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	<title>tis news Archives - TIS Media</title>
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	<description>हर अक्षर सच, हर खबर निष्पक्ष </description>
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	<title>tis news Archives - TIS Media</title>
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		<title>चंबल में मिला विवाहिता का शव, इलाके में मची सनसनी</title>
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		<pubDate>Wed, 24 Feb 2021 17:34:43 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>कोटा. दादाबाडी इलाके में बुधवार को चंबल नदी के भीतरिया कुंड में एक महिला का शव मिला है। सूचना पर निगम की रेस्क्यू टीम मौके पर पहुंची और विवाहिता का शव नदी से निकाला। मृतका की पहचान सुल्तानपुर के मोरपा निवासी सुरभि (24) के रूप में हुई है। जिसकी दिसंबर 2020 में दादाबाड़ी इलाके के &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>कोटा. दादाबाडी इलाके में बुधवार को चंबल नदी के भीतरिया कुंड में एक महिला का शव मिला है। सूचना पर निगम की रेस्क्यू टीम मौके पर पहुंची और विवाहिता का शव नदी से निकाला। मृतका की पहचान सुल्तानपुर के मोरपा निवासी सुरभि (24) के रूप में हुई है। जिसकी दिसंबर 2020 में दादाबाड़ी इलाके के हनुमान बस्ती निवासी सुनील मालव से शादी हुई थी।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>Read More :<a href="https://tismedia.in/kota/police-arrested-two-accused-of-deadly-attack-on-youth-in-kota/4764/"> बदले की आग में जल रहा था आरोपी, मौका मिलते ही चाकुओं से गोद डाला</a></strong></span></p>
<p>बताया जा रहा है कि महिला सुबह बिना बताए घर से निकली थी। शव मिलने पर पीहर और ससुराल पक्ष के लोग एमबीएस अस्पताल की मोर्चरी पहुंचे। पुलिस ने पोस्टमार्टम के बाद शव परिवारजनों को सौंप दिया। फिलहाल दोनों पक्षों की ओर से पुलिस में शिकायत नहीं गई है। वहीं, पुलिस मामले की जांच में जुटी है। पुलिस उपाधीक्षक अंकित जैन ने बताया कि फिलहाल मौत के कारणों का पता नहीं लगा है। दोनों पक्षों की ओर से भी शिकायत नहीं दी गई है। एसडीएम स्तर पर मामले की जांच की जा रही है।</p>
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		<title>#Basant_Special काका हाथरसीः क्या बंद तुम्हारी आंखों में&#8230;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[tismedia.in]]></dc:creator>
		<pubDate>Tue, 16 Feb 2021 08:31:36 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[काका हाथरसी के प्रेम पत्र]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>काका हाथरसी को हास्य व्यंग का पुरोधा माना जाता है&#8230; लेकिन, वह प्रेम के भी बड़े हस्ताक्षर थे&#8230; यकीन न आए तो सौंदर्य रस में डूबी उनकी कविता को पढ़कर देख लीजिए&#8230; क्या बंद तुम्हारी आंखों में&#8230;! इस कविता के जरिए उन्होंने प्रेयसी की जो कल्पना की है वह हाथरस के खेतों में खिलखिलाते गुलाब &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>काका हाथरसी को हास्य व्यंग का पुरोधा माना जाता है&#8230; लेकिन, वह प्रेम के भी बड़े हस्ताक्षर थे&#8230; यकीन न आए तो सौंदर्य रस में डूबी उनकी कविता को पढ़कर देख लीजिए&#8230; क्या बंद तुम्हारी आंखों में&#8230;!</p>
<p>इस कविता के जरिए उन्होंने प्रेयसी की जो कल्पना की है वह हाथरस के खेतों में खिलखिलाते गुलाब की खुशबू और उससे बने गुलकंद की मिठास से सराबोर है&#8230; हाथरसियों के लिए तो यह किसी अभूतपूर्व वरदान से कम नहीं है&#8230; अंगारों से तपती भट्टियों पर चढ़ी देगों में जब नाजुक गुलाब को डाला जाता है तो पसीना-पसीना हो उठा उसका अर्क आसमान की ओर उड़ने लगता है&#8230; जहां टकटकी लगाए बैठी पीतल की सुराहियां उसे अपनी पलकों में कैद कर लेती हैं&#8230; और उन गुलाबी आंसुओं को आत्मसात कर दे देती हैं नया नाम&#8230; गुलाबजल। <img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft wp-image-4508 size-medium" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/gopal-das-niraj-with-kaka-hathrasi-300x212.jpg" alt="काका हाथरसी, काका हाथरसी के प्रेम पत्र, बसंत पंचमी, Basant Panchami Special, Kaka Hatharasi, TIS Media, TIS News,  " width="300" height="212" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/gopal-das-niraj-with-kaka-hathrasi-300x212.jpg 300w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/gopal-das-niraj-with-kaka-hathrasi.jpg 750w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /><br />
जी हां, वही गुलाब जल जो आंखों की चमक के लिए खासा मुफीद और रूह को तर कर देने वाला अर्क कहा जाता है। गुलाब के इन्हीं आंसुओं से इत्र और खस की मंत्रमुग्ध कर देने वाली खुशबुएं जन्मती हैं, लेकिन शर्त वहीं भट्टी पर तपाई की। काका इस तपिश को बेहद करीब से महसूस करते थे और इसीलिए उन्होंने हंसगुल्लों के साथ इसकी भी बेहद महीन पिसाई कर डाली&#8230; तब जाकर जन्मे काका-काकी के लव लैटर्स!<br />
