व्यक्तित्व डिग्री के अनुरूप चलें । जब समाज में यह कहा जाने लगे कि फलां व्यक्ति फलां स्कूल का है तब केवल स्कूल की प्रतिष्ठा नहीं होती वल्कि इस क्रम में उस व्यक्ति की प्रतिष्ठा होती है । परपंरा व परिवेश से काटकर बच्चे को एक कृत्रिम शिक्षा और जीवन से जोड़ते हुए हम उसे अपने आप से और परिवेश से अजनबी बना रहे हैं । इस क्रम में जो कुछ सामने होता वह शिक्षा का परिणाम न होकर बस जीवन को किसी तरह चलाने वाली व्यवस्था का नाम भर होता । यह बात बुनियादी तौर पर सही है कि बच्चा सबसे पहले अपनी मातृभाषा को सिखता है &#8230;रचनात्मकता व मौलिकता का विचार मातृभाषा में ही जन्म लेता है &#8230;इसे किसी भी अन्य भाषा या दूसरी भाषा से नहीं पाया जा सकता । बच्चों को जो भी सीखलाया जाय वह उन पर बोझ की तरह न हो वल्कि सहज हो &#8230;यह सहज ज्ञान ही जीवन का अंग बनता है । अपनी मातृभाषा में यदि हम ज्ञान को अर्जित करते हैं तो स्वाभाविक है कि जीवन की सही दिशा को तय तो करेंगे ही , इसी के साथ सही दिशा में हमारा ज्ञान राष्ट्र निर्माण में अग्रणी भूमिका निभायेगा ।</p>
<p>आज यदि शिक्षा के क्षेत्र में कोई बड़ा काम करना है तो वह यह होगा कि बच्चों की कल्पना शक्ति को जागृत किया जाये &#8230;वह कुछ मौलिक सोचे &#8230;जो है उसमें बदलाव लाने की परिकल्पना करें। वस्तुनिष्ठ और बहुविकल्पीय प्रश्नों की जगह लिखित उत्तर और दिये गये विषय पर विचार प्रधान मौलिक आलेख से ही बच्चों के ज्ञान व कौशल को जांचा जाये।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>लेखकः  विवेक कुमार मिश्र, शिक्षक ही नहीं समाज के सजग प्रहरी भी हैं। </strong></span></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/teachers-day-special-article-by-vivek-kumar-mishra/10600/">शिक्षक दिवसः शिक्षा, समाज और भावी पीढ़ियों का संसार यानि उम्मीदों का जहां और भी है&#8230;</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>शिक्षा की अलख जगा रही &#8220;रागिनी&#8221; की कहानी, जिसने अपने दम पर बदल डाली स्कूल की सूरत</title>
		<link>https://tismedia.in/editorial/article/motivational-story-on-teachers-day-written-by-senior-litterateur-and-journalist-ravi-sharma/10597/?utm_source=rss&#038;utm_medium=rss&#038;utm_campaign=motivational-story-on-teachers-day-written-by-senior-litterateur-and-journalist-ravi-sharma</link>
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		<pubDate>Sun, 05 Sep 2021 14:59:09 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>रागिनी का शिक्षामित्र के लिए चयन हुआ था। जिस गांव के बच्चों को शिक्षित करने का दायित्व उसे सौंपा गया था, वह एक पिछड़ा क्षेत्र था। यहां अभी तक शिक्षा का दीप प्रज्जवलित नहीं हुआ था, इसलिए इस गांव को लोग &#8216; पिछड़ा गांव &#8216; के रूप में जानते थे। यहां के लोगों का मुख्य &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/motivational-story-on-teachers-day-written-by-senior-litterateur-and-journalist-ravi-sharma/10597/">शिक्षा की अलख जगा रही &#8220;रागिनी&#8221; की कहानी, जिसने