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	<title>The Emergency Archives - TIS Media</title>
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	<description>हर अक्षर सच, हर खबर निष्पक्ष </description>
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	<title>The Emergency Archives - TIS Media</title>
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		<title>प्रेस पर प्रेशर कितना ? तब और अब!</title>
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		<pubDate>Tue, 29 Jun 2021 11:45:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>मसलन आपातकाल जैसी लोमहर्षक वारदातें यदि आज होतीं, तो वर्तमान मीडिया क्या सत्तावानों के, पुलिसवालों के, राजनेताओं के, समाज के कर्णधारों के परखमें और पुर्जें नहीं उड़ा देते? अत्याचारियों की धज्जियां ढूंढे नहीं मिलती। तो इन पुराने हैवानी हादसों पर गौर करें। दो घटनाओं का उल्लेख करें। आपातकाल में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. रघुवंश &#8230;</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>कई दफा सुना। बहुत बार पढ़ा भी। अब मितली सी होने लगती है। वितृष्णा और जुगुप्सा भी। कथित जनवादी, प्रगतिशालि, अर्थात वामपंथी और सोनिया—कांग्रेसी दोहराते रहते है, चीखते भी हैं कि आज आपातकाल से भी बदतर स्थिति हो गयी है। अत: तार्किक होगा कि खूंखार टीवी एंकर, खोजी खबरिये और जुझारु—मीडियाकर्मियों की तब (25 जून 1975 से 21 मार्च 1977) और आज की कार्यशैली की तनिक तुलना करें।
			</div>
		</div>
	
<p>मसलन आपातकाल जैसी लोमहर्षक वारदातें यदि आज होतीं, तो वर्तमान मीडिया क्या सत्तावानों के, पुलिसवालों के, राजनेताओं के, समाज के कर्णधारों के परखमें और पुर्जें नहीं उड़ा देते? अत्याचारियों की धज्जियां ढूंढे नहीं मिलती। तो इन पुराने हैवानी हादसों पर गौर करें। दो घटनाओं का उल्लेख करें। आपातकाल में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. रघुवंश को नजरबंद कर जेल में सड़ाया गया। उनपर इल्जाम लगा था कि वे खंभे पर चढ़कर संचार के तार काट रहे थे। डॉ. रघुवंश जन्मजात लुंज थे। वे बाल्यावस्था से ही अपने पैरों की उंगलियों के बल लिखा करते थे। कालीकट (केरल) के इंजीनियरिंग के छात्र वी. राजन को नक्सलवादी कहकर कैद किया गया था। टांगों को लोहे की चादर से कुचला गया। वह मर गया। पुलिस ने इस हरकत से साफ इनकार कर दिया था। मगर न्यायालय ने सच्चाई ढूंढ ही ली। मुख्यमंत्री के. करुणाकरण को त्यागपत्र देना ही पड़ा।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE:<span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/india/contribution-of-indian-legend-journalists-gyan-sagar-verma-and-viren-dangwal-in-emergency/9398/"> ज्ञान सागर वर्माः देश का इकलौता पत्रकार जिसने इंटेलीजेंस की आंखों में धूल झोंककर छापी थी सरकार के खिलाफ खबर</a></span></strong></span></p>
<p>मध्य प्रदेश की एक पुलिस हिरासत में मां और बेटे को विवस्त्र करके साथ सुलाया गया था। सत्तारुढ मां—बेटे (संजय गांधी) इस पर मौन रहे। भारत के प्रधान न्यायाधीश जेसी शाह के न्यायिक आयोग ने इन वारदातों के विवरण को सार्वजनिक कर दिया था। अखबारों की बिजली काटकर 26 जून 1975 को दैनिक ही नहीं छपने दिये गये थे। ढेर सारे ऐसे हादसे हुये थे। जैसे खेतों में ही किसानों की नसबंदी करा दी। जनसंख्या नियंत्रण का अभियान था। मुसलमानों, खासकर जामा मस्जिद और तुर्कमानगेट पर जो पुलिस ने किया, वह तो जघन्य था। तात्पर्य यह है कि इतना नृशंस, क्रूरतम और अमानविक जुल्म तब ढाया गया था। क्या आज के भारत में ऐसी घटनायें संभव हैं? कहीं जिक्र होता भी हैं? अगर कहीं किसी सिरफिरे पुलिसवाले अथवा राजमद में सत्तासीन व्यक्ति ने ऐसा करे भी तो वह क्या बच पायेगा? मुक्त टीवी बहस में उसकी बधिया उखाड़ दी जायेगी। बोटी—बोटी हो जायेगी। तो फिर क्या औचित्य है यह चिल्लपों करने का कि इन्दिरा गांधी वाली इमर्जेंसी अब मोदी राज में वापस लौट आयी है। विचारणीय बात यह है कि ऐसी बेतुकी बातें वे करते है जो एमर्जेंसी के समय या बाद में जन्मे हैं। राहुल गांधी और उनकी भगिनी प्रियंका वाड्रा तीन और चार साल के शिशु थे जब उनकी दादी तानाशाह बन बैठीं थीं।</p>