चौंकिए मत, काका का मिजाज भी प्रेम में खासा पगा था&#8230; वह अपनी प्रेमिका की बंद आखों तक में झांक बैठते थे और तलाश लाते थे उसमें छिपे द्वंदों से जन्मा गुलकंद। उनकी रचना क्या बंद तुम्हारी आंखों में&#8230; मुझ जैसे हाथरसी के लिए प्रेम ग्रंथ नहीं महाकाव्य है&#8230; ऐसा काव्य जिसमें डूबने वाले पर उसकी मृगनयनी घणी लट्टू हो जाए&#8230; पलकें मूंदने ने बाद भी कुछ न छिपा पाए&#8230; चिकित्सीय शब्दावली में इसे आप एक्सरे या एमआरआई मशीन भी कह सकते हैं। पढ़िए तो जरा इसे&#8230; लट्टू न हो जाएं तो कहिएगा&#8230;</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">मृगनयनी बोलो, मुंह खोलो, क्या बंद तुम्हारी आंखों में ?</span></strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000;">आनंद तुम्हारी आंखों में, द्वंद्व तुम्हारी आंखों में</span></strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000;">नयनों से पलक उठेंगे जब, वह आलम कैसा होगा तब</span></strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000;">चमकें लाखों सूरज चंदा, हरचंद तुम्हारी आंखों में</span></strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000;">भंवरे क्यों भटके भन्नाएं, जब एक जगह ही पा जाएं</span></strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000;">गुलशन के सारे फूलों का, मकरंद तुम्हारी आंखों में</span></strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000;">जिनको न मिला यौवन राशन, वे आलोचक देते भाषण</span></strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000;">छलनाओं जैसे भरे हुए, छल छंद तुम्हारी आंखों में</span></strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000;">इकरार कभी, इंकार कभी, कभी ठसक ठिनक या रूठ मटक</span></strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000;">क्या लगे हुए हैं नखरारे, पैबंद तुम्हारी आंखों में</span></strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000;">किस-किस हक़ीम के पास जायं, आंखों में घुसकर चाट जायं</span></strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000;">मिल जाए प्रेम से पगा हुआ, गुलकंद तुम्हारी आंखों में</span></strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000;">आंखों से आंखें सट जाएं, तो परदा दुई के हट जाएं</span></strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000;">तुम बंद हमारी आंखों में, हम बंद तुम्हारी आंखों में</span></strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000;">दुनिया से नाते टूट जायं, माया बंधन से छूट जायं</span></strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000;">काका कवि चरण किया करें, स्वच्छंद तुम्हारी आंखों में !!</span></strong><br />
काका की चहल कदमी सिर्फ प्रेयसी की आंखों तक ही सीमित नहीं रही&#8230; काका ने लंबा सफर तय किया था&#8230; प्रेम का&#8230; बाजरिया काकी&#8230; वह अपनी प्रेमरस से सराबोर रचनाओं को काका-काकी के लव लैटर्स कहा करते थे&#8230; पढ़िए खासी रूमानियत से भरा काका का एक और ऐतिहासिक लव लैटर&#8230;<br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>हाथरस</strong></span><br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>5 जुलाई,1925</strong></span><br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>आगरे की लली</strong></span><br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>मेरे दिल की कली,</strong></span><br />
<span style="color: #ff0000;">यह</span> पत्र लिखते हुए हृदय में उथल-पुथल हो रही है, जैसे इम्तहान के कमरे में जाते हुए हमारी हुई थी। दिल धक्-धक् कर रहा है। कलम काँप रही है और इस पत्र को बाँचकर तुम क्या सोचोगी, हमारी अक्ल यह नाप रही है। कहीं नाराज़ हो गईं तो सब गुड़-गोबर हो जाएगा। फिर भी लिखे बिना दिल नहीं मानता। कल बगीची से डंड पेलकर घर आए तो देखा कि बैठक में चार-पाँच आदमी बैठे हुए हैं। उनको सूँघने पर पता चला कि पीली पगड़ी वाले तो थे तुम्हारे मामा, काली टोपी वाले नाई ठाकुर थे और टोपा वाले पता नहीं कौन थे।<br />
जैसे ही हम कमरे में दाखिल हुए, बातचीत एकदम बंद हो गई। हमारे मामा ने फुदककर कहा, ‘लो जी यह है लड़का।’ हमारा हृदय धड़का। मामा बड़े प्यार से बोले,‘सबको राम-राम करो, बेटा। ये सब आगरे से आए हैं।’आगरे का नाम सुनते ही दालमोठ और पेठा दिखाई देने लगे। हमें क्या पता था कि आगरे का संबंध तुमसे भी है। खैर सब घूर-घूरकर हमें ऐसे देखने लगे, जैसे कोई पेटू हलवाई की दुकान पर खड़ा बालूशाइयों को देखता है। कोई हमारे मुँह की ओर देख रहा था, कोई हाथ की तरफ़, कोई पैरों की तरफ़। हमारे शरीर पर जहाँ-तहाँ लगी हुई थी अखाड़े की मिट्टी और गुम हो रही थी सिट्टी-पिट्टी।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">टोपा वाले बोले,</span></strong> ‘यह क्या बेटा, जगह-जगह खुजली हो गई है ?’<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">हमने मिट्टी झाड़कर कहा,</span></strong> ‘अभी-अभी अखाड़े से कुश्ती लड़कर आए हैं।’<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">नाई ने पूछा,</span></strong> ‘कितनी दंड पेलते हो लाला ?’<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">हमने कहा,</span> </strong>‘चार सौ बीस सुबह, चार सौ बीस शाम।’<br />
और क्या करते हो काम ?’<br />
