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	<title>Editorial Article TIS Media Archives - TIS Media</title>
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	<description>हर अक्षर सच, हर खबर निष्पक्ष </description>
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	<title>Editorial Article TIS Media Archives - TIS Media</title>
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		<title>बड़ा सवालः इस्राइल से भारत की यारी पर इतना खौफ क्यों ?</title>
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		<pubDate>Wed, 19 May 2021 08:36:48 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>के. विक्रम राव अरब आतंकी गिरोह &#8221;हरकत—अल—मुक्वाम—अल—इस्लामी&#8221; (हमास) के राकेट के हमले से गाजा सीमावर्ती इलाके में सेवारत नर्स 32—वर्षीया सौम्या की 11 मई 2021 की रात मृत्यु हो गयी। अगले ही दिन विश्व नर्स दिवस था। उसकी अस्सी वर्षीया यहूदी मरीज भी बुरी तरह घायल हो गयी। आक्रमण के वक्त सौम्या अपने नौ वर्षीय &#8230;</p>
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<li><span style="color: #ff0000;"><strong>के. विक्रम राव</strong></span></li>
</ul>
<p>अरब आतंकी गिरोह &#8221;हरकत—अल—मुक्वाम—अल—इस्लामी&#8221; (हमास) के राकेट के हमले से गाजा सीमावर्ती इलाके में सेवारत नर्स 32—वर्षीया सौम्या की 11 मई 2021 की रात मृत्यु हो गयी। अगले ही दिन विश्व नर्स दिवस था। उसकी अस्सी वर्षीया यहूदी मरीज भी बुरी तरह घायल हो गयी। आक्रमण के वक्त सौम्या अपने नौ वर्षीय पुत्र के हालचाल फोन पर अपने पति संतोष से ले रही थी। पति ने विस्फोट सुना और फोन खामोश हो गया। पांच हजार किलोमीटर दूर केरल के हरित जिले इदुक्की के ग्राम कीरीथाडु में अपने कुटुम्ब को छोड़कर सौम्या जीविका हेतु इस्राइल नौ साल पूर्व आयी थी। हालांकि इदुक्की के कांग्रेसी सांसद एएम कुरियाकोस को विदेश राज्य मंत्री तथा केरल भाजपा अध्यक्ष वी. मुरलीधरन ने सौम्या के शव को जल्द से जल्द भारत लाने की कोशिशें की, जो सफल भी रहीं।</p>
<p>मंथन का मुद्दा यहां यह है कि इस्लामी आतंक से विश्व कब तक संतप्त रहेगा? इस्राइल से भारत के रिश्ते पांच दशकों से कटे रहे। कारण बस इतना था कि यहूदी गणराज्य से नातेदारी जो भी भारतीय पार्टी करती है हिन्दुस्तानी मुसलमान उसे वोट नहीं देते। फिलिस्तीन का मसला कश्मीर जैसा बना दिया गया। दोनों मजहबी पृथकवाद के शिकार रहे। सेक्युलर भारत के किसी भी राजनेता में इतना पुंसत्व नहीं रहा कि वह कहे कि विदेश नीति का एकमात्र आधार राष्ट्रहित होता है, मजहबी अथवा भौगोलिक दबाव नहीं। लेकिन इस्राइल—नीति की बाबत सीधा वोट से रिश्ता हो गया। जब 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी थी तो इस्राइल के विदेश मंत्री जनरल मोशे दयान दिल्ली लुकेछिपे आये थे। अटल बिहारी वाजपेयी, विदेश मंत्री, सूरज ढले रात के अंधेरे में सिरी फोर्ट के परिसर में उनसे मिले थे। मजबूत इच्छाशक्ति के धनी प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने तब कहा था कि यदि वे और अटलजी रोशनी में इस यहूदी राजनयिक से मिलते तो जनता पार्टी की सरकार ही गिर जाती। मोशे दयान की इस गुपचुप यात्रा को तब कांग्रेसी संपादक एमजे अकबर ने अपने दैनिक &#8221;दि टेलीग्राफ&#8221; में साया किया था। तो ऐसी सियासी धौंस रही पचास वर्ष तक  इन वोट बैंक के मालिकों की भारतीय कूटनीति पर!</p>
<p>भला हो कांग्रेसी प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव का जिन्होंने (1992) इस्राइल को मान्यता दी और उसका राजदूतावास खुलवाया। फिर जो भी प्रधानमंत्री आये खासकर वामपंथी इन्द्र कुमार गुजराल आदि ने इस्राइल से रिश्ते उदासीन ही रखे। नरेन्द्र मोदी ने सारा श्रेय ले लिया, जब उन्होंने इस्राइल के प्रधानमंत्री को भारत आमंत्रित किया और स्वयं राजधानी तेलअविव और पवित्र जेरुशलेम गये। मोदी ने तेलअविव में कहा भी था कि : &#8221;इतिहास के इस संकोच&#8221; को उन्होंने मिटा दिया। प्रधानमंत्री को कहना चाहिये था कि वे किसी वोट बैंक के