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	<title>Article By K Vikram Rao Archives - TIS Media</title>
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		<title>पीएम जिसने भारत बचाया</title>
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		<pubDate>Wed, 30 Jun 2021 08:47:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>विडम्बना तो यह थी कि उनके सगे काका (संजय गांधी) जो कभी भी किसी भी राजपद पर नहीं रहे, की समाधि राजघाट परिसर में बनी&#124; केवल पांच महीने रहे प्रधान मंत्री, जो लोकसभा में बैठे ही नहीं, (चरण सिंह) के लिये किसान घाट बन गया&#124; सात माह राजीव–कांग्रेस की बैसाखी पर प्रधान मंत्री पद कब्जियाये &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-former-prime-minister-p-v-narasimha-rao/9518/">पीएम जिसने भारत बचाया</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>आज (28 जून) स्व. पीवी नरसिम्हा राव की जन्मशती है। गमनीय है कि पाँच वर्ष तक अल्पमतवाली कांग्रेस सरकार को चलानेवाले नरसिम्हा राव ने दस जनपथ के इशारे पर थिरकने से इनकार कर दिया था| हालांकि सरदार मनमोहन सिंह सोनिया गांधी की उँगलियों पर दस वर्ष तक भांगड़ा करते रहे| ऐसे इतिहास-पुरुष के जन्मोत्सव से पार्टी मुखिया राहुल गांधी को कोई सरोकार भी नहीं है|
			</div>
		</div>
	
<p>विडम्बना तो यह थी कि उनके सगे काका (संजय गांधी) जो कभी भी किसी भी राजपद पर नहीं रहे, की समाधि राजघाट परिसर में बनी| केवल पांच महीने रहे प्रधान मंत्री, जो लोकसभा में बैठे ही नहीं, (चरण सिंह) के लिये किसान घाट बन गया| सात माह राजीव–कांग्रेस की बैसाखी पर प्रधान मंत्री पद कब्जियाये ठाकुर चंद्रशेखर सिंह का भी एकता स्थल पर अंतिम संस्कार किया गया| मगर सम्पूर्ण पांच साल की अवधि तक प्रधानमंत्री रहे पीवी नरसिम्हा राव का शव सोनिया गांधी ने सीधे हैदराबाद रवाना करा दिया था| दिल्ली में उनके नाम कोई स्मारक नहीं, कोई गली नहीं|</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE:<span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-difference-in-press-during-emergency-and-now/9504/"> प्रेस पर प्रेशर कितना ? तब और अब!</a></span></strong></span></p>
<p>कल्पना कीजिए कि ताशकन्द में अकाल मृत्यु (1966) और लोकसभाई चुनाव (1996) में कांग्रेस की पराजय न होती तो लाल बहादुर शास्त्री और नरसिम्हा राव पार्टी की दिशा बदल देते। तब नेहरू परिवार बस एक याद मात्र रह जाता। इतिहास का मात्र एक फुटनोट।</p>
<p>सोनिया गांधी और उनकी पार्टी ने नरसिम्हा राव के साथ जो व्यवहार किया है वह कोई राजनेता अपने घोर शत्रु के साथ भी नहीं कर सकता है। सोनिया की सोच को प्रतिबिंबित करती एक घटना पर बने अखबारी कार्टून का जिक्र समीचीन होगा। उस कार्टून में दिखाया गया था कि ग्रामीण रोजगार योजना (नरेगा) का नाम मनरेगा क्यों कर दिया गया। मनमोहन सिंह सरकार को आशंका हुई होगी कि एन.आर.ई.जी.ए. कही नरसिम्हा राव इम्प्लायमेन्ट गारन्टी योजना न कहलाने लग जाए। अतः महात्मा गांधी का नाम जोड़ दिया गया। मजाक ही सही पर इस बात से सोनिया-नीत कांग्रेस पार्टी की खोटी नीयत उजागर हो जाती है। उनकी मानसिकता उभरती है जो राहुल गांधी की उक्ति में झलकी थी। उत्तर प्रदेश विधान सभा (2007) के चुनाव में कांग्रेस के इस तत्कालीन महामंत्री ने मुस्लिम बस्ती में प्रचार अभियान में कहा था कि यदि नेहरू-गांधी कुटुम्ब का कोई सदस्य दिसम्बर 1992 में प्रधान मंत्री रहता तो बाबरी मस्जिद न गिरती। मानो नरसिम्हा राव ने अपने प्रधानमंत्री कार्यालय से हथौड़ा-फावड़ा उन कारसेवकों को मुहय्या कराया था। जब राजीव गांधी की हत्या के बाद नरसिम्हा राव कांग्रेस अध्यक्ष बने और दसवीं लोकसभा चुनाव (1991) में प्रधानमंत्री बने थे तो कांग्रेसी दिग्गजों का अन्दाज था कि नरसिम्हा राव एक लघु कथा के फुटनोट हैं और शीघ्र ही सोनिया गांधी अपनी पारिवारिक जागीर संभाल लेंगी। किसे पता था कि नरसिम्हा राव एक लम्बे, नीरस ही सही, उपन्यास का रूप ले लेंगे और पूरे पांच वर्ष तक प्रधान मंत्री पद पर डटे रहेंगे। नेहरू परिवार के बाहर का प्रथम कांग्रेसी था जो इस पद पर पूरी अवधि तक रहा।</p>
<p>तभी तंग आकर अर्जुन सिंह, नारायणदत्त तिवारी आदि ने कांग्रेस छोड़कर नई पार्टी बना ली थी। सोनिया गांधी का वरदहस्त उनपर था। मगर भिण्ड के राजपूत और कुमाऊं के द्विज मिलकर भी तेलंगाना के इस नियोगी ब्राम्हण का समरनीति में बराबरी नहीं कर पाये। किनारे पड़ गये। नरसिम्हा राव ने अपने पत्ते ढंग से फेटे और बांटे थे। इन्दिरा गांधी ने उन्हें अक्षम मुख्यमंत्री मानकर 1973 में तेलंगाना आन्दोलन के समय बर्खास्त कर दिया था। मगर शीघ्र ही उसी इन्दिरा गांधी ने दुबारा प्रधानमंत्री बनने पर नरसिम्हा राव को 14 जनवरी 1980 को प्रदेश स्तर से उठाकर सीधे विदेश मंत्री बना दिया। जब पंजाब आतंकवाद से धधक रहा था, दार्जिलिंग में गुरखा और मिजोरम में अलगाववादी समस्या पैदा कर रहे थे, तो इन्दिरा गांधी ने नरसिम्हा राव को गृहमंत्री बनाया था। तभी आया अमृतसर के स्वर्ण मन्दिर में सेना का प्रवेश और नरसिम्हा राव पर इन्दिरा सरकार को फिर से बचाने का दायित्व। इन्दिरा गांधी की हत्या के चन्द घण्टों बाद ही हैदराबाद से नरसिम्हा राव को वायुसेना के विमान से दिल्ली लाया गया था। तब सिख-विरोधी दंगों से दिल्ली जल रही थी। बाद में राजीव गांधी ने उन्हें रक्षा तथा मानव संसाधन मंत्री बनाया। इतने सब महत्वपूर्ण पद संभालने के बाद भी नरसिम्हा राव पर हिन्दीभाषी कांग्रेसी सन्देह करते रहे। इसका कारण था हिन्दी का सम्यक ज्ञान, सही शब्द, त्रुटिहीन उच्चारण, उम्दा शैली और उच्च साहित्य की दृष्टि से नरसिम्हा राव उन हिन्दी-भाषी कांग्रेसियों से कहीं ऊपर थे, उत्कृष्ट थे। संस्कृत और फारसी भी धड़ल्ले से बोलते थे। मुझे याद है तब गोरखपुर विश्वविद्यालय के दर्शन विभाग के अध्यक्ष ने कहा कि नरसिम्हा राव सारे प्रधान मंत्रियों से कहीं बड़े भाषाविद तथा हिन्दी के जानकार हैं। उन्हें मैंने टोका था कि यदि भाषा का ज्ञान ही खास अर्हता है तो फिर हिन्दी मास्टर ही प्रधान मंत्री बना दिया जाय। मगर नरसिम्हा राव ने सिद्ध कर दिया कि प्रवाहमयी हिन्दी बोलना एक योग्यता ही होती है। तो प्रश्न उठता है, “आखिर नरसिम्हा राव की खता क्या थी कि कांग्रेसी उन्हें अपना न सकें|” पहला तो यही कि नरसिम्हा राव की अध्यक्षता वाली कांग्रेस यदि ग्यारहवीं लोकसभा (1996) में बहुमत पा जाती तो नेहरू-गांधी परिवार को तब सर्वोदय शिविर का संचालन कार्य मिलता, या वह व्यापार, वाणिज्य के धंधे में चला जाता। वह इतना आध्यात्मिक कभी रहा नहीं कि हिमालय पर चला जाता। सत्ता और राजनीति के हाशिये पर तब तक वह चला ही गया था।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/india/contribution-of-indian-legend-journalists-gyan-sagar-verma-and-viren-dangwal-in-emergency/9398/">ज्ञान सागर वर्माः देश का इकलौता पत्रकार जिसने इंटेलीजेंस की आंखों में धूल झोंककर छापी थी सरकार के खिलाफ खबर</a></span></strong></span></p>
<p>लेकिन नरसिम्हा राव की कुछ उपलब्धियों का उल्लेख हो तो नाटककार जार्ज बर्नार्ड शा की उक्ति चरितार्थ होती है कि “जन्म पर सभी समान होते हैं। बस मौत पर पता चलता है कि कौन ऊंचाई तक उठा।” नरसिम्हा राव ने जो विशेष कार्य किये वह तो भारी थे अतः डूब गये, मगर जो विफलतायें थी, वे हलकी थीं, अतः सतह पर दिखती रहीं। जैसे अयोध्या प्रकरण। सन्तों से प्रवाहमय संस्कृत में संवाद कर प्रधानमंत्री ने उन्हें कारसेवा टालने हेतु मना भी लिया था। पर भड़काने में माहिर कल्याण सिंह की सरकार के सामने केन्द्र की कांग्रेस सरकार उन्नीस पड़ गई। नरसिम्हा राव ने लोकसभा में कहा भी था कि रामभक्तों (भाजपा) से तो सामना कर सकते थे, पर भगवान राम से नहीं। जनता दोनों के मध्य अन्तर नहीं कर पाई और कांग्रेस पार्टी की रामविरोधी छवि बन गई। वह चुनाव हार गई।</p>
<p>नरसिम्हा राव के व्यक्तित्व के सम्यक ऐतिहासिक आंकलन में अभी समय लगेगा। मगर इतना कहा जा सकता है कि तीन कृतियों से वे याद किए जाएंगे। पंजाब में उग्रवाद चरम पर था। रोज लोग मर रहे थे। एक समय तो लगता था कि अन्तर्राष्ट्रीय सीमा अमृतसर से खिसककर अम्बाला तक आ जाएगी। खालिस्तान यथार्थ लगता था। तभी मुख्यमंत्री बेअन्त सिंह और पुलिस मुखिया के.पी.एस. गिल को पूर्ण स्वाधिकार देकर नरसिम्हा राव ने पंजाब को भारत के लिए बचा लिया। उसके पहले राज्यपाल रहकर भी अर्जुन सिंह पंजाब को कटते देख रहे थे। देश का विकास दर जो आज चोटी पर चढ़ रहा है, यह भी नरसिम्हा राव की देन है। एक कुशल सरकारी मुलाजिम सरदार मनमोहन सिंह को वित्त मंत्री नियुक्त कर नरसिम्हा राव ने आर्थिक चमत्कार कर दिखाया। मनमोहन सिंह इसे स्वीकार चुके हैं। तीसरा राष्ट्रहित का काम नरसिम्हा राव ने किया कि गुप्तचर संगठन रॉ को पूरी छूट दे दी कि पाकिस्तान की धरती से उपजते आतंकी योजनाओं का बेलौस, मुंहतोड़ जवाब दें। अर्थात् यदि पाकिस्तानी आतंकी दिल्ली में एक विस्फोट करेंगे तो लाहौर और कराची में दो दो विस्फोट होंगे। इस्लामाबाद समझ गया कि नरसिम्हा राव ने विजयनगर (आन्ध्र) सम्राट कृष्णदेव राय से इतिहास सीखा है जिसने मुस्लिम हमलावरों को उन्हीं के प्रदेश में हराया।</p>
<p>मगर जीते जी नरसिम्हा राव की जो दुर्गति कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने की वह हृदय विदारक है। उससे ज्यादा खराब उनके निधन पर किया गया बर्ताव रहा है। नरसिम्हा राव के शव को सीधे हैदराबाद रवाना कर दिया ताकि कहीं राजघाट के आसपास उनका स्मारक न बनाना पड़े। पूरे पांच साल तक प्रधान मंत्री रहे व्यक्ति के शव को अकबर रोड वाले कांग्रेस पार्टी कार्यालय के परिसर के भीतर तक नहीं लाया गया। बाहर फुटपाथ पर ही रखा गया। और तो और अधजली लाश को मिट्टी का तेल डालकर शेष संस्कार कार्य किया गया था।</p>
<p>इसी विचारक्रम में याद आती है एक बात दस बरस पुरानी। अपनी अकर्मण्यता और लिबलिबेपन के कारण नरसिम्हा राव ने कांग्रेस पार्टी को ड्राइवर सीट से उतार कर केन्द्र सरकार में कन्डक्टर बना डाला था। उस वक्त सत्ता के खेल में ताल ठोकनेवाले कांग्रेसी ताली पीटते रहे। खाता-बही संभालने वाले बक्सर के पंसारी सीताराम केसरी ने वरिष्ठ और विद्वान नरसिम्हा राव से गद्दी छीन ली थी। खुद पार्टी अध्यक्ष बन गये। मगर इतिहास ने तब स्वयं को दुहराया। दो वर्ष बाद सोनिया गांधी ने अपने दल बल सहित कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष के कमरे का ताला तोड़कर खुद कुर्सी हथिया ली। सीताराम केसरी ने बस इतना विरोध में कहा कि यदि सोनियाजी इशारा कर देती तो वे खुद बोरिया-बिस्तर समेट लेते। सेवक अपनी औकात समझता है। तो बिना किसी चुनाव प्रक्रिया के, बिना नामांकन के, बिना वैध मतदान के, सोनिया गांधी स्वयंभू पार्टी मुखिया बन गईं थीं। सवा सौ साल की विरासत पर सात साल के बल पर काबिज हो गई।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/state/uttar-pradesh/virendra-atal-was-brutally-tortured-by-the-police-during-the-emergency/9382/">आपातकाल, यातनाएं और अटल: पुलिस ने प्लास से खींच लिए थे सारे नाखून, हिल गई थी पूरी दुनिया</a></span></strong></span></p>