अपने दम पर बदल डाली स्कूल की सूरत</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<div class="box success  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span><span style="color: #ff0000;"><strong>शुरू-शुरू में तो रागिनी की यह बात किसी के गले नहीं उतरी और उन्होंने अपने बच्चों को स्कूल भेजने से साफ़-साफ़ इनकार कर दिया। गांव के बुजुर्गवार तो इस बात को ही मानने को तैयार नहीं थे कि खेतों में शौच जाने से बीमारी फैलती है। बल्कि उनका मानना था कि इससे खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। रागिनी के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया। फिर भी उसने हार नहीं मानी। <span style="color: #000000;">पढ़िए एक शिक्षिका रागिनी के संघर्षों की कहानी&#8230; रवि शर्मा की बयानी।</span></strong></span> 
			</div>
		</div>
	
<p>रागिनी का शिक्षामित्र के लिए चयन हुआ था। जिस गांव के बच्चों को शिक्षित करने का दायित्व उसे सौंपा गया था, वह एक पिछड़ा क्षेत्र था। यहां अभी तक शिक्षा का दीप प्रज्जवलित नहीं हुआ था, इसलिए इस गांव को लोग &#8216; पिछड़ा गांव &#8216; के रूप में जानते थे। यहां के लोगों का मुख्य पेशा गौ-पालन व खेतीबाड़ी था। यही कारण था कि यहां के लोग अपने बच्चों को पढ़ाने में कोई रुचि नहीं रखते थे।</p>
<p>पूरे क्षेत्र में एकमात्र प्राथमिक सरकारी स्कूल था। इसमें शिक्षक और हेड मास्टर के नाम पर एकमात्र शर्मा जी तैनात थे। बच्चों की संख्या शून्य थी, लेकिन हेड मास्टर साहब हमेशा अपने रजिस्टर में 10-12 बच्चों का नाम दर्ज रखते थे, ताकि उनकी रोजी-रोटी चलती रहे। इसी प्राथमिक विद्यालय में रागिनी की नियुक्ति हुई थी। रोज शहर से गांव आना-जाना संभव नहीं था, इसलिए रागिनी ने गांव को ही अपना ठौर बनाना उचित समझा। उसने इस संबंध में हेड मास्टर साहब से बात की तो उन्होंने स्कूल के बगल में ही एक साफ-सुथरा कमरा रागिनी को दिलवा दिया। रागिनी जब वहां पहुंची तो यह देखकर दंग रह गए कि कमरे के साथ शौचालय तो था ही नहीं। उसने हेड मास्टर साहब से बात की तो उन्होंने बड़े सहज भाव से कह दिया, अरे भई गांव की सभी महिलाएं पास के खेत में बड़े सबेरे जाती हैं, तुम भी चली जाना।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>यह बात रागिनी को बहुत नागवार गुजरी। उसने हेड मास्टर साहब को सीधे लफ्जों में धमकी दे दी कि यदि उसके लिए अलग से टॉयलेट नहीं बनवाया गया तो वह न केवल शहर लौट जाएगी, बल्कि शिक्षा अधिकारी से शिकायत कर उनके स्कूल की मान्यता भी समाप्त करा देगी। हेड मास्टर साहब बड़े पसोपेश में पड़ गए। आखिर उन्होंने मकान मालिक से अनुरोध कर आनन-फानन में घर से जुड़ा शौचालय और स्नानघर भी बनवा दिया। बेशक इसमें उन्हें कुछ पैसे खुद की जेब से भी खर्च करने पड़े। फिर क्या था, रागिनी खुशी-खुशी उस घर में रहने आ गई। अब उसके सामने समस्या यह थी कि स्कूल में बच्चे कैसे लाए जाएं ? तो रागिनी ने घर-घर जाकर लोगों को न केवल शिक्षा का महत्व समझाना शुरू किया, बल्कि उन्हें सफाई का महत्व भी समझा कर कहा कि सभी लोग अपने घर में शौचालय अवश्य बनवाएं, क्योंकि महिला-पुरुषों का खुले में शौच करना अमर्यादित होने के साथ-साथ घृणित भी है। यह एक प्रकार से महिलाओं की अस्मिता पर चोट है, वहीं इससे गंदगी फैलती है जो कि विभिन्न बीमारियों को जन्म देती है।</strong></span></p>