कैदी नहीं हो सकते, भले ही वह अल्पसंख्यक हो या बहुसंख्यक। भारत की विदेश नीति को कोई भी आतंकी गुट भयभीत नहीं कर सकता। लेकिन, अब राष्ट्रस्तर पर बहस होनी चाहिये और जो दोषी हैं इस्राइल से रिश्ता न रखने के उन अपराधियों को इतिहास के कटघरों में खड़ा किया जाये। संयुक्त राष्ट्र समिति में 1949 में इस्राइल गणराज्य को सदस्य बनाने का प्रस्ताव आया था। जवाहरलाल नेहरु के आदेश पर भारत ने इस्राइल के विरुद्ध वोट दिया। सारे इस्लामी राष्ट्रों ने भी विरोध किया था। इन्हीं इस्लामी राष्ट्रों ने कश्मीर के मसले पर पाकिस्तान के पक्ष में वोट दिया था।</p>
<p>एक दकियानूसी मजहबी जमात है, जिसका नाम है &#8221;आर्गेनिजेशन आफ इस्लामी कंट्रीज।&#8221; जब मुस्लिम फिलीस्तीन का विभाजन कर नया राष्ट्र इस्राइल का गठन हो रहा था तो सारे मुस्लिम देशों ने जमकर मुखालफत की थी और शाश्वत हिंसक युद्ध की धमकी भी दी। मगर जब ब्रिटिश साम्राज्यवादियों द्वारा विशाल भारत का विभाजन कर पश्चिमी तथा पूर्वी पाकिस्तान (आज बांग्लादेश) बन रहा था तो सारे इस्लामी राष्ट्रों ने तकसीम का स्वागत किया था। आज तक कश्मीर को ये राष्ट्र समूह पाकिस्तानी ही मानता है। &#8221;सारे जहान से अच्छा&#8221; पंक्तियों  के रचयिता अलामा मोहम्मद इकबाल ने 1909 में लिखा था कि : &#8221;जो मुसलमान जिहादी नहीं है, वे सब यहूदियों की भांति कायर हैं।&#8221; वजह यह थी कि औसत यहूदी व्यापारी है और शांतिप्रिय होता है। हालांकि पंथनिरपेक्ष गणराज्य के उपराष्ट्रपति पद का दशक तक आनन्द उठाने वाले मियां मोहम्मद हामिद अंसारी राज्यसभा में इस्राइल का विरोध ही करते रहे।</p>
<p>भारतीय मुस्लिमों से अपेक्षा रही थी कि वे मिल्लत को समझायेंगे कि इस्राइल से मदद भारतहित में है। पर ऐसा प्रयास कभी भी नहीं किया गया। मसलन इस्राइल अब 5 जी में सहयोग कर मुम्बई अस्पताल के मरीज का शल्य चिकित्सा तेलअविव में बैठकर संचालित कर सकता है। भारत को कृषि, जलसिंचन, रेगिस्तान को हराभरा बनाने, खाद्य सुरक्षा आदि में सहयोग दे सकता हे। सुरंग खोदने में उसे दक्षता है। पाकिस्तान सीमा पर इस तकनीक द्वारा वह घुसपैठियों को बाधित कर सकता है। इस्राइल के पास राडार व्यवस्था है, जिससे जंगलों में छिपे नक्सली आतंकियों का पता लगाया जा सकता है।</p>
<p>एक खास बात। जितने भी अरब राष्ट्र हैं जो इस्राइल पर वीभत्स आक्रमण कर चुके है तथा आज भी उसे नेस्तानाबूद करने में ओवरटाइम करते है, सभी निजी तौर पर इस्राइल से तकनीकी और व्यापारी संबंध कायम कर रहे है। इन कट्टर इस्लामी देशों की लिस्ट में नाम है मोरक्को, बहरेइन, जोर्डन, अबू ढाबी, संयुक्त अरब अमीरात, सूडान इत्यादि। सबसे प्रथम है मिस्र जिसके नेता कर्नल जमाल अब्दुल नासिर ने सबसे पहले 7 जून 1967 के दिन संयुक्त अरब देशों के साथ इस्राइल पर हमला बोला था। सभी इस्लामी बिरादरी बुरी तरह पराजित हो गये थे। अचरज यह है कि कम्युनिस्ट चीन जो आज इस्लामी देशों का भाई बनता है, उसने 29 जनवरी 1992 को भारत द्वारा इस्राइल को मान्यता देने के एक महीने पहले ही इस्राइल को मान्यता देने तक की जल्दबाजी की थी। एक विशिष्टता और&#8230; इन अरब राष्ट्रों में वोट द्वारा नहीं, बन्दूक के बल पर सरकारें बनती है। इस्राइल में गत दो वर्षों में चार बार संसदीय मतदान हुआ। बहुमत की सरकार नहीं बन सकी थी। सवोच्च न्यायालय ने संसद के स्पीकर यूली एडेहस्टेइन को 25 मार्च 2020 के दिन त्यागपत्र देने पर विवश कर दिया  था, क्योंकि उन्होंने सदन को निलंबित कर दिया था।</p>
<p>अब देखिये भारत के विपक्षी दलों की निखालिस अवसरवादिता की एक झलक। संयुक्त राष्ट्र संघ में गाजा पर इस्राइल द्वारा प्रतिरोधात्मक  हमले (पुलिवामा टाइप) करने की निन्दा वाले प्रस्ताव का भारत ने समर्थन नहीं किया था। इस पर पीडीपी की कश्मीरी नेता महबूबा मुफ्ती ने लोकसभा में (15 जुलाई 2014) मोदी सरकार की आलोचना वाला प्रस्ताव पेश किया। इसका समर्थन किया तृणमूल कांग्रेस, इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग, समाजवादी पार्टी, मजलिसे इतिहादे मुसलमीन आदि ने संसदीय कार्य मंत्री वेंकैया नायडू से बहुमत द्वारा अस्वीकृत करा दिया। मगर परसों हमास के गाजा पट्टी पर घातक हमले की निन्दा अभी तक भारत में किसी ने नहीं की। सौम्या की शहादत को क्या यही श्रद्धांजलि है ? और कब तक जारी रहेगा यह सियासी अवसरवादिता का दौर&#8230; कब तक राष्ट्र से बढ़कर जाति और धर्म को तरजीह दी जाती रहेगी&#8230;!!!! निश्चित ही सवाल बड़ा है और आसानी से जवाब भी नहीं आने वाला&#8230; लेकिन हमें कोशिश करनी होगी कि कहीं जवाब तलाशने में इतनी देर न हो जाए कि हम राष्ट्र नहीं मजहबी ताकतों के तौर पर ही पहचाने जाने लगें&#8230;!!!!