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	<title>Art &amp; Culture Archives - TIS Media</title>
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		<title>जन आस्थाओं का संरक्षक और कवि की सामर्थ्य का प्रतिमान है रामचरित मानस: अतुल कनक</title>
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		<pubDate>Sat, 02 Apr 2022 12:40:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>हर वर्ष शारदीय और चैत्र नवरात्रि पर मौन रहता हूँ। मौन के दौरान मन में संवाद की चाह भी नहीं रहे, यही कोशिश करता हूँ। हालांकि मौन वाणी पर नियंत्रण का तप है, विचारों पर तो नियंत्रण पाना सामान्य गृहस्थ के लिए बहुत दुरूह है। ऐसा होना चाहिए, पर हो नहीं पाता। इधर, पिछले कुछ &#8230;</p>
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				<h4>अतुल कनक </h4>राजस्थानी भाषा के विख्यात साहित्यकार हैं। इनके द्वारा रचित एक उपन्यास जूण–जातरा के लिये उन्हें सन् 2011 में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्हें राजस्थानी भाषा के प्रतिष्ठित बैजनाथ पंवार पुरस्कार से भी सम्मानित किया जा चुका है। राजस्थान की माध्यमिक कक्षाओं में उनके लिखे लेख विद्यार्थियों को पढ़ाए जाते हैं। मंचीय कविता पाठ के लिए देश भर में खासे विख्यात हैं। इतना ही नहीं समसामयिक विषयों पर उनके लेख निरंतर देश के प्रमुख पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं।
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<p>हर वर्ष शारदीय और चैत्र नवरात्रि पर मौन रहता हूँ। मौन के दौरान मन में संवाद की चाह भी नहीं रहे, यही कोशिश करता हूँ। हालांकि मौन वाणी पर नियंत्रण का तप है, विचारों पर तो नियंत्रण पाना सामान्य गृहस्थ के लिए बहुत दुरूह है। ऐसा होना चाहिए, पर हो नहीं पाता। इधर, पिछले कुछ समय से यह भी कर रहा हूँ कि हर शनिवार किसी पुस्तक के बारे में कुछ लिखता हूँ। जीवन कई बार आपके संकल्पों को ही परस्पर विरोधी बना देता है। इन्हीं विरोधों पर विजय की सार्थक चेतना जुटाने के लिए ही तो हम मन को अलग अलग व्रतों से साधते हैं।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/mahadevi-verma-hindi-poetry/11762/">महादेवी वर्माः पंथ होने दो अपरिचित, हुए शूल अक्षत, सब बुझे दीपक जला लूँ ! पढ़िए, 51 महान कविताएं</a></strong></p>
<p>यह हो सकता था कि मैं आज किसी पुस्तक के बारे में नहीं लिखता। लेकिन मुझे यह उचित प्रतीत नहीं हुआ। फिर सोचा चैत्र नवरात्र में हमारे यहाँ रामचरित मानस के पारायण की एक पुष्ट परंपरा रही है- क्यों न आज उसी के बारे में बात की जाए। रामकथा का उत्स वाल्मीकि की रामायण से माना जाता है। तमसा नदी के तट पर ऋषि भारद्वाज के साथ आए हुए वाल्मीकि ने क्रौंच पक्षी के प्रेम और फिर विरह पीड़ा से साक्षात किया और कुछ दिनों तक एक विकलता से व्यतीत होने के बाद रामायण नामक उस विलक्षण काव्य का प्रतिपादन किया जिसमें 24 हजार श्लोक, पाँच सौ सर्ग और 6 काण्ड हैं । यह रचना तब पूर्ण हुई थी जब राम ने वन से लौटकर राज्य का शासन अपने हाथ में ले लिया था &#8211; &#8220;प्राप्तराजस्व रामस्य वाल्मीकिर्भगवानृषि:/ चकार चरितं कृतनं विचित्रपदमर्थवत्।।&#8221; इस महाकाव्य को पौलस्त्य वध या दशानन वध भी कहा गया है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/munshi-premchand-story-shankhnad-tis-media/10215/">शंखनाद: मुंशी प्रेमचंद की बयानी मुखिया भानु चौधरी के घर की कहानी&#8230;</a></strong></p>
<p>तुलसी ने जब रामचरितमानस का प्रणयन किया, उस समय भारत के अधिकांश हिस्से पर मुगलों का शासन था। लंबे समय से विदेशी आक्रांताओं के अधीन रहने के कारण समाज में सनातन परंपरा कई चुनौतियों का सामना कर रही थी। मान्यताएं कहती हैं कि तुलसी अपनी पत्नी से झिड़की मिलने के बाद भक्ति की ओर प्रवृत्त हुए थे। चूकि जन आस्थाओं ने राम कथा में कई प्रसंग जोड़ दिए थे, इसलिए वाल्मीकि की रामकथा और तुलसी की रामकथा में कुछ अंतर मिलता है। मसलन- वाल्मीकी ने सीता स्वयंवर का उल्लेख नहीं किया।जब स्वयंवर हुआ ही नहीं तो राजसभा में लक्ष्मण और परशुराम के मध्य उग्र संवाद कहाँ से होता? वाल्मीकी के अनुसार परशुराम शिवधनुष भंग होने के कारण क्षोभ में तो थे लेकिन वो राम- लक्ष्मण से उस समय वन में मिले थे जब विवाह के बाद दशरथ के साथ सब लोग अयोध्या जा रहे थे।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः<a href="https://tismedia.in/knowledge/do-you-know/know-who-was-the-real-turram-khan/10920/"> खुद को बड़ा तुर्रम खां समझते हो, जानिए आखिर कौन थे असली तुर्रम खां?</a></strong></p>
<p>लेकिन तुलसी की शब्द साधना की शक्ति ही कहा जाना चाहिए कि मूल कथा से इत्र जाकर भी उन्होंने जो कुछ लिखा, वही जन- जन का विश्वास हो गया। इसका एक बड़ा कारण यह भी हो सकता है कि तुलसी ने आम आदमी की भाषा में अपनी बात कही और लोक अपनी भाषा में कही गई सार्थक बातों को बहुत स्नेह और सम्मान से सहेजता है। यह तुलसी की साधना का ही कमाल है कि उनकी लिखी कई पंक्तियों के बारे में ज्योतिष कहते हैं कि उनका निरंतर जप करने से मनोवांछित फल मिलते हैं। तुलसी सब देवताओं, गुरू की आराधना करने के बाद कहते हैं &#8211; &#8220;बिनु सतसंग बिबेक न होंई, राम कृपा बिनु सुलभ न सोई/ सतसंगत मुद मंगल मूला, सोइ फल सिधि सब साधन फूला।&#8221;</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/editorial/article/how-was-the-goonda-act-made-in-india/10308/">कौन है गुंडा? कैसे बना गुंडा एक्ट? जानिए हैरतंगेज हकीकत</a></strong></span></p>
<p>रामचरित मानस का सबसे अद्भुत पक्ष यह है कि यह बहुत कुशलता से जीवन के महत्वपूर्ण सूत्रों से हमारा परिचय कराता है- &#8220;गुन अवगुन जानत सब कोई, जो जेहि भाव नीक तेहि सोई &#8221; और &#8220;अब मोहि भा भरोस हनुमंता/ बिनु हरि कृपा मिलेहिं न संता&#8221; या &#8220;जाको प्रभु दारुण दुख देहि, ताकी मति पहले हर लेहि&#8221; जैसे कितने ही सूत्र वाक्य रामचरितमानस में पाठक के चिंतन की देहरी पर दस्तक देते हैं। मानस की रचना का प्रस्थान बिंदु यह विश्वास है &#8211; &#8220;जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि/ बंदऊं सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि।&#8221; कवि की विनम्रता देखिए कि वो कहता है- मेरी कविता भद्दी है, लेकिन इसमें रामकथा होने के कारण यह अच्छी समझी जाएगी &#8211; &#8220;भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी/ राम कथा जग मंगल करनी।&#8221; लेकिन काव्य के प्रारंभ में ही वो उन लोगों को कोसने से भी नहीं चूकते, जो लोगों की धार्मिक आस्थाओं का उपयोग अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए करते हैं &#8211; &#8220;बंचक भगत कहाइ राम के, किंकर कंचन कोह काम के/ तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी, धींग धरमध्वज धंधक धोरी।&#8221; इन पंक्तियों में आया अनुप्रास तुलसी की शब्द साधना का प्रमाण है।</p>
<p><b>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/knowledge/do-you-know/know-who-was-the-real-turram-khan/10920/">खुद को बड़ा तुर्रम खां समझते हो, जानिए आखिर कौन थे असली तुर्रम खां?</a></b></p>
<p>किसी कवि की शब्द सामर्थ्य और थोड़े में बहुत कुछ कह देने की क्षमता देखनी हो तो रामचरित मानस का अध्ययन जरूर किया जाना चाहिए। यदि लोक में आज भी यह विश्वास कायम है कि रामकथा कलि कलुष विभंजनि &#8221; या &#8220;रामकथा कलि कामद गांव &#8221; तो उस विश्वास को बनाए रखने में तुलसी का बहुत बड़ा योगदान है। आज भी यह विश्वास बहुत आम है कि सुंदरकांड के पारायण से व्यक्ति के जीवन को आकस्मिक संकटों से मुक्ति मिलती है। कविता, मंत्र, पूजा, ज्योतिष- इन सबका सबसे सार्थक रूप यही है कि वो लोगों में चुनौतियों का सामना सकारात्मकता से करने का संकल्प जगाएं और रामचरित मानस ने जिस तरह से कविता के प्रति समाज की इस आस्था को थाम रखा है, वैसे उदाहरण बिरले ही मिलेंगे।</p>
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		<title>Valentines Day: अमर प्रेम की निशानी &#8216;ढोला मारू&#8217;, राजस्थान में आज भी गाए जाते हैं इनके प्रेमगीत</title>
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		<pubDate>Mon, 14 Feb 2022 07:24:59 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>TISMedia@Kota दुनिया में कई ऐसी प्रेम कहानियां हैं, जो आज भी मशहूर हैं. हीर-राझां से लेकर लैला मजनूं और रोमियो जूलियट तक इन कहानियों ने हर पीढ़ी के लोगों को प्यार की नई परिभाषा समझाई है. ऐसी ही एक खास प्रेम कहानी है ढोला मारू की. यह प्रेम कहानी मूल रूप से राजस्थान की है. &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/history-and-culture/valentines-day-love-story-of-dhola-maru-of-rajasthan/11650/">Valentines Day: अमर प्रेम की निशानी &#8216;ढोला मारू&#8217;, राजस्थान में आज भी गाए जाते हैं इनके प्रेमगीत</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ff0000;"><strong>TISMedia@Kota</strong></span> दुनिया में कई ऐसी प्रेम कहानियां हैं, जो आज भी मशहूर हैं. हीर-राझां से लेकर लैला मजनूं और रोमियो जूलियट तक इन कहानियों ने हर पीढ़ी के लोगों को प्यार की नई परिभाषा समझाई है. ऐसी ही एक खास प्रेम कहानी है ढोला मारू की. यह प्रेम कहानी मूल रूप से राजस्थान की है. आज भी यहां के लोकगीतों में इस कहानी का जिक्र मिलता है.</p>
<p>इस कहानी के अनुसार नरवर के राजा नल के बेटे साल्हकुमार की शादी 3 साल की उम्र में बीकानेर के पंवार राजा पिंगल की बेटी से हुई थी. यह बाल विवाह था इसलिए उस वक्त गौना नहीं करवाया गया. अब जब राजकुमार बड़ा हुआ तो उसकी दूसरी शादी करवा दी गई, मगर वह राजकुमारी अब भी गौने के इंतजार में थी. राजकुमारी बड़ी होकर बेहद सुंदर और आकर्षक दिखाई देती थी. राजा पिंगल ने अपनी बेटी के ससुराल उसे लिवा ले जाने के लिए कई संदेश भेजे, लेकिन राजकुमार की दूसरी पत्नी वहां से आने वाले हर संदेश वाहक की हत्या कर देती थी. राजकुमार अपने बचपन की शादी को भूल चुका था, दूसरी रानी यह बात जानती थी. उसे डर था कि राजकुमार सब याद आते ही उसे छोड़कर पहली रानी के पास चले जाएंगे जो कि बहुत खूबसूरत है.</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>इंतजार करती रही पहली रानी</strong></span><br />
पहली रानी को इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी, वह अक्सर राजकुमार को याद किया करती थी. बेटी की इस हालत को देखकर उसके पिता ने चतुर ढोली को नरवर भेजा. जब ढोली नरवर रवाना हो रहा था, तब राजकुमारी ने उसे अपने पास बुलाकर मारू राग में दोहे बनाकर दिए और उसे बताया कि कैसे राजकुमार के पास जाकर ये गाकर सुनाना है. चतुर ढोली एक याचक बनकर नरवर महल पहुंचा. रात में बारिश हुई और उसने ऊंची आवाज में मल्हार राग गाना शुरू कर दिया. ये राग इतना मधुर था कि राजकुमार भी उसे सुनने के लिए नींद से जाग गया. जब उसे गाते हुए राजकुमार ने राजकुमारी का नाम सुना तो उसे अपनी पहली शादी की याद आ गई.</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>दोहे लिखकर पहुंचाया संगीत से सजा संदेश</strong></span><br />
जब सुबह राजकुमार ने उसे बुलाकर इस बारे में पूछा तो उसने राजकुमारी का पूरा संदेश सुनाया. आखिर में साल्हकुमार ने अपनी पहली पत्नी को लाने का निश्चय कर लिया. उसकी दूसरी पत्नी ने उसे रोक दिया. राजकुमार जब भी पहली रानी के पास जाने की कोशिश करता, दूसरी पत्नी उसे रोक देती. एक दिन मौका पाकर जब राजकुमार पिंगल पहुंचा तो राजकुमारी अपने प्रियतम राजकुमार को देख खुशी से झूम उठी. दोनों ने कई दिन साथ में बिताए. इसके बाद ऊंट पर बैठकर दोनों नरवर लौटने लगे.</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">खत्म नहीं हुईं मुश्किलें</span></strong><br />
फिर भी उनकी मुश्किल आसान नहीं थी. रास्ते में उनका सामना उमरा-सुमरा सें हुआ, जो साल्हकुमार को मारकर राजकुमारी को हासिल करना चाहता था. रास्ते में उमरा-सुमरा ने जाल बिछाकर उन्हें रोक लिया, मगर फिर से ढोली ने गाना गाया. इस गाने में बताया कि उमरा-सुमरा राजकुमार को मारने वाला है. इसके बाद राजकुमारी ने राजकुमार को उस चंगुल से बचाया. कहा जाता है कि रास्ते में राजकुमारी को सांप ने काट लिया था, लेकिन फिर शिव-पार्वती के आशीर्वाद से सांप भी उनके प्यार का कुछ नहीं बिगाड़ पाया. ऐसे कई मुश्किलों का सामना करते हुए राजकुमार ने राजकुमारी का हासिल कर लिया.अब इस कहानी को ही राजस्थान में ढोला मारू की कहानी कहा जाता है और यह काफी प्रचलित है.</p>
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		<title>रंगभेद से इस्लाम भी मुक्त नहीं है, बस इसी गुत्थी को सुलझाना अब्दुल रज्जाक की कृति का मूलाधार</title>
		<link>https://tismedia.in/editorial/article/k-vikram-rao-analyzing-the-journey-of-abdul-razak-gurnah-wins-the-2021-nobel-prize-in-literature/10857/?utm_source=rss&#038;utm_medium=rss&#038;utm_campaign=k-vikram-rao-analyzing-the-journey-of-abdul-razak-gurnah-wins-the-2021-nobel-prize-in-literature</link>
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		<pubDate>Fri, 08 Oct 2021 16:02:33 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>इस वर्ष के साहित्यवाले नोबेल पारितोष से नवाजे गये अश्वेत अफ्रीकी प्रोफेसर अब्दुल रज्जाक गुर्नाह के माध्यम से विश्व के आमजन की विपदा पर मनन होगा। विषय है : विस्थापित, निष्कासित, शरणार्थी, पलायन कर रहे लोग, (काबुल, म्यांमार, हांगकांग के ताजा संदर्भ में)। अपनी किशोरावस्था में अब्दुल रज्जाक स्वभूमि जंजीबार द्वीप में नस्ली उथल—पुथल से &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/k-vikram-rao-analyzing-the-journey-of-abdul-razak-gurnah-wins-the-2021-nobel-prize-in-literature/10857/">रंगभेद से इस्लाम भी मुक्त नहीं है, बस इसी गुत्थी को सुलझाना अब्दुल रज्जाक की कृति का मूलाधार</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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<div class="o9v6fnle cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q">