<p>नरसिम्हा राव कितने भ्रष्ट रहे? वे प्रधानमंत्री रहे किन्तु अपने पुत्र को केवल पैट्रोल पम्प ही दिला पाये। हर्षद मेहता के वकील राम जेठमलानी ने मुम्बई के पत्रकारों को दर्शाया कि उनके मुवक्किल ने सन्दूक में एक करोड़ नोट कैसे लपेट कर नरसिम्हा राव को दिये थे। अर्थात जिसके एक इशारे पर शेयर मार्केट में अरबों का वारा-न्यारा हो जाए उस प्रधान मंत्री ने केवल एक करोड़ में सन्तुष्टि कर ली? वे असहाय इतने थे कि इस भाषाज्ञानी प्रधानमंत्री को अपनी आत्मकथा रूपी उपन्यास के प्रकाशक को स्वयं खोजना पड़ा था। नक्सलियों से अपने खेतों को बचाने में विफल रहे, नरसिम्हा राव दिल्ली में मात्र एक फ्लैट ही बीस साल में साझेदारी में ही खरीद पाये। तो मानना पड़ेगा कि नरसिम्हा राव आखिर अपनी दक्षता, क्षमता, हनक, रुतबा, रसूख और पहुंच में सोनिया के सामने कहीं आसपास भी नहीं फटकते। मगर आज दिख रहा है कि पूरा कुनबा माँ, बेटा और बेटी दया खोज रहे हैं। कब मोदी की दृष्टि वक्र हो जाय। दामाद वाड्रा की हालत इसका प्रमाण है|</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>(<span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://tismedia.in/">TIS Media</a></span> परिवार के संरक्षक<span style="color: #ff0000;"> <a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के. विक्रम राव</a> </span>का शुमार देश के नामचीन पत्रकारों में होता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उन्होंने इमरजेंसी तक में स्वतंत्र आवाज के लिए जेल यात्रा की। महीनों की सजाएं भुगती। श्री राव,  वॉयस ऑफ अमेरिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनोमिक टाइम्स, फिल्मफेयर और इलस्ट्रेटेड वीकली में प्रमुख पदों पर रहने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड के संस्थापक संपादक भी रह चुके हैं। प्रेस की नियामक संस्था &#8216;भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य रहने के अलावा मजीठिया वेतन बोर्ड और मणिसाना वेतन बोर्ड के सदस्य के तौर पर पत्रकारों के हित में लंबा संघर्ष किया है। <span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के.विक्रम राव</a>,</span> फिलहाल इंडियन फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट <span style="color: #ff0000;">#IFWJ</span> के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)</strong></span></p>
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		<title>प्रेस पर प्रेशर कितना ? तब और अब!</title>
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		<pubDate>Tue, 29 Jun 2021 11:45:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>मसलन आपातकाल जैसी लोमहर्षक वारदातें यदि आज होतीं, तो वर्तमान मीडिया क्या सत्तावानों के, पुलिसवालों के, राजनेताओं के, समाज के कर्णधारों के परखमें और पुर्जें नहीं उड़ा देते? अत्याचारियों की धज्जियां ढूंढे नहीं मिलती। तो इन पुराने हैवानी हादसों पर गौर करें। दो घटनाओं का उल्लेख करें। आपातकाल में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. रघुवंश &#8230;</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>कई दफा सुना। बहुत बार पढ़ा भी। अब मितली सी होने लगती है। वितृष्णा और जुगुप्सा भी। कथित जनवादी, प्रगतिशालि, अर्थात वामपंथी और सोनिया—कांग्रेसी दोहराते रहते है, चीखते भी हैं कि आज आपातकाल से भी बदतर स्थिति हो गयी है। अत: तार्किक होगा कि खूंखार टीवी एंकर, खोजी खबरिये और जुझारु—मीडियाकर्मियों की तब (25 जून 1975 से 21 मार्च 1977) और आज की कार्यशैली की तनिक तुलना करें।
			</div>
		</div>
	
<p>मसलन आपातकाल जैसी लोमहर्षक वारदातें यदि आज होतीं, तो वर्तमान मीडिया क्या सत्तावानों के, पुलिसवालों के, राजनेताओं के, समाज के कर्णधारों के परखमें और पुर्जें नहीं उड़ा देते? अत्याचारियों की धज्जियां ढूंढे नहीं मिलती। तो इन पुराने हैवानी हादसों पर गौर करें। दो घटनाओं का उल्लेख करें। आपातकाल में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. रघुवंश को नजरबंद कर जेल में सड़ाया गया। उनपर इल्जाम लगा था कि वे खंभे पर चढ़कर संचार के तार काट रहे थे। डॉ. रघुवंश जन्मजात लुंज थे। वे बाल्यावस्था से ही अपने पैरों की उंगलियों के बल लिखा करते थे। कालीकट (केरल) के इंजीनियरिंग के छात्र वी. राजन को नक्सलवादी कहकर कैद किया गया था। टांगों को लोहे की चादर से कुचला गया। वह मर गया। पुलिस ने इस हरकत से साफ इनकार कर दिया था। मगर न्यायालय ने सच्चाई ढूंढ ही ली। मुख्यमंत्री के. करुणाकरण को त्यागपत्र देना ही पड़ा।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE:<span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/india/contribution-of-indian-legend-journalists-gyan-sagar-verma-and-viren-dangwal-in-emergency/9398/"> ज्ञान सागर वर्माः देश का इकलौता पत्रकार जिसने इंटेलीजेंस की आंखों में धूल झोंककर छापी थी सरकार के खिलाफ खबर</a></span></strong></span></p>
<p>मध्य प्रदेश की एक पुलिस हिरासत में मां और बेटे को विवस्त्र करके साथ सुलाया गया था। सत्तारुढ मां—बेटे (संजय गांधी) इस पर मौन रहे। भारत के प्रधान न्यायाधीश जेसी शाह के न्यायिक आयोग ने इन वारदातों के विवरण को सार्वजनिक कर दिया था। अखबारों की बिजली काटकर 26 जून 1975 को दैनिक ही नहीं छपने दिये गये थे। ढेर सारे ऐसे हादसे हुये थे। जैसे खेतों में ही किसानों की नसबंदी करा दी। जनसंख्या नियंत्रण का अभियान था। मुसलमानों, खासकर जामा मस्जिद और तुर्कमानगेट पर जो पुलिस ने किया, वह तो जघन्य था। तात्पर्य यह है कि इतना नृशंस, क्रूरतम और अमानविक जुल्म तब ढाया गया था। क्या आज के भारत में ऐसी घटनायें संभव हैं? कहीं जिक्र होता भी हैं? अगर कहीं किसी सिरफिरे पुलिसवाले अथवा राजमद में सत्तासीन व्यक्ति ने ऐसा करे भी तो वह क्या बच पायेगा? मुक्त टीवी बहस में उसकी बधिया उखाड़ दी जायेगी। बोटी—बोटी हो जायेगी। तो फिर क्या औचित्य है यह चिल्लपों करने का कि इन्दिरा गांधी वाली इमर्जेंसी अब मोदी राज में वापस लौट आयी है। विचारणीय बात यह है कि ऐसी बेतुकी बातें वे करते है जो एमर्जेंसी के समय या बाद में जन्मे हैं। राहुल गांधी और उनकी भगिनी प्रियंका वाड्रा तीन और चार साल के शिशु थे जब उनकी दादी तानाशाह बन बैठीं थीं।</p>
<p>वस्तुस्थिति यह है कि आज तक आपातकाल के अपराधियों ने न तो कोई दण्ड भुगता, न उनलोगों ने कभी यातना देखी। अत: दिमागी बेईमानी होगी यह कहना कि आपातकाल जैसी स्थिति आज भी है। जन अदालत का फैसला 1977 में देखा गया। रायबरेली की जनता द्वारा प्रधानमंत्री के चुनाव पर दिये गये जनादेश को याद करें।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE:<span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/state/uttar-pradesh/virendra-atal-was-brutally-tortured-by-the-police-during-the-emergency/9382/"> आपातकाल, यातनाएं और अटल: पुलिस ने प्लास से खींच लिए थे सारे नाखून, हिल गई थी पूरी दुनिया</a></span></strong></span></p>
<p>मीडिया का हाल उस वक्त कैसा था? लालकृष्ण आडवाणी (मोरारजी काबीना के सूचना एवं प्रसारण मंत्री) ने बेहतरीन बात कही पत्रकारों से : &#8221;इंदिरा गांधी ने तो आप लोगों से झुकने के लिये कहा था और आज लोग लगे रेंगने!&#8221; क्या वर्तमान युग में ऐसा मुमकिन है? हुजुम है आज जांबाज पत्रकारों का जो पलटवार करेंगे, झुकने की तो बात है ही नहीं। आज सेंसरशिप कोई सरकार लगा सकती है? तत्काल उसे तोड़ा जायेगा। हां, जिन मीडिया मालिकों का व्यवसायिक हित है वे जरुर उसके संवाददाताओं को धमकायेंगे, परेशान करेंगे। खबर दबायेंगे।</p>
<p>स्वयं अपना उदाहरण 1976 का पेश करुं । प्रतिरोध की आवाज इर्मेंजेंसी (1975-77) में पूरी तरह कानून कुचल दिया गया था। मीडिया सरकारी माध्यम मात्र बन गया था। अधिनायकवाद के विरोधी जेलों में ठूंस दिये गये थे। समूचा भारत गूंगा बना दिया गया था। न्यायतंत्र नंपुसक बना डाला गया था। हालांकि उसके कान और आँख ठीक थे। उस दौर में हम पच्चीस सामान्य भारतीयों ने देश के इतिहास में सबसे जालिम, खूंखार और मेधाहीन तानाशाही का सक्रिय विरोध करने की छोटी सी कोशिश की थी। पुलिस ने इसे &#8221;बड़ौदा डायनामाइट षडयंत्र&#8221; का नाम दिया था। सजा थी फांसी। तब मैं बड़ौदा में &#8221;टाइम्स आफ इन्डिया&#8221; का संवाददाता था। मेरा आवास हमारी भूमिगत प्रतिरोधात्मक गतिविधियों का केन्द्र था। हम सब की गिरफ्तारी के बाद कुछ लोग समझे थे कि बगावत की एक और कोशिश नाकाम हो गई थी। पर ऐसा हुआ नहीं था।</p>
<p>रायबरेली के वोटरों ने हमारा मकसद पूरा किया। तब तानाशाह पहले कोर्ट (इलाहाबाद) से, फिर वोट (रायबरेली, 20 मार्च 1977) से हारीं। हम सब रिहा हो गये। भारत दुबारा आज़ाद हुआ। अब वैसी (25 जून 1975) तानाशाही फिर कभी नहीं लौटेगी। मगर आजादी किसी की कभी बरकरार नहीं रहती है, सिवाय उनके जो सचेत रहते हैं। मेरे लिये यह आवश्यक है, स्वाभाविक भी, क्योंकि मेहनतकश पत्रकार के नाते समतामूलक समाज का सृजन मेरा भी सपना है। इसीलिए हर जगह प्रतिरोध की लौ हम जलाना चाहते हैं। जनवादी संघर्ष का अलख हम जगाना चाहते हैं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE:<span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-journalism-in-this-era-what-is-journalism-how-it-is-now-a-days/9128/"> मुमकिन, माना मीडिया ने! नामुमकिन कर डाला योगीजी ने !!</a></span></strong></span></p>