</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>(<span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://tismedia.in/">TIS Media</a></span> परिवार के संरक्षक<span style="color: #ff0000;"> <a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के. विक्रम राव</a> </span>का शुमार देश के नामचीन पत्रकारों में होता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उन्होंने इमरजेंसी तक में स्वतंत्र आवाज के लिए जेल यात्रा की। महीनों की सजाएं भुगती। श्री राव,  वॉयस ऑफ अमेरिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनोमिक टाइम्स, फिल्मफेयर और इलस्ट्रेटेड वीकली में प्रमुख पदों पर रहने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड के संस्थापक संपादक भी रह चुके हैं। प्रेस की नियामक संस्था &#8216;भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य रहने के अलावा मजीठिया वेतन बोर्ड और मणिसाना वेतन बोर्ड के सदस्य के तौर पर पत्रकारों के हित में लंबा संघर्ष किया है। <span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के.विक्रम राव</a>,</span> फिलहाल इंडियन फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट <span style="color: #ff0000;">#IFWJ</span> के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)</strong></span></p>
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		<item>
		<title>मंथन: आस्ट्रेलिया से लें सबक, लॉकडाउन और सख्ती बढ़ाना ही कोरोना चेन तोड़ने का विकल्प</title>
		<link>https://tismedia.in/editorial/article/senior-journalist-harish-malik-opinion-on-uncontrolled-situation-of-corona-pandemic/7570/?utm_source=rss&#038;utm_medium=rss&#038;utm_campaign=senior-journalist-harish-malik-opinion-on-uncontrolled-situation-of-corona-pandemic</link>
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		<pubDate>Fri, 30 Apr 2021 17:06:16 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भले ही राष्ट्र के नाम पिछले सम्बोधन में कहा हो कि राज्य लॉकडाउन को अंतिम विकल्प बनाएं, लेकिन राजस्थान के वर्तमान हालातों को देखते हुए लगता है कि फिलहाल लॉकडाउन ही कोरोना की चेन को तोड़ने का पहला विकल्प है। जब जन अनुशासन पखवाड़े (लॉकडाउन) के बावजूद कोरोना के पॉजिटिव केसों &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<div class="kvgmc6g5 cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q">
<blockquote>
<div dir="auto">प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भले ही राष्ट्र के नाम पिछले सम्बोधन में कहा हो कि राज्य लॉकडाउन को अंतिम विकल्प बनाएं, लेकिन राजस्थान के वर्तमान हालातों को देखते हुए लगता है कि फिलहाल लॉकडाउन ही कोरोना की चेन को तोड़ने का पहला विकल्प है। जब जन अनुशासन पखवाड़े (लॉकडाउन) के बावजूद कोरोना के पॉजिटिव केसों में बेतहाशा वृद्धि हो रही है तो बगैर लॉकडाउन के हालात बद से बदतर हो सकते हैं। ऐसे में तो लॉकडाउन और ज्यादा समीचीन हो गया है। जन अनुशासन पखवाड़े को कुछ और सख्तियों के साथ राज्यभर में बढ़ाया ही जाना चाहिए। वैसे भी राजस्थान में कोरोना की दूसरी लहर का पीक मई में आने की संभावना विशेषज्ञ बता रहे हैं।</div>
</blockquote>
</div>
<div class="o9v6fnle cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q">
<div dir="auto"><strong><span style="color: #ff0000;">दस दिन में 53 से बढ़कर 158 की मौत</span></strong></div>