<div dir="auto">इस वर्ष के साहित्यवाले नोबेल पारितोष से नवाजे गये अश्वेत अफ्रीकी प्रोफेसर अब्दुल रज्जाक गुर्नाह के माध्यम से विश्व के आमजन की विपदा पर मनन होगा। विषय है : विस्थापित, निष्कासित, शरणार्थी, पलायन कर रहे लोग, (काबुल, म्यांमार, हांगकांग के ताजा संदर्भ में)। अपनी किशोरावस्था में अब्दुल रज्जाक स्वभूमि जंजीबार द्वीप में नस्ली उथल—पुथल से उत्पीड़ित हो चुके थे। गोरे अरब मुसलमानों द्वारा समधर्मी अश्वेतों (हब्शी) को संतप्त करना उनकी एक विषादभरी प्रतीति थी। हालांकि इस्लाम समतामूलक मजहब है, जहां कलमा पढ़ते ही सब समान हो जाते हैं। हिन्दुओं जैसा भेदभाव नहीं। पर यह सरासर झूठ निकला। त्वचा के रंगभेद से इस्लाम भी मुक्त नहीं है। बस इसी गुत्थी को सुलझाना ही अब्दुल रज्जाक की कृति का मूलाधार रहा।</div>
</div>
</div>
</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">फिलवक्त प्रोफेसर अब्दुल रज्जाक को जानकर उनकी मातृभूमि जंजीबार (तंगानियाका) और भारत के अत्यन्त आत्मीय प्रसंग अनायास मस्तिष्क पटल पर उभर आतें हैं। पड़ोसी राष्ट्र रहे तंगानियाका और द्वीप राष्ट्र जंजीबार दो सदियों के बाद यूरोपीय साम्राज्यवादियों से स्वतंत्र होकर तंजानिया नामक गणराज्य बने थे। तब राष्ट्रपति जूलियस नेरेरे की रहनुमाई में भारत का वह प्रगाढ़ मित्र बना था। नेरेरे &#8221;अफ्रीकी गांधी&#8221; कहलाये। अंहिसा के अनन्य आराधक राष्ट्रपति नेरेरे कई मायनों में नेलसन मण्डेला से भी अधिक वरीय रहे। महात्मा गांधी शांति पुरस्कार और नेहरु एवार्ड से भारत द्वारा सम्मानित नेरेरे अफ्रीकी स्वाधीनता क्रान्ति के सृजक रहे। उनका राष्ट्रीय चिंतन था &#8221;उजामा&#8221; (देश एक ही परिवार)। किन्तु यह भारत में प्रचलित विकृति (वंशवाद) जैसी नहीं है। समतावादी समाज का पर्याय बना। नेरेरे की इसी उक्ति से प्रोफेसर अब्दुल रज्जाक अनुप्राणित रहे। वे कहते थे : &#8221;गरीबी से भागना शिक्षा का लक्ष्य नहीं है। गरीबी से लड़ना है।&#8221; उसी दौर में &#8221;गरीबी हटाओ&#8221; के नारे पर इन्दिरा गांधी पांचवीं लोकसभा (1971) का चुनाव लड़ रहीं थीं। जब वे राजधानी दारे सलाम गयीं थीं तो राष्ट्रपति नेरेरे ने भारतीय प्रधानमंत्री को मोर—मोरनी का जोड़ा भेंट दिया था। नेरेरे और प्रो. अब्दुल रज्जाक दोनों अश्वेत थे पर उनका धर्म पृथक था। ईसाई और इस्लाम।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">अपनी पुरस्कृत रचना &#8221;पेराडाइज&#8221; (बहिश्त) में अब्दुल रज्जाक इस्लाम के दूसरे पहलू पर भी गौर करते हैं। वे सैटानिक वर्सेज के लेखक सलमान रश्दी के साथी रहे। उनके उपन्यास का पात्र अजीज चाचा अपने सगे भतीजे यूसुफ को एक व्यापारी के पास रेहन रख देता है क्योंकि उसका उधार वह चुका नहीं पाया था। वह सौदागर भी सूद की राशि का भुगतान होने तक इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लेता है। जबकि इस्लाम में व्याज लेना गुनाह है। इसीलिये नेक मुसलमान बैंक खातों में जमा राशि पर सूद भी नकारते हैं। इतनी ऊंचाई छूने के बाद भी अब्दुल रज्जाक अपनी जन्मभूमि जंजीबार में पर्याप्त प्रतिष्ठा, सम्मान और पहचान नहीं हासिल कर पाये। उनकी भांजी अभी तंजानिया के शिक्षा मंत्री की बीवी है। पर अब्दुल रज्जाक की पुस्तकें वहां प्रसारित नहीं हुईं हैं।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto">यह नोबेल विजेता उल्लेख भी करता रहा कि तंजानिया और भारत का अतीत यूरोपीय साम्राज्यवादियों से ग्रसित रहा। जब पुर्तगाल सम्राट ने गोवा कब्जियाया था उसी कालखण्ड में जंजीबार—तंगानियका को भी उसने अपना उपनिवेश बनाया था। पुर्तगाली, फ्रांसीसी, फिर अंग्रेज बारी—बारी से इन भूस्थलों का औपनिवेशक शोषण करते रहे। प्रथम विश्व युद्ध (1914) में जर्मन सम्राट कैसर विल्हेम ने भी इस द्वीप राष्ट्र को अपना गुलाम बनाया था। शोषण किया था। तब भारत बच गया था।</div>
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<div class="o9v6fnle cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q">
<div dir="auto">प्रोफेसर अब्दुल रज्जाक गुर्नाह के इंग्लैण्ड के कैन्ट विश्वविद्यालय में उत्तर—उपनिवेश युग के साहित्य के निष्णात हैं। उनकी डाक्टरेट का विषय भी अंग्रेजी साहित्य की इसी विधा पर है। भारत भी ब्रिटिश उपनिवेश रहा तो था, इसीलिये स्वातंत्र्योत्तर इंग्लिश साहित्य के कई भारतीय लेखक रहे। जैसे आरके नारायण (गाइड, उपन्यास के रचयिता), रवीन्द्रनाथ ठाकुर, विक्रम सेठ, राजा राव, भवानी भट्टाचार्य, मुल्कराज आनन्द, अनिता देसाई, मनोहर मलगांवकर, चेतन भगत आदि। इसी प्रकार राष्ट्रमंडल देशों में कनाडा, आस्ट्रेलिया, जमाइका आदि में भारतीय मूल के लेखक रहे हैं। अर्थात गैरब्रिटिश इंग्लिश लेखकों का अब अलग वैश्विक समाज है। प्रो. अब्दुल रज्जाक को उनमें शीर्ष पद मिल गया है। भारत के साहित्य प्रेमियों को इस उपलब्धि पर गर्व होगा।</div>
<div dir="auto"></div>
<div dir="auto"><span style="color: #000000;"><strong>(<span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://tismedia.in/">TIS Media</a></span> परिवार के संरक्षक<span style="color: #ff0000;"> <a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के. विक्रम राव</a> </span>का शुमार देश के नामचीन पत्रकारों में होता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उन्होंने इमरजेंसी तक में स्वतंत्र आवाज के लिए जेल यात्रा की। महीनों की सजाएं भुगती। श्री राव,  वॉयस ऑफ अमेरिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनोमिक टाइम्स, फिल्मफेयर और इलस्ट्रेटेड वीकली में प्रमुख पदों पर रहने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड के संस्थापक संपादक भी रह चुके हैं। प्रेस की नियामक संस्था &#8216;भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य रहने के अलावा मजीठिया वेतन बोर्ड और मणिसाना वेतन बोर्ड के सदस्य के तौर पर पत्रकारों के हित में लंबा संघर्ष किया है। <span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के.विक्रम राव</a>,</span> फिलहाल इंडियन फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट <span style="color: #ff0000;">#IFWJ</span> के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)</strong></span></div>
</div>
<div class="o9v6fnle cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q">
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</div>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/k-vikram-rao-analyzing-the-journey-of-abdul-razak-gurnah-wins-the-2021-nobel-prize-in-literature/10857/">रंगभेद से इस्लाम भी मुक्त नहीं है, बस इसी गुत्थी को सुलझाना अब्दुल रज्जाक की कृति का मूलाधार</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>आजादी की अमृत महोत्सवः कोटा में शान से फहरा तिरंगा, उल्लास के साथ मनाया आजादी का जश्न</title>
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		<pubDate>Sun, 15 Aug 2021 15:44:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>कोरोना गाइड लाइन की पालना के साथ आयोजित हुए समारोह  जिला प्रशासन ने 50 लोगों को जिला स्तरीय समारोह में किया सम्मानित  TISMedia@Kota कोटा में 75 वां स्वाधीनता दिवस समारोहपूर्वक मनाया गया। जिला स्तरीय मुख्य समारोह महाराव उम्मेदसिंह स्टेडियम मे आयोजित हुआ, जिसमें मुख्य अतिथि संभागीय आयुक्त कैलाशचंद मीणा ने ध्वजारोहण किया। रविवार को शहर &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/rajasthan/kota-news/kota-celebrate-75th-independence-day/10397/">आजादी की अमृत महोत्सवः कोटा में शान से फहरा तिरंगा, उल्लास के साथ मनाया आजादी का जश्न</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<ul>
<li><span style="color: #ff0000;"><strong>कोरोना गाइड लाइन की पालना के साथ आयोजित हुए समारोह </strong></span></li>
<li><span style="color: #ff0000;"><strong>जिला प्रशासन ने 50 लोगों को जिला स्तरीय समारोह में किया सम्मानित </strong></span></li>
</ul>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>TISMedia@Kota</strong></span> कोटा में 75 वां स्वाधीनता दिवस समारोहपूर्वक मनाया गया। जिला स्तरीय मुख्य समारोह महाराव उम्मेदसिंह स्टेडियम मे आयोजित हुआ, जिसमें मुख्य अतिथि संभागीय आयुक्त कैलाशचंद मीणा ने ध्वजारोहण किया। रविवार को शहर से लेकर गांवों तक स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव का जमकर उल्लास मनाया गया।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="size-full wp-image-10399 aligncenter" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/lok-sabha-speaker-om-birla-independence-day.jpg" alt="Independence Day Celebrations, Independence Day Celebrations in Kota, Azadi Ka Amrit Mahotsav, 75th Independence Day, Kota News, Latest News Kota, Hindi News Kota, TIS Media" width="650" height="400" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/lok-sabha-speaker-om-birla-independence-day.jpg 650w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/lok-sabha-speaker-om-birla-independence-day-300x185.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 650px) 100vw, 650px" /></p>
<p>लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने 75वें स्वाधीनता दिवस की देशवासियों को शुभकामनाएं दी। उन्होंने कहा कि आजादी का अमृत महोत्सव मनाते हुए हम नए भारत के निर्माण की दिशा में नवीन लक्ष्य तय करें। हमारे संकल्प में राष्ट्रहित प्रथम व देशवासियों के कल्याण का भाव हो, हमारा प्रत्येक कदम देश को विकास की ओर अग्रसर करे।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="size-full wp-image-10400 aligncenter" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/independence-day-celebration-kota-police.jpg" alt="Independence Day Celebrations, Independence Day Celebrations in Kota, Azadi Ka Amrit Mahotsav, 75th Independence Day, Kota News, Latest News Kota, Hindi News Kota, TIS Media" width="700" height="547" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/independence-day-celebration-kota-police.jpg 700w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/independence-day-celebration-kota-police-300x234.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 700px) 100vw, 700px" /></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>जिले भर में रहा खासा उल्लास </strong></span><br />
कोटा में 75 वें स्वाधीनता दिवस के मौके पर आयोजित होने वाले समारोहों की धूम रही। मुख्य कार्यक्रम महाराव उम्मेद सिंह स्टेडियम में आयोजित किया गया। जहां संभागीय आयुक्त कैलाशचंद मीणा सुबह 9 बजकर 05 मिनट पर शहीद स्मारक पहुंचे और शहीदों को नमन किया। इसके बाद प्रातः 9ः15 बजे ध्वजारोहण कर परेड़ का निरीक्षण किया। कम्पनी कमाण्डर युवराज सोनीगरा के नेतृत्व में राजस्थान पुलिस, आरएसी एवं होमगार्ड की टुकडी ने ध्वज सलामी दी। शहर पुलिस की टुकड़ी का नेतृत्व सब इंस्पेक्टर दुर्गाशंकर, ग्रामीण महिला पुलिस की टुकड़ी का नेतृत्व सब इंस्पेक्टर कौशल्या, आरएसी की टुकड़ी का नेतृत्व प्लाटून कमांडर भंवरलाल एवं गृह रक्षा दल की टुकड़ी का नेतृत्व कम्पनी कमांडर महेन्द्र सिंह नरूका ने किया। राजस्थान पुलिस एवं आरएसी के संयुक्त बैंड ने जब राष्ट्रीय गान की स्वर लहरियां बिखेरी तो पूरा स्टेडियम उल्लास से भर उठा।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="size-full wp-image-10401 aligncenter" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/independence-day-celebration-kota.jpg" alt="Independence Day Celebrations, Independence Day Celebrations in Kota, Azadi Ka Amrit Mahotsav, 75th Independence Day, Kota News, Latest News Kota, Hindi News Kota, TIS Media" width="700" height="338" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/independence-day-celebration-kota.jpg 700w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/independence-day-celebration-kota-300x145.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 700px) 100vw, 700px" /></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने मोहा मन </strong></span><br />
समारोह में महामहिम राज्यपाल के संदेश का पठन अतिरिक्त कलक्टर प्रशासन राजकुमार सिंह द्वारा किया गया। समारोह में कोरोना रोकथाम एवं जागरूकता में सराहनीय कार्य करने पर नगर निगम उत्तर आयुक्त वासुदेव मालावत को राज्य स्तरीय प्रशस्ति पत्र प्रदान किया गया, साथ ही जिला स्तर की 50 प्रतिभाओं को प्रतीक चिन्ह एवं प्रमाण पत्र देकर सम्मानित किया गया। समारोह में जन सम्पर्क विभाग एवं शिक्षा विभाग द्वारा तैयार कराये गये कोरोना जागरूकता पर आधारित, वैक्सीनेशन, चिरंजीवी योजना एवं गतिमान राजस्थान पर आधारित ‘‘कण-कण सूं गूंजे जय-जय राजस्थान’’ सांस्कृतिक लोक नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति दी गई। कार्यक्रम राष्ट्रगान के साथ सम्पन्न हुआ तथा संचालन नीता डांगी व पुरूषोत्तम शर्मा द्वारा किया गया।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="size-full wp-image-10402 aligncenter" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/tis-media-independence-daycelebration.jpg" alt="Independence Day Celebrations, Independence Day Celebrations in Kota, Azadi Ka Amrit Mahotsav, 75th Independence Day, Kota News, Latest News Kota, Hindi News Kota, TIS Media" width="700" height="324" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/tis-media-independence-daycelebration.jpg 700w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/tis-media-independence-daycelebration-300x139.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 700px) 100vw, 700px" /></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>धूमधाम से हुआ ध्वजारोहण </strong></span><br />
