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	<title>Article by Dr Mukti Parashar Archives - TIS Media</title>
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	<title>Article by Dr Mukti Parashar Archives - TIS Media</title>
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		<title>कोटा चित्रशैली में प्रकृति संग कृष्ण जीवन का चित्रांकन</title>
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		<pubDate>Sun, 16 May 2021 10:43:19 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>धार्मिक चित्रों में कोटा के राम माधोसिंह को भी अनेक दृश्यों में प्रमुखता से चित्रित किया गया है &#124; छत्र महल के आंतरिक ग्रह प्रवेश द्वार से जुड़ी मिति पर कृष्ण के जीवन से संबंधित चित्रों की भरमार है &#124; जैसे— कृष्ण एवं गोपियां भवन के मध्य में संगीतमय क्षणों में, प्रेमालिंगन कृष्ण अपनी प्रेयसी &#8230;</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>मनोरंजन के लिए लोकोत्सव की परंपरा में कोटा के लघु चित्रों एवं मिति चित्र में लोकोत्सव का परंपरागत स्वरूप ही चित्रित किया गया है | यहां पर कई धार्मिक चित्रों के साथ श्री कृष्ण जी व उनके स्वरूप ब्रजनाथ जी से संबंधित चित्र बहुतायत से बने हैं | इन सभी में प्रकृति को भी विशिष्ट महत्व दिया गया है |
			</div>
		</div>
	
<p>धार्मिक चित्रों में कोटा के राम माधोसिंह को भी अनेक दृश्यों में प्रमुखता से चित्रित किया गया है | छत्र महल के आंतरिक ग्रह प्रवेश द्वार से जुड़ी मिति पर कृष्ण के जीवन से संबंधित चित्रों की भरमार है | जैसे—<br />
कृष्ण एवं गोपियां भवन के मध्य में संगीतमय क्षणों में, प्रेमालिंगन कृष्ण अपनी प्रेयसी के साथ, चीरहरण चित्र में कोटा की परंपरागत शैलखंडों को दर्शाया है, कालिया नाग का दमन करते कृष्ण आदि प्रवेश द्वार की बाई भिति पर अनेक चित्र दिखाई देते हैं, राजप्रासादों में नायक व गोपियों के साथ कृष्ण विश्राम करते हुए, गोपीकाओं के साथ रास रचाते कृष्ण, इस चित्र में अर्धचंद्राकार ऊंचे क्षितिज है जिसमें गोल-गोल मेघों की झालरों का अंकन बहुत ही सुखद है, सागर मंथन करते देवता एवं असुर, भगवान विष्णु की कथा से संबंधित दृश्य, हाथियों की लड़ाई का आनंद लेते विशिष्ट वर्ग, प्रकृति के सुरम्य वातावरण में उड़ते पक्षी तथा गरुडासीन विष्णु लक्ष्मी, गोपियों के साथ नृत्य करते कृष्णा |</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/art-culture/article-by-dr-mukti-parashar-on-unknown-statues-of-dashawatar-of-vishnu-at-kanah-karai-in-kota/8279/">कोटा की अचर्चित दशावतार पट्टिका</a></span></strong></span></p>
<p>राज महल में भी कई चित्र बने हैं-<br />
गोवर्धन धारण किए कृष्ण, धार्मिक अनुष्ठान करते कृष्ण एवं कुछ जनसमुदाय, गार्यो को चराकर घर लौटते ग्वाले व कृष्णा, अग्नि से घिरे ग्वाले व गार्यो को बचाते हुए कृष्ण<br />
सघन वृक्षों के मध्य राक्षसों का संहार करते कृष्ण, इनके अतिरिक्त बांसुरी बजाते, नृत्य करते, सखियों के साथ जल क्रीड़ा करते, पूतना का दुग्ध पान करते नगर की और ग्वालों और गायों का प्रस्थान आदि कई चित्र हैं जिनमें कृष्ण के साथ पक्षियों, पकृति व भवनों का सुन्दर चित्रण किया है |<br />
कोटा चित्र शैली में ही एक चित्र है जिसे गंगाचार्य द्वारा ‘कृष्ण’ का नाम दिया गया था यह चित्र 1630-40 ई. के मध्य अपारदर्शी जल रंग द्वारा बनाया गया है | यह राजकीय संग्रहालय कोटा में संग्रहित है | इस संपूर्ण चित्र में दो दृश्य हैं नीचे की ओर कृष्ण के मां बाप (नंद बाबा यशोदा) गंगाचार्य का द्वार पर स्वागत करते हुए चित्रित हैं नीचे भूमि तक हल्के हरे रंग से घास को प्रदर्शित किया है आगे की तरफ कुछ घास बनाई गई है जिसमें सफेद ज्वार जैसे फल बनाए गए हैं | चित्र के ऊपरी भाग में आचार्य घर में बैठे हैं और उनके हाथ में जन्मकुंडली जैसा कोई कागज है और वह किसी गणित करती हुई मुद्रा में बैठे हैं | उनके आगे कृष्ण, बलराम, माता यशोदा व नंद बाबा बैठे हैं | दो सेविकाएँ हाथ में फल व पानी का पात्र लिए खड़ी है | भवन सफेद, लाल व हरे रंगों से बनाया गया है और उसमें बने आलो को विभिन्न लाल वहरे पात्रों द्वारा