<p>उसी दौर का वृतांत है। बड़ौदा जेल में गुजरात के डीजी (पुलिस) पीएन राइटर मुझसे जिरह करने आये। उनका प्रश्न था : &#8221;जब समूचे भारत के पत्रकार पटरी पर आ गये थे, तो आप (दो संतानों के पिता) को क्या सूझी थी कि इंदिरा गांधी के विरोध में बगावत का परचम लहराये?&#8221; मेरा उत्तर सामान्य था। वे भी &#8221;टाइम्स आफ इंडिया&#8221; के पाठक थे। मैंने पूछा : &#8221; डीजीपी साहब, 25 जून 1975, प्रेस सेंसरशिप लगाये जाने के पूर्व &#8221;टाइम्स&#8221; पढ़ने में कितना समय लगाते थे? वे बोले : &#8221; सोलह पृष्ठ पढ़ने में करीब बीस—बाईस मिनट लगते थे।&#8221; मेरा अगला प्रश्न था : &#8221;जून 25 के बाद, जब सेंसरशिप लागू हो गयी थी, तब?&#8221; उनका जवाब था : &#8221;अब करीब दस मिनट।&#8221; मैं बोला : &#8221;साहब! आपके दस मिनट वापस लाने के लिये मैं जेल में आया हूं।&#8221; बस मेरा पुलिसिया इंटरोगेशन खत्म हो गया। क्या आज कहीं पत्रकारिता में ऐसी स्थिति की लेशमात्र भी आशंका है? संभव भी हो सकती है? यर्थार्थवादी दृष्टि अपनाये। नयी पीढ़ी के, खासकर युवा श्रमजीवी पत्रकार कायर नहीं हैं। बस यही सम्यक टिप्पणी है: इंदिरा शासन के दौर की मीडिया पर और आज के टीवी—अखबारों पर। निरंकुशता के सोपान पर इंदिरा गांधी से नरेन्द्र मोदी बहुत निचले पायदान पर हैं।</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>(<span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://tismedia.in/">TIS Media</a></span> परिवार के संरक्षक<span style="color: #ff0000;"> <a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के. विक्रम राव</a> </span>का शुमार देश के नामचीन पत्रकारों में होता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उन्होंने इमरजेंसी तक में स्वतंत्र आवाज के लिए जेल यात्रा की। महीनों की सजाएं भुगती। श्री राव,  वॉयस ऑफ अमेरिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनोमिक टाइम्स, फिल्मफेयर और इलस्ट्रेटेड वीकली में प्रमुख पदों पर रहने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड के संस्थापक संपादक भी रह चुके हैं। प्रेस की नियामक संस्था &#8216;भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य रहने के अलावा मजीठिया वेतन बोर्ड और मणिसाना वेतन बोर्ड के सदस्य के तौर पर पत्रकारों के हित में लंबा संघर्ष किया है। <span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के.विक्रम राव</a>,</span> फिलहाल इंडियन फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट <span style="color: #ff0000;">#IFWJ</span> के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)</strong></span></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-difference-in-press-during-emergency-and-now/9504/">प्रेस पर प्रेशर कितना ? तब और अब!</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>मुमकिन, माना मीडिया ने! नामुमकिन कर डाला योगीजी ने !!</title>
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		<pubDate>Mon, 14 Jun 2021 12:57:54 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>अर्थात वह सहाफिये—आजम मृषाभाषी हो गये। पुण्यजी की सुकृति चर्चित हो गयी। अचरज का आधार यह है कि एक प्राचीन आम मान्य रिवाज इससे टूटा था। कोरोना काल का प्रोटोकाल तो ऐसा रचा नहीं गया है कि &#8221;हैप्पी बर्थडे&#8221; वर्जित हो गया हो। बल्कि दीर्घायु की कामना कोविड को हराने हेतु आज ज्यादा जरुरी है। &#8230;</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
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				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>यूं तो हमारे व्यवसाय में फ़ेक (फर्जी) और पेइड (दाम चुकाई) न्यूज का प्रचलन अरसे से है। खासकर चुनाव के दौरान। अब &#8221;प्लांटिंग&#8221;(रोपना) भी चालू है। इसीलिये हमलोग तो पसोपेश में उलझे रहते हैं कि पत्रकारिता आखिर है क्या? व्रत है या वृत्ति? मगर गत दिनों लखनऊ मीडिया जगत में हरित क्रान्ति विस्तीर्ण हो गयी। शायद वनमहोत्सव का पखवाड़ा था! मसलन, निपुण विप्रशिरोमणि, मगध से विदर्भ तक वास कर चुके, पंडित पुण्य प्रसून वाजपेयी ने छह अप्रैल को खबर चलायी कि &#8221;पीएम ने सीएम को जन्मगांठ की शुभकामनायें नहीं भेजीं।&#8221; हालांकि राजधानी के दैनिकों में मुखपृष्ठ पर तभी खबर साया हुयी थी कि भाजपा प्रधानमंत्री भाजपाई मुख्यमंत्री की लंबी आयु के इच्छुक हैं।
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<p>अर्थात वह सहाफिये—आजम मृषाभाषी हो गये। पुण्यजी की सुकृति चर्चित हो गयी। अचरज का आधार यह है कि एक प्राचीन आम मान्य रिवाज इससे टूटा था। कोरोना काल का प्रोटोकाल तो ऐसा रचा नहीं गया है कि &#8221;हैप्पी बर्थडे&#8221; वर्जित हो गया हो। बल्कि दीर्घायु की कामना कोविड को हराने हेतु आज ज्यादा जरुरी है। मोदी तो अपनी चिरबैरी सोनिया को भी शतायु की कामना भेजते हैं। भले ही मात्र प्रथा के नाते। मगर उनके संगीसाथी तो चाहेंगे कि रायबरेली में उनकी याद में एक सड़क का नामकरण शीघ्र ही रख दिया जाये।</p>
<p>कुछ मिलती—जुलती खरी टिप्पणी आई बिहार के ही एक अन्य एंकर जनाब अजीत अंजुम की। (उनके नाम का अर्थ है &#8221;नज्म का बहुवचन।&#8221; नक्षत्रमंडलनुमा।) आभा तथा कान्तियुक्त। उन्होंने तो ऐसी खबर चलायी कि मानों मोदी ने योगी की सुपारी दे डाली हो।  योगीजी के हमवतनी स्व. हेमवती नन्दन बहुगुणा जी की उक्ति याद आती है। वे बताते थे कि इन्दिरा गांधी मुख्यमंत्रीरुपी पौधे बोतीं थीं। कुछ समय बाद उखाड़ कर परखतीं थीं कि कहीं जड़े तो मजबूत नहीं हो गयीं? कांग्रेसी प्रधानमंत्री का तो मुख्यमंत्री बदलने का ओलंपिक रिकॉर्ड रहा। टाइम्स आफ इंडिया के मेरी साथी आर.के. लक्ष्मण ने तब निहायत मर्मस्पर्शी कार्टून बनाया था। हैदराबाद विमानस्थल पर टोपी पहने कई कांग्रेसीजन कतार में खड़े दिखे। उनसे इन्दिरा गांधी कह रही हैं : &#8221;बायें से तीसरे। आप आंध्र प्रदेश के अगले मुख्यमंत्री होंगे। क्या नाम है आपका?&#8221; तब तक हैदराबाद में दो साल में पांच मुख्यमंत्री पलटे जा चुके थे।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-brazil-protest-against-jair-bolsonaro-president-of-brazil/9101/">भारतमित्र, किन्तु अतीव जुगुप्सित &#8221;मसीहा&#8221;</a></span></strong></span></p>
<p>यूं नरेन्द्र मोदी तो कहीं अधिक बलवान हैं। किन्तु अटल बिहारी वाजपेयी जैसे बेतुके रुप से प्रताड़ित नहीं करते हैं। जैसे एकदा लखनऊ में हुआ था। बेगम हजरत पार्क में भाजपा की सभा थी। कलेक्ट्रेट में लोकसभाई नामांकन दाखिल कर अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा बेगम हजरत महल पार्क में उद्बोधन होना था। राजनाथ सिंह, लालजी टंडन आदि का भाषण हुआ। फिर धन्यवाद का भाषण हो गया। मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का नाम तक नहीं पुकारा गया। मंच से उतरकर वे घर चले आये। पैराशूट से कभी धरा पर उतरा संजय गांधी अपने मुख्यमंत्री पंडित नारायणदत्त तिवारी से ऐसा ही अभद्र व्यवहार करता था?</p>
<p>वापस लौटें समाचार के आयाम, गुण, विषयवस्तु और प्रस्तुतिकरण पर। वहीं मोदी—योगी के बधाई खबर पर। रिपोर्टर की भांपने, ताड़ लेनेवाली अर्हता की। पता चला कि ट्विटर पर पीएम का सीएम को बधाई संदेश नहीं आया तो साथियों ने दिगामी तीर से तुक्का लगाया। इन महारथियों को याद नहीं रहा कि ट्विटर का झगड़ा भारत सरकार से चल रहा है। मोहन भागवत और वैंकय्या नायडू का ट्विटर हटा दिया गया, फिर चालू हुआ। इधर मोदी के लोगों ने ट्विटर पर संदेश प्रसारित करना कुछ वक्त से रोक दिया है। पर प्रधानमंत्री ने तीरथ सिंह रावत (उत्तराखण्ड) और योगी आदित्यनाथ से फोन पर बात की। यह शुभ  संदेश प्रचारित नहीं हुआ। मगर तभी ढेर सारे अनुमान, अन्दाज और अटकलें चालू हो गयीं। माहौल भी ऐसा बना कि मीडिया ने काबीना परिवर्तन की लहर तक चलायी गयी। जो बवंडर तो बन न सकीं। बस फिस हो गयी। इस पूरे प्रकरण में वरिष्ठ टीवी संपादक साथी वासिन्द मिश्र की राय बहुत तर्कसम्मत लगती है। यदि कोविड से लड़ने के प्रबंधन में योगीजी विफल रहे तो फिर कर्नाटक, गुजरात, मध्य प्रदेश आदि के भाजपायी मुख्यमंत्री पहले हटें। वे तो सफलता से दूर थे। योगीजी तो अनवरत युद्धरत रहे हैं।</p>
<p>इसी बीच पार्टी उपाध्यक्ष पूर्वी चम्पारण के ठाकुर राधामोहन सिंह लखनऊ पधारे थे। उन्हें याद आया कि आनन्दीबेन पटेल की चाय अरसे से नहीं पी है। राजभवन चले गये। हृदयनारायण दीक्षित से सत्संग करने भी गये। तभी भाई मनोज सिन्हा दिल्ली पधार गये, शायद अपना नया कुर्ता पुराने दर्जी से सिलवाने और शुद्ध सत्तू श्रीनगर ले जाने। सब समेटकर कहानी तो बन ही गयी। पत्रकारी दक्षता तो रही ही। मगर वहीं मात्र चुहिया निकली पहाड़ खुदने के बाद। तब भी कुछ रिपोर्टरों की चपलता, कल्पनाशीलता और काव्यात्मकता की दाद देनी पड़ेगी।</p>
<p>यहां अपना उदाहरण दूं। मेरी खबर से कांग्रेस सरकार की दुविधा बढ़ गयी थी। इन्दिरा गांधी ने (1974) विधानसभा चुनाव पर गुजरात के महाबली स्वास्थ्य मंत्री और बड़ौदा के महापौर  डा. ठाकोरभाई पटेल को उलूल—जुलूल बोलने पर डांटा। डा. पटेल ने कुछ मलयालम भाषी पत्रकारों को कहा था कि विधानसभा चुनाव में बड़ौदा से उनका सोशलिस्ट प्रतिद्वंदी गजानन पराडकर को उनका अलसेशियन कुत्ता ही हरा देगा। यह खबर मुझे केरल के सा थियों से मिली। उनके छापने के बाद मैंने उसे गुजरात के मित्रों में वितरित किया। तभी प्रधानमंत्री अभियान पर गुजरात आयीं। इसी चुनाव में पराजय के बाद इन्दिरा गांधी ने भारत पर इमरजेंसी थोपी थी। तब बड़ौदा के एक सार्वजनिक उपक्रम के विश्राम गृह में प्रधानमंत्री ने डॉ. पटेल से बात की। वहां के खानसामें ने मुझे बाद में बताया कि कुत्तेवाली बात पर प्रधानमंत्री पार्टी प्रत्याशी से जोर—जोर से बात कर रहीं थीं। मेरी खबर का स्रोत वही रसोईया था। डॉ. पटेल विधान सभा सीट हार गये। पराडकर जीत गये। अंजाम में गुजरात में पहली बार कांग्रेस पराजित हुयी। इमरजेंसी आ गयी।</p>
<p>ब्रिटिश संसद का किस्सा जान लीजिये। वहां कल्पनाशील रिपोर्टर ने गजब ढा दिया था। सदन के प्रांगण में एक संवाददाता ने वित्त मंत्री से मजाक में पूछा, &#8221;किन—किन वस्तुओं पर नया कर लगेगा?&#8221; वित्त मंत्री ने व्यंग किया : &#8221;आप धुआं बेहिचक उड़ा सकते हैं।&#8221; बस क्या था। खबर छपी कि तंबाखू पर नया कर नहीं। बजट की गोपनीयता भंग करने के आरोप वित्तमंत्री की विदाई हो गयी। दो और दो जोड़कर भी अक्सर बाईसवाली खबर बनायी जा सकती है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-high-court-order-to-continue-the-construction-work-of-central-vista-uninterrupted/9076/"> विकास में वक्फ का रोड़ा नागवार होगा!</a></span></strong></span></p>
<p>दूसरा वाकया लन्दन के एक महंगे सैलून का है। पिछली सदी वाला। एक बार लार्ड चार्ल्स हार्डिंग हजामत हेतु वहाँ गए। अमूमन हज्जाम मुतबातिर बात करता रहता है, बिना विराम के, बिना विश्राम के। सूचनाओं की खदान उसके पास रहती है। अतः लार्ड हार्डिंग ने बातचीत के दरम्यान कुछ पूछा होगा। कुछ देर बाद उसी कुर्सी पर लन्दन टाइम्स का रिपोर्टर पहुंचा और उसी नाई से केशकर्तन कराया। फितरतन उस हज्जाम ने पत्रकार को बताया कि लार्ड हार्डिंग आये थे। बातचीत का ब्यौरा माँगने पर नाई ने बताया कि वे नई दिल्ली के मौसम के बारे में पूछ रहे थे। वह नाई कुछ समय भारत में कार्यरत था। रिपोर्टर की खोपड़ी का एंटिना टनटनाया। दफ्तर आकर उसने खबर लगाई कि भारत के अगले वायसराय लार्ड चार्ल्स हार्डिंग नियुक्त हुए हैं। वही दो और दो उस रिपोर्टर ने जोड़ा, क्योंकि पैंसठ—वर्षीय लार्ड गिल्बर्ट मिन्टों दिल्ली से लन्दन वापस (1910) वतन लौट रहे थे। उधर प्रथम विश्वयुद्ध की भनक सुनाई दे रही थी। भारत की राष्ट्रीय राजधानी भी कोलकाता से नई दिल्ली (1911) बनने वाली थी। अतः वायसराय के पद को इन परिस्थितियों में रिक्त नहीं रखा जा सकता था| इतनी सूचना पर्याप्त थी खबर बनाने के लिये। लेकिन गमनीय पहलू है कि नाई ही इतनी बड़ी खबर का स्रोत था। संयोग से रिपोर्टर उसी कुर्सी पर विराजा और उसी नाई ने उसकी हजामत बनाई, खबर भी दी।</p>