इस अवसर पर महानिरीक्षक पुलिस कोटा रेंज रविदत्त गौड़़, जिला कलक्टर उज्ज्वल राठौड़, पुलिस अधीक्षक शहर डॉ. विकास पाठक, अतिरिक्त कलक्टर शहर डॉ. महेन्द्र लोढ़ा, आयुक्त नगर निगम कोटा उत्तर वासुदेव मालावत, कोटा दक्षिण कीर्ति राठौड़, सचिव नगर विकास न्यास राजेश जोशी, सीईओ जिला परिषद ममता तिवाडी, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक शहर प्रवीण जैन, मुख्यालय राजेश मील, ग्रामीण पारस जैन सहित विभिन्न विभागों के अधिकारीगण, जनप्रतिनिधिगण गणमान्य नागरिक मौजूद रहे। 75 वें स्वाधीनता दिवस पर कोरोना की गाइड लाईन की पालना करते हुए विभिन्न कार्यालयों में ध्वजारोहण किया गया। सीएडी में संभागीय आयुक्त कैलाशचंद मीणा, कलेक्ट्रेट कार्यालय पर जिला कलक्टर उज्ज्वल राठौड़, नगर निगम कोटा उत्तर कार्यालय में महपौर मंजू मेहरा, कोटा दक्षिण नगर निगम कार्यालय में महापौर राजीव अग्रवाल ने ध्वाजारोहण किया।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="size-full wp-image-10403 aligncenter" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/tismedia.in-independence-daycelebration.jpg" alt="Independence Day Celebrations, Independence Day Celebrations in Kota, Azadi Ka Amrit Mahotsav, 75th Independence Day, Kota News, Latest News Kota, Hindi News Kota, TIS Media" width="606" height="322" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/tismedia.in-independence-daycelebration.jpg 606w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/tismedia.in-independence-daycelebration-300x159.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 606px) 100vw, 606px" /></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>कोरोना गाइडलाइन की हुई पूरी पालना </strong></span><br />
नगर विकास न्यास कार्यालय में अध्यक्ष एवं जिला कलक्टर उज्ज्वल राठौड़, पुलिस अधीक्षक शहर कार्यालय में पुलिस अधीक्षक शहर डॉ. विकास पाठक ने, ग्रामीण कार्यालय में पुलिस अधीक्षक ग्रामीण शरद चौधरी ने, जिला परिषद में सीईओ ममता तिवाड़ी, मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय में सीएमएचओ डॉ भूपेन्द्र सिंह तंवर, समाज कल्याण में उप निदेशक ओम प्रकाश तोषनीवाल, सूचना एवं जनसम्पर्क कार्यालय में उप निदेशक हरिओम सिंह गुर्जर ने ध्वजारोहण कर सभी को स्वाधीनता दिवस की बधाई और शुभकामनाऐं दी। इसी प्रकार सभी उपखण्ड मुख्यालयों पर उपखण्ड अधिकारियों द्वारा ध्वजारोहण कर कोरोना की गाइड लाइन की पालना करते हुए समारोह पूर्वक 75 वां स्वाधीनता दिवस मनाया।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="size-full wp-image-10404 aligncenter" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/independence-day-celebration.jpg" alt="Independence Day Celebrations, Independence Day Celebrations in Kota, Azadi Ka Amrit Mahotsav, 75th Independence Day, Kota News, Latest News Kota, Hindi News Kota, TIS Media" width="700" height="864" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/independence-day-celebration.jpg 700w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/independence-day-celebration-243x300.jpg 243w" sizes="auto, (max-width: 700px) 100vw, 700px" /></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>कच्ची बस्तियों में भी मची धूम </strong></span><br />
कोटा के सामाजिक संगठनों, राजनीतिक दलों एवं व्यापारिक समूहों के साथ-साथ समाजसेवियों एवं आम जनमानस ने भी आजादी का अमृत महोत्सव धूमधाम से मनाया। निजी प्रतिष्ठानों पर ध्वजारोहण किए गए। गली मुहल्लों में बच्चे और बुजुर्गों के साथ आजादी का जश्न मनाया गया। सोसायटी हैज ईव की ओर से पौधारोपण किया गया। रॉबिन हुड आर्मी ने कच्ची बस्ती के बच्चों के साथ धूमधाम से आजादी का जश्न मनाया। बघेरवाल फोर सीजन कॉमर्शियल कांप्लेक्स में भी स्वतंत्रता दिवस समारोह धूमधाम से मनाया गया। इस मौके पर स्वच्छता एवं पर्यावरण संरक्षण के लिए होम्योपैथिक चिकित्सक डॉ. गुनवंत सिंह एवं अनिल नैयर को सम्मानित किया गया। इस मौके पर कॉम्पलेक्स के सफाई एवं सुरक्षाकर्मियों को भी सम्मानित किया गया।</p>
<figure id="attachment_10398" aria-describedby="caption-attachment-10398" style="width: 936px" class="wp-caption alignnone"><img loading="lazy" decoding="async" class="size-full wp-image-10398" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/independence-day.jpg" alt="independence day celebration" width="936" height="504" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/independence-day.jpg 936w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/independence-day-300x162.jpg 300w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/independence-day-768x414.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 936px) 100vw, 936px" /><figcaption id="caption-attachment-10398" class="wp-caption-text">सामाजिक क्षेत्रों में विशेष योगदान देने पर बघेरवाल फोर सीजन कॉम्पलेक्स में सम्मानित किए गए समाजसेवी।</figcaption></figure>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/rajasthan/kota-news/kota-celebrate-75th-independence-day/10397/">आजादी की अमृत महोत्सवः कोटा में शान से फहरा तिरंगा, उल्लास के साथ मनाया आजादी का जश्न</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>सुनो! मौका देकर तो देखो&#8230; जज साहब, मैं तुम्हें भी बम बनाना सिखा सकता हूं&#8230;</title>
		<link>https://tismedia.in/editorial/article/story-of-youngest-martyr-of-indian-independence-movement-khudiram-bose/10330/?utm_source=rss&#038;utm_medium=rss&#038;utm_campaign=story-of-youngest-martyr-of-indian-independence-movement-khudiram-bose</link>
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		<pubDate>Wed, 11 Aug 2021 11:31:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>13 जून, 1908&#8230; मुजफ्फरपुर कोर्ट&#8230;! कटघरे में खड़ा खूबसूरत नौजवान अचानक मुस्कुरा उठा। फैसला सुना रहा जज कॉर्न डफ भौंचक्का रह गया। उसे लगा कि शायद धोती कुर्ता पहने हिंदुस्तानी को अंग्रेजी समझ नहीं आई, इसीलिए फांसी का फैसला सुनकर मारे खौफ के गश खाकर गिरने के बजाय इसे हसी-ठिठोली सूझ रही है। जज कॉर्न &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/story-of-youngest-martyr-of-indian-independence-movement-khudiram-bose/10330/">सुनो! मौका देकर तो देखो&#8230; जज साहब, मैं तुम्हें भी बम बनाना सिखा सकता हूं&#8230;</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<figure id="attachment_10332" aria-describedby="caption-attachment-10332" style="width: 224px" class="wp-caption alignleft"><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-10332" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/tismedia.in_.jpg" alt="Khudiram Bose, Indian revolutionary from Bengal Presidency,  British rule of India, Muzaffarpur Conspiracy Case, Prafulla Chaki,  Indian Independence Movement, British judge Magistrate Douglas Kingsford,  Medinipur district Bengal, TIS Media" width="224" height="366" /><figcaption id="caption-attachment-10332" class="wp-caption-text">खुदीराम बोस।</figcaption></figure>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">13 जून, 1908&#8230;</span></strong> मुजफ्फरपुर कोर्ट&#8230;! कटघरे में खड़ा खूबसूरत नौजवान अचानक मुस्कुरा उठा। फैसला सुना रहा जज कॉर्न डफ भौंचक्का रह गया। उसे लगा कि शायद धोती कुर्ता पहने हिंदुस्तानी को अंग्रेजी समझ नहीं आई, इसीलिए फांसी का फैसला सुनकर मारे खौफ के गश खाकर गिरने के बजाय इसे हसी-ठिठोली सूझ रही है।<br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>जज कॉर्न डफः</strong></span> सजा का मतलब समझते हो?<br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>नौजवान धीरे से मुस्कुराया और बोलाः</strong></span> हां, मुझे सब समझ में आता है। आपने मुझे मौत की सजा सुनाई है। मेरे वकील ने भी दलील दी थी कि मैं बहुत छोटा हूं, इसलिए बम नहीं बना सकता। लेकिन, मेरे वकील गलत हैं। मैं तो बस उनकी गलती सही करने की कोशिश कर रहा हूं।<br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>जज कॉर्न डफः</strong></span> वो कैसे ठीक करोगे?<br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>नौजवानः</strong> </span>अगर आप मुझे थोड़ा समय दें तो मैं आपको भी बम बनाना सिखा सकता हूं&#8230;!!!</p>
<p>इतना सुनते ही पूरी अदालत में सन्नाटा पसर गया&#8230; हैरत में पड़ा जज उस नौजवान को कई मिनटों तक एक टक देखता रह गया&#8230; आखिर में उसने लिखा&#8230; वो एक शेर थे&#8230; जो निर्भीक होकर फांसी के फंदे की ओर बढ़ा&#8230;। हां, वो शेर कोई और नहीं खुदीराम बोस थे&#8230; आजादी के इतिहास में पहला बम फोड़ने वाले जांबाज क्रांतिकारी&#8230; जिनके बम की गूंज से सिर्फ बिहार और बंगाल ही नहीं लन्दन तक कांप उठे थे। मां भारती को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराने के लिए खुदीराम बोस महज 18 साल की उम्र में मुस्कुराते हुए फांसी के फंदे पर झूल गए थे।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter wp-image-10333 size-full" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/khudiram-bose.jpg" alt="Khudiram Bose, Indian revolutionary from Bengal Presidency,  British rule of India, Muzaffarpur Conspiracy Case, Prafulla Chaki,  Indian Independence Movement, British judge Magistrate Douglas Kingsford,  Medinipur district Bengal, TIS Media" width="600" height="359" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/khudiram-bose.jpg 600w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/khudiram-bose-300x180.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 600px) 100vw, 600px" /></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>शेर-ए-हिंदुस्तान खुदीराम</strong></span><br />
3 दिसम्बर 1889&#8230; बंगाल के मेदिनीपुर जिले में त्रैलोक्यनाथ बोस और लक्ष्मी प्रिया देवी के घर एक बेटे का जन्म हुआ। बेटा पैदा होने से घर में ख़ुशी से ज्यादा खौफ मौत का खौफ तैर उठा था&#8230; दरअसल बात यह थी कि प्रिया देवी ने इससे पहले भी दो बेटों को जन्म दिया था, लेकिन दोनों को ही बीमारी निगल गई। प्रिया देवी को लगा कि कहीं यह बच्चा भी काल के गाल में न समा जाए। त्रैलोक्यनाथ बोस को इस डर से बाहर निकलने की एक तरकीब सूझी&#8230; उन्होंने अपनी बड़ी बेटी को आवाज दी और सिर्फ तीन मुट्ठी चावल के बदले नवजात को उसे बेच दिया। बंगाल के गांवों में चावल को खुदी कहते थे&#8230; इसीलिए तीन मुट्ठी चावल के बदले मिले इस नवजात का नाम उसकी बड़ी बहन ने खुदी राम रखा&#8230;। त्रैलोक्यनाथ बोस का टोटका काम कर गया और खुदीराम बोस जीवित बच गए।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-10335" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/Muraripukur_garden_house.png" alt="Khudiram Bose, Indian revolutionary from Bengal Presidency,  British rule of India, Muzaffarpur Conspiracy Case, Prafulla Chaki,  Indian Independence Movement, British judge Magistrate Douglas Kingsford,  Medinipur district Bengal, TIS Media" width="800" height="547" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/Muraripukur_garden_house.png 800w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/Muraripukur_garden_house-300x205.png 300w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/Muraripukur_garden_house-768x525.png 768w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/Muraripukur_garden_house-220x150.png 220w" sizes="auto, (max-width: 800px) 100vw, 800px" /></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>बम बनाने की पढ़ाई </strong></span><br />
त्रैलोक्यनाथ बोस ने बचपन से ही बेटे की पढ़ाई पर खासा जोर दिया, लेकिन बेटा था कि उसका मन शास्त्रों की बजाय शस्त्रों की पढ़ाई में रमने लगा। खुदीराम अभी 9वीं कक्षा तक पहुंचे ही थे कि पूरा बंगाल अंग्रेजों की विभाजनकारी साजिश को नाकाम करने के लिए सुलग उठा। खुदीराम के भीतर भी मां भारती को अंग्रेजों के अत्याचार से मुक्त कराने की आग धधक उठी और देखते ही देखते वह महान क्रांतिकारी सत्येन्द्रनाथ सान्याल के संपर्क में आ गए। जहां उन्होंने बम बनाना सीखा। एक दिन ऐसा भी आया कि नौंवी कक्षा के बाद उनका मन स्कूल में बिल्कुल भी नहीं रमा तो पढ़ाई छोड़ खुदीराम रिवोल्यूशनरी पार्टी के सदस्य बन गए और 1905 में बंगाल के विभाजन (बंग-भंग) के विरोध में चलाये गये आन्दोलन में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>बचने में माहिर थे खुदीराम </strong></span><br />
इतिहासवेत्ता मालती मलिक के अनुसार फरवरी 1906 में मिदनापुर में एक औद्योगिक एवं कृषि प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। यह आयोजन इतना बड़ा था कि आसपास के प्रांतों के लोग भी इसे देखने आ रहे थे। मौके का फायदा उठा खुदीराम बोस ने क्रान्तिकारी सत्येन्द्रनाथ का लिखे पत्रक ‘सोनार बांगला’ इस प्रदर्शनी में बांटना शुरू कर दिया। ब्रितानिया हुकूमत के खिलाफ आग उलगता एक पत्रक अंग्रेज पुलिस अफसर तक जा पहुंचा तो वह खुदीराम को पकड़ने के लिए भागा, लेकिन खुदीराम उसके मुंह पर घूसा मारकर भाग निकले। मामला अदालत तक पहुंचा और उन पर राजद्रोह का मुकदमा चलाया गया, लेकिन खुदीराम के खिलाफ किसी ने गवाही न। नतीजन, वह बरी हो गए। 28 फरवरी 1906 को खुदीराम बोस फिर गिरफ्तार कर लिये गए, लेकिन इस बार तो वह कैद से ही भाग निकले। लगभग दो महीने बाद अप्रैल में उन्हें अंग्रेजों ने फिर से धर दबोचा, लेकिन इस बार भी कोई गवाही न मिलने पर 16 मई 1906 को उन्हें रिहा करना पड़ा।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>बम के धमाके और &#8220;युगान्तर&#8221;</strong></span><br />