सजाया गया है | चित्र में दरी बिछी हुई है जिसमें पीला बॉर्डर है | मध्य में हरा रंग है और उस पर फूल व पत्तियों के अलंकरण बने हैं | चित्र के ऊपरी बाएं भाग में सफेद मिश्रित नीले रंग से युक्त आकाश बना है | उसके नीचे केले का वृक्ष उसके आसपास आम का वृक्ष बना है, जिस पर मंजरिया लगी हुई है | कुछ फूलों के पौधे हैं जिन में लाल व सफेद रंग के पुष्प बने हैं | पीछे सरो व कदम्ब के वृक्ष भी बने हैं | फूलों के पौधे कनेर के बनाए गए हैं | चित्रकार ने घटना के साथ प्रकृति का चित्रण बहुत ही सजीव व सुंदर प्रस्तुत किया है | मंजरीयुक्त पेड़ में पहले गहरा हरा रंग भर कर उस पर आउट लाइन से पत्तियां बनाई गई है | जिसमें मंजरीयुक्त आम का पेड़ ज्योतिष के अनुसार काफी शुभ माना जाता है |</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-dr-mukti-parashar-gugor-fort-built-by-the-khinchi-rajputs-is-mourning-on-its-predicament-in-the-desolate-and-ruins-state/8263/">पुरातत्व विभाग की राह तकता गुगोर दुर्ग</a></span></strong></span></p>
<p>रुकमणी मंगल सीरीज के कई चित्र हैं जो राव माधसिंह ट्रस्ट म्यूजियम में संग्रहित है | इन प्रतीकात्मक चित्रों का धार्मिक महत्व विशेष है | एक अन्य चित्र वासुदेव देवकी के विवाह का चित्र है यह भी रुकमणी मंगल का ही चित्र अपारदर्शी जल रंगों व स्वर्ण रंगों से बना हुआ है |<br />
एक अन्य चित्र जो कि रुकमणी मंगल का मुख्य पृष्ठ पर चित्रित है कोटा गढ़ में संग्रहित है | यह 1660-70 ई के मध्य अपारदर्शी जल रंगों से बना है | संपूर्ण चित्र को बहुत ही सुंदर प्रकृति के साथ चित्रित किया गया है | हर जगह मनुष्य का भगवान का प्रकृति के साथ तारतम्य दर्शाया गया है | इस दृश्य में एक राजकीय व्यक्ति किसी साधु के समक्ष नतमस्तक होते प्रार्थना करते चित्रित है साथ एक सेवक चित्रित हैं और चित्र के ऊपरी भाग में भगवान विष्णु व मां सरस्वती भी चित्रित है ऐसा लगता है जैसे कोई महत्वपूर्ण घटना घट रही हो | इस चित्र में साधु को सफेद कुटिया के बाहर केसरिया धोती में बाघ की खाल के ऊपर बैठे बनाया है | वह किसी चबूतरे जैसी जगह पर बैठे हैं | जिसके नीचे पत्थर की चट्टाने जैसी बनी है और उसके नीचे शेर के मुख जैसे पत्थर की आकृति से पानी गिर रहा है | उनकी कुटिया के पीछे सफेद तना व गहरी हरी पत्ती वाला पारस पीपल तथा उसी के साथ बनयान वृक्ष चित्रित है | चित्र के दाएं तरफ मध्य भाग में दो आम के पेड़ के साथ जामुन का पेड़ चित्रित है |<br />
एक अन्य चित्र रुक्मणी हरण- इस चित्र में श्री कृष्ण रुकमणी को भगाते हुए चित्रित हैं | चित्र में सैनिक, घोड़े हाथी, नारियां सभी का चित्रण बहुत ही सुंदर है | ऊपर सूर्य बना होने से दिन की घटना का वर्णन करता है | चित्र के मध्य में स्लेटी व सफेद मिश्रित रंग से कुंड बनाया है | संपूर्ण चित्र में केले के पेड़ और लाल फूल वाली बेल को भी संयोजित तरीके से चित्रित किया गया है | चित्र को तीन भागों में बांटा गया है | ऊपर राजसी पुरुष कुछ मंत्रणा कर रहे हैं | मध्य में कुछ नारियां पूजा अर्चना करती हुई मंदिर के समक्ष बनाई गई हैं | और निचले भाग में मंदिर के बाहर श्री कृष्ण रुक्मणी का हाथ पकड़ते हुए उनका हरण करते हुए रथ पर चित्रित किये गये है | संपूर्ण चित्र पूरी घटना को बहुत ही सुनियोजित तरीके से प्रदर्शित करता है |</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-vineet-singh-on-charlie-hebdo-cartoon-on-hindu-gods/8277/">शार्ली हेब्दो ने फिर की नापाक हरकत, अब हिंदुओं की भावनाएं भड़काने की कोशिश</a></span></strong></span></p>
<p>गोपियों व कृष्ण के रासलीला का दृश्य 1680ई. में अपारदर्शी जल रंगों व स्वर्ण रंगों व धात्विक रंगों से निर्मित किया गया है | यह चित्र मोर मुकुट धारी कृष्ण व राधा प्रेमी युगल के साथ नृत्य करती गोपियों का चित्रण है | कृष्ण व राधा मध्य में प्रेमी युगल के रूप में तख्त पर बैठे हैं | उनके चारों तरफ गोपियां घेरा बनाए नृत्य कर रही हैं | सब के गले में सफेद पुष्प माला आठ की आकृति जैसी बनाई गई है | ऊपर नीले आसमान में चांद व तारे रात्रि के दृश्य को इंगित करते हैं | सभी प्रसन्न मुद्रा में है लाल रंग मध्य में बनाया है जो प्रेम की अग्नि को दर्शाता है | संपूर्ण चित्र में मंजरी लगे आम वृक्ष, कदंब, जामुन और केले के पेड़ों को बहुत ही सुंदर रूप में संयोजित किया गया है |<br />