<p>मगर मोदीजी का योगीजी को फोन वाली खबर किसी भी खबरची ने न पाने की कोशिश की। न जानना चाहा। बस लंतरानी हांक दी।</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>(<span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://tismedia.in/">TIS Media</a></span> परिवार के संरक्षक<span style="color: #ff0000;"> <a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के. विक्रम राव</a> </span>का शुमार देश के नामचीन पत्रकारों में होता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उन्होंने इमरजेंसी तक में स्वतंत्र आवाज के लिए जेल यात्रा की। महीनों की सजाएं भुगती। श्री राव,  वॉयस ऑफ अमेरिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनोमिक टाइम्स, फिल्मफेयर और इलस्ट्रेटेड वीकली में प्रमुख पदों पर रहने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड के संस्थापक संपादक भी रह चुके हैं। प्रेस की नियामक संस्था &#8216;भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य रहने के अलावा मजीठिया वेतन बोर्ड और मणिसाना वेतन बोर्ड के सदस्य के तौर पर पत्रकारों के हित में लंबा संघर्ष किया है। <span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के.विक्रम राव</a>,</span> फिलहाल इंडियन फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट <span style="color: #ff0000;">#IFWJ</span> के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)</strong></span></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-journalism-in-this-era-what-is-journalism-how-it-is-now-a-days/9128/">मुमकिन, माना मीडिया ने! नामुमकिन कर डाला योगीजी ने !!</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>भारतमित्र, किन्तु अतीव जुगुप्सित &#8221;मसीहा&#8221;</title>
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		<pubDate>Sun, 13 Jun 2021 11:55:06 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>अगली  और अन्तिम कृपा की है कि गत गणतंत्र दिवस (26 जनवरी 2020)  पर वे नयी दिल्ली में विशेष अतिथि थे। दक्षिण एशिया और लातिन अमेरिका के इन दोनों राष्ट्रों की डेढ़ अरब जनता के दो नुमाइन्दे साथ थे। बस अब इतना ही। और आगे अच्छा नहीं है। कल रात्रि से ब्राजील में देशव्यापी प्रदर्शन &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-brazil-protest-against-jair-bolsonaro-president-of-brazil/9101/">भारतमित्र, किन्तु अतीव जुगुप्सित &#8221;मसीहा&#8221;</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
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				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>इसके पहले कि आप आगे पढ़कर इस राजनेता को पूर्णतया कुत्सित और सिर्फ घृणास्पद मान लें, उससे जुड़ी तीन नीक बातों का उल्लेख पहले कर दूं। जब नरेन्द्र मोदी ने ब्राजील गणराज्य के इस छाछठ—वर्षीय 38वें राष्ट्रपति तथा भारतमित्र जायूर मसीहा बोल्सोनारो को उनके बीस करोड़ नागरिकों हेतु कोविड—19 कोवैक्सीन खुराक भेजी थी तो उन्होंने आभार में कहा था कि : &#8221;हनुमान संजीवनी लाये थे, रामानुज को बचाया था। वैसे ही कोविड—19 से निबटने हेतु मोदीजी ने हमें संजीवनी भेजी है (22 जनवरी 2021)।&#8221; एक उपकार ब्राजील ने किया था कि भारत के वित्तीय उत्कर्ष के लिये चीन, रुस तथा दक्षिण अफ्रीका के साथ परस्पर सहयोग के तीन गठबंधन रचे। इसे &#8221;ब्रिक्स, आईबीएस तथा बीएएसआईसी&#8221; नाम दिया। इससे भारत को विकास के अपार अवसर मिले।
			</div>
		</div>
	
<p>अगली  और अन्तिम कृपा की है कि गत गणतंत्र दिवस (26 जनवरी 2020)  पर वे नयी दिल्ली में विशेष अतिथि थे। दक्षिण एशिया और लातिन अमेरिका के इन दोनों राष्ट्रों की डेढ़ अरब जनता के दो नुमाइन्दे साथ थे। बस अब इतना ही। और आगे अच्छा नहीं है।</p>
<p>कल रात्रि से ब्राजील में देशव्यापी प्रदर्शन शुरु हो गये। कोविड—19 से ढाई हजार लोग कालकवलित हो गये। एक लाख नये लोग ग्रसित हो गये। (भारत में अब तक तीन लाख चालीस हजार मृत्यु हुयी हैं।)। अत: ब्राजील के विभिन्न शहरों में जनता सड़कों पर निकल आयी। वे सब थाली पीटकर बोल्सोनारो की मौत की प्रार्थना कर रहे थे।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE:<span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-high-court-order-to-continue-the-construction-work-of-central-vista-uninterrupted/9076/"> विकास में वक्फ का रोड़ा नागवार होगा!</a></span></strong></span></p>
<p>वस्तुत: विरोध का यह तरीका अहमदाबाद में नवनिर्माण आन्दोलन के दौरान (20 दिसंबर 1973—16 मार्च 1974) सामने आया था। छात्र संघर्ष समिति ने कांग्रेस मुख्यमंत्री चिमनभाई जीवाभाई पटेल की बर्खास्तगी तथा राज्य विधानसभा को भंग करने हेतु यह जनसंघर्ष समस्त गुजरात राज्य में चलाया था। इंदिरा—कांग्रेस की सरकार का यह मृत्युघंट था। अत: तीन चौथाई विधायकों ने जनता के आग्रह पर त्यागपत्र स्पीकर को दे दिया। राष्ट्रपति शासन लग गया। आम चुनाव में जनतामोर्चा की सरकार बनी। गांधीवादी बाबूभाई पटेल मुख्यमंत्री बने। मगर एमरजेंसी थोप दी गयी। गुजरात में केन्द्र का शासन हो गया। यह थाली पीटनेवाले विरोध का तरीका तभी से प्रचलन में आया। इसके पहले अलग गुजरात प्रदेश के लिये गांधीवादी इन्दुलाल याज्ञिक के नेतृत्व में चले आन्दोलन में &#8221;जनता कर्फ्यूवाले&#8221; जनविरोध का तरीका इजाद हुआ। तब केन्द्र सरकार के इन्दिरा गांधी के काबीना का कोई भी मंत्री, खासकर मोरारजी देसाई, आदि आते थे तो अहमदाबाद की सड़कें सूनसान हो जातीं थीं। जैसे आये, वैसे ही उलटे पैर गुजरात से लोग दिल्ली, मुम्बई वापस लौट जाते थे। आज ब्राजील के शहरों में मिलता—जुलता नजारा दिख रहा है।</p>
<p>अब बोल्सोनारो की प्रमाणित घृणास्पद बातें। इस राष्ट्रपति ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि पुरुष—महिला के समान वेतन वाले नियम का वे खात्मा चाहते है। कारण ! &#8221;महिला गर्भधारण करती हैं। छुट्टी ले लेतीं हैं।&#8221; उनके आंकलन में अरब देश तथा अफ्रीकी राष्ट्र मानवता की संचित गंदगी हैं। झाड़ना चाहिये। ब्राजील की सेना से रिटायर यह राष्ट्रपति सैनिक शासन का हिमायती है। वह हत्या का विरोधी है, मगर तड़पा कर मृत्यु देने का पक्षधर है। फांसी को दोबारा कानून बनाना चाहता है।</p>
<p>बोल्सोनारो को ब्राजील का डोनल्ड ट्रंप माना जाता है। वह नारी—द्वेषी है। उनके दो पुत्र है। तीसरी संतान एक बेटी है जिसे वह &#8221;मेरे कमजोर क्षणों की देन&#8221; कहते हैं। उसकी दृढ़ मान्यता है कि सेक्युलर गणराज्य की अवधारणा ही बेहूदी है, फिजूल है। ईश्वर सर्वोपरि है। उनकी मां ने उनका नाम रखा &#8221;जायूर मसीहा बोल्सोनारो&#8221; क्योंकि वह मानती रही कि जीसस क्राइस्ट ने उनके पुत्र को भेजा है। राष्ट्रपति कहते हैं कि यदि अठारह—वर्ष से कम का व्यक्ति बलात्कार आदि घृणित अपराध करता है तो उसे बालिग की भांति दण्ड मिले। इसपर उनकी विपक्षी सांसद तथा पूर्व मानवाधिकार मंत्री मारिया डी रोजारियो ने बोल्सोनारो को रेपिस्ट कहा। मगर राष्ट्रपति का प्रत्युत्तर था : &#8221;मारिया तो बलात्कार लायक भी नहीं हैं।&#8221; तब अदालत ने इन्हें छह माह की सजा दी और दस हजार डालर का जुर्माना लगाया।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #ff0000;"><strong> <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-lawyers-must-think-about-the-case-before-agreeing-to-advocacy/9049/">कटघरे में तो आयें, वकील साहबान !!</a></span></strong></span></p>
<p>बोल्सोनारो का मानना है कि हिंसा सियासत का अनिवार्य अंग है। एक टीवी इन्टर्व्यू में वे बोले कि ब्राजील को विकसित बनाना है तो &#8221;तीस हजार लोगों को गोली से उड़ा देना चाहिये। इसकी शुरुआत समाजवादी नेता प्रोफेसर फर्नाण्डो हेनरिख कार्डोसो से हो।&#8221; यह नेता ब्राजील का 34वां राष्ट्रपति था। समाजशास्त्र का निष्णात था।</p>
<p>हाल ही में राजधानी रियो डि जेनेरो में भारतीय राजदूत सुरेश के. रेड्डि ने &#8221;इंडियन एक्सप्रेस&#8221; को बताया था कि ब्राजील पहला देश है जिसे कोवैक्सीन भारत ने भेजा था। दोनों राष्ट्रों की मैत्री प्रगाढ़तम है।</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>(<span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://tismedia.in/">TIS Media</a></span> परिवार के संरक्षक<span style="color: #ff0000;"> <a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के. विक्रम राव</a> </span>का शुमार देश के नामचीन पत्रकारों में होता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उन्होंने इमरजेंसी तक में स्वतंत्र आवाज के लिए जेल यात्रा की। महीनों की सजाएं भुगती। श्री राव,  वॉयस ऑफ अमेरिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनोमिक टाइम्स, फिल्मफेयर और इलस्ट्रेटेड वीकली में प्रमुख पदों पर रहने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड के संस्थापक संपादक भी रह चुके हैं। प्रेस की नियामक संस्था &#8216;भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य रहने के अलावा मजीठिया वेतन बोर्ड और मणिसाना वेतन बोर्ड के सदस्य के तौर पर पत्रकारों के हित में लंबा संघर्ष किया है। <span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के.विक्रम राव</a>,</span> फिलहाल इंडियन फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट <span style="color: #ff0000;">#IFWJ</span> के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)</strong></span></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-brazil-protest-against-jair-bolsonaro-president-of-brazil/9101/">भारतमित्र, किन्तु अतीव जुगुप्सित &#8221;मसीहा&#8221;</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>विकास में वक्फ का रोड़ा नागवार होगा!</title>
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		<pubDate>Sat, 12 Jun 2021 12:29:41 +0000</pubDate>