खुदीराम का हौसला अब खासा बढ़ चुका था। मिदनापुर में ‘युगान्तर’ नाम की क्रान्तिकारियों की गुप्त संस्था का हिस्सा बनते ही खुदीराम क्रांतिकारियों से जुड़ गए। जिन हाथों में अभी तक पत्रक हुआ करते थे उन्होंने अब बम थाम लिए थे। खुदीराम ने 6 दिसंबर 1907 को पहला बम नारायणगढ़ रेलवे स्टेशन पर बंगाल के गवर्नर की स्पेशल ट्रेन पर फेंका, लेकिन इस हमले में गवर्नर बच निकला। साल 1908 में उन्होंने दो अंग्रेज अधिकारियों वाट्सन और पैम्फायल्ट फुलर पर भी बम से हमला किया लेकिन वे भी बच निकले। उन दिनों जिला सेशन जज हुआ करता था डग्लस किंग्सफोर्ड, जिसको भारतीय फूटी आंख नहीं सुहाते थे। छोटे से छोटे मामले में भी डग्लस 15 कोड़ों से कम की सजा न देता। क्रांतिकारियों ने अगला लक्ष्य बनाया किंग्सफोर्ड को, जिसे मारकर भारतीयों पर होने वाले जुल्म का बदला लेने का फैसला किया गया। पहली कोशिश में किताब में छुपाकर एक बम किंग्सफोर्ड के पास भेजा गया, लेकिन किंग्सफोर्ड ने किताब नहीं खोली और वह साफ बच निकला।</p>
<figure id="attachment_10334" aria-describedby="caption-attachment-10334" style="width: 600px" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" class="size-full wp-image-10334" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/tismedia.in-kingsford.jpg" alt="Khudiram Bose, Indian revolutionary from Bengal Presidency,  British rule of India, Muzaffarpur Conspiracy Case, Prafulla Chaki,  Indian Independence Movement, British judge Magistrate Douglas Kingsford,  Medinipur district Bengal, TIS Media" width="600" height="359" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/tismedia.in-kingsford.jpg 600w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/tismedia.in-kingsford-300x180.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 600px) 100vw, 600px" /><figcaption id="caption-attachment-10334" class="wp-caption-text">अंग्रेज जज डगलस किंग्सफोर्ड।</figcaption></figure>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>किंग्जफोर्ड को मारने मुजफ्फरपुर तक जा पहुंचे </strong></span><br />
1905 में लॉर्ड कर्जन ने जब बंगाल का विभाजन किया तो उसके विरोध में सड़कों पर उतरे अनेकों भारतीयों को उस समय के कलकत्ता के मॅजिस्ट्रेट किंग्जफोर्ड ने क्रूर दण्ड दिया। अन्य मामलों में भी उसने क्रान्तिकारियों को बहुत कष्ट दिया था। इसके परिणामस्वरूप किंग्जफोर्ड को पदोन्नति देकर मुजफ्फरपुर में सत्र न्यायाधीश के पद पर भेजा। ‘युगान्तर’ समिति कि एक गुप्त बैठक में किंग्जफोर्ड को मारने का फैसला हुआ। इस काम के लिए चुना गया खुदीराम और उनके साथ प्रफुल्ल चाकी को। दोनों लोग एक बम और दो पिस्तौल लेकर जा पहुंचे मुजफ्फरपुर। वहां पहुंचकर उन दोनों ने मोतीझील इलाके में एक धर्मशाला में किराए पर कमरा लिया, जिसका मालिक एक बंगाली ज़मींदार था। उन्हें लगा कि दो बंगाली अगर एक बंगाली धर्मशाला में रहेंगे तो किसी को शक नहीं होगा।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>एक बम, दो मौत</strong></span><br />
दोनों ने पहले बंगले की निगरानी की, किंग्सफोर्ड के आने जाने का समय, बग्घी तथा उसके घोडे का रंग और कार्यालय तक की छानबीन की। 30 अप्रैल 1908 को दोनों किंग्जफोर्ड के बंगले के बाहर आ जमे। वहां मौजूद पुलिस के गुप्तचरों ने उन्हें हटाना भी चाहा लेकिन बड़ी चतुराई से वह दोनों वहीं जमे रहे। रात में साढ़े आठ बजे के आसपास क्लब से किंग्जफोर्ड जैसी बग्घी देख खुदीराम गाडी के पीछे भागने लगे। रास्ते में बहुत ही अंधेरा था। गाडी किंग्जफोर्ड के बंगले के सामने आते ही खुदीराम ने अंधेरे में ही आगे वाली बग्घी पर निशाना लगाकर जोर से बम फेंका। हिन्दुस्तान में इस पहले बम विस्फोट की आवाज उस रात तीन मील तक सुनाई दी और कुछ दिनों बाद तो उसकी आवाज इंग्लैंड में भी सुनी गयी जब वहां इस घटना की खबर ने तहलका मचा दिया, लेकिन किंग्सफोर्ड बच निकला। दरअसल हुआ यह कि उस दिन किंग्सफ़ोर्ड के अलावा वहां के लोकल बैरिस्टर प्रिंगल केनेडी का परिवार भी मौजूद था। रात आठ बजे तक उन लोगों ने ब्रिज, ताश का गेम खेला और उसके बाद सब लोग बाहर आ गए। केनेडी की पत्नी और बेटी जाकर सबसे आगे वाली बग्गी में बैठ गए। अंधेके के कारण इसी बग्गी को खुदीराम किंग्सफोर्ड की बग्गी समझ बैठे। उनके फेंके बम से बग्गी में बैठी केनेडी की पत्नी और बेटी की मौत हो गई।</p>
<figure id="attachment_10336" aria-describedby="caption-attachment-10336" style="width: 600px" class="wp-caption aligncenter"><img loading="lazy" decoding="async" class="size-full wp-image-10336" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/tismedia.in-praful-chaki.jpg" alt="Khudiram Bose, Indian revolutionary from Bengal Presidency,  British rule of India, Muzaffarpur Conspiracy Case, Prafulla Chaki,  Indian Independence Movement, British judge Magistrate Douglas Kingsford,  Medinipur district Bengal, TIS Media" width="600" height="359" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/tismedia.in-praful-chaki.jpg 600w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/tismedia.in-praful-chaki-300x180.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 600px) 100vw, 600px" /><figcaption id="caption-attachment-10336" class="wp-caption-text">अमर सेनानी प्रफुल चाकी की अंतिम तस्वीर।</figcaption></figure>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>प्रफुल्ल चाकी का सिर काट ले गए अंग्रेज </strong></span><br />
बम फटते ही खुदीराम और प्रफुल्ल चाकी वहां से भाग निकले। भागते समय उनके जूते और चादर रास्ते में छूट गई। जिससे अंग्रेजों ने उनका ठिकाना पता कर लिया। दोनों की पहचान होते ही अगले दिन मुनादी करवा दी गई कि दो बंगाली लड़के हत्या के आरोप में फरार हैं। खबर देने वाले को 5000 रुपए का इनाम मिलेगा। 1 मई 1908 को प्रफुल्ल समस्तीपुर स्टेशन पहुंचे और एक ट्रेन में जाकर बैठ गए।  पहचान छुपाने के मकसद से उन्होंने नए जूते और कपड़े भी खरीद लिए, लेकिन ट्रेन में प्रफुल्ल के साथ एक बंगाली दरोगा नंदलाल बैनर्जी भी यात्रा कर रहा था। प्रफुल को देखकर उसे शक हुआ और पूछताछ करने लगा। प्रफुल्ल ने नंदलाल बैनर्जी को अपना नाम दिनेश चंद्र रे बताया था, लेकिन उसका शक गहराया तो अगले स्टेशन पर उसने पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने प्रफुल को जैसे ही पकड़ा उन्होंने अपनी पिस्टल से गोलियां चलाना शुरू कर दिया। आखिर में प्रफुल ने अपनी ही पिस्टल से सीने में गोली मार शहादत दे दी। अंग्रेजों के अत्याचार का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि शिनाख्त करने के लिए पुलिस ने प्रफुल्ल का सिर काटकर कलकत्ता भिजवाया ताकि ये पक्का हो सके कि ये वही प्रफुल्ल कुमार चाकी है।</p>
<figure id="attachment_10337" aria-describedby="caption-attachment-10337" style="width: 394px" class="wp-caption alignleft"><img loading="lazy" decoding="async" class="size-full wp-image-10337" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/tismedia.in-Khudiram-Bose.jpg" alt="Khudiram Bose, Indian revolutionary from Bengal Presidency,  British rule of India, Muzaffarpur Conspiracy Case, Prafulla Chaki,  Indian Independence Movement, British judge Magistrate Douglas Kingsford,  Medinipur district Bengal, TIS Media" width="394" height="600" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/tismedia.in-Khudiram-Bose.jpg 394w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/tismedia.in-Khudiram-Bose-197x300.jpg 197w" sizes="auto, (max-width: 394px) 100vw, 394px" /><figcaption id="caption-attachment-10337" class="wp-caption-text">16 साल के खुदीराम बोस।</figcaption></figure>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>30 किमी पैदल चले और पकड़े गए खुदीराम </strong></span><br />
उधर, खुदीराम रेलवे ट्रैक पर पैदल ही चल निकले। करीब 30 किमी चलने के बाद वह पूसा के पास वैनी रेलवे स्टेशन पहुंच गए। भूख और प्यास से बेहाल खुदीराम पानी पीने के लिए नल के पास गए तो वहां पुलिस का अच्छा खासा जाप्ता देख लोगों से इसकी वजह पूछने लगे। तभी अचानक उनके मुंह से निकल पड़ा कि क्या किंग्सफोर्ड नहीं मरा&#8230;!!! जैसे ही पुलिस वालों के कानों में यह शब्द पड़े उन्हें शक हो गया और खुदीराम को धर दबोचा। उन्होंने मुकाबले के लिए अपनी पिस्टल निकाली, लेकिन वह इतना थक चुके थे कि पुलिस वाले उन पर भारी पड़ गए। पुलिस उन्हें पकड़कर मुज़फ़्फ़रपुर स्टेशन ले आई, लेकिन तब तक उनकी गिरफ़्तारी की खबर चारों तरफ आग की तरह फैल चुकी थी। किसी को यकीन ही नहीं हो रहा था कि 18 साल के लड़के ने किसी अंग्रेज को मार गिराया है। पुलिस स्टेशन पहुंचकर जैसे ही खुदीराम वैन से उतरे, तो जोर से चिल्लाए- वन्दे मातरम !</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>7 दिन, 55 सवाल और फांसी की सजा </strong></span><br />
13 जून 1908&#8230; को सिर्फ सात दिन चली सुनवाई और 55 सवाल पूछने के बाद आखिरकार इस रोज जज कॉर्न डफ ने खुदीराम को फांसी की सजा सुनाई। खुदीराम के वकील कालीदास ने जमकर जिरह की। उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि इतना छोटा लड़का बम नहीं बना सकता, लेकिन इस पर खुदीराम हसने लगे और फैसला सुनाने के बाद जब जज ने उससे पूछा, कि  ‘क्या तुम फ़ैसला समझ गए हो?’ उन्होंने कहा कि ‘हां लेकिन मैं कुछ कहना चाहता हूं’। जज ने कहा, मेरे पास इसके लिए वक्त नहीं है। जिसके बाद खुदीराम बोले अगर मुझे मौक़ा दिया जाए, तो मैं ये बता सकता हूं कि बम कैसे बनाया गया था। फांसी के तख्ते पर झूलने की चिंता से ज्यादा खुदीराम को इस बात की फ़िक्र थी कि बम बनाने का फ़ॉर्म्युला ज्यादा से ज्यादा लोगों तक कैसे पहुंचाया जा सकता है। खुदीराम ने अपने वकील से कहा कि चिंता मत करो, पुराने समय में राजपूत औरतें आग में जौहर कर लेती थीं। मैं भी बिना किसी डर के अपनी मौत स्वीकार कर लूंगा।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>और हंसते-हंसते झूल गए फांसी पर </strong></span><br />
खुदीराम को मौत से इस कदर बेतकल्लुफ़ी थी कि जेलर आखिरी इच्छा पूछने आया तो खुदीराम उससे भी मसखरी करने लगे। खुदीराम ने जेलर से कहा कि क्या खाने को आम मिल सकते हैं? जेलर ने उन्हें आम भिजवा दिए और कुछ देर बाद उसने देखा कि आम तो ऐसे ही पड़े हुए हैं। जेलर ने पूछा कि आम क्यों नहीं खाए तो खुदीराम ने जवाब दिया कि आम तो वो खा चुका है, जेलर ने जाकर गौर से आम की तरफ देखा तो पता चला कि आम की गुठलियां इस तरह निकाली गई थीं कि आम साबुत ही दिखाई पड़ रहा था। जेलर का हाल देखकर खुदीराम खिलखिलाकर हंस पड़े। 11 अगस्त की सुबह 6 बजे खुदीराम को फांसी दे दी गई। वहां मौजूद लोगों के अनुसार फांसी मिलने तक एक बार भी ना वो घबराए, ना उनके चेहरे पर कोई शिकन आई। हाथ में गीता थामे जब उनका आखिरी फोटो खींचा गया तो चेहरे का तेज अंग्रेज हुकूमत की आंखों को चौंधिया रहा था। फांसी के बाद जब उनका अंतिम संस्कार किया गया तो उनकी चिता पर अस्थि चूर्ण और भस्म के लिए परस्पर छीना-झपटी होने लगी। कोई सोने की डिब्बी में, कोई चांदी के और कोई हाथी दांत के छोटे-छोटे डिब्बों में वह पुनीत भस्म भरकर ले गया। एक मुट्ठी भस्म के लिए हज़ारों स्त्री-पुरुष बावले हो उठे थे। कहते हैं कि बंगाल के सारे युवक उन दिनों जो धोती पहनते थे, उसकी बॉर्डर पर खुदीराम बुना होता था। फरवरी 1910 में एक ऐसी ही धोती सरकारी अधिकारियों के सामने लाई गई। उसके बॉर्डर पर एक कविता लिखी हुई थी:-</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>एक बार बिदाय दे मां, घूरे आसी ! </strong></span><br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>हंसी हंसी पोरबो फांसी देखबे भारतबासी !</strong></span></p>
<p><strong>हिंदी में जिसका अर्थ है,</strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>एक बार मुझे विदा दो मां, मैं जल्दी लौटूंगा.</strong></span><br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>पूरे भारत के लोग मुझे देखेंगे और मैं हंसते-हंसते फांसी पर झूल जाऊंगा.</strong></span></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/story-of-youngest-martyr-of-indian-independence-movement-khudiram-bose/10330/">सुनो! मौका देकर तो देखो&#8230; जज साहब, मैं तुम्हें भी बम बनाना सिखा सकता हूं&#8230;</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>#WorldIndigenousDay: कौन है गुंडा? कैसे बना गुंडा एक्ट? जानिए हैरतंगेज हकीकत</title>
		<link>https://tismedia.in/editorial/article/how-was-the-goonda-act-made-in-india/10308/?utm_source=rss&#038;utm_medium=rss&#038;utm_campaign=how-was-the-goonda-act-made-in-india</link>
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		<pubDate>Mon, 09 Aug 2021 08:44:13 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>20वीं शताब्दी के दो दशक बीतने तक यह शब्द था ही नहीं। आप इंटरनेट पर खोजिए इस शब्द को। वहां इतनी ही जानकारी है कि पहली बार 1920 में ब्रिटिश अखबार में यह शब्द छपा था, जिसकी स्पेलिंग थी- GOONDAH, फिर 1930 में एक काल्पनिक कॉमिक कैरेक्टर आया- ‘एलिस द गून’। अंग्रेजी में एक शब्द &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/how-was-the-goonda-act-made-in-india/10308/">#WorldIndigenousDay: कौन है गुंडा? कैसे बना गुंडा एक्ट? जानिए हैरतंगेज हकीकत</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span> <strong><span style="color: #ff0000;">गुंडा शब्द इन दिनों काफी प्रचलित हो चुका है। राजनीति से लेकर आम जिंदगी तक में यह शब्द अक्सर सुनने को मिलते हैं- भाजपा के गुंडे, सपा के गुंडे, किसान नहीं, गुंडे हैं। गुंडागर्दी, गुंडा टैक्स, गुंडाराज&#8230;!!! आम बोलचाल, मीडिया की खबरों और आंदोलन के नारों में यह शब्द इस्तेमाल होता है। इस शब्द की बुनियाद पर कानून भी बना है- गुंडा एक्ट। क्या आपने कभी सोचा कि शब्द कहां से आ गया? शायद कभी नहीं। बस इतनी ही तस्वीर हर दिमाग में होती है कि गुंडा मतलब बदमाश, जो अराजक है, हिंसक है, अपराधी है, दहशत फैलाता है, समाज के लिए खराब आदमी है, जो औरतों-बच्चों के प्रति भी संवेदनशील नहीं होता! क्या वाकई में अभी तक हम जो सोचते थे वही सच है या फिर हकीकत कुछ और ही है&#8230; जानिए, एक ऐसी साजिश के बारे में जिसने हिंदुस्तान की संस्कृति को सालों बाद भी झूठ के जाल में जकड़ रखा है&#8230;!!! जानिए &#8220;गुंडा&#8221; का स्याह सच&#8230;!!- <span style="color: #000000;">आशीष आनंद</span></span></strong>