<p>वस्तुस्थिति यह है कि आज तक आपातकाल के अपराधियों ने न तो कोई दण्ड भुगता, न उनलोगों ने कभी यातना देखी। अत: दिमागी बेईमानी होगी यह कहना कि आपातकाल जैसी स्थिति आज भी है। जन अदालत का फैसला 1977 में देखा गया। रायबरेली की जनता द्वारा प्रधानमंत्री के चुनाव पर दिये गये जनादेश को याद करें।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE:<span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/state/uttar-pradesh/virendra-atal-was-brutally-tortured-by-the-police-during-the-emergency/9382/"> आपातकाल, यातनाएं और अटल: पुलिस ने प्लास से खींच लिए थे सारे नाखून, हिल गई थी पूरी दुनिया</a></span></strong></span></p>
<p>मीडिया का हाल उस वक्त कैसा था? लालकृष्ण आडवाणी (मोरारजी काबीना के सूचना एवं प्रसारण मंत्री) ने बेहतरीन बात कही पत्रकारों से : &#8221;इंदिरा गांधी ने तो आप लोगों से झुकने के लिये कहा था और आज लोग लगे रेंगने!&#8221; क्या वर्तमान युग में ऐसा मुमकिन है? हुजुम है आज जांबाज पत्रकारों का जो पलटवार करेंगे, झुकने की तो बात है ही नहीं। आज सेंसरशिप कोई सरकार लगा सकती है? तत्काल उसे तोड़ा जायेगा। हां, जिन मीडिया मालिकों का व्यवसायिक हित है वे जरुर उसके संवाददाताओं को धमकायेंगे, परेशान करेंगे। खबर दबायेंगे।</p>
<p>स्वयं अपना उदाहरण 1976 का पेश करुं । प्रतिरोध की आवाज इर्मेंजेंसी (1975-77) में पूरी तरह कानून कुचल दिया गया था। मीडिया सरकारी माध्यम मात्र बन गया था। अधिनायकवाद के विरोधी जेलों में ठूंस दिये गये थे। समूचा भारत गूंगा बना दिया गया था। न्यायतंत्र नंपुसक बना डाला गया था। हालांकि उसके कान और आँख ठीक थे। उस दौर में हम पच्चीस सामान्य भारतीयों ने देश के इतिहास में सबसे जालिम, खूंखार और मेधाहीन तानाशाही का सक्रिय विरोध करने की छोटी सी कोशिश की थी। पुलिस ने इसे &#8221;बड़ौदा डायनामाइट षडयंत्र&#8221; का नाम दिया था। सजा थी फांसी। तब मैं बड़ौदा में &#8221;टाइम्स आफ इन्डिया&#8221; का संवाददाता था। मेरा आवास हमारी भूमिगत प्रतिरोधात्मक गतिविधियों का केन्द्र था। हम सब की गिरफ्तारी के बाद कुछ लोग समझे थे कि बगावत की एक और कोशिश नाकाम हो गई थी। पर ऐसा हुआ नहीं था।</p>
<p>रायबरेली के वोटरों ने हमारा मकसद पूरा किया। तब तानाशाह पहले कोर्ट (इलाहाबाद) से, फिर वोट (रायबरेली, 20 मार्च 1977) से हारीं। हम सब रिहा हो गये। भारत दुबारा आज़ाद हुआ। अब वैसी (25 जून 1975) तानाशाही फिर कभी नहीं लौटेगी। मगर आजादी किसी की कभी बरकरार नहीं रहती है, सिवाय उनके जो सचेत रहते हैं। मेरे लिये यह आवश्यक है, स्वाभाविक भी, क्योंकि मेहनतकश पत्रकार के नाते समतामूलक समाज का सृजन मेरा भी सपना है। इसीलिए हर जगह प्रतिरोध की लौ हम जलाना चाहते हैं। जनवादी संघर्ष का अलख हम जगाना चाहते हैं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE:<span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-journalism-in-this-era-what-is-journalism-how-it-is-now-a-days/9128/"> मुमकिन, माना मीडिया ने! नामुमकिन कर डाला योगीजी ने !!</a></span></strong></span></p>