<div dir="auto">अब तीन मई को जन अनुशासन पखवाड़ा खत्म होने जा रहा है। इसे बढ़ाने या खत्म करने के लिए तर्क—वितर्क आ रहे हैं। जो इसे खत्म करने की वकालत कर रहे हैं, उन्हें जान लेना चाहिए कि ​लॉकडाउन के दस दिनों में ही कोरोना से मरने वालों की संख्या 53 से रिकार्ड 158 तक पहुंच गई। जान से जरूरी कुछ भी नहीं है। हमारी रिकवरी रेट घटकर बेहद नीचे आ गई और पॉजिटिव केस पांच हजार से ज्यादा बढ़ गए !! ऐसे में यदि लॉकडाउन न होता तो कितने भयावह हालात बनते ? राज्य के पास अतिरिक्त मरीजों के लिए पर्याप्त साधन ही नही हैं। न जरूरी बेड है न आक्सीजन। न पूरा नर्सिंग स्टाफ है न डाक्टर। न पर्याप्त वेंटीलेटर हैं और न ही अस्पताल। बगैर लॉकडाउन के कोरोना मरीजों को संभालना और मुश्किलतलब होगा।</div>
<div dir="auto"></div>
</div>
<div class="o9v6fnle cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q">
<div dir="auto"><strong><span style="color: #ff0000;">कोरोना और एकोनॉमी दोनों को संभाला</span></strong></div>
<div dir="auto">दरअसल, हमसे एक तिहाई आबादी वाले आस्ट्रेलिया जैसे देश से सबक लिया जाना चाहिए। आस्ट्रेलिया ने पिछले साल कोरोना की दस्तक के बाद 113 केस आने पर ही लॉकडाउन लगा दिया था। जरूरी सेवाओं का छोड़कर सभी सार्वजनिक स्थल बंद कर दिए। नियम तोड़ने वालों पर अधिकतम दस लाख तक का जुर्माना लगाया गया। कोरोना और एकोनॉमी दोनों को मिलकर संभाला। सौ कोविड क्लिनिक हास्पीटल बनाए गए। लॉकडाउन में नौकरियां जाने लगीं तो निजी कंपनियों के कर्मचारियों की हर माह आर्थिक मदद की। बेरोजगार का भत्ता दोगुना कर दिया। मई 2020 में ही उसे समझ में आ गया था कि वेंटीलेटर्स की कमी पड़ने वाली है, इसलिए 5500 वेंटीलेटर्स का आर्डर दिया। इस साल कोरोना के मामले बढ़े तो तत्काल लॉकडाउन लगा दिया। राजस्थान सरकार ने हालांकि पिछले साल लॉकडाउन लगाने में सबसे जल्दी पहल की थी। उसके अपेक्षित परिणाम भी सामने आए। उससे सबक लेते हुए इस बार भी जन अनुशासन पखवाड़े के नाम पर कुछ छूट के साथ लॉकडाउन ही लगाया है। तीन मई के बाद इसे एक या दो सप्ताह के लिए बढ़ाया जा सकता है।</div>
<div dir="auto"></div>
</div>
<div class="o9v6fnle cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q">
<div dir="auto"><strong><span style="color: #ff0000;">कोविड से लड़ने के पर्याप्त मेडिकल इंतजाम नहीं</span></strong></div>
<div dir="auto">यह इसलिए भी जरूरी है कि वर्तमान में प्रदेश का ऐसा कोई भी जिला नहीं है, जहां कोरोना के केसों में लगातार बढ़ोत्तरी नहीं हो रही। पर्याप्त संसाधन न होने की कारण हालात इतने दारुण हो गए हैं कि अस्पतालों में अव्वल तो गंभीर मरीजों तक को बेड नहीं मिल पा रहे हैं। यदि कहीं बेड सुलभ है तो आक्सीजन नदारद है। आक्सीजन आती है तो टैंकर का इंतजाम नहीं! आईसीयू, वेंटीलेटर और रेमडेसीविर का तो भगवान ही मालिक है। यह &#8216;ऊपर&#8217; तक पहचान वालों को ही नसीब हो रहे हैं। आम जनता तो बेड के लिए ही मारी—मारी फिर रही है। प्रदेश का सबसे बड़ा कोविड केयर सेंटर बीलवा में शुरू हुआ है, लेकिन अभी वहां पर्याप्त इंतजामों का अभाव है।</div>
<div dir="auto"></div>
</div>
<div class="o9v6fnle cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q">
<div dir="auto"><span style="color: #ff0000;"><strong>आपदा में अवसर तलाश रहे कालाबाजारी</strong></span></div>
<div dir="auto">संवेदनहीनता की हद यह कि प्रदेश के सबसे बड़े एसएमएस अस्पताल को मौखिक तौर पर मरीजों को भर्ती न करने के लिए कहा है, क्योंकि आक्सीजन का पर्याप्त इंतजाम नहीं है। केंद्र के निर्देश पर आक्सीजन मिलने के बावजूद इसकी कमी का कारण लगातार मरीजों का बढ़ते जाना है। दूसरे, आक्सीजन सिलेंडर्स की कालाबाजारी और स्टॉक की भी खबरें आ रही हैं। रेमडेसिविर इंजेक्शन को ब्लैक में बेचते नर्सिेग कर्मी और मेडिकल स्टोर संचालक हाल ही में पकड़े जा चुके हैं। महामारी की आपदा में कालाबाजारी के अवसर तलाश रहे लोगों को चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए। एक ओर दिल्ली की तर्ज पर अलवर में निशुल्क आक्सीजन सिलेंडर लंगर लगाने की, मरीजों के लिए प्लाज्मा डोनेट करने की सुखद खबरें आ रही हैं। दूसरी ओर ऐसे अवसरखोर भी हैं। जनता को ऐसे लोगों का मुंह काला करना चाहिए।</div>