			</div>
		</div>
	
<p>20वीं शताब्दी के दो दशक बीतने तक यह शब्द था ही नहीं। आप इंटरनेट पर खोजिए इस शब्द को। वहां इतनी ही जानकारी है कि पहली बार 1920 में ब्रिटिश अखबार में यह शब्द छपा था, जिसकी स्पेलिंग थी- GOONDAH, फिर 1930 में एक काल्पनिक कॉमिक कैरेक्टर आया- ‘एलिस द गून’। अंग्रेजी में एक शब्द ‘गून’ भी है, जिसे गुंडा शब्द बतौर ही इस्तेमाल किया जाता है। असल में, हिंदी में गुंडा शब्द अंग्रेजों की फाइल से आया। जब 20वीं शताब्दी के पहले दशक में बस्तर के आदिवासी स्वतंत्रता सेनानी वीर गुंडाधुर धुरवा को अंग्रेजों ने गुंडा (बदमाश ) मान लिया। यह उनके दिमाग का कैरेक्टर था, जो उनकी सत्ता के खिलाफ बेखौफ, बिगड़ैल, अराजक था। जो उनका गुलाम नहीं हो सका और विद्रोह करके उनकी खटिया खड़ी कर दी, जिसे वे कभी पकड़ नहीं पाए। इसी वजह से अंग्रेजों ने ऐसे लोगों पर कार्रवाई के लिए ‘गुंडा’ एक्ट बनाया।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-10309" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/gundadhur3.jpg" alt="World Indigenous Day" width="696" height="392" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/gundadhur3.jpg 696w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/gundadhur3-300x169.jpg 300w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/gundadhur3-390x220.jpg 390w" sizes="auto, (max-width: 696px) 100vw, 696px" /></p>

		<div class="box note  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span><strong><span style="color: #ff0000;">समझ पा रहे हैं आप? देश और समाज के लिए फैसलाकुन संघर्ष करने वाला कौन था- गुंडा। विदेशी हुक्मरानों ने महान् गुंडाधुर को अपराधी करार देकर उस तरह के चरित्र को गुंडा बना दिया।</span></strong>
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<p>विदेशियों- शासकों ने दबे-कुचले, गरीब, बदहाल, दलित जातियों, आदिवासियों, जनजातियों, दलितों, औरतों के लिए हिकारत के जो शब्द बोले, वही गालियां हम सबकी जुबान पर चढ़ी हैं। ये गालियां हम घर और बाहर इसी हिकारत से बोलते हैं और इसका एहसास भी नहीं होता। ‘मादर’ शब्द फारसी में मां को कहा जाता है, इस शब्द से गाली बना दी गई। अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों को डकैत, लुटेरे, आतंकवादी कहा और ये शब्द आजादी के बाद तक किताबों में आते रहे। आज भी कई लोग काकोरी कांड या फलाना-ढिकाना कांड बोलते हैं, जबकि उनको केस कहा जाना चाहिए, वे केस जो अंग्रेजों ने चलाए। कांड नकारात्मक होता है, हत्याकांड, दुष्कर्म कांड की तरह। हिंदू शब्द भी इसी तरह अरबियों का दिया हुआ नकारात्मक भाव से कहा शब्द है।</p>
<p>ठीक इसी तरह छत्तीसगढ़ में बस्तर के आदिवासी क्रांतिकारी गुंडाधुर गुंडा बन गए। एक ऐसा क्रांतिकारी, जिन्होंने अंग्रेजों की जड़ें कभी भी बस्तर में नहीं जमने दीं। अंग्रेजों के सारे छल-बल जिनके आगे फेल हो गए और कभी गिरफ्तार नहीं कर पाए। बस्तर में गुंडाधुर की प्रतिमा लगी है, आदिवासी इस वीर को पूजते हैं और अपने खिलाफ अत्याचार होने पर उनसे साहस-उत्साह पैदा करते हैं। इसी वजह से बस्तर आज भी रह-रहकर धधक उठता है, जब उनकी जिंदगी, जंगल, अस्मत पर आंच आती है। बस्तर का पूरा नक्शा मुगलों से लेकर आज तक कोई ठीक से नहीं बना पाया। आज भी तीर-कमान एके-56 से मुकाबला करते हैं। आश्चर्यजनक है, प्रतिरोध की वजह से यहां के आदिवासी आज भी सत्ता की नजर में ‘गुंडे’ हैं और उन्हें ‘गुंडा’ होने पर फख्र है।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-10310" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/gundadhur4.jpg" alt="World Indigenous Day" width="696" height="786" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/gundadhur4.jpg 696w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/gundadhur4-266x300.jpg 266w" sizes="auto, (max-width: 696px) 100vw, 696px" /><br />
पूरा किस्सा, जो वास्तविक इतिहास है<br />
वर्ष 1910 में हुआ था भूमकाल विद्रोह, जिसके नायक थे धुरवा आदिवासी गुंडाधुर। जिनके नाम से अंग्रेज कांपते थे। इस जनजाति के लोग आज भी बस्तर के 800 से ज्यादा गांवों में रहते हैं। कहते हैं राज्य के दीवान कालिंद्र सिंह ने उनकी खोज की और 1910 में उन्हें भूमकाल विद्रोह का नेतृत्व दिया। रानी सुबरन कुंवर ने कहा था कि मुरिया राज की स्थापना के लिए धुरवा जनजाति का एक होना जरूरी है। एक फरवरी 1910 से 75 दिन तक गुंडाधुर का आंदोलन चला। जब किसी भी तरह अंग्रेज गुंडाधुर को पकड़ नहीं पाए और उनका आंदोलन दबा नहीं पाए तो अंग्रेजों ने संधि कर ली।</p>
<p>धुरवा आबादी छत्तीसगढ़ के बस्तर के सुकमा, जगदलपुर, दरभा, छिंदगढ़ में आबाद है। इसके आलावा ओडिशा के लगभग 88 गांवों में धुरवा हैं। धुरवा समाज के सचिव गंगाराम कश्यप के अनुसार बस्तर से लगे उड़ीसा के इलाकों में इनकी संख्या 10 हजार से ज्यादा है। भूमकाल विद्रोह जिन वीर धुरवाओं की अगुवाई में लड़ा गया वे थे गुंडाधुर (निवासी नेतानार) और डेबरीधुर (निवासी एलंगनार)। धुरवा युवक लंबे-ऊंची कदकाठी के होते हैं और मूंगे की माला और रंग बिरंगे गहने पहनते हैं। अपनी बोली और जनजातीय परंपराए हैं। बस्तर की कांगेरघाटी के इर्द-गिर्द बसे धुरवा बेटे-बेटियों के विवाह में जल को साक्षी मानते हैं, अग्नि को नहीं। नृत्य, गीत और आपसी संवाद की बोली धुरवी कहलाती है, जो द्रविड़ भाषा परिवार का हिस्सा है।</p>
<p>होली से पहले एक माह तक चलने वाला पर्व गुरगाल होता है। अबूझमाड़िया आदिवासी नेरोम की लड़ी धुरवा जनजाति के युवक-युवतियों को देकर प्रेम का इजहार करते हैं। धुरवा जाति के युवक बांस से बनी खूबसूरत टोकरियों या बांस की कंघी भेंटकर प्रेम का इजहार करते हैं, बदले में युवतियां सुनहरी-चांदी के रंग की पट्टियों वाली लकड़ी की कुल्हाड़ी देकर प्रेम निमंत्रण का जवाब देती हैं। धुरवा जनजाति के लोग पानी के फेरे लेकर जिंदगी भर एक दूजे के संग रहने की कसमें खाते हैं। खास बात यह है कि इन फेरों में सिर्फ वर-वधु ही नहीं होते, बल्कि पूरा गांव शामिल होता है। पानी और पेड़ की पूजा ही धुरवा जनजाति की हर प्रमुख परंपरा के केंद्र में होती है। तथाकथित मुख्यधारा की राजनीति ने आदिवासियों की परवाह कभी नहीं की। इसी का नतीजा है कि धुरवा जनजाति की उपजाति परजा अब विलुप्त हो चुकी है।</p>
<p>धुरवा जंगल, जल, जमीन का हक खो चुके हैं। भय, भूख और भ्रष्टाचार के सताए धुरवा बेदखल होकर दिहाड़ी मजदूरी के लिए भी भटक रहे हैं। देखा जाए तो धुरवा समाज के हाशिए पर जाने का एक कारण 1910 का भूमकाल भी है। इस क्रांति के दमन के बाद अंग्रेजों ने बहुत निर्ममता से इस वीर कौम को कुचला, अपमानित, पारंपरिक शस्त्र लेकर चलने पर भी पाबंदी लगा दी।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-10311" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/baster3.jpeg" alt="World Indigenous Day" width="696" height="392" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/baster3.jpeg 696w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/baster3-300x169.jpeg 300w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/baster3-390x220.jpeg 390w" sizes="auto, (max-width: 696px) 100vw, 696px" /></p>
<p><span style="color: #ff0000;">गुंडाधुर की ओर लौटते हैं।</span> वर्ष 1910 की जनवरी में ताड़ोकी की एक जनसभा में लाल कालिंद्र सिंह की उद्घोषणा के द्वारा गुंडाधुर को सर्वमान्य नेता चुना गया (फॉरेन डिपार्टमेंट सीक्रेट, 1 अगस्त 1911)। लाल कालिंद्र ने प्रमुख नायक चुनने के बाद परगना स्तर पर अलग-अलग नेता नामजद किए। इसके बाद भूमकाल विद्रोह की योजना पर काम शुरू हो गया। गुंडाधुर ने पूरी रियासत की यात्रा कर भूमकाल का संदेश दिया। डेबरीधुर उत्साही युवकों का संगठन तैयार करने में लग गए। इतनी बड़ी योजना पर खामोशी से अमल हो रहा था। जन-जन तक पहुंचने के हुनर के चलते किवदंती चल पड़ी कि गुंडाधुर में उड़ने की शक्ति है, कि गुंडाधुर के पूंछ है, कि जादुई ताकत है। यहां तक कि यह भी कि जब भूमकाल शुरु होगा और अंग्रेज बंदूक चलाएंगे तो गुंडाधुर अपने मंतर से गोली को पानी बना देगा।</p>
<p><span style="color: #ff0000;">एक कहानी यह भी चली</span><br />
”नेतानार गांव में हनगुंडा नाम की दुष्ट औरत रहती थी। उसने सब को तंग करके रखा था। गांव वालों ने मिलकर सोचा कि कैसे इस हनगुंडा को मारा जाए जिससे कि सभी सुखी हो जाएं। गुंडाधुर को इस काम के लिए चुना गया। गुंडाधुर तो सबकी मदद के लिए हमेशा आगे रहता था, वह तैयार हो गया। गुंडाधुर ने गायता को साथ में लिया और दोनों हनगुंडा की तलाश में निकल पड़े। हनगुंडा को पता चला कि गांव वाले उसे मारना चाहते हैं तो वह गुस्से से और भयानक हो गई। उसने शेर का रूप धरा और ‘सिरहा’ की बकरी को खा गई। गुंडाधुर ने शेर बनी हुई हनगुंडा पर बहुत से तीर चलाए, लेकिन किसी भी तीर का शेर पर असर नहीं हुआ। दूसरे दिन फिर से हनगुंडा शेर बन कर आई और उसने सिरहा का लमझेना उठा लिया। अगले दिन फिर से वह गायता का बैल उठा ले गई। इस बार गुंडाधुर शेर के पीछे-पीछे भागा। उसने देखा कि बैल का खून पी लेने के बाद शेर ने अपनी पीठ को पीपल के झाड़ पर रगड़ा, तभी वह शेर आदमी का रूप लेने लगा। जब शेर आधा आदमी और आधा शेर बन गया तब गुंडाधुर अपनी तलवार लेकर उसके सामने आ गया। वह यह देखकर चौंक गया कि असल में हनगुंडा कोई और नहीं उसकी अपनी मां है।…..लेकिन गुंडाधुर ने तलवार चलाकर गर्दन उड़ा दी। गांव की भलाई के लिए और अपनी माटी के लिए वह कुछ भी कर सकता था।”</p>
<p>भूमकाल में गुंडाधुर का कुशल प्रबंधन गजब का था। राज्य के दक्षिण पूर्वी हिस्से में विद्रोही कई दलों में विभाजित थे और एक साथ कई मोर्चों पर युद्ध हो रहा था। इसके बावजूद गुंडाधुर तक हर सूचना पहुंच रही थी। जहां विद्रोही कमजोर होते वह खुद उत्साह बढ़ाने पहुंच जाते। हर बीतते दिन के साथ विद्रोही अधिक मजबूत होते जा रहे थे। इंद्रावती नदी घाटी के अधिकांश हिस्सों पर दस दिनों में मुरियाराज का परचम बुलंद हो गया।</p>
<p>‘बस्तर: एक अध्ययन’ में डॉ. रामकुमार बेहार और निर्मला बेहार ने लिखा है- ”25 जनवरी को यह तय हुआ कि विद्रोह करना है और 2 फरवरी 1910 को पुसपाल बाजार की लूट से विद्रोह आरंभ हो गया, 7 फरवरी 1910 को बस्तर के तत्कालीन राजा रुद्रप्रताप देव ने सेंट्रल प्राेविंस के चीफ कमिश्नर को तार भेजकर विद्रोह होने और तत्काल सहायता भेजने को कहा (स्टैंडन की रिपोर्ट, 29 मार्च 1910)। विद्रोह दबाने को सेंट्रल प्रोविंस के 200 सिपाही, मद्रास प्रेसिडेंसी के 150 सिपाही, पंजाब बटालियन के 170 सिपाही भेजे गए (फ़ॉरेन डिपार्टमेंट फाईल, 1911)। 16 फरवरी से 3 मई 1910 तक ये टुकड़ियां विद्रोह के दमन में लगी रहीं।”</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-10312" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/adivasi.jpg" alt="World Indigenous Day" width="696" height="392" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/adivasi.jpg 696w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/adivasi-300x169.jpg 300w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/adivasi-390x220.jpg 390w" sizes="auto, (max-width: 696px) 100vw, 696px" /></p>
<p>अंग्रेज टुकड़ी ने जगदलपुर में घेरा डाला। नेतानार के पास स्थित अलनार के वन में 26 मार्च को भयानक युद्ध हुआ, जिसमें 21 आदिवासी मारे गए।आदिवासियों ने अंग्रेजी टुकड़ी पर इतने तीर चलाए कि सुबह देखा तो चारों ओर तीर ही तीर नज़र आ रहे थे (फ़ॉरेन डिपार्टमेंट फाइल, 1911)। दंतेवाड़ा से लेकर कोंडागांव तक लड़ी गई हर बड़ी लड़ाई में गुंडाधुर खुद मौजूद रहे। जिस भी मोर्चे पर विजय हुई, जश्न मनाया गया। आखिरकार विद्रोही राजधानी को घेरकर बैठ गए, जिससे अंग्रेज अफसर गेयर और दि ब्रेट सैन्य टुकड़ियों के बावजूद तनाव में थे। यहीं पर उन्होंने चालाकी दिखाई।</p>
<p>उनको पता था कि माटी ही आदिवासियों का जीवन और देवता है। प्रशासकीय कार्यकाल के दौरान मुकदमों में उसने देखा था कि आदिवासी ‘मिट्टी की कसम’ खाकर झूठ नहीं बोलते, भले फांसी हो जाए। उसने मिट्टी हाथ में उठाकर आदिवासियों की सभी समस्याओं को हल करने की कसम खाई और विश्वास दिलाया कि आदिवासी अपनी लड़ाई जीत गए हैं और आगे का शासन उनके अनुसार ही चलेगा। आदिवासी इस चाल में आ गए। उनको लगा, भला माटी की कोई झूठी कसम खा सकता है? माटी तो सभी की देवी है, वह बस्तरिये हों या कि अंग्रेज। कुछ विद्रोहियों को सहमति के आधार पर समझौते के लिए नामित किया गया, जिनका काम गुंडाधुर और सरकार के बीच संवाद स्थापित करना था। गेयर सभा से उठा तो उसके चेहरे पर विजयी मुस्कान थी। उसका मनोवैज्ञानिक अस्त्र काम कर गया था।</p>
<p>उसने विद्रोही आदिवासियों को भी मिट्टी की कसम उठाने के लिए बाध्य कर दिया, कि जब तक बातचीत की प्रक्रिया चलेगी आक्रमण नहीं करेंगे। वार्ता शुरू हुई। हर बार प्रस्तावों को किसी न किसी बहाने गेयर लौटा देता। विद्रोहियों को लगता कि उनकी बात सुनी जा रही है और गेयर समय बिता रहा था। उसको हेडक्वार्टर से संदेश आ चुका था कि 24 फरवरी की सुबह मद्रास और पंजाब बटालियन जगदलपुर पहुंच जाएंगी। जबलपुर, विजगापट्टनम, जैपोर और नागपुर से भी 25 फरवरी तक सशस्त्र सेनाओं के पहुंचने की उम्मीद थी।</p>
<p>जैसे ही अंग्रेज सैन्य बल पहुंचे, राजधानी से विद्रोहियों को खदेड़ने की कार्रवाई शुरू हो गई। विद्रोही हतप्रभ थे; मिट्टी की कसम खा कर भी धोखा? क्या गेयर के अपने देश में मिट्टी का कोई मान नहीं होता? आग उगलने वाले हथियारों वाली सेना को नंग-धड़ंग, कुल्हाड़-फरसाधारियों से युद्ध जीतने में षड्यंत्र करना पड़ता है? गोलियां चलने लगीं। गुंडाधुर ने पीछे हटने का निर्णय लिया। सरकारी सेना आगे बढ़ती जा रही थी और विद्रोही जगदलपुर की भूमि से खदेड़े जा रहे थे। कई विद्रोही गिरफ्तार कर और कई माटी के लिए शहीद हो गए।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-10313" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/gundadhur2.jpg" alt="World Indigenous Day" width="800" height="450" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/gundadhur2.jpg 800w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/gundadhur2-300x169.jpg 300w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/gundadhur2-768x432.jpg 768w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/gundadhur2-390x220.jpg 390w" sizes="auto, (max-width: 800px) 100vw, 800px" /></p>