एक अन्य चित्र <strong>महाराव अर्जुन सिंह</strong> दरी खाने में <strong>कृष्ण जन्माष्टमी</strong> मनाते हुए है यह चित्र 1720-25 ई में बनाया गया है | इसमें पूरे गढ़ पैलेस के अंदर का दृश्य मल्टीपल व्यू प्वाइंट से चित्रित किया गया है | कृष्ण द्वारा गोपी वस्त्र हरण चित्र भी बहुत ही आकर्षक बनाया गया है | एक अन्य चित्र बृज नाथ जी की गरुड़ पर सवारी यह बहुत ही सुंदर चित्र है | इसमें आसमान में बहुत सारे रंग भरे गए हैं | आसमानी केसरिया, हल्का बैंगनी सफेद, गहरा नीला व लाल रंगों से आकाश बनाया गया है | उनके बीच वध्य बजाते हुए कुछ नारी आकृतियां (अप्सरायें) बनाई गई है | एक पेड़ बनाया गया है मध्य भूमि में पीली भूमि बनाई गई है, उस पर गरुड़ के ऊपर भगवान को सवारी करते हुए चित्रित किया गया है | भूमि में स्लेटी व सफेद रंग से जल बनाया गया है |</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-sudheer-vidyarthi-on-a-unique-soldier-forgotten-by-india-but-acknowledged-by-britishers/8084/">1857 की क्रांति का अनोखा नायक, जिसे भारत ने भुला दिया और अंग्रेजों ने सहेजा</a></span></strong></span></p>
<p><strong>अक्षय तृतीया</strong> पर <strong>बृजनाथ जी</strong> की आरती करते हैं हुए महाराव किशोर सिंह जी का चित्र 1831ई. में अपारदर्शी जल रंगों व धात्विक स्लेटी रंग से बनाया गया है | इसमें श्री कृष्ण जी की प्रतिमा के आगे महाराव आरती कर रहे हैं | आगे पानी का संगमरमर का पात्र बनाया है जिसमें कमल के फूल डाले हुए हैं | कमल के फूल भगवान ब्रजनाथ जी को भी चढ़ा रखे हैं | इस तरह के चित्र भगवान बृज नाथ जी की सेवा करते हुए कोटा चित्र शैली में बहुत बने हैं | पीली छतरी वाले राज सिंहासन पर बैठे नीलवर्ण या ब्रजनाथ जी इस चित्र में इनका अभिनंदन करते हैं ब्रह्मा, विष्णु व शिव को भी चित्रित किया गया है तथा इनके पीछे कतार बद्ध कोटा के शासक व सरदार खड़े हैं | वहीं कोटा के राजचिन्ह गरुड़ को भी अभिवादन की मुद्रा में दर्शाया गया है | इस चित्र में विशेष प्रकार की पगड़िया जो मुकुट के सामान तिकोनी है बनाई गई हैं | कुछ अन्य चित्रों में मदमस्त हाथी के दांत उखाड़ते ब्रजनाथ जी, चंबल नदी के मध्य नौका में सवार बृजनाथ जी व विशिष्ट व्यक्ति आईना दिखाते हुए, चंबल नदी के पार काली बग्गी में सवार बृजनाथ जी व राव माधव सिंह, भील व कावड़िए, एक प्रमुख चित्र में बृज नाथ जौकी सुसज्जित हाथी पर सवारी निकल रही है | अनुचर और महाराव, उनका परिवार, अन्य व्यक्ति हरे मैदान रूपी भूमि पर पैदल चल रहे हैं |<br />
इस तरह से लघु चित्र शैली व मिति चित्रण में श्री कृष्ण के विभिन्न क्रियाकलापों व ब्रजनाथ जी को कोटा के कलाकारों ने हृदय की अनुभूतियों से परिपूर्ण किया है | उन्होंने चित्रित किए जाने वाले विषयों को सम्यक् अनुभूत किया है | इन चित्रों में संयोजन, रूप विन्यास इतना सफल एवं सशक्त है कि दर्शक चित्रों के माध्यम से उन्हीं भावों की अनुभूति करने लगता है जिससे प्रेरित होकर चित्र रचना की गई है | इसी रूपात्मक स्थिति के आधार पर कलाकृति, कलाकार एवं दर्शक में संबंध स्थापित करते हैं | अनुभूति कला का आत्म तत्व है तथा अभिव्यक्ति शरीर का तत्व है | बिना शरीर के आत्मा का अस्तित्व संभव है, लेकिन आत्मा रहित शरीर शव के समान है | कोटा शैली के चित्रों की अभिव्यक्ति के पीछे अनगिनत गहन संवेदनशीलता व आध्यात्मिकता निहित है |</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>लेखक:</strong> </span><span style="color: #0000ff;"><strong>डॉ</strong><strong>.</strong><strong>मुक्ति पाराशर</strong></span><br />
<span style="color: #0000ff;"><strong>कला इतिहासकार व साहित्यकार</strong></span></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/art-culture/article-by-dr-mukti-parashar-on-the-entire-life-of-krishna-is-presented-in-the-kota-painting-style/8339/">कोटा चित्रशैली में प्रकृति संग कृष्ण जीवन का चित्रांकन</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>कोटा की अचर्चित दशावतार पट्टिका</title>