हमारे मामा बीच में ही बोल उठे, ‘अजी बड़ी ऊँची जगह काम करता है।’ फिर हमसे कुछ सीधे सवाल तुम्हारे नाई ने किए। हमने कविता में उत्तर दिए। हम यहाँ उन प्रश्नोत्तरों को इसलिए लिख रहे हैं कि तुम अपनी सखी-सहेलियों को बता सको कि हम कविता भी करते हैं। <strong><span style="color: #ff0000;">सबसे पहला प्रश्न था-</span></strong>तुम्हारी उम्र कितनी है लल्लू ?<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">हमारा उत्तर :</span></strong> ठीक उम्र तो जानते हैं केवल माँ-बाप, वैसे लगभग बीस है, समझ लीजिए आप।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">दूसरा प्रश्न :</span></strong> कितने पढ़े हो अब तक ?<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">हमारा उत्तर :</span></strong> जहाँ तक पढ़ाया, वहाँ तक पढ़े हैं, एक-एक दर्जा में दो-दो बार चढ़े हैं।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">प्रश्न :</span></strong> एक बात और बताओ लाला ! बुरा मत मानना। तुम्हारी आँखों में काजल कौन लगाता है, अम्मा या मामी ?<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">उत्तर :</span></strong> अम्मा या मामी कभी, काजल नहीं लगाए, अंगुली काजल लगाती, फटाफट्ट लग जाए।<br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>प्रश्न :</strong></span> कुछ भजन-पूजा भी करते हो ?<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">उत्तर :</span></strong> माला जपते राम की, नित्य एक सौ आठ, साठ बार हम कर चुके, रामायण का पाठ।<br />
फिर तुम्हारे मामा पूछने लगे, ‘क्यों बेटा, तु्म्हें अपने पिताजी की कुछ याद है क्या ?’<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">हम बोले :</span></strong> प्लेग पी गई पिता को, हमें नहीं कुछ याद,<br />
मामी-मामा ने हमें, पाला उसके बाद।अब टोपा वाले चहके : तनखा कितनी मिलती है, लल्लू ?<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">हमने उत्तर दिया :</span> </strong>रुपए ला ला दे रहे हर महीने पच्चीस, जब हो जाए ब्याह तब, तक दें पूरे तीस।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">फिर नाई मिमियाया :</span></strong> यारबास कितने हैं तुम्हारे ?<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">उत्तर:</span></strong> किस-किस का लें नाम हम, यार बहुत दिलदार, मारें सीटी एक तो, लंबी लगे कतार।<br />
उस दिन जल्दबाजी में हमारे पायजामे का नाड़ा कुर्ते से नीचे लटका रह गया था तो नाई ने पूछा, ‘पाजामे का यह नाड़ा हर समय इसी तरह लटकाए रहते हो क्या ?’<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">हमने उत्तर दिया :</span></strong> नाड़ा बहुत प्रसन्न है, रखो ताक पर लाज,<br />
दर्शन करने आपके, लटक गया है आज।सुनकर सब हँस गए। हमने अनुभव किया फँस गए। पर नाई ठाकुर तो बड़े चतुर होते हैं। उनको यह बात कुछ चुभ गई और कहने लगे, ‘ठीक-ठीक जवाब दो कुँवरजी ! उल्टी-सीधी बात समझ में नहीं आती।’ हम फिर भी नहीं चूके और यह दोहा सुना दिया:<br />
कविता चलती है सदा, आड़ी-तिरछी चाल,<br />
जैसे नाई काटते, उल्टे-सीधे बाल।<br />
यह बात भी नाई को चुभ गई हो तो तुम उन्हें मना लेना, क्योंकि अभी उनसे बहुत काम निकालना है। उन्होंने भाँजी मार दी, तो बना-बनाया बिगड़ जाएगा खेल। फिर कैसे चढ़ेगा दूल्हा-दुलहन पर तेल !और भी बहुत से प्रश्न तुम्हारे मामाजी ने पूछे। हम उनके संतोषजनक जवाब देकर बाहर आ गए। उन्हें विश्वास हो गया कि लड़का हकला नहीं है। आवाज भी कड़कदार है। सूरत-सीरत भी ठीक-ठाक है। वे संतुष्ट से दिखाई दिए तो हम चले आए। फिर भी किवाड़ के पीछे खड़े होकर उनका निर्णय जानने के लिए उत्सुक हो रहे थे।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignleft wp-image-4507 size-full" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/Kaka-Hatharasi-old.jpg" alt="काका हाथरसी, काका हाथरसी के प्रेम पत्र, बसंत पंचमी, Basant Panchami Special, Kaka Hatharasi, TIS Media, TIS News,  " width="322" height="156" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/Kaka-Hatharasi-old.jpg 322w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/Kaka-Hatharasi-old-300x145.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 322px) 100vw, 322px" />हमारे जाने के बाद नाई ने तुम्हारे अंग-प्रत्यंग और सौंदर्य का मनोहारी चित्र खींचा। जबसे यह वर्णन सुना है, तबसे तुम्हारा चित्र बारंबार आँखों के सामने आता रहता है। मन चाहता है कि तुम्हारी एक छटा दिख जाए तो हृदय की मुरझाई हुई कली खिल जाए। क्या ऐसा कोई साधन हो सकता है कि हम ताजमहल देखने के बहाने अपनी ‘मुमताज’ को भी देख सकें ? विश्वास रखो, हम वहाँ किसी से भी नहीं कहेंगे कि हम अमुक हैं।खड़े-खड़े हमने तुम्हारे मामाजी के मुख से तुम्हारा नाम पहली बार सुना। वे कह रहे थे-‘रतना के लिए यह लड़का ठीक रहेगा।’ वाह, क्या प्यारा नाम है रतना। जैसे रत्नों का ढेर।<br />
फिर मन में विचार आया कि तुलसीदास की रत्नावली तुलसीदास को बहुत फटकारा करती थी, कहीं ऐसी न हो ? और जब तुम्हारे मामाजी ने बेलनगंज में घर बताया तो कुछ कँपकँपी सी आई, लेकिन अंतरात्मा बोली, ‘घबराओ, मत तात ! इसमें डरने की क्या बात। पत्नी की फटकार से ही तो तुलसीदास विश्व में प्रसिद्ध हो गए। विद्योत्मा के व्यंग्यवाणों से कालिदास महाकवि हो गए। तुम्हारा भी फ्यूचर ब्राइट हो सकता है।</p>
<p>’प्यारी रतना ! थोड़ी-बहुत हम भी करते हैं काव्य-रचना। भाँवरों के समय जब तुम्हारी मामी तथा सखी-सहेलियाँ इकट्ठी होकर परिपाटी के अनुसार कहेंगी कि लालाजी सिल्लोक (श्लोक) सुनाओ; तब देखना हमारा कमाल। ऐसी-ऐसी तुकबंदी सुनाएँगे कि सबके गाल शर्म से हो जाएँगे लाल। अब तो यही इच्छा है कि तुम्हारी तथा तुम्हारी मामी की स्वीकृति मिल जाए तो मामला फिट हो जाए। हमारा फोटो तुम्हारे मामाजी ले गए हैं लेकिन बदले में तुम्हारा नहीं दे गए हैं। कहने लगे-‘हमारे यहाँ लड़कियों के फोटो नहीं खिंचवाए जाते।’ खैर, तुम्हारा जो रूप-वर्णन नाई ने किया है, उससे चौथाई भी निकला तो चलेगा।</p>