<p>शुरू-शुरू में तो रागिनी की यह बात किसी के गले नहीं उतरी और उन्होंने अपने बच्चों को स्कूल भेजने से साफ़-साफ़ इनकार कर दिया। गांव के बुजुर्गवार तो इस बात को ही मानने को तैयार नहीं थे कि खेतों में शौच जाने से बीमारी फैलती है। बल्कि उनका मानना था कि इससे खेतों की उर्वरा शक्ति बढ़ती है। रागिनी के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया। फिर भी उसने हार नहीं मानी। रागिनी ने सोचा कि यदि शहर से बुला कर कुछ लड़के-लड़कियों की एक टोली तैयार कर ली जाए तो निश्चित रूप से वे गांव वालों को इस बारे में समझा सकेंगे। इसी के साथ रागिनी ने गांव में मुनादी करा दी कि स्कूल में हर रोज बच्चों के लिए खेलों का आयोजन किया जाएगा और बीच-बीच में जादू भी दिखाया जाएगा। इसके लिए रागिनी ने शहर से अपने परिचित एक जादूगर और खेल क्लब के कुछ सदस्यों को गांव बुला लिया। फिर क्या था, जब बच्चों को पता लगा कि स्कूल में खेल खिलाए जाते हैं और जादू दिखाया जाता तो वे रोज स्कूल आने लगे। रागिनी ने भी बिना देर किए खेलों का समय निर्धारित कर दिया, ताकि बच्चे समय पर स्कूल आएं। इसी के साथ उसने अपने साथियों व जादूगर से कहा कि वह बच्चों को जादू के साथ-साथ अक्षर ज्ञान कराना भी शुरू कर दें। धीरे-धीरे स्कूल में लगभग 50 बच्चे आने लगे। उनका नाम रागिनी और हेड मास्टर साहब ने रजिस्टर में दर्ज कर लिया और रोज उनकी हाजिरी होने लगी।</p>
<p>अगले कदम के तौर पर रागिनी ने बच्चों के लिए मध्याह्न भोजन की व्यवस्था करानी चाही तो हेड मास्टर साहब ने हाथ खड़े कर दिए और कहा कि बजट ही नहीं है। साथ ही उन्होंने सुझाव दिया कि रागिनी चाहे तो शिक्षा अधिकारी को आमंत्रित कर बच्चों के लिए इसकी व्यवस्था भी करा सकती है। फिर क्या था, शहर जाकर रागिनी ने शिक्षा अधिकारी महोदय को स्कूल का निरीक्षण करने के लिए आमंत्रित कर लिया। जब अधिकारी महोदय स्कूल आए तो 50 बच्चों को देखकर चकित रह गए। सभी लोगों ने उन्हें बताया कि यह रागिनी के प्रयासों से ही संभव हो सका है। फिर दोपहर में बच्चों के अभिभावकों को भी स्कूल आमंत्रित किया गया था और उनके लिए भव्य भोजन की भी व्यवस्था की गई थी। इस दौरान शिक्षाधिकारी ने सभी अभिभावकों से आग्रह किया कि वे गांव के अन्य लोगों को भी अपने बच्चों को स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करें। उन्होंने अभिभावकों को बताया कि बच्चों के लिए दोपहर में मध्याह्न भोजन की भी व्यवस्था की जाएगी। उनके बच्चे पढ़-लिख कर अफसर बनेंगे। यह बात काफी हद तक गांव वालों को समझ आई और उन्होंने शिक्षा अधिकारी को आश्वासन दिया कि अगली बार जब वे स्कूल आएंगे तो बच्चों की संख्या सौ से भी ज्यादा होगी।</p>