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		<pubDate>Sat, 15 May 2021 10:21:32 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>कोटा नगर के दाहिनी ओर पुराण प्रसिद्ध चंबल नदी प्रवाहित होती है। चंबल के इस क्षेत्र में बनी गहरी घाटियों से पूरा महत्व के अनेक शैलाश्रय भी मिले हैं। कोटा नगर के दाहिनी और चंबल के किनारे &#8220;कान्हा कराई&#8221; नामक स्थल है यहां कुछ ऐसी मूर्तियां मिली है जो अभी तक अचर्चित है। कोटा के &#8230;</p>
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<p dir="auto">कोटा नगर के दाहिनी ओर पुराण प्रसिद्ध चंबल नदी प्रवाहित होती है। चंबल के इस क्षेत्र में बनी गहरी घाटियों से पूरा महत्व के अनेक शैलाश्रय भी मिले हैं। कोटा नगर के दाहिनी और चंबल के किनारे &#8220;कान्हा कराई&#8221; नामक स्थल है यहां कुछ ऐसी मूर्तियां मिली है जो अभी तक अचर्चित है। कोटा के कुन्हाड़ी क्षेत्र में स्थित चंबल की कराइयो में पाषाण पट्टी पर विष्णु के 10 अवतारो का अंकन है। संपूर्ण हाड़ौती क्षेत्र में ऐसी लंबी एक ही पटिका है।<br />
इसमें शेषशैया विष्णु के दशावतार कच्छ अवतार, नरसिंह अवतार, कृष्ण अवतार, राम सीता लक्ष्मण भी उकेरे है। वर्तमान में पानी भरने के कारण मूर्तियों का काफी भाग नष्ट हो चुका है। कराई के अंदर चट्टानों के नीचे से चंबल का जल सूखने पर एक स्थानीय व्यक्ति ने मुझे सूचना दी कि कराईयो में देवताओं की मूर्तियां उकेरी हुई है मैंने स्थल विशेष का सामुख्य अध्ययन करने के पश्चात हाड़ौती क्षेत्र के इतिहासविदो से दशावतार पट्टिका पर बनी वैष्णव अवतार मूर्तियों के निर्माण के प्रयोजन आदि के बारे में जानकारी लेनी चाही तो मुझे यह जानकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि कोई भी विद्वान ना तो इस स्थल से अभी तक परिचित था और ना ही कोई इस स्थल की पुरातात्विक जानकारी की पुष्टि कर सका। ऐसी स्थिति में मैंने स्वयं के सामुख्य अध्ययन के आधार पर कोटा की इस अज्ञात एवं अप्रकाशित दशावतार पट्टिका पर प्रथम दृष्टया जो अध्ययन हो सका वह करने का एक लघु प्रयास किया है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-dr-mukti-parashar-gugor-fort-built-by-the-khinchi-rajputs-is-mourning-on-its-predicament-in-the-desolate-and-ruins-state/8263/">पुरातत्व विभाग की राह तकता गुगोर दुर्ग</a></span></strong></span></p>
<p>कोटा संग्रहालय के प्रभारी अधिकारी के संज्ञान में कान्हा कराई स्थल नहीं होने की पुष्टि हुई है विवेच्य कान्हा कराई के चट्टानी तल पर कुछ अलग से पाषाण लगाकर लगभग 15 फीट लंबी और 3 फीट चौड़ी पाषाण पट्टिका पर विष्णु के दशावतारो का अंकन बाई से दाएं और क्रमबद्ध रूप से जिस कला शिल्प के अनुरूप है वह कला संभवत 16 से 17 शताब्दी की प्रतीत होती है। ऐसी शिल्प कला झालरापाटन की विधाता बेमाता मूर्तियों की कला से स्पष्टतया साम्यता रखती हैं। इस पट्टिका पर उकेरी गई दशावतार देव मूर्तियां जलप्लावन तथा कई अन्य कारणों से अपनी कलात्मकता खो बैठी है परंतु फिर भी जो शेष है वह हाड़ौती क्षेत्र की एकमात्र दशावतार पट्टिका के रूप में पूरा निधि के रूप में उपलब्ध हैं। इस पट्टिका पर प्रथम मूर्ति हाथ जोड़े मानव आकार स्थानक गरुड़ की है जिसके पीछे लहरदार कवच एवं पंख है। इस मूर्ति में गरुड़ के शीश पर मुकुट और कान में कुंडल हैं उसका आगे का मुख एवं वक्ष भाग भग्न है संभवतया यह विष्णु व उनके वाहन &#8216;गरुड़ &#8216;को सम्मिलित रूप से दिखाने का प्रयास है।</p>
<p dir="auto"><img decoding="async" class="aligncenter wp-image-8288 " src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/05/20210220_153309.jpg" alt="" width="447" height="201" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/05/20210220_153309.jpg 307w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/05/20210220_153309-300x135.jpg 300w" sizes="(max-width: 447px) 100vw, 447px" /> इसी के निकट एक भग्न हो चुकी &#8216;शेषशायी विष्णु&#8217; की मूर्ति है जिसमें लक्ष्मी का अधोभाग शेष है। वह बहुत ही हल्की सी छाया मात्र इस मूर्ति की बची है। इस