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		<category><![CDATA[Politics]]></category>
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		<category><![CDATA[Central Vista Construction]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>उन्होंने लिखा कि इंडिया गेट के पास के जलाशय के समीपवाली जाब्तागंज मस्जिद न तोड़ी जाये। इसी प्रकार कृषि भवन तथा राष्ट्रपति भवन की मस्जिद भी सुरक्षित रहें। उनकी लिस्ट में सुनहरी बाग रोड, रेड क्रास रोड की (संसद मार्ग), जामा मस्जिद (शाहजहांवाला नहीं) आदि भी शामिल हैं। ध्यान रहें कि ये सब वक्फ की &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-high-court-order-to-continue-the-construction-work-of-central-vista-uninterrupted/9076/">विकास में वक्फ का रोड़ा नागवार होगा!</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>न्यायिक निर्णय (हाईकोर्ट : 1 जून 2021) के बाद राजधानी के &#8221;सेन्ट्रल विस्ता&#8221; योजना का निर्माण कार्य निर्बाधरुप से चलेगा। किन्तु दिल्ली वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष और ओखला क्षेत्र से आम आदमी पार्टी के विधायक मियां मोहम्मद अमानतुल्ला खान ने (4 जून 2021) प्रधानमंत्री को पत्र लिख कर आग्रह किया कि इस नयी राजधानी निर्माण क्षेत्र में आनेवाली मस्जिदों को बनी रहने दिया जाये।
			</div>
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<p>उन्होंने लिखा कि इंडिया गेट के पास के जलाशय के समीपवाली जाब्तागंज मस्जिद न तोड़ी जाये। इसी प्रकार कृषि भवन तथा राष्ट्रपति भवन की मस्जिद भी सुरक्षित रहें। उनकी लिस्ट में सुनहरी बाग रोड, रेड क्रास रोड की (संसद मार्ग), जामा मस्जिद (शाहजहांवाला नहीं) आदि भी शामिल हैं। ध्यान रहें कि ये सब वक्फ की संपत्ति नहीं हैं। एक दफा हरियाणा के चन्द जाट किसानों ने रायसीना हिल्स पर अपना दावा ठोका था। वे राष्ट्रपति को बेदखल कर खुद रहना चाहते थे (20 फरवरी 2017, दि हिन्दू )। इस जाट किसान महाबीर का कहना था कि उसके परदादा के पिता कल्लू जाट रायसीना भूभाग पर हल चलाते थे। उनके पुत्र नत्थू भी यहीं जोताई करता था। मगर 1911 में नयी राजधानी निर्माण पर ब्रिटिश राज ने उन्हें बेदखल कर दिया था।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-lawyers-must-think-about-the-case-before-agreeing-to-advocacy/9049/">कटघरे में तो आयें, वकील साहबान !!</a></span></strong></span></p>
<p>विधायक खान ने दस दिन की नोटिस भारत सरकार को दिया है। वे नहीं चाहते कि अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़े। इसकी पूरी रपट चैन्नई के वामपंथी अंग्रेजी दैनिक &#8221;दि हिन्दू&#8221; में (5 जून 2021, पृष्ठ—3, कालम : 4—6 में) छपी है। यूं तो नयी दिल्ली के कई चौराहों पर के उद्यानों में मस्जिदों को असलियत में बिना नक्शे को पारित कराये बनी इमारतें ही कहा जायेगा।</p>
<p>यहां अमीनाबाद (लखनऊ) में बने हनुमान मंदिर के निर्माण का किस्सा भी बयान हो। बात पुरानी है किंतु नागरिक विकास की दृष्टि से अहम है। प्रयागराज की जगह लखनऊ तब नई नवेली राजधानी बनने वाला था। संयुक्त प्रांत की सरकार तब प्रयाग से अवध केंद्र में आ रही थी। उस दौर की यह बात है। अमीनाबाद पार्क, (जो तब सार्वजनिक उद्यान था) में पवनसुत हनुमान का मंदिर प्रस्तावित हुआ। मंदिर समर्थक लोग कानून के अनुसार चले। नगर म्यूनिसिपालिटी ने 18 मई 1910 को प्रस्ताव संख्या 30 द्वारा निर्णय किया कि अमीनाबाद पार्क के घासयुक्त (लाॅन) भूभाग से दक्षिण पूर्वी कोने को अलग किया जाता है ताकि मंदिर तथा पुजारी का आवास हो सके। तब म्यूनिसिपल चेयरमैन थे आई.सी.एस. अंग्रेज अधिकारी, उपायुक्त मिस्टर टी.ए. एच. वेये, जिन्होंने सभा की अध्यक्षता की थी। मंदिर के प्रस्ताव के समर्थकों में थे खान साहब नवाब गुलाम हुसैन खां। एक सदी पूर्व अवध का इतिहास इसका साक्षी रहा।</p>
<p>खैर यहां मियां अमानतुल्ला खान को इन ऐतिहासिक तथ्यों से अवगत करा दूं कि मक्का में डेढ़ सौ से अधिक पुरानी मस्जिदों को गत वर्षों में साउदी बादशाह के हुक्म से तोड़ा गया था ताकि हज के लिये आनेवाले जायरीनों के आवास, भोजन और दर्शन हेतु पर्याप्त व्यवस्था हो सके। मक्का—मदीना इस्लाम का पवित्रतम तीर्थस्थल है। &#8221;साउदी गजट&#8221; समाचार—पत्र के अनुसार 126 मस्जिदें तथा 96 मजहबी इमारतें जमीनदोज कर दी गयीं थीं, ताकि विशाल पुनर्निर्माण कार्य हो सके। इस पर बीस अरब डालर (चौदह खरब रुपये) खर्च किये गये। उमराह तथा हज एक ही समय संभव हो, इस निमित्त से यह ध्वंस तथा पुनर्निर्माण कार्य हुआ। ओटोमन तुर्को द्वारा निर्मित संगमरमर के भवनों को पवित्र काबा के समीप से हटाया गया ताकि विशाल मस्जिद चौड़ी की जा सके। बीस लाख यात्रियों को इससे सहूलियत मिली। राजधानी की 98 प्रतिशत ऐतिहासिक इमारतें तोड़ी गयीं ताकि साउदी अरब की राजधानी (ठीक नयी दिल्ली की भांति) समुचित रुप से निर्मित हो सके। यह 1985 की बात है।</p>
<p>कुछ वक्त पूर्व पैगम्बरे इस्लाम के रिश्तेदार के &#8221;हमजा हाउस&#8221; को सपाट कर दिया गया ताकि बहुसितारा मक्का होटल बन सके। लंदन—स्थित इस्लामिक हेरिटेज रिसर्च फाउंडेशन के निदेशक इर्फान अल अलावी ने इसकी सूचना प्रसारित की। अलावी साहब का आरोप था कि मदीना मस्जिद से पैंगम्बर की मजार को दूर करने के लिये तोड़फोड़ की गयी।</p>
<p>इस्लाम के प्रथम खलीफा अबू बक्र के आवास को तोड़कर पांच सितारा हिलटन होटल बन गया है। विश्व की सबसे ऊंची इमारत मक्का रायल क्लाक टावर को आतंकी ओसामा बिन लादेन की कम्पनी ने बनाया है। समीप ही कई माल और होटल बने है। पवित्र काबा पर इसकी छाया अब पड़ने लगी है। पहले सूरज की समूची रोशनी पड़ती थी। साउदी अरब में बहावी धर्म का प्रचलन है। बहावी के अनुसार दरगाह, मजार, कब्र, इबातकेन्द्र आदि को आराधना स्थल मानना गैरइस्लामी है। सिवाय अल्लाह के किसी अन्य की पूजा नहीं की जा सकती।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-army-rules-for-youth-in-israel-and-difference-between-india-and-israel/8747/">भगत सिंह फिर जन्मे, मगर पड़ोस के घर में !</a></span></strong></span></p>
<p>आश्चर्य की बात यह है कि इतना सब विध्वंस होने के बाद भी इस्लामी राष्ट्रों ने ऐसी इस्लाम—विरोधी हरकतों की तीव्र भर्त्सना नहीं की। डर था कि उनके हज यात्रियों की संख्या कहीं साउदी सरकार घटा न दे। &#8221;मक्का दि सेक्रेड सिटी&#8221; के लेखक जनाब जियाउद्दीन सरदार ने लिखा है कि सउदी सरकार को आर्थिक संकट हो सकता है, क्योंकि तेल के कुएं सूखते जा रहे हैं। अत: हज तीर्थयात्रियों द्वारा भरपाई की जा सकती है। इसीलिये यह नवनिर्माण कार्य किया जा रहा है।</p>
<p>इन उपरोक्त तथ्यों पर गौर करने से इतना तो स्पष्ट है कि विकास कार्य के लिये परिवर्तन तो होता ही है। इसी से नवीन भवनों के अवतरण भी संभव है। मियां अमानतुल्ला खान को यही समझना होगा कि जब पवित्र स्थल मक्का में मस्जिद और धार्मिक इमारतें तोड़कर नये उपयोगी भवन निर्माण हो सकते हैं तो नयी दिल्ली में तो जनता के पार्कों में कब्जा जमाना कहां तक उचित और तर्कसम्मत ठहराया जा सकता है? बदलाव तो होना ही है। प्राचीन को अर्वाचीन हेतु जगह देनी पड़ेगी। अपनी पहली मास्को यात्रा पर मैंने देखा था कि एक पुराने चर्च को समूचा खोदकर, उठाकर किनारे कर दिया गया था, ताकि सड़क चौड़ी हो सके। ईसाईयों ने इसकी सहमति भी दी थी। नयी दिल्ली फिर क्यों दकियानूसी बना रहे। इन्द्रप्रस्थ था, शाहजहानाबाद बना, लुटियंस का नयी दिल्ली बना, अब सेक्युलर भारत की सेक्युलर राजधानी बनेगी।</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>(<span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://tismedia.in/">TIS Media</a></span> परिवार के संरक्षक<span style="color: #ff0000;"> <a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के. विक्रम राव</a> </span>का शुमार देश के नामचीन पत्रकारों में होता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उन्होंने इमरजेंसी तक में स्वतंत्र आवाज के लिए जेल यात्रा की। महीनों की सजाएं भुगती। श्री राव,  वॉयस ऑफ अमेरिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनोमिक टाइम्स, फिल्मफेयर और इलस्ट्रेटेड वीकली में प्रमुख पदों पर रहने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड के संस्थापक संपादक भी रह चुके हैं। प्रेस की नियामक संस्था &#8216;भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य रहने के अलावा मजीठिया वेतन बोर्ड और मणिसाना वेतन बोर्ड के सदस्य के तौर पर पत्रकारों के हित में लंबा संघर्ष किया है। <span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के.विक्रम राव</a>,</span> फिलहाल इंडियन फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट <span style="color: #ff0000;">#IFWJ</span> के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)</strong></span></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-high-court-order-to-continue-the-construction-work-of-central-vista-uninterrupted/9076/">विकास में वक्फ का रोड़ा नागवार होगा!</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>कटघरे में तो आयें, वकील साहबान !!</title>
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		<pubDate>Fri, 11 Jun 2021 11:40:27 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>मुद्दा 8 जून 2021 का सर्वोच्च न्यायालय की खण्डपीठ वाला है। न्यायमूर्ति द्वय इन्दिरा बनर्जी तथा मुक्तेश्वरनाथ रसिकलाल शाह की अदालत का है। बचाव पक्ष के वकील महोदय दो खाद्य व्यापारियों, प्रवर और विनीत गोयल (नीमच, मध्य प्रदेश), के लिये अग्रिम जमानत की पैरवी कर रहे थे। इन दोनों पर आरोप है कि वे मिलावटी &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-lawyers-must-think-about-the-case-before-agreeing-to-advocacy/9049/">कटघरे में तो आयें, वकील साहबान !!</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
		<div class="box info  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>गत सप्ताह सर्वोच्च न्यायालय ने वरिष्ठ वकीलों के जमीर को कचोटा। मसला था कि पैरवी हेतु मुकदमा स्वीकारने की बेला पर क्या जुड़े हुये पहलुओं पर वे गौर फरमाते हैं? याचिका के जनपक्ष पर सोचते हैं? हालांकि अभी वस्तुस्थिति यही है कि अर्थ ही प्रधान है, शुभलाभ ही मात्र प्रयोजन है? वकीलों द्वारा हिचकते उत्तरों के कारण उनकी सभी याचिकायें खारिज हो गयीं। यदि भारत की बार काउंसिल सदस्यों को अपने निर्मल मन की बात को मान कर नैतिकतापूर्ण फैसला करने पर सहमत करा ले तो राष्ट्र की न्यायप्रक्रिया सुघड़ होगी। उसमें लोकास्था मजबूत होगी। अन्याय के अंजाम में जनविप्लव की आशंका दूर होगी। वर्ना जनता की सहनशक्ति असीमित नहीं है। कुचले जाने के पूर्व चींटी भी डंक मार ही देती है।