<p>उसी दौर का वृतांत है। बड़ौदा जेल में गुजरात के डीजी (पुलिस) पीएन राइटर मुझसे जिरह करने आये। उनका प्रश्न था : &#8221;जब समूचे भारत के पत्रकार पटरी पर आ गये थे, तो आप (दो संतानों के पिता) को क्या सूझी थी कि इंदिरा गांधी के विरोध में बगावत का परचम लहराये?&#8221; मेरा उत्तर सामान्य था। वे भी &#8221;टाइम्स आफ इंडिया&#8221; के पाठक थे। मैंने पूछा : &#8221; डीजीपी साहब, 25 जून 1975, प्रेस सेंसरशिप लगाये जाने के पूर्व &#8221;टाइम्स&#8221; पढ़ने में कितना समय लगाते थे? वे बोले : &#8221; सोलह पृष्ठ पढ़ने में करीब बीस—बाईस मिनट लगते थे।&#8221; मेरा अगला प्रश्न था : &#8221;जून 25 के बाद, जब सेंसरशिप लागू हो गयी थी, तब?&#8221; उनका जवाब था : &#8221;अब करीब दस मिनट।&#8221; मैं बोला : &#8221;साहब! आपके दस मिनट वापस लाने के लिये मैं जेल में आया हूं।&#8221; बस मेरा पुलिसिया इंटरोगेशन खत्म हो गया। क्या आज कहीं पत्रकारिता में ऐसी स्थिति की लेशमात्र भी आशंका है? संभव भी हो सकती है? यर्थार्थवादी दृष्टि अपनाये। नयी पीढ़ी के, खासकर युवा श्रमजीवी पत्रकार कायर नहीं हैं। बस यही सम्यक टिप्पणी है: इंदिरा शासन के दौर की मीडिया पर और आज के टीवी—अखबारों पर। निरंकुशता के सोपान पर इंदिरा गांधी से नरेन्द्र मोदी बहुत निचले पायदान पर हैं।</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>(<span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://tismedia.in/">TIS Media</a></span> परिवार के संरक्षक<span style="color: #ff0000;"> <a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के. विक्रम राव</a> </span>का शुमार देश के नामचीन पत्रकारों में होता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उन्होंने इमरजेंसी तक में स्वतंत्र आवाज के लिए जेल यात्रा की। महीनों की सजाएं भुगती। श्री राव,  वॉयस ऑफ अमेरिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनोमिक टाइम्स, फिल्मफेयर और इलस्ट्रेटेड वीकली में प्रमुख पदों पर रहने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड के संस्थापक संपादक भी रह चुके हैं। प्रेस की नियामक संस्था &#8216;भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य रहने के अलावा मजीठिया वेतन बोर्ड और मणिसाना वेतन बोर्ड के सदस्य के तौर पर पत्रकारों के हित में लंबा संघर्ष किया है। <span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के.विक्रम राव</a>,</span> फिलहाल इंडियन फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट <span style="color: #ff0000;">#IFWJ</span> के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)</strong></span></p>
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		<title>25 जून: भारत के इतिहास में काला दिन, जब आपातकाल की घोषणा की</title>
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		<pubDate>Fri, 25 Jun 2021 05:22:20 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>TISMedia@कोटा. 25 जून&#8230; आज ही के दिन मुगल शासक बाबर बंगाल पर विजय प्राप्त कर आगरा लौटा&#8230; आज के दिन 1931 में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह का उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में जन्म हुआ&#8230; आज ही के इतिहास में दर्ज है भारतीय क्रिकेट टीम का ब्रिटेन के लॉर्ड्स मैदान पर अपना पहला &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color: #ff0000;">TISMedia@कोटा.</span> 25 जून&#8230;</strong> आज ही के दिन मुगल शासक बाबर बंगाल पर विजय प्राप्त कर आगरा लौटा&#8230; आज के दिन 1931 में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह का उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में जन्म हुआ&#8230; आज ही के इतिहास में दर्ज है भारतीय क्रिकेट टीम का ब्रिटेन के लॉर्ड्स मैदान पर अपना पहला टेस्ट मैच&#8230; आज ही के दिन जन्म हुआ बॉलीवुड अभिनेत्री करिश्मा कपूर का&#8230; आज ही का था दिन जब इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने देश में आपातकाल लगाने की घोषणा की&#8230; आज ही के दिन भारत ने वेस्टइंडीज को 43 रनों से हरा कर पहली बार क्रिकेट विश्व कप का खिताब जीता&#8230; और आज ही के दिन भारतीय खिलाड़ी श्रीकान्त किदाम्बी ने ऑस्ट्रेलिया ओपन सुपर सीरीज खिताब जीता&#8230;</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>आपातकाल की घोषणा का दिन</strong></span><br />