पट्टिका पर तीसरी मूर्ति विष्णु के &#8216;मत्स्य अवतार&#8217; रूप की है इस अवतार रूप में विष्णु को चतुर्भुज दर्शाया गया है। वह अपने पृष्ठ के दोनों करो को ऊपर उठाए हुए हैं तथा इनमें गदा व पुष्प धारण किए हुए हैं। उनके शीश पर लंबा मुकुट व कंधों से कटी तक लहराता उत्तरीय है। उनके दो मुख्य कर गोद में हैं। उनका कटी से नीचे का शेष भाग मछली रूप में है। इसी क्रम में एक मूर्ति भगवान विष्णु के &#8216;कच्छप&#8217; रूप की है। यह मूर्ति भी मत्स्यावतार मूर्ति के समान है अंतर मात्र इतना है कि इसके कटी प्रदेश के नीचे के भाग में कच्छप (कछुआ)को दर्शाया गया है। कच्छप के शरीर पर कवच को बहुत ही सुंदर शिल्प के रूप में उकेरा गया है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/justice-deepak-maheshwari-is-inspiring-us-to-fulfill-his-duty-towards-the-society/8243/">कोरोना कालः समाज के ऋण से उऋण होने का यही वक्त है&#8230;</a></span></strong></span></p>
<p>इस क्रम में अगली मूर्ति विष्णु के &#8216;नृसिंह&#8217; अवतार कि चतुर्भुजी मूर्ति है। इसमें भगवान &#8216;नृसिंह&#8217; अपने घुटनों पर हिरण्याकश्यप को लेटा कर अपने दो मुख्य करो के तीखै नाखून से उसके हृदय को विदीर्ण करते हुए प्रदर्शित हैं। उनके सिर के ऊपर उठे दो हाथों में वैष्णव आयुध गदा एवं पदम हैं। &#8216;नृसिंह&#8217; के शीश पर गोलाकार मुकुट है जिस पर कमल पुष्प की पत्तियों का अंकन है। मूर्ति के वक्ष पर मणिमुक्ताहार सुशोभित है तथा कटी से नीचे के भाग में उन्होंने धोती धारण कर रखी है। अन्य अवतार मूर्ति चतुरबाहु &#8216;नर वराह&#8217; की है जिसमें वराह ने अपने दाएं कर की कोहनी पर आसनस्थ एवं प्रार्थनारत पृथ्वी देवी को धारण कर रखा है। नर वराह के चारों करों में वैष्णव आयुद्ध शंख ,चक्र, गदा एवं पदम उत्कीर्ण है। वराह ने अपनी बाई जंघा को ऊपर उठाया हुआ है तथा उसके पेर के नीचे कुछ कुंडलीकृत आकृति बनी हुई है ।वराह के वक्ष एवं कंठ पर मणिमुक्ताहार, कटी पर धोती तथा करो एवं पांवों में कड़े धारण किए हुए दर्शाया गया है। यह मूर्ति बहुत ही सुंदर ढंग से उकैरी हुई है।अगली मूर्ति &#8216;कृष्णावतार&#8217; की है जो त्रिभंग मुद्रा में उत्कीर्ण है इसमें श्री कृष्ण को मोर पंख का मुकुट धारण किए हुए और बंसी बजाते हुए दर्शाया गया है।</p>
<p dir="auto"><img loading="lazy" decoding="async" class="wp-image-8287 size-medium aligncenter" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/05/IMG-20210220-WA0029-225x300.jpg" alt="" width="225" height="300" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/05/IMG-20210220-WA0029-225x300.jpg 225w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/05/IMG-20210220-WA0029-768x1024.jpg 768w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/05/IMG-20210220-WA0029.jpg 780w" sizes="auto, (max-width: 225px) 100vw, 225px" /></p>
<p dir="auto">कृष्ण के दाएं और बाएं दो परिचारिकाएं हैं जो चामर पंख झलती हुई दिखाई देती है। मूर्ति में कृष्ण के पैरों के पास गाय भी उत्कीर्ण है।अवतार मूर्तियों के मध्य के पाषाण खंड में 6 कोटरे से बनी हुई है इन कोटरो का शिल्प मध्ययुगीन है। मध्य के तीन कोटरों में तीन द्विभुज स्त्री परिचारिकाएं अपने दोनों पैरों को ऊपर किए खड़ी है तथा उनकी ग्रीवा में एक लंबी पुष्पमाला है जो पैरों तक उकेरी हुई है। इन स्त्री मूर्तियों के शीश पर गोल व नुकीला मुकुट है ऐसे ही मुकुट उक्त विवेचित अवतार मूर्तियों में भी है। इन स्त्रियों के परिधान राजपूती वेशभूषा से प्रभावित हैं। 3 अन्य कोटरों में क्रमशः लक्ष्मण राम एवं सीता की अलग-अलग मूर्तियां है। लक्ष्मण और राम अपने अपने कर में धनुष धारण किए हुए हैं व शीश पर टोपी नुमा मुकुट धारण किए हुए हैं। सीता की मूर्ति का वस्त्र अलंकरण भी राजपूती कला से प्रभावित है। उन्होंने भी शीश पर टोपीनुमा मुकुट धारण किया हुआ है। इस प्रकार कोटा क्षेत्र कि यह दशावतार पट्टिका हाडोती में अब तक पाई गई पुरा मूर्तियों में सबसे अलग है। प्रस्तुत लेख में विवेचित मूर्तियों का शारीरिक गठन वेशभूषा अलंकरण आदि 11वीं से चौदहवीं शताब्दी की मूर्तियों की भांति आकर्षक नहीं है। इसका कारण यह भी माना जा सकता है कि मध्यकाल में मुगलों के आक्रमण और उनके मूर्तिभंजक होने से मूर्तियों के कलात्मक वैभव को उकेरना बंद सा हो गया था।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-vineet-singh-on-charlie-hebdo-cartoon-on-hindu-gods/8277/">शार्ली हेब्दो ने फिर की नापाक हरकत, अब हिंदुओं की भावनाएं भड़काने की कोशिश</a></span></strong></span></p>