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<p>मुद्दा 8 जून 2021 का सर्वोच्च न्यायालय की खण्डपीठ वाला है। न्यायमूर्ति द्वय इन्दिरा बनर्जी तथा मुक्तेश्वरनाथ रसिकलाल शाह की अदालत का है। बचाव पक्ष के वकील महोदय दो खाद्य व्यापारियों, प्रवर और विनीत गोयल (नीमच, मध्य प्रदेश), के लिये अग्रिम जमानत की पैरवी कर रहे थे। इन दोनों पर आरोप है कि वे मिलावटी खाद्य पदार्थ का विक्रय करते हैं। गेहूं को पोलिश कर बेचते थे। उन पर मुकदमा कायम हुआ और गिरफ्तारी का अंदेशा है। सुनवाई के दौरान खण्डपीठ ने पूछा : &#8221;वकील साहब क्या आप तथा आपके कुटुम्बीजन उस अन्न को खा सकेंगे?&#8221; पीठ ने फिर पूछा भी : &#8221;इतने सरल प्रश्न का उत्तर देना क्यों कठिन है? या फिर जनता मरे, उसकी क्यों फ़िक्र करें?&#8221; तार्किक अंत हुआ कि अग्रिम जमानत की याचिका खारिज हो गयी।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-army-rules-for-youth-in-israel-and-difference-between-india-and-israel/8747/">भगत सिंह फिर जन्मे, मगर पड़ोस के घर में !</a></span></strong></span></p>
<p>पिछले सप्ताह ऐसा ही मिलता—जुलता एक और मुकदमा आया था। वह भी मिलावटी खाद्य पदार्थ की बिक्री का था। न्यायमूर्तिद्वय भूषण रामकृष्ण गवयी और कृष्ण मुरारी ने कारोबारी दिव्यलोचन बेहरा की अग्रिम जमानत की याचिका नामंजूर कर दी। उस पर आरोप लगा था कि वह घी में अपमिश्रण कर बेचता था। उनके वकील ने (4 जून 2021) खण्डपीठ को तर्क दिया कि उनका मुवक्किल दीपक जलाने के लिये घी मंदिर को सप्लाई करता था। खाने हेतु नहीं। इस पर न्यायमूर्तियों का अगला प्रश्न था, &#8221;तो आपकी मिर्चवाली सॉस (चटनी) क्या देवमूर्ति पर लेप लगाने के लिये थी या अभिषेक हेतु? आपका हर उत्पाद मिलावटी है।&#8221; खण्डपीठ का आक्रोश था कि &#8221;आपलोग अपने नकली उत्पाद से एक व्यक्ति नहीं पूरे समाज को मार रहे है। यह अपराध हल्के में नहीं लिया जा सकता है।&#8221; आस्था का मसला नहीं उठा कि &#8221;भगवान को नकली सामग्री पेश करते हो ?&#8221;</p>
<p>अत: मूलभूत प्रश्न यही है कि यदि वकील महोदय सुविचार कर पैरवी हेतु मुवक्किल को हामी भरें तो न्याय का वेश्याकरण नहीं होगा। उदाहरणार्थ रेप के मुकदमों को आत्ममंथन के बाद स्वीकारना चाहिये। हर वकील को यह याद रखना चाहिये। इसी विषयवस्तु पर बनी दक्षिण भारत की एक फिल्म (जख्मी औरत) जिसमें अधिवक्ता की भूमिका में अनुपम खेर अपने मुवक्किल कुछ बलात्कारी युवकों को साफ बचा लेते हैं। मगर वे युवक फिर वकील साहब की बेटी को ही उठा ले जाते हैं। तब अनुपम खेर को परपीड़ा का एहसास होता है। वकील साहब सुधर जाते है, क्योंकि तब खुद पर जो बीतने लगी। अत: ऐसी आचार संहिता इन वकीलों को स्वयं गढ़नी चाहिये। बार काउंसिलों को लागू करनी चाहिए।</p>
<p>इसी भांति अग्रिम जमानत का प्रावधान रखा गया था ताकि नागरिक स्वतंत्रता का इरादतन हनन रोका जाये। आखिर हर व्यक्ति को जीवन और स्वतंत्रता का मूलाधिकार है। खासकर जब कार्यपालिका अन्यायी हो जाये। डॉ. राममनोहर लोहिया ने कहा भी था कि : &#8221;यदि सड़क खामोश हो गयी, तो संसद आवारा हो जायेगी।&#8221; न्यायतंत्र पर भी यही लागू होता है।</p>
<p>इस बिन्दु पर सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्तिद्वय धनंजय यशवंत चन्द्रचूड और इन्दु मलहोत्रा ने एक संपादक की कैद पर कुछ माह पूर्व कहा था कि, &#8221; एक दिन के लिये भी नागरिक की स्वतंत्रता का हरण अमान्य है।&#8221; इस संदर्भ में उत्तर प्रदेश अपराध संहिता (यूपी संशोधन) बिल 2018 को (12 जून 2019) पारित कर अग्रिम जमानत के प्रावधान को वापस लाने के लिये योगी आदित्यनाथ की सरकार सबके जनवादी आभार की हकदार बनी। इमरजेंसी (25 जून 1975 से 21 मार्च 1977) के दौरान इन्दिरा गांधी सरकार ने अग्रिम जमानत के अधिकार का खात्मा कर दिया था। हालांकि 2010 में मायावती सरकार ने इसी बिल को पारित किया था। किन्तु सोनिया—गांधी—नीत संप्रग सरकार (सरदार मनमोहन सिंह वाली) ने स्वीकारा नहीं था। तब राष्ट्रपति श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने स्पष्टीकरण हेतु बिल लौटा दिया था। स्वीकृति नहीं दी थी। तीन दशक लगे यह अधिकार पुन: प्राप्त करने में।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-walayar-girls-case-and-pinarayi-vijayan-communist-party-of-india/8661/">नारी की चुनौती नयी माकपा सरकार को !</a></span></strong></span></p>
<p>यहां एक निजी घटना का उल्लेख अत्यंत प्रासंगिक होगा। दो अत्यंत महत्वपूर्ण कानूनी प्रावधान थे। यदि पुलिस साठ दिन में आरोपपत्र (चार्जचीट) अदालत में नहीं दाखिल कर पायी तो मुलजिम को जमानत मिल जाती थी। इन्दिरा गांधी सरकार ने इस अवधि को दूना (चार महीने) कर दिया। दूसरा नियम था कि जो बयान पुलिस के समक्ष दर्ज हुआ वह न्यायालय में बतौर प्रमाण साक्ष्य नहीं होता है। इमरजेंसी में संहिता का संशोधन कर पुलिसिया रपट को भी पुख्ता सबूत मान लिया गया। अर्थात यदि बाहें मरोड़कर पुलिस झूठे बयान पर हस्ताक्षर करा ले तो वह न्यायिक तौर पर स्वीकार्य होगा। हम बड़ौदा डायनामाइट केस के अभियुक्तों को जेल में बंद रखने के लिये दोनों संशोधन रातोंरात पारित किये गये थे। मुझे जब गुजरात हाईकोर्ट ने साठ दिन बाद जमानत दे दी थी तो कांग्रेस सरकार ने मेरे वकील को ही कैद कर लिया और मुझे मीसा (आंतरिक सुरक्षा अधिनियम) के तहत जेल परिसर में दोबारा गिरफ्तार कर लिया था। अभी भी भारत राष्ट्र—राज्य नागरिक आजादी की सुरक्षा पर अनुदार ही है। यहीं विचारवान, न्यायप्रिय और लोकपक्षधर वकीलों की भूमिका का महत्व बढ़ जाता है। बार काउंसिल का दायित्व बढ़ जाता है।</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>(<span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://tismedia.in/">TIS Media</a></span> परिवार के संरक्षक<span style="color: #ff0000;"> <a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के. विक्रम राव</a> </span>का शुमार देश के नामचीन पत्रकारों में होता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उन्होंने इमरजेंसी तक में स्वतंत्र आवाज के लिए जेल यात्रा की। महीनों की सजाएं भुगती। श्री राव,  वॉयस ऑफ अमेरिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनोमिक टाइम्स, फिल्मफेयर और इलस्ट्रेटेड वीकली में प्रमुख पदों पर रहने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड के संस्थापक संपादक भी रह चुके हैं। प्रेस की नियामक संस्था &#8216;भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य रहने के अलावा मजीठिया वेतन बोर्ड और मणिसाना वेतन बोर्ड के सदस्य के तौर पर पत्रकारों के हित में लंबा संघर्ष किया है। <span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के.विक्रम राव</a>,</span> फिलहाल इंडियन फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट <span style="color: #ff0000;">#IFWJ</span> के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)</strong></span></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-lawyers-must-think-about-the-case-before-agreeing-to-advocacy/9049/">कटघरे में तो आयें, वकील साहबान !!</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>भगत सिंह फिर जन्मे, मगर पड़ोस के घर में !</title>
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		<pubDate>Wed, 26 May 2021 07:36:04 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>इस्राइल में हर 18 वर्ष से ऊपर का किशोर अनिवार्य तौर पर दो वर्षों तक सेना में शिक्षण पाता है। सिवाय दिव्यांग और धर्म कार्य में रत लोगों के। युवतियों के लिये भी सैन्य सेवा अनिवार्य है। प्रधानमंत्री बैंजामिन नेतनयाहू तो सेना में प्रशिक्षित रहे और युद्धरत भी। उनके दो बेटे हैं। बड़ा तीस—वर्षीय येयर &#8230;</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
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				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>देश बनता है राष्ट्रनायकों के उत्सर्ग से। संघर्षशील इस्राइल इस तथ्य का जीवंत प्रमाण है। आठ अरब देशों, सभी शत्रु, की 42 करोड़ आबादी का मुकाबला सात दशकों से 90 लाख जनसंख्यावाला इस्राइल अकेला कर रहा है। तीन युद्ध लड़ा और सभी जीता भी।
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<p>इस्राइल में हर 18 वर्ष से ऊपर का किशोर अनिवार्य तौर पर दो वर्षों तक सेना में शिक्षण पाता है। सिवाय दिव्यांग और धर्म कार्य में रत लोगों के। युवतियों के लिये भी सैन्य सेवा अनिवार्य है। प्रधानमंत्री बैंजामिन नेतनयाहू तो सेना में प्रशिक्षित रहे और युद्धरत भी। उनके दो बेटे हैं। बड़ा तीस—वर्षीय येयर नेतनयाहू फौजी सेवा कर, अब अंतर्राष्ट्रीय विषय पढ़ा रहा है। अब उसका अनुज छब्बीस—वर्षीय एवरिल भी सेना में भर्ती हुआ। वह सेना कम्बेट विंग (लड़ाकू बटालियन) में भर्ती हुआ। हालांकि प्रधानमंत्री के पुत्र को कम खतरनाक टुकड़ी में रखने की पेशकश हुयी थी। मगर ए वरिल ने स्पष्ट किया कि वह अपने पिता तथा अग्रज की भांति सार्वजनिक जीवन में नहीं जायेगा। राजनीति से उसे घृणा है। वह इसे भ्रष्टाचार और तुरंत अमीर बन जाने का सुलभतम राह बताता है। उनके पिता पर जब राजपद के दुरुपयोग और गबन का मुकदमा चला था तो उसने न्यायिक प्रक्रिया समुचित चलाने पर जोर दिया था। अर्थात यदि पिता दोषी पाया गया तो जेल जाये। कुछ समय पूर्व जब उसके माता—पिता उसे सैन्य प्रशिक्षण हेतु भेज रहे थे तभी से एविरल ने संघर्ष को ही जीवन का लक्ष्य बनाया।</p>
<p>शायद यही कारण है कि आज सारे शत्रु राष्ट्रों से घिरे रहने के बावजूद इस्राइल जीत रहा है। अरब आतंकियों के प्रदेश गाजापट्टी को गत सप्ताह तबाह कर उसने अपनी अपराजेय स्थिति को सिद्ध कर दिया।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-walayar-girls-case-and-pinarayi-vijayan-communist-party-of-india/8661/">नारी की चुनौती नयी माकपा सरकार को !</a></span></strong></span></p>
<p>अब भारत से इस्राइल की तुलना कर लें। करीब 135 करोड़ जनसंख्या वाला यह गणराज्य है जिसकी भूमि का दायरा करोड़ों वर्ग किलोमीटर का है। मगर अपनी सेना का विस्तार अधिक नहीं कर पा रहा है। मसलन गुजरात राज्य से सेना में कोई भर्ती होता ही नहीं। सभी व्यापार पसंद करते है। मुझे याद है जब 15 अगस्त 1968 के दिन आजाद भारत के युवजन 21 वर्ष की आयु पूरा करते ही गणतंत्र के नागरिक और वोटर बने थे। तब गुजरात के राज्यपाल गांधीवादी अर्थशास्त्री श्रीमन नारायण अग्रवाल जी की पत्नी श्रीमती मदालसा नारायण ने सुझाया था कि &#8221;टाइम्स आफ इंडिया&#8221;, अहमदाबाद, एक सर्वेक्षण कराये कि ये नये बने वोटर क्या बनना चाहते है और राष्ट्रनिर्माण में कैसा योगदान करना चाहेंगे? मदालसाजी उद्योगपति बजाज परिवार की थीं। सेवाग्राम में बापू के सान्निध्य में प्रेरित हुयीं थीं।</p>