<p>अपने फोटो के बारे में एक बात और बतानी है-फोटोग्राफर की भूल से हमारे बाएँ गाल पर एक छोटा-सा काला निशान आ गया है। उसे तिल मत समझ लेना। वास्तव में उस समय गाल पर एक मक्खी बैठ गई थी। यह फोटो हमने दाऊजी के मेले में चलते-फिरते फोटोग्राफर से चवन्नी में खिंचवाया था। एक अठन्नी वाला खिंचवाते तो मजा आ जाता। तब वह मक्खी को उड़ाकर ही फोटो खींचता। तुमसे क्यों छिपाएँ, मेले में गर्म जलेबी बन रही थीं। दो पैसे की आठ जलेबी खाकर आए थे। गाल पर जरा चाशनी जम गई होगी। फिर मक्खी का भी क्या कसूर ! कोई ग़लत कल्पना नहीं करना हजूर !<br />
अब इन फोटुओं की चर्चा छोड़ें और कुछ ऐसा जुगाड़ लगाएँ कि हम तुम्हें देखें, तुम हमें देखो। हाथ से हाथ न सही, आँखों से आँख मिल जाएँ।हट जाएँ सब बीच से, दूरी की दीवार,<br />
अब तो इच्छा है यही, हो प्रत्यक्ष दीदार।मन नहीं कर रहा, फिर भी यह पत्र समाप्त कर रहे हैं। कोई पढ़ न ले इसलिए अपने हाथों ही से लिफाफा बंद करके लैटरबक्स में डालने जा रहे हैं । इस पत्र का उत्तर घर के पते पर न भेजकर दूकान के पते पर भेजना। पता इस प्रकार है-<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">काका हाथरसी, द्वारा सेठ राधेप्रसाद पोद्दार।</span></strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000;">नयागंज, हाथरस।</span></strong><br />
बड़ी बेकरारी से तुम्हारे पत्र की प्रतीक्षा करेंगे। उत्तर नहीं मिलेगा, तब तक आहें भरते रहेंगे।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">तुम्हारा होने वाला,</span></strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000;">प्राणों से प्यारा, काका</span></strong></p>
<p style="text-align: center;">पुनश्च: तुम्हारे मामा ने हमारे मामा से हमारी जन्म-कुंडली माँगी थी। वे भेजेंगे या भूल जाएँगे, कहा नहीं जा सकता। उन्हें क्या जल्दी है, जल्दी तो हमें है। इस कुंडली को देखकर एक ज्योतिषी ने कहा था कि इस लड़के के लखपती होने का योग है और यह विद्वान बनेगा, क्योंकि ग्रह में बृहस्पति है। यह बात हम तुम्हें फाँसने के लिए नहीं लिख रहे, भगवान कसम, बिल्कुल फैक्ट है।<br />
प्राणों से प्यारे काका आपको <span style="color: #ff0000;"><strong>इस हाथरसी का दंडवत नमन&#8230;!!  बाकलम: <a href="https://www.facebook.com/UdaiVineetSingh/">VineetSingh</a></strong></span></p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-4509 size-full aligncenter" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/kaka-hatharasi.jpg" alt="काका हाथरसी, काका हाथरसी के प्रेम पत्र, बसंत पंचमी, Basant Panchami Special, Kaka Hatharasi, TIS Media, TIS News,  " width="700" height="315" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/kaka-hatharasi.jpg 700w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/kaka-hatharasi-300x135.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 700px) 100vw, 700px" /></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/art-culture/basant-special-love-letters-of-kaka-hatharasi/4505/">#Basant_Special काका हाथरसीः क्या बंद तुम्हारी आंखों में&#8230;</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>#Valentine_Special खुला आकाश, प्रेम की बरसात, यह रितुल यात्रा है…</title>
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		<pubDate>Sun, 14 Feb 2021 17:10:17 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>तुम्हारी हँसी मेरे मौन का संपूर्ण संवाद तुम्हारा साथ मेरी साँसों में जमा सौरभ का स्रोत/ तुम देखो तो रंग भर जाते हैं मेरे सपनों में और तुम छू दो तो हो जाता हूँ मैं कामनाओं की झील/ तुम्हारा प्रेम जैसे किसी मंदिर के शिखर पर लहराता ध्वज मैं जिसके बहाने छू लेता हूँ सारा &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #3366ff;">तुम्हारी हँसी मेरे मौन का संपूर्ण संवाद</span><br />
<span style="color: #3366ff;">तुम्हारा साथ मेरी साँसों में जमा सौरभ का स्रोत/</span><br />
<span style="color: #3366ff;">तुम देखो तो रंग भर जाते हैं मेरे सपनों में</span><br />
<span style="color: #3366ff;">और तुम छू दो तो हो जाता हूँ मैं कामनाओं की झील/</span><br />
<span style="color: #3366ff;">तुम्हारा प्रेम जैसे किसी मंदिर के शिखर पर लहराता ध्वज</span><br />
<span style="color: #3366ff;">मैं जिसके बहाने छू लेता हूँ सारा आकाश/</span><br />
<span style="color: #3366ff;">तुम्हारा प्रेम जैसे किसी शहर को उसके इतिहास का संबोधन</span><br />
<span style="color: #3366ff;">मैं जिसे सुनकर हो जाता हूँ पर्वतों सा बुलंद/</span><br />
<span style="color: #3366ff;">मैं रहूँ या नहीं रहूँ/ रहे यह प्रेम काल की सीमा के भी परे</span><br />
<span style="color: #3366ff;">प्रेम की संभावनाओं का भी कही सीमांकन संभव है भला?</span><br />