<p dir="auto">राजपूती प्रभाव व संस्कृति उन मूर्तियों पर 16वीं सदी के बाद आना आरंभ हुआ। लेख में वर्णित मूर्तियों  जैसी अनेक अन्य देव मूर्तियां हाडोती के बांरा, झालरापाटन से लेकर मध्यप्रदेश के राजगढ़ के विभिन्न देव मंदिरों में सहजता से दिखाई देती है और अभी भी सब पूज्य है।</p>
<div style="width: 1220px;" class="wp-video"><video class="wp-video-shortcode" id="video-8279-1" width="1220" height="686" preload="metadata" controls="controls"><source type="video/mp4" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/05/20210220_154640.mp4?_=1" /><a href="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/05/20210220_154640.mp4">https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/05/20210220_154640.mp4</a></video></div>
<p><span style="color: #0000ff;"><strong><span style="color: #ff0000;">लेखक:</span> डॉ</strong><strong>.</strong><strong>मुक्ति पाराशर</strong></span><br />
<span style="color: #0000ff;"><strong>कला इतिहासकार व साहित्यकार</strong></span></p>
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		<title>पुरातत्व विभाग की राह तकता गुगोर दुर्ग</title>
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		<pubDate>Sat, 15 May 2021 08:49:21 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>दुर्ग निर्माण की परंपरा राजस्थान में बहुत प्राचीन है शायद ही ऐसा कोई स्थानों हो जहां पर कोई दुर्ग, किला या गड़ी स्थापित नहीं हुई हो। ईधर्म व नीतिशास्त्र के ग्रंथों में भी दुर्ग व किले के स्थापत्य के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। दुर्ग को राज्य के 7 अंगों( राजा, मंत्री, सुहत, कोश, &#8230;</p>
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				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>राजस्थान में हाड़ौती क्षेत्र का एक प्रांत बारां जिसे कोटा से अलग किया गया था चारों तरफ से हरा-भरा हैं। यहां पर कई कलात्मक व पुरातात्विकअवशेष यत्र-तत्र बिखरे पड़े हुए हैं। इसकी प्राकृतिक सुंदरता अपने आप में निराली है । कितने ही मंदिर और कई स्थापत्य  की कलात्मकता यहां पर हमें देखने को प्राप्त होती है। इन्ही  में से एक है गुगोर का दुर्ग।
			</div>
		</div>
	
दुर्ग निर्माण की परंपरा राजस्थान में बहुत प्राचीन है शायद ही ऐसा कोई स्थानों हो जहां पर कोई दुर्ग, किला या गड़ी स्थापित नहीं हुई हो। ईधर्म व नीतिशास्त्र के ग्रंथों में भी दुर्ग व किले के स्थापत्य के बारे में जानकारी प्राप्त होती है। दुर्ग को राज्य के 7 अंगों( राजा, मंत्री, सुहत, कोश, राष्ट्र, दुर्ग, सेना) में से एक माना गया है।<br />
शुक्रनीति के अनुसार दुर्ग को हाथ के अंगों के का स्थान दिया गया है।<br />
&#8220;दुर्गमात्यं सहछत्रम्, मुखं कोशो बल् मनः।<br />
हस्तो पादौ दुर्ग राष्ट्रे, राज्यागनि स्मृतामिही।।&#8221;<br />
इन सभी दुर्गों की विशिष्ट पहचान भी है और गुगौर का दुर्ग गिरी दुर्ग की श्रेणी  के अंतर्गत आता है ।<br />
हाड़ौती क्षेत्र में किले, दुर्ग और गढ़ की भरमार है। इसी कडी में यहां के किलो की कलात्मकता भी निराली है। बांरा जिला से 68 किलोमीटर दूर एक कस्बा छिपाबड़ौद है। यहां से छबड़ा के निकट 8 किलोमीटर दूर गुगौर दुर्ग स्थित हैं जो खींची राजपूतों का माना जाता है । प्राचीन काल में यह क्षेत्र परमार राजाओं के अधीनस्थ था बाद में यहां खींची राजपूतों के अंतर्गत आ गया । हाडौती में खींची राजाओं का सबसे बड़ा भारत संस्थान गागरोन था जो वर्तमान जिला झालावाड़ में स्थित जलदुर्ग  हैं।<br />