<p>देखते-देखते एक साल बीत गया और गांव वालों के प्रयासों से स्कूल में भी बच्चों की संख्या सौ से अधिक जा पहुंची। रागिनी ने फिर एक बार शिक्षा अधिकारी महोदय को स्कूल आमंत्रित किया तो वो सौ से भी ज्यादा बच्चों की संख्या देख कर बहुत खुश हुए। उन्होंने तत्काल ही बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षकों की समस्या को देखते हुए खेल खिलाने वाले युवाओं को उनकी शैक्षिक योग्यता के अनुरूप शिक्षामित्र के रूप में नियुक्ति प्रदान कर दी। अब वे सब बच्चों को जी-जान से साक्षर करने में जुटे थे। शिक्षा अधिकारी ने रागिनी को भी शिक्षक के रूप में प्रमोट कर दिया। अब अन्य गांव वाले भी न केवल अपने बच्चों को स्कूल भेज रहे थे, बल्कि उन्होंने साफ-सफाई को ध्यान में रखते हुए घर में शौचालय बनवाने भी शुरू कर दिए थे। रागिनी के प्रयासों से गांव में शिक्षा की अलख जग चुकी थी।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong><span style="color: #000000;">लेखकः </span> रवि शर्मा, वरिष्ठ साहित्याकार हैं। पत्रकारिता के क्षेत्र में चार दशक से भी ज्यादा का अनुभव रहा है। बाल कहानियों के लिए उन्हें देश और दुनिया भर से कई सम्मान मिल चुके हैं। </strong></span></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/motivational-story-on-teachers-day-written-by-senior-litterateur-and-journalist-ravi-sharma/10597/">शिक्षा की अलख जगा रही &#8220;रागिनी&#8221; की कहानी, जिसने अपने दम पर बदल डाली स्कूल की सूरत</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>शिक्षक दिवस: शिक्षा के लिए चिन्तन का दिवस या नौकरी बचाने की कोशिशों का मर्सिया</title>
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		<pubDate>Sun, 05 Sep 2021 14:43:19 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>आज शिक्षक दिवस है&#124;अर्थात् अतीत के स्वच्छ आयने के सामने बैठ कर वर्तमान के शिक्षकों का स्तुति पाठ करने का दिन। शिक्षक में ब्रह्मा, विष्णु, शिव या परं ब्रह्म खोजने का दिन। आज के दिन शिक्षकों के नाम से जो स्तुति पाठ किया जाता है, तद्विषयक यदि मूल्यांकन करें तो बहुत हल्के चिन्तन से यह &#8230;</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span><span style="color: #ff0000;"><strong>आज शिक्षक शिक्षा के लिए नहीं अपितु बहुत मुश्किल से प्राप्त हुयी नौकरी को जैसे जैसे बचाने के लिए चिन्तित है। इसीलिए कागजों पर पैन घिसटती हुयी अथवा शिक्षा को छोड़कर शेष सभी ऊल जलूल उद्देश्यों के लिए दिनभर कम्प्यूटर पर घिसती हुयी उंगलियाँ यह बखूबी जानती हैं कि उसके लिए शिक्षक होना कितना चुनौतीपूर्ण है।  करे भी क्या वर्षों तक कोचिंग कर के यौवन के अन्तिम छोर पर जैसे जैसे यह नौकरी मिली है| अब उसे बचाना पहली प्राथमिकता है, वह भी घर के एकदम पास में | इस जरुरी ध्येय के लिए स्थानांतरण को बचाने के लिए हजारों बार भी सत्ता के दरबारों की चौखट चूमनी पड़े तो भी निर्लज्जता कैसी? </strong><span style="color: #000000;"><strong>शिक्षकों के संघर्ष को बयां करता आचार्य डॉ. गीताराम शर्मा का ज्वलंत लेख, आप भी पढ़िए&#8230;</strong></span></span><span style="color: #000000;">।</span> 
			</div>
		</div>
	