यकीनन, नहीं&#8230;!!! ठीक उसी तरह उस प्रेम यात्रा को भी शब्दों में बांधना संभव नहीं&#8230; जिसके यात्री तमाम देहिक और भौतिक संबंधों से परे हों&#8230;!!! जहां भावों की संगत हो, शब्दों की थिरकन हो&#8230; विचारों की वैतरणी, खुला आकाश, सिर्फ और सिर्फ अनवरत प्रेम की बरसात&#8230; जी हां, वही रितुल यात्रा है&#8230;! और यात्री हैं कवि, लेखक, पत्रकार और साहित्यकार दंपत्ति अतुल कनक एवं रितु जोशी। आखिर कौन होगा वह, जो नहीं चाहेगा कि उसका प्रिय उसके लिए कविताएं लिखे&#8230; कहानियां और किस्से गढ़े, लेकिन जनाब यहां माजरा जरा उल्टा है&#8230;!! रितुल यात्रा का प्रारब्ध ही ‘’<span style="color: #ff0000;">कनक रचनावली</span>’’ में छिपा है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="size-medium wp-image-4429 alignleft" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/atul1-300x176.jpeg" alt="" width="300" height="176" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/atul1-300x176.jpeg 300w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/atul1-1024x602.jpeg 1024w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/atul1-768x451.jpeg 768w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/atul1.jpeg 1280w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /></p>
<p>“यूं तो मैं इन्हें बचपन से ही जानती हूं&#8230; थोड़ा होश संभाला तो घर आना जाना भी निरन्तर होने लगा&#8230;! प्रेम से पगी कविताएं ही नहीं इनके लिखे विरह के किस्से भी खूब पढ़े, लेकिन तब सिर्फ एक शब्दाकर्षण था, लेकिन मोह में तब बदला जब मैं पढ़ाई के लिए दूर हुई।‘’ रितु मुस्कुराते हुए कहती हैं&#8230; एक पखवाड़ा भी नहीं बीता कि मुझे याद आने लगी। मैने उन्हें (अतुल कनक) को कॉल किया कि मिलना है, आपकी याद आ रही है। तब जाकर समझ आया कि कुछ तो है? लेकिन, क्या है स्पष्ट कहना मुश्किल था&#8230;!!! आप इसे बचपन की मोहब्बत कह सकते हैं&#8230; लेकिन, मुझे 6 साल लगे यह कहने में। ‘’आप इसे आज के दौर जैसा प्रपोज करना बिल्कुल भी नहीं कह सकते’’&#8230; अतुल कनक कहते हैं। हम दोनों में से किसी ने भी एक दूसरे को प्रपोज कभी नहीं किया। हां, मेरी लिखी प्रेम कविताएं प्रपोजल लगी हों यह हो सकता है। हां, एक दूसरे के घर आना जाना काफी होता था और साल 94-95 आते-आते आंखों में दिखने भी लगा था कि कुछ तो है&#8230;!!!</p>
<p>बात आगे बढ़ती इससे पहले रितु ने टोका&#8230; एक कविता है इनकी जो हमारी मुलाकात के आपके सवाल पर एकदम सटीक बैठती है&#8230; सुनिए&#8230;</p>
<p style="text-align: left;"><span style="color: #ff0000;"><img loading="lazy" decoding="async" class="size-medium wp-image-4430 alignright" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/atul-260x300.jpeg" alt="" width="260" height="300" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/atul-260x300.jpeg 260w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/atul.jpeg 307w" sizes="auto, (max-width: 260px) 100vw, 260px" />पहली बार किस जन्म में, कहाँ मिले थे हम/</span><br />
<span style="color: #ff0000;">तुम्हें याद है कृष्ण कि पहली बार कब मिले थे हम &#8211; तुम</span><br />
<span style="color: #ff0000;">कितने बरस हो गये हमारे सपनों को उद्दाम हुए/</span><br />
<span style="color: #ff0000;">राधा ने पूछा तो हँस कर बोले रासबिहारी-</span><br />
<span style="color: #ff0000;">तुम वर्षों की बात कर रही हो राधा!,</span><br />
<span style="color: #ff0000;">मुझे तो यह रिश्ता युगों पुराना लगता है/</span><br />
<span style="color: #ff0000;">प्रेम एक ही जन्म के पुण्यों का परिणाम होता तो कैसे महकाता साँसों को</span><br />
<span style="color: #ff0000;">कैसे मेरे सपने तुम्हारी नींद में उतर आते/</span><br />
<span style="color: #ff0000;">कैसे मेरी बाँसुरी में गुँथ पाते गीत तुम्हारे?</span><br />
<span style="color: #ff0000;">प्रेम का रिश्ता जन्म जन्मांतर का होता है</span><br />
<span style="color: #ff0000;">और यह याद रखना कुछ कठिन है कि</span><br />
<span style="color: #ff0000;">बस यही लगता है कि सृष्टि की उत्पत्ति के पहले भी हम तुम साथ थे</span><br />
<span style="color: #ff0000;">और यों ही साथ रहेंगे हमेशा/</span><br />
<span style="color: #ff0000;">जब शेष नहीं रहेगा कुछ भी, सिवाय प्रेम के&#8230;!! </span><br />
<strong>साल 1997&#8230;</strong> एक रोज वह भी क्षण आ गया कि मां और बाबूजी ने खुद आगे बढ़कर कह दिया&#8230; अतुल-रितु अब शादी कर लो&#8230;! और हम अतुल-रितु से रितुल हो गए&#8230;!!!</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>मजबूती की पहचान कराते हैं मुश्किल दौर</strong></span><br />
रितु बताती हैं कि “शादी के बाद परिवार आगे बढ़ा, लेकिन बेटी के जन्म के समय इतनी सारी परेशानियां हो गईं कि एक पल के लिए तो लगा कि कहीं सांसें ही साथ न छोड़ दें&#8230; लेकिन, फिर याद आया कि प्रेम करने के लिये तो अपने अस्तित्व के अहसास तक को भुलाना पड़ता है। ऐसे में जब आपका जीवन साथी पहाड़ सी मजबूती और फूलों से कोमल भाव लिए आपके साथ खड़ा होता है तो तकलीफ, दर्द और परेशानियां न जाने कहां छूमंतर हो जाती हैं। डॉक्टरों ने साफ कह दिया था कि दूसरे बच्चे की कल्पना भी न करें&#8230; और आप यकीन नहीं करेंगे वह दिन है और आज का दिन है, बेटी के रहते कभी हमें किसी कमी का अहसास तक नहीं हुआ। यकीनन, मुश्किल दौर रिश्ते को और भी ज्यादा मजबूत बनाते हैं।“</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>हमारा साथ ही तो हमारा वजूद है</strong></span><br />