भारत के इतिहास में 25 जून एक काले दिन के तौर पर दर्ज है। 1975 में आज ही के दिन इंदिरा गांधी की सरकार की सिफारिश पर तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने आपातकाल की घोषणा की। जिसने कई ऐतिहासिक घटनाओं को जन्म दिया। आपातकाल लगभग 21 महीने यानि 21 मार्च 1977 तक लागू रहा। आपातकाल आजाद हिंदुस्तान का सबसे काला काल कहा जाता है। इसकी घोषणा संविधान की धारा 352 के तहत की गई थी और खुद इंदिरा गांधी ने रेडियो पर इसका ऐलान किया था। स्वतंत्र भारत के इतिहास में ये सबसे विवादस्पद काल रहा क्योंकि आपातकाल में भारत में चुनाव स्थगित हो गए थे।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>भारत के इतिहास में आज का दिन<br />
</strong></span><strong>1529 &#8211;</strong> मुगल शासक बाबर बंगाल पर विजय प्राप्त कर आगरा लौटा।<br />
<strong>1931 &#8211;</strong> भारत के पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह का उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद में जन्म।<br />
<strong>1932 &#8211;</strong> भारतीय क्रिकेट टीम ने ब्रिटेन के लॉर्ड्स मैदान पर अपना पहला टेस्ट मैच खेला।<br />
<strong>1974 &#8211;</strong> बॉलीवुड अभिनेत्री करिश्मा कपूर का जन्म।<br />
<strong>1975 &#8211;</strong> राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने आंतरिक आपातकाल लगाने के सरकार के प्रस्ताव को मंजूरी दी।<br />
<strong>1983 &#8211;</strong> भारत ने वेस्टइंडीज को 43 रनों से हरा कर पहली बार क्रिकेट विश्व कप का खिताब अपने नाम किया।<br />
<strong>2017 &#8211;</strong> किदाम्बी श्रीकान्त ने ऑस्ट्रेलिया ओपन सुपर सीरीज खिताब जीता।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE:<span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/rajasthan/ashok-gehlot-has-absolute-majority-in-rajasthan-assembly/9329/"> राजस्थानः मस्त रहिए, गहलोत सरकार पर कोई खतरा नहीं है&#8230;</a></span></strong></span></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>विश्व के इतिहास में आज का दिन</strong></span><br />
<strong>1788 &#8211;</strong> वर्जीनिया अमेरिका के संविधान को अपनाने वाला 10वां राज्य बना।<br />
<strong>1868 &#8211;</strong> अमेरिका के राष्ट्रपति एंड्रयू जॉनसन ने सरकारी कर्मचारियों के लिये दिन में आठ घंटे काम करने का कानून पारित किया।<br />
<strong>1941 &#8211;</strong> फिनलैंड ने सोवियत संघ पर हमले की घोषणा की।<br />
<strong>1951 &#8211;</strong> अमेरिकी टेलीविजन एवं रेडियो नेटवर्क सीबीएस ने चार शहरों में पहले रंगीन टीवी कार्यक्रम का प्रसारण किया।<br />
<strong>1960 &#8211;</strong> मेडागास्कर फ्रांस से स्वतंत्र हुआ।<br />
<strong>1993 &#8211;</strong> किम कैंपबेल कनाडा की 19वीं प्रधानमंत्री बनीं।<br />
<strong>1994 &#8211;</strong> जापान के प्रधानमंत्री सुतोमु हाता ने अपने पद से इस्तीफा दिया।<br />
<strong>2005 &#8211;</strong> ईरान के राष्ट्रपति चुनाव में अति कट्टरपंथी माने जाने वाले महमूद अहमदी नेजाद की जीत की घोषणा हुई ।<br />
<strong>2009 &#8211;</strong> संगीत एवं नृत्य की नयी परिभाषा लिखने वाले माइकल जैक्&#x200d;सन का निधन।<br />
<strong>2010 &#8211;</strong> ऑस्ट्रिया में दुनिया का सबसे बड़ा सोने का सिक्का 40 लाख डालर में नीलाम हुआ।<br />
<strong>2011 &#8211;</strong> ह्यूस्टन के उद्यमी एवं खरपतवार हटाने की मशीन के आविष्कारक जॉर्ज सी बैलस सीनियर का निधन।<br />
<strong>2014 &#8211;</strong> उरुग्वे के फुटबॉल खिलाड़ी लुईस सुआरेज पर फीफा 2014 विश्वकप के दौरान विपक्षी टीम के खिलाड़ी को दांत से काटने का आरोप लगा।<br />
<strong>2019 &#8211;</strong> स्पेसएक्स ने अपने फाल्कन हेवी रॉकेट को केप कैनवेरल से लॉन्च किया।</p>
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