<div dir="auto"><span style="color: #ff0000;"><strong>(लेखकः <a href="https://www.facebook.com/harish.malik.3576">हरीश मलिक</a>, देश के जानेमाने पत्रकार हैं। राजस्थान पत्रिका के राज्य संपादक सहित देश के कई बड़े समाचार पत्रों में अहम जिम्मेदारियां निभा चुके हैं)  </strong></span></div>
</div>
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		<title>असहाय चीत्कार के बीच कोड़ा फटकारते धूर्त हुक्मरानों का अट्टाहास&#8230;</title>
		<link>https://tismedia.in/state/uttar-pradesh/journalist-ashish-saxena-is-reviewing-the-situation-of-uncontrolled-corona-infection-in-uttar-pradesh/7434/?utm_source=rss&#038;utm_medium=rss&#038;utm_campaign=journalist-ashish-saxena-is-reviewing-the-situation-of-uncontrolled-corona-infection-in-uttar-pradesh</link>
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		<pubDate>Wed, 28 Apr 2021 13:58:08 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>26 अप्रैल रात पौने ग्यारह बजे दिल्ली से पत्रकार साथी का वाट्सएप मैसेज आया- मरीज का नाम गजेंद्र कुमार, उम्र 62 साल, बरेली, ऑक्सीजन लेवल गिरता जा रहा है…. सांसों के लिए पिछले पांच घंटे से हॉस्पिटल हॉस्पिटल घूम रहे हैं, लेकिन बेड नहीं मिला। जीवन बचाने के लिए तत्काल मरीज को भर्ती करना जरूरी &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/state/uttar-pradesh/journalist-ashish-saxena-is-reviewing-the-situation-of-uncontrolled-corona-infection-in-uttar-pradesh/7434/">असहाय चीत्कार के बीच कोड़ा फटकारते धूर्त हुक्मरानों का अट्टाहास&#8230;</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span><span style="color: #ff0000;"><strong>बरेली का कोविड अस्पताल&#8230; 300 बिस्तरों के इस अस्पताल का उदघाटन कोरोना ने ही किया&#8230;  पूरा अस्पताल सिर्फ एक फिजिशियन के हवाले हैं&#8230;!  एक दो लोगों का नर्सिंग स्टाफ था वह नदारद है&#8230; स्टाफ के नाम पर यहां चंद सफाई कर्मी ही बचे हैं&#8230;। सफाईकर्मी ही कैथ लगा देते हैं&#8230; भर्ती मरीजों को पानी और दवा दे देते हैं&#8230;! कई मर्तबा तो यह भी नसीब नहीं होता&#8230;! अस्पताल में  कुछ कमजोर और बुजुर्ग मरीज भी भर्ती हैं&#8230; आलम यह है कि उनसे बिस्तर पर हिला तक नहीं जाता&#8230;शौच और पेशाब बिस्तर पर ही निकल जा रहा है&#8230;। सोचकर देखिए, वह जिंदा नर्क भोग रहे हैं। मरीजों से फुल यह अस्पताल महज एक चिकित्सक के सहारे चल रहा है, लेकिन मरीजों की मौत का सिलसिला इतना तेज है कि डॉक्टर साहब के सामने इलाज से बड़ा काम मृतका का डेथ सर्टिफिकेट बनाना हो गया है।</strong></span>  <strong><span style="color: #0000ff;">&#8211; आशीष आनंद</span></strong>
			</div>
		</div>
	
<p><strong><span style="color: #ff0000;">26 अप्रैल</span> </strong>रात पौने ग्यारह बजे दिल्ली से पत्रकार साथी का वाट्सएप मैसेज आया- मरीज का नाम गजेंद्र कुमार, उम्र 62 साल, बरेली, ऑक्सीजन लेवल गिरता जा रहा है…. सांसों के लिए पिछले पांच घंटे से हॉस्पिटल हॉस्पिटल घूम रहे हैं, लेकिन बेड नहीं मिला। जीवन बचाने के लिए तत्काल मरीज को भर्ती करना जरूरी है। वेंटीलेटर बेड चाहिए। अगर फोन से कोई मदद हो पाए तो कर दीजिएगा। ऑक्सीजन सेचुरेशन 60 है।</p>
<p>मैंने स्थानीय एक पत्रकार साथी, जो हेल्थ बीट के रिपोर्टर हैं, उनसे मदद मांगी। उन्होंने टटोलकर बताया कि सबसे अच्छी स्थिति जिस अस्पताल में है, वहां भी पांच वेटिंग है। दिल्ली के साथी को हालात के बारे में बता दिया गया। कोई सूरत बने राहत की, इस उम्मीद पर काफी देर तक फोन खटखटाते रहे, लेकिन कामयाबी नहीं मिली।</p>