<p>आज शिक्षक दिवस है|अर्थात् अतीत के स्वच्छ आयने के सामने बैठ कर वर्तमान के शिक्षकों का स्तुति पाठ करने का दिन। शिक्षक में ब्रह्मा, विष्णु, शिव या परं ब्रह्म खोजने का दिन। आज के दिन शिक्षकों के नाम से जो स्तुति पाठ किया जाता है, तद्विषयक यदि मूल्यांकन करें तो बहुत हल्के चिन्तन से यह समझ आ जायेगा कि शिक्षक के जिस विराट स्वरुप का हमें स्मरण कराया जा रहा है उसकी वास्तविक प्रतिछवि कहीं कहीं दूर तक समाज में दिखायी नहीं देती है। न शिक्षक को अपने उदात्त ऐतिहासिक स्वरुप के स्मरण और संरक्षण की चिन्ता है, न शिक्षक के लिए समाज प्रतिबद्ध है और न नियामक सत्ताएं शिक्षा जैसे पवित्र कर्तव्य एवं उसके पहरुए शिक्षक के प्रति श्रद्धावनत हैं।</p>
<p>आज शिक्षक शिक्षा के लिए नहीं अपितु बहुत मुश्किल से प्राप्त हुयी नौकरी को जैसे जैसे बचाने के लिए चिन्तित है। इसीलिए कागजों पर पैन घिसटती हुयी अथवा शिक्षा को छोड़कर शेष सभी ऊल जलूल उद्देश्यों के लिए दिनभर कम्प्यूटर पर घिसती हुयी उंगलियाँ यह बखूबी जानती हैं कि उसके लिए शिक्षक होना कितना चुनौतीपूर्ण है।  करे भी क्या वर्षों तक कोचिंग कर के यौवन के अन्तिम छोर पर जैसे जैसे यह नौकरी मिली है| अब उसे बचाना पहली प्राथमिकता है, वह भी घर के एकदम पास में | इस जरुरी ध्येय के लिए स्थानांतरण को बचाने के लिए हजारों बार भी सत्ता के दरबारों की चौखट चूमनी पड़े तो भी निर्लज्जता कैसी?</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>आखिर आज के शिक्षक को यह व्यवसाय सम्मान पूर्वक या सम्मान के लिए प्राप्त नहीं हुआ है अपितु अनेक भोगाकांक्षाओं और सपनों के लिए अपनी पसीना बहाकर मिला है। फिर जिस समाज की चिन्ताओं में शिक्षक की चिन्ता करना प्राथमिकता होती थी, वह अब मृग मरीचिका ही है। कुछ विशिष्ट तपस्वी और साधक शिक्षकों को छोड़कर समाज की सामान्य सोच में शिक्षक ही सबसे नकारा और फ़िजूल व्यक्ति है। प्रशासनिक तन्त्र भी शिक्षकों को शिक्षा के अलावा हर उच्च और तुच्छ कार्य के लिए उपयुक्त मानता है। ऐसी विशुद्ध विषम स्थितियों में राष्ट्र के लिए शिक्षा , शिक्षा के लिए शिक्षक और शिक्षक के लिए समाज की त्रिपथगा पवित्र विचार गंगा वर्तमान में शुष्क प्राय: है। इसलिए शिक्षक दिवस पर शिक्षकों की गरिमा का बखान कागज की खेती अथवा वाग्विलास मात्र ही लगता है। </strong></span></p>
<p>इन तमाम अन्धेरों के बाबजूद यह दिन अध्यवसायी और शिक्षा के लिए समर्पित शिक्षकों के लिए रोशनी की एक किरण लेकर आता है।  शिक्षकों के लिए आत्मालोचन और उज्जवल अतीत के सहारे अपनी छवि और शिक्षा की चिन्ता का चिन्तन मनन करने का दिन है शिक्षक दिवस। भले ही वर्तमान समय का सच यह है कि आज शिक्षा में भी समय के प्रभाव से अध्यवसाय पिछड़ गया है और व्यवसाय हावी है । जिस शिक्षक को विद्या और विद्यार्थी के प्रति बफ़ादार होना चाहिए वह अब व्यवसाय के प्रति बफ़ादार हो चला है। इसलिए विद्यार्थी और शिक्षक के बीच पूंजी और व्यवसायिकता व्यवहार बन कर खड़ी हो गयी हैं। तेजस्विनावधीतमस्तु का जाना पहचाना सांस्कृतिक शंखनाद कुछ मन्दिम हो चला है। लेकिन जैसा कि मैंने कहा कि यह केवल समय का सच है,जो शाश्वत सच को थोड़ा अभिभूत ही कर सकता है,अपास्त नहीं कर सकता ।</p>