रितु कहती हैं ‘’यह निहायत प्रयोगवादी इंसान हैं। जो यथार्थ के लिए जीते हैं। तभी लेखन की मौलिकता भी आती है। उपन्यास लिखना शुरू किया तो नायक की अवस्था का अहसास करने के लिए करीब 500 दिन लंबा उपवास कर डाला। मौन तो इनकी नियमित साधना है। यह मेरे लिए थोड़ा कठिन होता है। क्योंकि, आप रोकना तो दूर इस फैसले में बदलाव तक के लिए कुछ भी नहीं कर सकते।‘’ शुरुआत में कठिनाई हुई, लेकिन अब लगता है मैं भी इस रंग में रंग चुकी हूं। अतुल कनक ठहाका लगाते हुए एक किस्सा सुनाना नहीं भूलते ‘’बात शादी से पहले की है। मैं मौन व्रत ले चुका था और रितु की जिद थी कि मैं ऐसा न करूं। ठना-ठनी में रितु ने अपनी काइनेटिक से अपने ही पैर में टक्कर मार ली। और जब लोग उठाने आए तो नंबर भी मेरा ही दे दिया। पहली परेशानी तो तलाशने में आई और दूसरी समझाने में, लेकिन अच्छी बात यह है कि उस रोज यह समझ गईं कि व्रत सिर्फ लेखन की जरूरत नहीं, बल्कि एक लेखक की आस्था का विषय है। इसके बाद इन्होंने दोबारा कभी मुझे ऐसा करने के लिए नहीं कहा। सच कहूं तो हमारा साथ ही हमारा वजूद है।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;"><img loading="lazy" decoding="async" class="size-medium wp-image-4431 alignleft" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/atul2-201x300.jpeg" alt="" width="201" height="300" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/atul2-201x300.jpeg 201w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/atul2.jpeg 445w" sizes="auto, (max-width: 201px) 100vw, 201px" />खुला आसमान</span></strong><br />
अतुल लेखन में परिवार के योगदान का जिक्र कुछ इस तरह करते हैं “मुझे मेरी माता-पिता ही नहीं पत्नी और बेटी ने खुला आकाश दिया है। पूर्ण बंधन मुक्त&#8230; तभी तो इतनी विविधताओं के साथ लिख पाता हूं। जो कह दिया सो हो जाता है&#8230; जो चाहता हूं सो मिल जाता है&#8230; और क्या चाहिए आपको जीवन में&#8230;।।“ रितु कहती हैं “इनका लेखन बेहद व्यापक है, जबकि मैं कविताओं में ही मगन हूं। हां रिपोर्ताज, यात्रा वृतांत आदि लिखती रहती हूं, लेकिन सच कहूं तो हम दोनों की यात्राएं अपनी-अपनी हैं और सुखमई हैं। आप यकीन नहीं करेंगे कि घर के कोनो-कोने में साहित्य और लेखन ऐसा समाया है कि हम घंटों किताबों, किस्से कहानियों और कविताओं पर ही चर्चा करते रहते हैं। यही हमारा प्रेम है और यही हमारे नेह के समीकरण। और तो और अब बेटी भी इस राह पर चल पड़ी है। कुल मिलाकर खुले आकाश तले प्रेम की यह बरसात ही रितुल यात्रा है&#8230;।।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">मूर्धन्य साहित्यकार दंपति रितु जोशी और अतलु कनक को द इनसाइड स्टोरी की शुभकामनाएं कि उनका प्रेम यूं ही सूरज-चांद बनकर आसमान में चमकता रहे। </span></strong></p>
<p style="text-align: right;"><strong>बाकलम-<span style="color: #ff0000;">Vineet Singh@Kota </span></strong></p>
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		<title>#Valentine_Special कर्म की धूनी पर प्रेम की साधनाः कृष्णा-राजेंद्र</title>
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		<pubDate>Sun, 14 Feb 2021 14:05:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>Vineet Singh@Kota. साल 2003&#8230; जगह थी कला दीर्घा कोटा&#8230; जहां मध्यवर्गीय परिवार के वैवाहिक जीवन की विडंबनाओं  को शब्दों में पिरोने वाले महान चितेरे राकेश मोहन के नाटक ‘’आधे-अधूरे’’ की रिहर्सल चल रही थी&#8230; लेकिन, किसे पता था कि नायक के सामने ऑडिशन दे रही नाटक की सबसे अहम किरदार उसके जीवन की भी नायिका &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color: #ff0000;">Vineet Singh@Kota.</span></strong> <em><span style="color: #ff0000;">साल 2003&#8230; जगह थी कला दीर्घा कोटा&#8230; जहां मध्यवर्गीय परिवार के वैवाहिक जीवन की विडंबनाओं  को शब्दों में पिरोने वाले महान चितेरे राकेश मोहन के नाटक ‘’आधे-अधूरे’’ की रिहर्सल चल रही थी&#8230; लेकिन, किसे पता था कि नायक के सामने ऑडिशन दे रही नाटक की सबसे अहम किरदार उसके जीवन की भी नायिका बन जाएगी&#8230;!!!</span></em></p>
<p>जी हां, हम जिक्र कर रहे हैं ‘’आधे-अधूरे’’ से हुए ‘’पूरे पांचाल’’ यानि कला की महारथी कृष्णा महावर और थियेटर को आंदोलन बनाने वाले ओजस्वी कलाकार राजेंद्र पांचाल का। जिन्होंने की कर्म की धूनी पर प्रेम की अनवरत साधना। #Valentine_Special में प्रस्तुत हैं उनके जीवन के बेहद अहम पहलु&#8230;</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">शुरू हुए मुलाकातों के दौर</span></strong><br />
जीवन में मील का पत्थर साबित हुई इस मुलाकात के बारे में राजेंद्र पांचाल कहते हैं “ऐसा नहीं है कि यह हमारी पहली मुलाकात थी। इससे पहले भी कई मर्तबा मिले थे हम लोग। दोनों कोटा ही रहते थे, लेकिन हां, एक दूसरे को करीब से जाना-समझा पहली बार। इसके बाद हम और भी अच्छे दोस्त बन गए।“  हालांकि साल 2006 में मैं नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (एनएसडी) चला गया और कृष्णा शांति निकेतन।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="size-medium wp-image-4425 alignleft" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/Rajendra-panchal-krashna-mahawar-3-284x300.jpeg" alt="" width="284" height="300" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/Rajendra-panchal-krashna-mahawar-3-284x300.jpeg 284w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/Rajendra-panchal-krashna-mahawar-3.jpeg 720w" sizes="auto, (max-width: 284px) 100vw, 284px" /></p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">कृष्णा ने बढ़ाया हाथ</span></strong><br />