<p>सुबह साढ़े ग्यारह बजे संदीप का मैसेज आया- <span style="color: #ff0000;"><strong>वो व्यक्ति गुजर गए। फिर भी आपने जो कोशिश की उसके लिए शुक्रिया।</strong> </span>इस मैसेज को पढ़ते ही जैसे कलेजे पर हथौड़ा सा पड़ गया। कितने असहाय हो गए हैं सब।</p>
<p>कल ही की बात है, ऐसा ही एक केस था। ऑक्सीजन के लिए एक परिवार भागदौड़ करते परसाखेड़ा इंडस्ट्रियल एरिया पहुंचा, जहां लंबी कतार थी। आखिर एक अस्पताल में दूसरे मरीज ने उनको कुछ देर के लिए अपना सिलिंडर देकर राहत दी&#8230;लेकिन&#8230;लखनऊ के बड़े सरकारी अस्पताल के डॉक्टर मित्र ने बताया कि तीन दिन तक हमारे यहां के लैब टैक्नीशियन की पत्नी ऑक्सीजन के लिए तड़पकर मर गई, न बेड मिला न ऑक्सीजन। यहां वीआईपी लोगों से ही फुर्सत नहीं है, नेता और नौकरशाह हर बेड के हकदार हैं।</p>
<p>उत्तरप्रदेश के सभी वाट्सएप ग्रुप और फेसबुक पेज-ग्रुप पर किसी न किसी की ऑक्सीजन की गुहार देखी जा सकती है। इसके बावजूद उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का सीधा हुक्म आया है कि <span style="color: #ff0000;"><strong>ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं है</strong></span>, इस तरह की अफवाह फैलाने वालों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत कार्रवाई की जाएगी। उन डॉक्टरों की संपत्ति सीज कर दी जाएगी, डिग्री कैंसिल कर दी जाएगी, जो स्वास्थ्य व्यवस्था की कोई कमी उजागर करेंगे। ट्विटर पर दादा जी के लिए ऑक्सीजन की गुहार लगाने वाले एक पर कार्रवाई हो भी गई।</p>
<p>हुक्मरानों के हाथ में कोड़ा है, वे फटकार रहे हैं। पुलिस, नौकरशाहों के जरिए सिर्फ सख्ती को ही सरकार की जिम्मेदारी समझ रहे हैं। उनका बस चले तो बिना सांस के ही नहीं मुंह में कपड़ा ठूंसकर मार दें, जिससे कोई बोल न सके। यह निष्ठुर बर्ताव हर कोई बर्दाश्त कर रहा है, भले ही वह भाजपा के लिए जान छिड़कता रहा हो। रोड शो, रैलियों, चुनाव में मदमस्त होकर सत्ता के लालची ये वही नेता हैं, जो स्वास्थ्य व्यवस्था के नाम पर आयुष्मान योजना को अमृत बता रहे थे। जो कृषि संकट हो या कोई समस्या, माला जपने, मंत्र पढ़ने, दीया जलाने, थाली बजाने में ही निदान खोजने की नसीहतें देते रहे हैं।</p>
<p>यह काम इस वक्त भी नहीं रुका है। सोशल मीडिया में वायरल है कि लखनऊ के भाजपा सांसद और देश के रक्षामंत्री कह रहे हैं, कोरोना काल में औषधि की तरह काम करेगा रामचरित मानस का पाठ, उत्तराखंड के भाजपाई मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत कह रहे हैं, हमें वेदों की ओर लौटना होगा जहां ऋषि मुनि सालों तक बिना ऑक्सीजन के जिंदा रहते थे। हरियाणा के भाजपाई मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर कह रहे हैं, मरे हुए लोग वापस नहीं आएंगे, मौत के आंकड़ों पर बहस बेमानी है।</p>
<p>हद तो तब हो गई जब केंद्र की मोदी सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के विजय राघवन ने कहा, सरकार कोरोना की दूसरी लहर के लिए तैयार थी, पिछले साल से तुलना करें तो हम बहुत अच्छी स्थिति में हैं, जीवन जीने की चीजें और जिंदगी सुरक्षित है। हो सकता है कि इसमें से कई फर्जी बातें वायरल हों, लेकिन इस तरह की बयानबाजी सरकार में बैठे लोगों ने जब तब की ही हैं। अधिकांश बयान तो प्रमुख मीडिया में ही प्रकाशित हुए हैं।</p>
<p>इसी असंवेदनशीलता का नतीजा है कि आम लोग कोविड ही नहीं, आम बीमारियों का इलाज न मिल पाने से भी काल के गाल में समाते चले जा रहे हैं। उत्तरप्रदेश के बरेली शहर में, जो तथाकथित स्मार्ट सिटी बतौर घोषित है। यहां के सांसद केंद्रीय श्रम मंत्री हैं, सभी विधायक भाजपा के हैं। यहां कोविड अस्पताल के नाम पर पूर्ववर्ती सपा सरकार का बनवाया 300 बिस्तरों का अस्पताल है। इसका उद्घाटन ही कोविड महामारी ने किया, नहीं तो कल्पना की जा सकती है कि क्या होता। तीन साल पहले रुहेलखंड रीजन में रहस्यमयी बुखार से सैकड़ों मौत का मंजर यहां के लोगों ने देखा है।</p>