<p>भयानक रात थी। पराजित विद्रोही जगदलपुर से आठ किलोमीटर दूर स्थित अलनार गांव में जमा हुए। गेयर तक खबर पहुंची कि सुबह होते ही महल पर हमला किया जाएगा, जहां अंग्रेज सेना सुरक्षा में लगी थी। आधी रात को सोते हुए जनसमूह पर गेयर ने हमला कर ज्यादातर की हत्या करा दी। गुंडाधुर फिर भी पकड़ में नहीं आए और न ही उनके प्रमुख साथी डेबरीधुर हाथ आए। गुप्त सूचना के आधार पर कुछ घुड़सवारों को नेतानार भेजा गया। एक सिपाही डेबरीधुर की झोपड़ी के भीतर घुसा लेकिन आहट से सचेत हो चुके डेबरीधुर ने उसे वहीं ढेर कर दिया और जंगल में गायब हो गए। गेयर ने गुंडाधुर को पकड़ने के लिए दस हजार और डेबरीधुर पर पांच हजार रुपए के इनाम की घोषणा कर दी। उस वक्त ये बहुत बड़ी रकम थी।</p>
<p>जल्द ही गुंडाधुर ने विद्रोहियों का संगठन पुनर्जीवित कर लिया। सात सौ क्रांतिकारियों का समूह फिर ब्रिटिश सत्ता से टकराने को तैयार था। 25 मार्च 1910 को उलनार भाठा के पर सरकारी सेना का पड़ाव था। गुंडाधुर को जानकारी मिली कि गेयर भी इस कैंप में ठहरा है। डेबरीधुर, सोनू माझी, मुस्मी हड़मा, मुंडी कलार, धानू धाकड, बुधरू, बुटलू जैसे गुंडाधुर के विश्वस्त क्रांतिकारियों ने अचानक कैंप पर भीषण आक्रमण किया तो गेयर के होश उड़ गए।</p>
<p>तीरों की बौछारों से सैनिकों में भगदड़ मच गई। गेयर जानता था कि पकड़ लिया गया तो जिंदा नहीं बच सकता इसलिए वहां से भाग गया। अंग्रेज सेना एक घंटे भी नहीं टिकी और भाग खड़ी हुई। उलनार भाठा की इस विजय के बाद नगाड़ों ने आसमान गूंज गया, एक बार फिर ‘मुरियाराज की कल्पना‘ को पंख मिल गए। इस विजयोन्माद में सबसे खुश सोनू माझी ही लग रहा था। कोई संदेह भी नहीं कर सकता था कि उनका यह साथी अंग्रेजों से मिल गया है। बड़ी जीत से सभी विद्रोही उत्साहित थे। सोनू माझी ने आगे बढ़ बढ़कर शराब परोसी। रात गहराती जा रही थी। नींद और नशा हावी हो गया।</p>
<p>सोनू माझी दबे पांव वहां से निकला। वह जानता था कि इस समय गेयर कहां हो सकता है। उलनार से लगभग तीन किलोमीटर दूर एक खुली सी जगह पर गेयर सैन्य दल को जुटाने में लगा था। अपमानजनक पराजय का उसके पास कोई स्पष्टीकरण भी नहीं था इसलिए तनाव में था। सोनू माझी को सामने देख कर तिनके को सहारा मिल गया।</p>
<p>सोनू माझी ने जब बताया कि विद्रोही इस समय अचेत अवस्था में हैं, गेयर को मौका मिल गया। पौ फटने से पहले वह सैन्य दल समेत वहां पहुंचने को चल पड़ा। गोलियों की आवाज सुनते ही गुंडाधुर की आंख खुल गई। बाकी साथियों को आवाज़ें दे-देकर जगाने की कोशिश करने लगे, लेकिन ज्यादातर बेहोशी की हालत में थे। कुछ जागे भी तो नशे और नींद की वजह से तीर-कमान उठाने की हालत में नहीं थे। सैनिकों की हलचल बढ़ने पर वे तलवार खोंसकर भारी मन से साथियों को पीछे आने को कहते हुए घने जंगल में बढ़ गए, कि पकड़े गए तो भूमकाल खत्म हो जाएगा, जिंदा रहे तो उम्मीद फिर बनेगी।</p>
<p>कोई विरोध नहीं हुआ, लेकिन गेयर ने सबको गोली मारने का आदेश दे दिया। सोते हुए विद्रोहियों पर बंदूकें धधकने लगीं। सुबह 21 लाशें माटी में शहीद होने के गर्व के साथ पड़ी हुई थीं। डेबरीधुर समेत कई प्रमुख क्रांतिकारी पकड़ लिए गए। नगाड़ा पीटकर जगदलपुर शहर और आसपास के गांवों में डेबरीधुर के पकड़े जाने की मुनादी की गई। बिना मुकदमा नगर के बीचों-बीच इमली के पेड़ पर लटकाकर डेबरीधुर और माड़िया माझी को फांसी दे दी गई। बाद में कालेंद्र सिंह के मित्रों ने आदिवासियों के साथ अंग्रेजों से संधि की, जिससे अत्याचार न हो और शांति बनी रहे। अंग्रेज तो चले गए, लेकिन यह संधि आज तक किसी काम नहीं आई। भूमकाल विद्रोह के नायक गुंडाधुर न मारे गए न पकड़े गए। अंग्रेजी फाइल यह कहकर बंद कर दी गई कि कोई यह बताने में समर्थ नहीं है कि गुंडाधुर कौन है और कहां है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>बस्तर के जंगल के चीखते सन्नाटे आज भी अपने नायक गुंडाधुर का इंतज़ार कर कर रहे हैं।</strong></span></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/how-was-the-goonda-act-made-in-india/10308/">#WorldIndigenousDay: कौन है गुंडा? कैसे बना गुंडा एक्ट? जानिए हैरतंगेज हकीकत</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>#WorldIndigenousDay: &#8220;असुर नेशन&#8221; आदिवासीयों के वजूद बचाने की एक कोशिश</title>
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		<pubDate>Mon, 09 Aug 2021 08:12:39 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>गुरदरी बॉक्साइट माइंस के आसपास के गांवों में बसे असुर आदिवासियों की ये आह ‘असुर आदिवासी विज़डम डॉक्यूमेंटेशन इनीशिएटिव’ फेसबुक पेज पर मौजूद है. वे ‘असुर नेशन डॉट इन’ नाम से वेबसाइट और फेसबुक पेज के ज़रिए अपनी बात दुनियाभर में पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ महीने पहले उन्होंने अपना कम्युनिटी रेडियो भी &#8230;</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>‘हम असुर लोग पाट में रहते हैं। झारखंड के पाट, यानी नेतरहाट में। हमारे इलाके में भारत का बॉक्साइट भरा है। इलाका हमारा है, लेकिन इस पर राज एक कारपोरेट कंपनी करती है। राजधानी रांची से हम करीब 170 किलोमीटर दूर हैं, इसलिए पहाड़ों से हमारी चीख वहां पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देती है। मोबाइल के जरिए मीडिया यहां पहुंच गया है, पर मीडिया वाले इधर झांकते भी नहीं। कारपारेट कंपनी ने सबकी खूब खातिरदारी कर रखी है। हमारी सुनने वाला कोई नहीं है और दिन-रात कंपनी के डंफर हमारी छाती रौंद रहे हैं। इसलिए हम अपनी कहानी अपने बच्चों को बताने के लिए, आप जैसे लोगों को दिखाने के लिए इस तरह की तस्वीरें बना रहे हैं। अपनी दीवालों पर। अपने दिमागों में और काल की छाती पर। इसलिए कि ‘समुद्र मंथन’ खत्म नहीं हुआ है। न ही असुर लोग पूरी तरह से मरे हैं। हम आज भी ज़िंदा हैं।’
			</div>
		</div>
	
<p>गुरदरी बॉक्साइट माइंस के आसपास के गांवों में बसे असुर आदिवासियों की ये आह ‘असुर आदिवासी विज़डम डॉक्यूमेंटेशन इनीशिएटिव’ फेसबुक पेज पर मौजूद है. वे ‘असुर नेशन डॉट इन’ नाम से वेबसाइट और फेसबुक पेज के ज़रिए अपनी बात दुनियाभर में पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं। कुछ महीने पहले उन्होंने अपना कम्युनिटी रेडियो भी शुरू किया है, जंगल में बैठकर ही कार्यक्रमों को ब्रॉडकास्ट किया जाता है। इस तरह वे अपनी भाषा, संस्कृति, पुरखों की ज्ञान परंपरा और वजूद बचाने को संघर्ष कर रहे हैं।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-10301" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/asur-alphabet.jpg" alt="World Indigenous Day, government of tribals, tribals passports, TIS Media, UNESCO, World Tribal Policy, Tribal in India, Tribal Community in India, tribal language" width="696" height="1044" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/asur-alphabet.jpg 696w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/asur-alphabet-200x300.jpg 200w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/asur-alphabet-683x1024.jpg 683w" sizes="auto, (max-width: 696px) 100vw, 696px" /></p>
<p>असुर आदिवासियों का कहना है कि यूनेस्को की खतरे में पड़ी विश्व भाषाओं के एटलस के हिसाब से असुर आदिवासी भाषा खतरे की सूची में है। उनका आरोप है कि कारपोरेट कंपनियों ने हमारा जीवन तबाह कर हाशिये पर पहुंचा दिया है। वहीं, हिंदू कथा-पुराण हमें राक्षस कहते हैं और हमारे रावण, महिषासुर आदि पुरखों की हत्याओं का विजयोत्सव मनाते हैं। इन हालातों के बीच हम असुर आदिवासियों ने अस्तित्व बचाने और भाषा-संस्कृति के संरक्षण को नेतरहाट के जोभीपाट गांव में ‘असुर आदिवासी विजडम अखड़ा’ केन्द्र की स्थापना की है। वे अपील कर रहे हैं कि जीने में मदद कीजिए, सहायता दीजिए ताकि अपनी भाषा-संस्कृति और ज्ञान परंपराओं को बचा सकें।</p>

		<div class="box note  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>ये कितनी अजीब बात है कि दुनियाभर के वैज्ञानिक जहां आदिवासियों को ही अब ग्रह बचाने का जरिया मान रहे हैं और वहीं आदिवासियों को अपना वजूद बचाने के लिए जीने-मरने का संघर्ष करना पड़ रहा है। असुर आदिवासी ही नहीं, बस्तर से लेकर पूर्वोत्तर के राज्यों में, सोनभद्र से लेकर लक्ष्यद्वीप तक यही हाल दिखाई देता है।
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<p>ऐसा सिर्फ भारत में ही नहीं, पूरी दुनिया में हो रहा है। विकसित कहे जाने वाले देशों में भी आदिवासी वजूद और हक के संघर्षों में उतर चुके हैं और उनको गुलाम बनाने वाले प्रतीकों का सफाया कर रहे हैं। क्रिस्टोफर कोलंबस से लेकर नेपोलियन की बीवी तक की मूर्तियों को उखाड़कर नाले में फेंक देना ऐसे ही नहीं हुआ है। वे अब अपने पूर्वजों और नायकों की शिक्षाओं को जिंदा करने की कोशिश कर रहे हैं। वैश्विक एकता बनाने के प्रयास भी आदिवासियों के बीच हो रहे हैं।</p>
<p>गुजरात की आदिवासी छात्रा लता चौधरी ने आदिवासी एकता ध्वज का नमूना बनाया है, जिसमें गोल घेरे में कई रंगों के गोले हैं, जो विभिन्न देशों में मौजूद आदिवासियों की संस्कृति को अभिव्यक्त करते हैं और बीच में मौजूद पंख उनकी एकता को प्रदर्शित करता है। वे बताती हैं कि 2012 के दिसंबर से दुनियाभर में यह आदिवासी एकता ध्वज भेज रहे हैं, जिसे कई समूहों ने अपना भी लिया है।</p>
<p>लता चौधरी का कहना है कि आदिवासी एक दूसरे से पूरी दुनिया में इस तरीके से जुड़ रहे हैं, हालांकि अधिकारों की कम जानकारी की वजह से बहुत परेशानियों का सामना करते हैं। किताबें ये तक कहती हैं कि आदिवासियों को वीज़ा-पासपोर्ट के बगैर सरहदें पार करने का हक है। क्योंकि सरहदें बहुत बाद में बनीं और आदिवासी हमेशा से बिना सरहदों के रहे हैं। उनके टैटू-टोटम या संस्कृति किसी सरहद या पासपोर्ट से ठहर नहीं सकते।</p>
<p>लता के दावे की पड़ताल करने पर जानकारी मिली कि इस दावे में दम तो है। यह भी सच है कि दुनिया में बाकायदा एक आदिवासी सरकार संचालित हो रही है, जो अपना पासपोर्ट भी जारी करती है, जो आदिवासियों के लिए कई देशों में आने-जाने का जरिया है। तथ्य यह भी है कि एबोर्जिनल प्रोवीजनल गवर्नमेंट नाम से संचालित इस सरकार ने जेल में बंद विकीलीक्स के सह संस्थापक जूलियन असांजे को भी पासपोर्ट जारी किया था।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-10302" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/asur.jpg" alt="World Indigenous Day, government of tribals, tribals passports, TIS Media, UNESCO, World Tribal Policy, Tribal in India, Tribal Community in India, tribal language" width="696" height="392" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/asur.jpg 696w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/asur-300x169.jpg 300w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/asur-390x220.jpg 390w" sizes="auto, (max-width: 696px) 100vw, 696px" /></p>
<p>एपीजी डॉट ओआरजी डॉट एयू वेबसाइट पर आदिवासी सरकार के बारे में विवरण दर्ज है कि यह सरकार क्या है और किस तरह का काम कर रही है। इसमें बताया गया है कि आदिवासी अनंतिम सरकार (APG) का गठन 16 जुलाई 1990 को हुआ था। इस सिद्धांत पर सरकार को स्थापित किया गया कि आदिवासी संप्रभु लोग हैं, एपीजी आदिवासी समुदाय के आत्मनिर्णय और स्व-सरकार के लिए अभियान चलाती है। ऑस्ट्रेलियाई में इस सरकार को बनाया गया, जिसे वहां की सरकार ने स्वीकार्यता नहीं दी है। वहीं एपीजी का कहना है कि हमें आदिवासी समुदाय के रूप में औपनिवेशिक हस्तक्षेप के बहिष्कार के साथ ही अपनी भूमि और जीवन का भविष्य तय करने का अधिकार है। हम इस देश को चला चुके हैं और हमारी संप्रभुता का अधिकार हमारे अंदर यह माद्दा पैदा करता है।</p>
<p>आदिवासी संप्रभुता को लागू करने की एपीजी की नीति के तहत ही आदिवासी पासपोर्ट जारी होता है, जो आदिवासी राष्ट्र ऑस्ट्रेलियाई राष्ट्र से अलग है। इस सरकार की आदिवासियों के अधिकारों से जुड़ी कई दूसरी नीतियां भी हैं। एपीजी से जारी यात्रा दस्तावेजों को कई देशों, लीबिया (1987 और 1988), नॉर्वे और स्विट्जरलैंड (1990), और मोहॉक राष्ट्र (2014) में स्वीकार किया जा चुका है। वहीं ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने आदिवासी पासपोर्ट को मान्यता देने से इनकार कर दिया। जबकि, कई आदिवासियों ने ऑस्ट्रेलियाई कस्टम के सामने केवल आदिवासी पासपोर्ट दिखाकर प्रवेश किया है।</p>
<p>एपीजी आदिवासी जन्म प्रमाण पत्र भी जारी करता है, ताकि आदिवासी बच्चों को आदिवासी राष्ट्र के नागरिकों के रूप में पंजीकृत किया जा सके। उन्हें इस पर ऐतराज है कि अपने बच्चों को जन्म के समय औपनिवेशिक ऑस्ट्रेलियाई राज्य के साथ पंजीकृत करने के लिए मजबूर किया जा रहा है। वे कहते हैं कि हमारे अपने जन्म प्रमाणपत्र औपनिवेशिक कानून के दायित्वों की अस्वीकृति है। एपीजी ने पहली बार 1992 में आदिवासी जन्म प्रमाणपत्र जारी करना शुरू किया था।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-10304" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/julian-asanje.jpg" alt="" width="696" height="392" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/julian-asanje.jpg 696w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/julian-asanje-300x169.jpg 300w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/julian-asanje-390x220.jpg 390w" sizes="auto, (max-width: 696px) 100vw, 696px" /></p>
<p>विदेशों में राजनयिक प्रतिनिधिमंडल भेजकर एपीजी ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से आदिवासी संप्रभुता को मान्यता देने की मांग की है। यह 1970 के दशक की शुरुआत में एबोरिजिनल दूतावास ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के अध्यक्ष माओ से इसी हैसियत से मुलाकात की और चीन का दौरा किया। फिर 1980 के दशक के आखिर में लीबिया में कर्नल गद्दाफी के शासनकाल में आदिवासी प्रतिनिधिमंडलों की विरासत को मान्यता मिली।</p>