<p>हमारे चीफ रिपोर्टर आरवी रामन ने मुझे सर्वेक्षण की जिम्मेदारी सौंपी। जितने युवाओं का मैंने साक्षात्कार किया था एक ने भी सैन्यसेवा को अपनी पसंद नहीं बताया। गुजरात विश्वविद्यालय के प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण एक छात्र ने बताया कि वह न तो आईएएस (सिविल) प्रतियोगिता में जायेगा, न प्रबंधन (अहमदाबाद में इंडियन इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट) का ही छात्र बनेगा। उसकी केवल हसरत थी कि वह अपने व्यापारी पिता की पेढ़ी पर बैठकर वंशानुगत व्यापार का अधिक विस्तार करे।</p>
<p>अब इस्राइल की तुलना गुजरात से करें। भूभाग में गुजरात दोगुना है, दो लाख वर्ग किलोमीटर का है। जनसंख्या भी सवा छह करोड़ है, इस्राइल का छह गुना है। दोनों सीमावर्ती इलाके हैं। मगर गुजरात—पाकिस्तान सीमा की रक्षा में कोई गुजरात रेजिमेन्ट नहीं है।</p>
<p>इसी परिवेश में गौर करें जरा ब्रिटेन के युद्धकालीन अनिवार्य सैनिक प्रशिक्षण पर। प्रथम विश्वयुद्ध में प्रधानमंत्री हर्बर्ट एस्क्विथ थे। हर घर से एक बालिग के लिये नियम था (conscrption) सेना में भर्ती होने का। जर्मनी से जंग (28 जुलाई 1914 से 11 नवम्बर 1918) करने के लिये प्रधानमंत्री का इकलौता पुत्र रेमण्ड फ्रांस के मोर्च पर तैनात हुआ। वहां वह जर्मन सेना की गोली लगने से शहीद हो गया। तब ब्रिटिश हाउस आफ कामंस (लोकसभा) में शहीदों को श्रद्धांजलि देते प्रधानमंत्री ने कहा, &#8221;रेमंड मेरा इकलौता बेटा था। प्रतिष्ठित आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय का प्रोफेसर रहा। बैरिस्टरी पढ़ा। राजनीति में जाता तो देश का प्रधानमंत्री हो सकता था। मगर देश सेवा में शहीद हुआ।&#8221; फिर ब्रिटिश नेता ने कहा, &#8221; हमें सीखना होगा हमारे साम्राज्य के प्राचीनतम उपनिवेश भारत से। वहां युद्ध होते रहते हैं। पर क्षत्रिय लोग सेना संभालते है। वणिक अर्थ व्यवस्था संभालते है। बौद्धिक धरोहर विप्रवर्ग बचाता रहता है। भारत में कर्तव्यों का परिसीमन है। समाज निर्बाध प्रगति करता रहता है।&#8221;</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-mamata-banerjee-and-narada-chit-fund-case/8542/">ममता दीदी का &#8221;खेला&#8221; चालू छे !</a></span></strong></span></p>
<p>भारत सत्याग्रह और जेल के बल पर आजाद हुआ था। किन्तु अब उसके बारे में जन—अवधारणा बदली है। हर राजनेता अपनी संतान को चुनाव लड़ाता है, पार्टी का पद देता है। सारे पुत्र—पुत्री संपन्न सियासत में जाते हैं। सेना के कैरियर को शायद ही ये &#8221;जननायक&#8221; लोग आत्मजों हेतु चयनित करेंगे। अर्थात भगत सिंह फिर जन्मे, मगर पड़ोसी के घर में। इस्राइल और भारत के राष्ट्रीय दृष्टिकोणों में यही विशिष्ट अन्तर है।</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>(<span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://tismedia.in/">TIS Media</a></span> परिवार के संरक्षक<span style="color: #ff0000;"> <a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के. विक्रम राव</a> </span>का शुमार देश के नामचीन पत्रकारों में होता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उन्होंने इमरजेंसी तक में स्वतंत्र आवाज के लिए जेल यात्रा की। महीनों की सजाएं भुगती। श्री राव,  वॉयस ऑफ अमेरिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनोमिक टाइम्स, फिल्मफेयर और इलस्ट्रेटेड वीकली में प्रमुख पदों पर रहने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड के संस्थापक संपादक भी रह चुके हैं। प्रेस की नियामक संस्था &#8216;भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य रहने के अलावा मजीठिया वेतन बोर्ड और मणिसाना वेतन बोर्ड के सदस्य के तौर पर पत्रकारों के हित में लंबा संघर्ष किया है। <span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के.विक्रम राव</a>,</span> फिलहाल इंडियन फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट <span style="color: #ff0000;">#IFWJ</span> के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)</strong></span></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-army-rules-for-youth-in-israel-and-difference-between-india-and-israel/8747/">भगत सिंह फिर जन्मे, मगर पड़ोस के घर में !</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>नारी की चुनौती नयी माकपा सरकार को !</title>
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		<pubDate>Sat, 22 May 2021 10:02:24 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>लेकिन दूसरी कमजोरी, परिवारवादवाली, से भी विजयन अलग नहीं रह पाये। सट ही गये कुटुम्ब से।  उनकी पुत्री वीणा टी. का दूसरा पति अर्थात विजयन का दूसरा दामाद पी.ए. मोहम्मद रियाज लोक निर्माण जैसे कमाऊ विभाग का मंत्री नामित हुआ। चौवालीस—वर्षीय वकील रियाज, जिनके पिता अब्दुल कादिर पुलिस अफसर हैं, की पहली बीवी डॉ. समीहा &#8230;</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>         नारी—अस्मिता को अतीव महत्व देने के लिये गुजरात के बाद केरल ही मशहूर है। इस बार वहां प्रथम महिला मुख्यमंत्री की संभावना अत्यधिक थी। पर लैंगिक भेदभाव करने में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट भी अंतत: वही भारतीय समाज में जमी पौरुष ग्रंथि से मुक्त नहीं हो पाये। कांग्रेसी जैसी ही। इसीलिए दोबारा केरल के मुख्यमंत्री बनते ही पिनरायी विजयन ने सत्ता में अपनी जड़ जमाने हेतु अपने प्रतिस्पर्धी रही के.के शैलजा को काबीना तक में नहीं रखा। बस विधायक दल का सचेतक नामित कर दिया। कुर्सी से काफी दूर।
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<p>लेकिन दूसरी कमजोरी, परिवारवादवाली, से भी विजयन अलग नहीं रह पाये। सट ही गये कुटुम्ब से।  उनकी पुत्री वीणा टी. का दूसरा पति अर्थात विजयन का दूसरा दामाद पी.ए. मोहम्मद रियाज लोक निर्माण जैसे कमाऊ विभाग का मंत्री नामित हुआ। चौवालीस—वर्षीय वकील रियाज, जिनके पिता अब्दुल कादिर पुलिस अफसर हैं, की पहली बीवी डॉ. समीहा से दो बेटे है, दस और तरह वर्ष के। छह वर्ष पूर्व तलाक हो गया था। डॉ. वीणा विजयन के पहले पति रवि पिल्लई एक अमीर उद्योगपति हैं। उनका एक पुत्र भी है। वीणा एम.डी. है। दोनों ने कहा कि विवाह दो प्राणियों (उनका और रियाज) का निजी मामला है, अपनी पसंद है।</p>
<p>मगर मीडिया ने मीमांसा की। योग्यतम महिला शैलजा को निकालकर कर विजयन ने मंत्री बनाया दामाद को ? क्या यह मार्क्सवादी सिद्धांत की दृष्टि से उचित है ? नैतिकता पर एकाधिकार बघेरने वाली  माकपा अब ससुर—दामाद वाली सियासत करे तो फर्क क्या रहा? ऐसा तो सोनिया—कांग्रेस में होता रहता है।</p>
<p>यह बात तीखी इसलिये भी हो जाती है क्योंकि प्रगतिशील राज्य केरल में पहली बार महिला मुख्यमंत्री बनते—बनते चूक गयी। पिछड़े यूपी, असम, बिहार, कश्मीर, मध्य प्रदेश, उड़ीसा और पड़ोसी तमिलनाडु की तुलना में केरल भी महिला मुख्यमंत्री का चयन करके नारी गौरव को कई चांद लगा सकता था। इन सभी राज्यों में स्त्री शीर्ष पर रह चुकी है। यूं भी मलयाली महिलाओं ने नर्स के पदों को विश्वभर में चमकाया है।</p>
<p>शैलजा को हटाना बड़ी खबर बनती किन्तु स्वयं इस जुझारु महिला ने नीतिपरस्त मार्क्सवादी होने के नाते कह दिया कि &#8221;काबीना का गठन मुख्यमंत्री का विशेषाधिकार है।&#8221; वही पुराना घिसा—पिटा बचाव। हालांकि इस मौन से शैलजा जन—आंकलन में काफी ऊंची उठी हैं। विजयन जरुर पुरुष—सहज द्वेष और भय के कारण निचले पायदान पर आ पड़े हैं। दुबई से सोने की तस्करी के कारण उनका अवमूल्यन तो हो ही गया था। जो शेष था वह जामाता को मंत्रिपद दहेज में देकर जाता रहा। उधर पूरब में ममता का भतीजावाद (सांसद अभिषेक बनर्जी) तो इधर सुदूर दक्षिण में विजयन के जवांईराज अब विपक्ष की राजनीति का अभिन्न अंग हो गये।</p>
<p>शैलजा की ख्याति फैली थी जब उन्होंने निपाह और कोविड—19 की महामारी का मर्दन किया था। इस वामपंथी को संयुक्त राष्ट्र संघ में &#8221;कीटाणु नाशक&#8221; हेतु सम्मानित किया गया था। एक साधारण कस्बायी अध्यापिका से वे उठी थीं। खूब संघर्ष किया। काबीना मंत्री बनीं। मगर अंतिम राउण्ड में अवरुद्ध हो गयीं। वे दूसरी वीएस अच्युतानंदन नहीं हो पायीं। इस सत्तानवे—वर्षीय माकपा धुरंधर का तो विजयन ने टिकट ही काट दिया था। माकपा के विरुद्ध तक जनविद्रोह हो गया था। विजयन को टिकट देना पड़ा और अच्युतानंदन मुख्यमंत्री (18 मई 2006) बने।</p>
<p>मगर गत माह विजयन ने एक चालाकी की। शैलजा को हटाने से आलोचना तो काफी हुयी पर मीडिया में उन्हें कमजोर करने के लक्ष्य से मुख्यमंत्री ने केरल की स्वास्थ्य मंत्री एक महिला ही को बनाया। टीवी पत्रकार वीणा जार्ज को स्वास्थ्य विभाग मिला है। पैंतालीस—वर्षीया यह महिला समाचार संपादक और टीवी न्यू की संपादिका थी। महाबली कांग्रेसी प्रतिस्पर्धी तथा विधिवेत्ता के. शिवदासन नायर को बीस हजार वोटों से अरनमुला विधानसभा क्षेत्र से हरा कर वीणा विधायक बनी है। अब उनके समक्ष यह प्राथमिकता के तौर पर चुनौती यह है कि एक योग्य पूर्व मंत्री की तुलना में उन्हें अपने कीर्तिमान रचाने होंगे।</p>