<p>हाल में यहां कुछ दिन भर्ती रहे अधिवक्ता यशपाल सिंह ने बताया, मैं तो किस्मत से बचकर निकल आया, घर पर ही बाकी इलाज होगा अब। इस वक्त यह हालात हैं कि मात्र के फिजिशियन के हवाले लोगों का इलाज चल रहा है। लोग बच कम रहे हैं, इसलिए डॉक्टर के पास डेथ सर्टिफिकेट बनाने का काम ही बड़ा हो गया है। स्टाफ के नाम पर कुछ सफाईकर्मी ही बचे हैं। सप्ताहभर पहले तक एक तो नर्सिंग स्टाफ था भी, जो शायद अब नहीं बचा। सफाईकर्मी ही कैथ लगा देते हैं या पानी दे देते हैं। कई बार तो यह भी नहीं होता, चादरें तक नहीं बदल पा रही हैं। कुछ कमजोर और बुजुर्ग बिस्तर से हिल भी नहीं पा रहे तो उनके सामने तो जिंदा नर्क जैसी स्थिति हो गई है।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">सरकार ने मौत और बीमारी के आंकड़ों में बाजीगरी का भी खेल शुरू कर दिया है।</span></strong></p>
<p>इस पर वरिष्ठ पत्रकार प्रेमशंकर मिश्र कहते हैं, आंकड़ों पर मत जाइए, आप उसमें भी नहीं गिने जाएंगे। आंकड़ों का आशावाद पिछले कुछ दिनों से फिर हिलोरे लेने लगा है। प्रदेश से लेकर लखनऊ तक में मरीजों के आंकड़े घट रहे हैं। इसके साथ ही व्यवस्था से लेकर बुद्धिजीवी तक कोरोना के जाने का ऐलान करने लगे हैं। वैसे भी हम भारतीय गजब के सौंदर्यबोध से भरे हैं। जंगल की भयानक आग जिसमें लाखों जीव जलकर स्वाहा हो गए, उनकी लपटों वाली तस्वीर देखकर भी हम &#8216;वाऊ&#8217; कर लेते हैं। 1998 में गोरखपुर में भयानक बाढ़ आई थी, जिसमें हजारों घर तबाह हो गए थे, उस दौरान भी लोग पॉपकार्न का पैकेट लेकर बाढ़ देखने आते थे।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>आंकड़े गुलाबी इसलिए हैं-</strong></span><br />
&#8211; नई डिस्चार्ज पॉलिसी में अगर मरीज को 7 दिन तक कोई दृश्य लक्षण नहीं है तो उसे बिना टेस्ट किए ही डिस्चार्ज किए जाने के आदेश हैं। यानि वह लक्षण बिना पॉजिटिव होकर भी &#8216;निगेटिव&#8217; हो सकता है।<br />
&#8211; कोविड की रिपोर्ट निगेटिव आ रही है, लेकिन CT स्कैन से कोविड पॉजीटिव आ रहे हैं, ये आंकड़ों का हिस्सा नहीं है<br />
&#8211; सरकार ने कहा टेस्ट बढ़ाकर 2.5 लाख से अधिक करें, उसके बाद संख्या घटकर 1.90 लाख रोजाना आ गई है, यानि मर्ज बढ़ रहा, लेकिन टेस्ट नहीं।<br />
&#8211; कांटेक्ट ट्रेसिंग का पैमाना संक्रमित व्यक्ति से जुड़े 25 लोगों तक पहुंचना है। प्रदेश में औसतन 33 हजार मरीज हैं और टेस्ट 2 लाख से कम, अगर इसे हम कांटेक्ट ट्रेसिंग का भी हिस्सा मान लें, तो हर व्यक्ति महज 6 का आंकड़ा है। यह भी तब है जब ऐसा हो रहा है, हम मान लें। हमारे-आप सबके परिचित में बहुत से लोग प्रभावित है, किसके यहां कितने कांटेक्ट ट्रेस किए गए, आप खुद ही इससे हकीकत परख सकते हैं।<br />
&#8211; कोविड से मौतों के सरकारी आंकड़ें व श्मशान के आंकड़ें अंतर साफ बता रहे हैं, भरोसा करना आपकी अपनी श्रद्धा पर है।<br />
&#8211; सुदूर क्षेत्रों में टेस्ट न के बराबर हैं, लक्षण वाले बहुत से लोग टाइफाइड व निमोनिया का मरीज मानकर इलाज कर रहे, और दिवगंत हो जा रहे हैं। वे आंकड़ों का हिस्सा नहीं है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>(15 सालों से पत्रकारिता के खांटी हस्ताक्षर <a href="https://www.facebook.com/ashish.saxena.39794">आशीष आनंद</a> दैनिक जागरण और अमर उजाला जैसे अखबारों से जुड़े रहे हैं। फिलहाल वह स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहे हैं एवं TIS Media की उत्तर प्रदेश टीम का प्रमुख हिस्सा हैं।)</strong></span></p>
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		<title>प्रहार: नेताजी, सोच संभल कर बोलें, ये पब्लिक है सब जानती है&#8230;</title>
		<link>https://tismedia.in/rajasthan/editorial-article-rajesh-kasera-gulabchand-kataria-s-controversial-statement-on-maharana-pratap/6796/?utm_source=rss&#038;utm_medium=rss&#038;utm_campaign=editorial-article-rajesh-kasera-gulabchand-kataria-s-controversial-statement-on-maharana-pratap</link>
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		<pubDate>Fri, 16 Apr 2021 08:03:51 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>&#8211; राजेश कसेरा इस बार बेतुके बोलों से आघात पहुंचाने और मन को आहत करने का काम किया राजस्थान विधानसभा के प्रतिपक्ष नेता और उदयपुर से भाजपा विधायक गुलाबचंद कटारिया ने। आवेश में आकर उन्होंने कई बार ऐसे शब्दों का चयन किया हैं जो उनके साथ पार्टी के लिए भी गलफांस बन जाता है। कटारिया &#8230;</p>