कृष्णा महावर बताती हैं कि इस दौरान उनका दिल्ली और राजेंद्र का शांति निकेतन आना जाना होता रहा। मेल-मुलाकातों के इस दौर में भले ही हम किसी से कुछ न बोले हों, लेकिन आंखें कहने भी लगीं थी और समझने भी। वह बेहद संजीदा किस्म के इंसान हैं, कहीं मुझे बुरा न लग जाए इसलिए कुछ कहने से शायद झिझक रहे थे!!! ऐसे में पहल मुझे ही करनी पड़ी&#8230;और एक रोज खुद आगे बढ़कर मैने अपने मन की बात उनसे कह ही दी।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>राजेंद्र ने थाम लिया</strong></span><br />
कृष्णा बताती हैं कि मेरे पहल करने के बाद ऐसा नहीं है कि राजेंद्र ने झट से हां कर दी हो। उन्होंने कुछ समय मांगा ताकि एक दूसरे को समझ सकें कि क्या वाकई में दो अच्छे दोस्त बेस्ट पार्टनर भी बन सकते हैं? हां मुझे सोचने में समय लगा&#8230;!!! क्योंकि मैं फकीर किस्म का इंसान हूं&#8230; खुद को पूरी तरह से थियेटर को समर्पित कर चुका हूं&#8230; ऐसे में मेरे सामने सबसे बड़ा सवाल यही था कि आखिर आप किसके साथ जिंदगी भर जी सकते हैं…!!! क्योंकि जीवन बिताना नहीं जीना था&#8230; वह भी एक दूसरे की साधना को भंग किए बगैर&#8230;!!! एक दूसरे की पहचान मिटाए बगैर..!! दूसरे को खुद से ज्यादा सम्मान और अधिकार देकर&#8230; समर्पण देकर… प्रसन्नता देकर!!! राजेंद्र मुस्कुराते हुए आगे कहते हैं&#8230; आखिर में हम साल 2009 में दोस्त से लाइफ पार्टनर बन ही गए।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>जमा बैठे कर्म की धूनी</strong></span><br />
कृष्णा और राजेंद्र के प्रेम की असल परीक्षा तो शादी के बाद शुरू हुई। दोनों ने कर्म की ऐसी धूनी रमाई कि प्रेम साधना और उसका प्रतिफल में बना रिश्ता पारस हो गया। कृष्णा बताती हैं कि शादी के बाद वह जयपुर चली गईं। जबकि राजेंद्र थियेटर को गांव-ढ़ांढ़ी तक ले जाने के संकल्प के साथ कोटा ही रुक गए। कृष्णा कहती हैं ‘’मैं जानती थी कि साधक को साधना से विरत नहीं किया जा सकता और रंगमंच ऐसी साधना है जिसके लिए कलाकार न समय देखता है और न ही साधन। सच कहूं तो मैने उन्हें पारिवारिक जिम्मेदारियों से पूरी तरह मुक्त कर दिया।‘’ उन्होंने मुझमें ऐसी हिम्मत, विश्वास और मजबूती भरी कि मैं खुद भी अपना वजूद निखारने मे जुट गई।</p>
<p style="text-align: left;"><strong><span style="color: #ff0000;">साधना को सलाम</span></strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000;"><img loading="lazy" decoding="async" class="size-medium wp-image-4424 alignright" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/Rajendra-panchal-krashna-mahawar-1-300x220.jpeg" alt="" width="300" height="220" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/Rajendra-panchal-krashna-mahawar-1-300x220.jpeg 300w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/Rajendra-panchal-krashna-mahawar-1-1024x752.jpeg 1024w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/Rajendra-panchal-krashna-mahawar-1-768x564.jpeg 768w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/02/Rajendra-panchal-krashna-mahawar-1.jpeg 1280w" sizes="auto, (max-width: 300px) 100vw, 300px" /></span></strong>कृष्णा बताती हैं कि “ राजेंद्र पांचाल, रोटेदा में पैराफिन थियेटर की स्थापना कर देश दुनिया के कला साधकों को रंगमंच की बारीकियां सिखाने और जनमानस में कला के प्रति आमजन में जागरुकता जगाने में ऐसे जुटे कि करीब तीन साल तक घर ही नहीं आए।“ और वह भी ऐसी स्थिति में जब कि बेटा ऋषभ सिर्फ 8 महीने का ही था। कृष्णा गौरवान्वित होते हुए कहती हैं कि&#8230; वक्त भले ही मुश्किलों से कटा, लेकिन हम दोनों के लिए ही यकीनन वह साल स्वर्णिम युग सरीखे थे। राजेंद्र पांचाल ने अभी तक के अपने सबसे बड़े नाटक सूर्यमल मिश्रण का मंचन पूरा किया। पैराफिन थियेटर की स्थापना की और कलाकार की असीमित पवित्रता को हासिल किया। और मैने, क्या किया&#8230; बताती हूं&#8230; इस दौरान आर्ट ट्रेंड, न्यू मीडिया आर्ट और वेस्टर्न एंड इंडियन इंस्टालेशन पर एक दो नहीं बल्कि, पूरी चार किताबें लिखीं&#8230;!! अरे रुकिए&#8230; कुछ और भी था&#8230; पहला राजस्थान ललित कला अकादमी पुरुस्कार और दूसरा राष्ट्रीय युवा कलाकार पुरस्कार। यह भी मैने इसी दोरान हासिल किया। यकीनन हम दोनों के लिए स्वर्णकाल था वह।</p>
<p><span style="color: #ff0000;">कृष्णा महावर और राजेंद्र पांचाल स्वर्णिम यात्रा निरंतर जारी है। द इनसाइड स्टोरी की ओर से दोनों को शुभकामनाएं।</span></p>
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		<title>ग्रहों की चाल में फंसा हरिद्वार कुंभ, 120 दिन नहीं सिर्फ 48 दिन का बचा मेला</title>
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		<pubDate>Tue, 29 Dec 2020 14:54:02 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>TIS_Media@स्टेट डेस्क. ग्रहों की आड़ी तिरछी चालों ने इस बार कुंभ को भी नहीं छोड़ा. हरिद्वार में इस सदी का दूसरा कुम्भ साल भर पहले ही आयोजित हो जाएगा. इतना ही नहीं ग्रह चालों का इस कुंभ पर इतना ज्यादा असर पड़ा है कि इसकी अवधि 120 दिनों से घटाकर कुल 48 दिनों की ही रह &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong>TIS_Media@</strong><strong>स्टेट डेस्क. </strong><strong>ग्रहों की आड़ी तिरछी चालों ने इस बार कुंभ को भी नहीं छोड़ा. हरिद्वार में इस सदी का दूसरा कुम्भ साल भर पहले ही आयोजित हो जाएगा. इतना ही नहीं ग्रह चालों का इस कुंभ पर इतना ज्यादा असर पड़ा है कि इसकी अवधि </strong><strong>120 </strong><strong>दिनों से घटाकर कुल </strong><strong>48 </strong><strong>दिनों की ही रह गई. </strong></p>