<p>1994 में एपीजी के संस्थापक अध्यक्ष बॉब वेदरॉल और सचिव माइकल मैनसेल ने दक्षिण प्रशांत फोरम में जगह बनाने के प्रयास में यात्राएं की और कहा कि हमें दुनियाभर में अपने वजूद को हासिल करने की जरूरत है। तब तत्कालीन ऑस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री बॉब हॉक ने दक्षिण प्रशांत देशों पर ऑस्ट्रेलिया की वित्तीय ताकत का इस्तेमाल कर एपीजी को बैठक में शामिल होने से रोक दिया। 2014 में एपीजी के एक प्रतिनिधिमंडल ने मोहॉक क्षेत्र में हौडेनोसौनी संघ के प्रतिनिधियों के साथ मुलाकात की, जो उत्तरी और लैटिन अमेरिका में आदिवासी संस्कृति को सहेजने की कोशिश कर रहे हैं।</p>
<p>एपीजी गैर-आदिवासी उन लोगों को भी वीजा जारी करता है जो आदिवासी राष्ट्र की सीमा में रह रहे हैं और आदिवासी संप्रभुता के दावे को स्वीकार कर वीजा का आवेदन करते हैं। यह सरकार दुनियाभर में आदिवासी समाज व्यवस्था के मॉडल के व्यवहारिक पहलुओं पर बातचीत और चर्चा को सार्वजनिक मंचों पर लाने की कोशिश में है। एपीजी कार्यकारी परिषद संगठन की गतिविधियों और परिवर्तन के एजेंडे का नेतृत्व करने के लिए जिम्मेदार है। एपीजी को शुरू में बुजुर्गों की एक शासी परिषद के साथ स्थापित किया गया था।</p>
<p>अगस्त 1992 में, एपीजी ने होबार्ट में अपनी पहली राष्ट्रीय बैठक की थी, जिसमें 150 से ज्यादा आदिवासी पुरुषों, महिलाओं और बच्चों ने होबार्ट हवाई अड्डे पर प्रतिनिधियों का अपनी परंपराओं से स्वागत किया। प्रतिनिधि सभी आदिवासी समुदायों के राजदूत थे। स्थानीय और राष्ट्रीय मीडिया ने इस घटना को फिल्माया। प्रतिनिधियों को शहर में बेतरतीब तरीके से नहीं, बल्कि बोनट पर चढ़ाकर आदिवासी झंडे लहराते कारों के काफिले के साथ ले जाया गया। रास्ते में काफिला जब एक पुल के नीचे से गुजरा, तस्मानियाई आदिवासी केंद्र के चाइल्ड केयर सेंटर के बच्चों ने वेलकम एपीजी का एक विशाल बैनर लगाकर स्वागत किया। पुलिस ने चौराहों पर यातायात रोककर काफिले की यात्रा व्यवस्थित किया।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="aligncenter size-full wp-image-10305" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/aborginal1.jpg" alt="World Indigenous Day, government of tribals, tribals passports, TIS Media, UNESCO, World Tribal Policy, Tribal in India, Tribal Community in India, tribal language" width="696" height="392" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/aborginal1.jpg 696w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/aborginal1-300x169.jpg 300w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/08/aborginal1-390x220.jpg 390w" sizes="auto, (max-width: 696px) 100vw, 696px" />संस्थापक एपीजी अध्यक्ष बॉब वेदरॉल ने उस वक्त कहा था, एपीजी सरकार आदिवासियों की कई पीढ़ियों के संघर्ष का नतीजा है, जिन्होंने आदिवासियों को इंसाफ के लिए लंबी लड़ाई लड़ी। यह सरकार इस सच्चाई और संघर्ष का प्रतिनिधित्व करती है, जिसका मकसद आदिवासियों के रूप में आने वाली पीढ़ियों को उनका हक दिलाना है, जो उनको कुदरत ने मुहैया कराया है। संयुक्त राष्ट्र संघ के अनुसार, दुनियाभर के 90 देशों में 47 करोड़ 60 लाख से ज्यादा आदिवासी निवास करते हैं, जो वैश्विक आबादी का 6.2 प्रतिशत हैं। उनकी अनूठी संस्कृतियों, परंपराओं, भाषाओं और ज्ञान प्रणालियों की विशाल श्रृंखला है। उनका अपनी भूमि के साथ एक खास रिश्ता है और एक विश्वदृष्टि के साथ ही विकास की प्राथमिकताओं की अवधारणाएं हैं।</p>
<p>यूनेस्को के मुताबिक, आदिवासी समुदाय के बीच दुनियाभर में इस्तेमाल की जाने वाली 7,000 भाषाओं में से कम से कम 40 फीसद किसी न किसी स्तर पर खतरे में हैं। जबकि विश्वसनीय आंकड़े मिलना बहुत मुश्किल है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इन भाषाओं का कमजोर होने कारण स्कूलों में न पढ़ाया जाना और सार्वजनिक क्षेत्र में उपयोग न होना है। मेक्सिको सिटी में हो चुके इस मामले पर विशेष दो दिवसीय कार्यक्रम में 50 देशों के 500 से ज्यादा विशेषज्ञ भागीदारों ने इस चुनौती को स्वीकार किया और आदिवासियों के हित में नारा बुलंद किया, “हमारे बिना हमारे लिए कुछ नहीं”। यह नारा कितना कारगर हुआ है, यह आदिवासियों के हालात से समझा जा सकता है।</p>
<p><strong>(<span style="color: #ff0000;">लेखक- आशीष आनंद, यह लेखक के अपने विचार हैं।</span>)</strong></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/world-indigenous-day-do-you-know-that-tribals-also-have-a-government-in-the-world/10300/">#WorldIndigenousDay: &#8220;असुर नेशन&#8221; आदिवासीयों के वजूद बचाने की एक कोशिश</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>शंखनाद: मुंशी प्रेमचंद की बयानी मुखिया भानु चौधरी के घर की कहानी&#8230;</title>
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		<pubDate>Mon, 02 Aug 2021 06:44:34 +0000</pubDate>
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<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/munshi-premchand-story-shankhnad-tis-media/10215/">शंखनाद: मुंशी प्रेमचंद की बयानी मुखिया भानु चौधरी के घर की कहानी&#8230;</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<h1 class="section-heading text-center"></h1>
<p style="text-align: center;"><strong>1</strong></p>
<p>भानु चौधरी अपने गाँव के मुखिया थे। गाँव में उनका बड़ा मान था। दारोगा जी उन्हें टाट बिना जमीन पर न बैठने देते। मुखिया साहब की ऐसी धाक बँधी हुई थी कि उनकी मरजी बिना गाँव में एक पत्ता भी नहीं हिल सकता था। कोई घटना, चाहे वह सास-बहू का विवाद हो, चाहे मेंड़ या खेत का झगड़ा, चौधरी साहब के शासनाधिकार को पूर्णरूप से सचेत करने के लिए काफी थी, वह तुरंत घटनास्थल पर जा पहुँचते, तहकीकात होने लगती, गवाह और सबूत के सिवा किसी अभियोग को सफलता सहित चलाने में जिन बातों की जरूरत होती है, उन सब पर विचार होता और चौधरी जी के दरबार से फैसला हो जाता। किसी को अदालत जाने की जरूरत न पड़ती। हाँ, इस कष्ट के लिए चौधरी साहब कुछ फीस जरूर लेते थे। यदि किसी अवसर पर फीस मिलने में असुविधा के कारण उन्हें धीरज से काम लेना पड़ता तो गाँव में आफत मच जाती थी; क्योंकि उनके धीरज और दारोगा जी के क्रोध में कोई घनिष्ठ संबंध था। सारांश यह कि चौधरी से उनके दोस्त-दुश्मन सभी चौकन्ने रहते थे।</p>
<p align="center"><strong>2</strong></p>
<p style="text-align: left;" align="center">चौधरी महाशय के तीन सुयोग्य पुत्र थे। बड़े लड़के बितान एक सुशिक्षित मनुष्य थे। डाकिये के रजिस्टर पर दस्तखत कर लेते थे। बड़े अनुभवी, बड़े मर्मज्ञ, बड़े नीति-कुशल। मिर्जई की जगह कमीज पहनते, कभी-कभी सिगरेट भी पीते, जिससे उनका गौरव बढ़ता था। यद्यपि उनके ये दुर्व्यसन बूढ़े चौधरी को नापसंद थे, पर बेचारे विवश थे; क्योंकि अदालत और कानून के मामले बितान के हाथों में थे। वह कानून का पुतला था। कानून की दफाएँ उसकी जबान पर रखी रहती थीं। गवाह गढ़ने में वह पूरा उस्ताद था। मझले लड़के शान चौधरी कृषि-विभाग के अधिकारी थे। बु़द्धि के मंद; लेकिन शरीर से बड़े परिश्रमी। जहाँ घास न जमती हो, वहाँ केसर जमा दें। तीसरे लड़के का नाम गुमान था। वह बड़ा रसिक, साथ ही उद्दंड भी था। मुहर्रम में ढोल इतने जोरों से बजाता कि कान के पर्दे फट जाते। मछली फँसाने का बड़ा शौकीन था। बड़ा रँगीला जवान था। खँजड़ी बजा-बजाकर जब वह मीठे स्वर से ख्याल गाता, तो रंग जम जाता। उसे दंगल का ऐसा शौक था कि कोसों तक धावा मारता; पर घरवाले कुछ ऐसे शुष्क थे कि उसके इन व्यसनों से तनिक भी सहानुभूति न रखते थे। पिता और भाइयों ने तो उसे ऊसर खेत समझ रखा था। घुड़की-धमकी, शिक्षा और उपदेश, स्नेह और विनय, किसी का उस पर कुछ भी असर न हुआ।</p>
<p>हाँ, भावजें अभी तक उसकी ओर से निराश न हुई थीं। वे अभी तक उसे कड़वी दवाइयाँ पिलाये जाती थीं; पर आलस्य वह राज रोग है जिसका रोगी कभी नहीं सँभलता। ऐसा कोई बिरला ही दिन जाता होगा कि बाँके गुमान को भावजों के कटु वाक्य न सुनने पड़ते हों। ये विषैले शर कभी-कभी उसके कठोर हृदय में चुभ जाते; किन्तु यह घाव रात भर से अधिक न रहता। भोर होते ही थकान के साथ ही यह पीड़ा भी शांत हो जाती। तड़का हुआ, उसने हाथ-मुँह धोया, बंशी उठायी और तालाब की ओर चल खड़ा हुआ। भावजें फूलों की वर्षा किया करतीं; बूढ़े चौधरी पैंतरे बदलते रहते और भाई लोग तीखी निगाह से देखा करते, पर अपनी धुन का पूरा बाँका गुमान उन लोगों के बीच से इस तह अकड़ता चला जाता, जैसे कोई मस्त हाथी कुत्तों के बीच से निकल जाता है। उसे सुमार्ग पर लाने के लिए क्या-क्या उपाय नहीं किये गये। बाप समझाता-बेटा ऐसी राह चलो जिसमें तुम्हें भी पैसे मिलें और गृहस्थी का भी निर्वाह हो। भाइयों के भरोसे कब तक रहोगे ? मैं पका आम हूँ-आज टपक पड़ा या कल। फिर तुम्हारा निबाह कैसे होगा ?</p>
<p>भाई बात भी न पूछेंगे; भावजों का रंग देख ही रहे हो। तुम्हारे भी लड़के-बाले हैं, उनका भार कैसे सँभालोगे ? खेती में जी न लगे, कहो कांस्टिबली में भरती करा दूँ ? बाँका गुमान खड़ा-खड़ा यह सब सुनता, लेकिन पत्थर का देवता था, कभी न पसीजता। इन महाशय के अत्याचार का दंड उनकी स्त्री बेचारी को भोगना पड़ता था। मेहनत के घर के जितने काम होते, वे उसी के सिर थोपे जाते। उपले पाथती, कुएँ से पानी लाती, आटा पीसती और तिस पर भी जेठानियाँ सीधे मुँह बात न करतीं, वाक्य-बाणों से छेदा करतीं। एक बार जब वह पति से कई दिन रूठी रही, तो बाँके गुमान कुछ नर्म हुए। बाप से जा कर बोले-मुझे कोई दूकान खोलवा दीजिए। चौधरी ने परमात्मा को धन्यवाद दिया। फूले न समाये। कई सौ रुपये लगा कर कपड़े की दूकान खुलवा दी। गुमान के भाग जगे। तनजेब के चुन्नटदार कुरते बनवाये, मलमल का साफा धानी रंग में रँगवाया। सौदा बिके या न बिके, उसे लाभ ही होना था ! दूकान खुली हुई है, दस-पाँच गाढ़े मित्र जमे हुए हैं, चरस की दम और ख्याल की तानें उड़ रही हैं-</p>
<p><strong>चल झटपट री, जमुना-तट री, खड़ो नटखट री।</strong></p>
<p>इस तरह तीन महीने चैन से कटे। बाँके गुमान ने खूब दिल खोल कर अरमान निकाले, यहाँ तक कि सारी लागत लाभ हो गयी। टाट के टुकडे़ के सिवा और कुछ न बचा। बूढ़े चौधरी कुएँ में गिरने चले, भावजों ने घोर आन्दोलन मचाया-अरे राम ! हमारे बच्चे और हम चीथड़ों को तरसें, गाढे़ का एक कुरता भी नसीब न हो, और इतनी बड़ी दूकान इस निखट्टू का कफन बन गयी। अब कौन मुँह दिखायेगा ? कौन मुँह ले कर घर में पैर रखेगा ? किंतु बाँके गुमान के तेवर जरा भी मैले न हुए। वही मुँह लिये वह फिर घर आया और फिर वही पुरानी चाल चलने लगा। कानूनदाँ बितान उनके ये ठाट-बाट देख कर जल जाता। मैं सारे दिन पसीना बहाऊँ, मुझे नैनसुख का कुरता भी न मिले, यह अपाहिज सारे दिन चारपाई तोड़े और यों बन-ठन कर निकले ? ऐसे वस्त्र तो शायद मुझे अपने ब्याह में भी न मिले होंगे। मीठे शान के हृदय में भी कुछ ऐसे ही विचार उठते थे। अंत में यह जलन न सही गयी, और अग्नि भड़की, तो एक दिन कानूनदाँ बितान की पत्नी गुमान के सारे कपड़े उठा लायी और उन पर मिट्टी का तेल उँड़ेल कर आग लगा दी। ज्वाला उठी, सारे कपड़े देखते-देखते जल कर राख हो गये। गुमान रोते थे। दोनों भाई खड़े तमाशा देखते थे। बूढ़े चौधरी ने यह दृश्य देखा, और सिर पीट लिया। यह द्वेषाग्नि है। घर को जला कर तब बुझेगी।</p>
<p align="center"><strong>3</strong></p>
<p>यह ज्वाला तो थोड़ी देर में शांत हो गयी, परंतु हृदय की आग ज्यों की त्यों दहकती रही। अंत में एक दिन बूढ़े चौधरी ने घर के सब मेम्बरों को एकत्र किया और इस गूढ़ विषय पर विचार करने लगे कि बेड़ा कैसे पार हो। बितान से बोले-बेटा, तुमने आज देखा कि बात की बात में सैकड़ों रुपयों पर पानी फिर गया। अब इस तरह निर्वाह होना असम्भव है। तुम समझदार हो, मुकदमे-मामले करते हो, कोई ऐसी राह निकालो कि घर डूबने से बचे। मैं तो यह चाहता था कि जब तक चोला रहे, सबको समेटे रहूँ, मगर भगवान् के मन में कुछ और ही है।</p>
<p>बितान की नीतिकुशलता अपनी चतुर सहगामिनी के सामने लुप्त हो जाती थी। वह अभी उसका उत्तर सोच ही रहे थे कि श्रीमती जी बोल उठीं-दादा जी ! अब समुझाने-बुझाने से काम न चलेगा, सहते-सहते हमारा कलेजा पक गया। बेटे की जितनी पीर बाप को होगी, भाइयों को उतनी क्या, उसकी आधी भी नहीं हो सकती। मैं तो साफ कहती हूँ-गुमान का तुम्हारी कमाई में हक है, उन्हें कंचन के कौर खिलाओ और चाँदी के हिंडोले में झुलाओ। हममें न इतना बूता है, न इतना कलेजा। हम अपनी झोंपड़ी अलग बना लेंगे। हाँ, जो कुछ हमारा हो, वह हमको मिलना चाहिए। बाँट-बखरा कर दीजिए। बला से चार आदमी हँसेंगे, अब कहाँ तक दुनिया की लाज ढोवें ?</p>
<p>नीतिज्ञ बितान पर इस प्रबल वक्तृता का जो असर हुआ वह उनके विकसित और प्रमुदित चेहरे से झलक रहा था। उनमें स्वयं इतना साहस न था कि इस प्रस्ताव को इतनी स्पष्टता से व्यक्त कर सकते। नीतिज्ञ महाशय गंभीरता से बोले-जायदाद मुश्तरका, मन्कूला या गैरमन्कूला, आपके हीन-हयात तकसीम की जा सकती है, इसकी नजीरें मौजूद हैं। जमींदार को साकितुलमिल्कियत करने का कोई इस्तहक़ाक़ नहीं है।</p>
<p>अब मंदबुद्धि शान की बारी आयी, पर बेचारा किसान, बैलों के पीछे आँखें बंद करके चलनेवाला, ऐसे गूढ़ विषय पर कैसे मुँह खोलता। दुविधा में पड़ा हुआ था। तब उसकी सत्यवक्ता धर्मपत्नी ने अपनी जेठानी का अनुसरण कर यह कठिन कार्य सम्पन्न किया। बोली-बड़ी बहन ने जो कुछ कहा, उसके सिवा और दूसरा उपाय नहीं। कोई तो कलेजा तोड़-तोड़ कर कमाये मगर पैसे-पैसे को तरसे, तन ढाँकने को वस्त्र तक न मिले, और कोई सुख की नींद सोये, हाथ बढ़ा-बढ़ा के खाय ! ऐसी अंधेर नगरी में अब हमारा निबाह न होगा।</p>
<p>शान चौधरी ने भी इस प्रस्ताव का मुक्तकंठ से अनुमोदन किया। अब बूढ़े चौधरी गुमान से बोले-क्यों बेटा, तुम्हें भी यही मंजूर है ? अभी कुछ नहीं बिगड़ा। यह आग अब भी बुझ सकती है। काम सबको प्यारा है, चाम किसी को नहीं। बोलो, क्या कहते हो ? कुछ काम-धंधा करोगे या अभी आँखें नहीं खुलीं ?</p>