<p>किन्तु पिनरायी विजयन की व्यथा कथा अभी खत्म नहीं हुयी है। उनकी चुनावी हरीफ दलित मजदूर विधवा वी. भाग्यवती ने अपना सत्याग्रह फिर चालू कर दिया है। उनकी दो नाबालिग पुत्रियों का माकपा के गुण्डों ने बलात्कार किया। न्याय की खोज में भाग्यवती ने सर मुडवा कर संघर्ष शुरु किया था। चालाक विजयन को उनके धर्मदम विधानसभा क्षेत्र (कन्नूर) में इस दलित ने पुरजोर चुनौती दी थी। &#8221;विजयन के विरुद्ध&#8221; अपना विजय संकल्प पूरा करने हेतु उसने सिर मुंडवा लिया था।  पिनरायी विजयन व्यग्र रहे। दलित मजदूर भाग्यवती द्वारा चुनावी उम्मीदवारी का कारण था कि उसकी दो नाबालिग बेटियों को न्याय मिले। बलात्कार के समय बड़ी पुत्री तेरह की और दूसरी केवल नौ वर्ष की थी। पुलिस की रपट के अनुसार इन दोनों ने आत्महत्या की थी, जबकि दोनों की लाशें टंगी मिलीं थीं। विधवा मां तीन वर्षों से दर—दर भटकती रही, न्याय की गुहार लगाती रही। जनपदीय न्यायालय में पांचों हत्यारें बरी कर दिये गये थे। अदालत ने पाया कि पुलिस तथा अभियोजन पक्ष हत्या सिद्ध नहीं कर पाया। पर्याप्त सबूत नहीं उपलब्ध करा पाये थे। इस निर्णय के बाद मलयालयम मीडिया ने राज्यव्यापी अभियान चलाया था। मीडिया के कारण जगह—जगह माकपा कार्यालयों के सामने धरना प्रदर्शन हुये। जनसंघर्ष का नतीजा था कि केरल हाई कोर्ट ने मुकदमें की दुबारा सुनवाई का आदेश दिया। फिर से जिला अदालत हत्या के आरोप पर सुनवायी कर रही है।  मगर माकपा शीर्ष नेतृत्व है कि अभी तक टस से मस भी नहीं हुआ। अत: जनयुद्ध अभी जारी है।</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>(<span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://tismedia.in/">TIS Media</a></span> परिवार के संरक्षक<span style="color: #ff0000;"> <a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के. विक्रम राव</a> </span>का शुमार देश के नामचीन पत्रकारों में होता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उन्होंने इमरजेंसी तक में स्वतंत्र आवाज के लिए जेल यात्रा की। महीनों की सजाएं भुगती। श्री राव,  वॉयस ऑफ अमेरिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनोमिक टाइम्स, फिल्मफेयर और इलस्ट्रेटेड वीकली में प्रमुख पदों पर रहने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड के संस्थापक संपादक भी रह चुके हैं। प्रेस की नियामक संस्था &#8216;भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य रहने के अलावा मजीठिया वेतन बोर्ड और मणिसाना वेतन बोर्ड के सदस्य के तौर पर पत्रकारों के हित में लंबा संघर्ष किया है। <span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के.विक्रम राव</a>,</span> फिलहाल इंडियन फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट <span style="color: #ff0000;">#IFWJ</span> के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)</strong></span></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-walayar-girls-case-and-pinarayi-vijayan-communist-party-of-india/8661/">नारी की चुनौती नयी माकपा सरकार को !</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>ममता दीदी का &#8221;खेला&#8221; चालू छे !</title>
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		<pubDate>Thu, 20 May 2021 08:39:14 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>सारे मसले से जुड़े चन्द तथ्यों का उल्लेख पहले हो जाये। भले ही सोनिया—कांग्रेस तथा अन्य दल आज भाजपा के विरुद्ध लामबंद हो जाये, पर याद रहे कि यही कांग्रेस पार्टी थी जिसने 2011 में विधानसभा के निर्वाचन में कुख्यात नारद चिट फण्ड घोटाले पर ममता बनर्जी को घेरा था। तब कोलकाता हाईकोर्ट में सोनिया—कांग्रेस &#8230;</p>
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				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>भारतीय गणराज्य से बंगभूमि के  &#8221;मुक्ति&#8221; का संघर्ष विप्र—विदुषी ममता बंधोपाध्याय ने तेज कर दिया है। यूं भी &#8221;आमी बांग्ला&#8221; बनाम &#8221;तू मि बाहरी&#8221; के नारे पर उनकी तृणमूल कांग्रेस पार्टी विधानसभा का चुनाव गत माह लड़ी थी। अत: अब अपने अधूरे एजेण्डे को अंजाम देने में प्राणपण से वे जुट गयीं हैं।
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<p>सारे मसले से जुड़े चन्द तथ्यों का उल्लेख पहले हो जाये। भले ही सोनिया—कांग्रेस तथा अन्य दल आज भाजपा के विरुद्ध लामबंद हो जाये, पर याद रहे कि यही कांग्रेस पार्टी थी जिसने 2011 में विधानसभा के निर्वाचन में कुख्यात नारद चिट फण्ड घोटाले पर ममता बनर्जी को घेरा था। तब कोलकाता हाईकोर्ट में सोनिया—कांग्रेस ने याचिका दाखिल की थी कि ममता के खिलाफ भ्रष्टाचार के इल्जाम में सीबीआई द्वारा जांच के आदेश पारित करें। उस वक्त मार्क्सवादी तथा अन्य वामपंथी पार्टियां भी कांग्रेस के सुर में सुर मिला रहीं थीं। यह दिलचस्प बात दीगर है कि इन दोनों आलोचक पार्टियों का एक भी विधायक, सात दशकों में पहली बार, गत माह जीता ही नहीं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/vikram-rao-of-veteran-journalist-reviewing-india-palestine-israel-relations/8487/"><strong>बड़ा सवालः इस्राइल से भारत की यारी पर इतना खौफ क्यों ?</strong></a></span></p>
<p>उसी दौरान कोलकता हाईकोर्ट ने (17 मार्च 2017) नारद चिट फण्ड के मामले की तहकीकात सीबीआई के सुपुर्द कर दिया। ममता बनर्जी ने सर्वोच्च न्यायालय में इस आदेश को निरस्त करने की (21 मार्च 2017) अपील की। मगर वह खारिज हो गयी। जांच चलती रही। सोनिया—कांग्रेस ने जांच और उचित दण्ड का आग्रह दोहराया। हाईकोर्ट के निर्देश के बाद ही उसने मांग की थी कि तृणमूल—कांग्रेस के दोषी नेताओं को जेल भेजा जाये। कांग्रेस की इस मांग के बाद ममता शासन भी तत्काल हरकत में आ गया। पचास—वर्ष पूर्व सीबीआई को प्रदत्त बंगाल के कार्यक्षेत्र के निर्णय को उन्होंने निरस्त कर दिया। अर्थात इस केन्द्रीय ब्यूरो से बंगाल स्वतंत्र हो गया। मगर उच्चतम न्यायालय के आदेश से कार्यवाही रोकी नहीं गयी।</p>
<p>कल सरकारी पार्टी के विधायकों ने कोलकता की सड़कों पर ताण्डव किया, राजभवन पर धावा बोला, दिनरात व्यस्त रहने वाला महानगर रेंगने पर विवश कर दिया गया। यह सब अखबारों में आज सुबह छप चुका है।</p>
<p>इस तकरार की नायिका &#8221;वीरांगना&#8221; ममता बनर्जी ने छह घंटे तक भारत सरकार के कार्यालय भवन निजाम पैलेस के समक्ष धरना दिया। उनका स्वयं का कार्यालय राइटर्स बिल्डिंग ठप रहा। कोरोना का राहत कार्य थम गया। दो हजार तृणमूल पार्टी कार्यकर्ताओं ने लाकडाउन को तोड़कर, बिना मास्क लगाये, पूरी राजधानी को रेहन पर रख दिया।</p>
<p>ममता बनर्जी  के पैर की हड्डी भी खूब फुर्ती से काम पर रही थी। राज्य पुलिस बनाम केन्द्रीय बल वाला नजारा बन गया था। स्वयं प्रदेश के काबीना मंत्री भारत सरकार के आदेशों को बाधित करते रहे। राज्य के कानून मंत्री स्वयं सीबीआई अदालत में डटे रहे। दोषी मंत्रियों को जमानत मिल गयी। तत्काल हाईकोर्ट ने उसे रद्द कर मंत्रियों और विधायकों को जेल भेज दिया। स्वयं मुख्य न्यायाधीश राजेश बिन्दल ने मुख्यमंत्री द्वारा धरना की भर्त्सना की। सीबीआई ने मांग की कि मुकदमा बंगाल के बाहर चलाया जाये।</p>
<p>इसी बीच बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष विमान बनर्जी ने संवैधानिक पहलू उठाया कि विधायकों तथा मंत्रियों को बिना उनकी अनुमति के क्यों गिरफ्तार कर लिया गया है? बिहार और उत्तर प्रदेश के विधानसभाई अधिकारियों के अनुसार ऐसा कोई भी प्रावधान नहीं है कि विधायक को हिरासत में लेने के पूर्व स्पीकर की अनुमति ली जाये।</p>
<p>अब ममता बनर्जी के &#8221;जनवादी&#8221; अभियान पर तनिक विचार कर लें। वे बोलीं थीं कि उनके काबीना मंत्रियों की गिरफ्तारी स्पष्टता गत माह के जनादेश का अपमान है। राजनीति शास्त्र का यह नया नियम और परिभाषा बंगाल की मुख्यमंत्री ने निरुपित कर दिया है। यदि यह मान भी लिया जाये तो भ्रष्टाचार की परिभाषा वोटर करेंगे, न कि न्यायाधीशजन। अर्थात जो जीता वही ईमानदार है। अगर इसे स्वीकार कर ले तो माफिया सरगना मियां मोहम्मद मुख्तार अंसारी, जो कई बार विधायक बने, को जेल में रखना गैरकानूनी है। उनके द्वारा भाजपाई विधायक कृष्णानन्द राय की हत्या राजनीतिक रुप से औचित्यपूर्ण है। अत: अब विधि—विधान की दिशा और अर्थ केवल मतपेटियां तय करेंगी।</p>
<p>ममता बनर्जी के आज के महाकालीवाले रौद्र रुप को देखकर चालीस वर्ष पूर्व उनका युवाजोश से भरा जनांदोलकारी दौर याद आता है। वे तब युवा कांग्रेस में थीं। मार्क्सवादी कम्युनिस्टों ने राज्य और पार्टी में सीमा रेखा मिटा दी थी। वहीं जो इन्दिरा गांधी ने 1975 में इमरजेंसी काल में किया था। तब यह बहादुर लड़ाकन पांच रुपये की हवाई स्लिपर, बीस रुपये वाली सूत की सफेद नीले बार्डरवाली साड़ी पहनकर हुगली में आग लगाती थी।  काली बाड़ी के निकट एक झोपड़ीनुमा मकान में रहती थीं। वहीं उनकी मां भी जिनका चरण स्पर्श प्रधानमंत्री अटल बिहार वाजपेयी करते थे।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: <span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-about-malerkotla/8427/">मालेरकोटला पर विवाद ? क्या कारण है ?</a></span></strong></span></p>
<p>बंगाल तब के मसीहा ज्योति बसु विशाल, भव्य भवन में अध्यासी थे। उनका पुत्र चन्दन उद्योगपति बन रहा था। इस अनीश्वरवादी कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री की पत्नी धर्मप्राण थी, कालीपूजा करती थी। हर धर्मोत्सव में सक्रिय रहती थी। तब बंगाल की जनता ममता में तारक का रुप देखती थी। ममता ने संकल्प लिया था कि माकपा तथा वामपंथ को बंगाल की खाड़ी में डूबो देंगी। गत माह यही कर दिखाया। विधानसभा में कांग्रेस और कम्युनिस्टों का नामलेवा, तर्पण करने वाला भी नहीं रहा।</p>
<p>इसीलिये अचंभा होता है कि ऐसी न्यायार्थ योद्धा बनीं ममता क्यों नारद चिट फंड घोटाले में आमजन के मेहनत की कमाई को लूटने वालों की हिमायती बनीं ? फिर कहावत याद आई कि ब्राह्मण मरता है तो ब्रह्म—राक्षस बनता है। शायद नियति का यही नियम है। इससे बंगाल अछूता नहीं रहा।</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>(<span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://tismedia.in/">TIS Media</a></span> परिवार के संरक्षक<span style="color: #ff0000;"> <a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के. विक्रम राव</a> </span>का शुमार देश के नामचीन पत्रकारों में होता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उन्होंने इमरजेंसी तक में स्वतंत्र आवाज के लिए जेल यात्रा की। महीनों की सजाएं भुगती। श्री राव,  वॉयस ऑफ अमेरिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनोमिक टाइम्स, फिल्मफेयर और इलस्ट्रेटेड वीकली में प्रमुख पदों पर रहने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड के संस्थापक संपादक भी रह चुके हैं। प्रेस की नियामक संस्था &#8216;भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य रहने के अलावा मजीठिया वेतन बोर्ड और मणिसाना वेतन बोर्ड के सदस्य के तौर पर पत्रकारों के हित में लंबा संघर्ष किया है। <span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के.विक्रम राव</a>,</span> फिलहाल इंडियन फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट <span style="color: #ff0000;">#IFWJ</span> के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)</strong></span></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/article-by-k-vikram-rao-on-mamata-banerjee-and-narada-chit-fund-case/8542/">ममता दीदी का &#8221;खेला&#8221; चालू छे !</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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