<p><strong> </strong>कुंभ 12 साल बाद आयोजित होता है. लेकिन इस बार ग्रहों की ऐसी चाल चली है कि इसका आयोजन एक साल पहले यानि सिर्फ 11 साल बाद ही हो रहा है. विद्वानों के मुताबिक हरिद्वार कुम्भ का आयोजन बृहस्पति के कुम्भ राशि और सूर्य के मेष राशि में आने पर होता है. बृहस्पति हर बारह साल बाद कुम्भ राशि में आते हैं और इस मौके पर कुंभ मेले का आयोजन किया जाता है. लेकिन, इस बार बृहस्पति 11वें साल में ही यानि 5 अप्रैल 2021 को ही कुम्भ राशि में आ जाएंगे.</p>
<p><strong>घट गई आयु</strong></p>
<p>हरिद्वार का कुम्भ मेला पूरे 120 दिन चलता है, लेकिन इस बार कुम्भ के मुख्य स्नान वाले दिन 14 अप्रैल को बना पुण्य योग इस बार सिर्फ एक महीने तक ही बना रहेगा. जिसके चलते मेले का समय 120 दिन से घटकर 48 दिनों का ही रह गया.</p>
<p><strong>पहला शाही स्नान शिवरात्रि को</strong><br />
बृहस्पति और सूर्य के संयोग से बने कुम्भ के मौक़े पर कुल चार शाही स्नान होंगे. इनमें 13 अखाड़े स्नान के लिए हर की पौड़ी जाएंगे. पहला शाही स्नान 11 मार्च को यानी शिवरात्रि के दिन होगा. जबकि, दूसरा शाही स्नान 12 अप्रैल को सोमवती अमावस्या के दिन और तीसरा मुख्य शाही स्नान 14 अप्रैल यानी मेष संक्रांति के मौके पर होगा. इन तीनों तिथियों पर सभी तेरह अखाड़े स्नान के लिए निकलते हैं. जबकि चौथा शाही स्नान बैसाख पूर्णिमा के दिन 27 अप्रैल को पड़ेगा, लेकिन उस दिन संन्यासियों के अखाड़े इसमें शामिल नहीं होंगे. इस दिन सिर्फ बैरागियों की तीन आणियाँ स्नान करेंगी.</p>
<p><strong>प्रशासन ने कसी कमर</strong><br />
मेला अधिकारी दीपक रावत ने बताया कि मेले के साथ ही कुम्भ के शाही स्नान को लेकर सभी तैयारियां पूरी कर ली गई हैं. साल 2021 के महाकुंभ में पर्व स्नानों पर श्रद्धालुओं की खासी भीड़ रहेगी. इसीलिए अभी से तैयारियां शुरू कर दी गई हैं. आईजी कुम्भ मेला संजय गुंज्याल ने बताया कि कुम्भ मेले की तैयारियों को देखते हुए एक जनवरी से ही अर्द्ध सैनिक बलों की पांच कम्पनियां हरिद्वार पहुंच जाएगी.</p>
<p>&nbsp;</p>
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		<title>लाड़ो मत आना इस देश&#8230;</title>
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		<pubDate>Mon, 26 Oct 2020 17:26:46 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>कोटा. दस दिनों तक घर-घर देवियों की पूजा का दौर चला&#8230; जमकर मान-मनोवल की गई, लेकिन हकीकत इसके उलट एकदम स्याह ही रही। नवरात्र का दौर खत्म हुए अभी चंद घंटे भी न गुजरे थे कि आरके पुरम थाना क्षेत्र में नवजात कन्या सड़क पर पड़ी मिली। चाइल्ड लाइन को खबर मिली तो उन्होंने बच्ची &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p>कोटा. दस दिनों तक घर-घर देवियों की पूजा का दौर चला&#8230; जमकर मान-मनोवल की गई, लेकिन हकीकत इसके उलट एकदम स्याह ही रही। नवरात्र का दौर खत्म हुए अभी चंद घंटे भी न गुजरे थे कि आरके पुरम थाना क्षेत्र में नवजात कन्या सड़क पर पड़ी मिली। चाइल्ड लाइन को खबर मिली तो उन्होंने बच्ची को जेके लोन अस्पताल में भर्ती करवाया। नवजात की हालत फिलहाल ठीक बताई जा रही है।</p>
<p><strong>Read More: <a href="http://theinsidestories.in/index.php/2020/10/26/rajasthan-election-bjp-remembers-ram-again/">कोटा नगर निगम चुनावः भाजपा को फिर याद आये राम</a></strong></p>
<p>कोटा में यह दिल दहला देने वाली घटना आरकेपुराम थाना क्षेत्र के गुर्जर बस्ती के पास हुई। आरके&nbsp; पुरम निवासी रामप्रसाद सोमवार सुबह छह बजे सब्जी मंडी जा रहे थे। इसी दौरान उन्हें किसी बच्चे की रोने की आवाज सुनाई दी, लेकिन कहीं कोई नजर नहीं आया तो वह हैरत में पड़ गए। तभी उनकी नजर सड़क किनारे पड़े कपड़े पर गई। पास जाकर देखा तो एक नवजात बच्ची उसमें लिपटी हुई पड़ी थी।</p>
<p><strong>Read More: <a href="http://theinsidestories.in/index.php/2020/10/25/udh-minister-shanti-dhariwal-counter-attack-on-bjp/">धारीवाल का भाजपा पर पलटवार, बोलेः काम तो छोड़ो वायदा ही कर दो</a></strong></p>
<p><strong>लोगों ने नहीं की मदद</strong></p>
<p>रामप्रसाद ने बताया कि उन्होंने स्थानीय लोगों से मदद की गुहार लगाई, लेकिन कोई आगे बढ़कर नहीं आया। थाने का फोन नंबर नहीं था। जैसे तैसे किसी राहगीर ने उन्हें चाइल्ड लाइन का नंबर दिया। जिसके बाद रामप्रसाद ने चाइल्ड लाइन कॉर्डिनेटर अल्का अजमेरा को सूचना दी। सूचना मिलते ही अल्का अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंची और नवजात को जांच के लिए जेके लोन अस्पताल आईं। जहां पर चिकित्सकों ने बताया कि नवजात का जन्म रात करीब तीन बजे हुआ है। उधर मामले की जानकारी मिलते ही आरकेपुरम थाना पुलिस भी मौके पर पहुंच गई। पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ मामला दर्ज कर बच्ची के परिजनों की तलाश में जुट गई है।</p>
<p><strong>Read More: <a href="http://theinsidestories.in/index.php/2020/10/26/kota-nagar-nigam-election-3/">मतदान केन्द्र पर रहेगी साबुन व सैनेटाइजर की व्यवस्था</a></strong></p>
<p><strong>आश्रय स्थल में मिलेगा आसरा</strong></p>
<p>अजमेरा ने बताया कि नवजात को फिलहाल उपचार के लिए जेके लोन अस्पताल में रखा गया है। घटना की पूरी जानकारी बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष को दे दी है। अध्यक्ष ने नवजात को करणी नगर स्थित आश्रय स्थल में रखने के आदेश दिए है। नवजात को दो दिनों बाद आश्रय स्थल भेज दिया जाएगा।</p>
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