सन् 1150 ईस्वी में खींची राजपूतों ने इस दुर्ग का निर्माण कराया था 1506 -7 में अकबर द्वारा इस दुर्ग को विजित्त करने के साथ ही यहां के राजाओं का पलायन हुआ और उन्होंने अपनी राजधानी और राज्य महुमैदाना, खातौली, मोरूपुर, घातौली मैं स्थापित की। इसके बाद मुगलों की हाड़ा राजपूतों से मित्रता के कारण हाड़ाओं की शत्रुता खींची राजपूतों से हुई और जहांगीर &#8211; शाहजहां के समय तक यह खींची राजा उक्त स्थानों से चलकर गुगोर आये तथा वहां इन्होंने अपना राज्य स्थापित किया। हालांकि यहां 14वीं सदी से खींची नरेशों के वंशज पहले से ही रह रहे थे परंतु बाद में गुगौर पर इनका बाहुल्य हुआ।  कालांतर में गुगोर और शाहबाद से जो खींची राजपरिवार संघर्ष कर निकले वे मालवा में नरसिंहगढ़ , खिंलचीपुर, नायतपुर और अंत में राधौगढ़ में स्थापित हुए थे ।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/citizen-journalist/article-by-pramod-ranjan-on-before-the-fifth-birthday-1-2-million-children-of-poor-and-backward-classes-are-feared-to-die-of-corona-infection/8264/">‘कोविड:19 अकाल’ का खतरा: तो, पांचवें जन्मदिन से पहले काल के गाल में समा जाएंगे इन तबकों के 12 लाख बच्चे!</a></span></span></strong></p>
<p>गुगोर का दुर्ग राजस्थान के अचचित दुर्गो में हैं तथा अभी भी इस पर किसी विशेष रुप से इतिहासकारों ने दृष्टि नहीं डाली। आज भी दुर्ग के निर्माता का नाम अज्ञात है। दुर्ग की  बनावट आज बहुत ही खंडर अवस्था में है लेकिन जो अवशेष बचे हैं उसके आधार पर वर्णन करने का प्रयास किया है। इस दुर्ग के पीछे पार्वती नदी प्रवाहित होती है जो राजस्थान को  मध्यप्रदेश से जोड़ती है।<br />
यहां पार्वती नदी उस पहाड़ी को स्पर्श करते हुए बहती है जिस पर यह दुर्ग अभेद्य रूप में बना है। इस दुर्ग का परकोटा ऊंचा एवं  सुदृढ़ के साथ खूबसूरत भी है। ऊंची प्राचीरों और बुर्जियों ने इस दुर्ग को अभेद्य दुर्ग की संज्ञा दी है । किन्तु अब यह वीरान व खंडहर अवस्था में आ चुका है।<br />
गुगोर दुर्ग की ख्याति यहां पर आयोजित जल जोहर के विराट अनुष्ठान के कारण है। इस जोहर में सैकडों वर्ष पूर्व खींची शासकों पर यहां आक्रमण के दौरान जब खींची सेना पराजित होने लगी तो इस दुर्ग की वीरांगनाओं ने अपनी रक्षा जल में जौहर कर के की और अपनी जीवन लीला को समाप्त किया। यह स्थान इस किले में रानी देह के नाम से प्रसिद्ध है और कहां जाता है कि यह एक विलक्षण जोहर अनुष्ठान है। यहां पर रानी देह में जल जौहर किया था। इस देह के ऊपर एक ओर देह है इसे भैंसादेह कहा जाता है। इसके ऊपर अत्यंत रमणीक भड़का जल प्रपात है।<br />
इसी दुर्ग के पिछले भाग में नदी के किनारे- किनारे खींची राजा के मृत्यु स्थल है, जिन्हें  क्षारबाग कहते है। इनमें ही छतरियां व चबूतरे है और इन्हीं में से सती स्मारको के  शिलालेख है , जो गुगोर दुर्ग के खींची शासकों वह रानियों के वीरत्व, उत्सर्ग और सतीत्व का आज भी गौरवशाली आख्यान करते हैं ।</p>
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<p><strong><span style="color: #ff0000;">READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/idgah-by-munshi-premchand/8218/">ईदगाह: वह कहानी, जो आज भी हमारे मन को झकझोरती है</a></span></span></strong></p>
<p>गुगोर के अप्रकाशित शिलालेखों की निर्मिति भी उक्त वर्णित लेखों की भांती है। इसमें लेखों के शीर्ष पर बने पंचाऊगल वाले हाथियों को मजबूत भावों से उकेरा है। इसके नीचे सौष्ठव देह वाले अश्वो पर राजसी पुरुषों को पगड़ी पहने तथा अपने हाथों में क्रमशः तलवार व आश्व की रश्मी थामें एवं पीठ पर ढाल बांधे हुए शिल्प से उकेरा गया है। इन राजपुरुषों की पगड़ी पर हीरा भी जड़ा हुआ है। वस्त्रों में ओजस्वी पायजामा है जिनपर सुंदर धारियां है। गले में मणि जणित कई लड़ियों का हार है, पैरों में राजसी जूतियां है। उनके सामने 1 से लेकर 5,6,7 स्त्रियाँ हाथ जोड़े खड़ी है। उन्होंने घाघरा, चोली ओढ़नी के साथ शीश पर अलंकृत बोर भी पहना है। वस्त्रों पर सलवटों की लकीरें बनाई हुई है। स्रियों के हाथों में कंगना व बाजूबंद भी हैं। यह सात-सती शिल्पांगन मध्ययुगीन राजपूताना के तत्कालीन राजसी परिवारों में बहुत प्रचलित था। जिसका जीवंत अंकन इन शिलालेखों में प्रभावी रूप से दिखाई