<p>मैं तेजस्वी बनूं ,तुम तेजस्वी बनो और दोनों मिलकर समाज को तेजस्वी बनाएं,इस भाव को समय की कोई क्रूरता भी छीन नहीं सकती क्योंकि यह शाश्वत है| अपने राष्ट्र की पूंजी महान गुरु शिष्य परम्परा का पुन: पुन: स्मरण और मूल्यों की पुन: पुन: पुरश्चर्या के लिए प्रेरित करना प्रत्येक शिक्षक का अनिवार्य कर्तव्य है।जिन महान शिक्षक डॉ राधा कृष्णनन् के जन्मदिन के संदर्भ से शिक्षक दिवस मनाया जाता है उन्होंने शिक्षक के विषय में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा है की शिक्षक वह नहीं जो पुस्तकीय ज्ञान को विद्यार्थी के मस्तिष्क में भर दे अपितु सच्चा शिक्षक वह है जो विद्यार्थी को भविष्य की चुनौतियां का सामना करने की सामर्थ्य प्रदान करें। यह काम कोई शिक्षक तब कर सकता है जब अतीत के निर्मल दर्पण के सामने बैठ कर वर्तमान की व्यवस्था में रहते हुए भविष्य के लिए रास्ते बनाने में विद्यार्थी की मदद करे।किन्तु यहां बड़ा विरोधाभास है।अतीत में शिक्षा के लिए तय किये हुए मूल्यों की संगति वर्तमान की व्यवस्था से नहीं बैठती इसलिए भविष्य की कोई स्पष्ट दशा नजर नहीं आती।</p>
<p>अतीत के मूल्य कहते हैं शिक्षा मुक्ति के लिए है ,आनन्द के लिए है ।आनन्द का मार्ग प्रेम,ममता,समता,करुणा,निर्लोभ सत्य, स्नेह से होकर गुजरता है लेकिन वर्तमान व्यवस्था संघर्ष सिखाती है , प्रतिस्पर्धा सिखाती है।नौकरी पाने का संघर्ष धन कमाने की प्रतिस्पर्धा वर्तमान के शैक्षिक ध्येय हैं।हर अभिभावक बच्चे को यही सिखाते रहा है कि कम्पटीशन ही तेरी नियति है , उसमें पिछड़ा तो कोई नहीं पूछने वाला ,बताओ जीवन की ऐसी विभीषिका से भविष्य के प्रति आशंकित विद्यार्थी अपने साथी विद्यार्थियों से प्रेम करेगा कैसे ?प्रेम का सूत्र ही&#8221; मैं नहीं तुम है&#8221; जबकि कम्पटीशन &#8221; तू नहीं मैं &#8221; भाव से होता है।एक नौकरी के लिए सौ लाइन में हैं तो वे प्रेम कर सकते हैं क्या ?</p>
<p>प्रतिस्पर्धा तो ईर्ष्या सिखाती है,लोभ सिखाती है,ऐसी प्रतिस्पर्धा से प्राप्त नौकरी या तथाकथित सफलता अहंकार देती है,तथा इन के सहारे निर्मित भविष्य अंधकारमय हो जाता है।इस प्रकार अतीत -वर्तमान-तथा भविष्य के बीच इन बिखरे टूटे तारों को जोड़ना शिक्षक की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। सामर्थ्यवान शिक्षक यह कर सकता है।वह अपने विद्यार्थियों में यह भाव भरे कि प्रतिस्पर्धा वर्तमान की मांग है इसलिए उससे मुख नहीं मोड़ सकते लेकिन दिशा बदल सकते हैं । प्रतियोगिता हो तो सही किन्तु औरों से नहीं स्वयं से।स्वयं की क्षमताओं से,स्वयं की पूर्णता को बाहर लाकर स्वयं के लिए रास्ता खोजना है।इस रास्ते में शत्रु कोई नहीं स्वस्थ प्रतिस्पर्धा है।अपने को शत-प्रतिशत लक्ष्योन्मुखी करना है,नियति मदद करेगी।यह स्वस्थ प्रतिस्पर्धा विद्यार्थी की होती हुई क्षमताओं को जगायेगी, आत्मविश्वास पैदा करेगी।पंचकोणीय व्यक्तित्व का विकास करेगी।यानी स्वामी विवेकानंद द्वारा अनुमोदित शैक्षिक मार्ग का पोषण करेगी । संस्कृत में एक श्लोक है कि &#8211;<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">उद्योगिनं पुरुष सिंहमुपैति लक्ष्मी।</span></strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000;">दैवेन देयमिति का पुरुषा वदन्ति।</span></strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000;">दैवंनिहत्यकुरुपौरुषमात्मशक्त्या।</span></strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000;">यत्नेकृतेपि न सिद्धयति कोSत्र दोष:।</span></strong><br />