<p>गुमान में धैर्य की कमी न थी। बातों को इस कान से सुन कर उस कान से उड़ा देना उसका नित्य-कर्म था। किंतु भाइयों की इस जन-मुरीदी पर उसे क्रोध आ गया। बोला-भाइयों की जो इच्छा है, वही मेरे मन में भी लगी हुई है। मैं भी इस जंजाल से भागना चाहता हूँ। मुझसे न मजूरी हुई, न होगी। जिसके भाग्य में चक्की पीसना बदा हो, वह पीसे ! मेरे भाग्य में चैन करना लिखा है, मैं क्यों अपना सिर ओखली में दूँ ? मैं तो किसी से काम करने को नहीं कहता। आप लोग क्यों मेरे पीछे पड़े हुए हैं। अपनी-अपनी फिक्र कीजिए। मुझे आध सेर आटे की कमी नहीं है।</p>
<p>इस तरह की सभाएँ कितनी ही बार हो चुकी थीं, परंतु इस देश की सामाजिक और राजनीतिक सभाओं की तरह इसमें भी कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता था। दो-तीन दिन गुमान ने घर पर खाना नहीं खाया। जतनसिंह ठाकुर शौकीन आदमी थे, उन्हीं की चौपाल में पड़ा रहता। अंत में बूढे़ चौधरी गये और मना के लाये। अब फिर वह पुरानी गाड़ी अड़ती, मचलती, हिलती चलने लगी।</p>
<p align="center"><strong>4</strong></p>
<p>पांडे के घर के चूहों की तरह, चौधरी के घर में बच्चे भी सयाने थे। उनके लिए घोड़े मिट्टी के घोड़े और नावें कागज की नावें थीं। फलों के विषय में उनका ज्ञान असीम था, गूलर और जंगली बेर के सिवा कोई ऐसा फल न था, जिसे वे बीमारियों का घर न समझते हों, लेकिन गुरदीन के खोंचे में ऐसा प्रबल आकर्षण था कि उसकी ललकार सुनते ही उनका सारा ज्ञान व्यर्थ हो जाता था। साधारण बच्चों की तरह यदि सोते भी हों, तो चौंक पड़ते थे। गुरदीन उस गाँव में साप्ताहिक फेरे लगाता था। उसके शुभागमन की प्रतीक्षा और आकांक्षा में कितने ही बालकों को बिना किंडरगार्टन की रंगीन गोलियों के ही, संख्याएँ और दिनों के नाम याद हो गये थे। गुरदीन बूढ़ा-सा, मैला-कुचैला आदमी था; किंतु आस-पास में उसका नाम उपद्रवी लड़कों के लिए हनुमान-मंत्र से कम न था। उसकी आवाज सुनते ही उसके खोंचे पर लड़कों का ऐसा धावा होता कि मक्खियों की असंख्य सेना को भी रण-स्थल से भागना पड़ता था। और जहाँ बच्चों के लिए मिठाइयाँ थीं, वहाँ गुरदीन के पास माताओं के लिए इससे भी ज्यादा मीठी बातें थीं। माँ कितना ही मना करती रहे, बार-बार पैसा न रहने का बहाना करे पर गुरदीन चटपट मिठाइयों का दोना बच्चों के हाथ में रख ही देता और स्नेहपूर्ण भाव से कहता-बहू जी, पैसों की कोई चिन्ता न करो, फिर मिलते रहेंगे, कहीं भागे थोडे़ ही जाते हैं। नारायण ने तुमको बच्चे दिये हैं, तो मुझे भी उनकी न्योछावर मिल जाती है, उन्हीं की बदौलत मेरे बाल-बच्चे भी जीते हैं। अभी क्या, ईश्वर इनका मौर तो दिखावे, फिर देखना कैसा ठनगन करता हूँ।</p>
<p>गुरदीन का यह व्यवहार चाहे वाणिज्य-नियमों के प्रतिकूल ही क्यों न हो, चाहे ‘नौ नगद सही, तेरह उधार नहीं’ वाली कहावत अनुभवसिद्ध ही क्यों न हो, किंतु मिष्टभाषी गुरदीन को कभी अपने इस व्यवहार पर पछताने या उसमें संशोधन करने की जरूरत नहीं हुई।</p>
<p>मंगल का शुभ दिन था। बच्चे बड़ी बेचैनी से अपने दरवाजों पर खड़े गुरदीन की राह देख रहे थे। कई उत्साही लड़के पेड़ों पर चढ़ गये और कोई-कोई अनुराग से विवश हो कर गाँव के बाहर निकल गये थे। सूर्य भगवान् अपना सुनहला थाल लिए पूरब से पश्चिम जा पहुँचे थे, इतने में ही गुरदीन आता हुआ दिखायी दिया। लड़कों ने दौड़कर उसका दामन पकड़ा और आपस में खींचातानी होने लगी। कोई कहता था मेरे घर चलो; कोई अपने घर का न्योता देता था। सबसे पहले भानु चौधरी का मकान पड़ा। गुरदीन ने अपना खोंचा उतार दिया। मिठाइयों की लूट शुरू हो गयी। बालकों और स्त्रियों का ठट्ठ लग गया। हर्ष और विषाद, संतोष और लोभ, ईर्ष्या और क्षोभ, द्वेष और जलन की नाट्यशाला सज गयी। कानूनदाँ बितान की पत्नी अपने तीनों लड़कों को लिये हुए निकली। शान की पत्नी भी अपने दोनों लड़कों के साथ उपस्थित हुई। गुरदीन ने मीठी बातें करनी शुरू कीं। पैसे झोली में रखे, धेले की मिठाई दी और धेले का आशीर्वाद। लड़के दोने लिए उछलते-कूदते घर में दाखिल हुए। अगर सारे गाँव में कोई ऐसा बालक था जिसने गुरदीन की उदारता से लाभ उठाया हो, तो वह बाँके गुमान का लड़का धान था।</p>
<p>यह कठिन था कि बालक धान अपने भाइयों-बहनों को हँस-हँस और उछल-उछल कर मिठाइयाँ खाते देख कर सब्र कर जाय ! उस पर तुर्रा यह कि वे उसे मिठाइयाँ दिखा-दिखा कर ललचाते और चिढ़ाते थे। बेचारा धान चीखता और अपनी माता का आँचल पकड़-पकड़ कर दरवाजे की तरफ खींचता था; पर वह अबला क्या करे। उसका हृदय बच्चे के लिए ऐंठ-ऐंठ कर रह जाता था। उसके पास एक पैसा भी नहीं था। अपने दुर्भाग्य पर, जेठानियों की निष्ठुरता पर और सबसे ज्यादा अपने पति के निखट्टूपन पर कुढ़-कुढ़ कर रह जाती थी। अपना आदमी ऐसा निकम्मा न होता, तो क्यों दूसरों का मुँह देखना पड़ता, क्यों दूसरों के धक्के खाने पड़ते ? उसने धान को गोद में उठा लिया और प्यार से दिलासा देने लगी-बेटा, रोओ मत, अबकी गुरदीन आवेगा तो तुम्हें बहुत-सी मिठाई ले दूँगी, मैं इससे अच्छी मिठाई बाजार से मँगवा दूँगी, तुम कितनी मिठाई खाओगे ! यह कहते-कहते उसकी आँखे भर आयीं। आह ! यह मनहूस मंगल आज ही फिर आवेगा, और फिर ये ही बहाने करने पड़ेंगे ! हाय, अपना प्यारा बच्चा धेले की मिठाई को तरसे और घर में किसी का पत्थर-सा कलेजा न पसीजे ! वह बेचारी तो इन चिंताओं में डूबी हुई थी और धान किसी तरह चुप ही न होता था। जब कुछ वश न चला, तो माँ की गोद से जमीन पर उतर कर लोटने लगा और रो-रो कर दुनिया सिर पर उठा ली। माँ ने बहुत बहलाया, फुसलाया, यहाँ तक कि उसे बच्चे के इस हठ पर क्रोध भी आ गया। मानव हृदय के रहस्य कभी समझ में नहीं आते। कहाँ तो बच्चे को प्यार से चिपटाती थी, ऐसी झल्लायी कि उसे दो-तीन थप्पड़ जोर से लगाये और घुड़क कर बोली-चुप रह अभागे ! तेरा ही मुँह मिठाई खाने का है ? अपने दिन को नहीं रोता, मिठाई खाने चला है ?</p>
<p>बाँका गुमान अपनी कोठरी के द्वार पर बैठा हुआ यह कौतुक बड़े ध्यान से देख रहा था। वह इस बच्चे को बहुत चाहता था। इस वक्त के थप्पड़ उसके हृदय में तेज भाले के समान लगे और चुभ गये। शायद उनका अभिप्राय भी यही था। धुनिया रुई को धुनने के लिए ताँत पर चोट लगाता है।</p>
<p>जिस तरह पत्थर और पानी में आग छिपी रहती है, उसी तरह मनुष्य के हृदय में भी, चाहे वह कैसा ही क्रूर और कठोर क्यों न हो, उत्कृष्ट और कोमल भाव छिपे रहते हैं। गुमान की आँखें भर आयीं। आँसू की बूँदें बहुधा हमारे हृदय की मलिनता को उज्ज्वल कर देती हैं। गुमान सचेत हो गया। उसने जा कर बच्चे को गोद में उठा लिया और अपनी पत्नी से करुणोत्पादक स्वर में बोला-बच्चे पर इतना क्रोध क्यों करती हो ? तुम्हारा दोषी मैं हूँ, मुझको जो दंड चाहो, दो। परमात्मा ने चाहा तो कल से लोग इस घर में मेरा और मेरे बाल-बच्चों का भी आदर करेंगे। तुमने आज मुझे सदा के लिए इस तरह जगा दिया, मानो मेरे कानों में शंखनाद कर मुझे कर्म-पथ में प्रवेश का उपदेश दिया हो।</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/munshi-premchand-story-shankhnad-tis-media/10215/">शंखनाद: मुंशी प्रेमचंद की बयानी मुखिया भानु चौधरी के घर की कहानी&#8230;</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>प्रेमचंदः जीवन का लेखक पढ़िए कथा सम्राट की जयंती पर विवेक मिश्र का &#8220;विमर्श&#8221;</title>
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		<pubDate>Sat, 31 Jul 2021 07:43:46 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>प्रेमचंद भारतीय ग्राम समाज के जीवन संसार को बहुत गहरे उतर कर अनुभव करते हैं। गांव का सच और मनुष्य मात्र के सच को अपने कथा भूमि में रखते हुए वे सीधे &#8211; सीधे उस जगह पर लें जाते हैं जहां से कहानी केवल कहने के लिए नहीं आती वल्कि उस सत्य से हमारा साक्षात्कार &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/katha-samrat-munshi-premchand-birth-anniversary/10212/">प्रेमचंदः जीवन का लेखक पढ़िए कथा सम्राट की जयंती पर विवेक मिश्र का &#8220;विमर्श&#8221;</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>प्रेमचंद जीवन को गढ़ते हैं। एक ऐसे संसार को बनाते हैं जिसमें सब रह सकें। उनकी कहानियां मनुष्य की चरित गाथा हैं जिसमें सभी अपना चेहरा देख सकते हैं । मनुष्य को , गांव समाज और मानवीय जिजीविषा को समझने के लिए उनके यहां इतने जिंदा चरित्र हैं कि उस रोशनी में हर समय में मनुष्य होने के नाते हम अपनी दुनिया को रच और गढ़ सकते हैं। <strong>विमर्श</strong> &#8211; <strong>विवेक कुमार मिश्र</strong>
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<div dir="auto"><strong>प्रेमचंद</strong> भारतीय ग्राम समाज के जीवन संसार को बहुत गहरे उतर कर अनुभव करते हैं। गांव का सच और मनुष्य मात्र के सच को अपने कथा भूमि में रखते हुए वे सीधे &#8211; सीधे उस जगह पर लें जाते हैं जहां से कहानी केवल कहने के लिए नहीं आती वल्कि उस सत्य से हमारा साक्षात्कार कराती है जिसे जानना और समझना जीवन संसार को जानना होता है। गांव की कथा उनके यहां जीवन संघर्ष की यात्रा है। संसार को समझने के लिए मानव कथा में होना और गांव में होना पूरी एक दुनिया है। यहां हाड़ मांस के वास्तविक आदमी हैं और सीधे व सरल अपनी प्रकृति के साथ रहते हैं। चालाकियां, बाजार और छल छद्म नहीं है यहां। ये अपने ढंग से सीधी &#8211; साधी दुनिया में जीवन जीना चाहते हैं पर यह भी नसीब नहीं हो पाता। बहुत मुश्किल से घर संसार की जीवन गाड़ी चलती है। ऐसे में मनुष्य की इच्छा और स्वप्न को कैसे पाया जाये , यह भी आसान नहीं है। मानवीय स्वप्न को समझने के लिए हमें गांव के संसार को जीना पड़ता है और इस जीने में मदद प्रेमचंद की कथा कहानियां करती हैं।</div>
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<div dir="auto"><strong>Read More: <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/premchand-story-bhaade-ka-tattoo/10209/">भाड़े का टट्टूः आगरा कॉलेज का मैदान और दो दोस्तों की यादगार कहानी, मुंशी प्रेमचंद की बयानी</a></strong></div>
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<div dir="auto">प्रेमचंद के विषय क्या हैं ? संसार क्या हैं और जीवन स्थितियां क्या हैं ? यहीं न कि बेटा बीमार है और पिता अपने बेटे को लेकर डॉक्टर के यहां दिखाने जाता है । डॉक्टर चड्डा को गोल्फ खेलने जाना है । वह बीमार बेटे को नहीं देखता बहुत बिनती करने के बाद भी नहीं देखता, हताश निराश बूढ़ा पिता बीमार बेटे को लेकर घर जाता है और इलाज के बिना ही भगत का बेटा मर जाता है। बूढ़ा पिता जिस पर दुखों का पहाड़ टूट जाता है। मन मसोस कर रह जाता कि क्या करें? पर यहीं प्रेमचंद और कहानी करिश्माई ढंग से सामने आती है कि थोड़े दिनों बाद ही स्थितियां बदलती हैं। डॉक्टर चड्डा के बेटे को सांप डस लेता है। पूरे इलाके में आग की तरह यह खबर फैल जाती है। बूढ़े पिता भगत को भी सूचना पहुंचती है कि डाक्टर के बेटे को सांप ने काट लिया। यहां भगत को सांप का मंतर, जहर उतारना आता है। भगत सीधे डॉक्टर के घर जाता है भीड़ को चीरते हुए डॉ.चड्डा के बेटे को देखता है। उसकी नब्ज टटोलने के बाद &#8230;सांप का मंत्र मारना शुरू करता है। यह वहीं भगत है जिसके बीमार बेटे को डॉक्टर ने देखने से साफ मना कर दिया था। पर भगत जो सांप का मंत्र जानता है वह डॉक्टर के बेटे को जिंदा करता है । यह बड़े डॉक्टर और बूढ़े गरीब भगत के जीवन के प्रति सोच का अंतर है ।</div>
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<div dir="auto"><strong>Read More: <a href="https://tismedia.in/art-culture/baudam-story-of-munshi-premchand-tis-media/10189/">बौड़म: आखिर लोग आपको बौड़म क्यों कहते हैं? पढ़िए साहित्य सम्राट मुंशी प्रेम चंद की कहानी</a></strong></div>
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<div dir="auto">एक के लिए अपना शौक बड़ा है भले जीवन चला जाये वहीं दूसरे के लिए जीवन को किसी भी स्थिति में क्यों न हो बचाना मूल्यवान है। यह जीवन के प्रति सोच और दुनिया को अपने अपने ढंग से देखने का नतीजा है कि एक के पास सब कुछ होते हुए भी वह बीमार को नहीं बचाता और दूसरा जिसके उपर दुखों का पहाड़ टूटा है वह मृत्यु की ओर जा रहे व्यक्ति को बचाने के लिए दौड़ पड़ता है । यहां पर कथाकार प्रेमचंद जो दुनिया रचते हैं उसमें बड़ा आदमी वह नहीं है जिसके पास धन दौलत है , जिसके बड़े शौंक हैं नहीं नहीं बड़ा वह है जो अभावों के बीच , दुखों के पहाड़ पर रहते हुए भी जीवन को बचाने के लिए न केवल दौड़ता है वल्कि जीवन को बचाता है । बूढ़ा भगत इस समय किसी भगवान की तरह सामने आता है । मानवीय वोध को जीवन की प्रेरणा बनाने का काम यह कहानी इस कला के साथ करती है कि संवेदना की अजस्र धार मानों फूट पड़ी हों । यह प्रेमचंद की संवेदना और प्रतिरोध का प्रमाण भी है कि जीवन को बचाने के लिए हमें किसी तरह के प्रतिशोध में नहीं आना चाहिए । किसी भी कीमत पर जीवन की रक्षा की जानी चाहिए । यह मानवता का संदेश है और यथार्थ की उस भूमि से संदेश सामने आता है कि यह सीधे मन पर , जीवन पर उतर जाता है ।</div>
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<div dir="auto"><strong>Read More: <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/katil-story-by-munshi-premchand/9120/">क़ातिल&#8230; पढ़िए, आज की कहानी</a></strong></div>
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<div dir="auto">बूढ़ा भगत गांव की भूमि से, अभाव की भूमि से मनुष्यता के लिए, जीवन के लिए दौड़ता है। अभाव, दुःख और संघर्ष कितना भी बड़ा क्यों न हो वह जीवन को बचाने के लिए सामने आता है। यह दुनिया केवल धन से नहीं चलती न अपनी ज़िद से चलती वल्कि मानवीय वोध और जीवन के प्रति सम्मान के भाव से चलती है। इस तरह प्रेमचंद जीवन को गढ़ते हैं। एक ऐसे संसार को बनाते हैं जिसमें सब रह सकें। उनकी कहानियां मनुष्य की चरित गाथा हैं जिसमें सभी अपना चेहरा देख सकते हैं । मनुष्य को , गांव समाज और मानवीय जिजीविषा को समझने के लिए उनके यहां इतने जिंदा चरित्र हैं कि उस रोशनी में हर समय में मनुष्य होने के नाते हम अपनी दुनिया को रच और गढ़ सकते हैं।</div>
<div dir="auto"><strong>(विमर्श: लेखक- विवेक कुमार मिश्र)</strong></div>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/katha-samrat-munshi-premchand-birth-anniversary/10212/">प्रेमचंदः जीवन का लेखक पढ़िए कथा सम्राट की जयंती पर विवेक मिश्र का &#8220;विमर्श&#8221;</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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