देता है। गुगौर दुर्गे की संरचना अनूठी है यह तीन भागों में विभक्त है ऊंची पहाड़ी पर बने इस दुर्ग के एक भाग में खींची शासकों के शाही परिवार का निवास था तथा दूसरे भाग में फौजी रिसाला रहा करता था। दुर्ग के अंदर आज भी महलों के खंडहर, पानी के टांके, मंदिर व कचहरी यानी न्याय भवन स्थित है। यहां पर खिंचीयों के आराध्य देवी बिजासन माता का मंदिर भी हैं परंतु पवित्रता की आकांक्षा से अब यहाँ की मूर्ति को दुर्ग के नीचे नदी के तट पर स्थापित कर दिया गया है। आज भी फाल्गुन मास में यहां 15 दिन का मेला लगता है यहां पर अनेक देवी-देवताओं की मूर्तियां ,मंदिर, मस्जिद एक ही स्थान पर बने हुई है किंतु अब वे खंडित हो चुकी है। यहां कई मूर्तियां वा पुरातत्व की सामग्री चोरी हो गई है। यहाँ एक गुप्त रास्ता है जो कि जमीन के अंदर होकर पार्वती नदी के तट पर जाता है।  यहां अभी भी घाट तथा दरवाजा बना है।आगे जाते हैं तो यहां अमेठीयो में खींची राजा का चबूतरा बना हुआ है जिसे शतरंज के चबूतरे के नाम से जाना जाता है। यहां कलात्मक छतरियों को भूल भुलैया के नाम से भी जानते हैं। यहां पीर बाबा की दरगाह अभी बनी है उसी के पास मंदिर है जिसमें कोई मूर्ति नहीं है। शतरंज चबूतरे पर खींची राजा धीर सिंह की अदालत लगा करती थी। जहां प्रजा के दुख-दर्द सुने जाते थे, और उनकी समस्याओं का समाधान किया जाता था। बारिश हो मिट्टी के कटाव के कारण यहां की छतरियां, पीर बाबा की दरगाह, मंदिर , दुर्ग के अंदर के भवन रानी महल आदि सभी खंडहर में  बदलते जा रहे हैं  यहां पर अनेकों शिलालेख मिले हैं।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-dr-nidhi-prajapati-on-how-people-took-advantage-of-this-covid-19-pandemic-situation-and-made-their-profit/8183/">मानवता पर भारी पड़ रही कोरोना काल में मुनाफाखोरी</a></span></span></strong></p>
<p>यहां पर सती स्मारक है जो यहां के खींची शासकों के मध्ययुगीन नाम व गोत्र की प्रकट करते हैं । हाड़ौती तथा मालवा के शिलालेखों में यह लेख आज भी ज्यादा चर्चित नहीं है। यह निम्न प्रकार हैं।  जैसे&#8211;<br />
वि. सं. 1410 माघ सुदी दशमी बुधवार<br />
गुगोर राजाधिराज श्री खींची चौहान कंवर<br />
कृष्ण सिंह देवतस्य सती बहू तंवरी कल्यान देव जी ।<br />
यहां पर ऐसे शिलालेख अन्दर-बाहर देखने को मिलते हैं।<br />
कहा जाता है कि यहां के दुर्ग की दीवार पर छः दरवाजे बने हुए थे और इसे लगभग 800 शताब्दी पूर्व का माना गया है। हालांकि इसके बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी है फिर भी यह अपने आप में अनूठा दुर्ग है। यहां पर एक मस्जिद बनी है और उसी के पास में मंदिर है जो कि हिंदू मुस्लिम एकता का प्रतीक माना जाता है। यहां पर मस्जिद में आज भी नमाज पढ़ी जाती है। किंतु मंदिर में कोई मूर्ति नहीं होने के कारण वहां पूजा नहीं होती फिर भी यह एक प्रतीक है-हिंदू मुस्लिम एकता का।<br />
17वीं सदी के पूर्व काल में गुगोर दुर्ग पर कोटा महाराज माधो सिंह के छोटे भाई हरीश सिंह का शासन था। इसी परंपरा में महराव दुर्जनसाल हाड़ा ने भी इस दुर्ग पर अपना आधिपत्य किया था। परंतु उस समय यहां ठाकुर खींची बलभद्र सिंह ने इस पर अपना अधिकार बनाए रखा । 18 वीं सदी के आरंभ में बूंदी के शासक क्षेत्रपाल के निधन के बाद उसके दितीय पुत्र भीमसिंह को यह दुर्ग मिला। इसके पश्चात् कोटा के हाड़ा राजपूत शासकों और मराठों के मध्य ऐसा मोड़ आया कि गुगौर का यह दुर्ग मराठों द्वारा नजराना वसूल करने का केंद्र बन गया इसके बाद अंग्रेजों के समय यह दुर्ग छबड़ा के साथ टोंक रियासत में चला गया। इस तरह कई ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी रहा यह दुर्ग बहुत ही खंडहर हालत में आ चुका है। पुरातत्व और राज्य सरकार द्वारा इसे पुनः दुरुस्त करने की एक पहल करनी होगी।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">लेखक:</span> <span style="color: #0000ff;">डॉ</span></strong><span style="color: #0000ff;"><strong>.</strong><strong>मुक्ति पाराशर</strong></span><br />
<span style="color: #0000ff;"><strong>कला इतिहासकार व साहित्यकार</strong></span></p>
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