इस भावार्थ सामान्यतः: ये किया जाता है कि भाग्य की परवाह किए बिना पूरे परिश्रम से भी यदि सफलता नहीं मिलती है तो मेरा कोई दोष नहीं,जबकि होना यह चाहिए कि यदि मेहनत करने पर भी सफलता नहीं मिलती है तो कोई न कोई दोष रह गया।उसे दूर करना है।यह भाव शिक्षक ही भर सकता कभी नहीं हारने का भाव,मेहनत पर विश्वास करने का भाव,शिक्षा की साधना का भाव पुस्तकों या कोचिंग के ट्यूटर के वश में नहीं। व्यावसायिकता विद्यार्थी का हृदय नहीं जेब देखती है।हृदय देखने का काम शिक्षक का अध्यवसाय ही कर सकता है। <span style="color: #ff0000;"><strong>पूर्णता का प्रकाशन योगी शिक्षक के ही वश का है भोगी ट्यूटर या टीचर का नहीं।</strong> </span>इसलिए अतीत शिक्षक को ही साक्षात् ब्रह्म यानी आनन्द के पर्याय के रुप में पूजता रहा है। सभी शिक्षक शिक्षा की आनन्दमार्गी यात्रा में पूरे मनोयोग से समर्पित हो कर शिक्षा जैसे सांस्कृतिक सरोकार के लिए अपने को सोंपकर कृतकृत्य हो जायं,बस यही शुभकामना। सभी शिक्षक साथियों के योग क्षेम की प्रभु से प्रार्थना।अस्तु||</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>‌ लेखकः डॉ गीता राम शर्मा, सह आचार्य संस्कृत, एस. बी पी.राजकीय महाविद्यालय डूंगरपुर</strong></span></p>
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		<title>कहीं हम भूल तो नहीं गए एक शिक्षक की मर्यादाएं और जिम्मेदारियांः डॉ. सुषमा तलेसरा</title>
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		<pubDate>Sun, 05 Sep 2021 14:22:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>यह गौरवान्वित करने वाली अनुभूति है कि शिक्षक का पद इतना सम्माननीय है कि पूरा देश शिक्षक दिवस के रूप में आयोजित करता है। डॉक्टर, इंजीनियर, वकील आदि सभी शिक्षकों के हाथों मढ़े जाते हैं। यह सर्वविदित है कि पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉक्टर राधाकृष्णन के जन्मदिवस 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>यह गौरवान्वित करने वाली अनुभूति है कि शिक्षक का पद इतना सम्माननीय है कि पूरा देश शिक्षक दिवस के रूप में आयोजित करता है। डॉक्टर, इंजीनियर, वकील आदि सभी शिक्षकों के हाथों मढ़े जाते हैं। यह सर्वविदित है कि पूर्व राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉक्टर राधाकृष्णन के जन्मदिवस 5 सितंबर को शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। जब राधाकृष्णन राष्ट्रपति बने तो उनके छात्रों ने उनका जन्मदिन मनाने की अनुमति मांगी, इस पर राधाकृष्णन ने कहा कि यदि मेरा जन्मदिन मनाना ही है तो शिक्षक दिवस के रुप में मनाया जाए ,तब से आज तक प्रतिवर्ष 5 सितंबर को यह दिन शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता रहा है। भिन्न-भिन्न संस्थाओं में इसे भिन्न-भिन्न तरीके से आयोजित किया जाता है। कई संस्थाओं में छात्र स्वयं एक दिन के लिए शिक्षक बनते हैं और उन शिक्षकों की शैली अपनाने का प्रयास करते हैं, कुछ संस्थाओं में छात्र अपने आदर्श अध्यापक के बारे में विचार प्रस्तुत करते हैं, कुछ जगह छात्र अपने शिक्षकों को तिलक लगाकर अभिवादन करते हैं।</p>
<p>एक शिक्षक के रूप में शिक्षक के कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी है, वह छात्रों के व्यक्तित्व का निर्माता है अतः एक शिक्षक का व्यवहार बेहद संतुलित तथा मर्यादा पूर्ण होना अपेक्षित है। छात्र शिक्षक द्वारा प्रेषित विषय वस्तु के साथ उसके मूल्य, आचार, विचार उसकी शैली सब कुछ अपनाते हैं।कई बार बच्चे माता-पिता से भी ज्यादा शिक्षक को विश्वसनीय मानते हैं अतः शिक्षक अच्छा ज्ञाता होना चाहिए, उसमें निरंतर पढ़ने की आदत होनी चाहिए। शिक्षक का दर्जा ज्ञान संप्रेषित करने वाले से कहीं ऊपर है। शिक्षक छात्रों के चरित्र का निर्माता तथा सर्वांगीण विकास का वाहक होता है। उसके व्यक्तित्व गुण व मूल्य उच्च कोटि के होने चाहिए। शिक्षक के व्यक्तित्व में नैतिक मूल्यों की कमी छात्रों के मन पर गहरा नकारात्मक प्रभाव डालती है। शिक्षक शिक्षार्थी के बीच एक मनोवैज्ञानिक बंध होता है,शिक्षक की नकारात्मक छवि इस बंध को कमजोर बना देती है तथा शिक्षार्थी के मन में शिक्षक के प्रति भरोसा खत्म सा हो जाता है।</p>
<p>शिक्षक दिवस पर शिक्षक सम्मान छात्रों द्वारा स्वर प्रेरित होना चाहिए ।सम्मान औपचारिक या किसी स्वार्थ से परे दिल की गहराई से निकला हुआ होना चाहिए ।यह तभी संभव है जब शिक्षक हर एक छात्र के व्यक्तित्व का सम्मान करें , प्रत्येक विद्यार्थी के विकास व उन्नति के प्रति संवेदनशील हो,धीरे सीखने वाले बच्चे के प्रति धैर्यवान हो उन्हें सिखाना भी अपना धर्म महसूस करे। जो शिक्षक बच्चों को निरंतर प्रेरित करता है ,कभी मुस्कुरा कर तो कभी कंधे पर हाथ रखकर,ऐसे शिक्षकों को छात्र सदैव याद रखते हैं। बच्चे को सही आकार देने में प्रेरणा एक सशक्त माध्यम है। दण्ड व प्रताड़ना के हथियार को अन्तिम विकल्प के रूप में रखना चाहिए।</p>
<p>कुछ ऐसे भी शिक्षक होते हैं जो अपने प्रत्येक विद्यार्थी यहां तक कि उनके परिवार की जानकारी भी रखते हैं ,उनकी समस्याओं के प्रति संवेदनशील होते हैं। निश्चित ही शिक्षार्थी भी ऐसे शिक्षक से हृदय की गहराई तक जुड़ जाते हैैं। विद्यार्थी जिन शिक्षकों को पसंद करते हैं, उन शिक्षकों द्वारा पढ़ाए जाने वाले विषय को भी छात्र पसंद करते हैं। यदि शिक्षक द्वारा किसी कारण से छात्र को अपमानित कर दिया गया, ऐसे में छात्र शिक्षक द्वारा पढ़ाए जाने वाले विषय से भी दूरी बनाने लगते हैं। शिक्षक का व्यवहार सभी छात्रों के साथ समान होना चाहिए। अतः शिक्षक का व्यक्तित्व व व्यवहार संतुलित व मर्यादा पूर्ण होना आवश्यक है। शिक्षक शिक्षार्थी संबंध महत्वपूर्ण है, हर कदम छात्रों के लिए अनुकरणीय होना चाहिए ।शिक्षक सम्मान दिल की गहराइयों से निकला हुआ होना चाहिए तभी शिक्षक दिवस का औचित्य है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>&#8221; भारत का भविष्य उसकी कक्षाओं में आकार लेता है&#8221; । डॉ डी एस कोठारी का यह उद्धरण आज भी प्रासंगिक है।</strong></span><br />
<strong>लेखकः डॉ. सुषमा तलेसरा, शिक्षाविद</strong></p>
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