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		<div class="box shadow  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>कहते हैं कमान से निकला तीर उतने गहरे घाव नहीं देता, जितनी टीस वाणी से निकले जहरीले बोल देते हैं। तभी तो संत कबीरदास ने भी लिखा, ऐसी बाणी बोलिए, मन का आपा खोए, औरों को शीतल करे, आपहुं शीतल होय। लेकिन, आज के दौर में हमारे चुने हुए जनप्रतिनिधि इस सीख को भुला चुके हैं। तभी तो बार-बार ऐसे शब्दभेदी बाण आमजन के दिलों में चुभोने का पाप करते हैं, जो उनकी भावनाओं को उद्वेलित करने का काम करते हैं।
			</div>
		</div>
	
<p style="text-align: right;"><strong><span style="color: #ff0000;">&#8211; राजेश</span><span style="color: #ff0000;"> कसेरा</span></strong></p>
<p>इस बार बेतुके बोलों से आघात पहुंचाने और मन को आहत करने का काम किया राजस्थान विधानसभा के प्रतिपक्ष नेता और उदयपुर से भाजपा विधायक गुलाबचंद कटारिया ने। आवेश में आकर उन्होंने कई बार ऐसे शब्दों का चयन किया हैं जो उनके साथ पार्टी के लिए भी गलफांस बन जाता है। कटारिया ने राजसमंद के कुंवारिया गांव में जनसभा के दौरान महाराणा प्रताप पर अभद्र टिप्पणी कर डाली। उनकी इस जहरीली बोली का राजपूत समाज ने कड़ा विरोध जताया। समूचे मेवाड़ में आक्रोश फैल गया। सोशल मीडिया के माध्यम से लोगों ने कटारिया के इस वीडियो को शेयर करते हुए अपना विरोध दर्ज कराया। वह भी उस रणबांकुरे और इतिहास के योद्धा के बारे में, जिन्हें मेवाड़ शिरोमणि की उपाधि दी गई। राजस्थान के इसी अंचल से महाराणा प्रताप ने अपने अदम्य शौर्य व पराक्रम से विश्वख्याति अर्जित की। प्रातः स्मरणीय प्रताप के नाम पर न जाने कितने नेताओं ने अपनी राजनीति को चमकाया है, इसके बावजूद उनके खिलाफ होने वाली अनर्गल टीका टिप्पणी को लोगों के दिलों से बरसोंबरस मिटाना कठिन है।</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/editorial/article/senior-journalist-harish-malik-opinion-on-corruption-in-ajmer-revenue-board/6733/">OPINION : अफसर + सरकारी वकील + दलाल = भ्रष्टाचार यानी राजस्थान रेवेन्यू बोर्ड </a></strong></span></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>पहले भी कटार सी चुभी है कटारिया की जुबान </strong></span><br />
बयानवीर गुलाब चंद कटारिया ने ऐसा पहली बार नहीं किया। इससे पहले कई बार अपने बयानों के चलते चर्चा में रहे हैं। बड़बोले कटारिया कई मौकों पर अमर्यादित शब्दों से गरजे हैं। कटारिया जब बोलते हैं तब भावनाओं में इस कदर बह जाते हैं कि क्या शब्द बोल रहे है, उसका भान ही नहीं रहता है। प्रदेश में कटारिया ने अपने भाषण में महाराणा प्रताप के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह लेकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के प्रति स्तरहीन भाषा का प्रयोग किया है। पत्रकारों के लिए अभद्र भाषा का प्रयोग करना हो या विधानसभा चुनाव में खुद के मतदाताओं को वोट कुएं में डाल देने की नसीहत देना। कटारिया कई बार जनता के निशाने पर आए हैं। &#8216;लव जिहाद&#8217; पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि &#8216;हमारी बेटियां पंचर वालों के साथ भाग रही हैं। वे मुस्लिमों की बढ़ती आबादी पर विवादित बयान दे चुके हैं। वे कह चुके हैं कि &#8220;अगर यही गति रही तो हर शहर में पाकिस्तान बन जाएगा।&#8221; बावजूद इसके कि वे राजस्थान की वर्तमान राजनीति के सबसे वरिष्ठतम नेताओं में शामिल हैं। उनको उदयपुर और मेवाड़ की जनता ने लगातार प्यार और समर्थन दिया है। वे राजनीति में आने वाली नई पीढ़ी पथ प्रदर्शक हैं, ऐसे में उनको हर शब्द नापतौल कर बोलना चाहिए।</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/editorial/article/history-of-indian-army-postal-service-by-arvind-kumar-singh/5942/">सुनो, ये चिट्ठियां नहीं हैं! कागज पर रख दिया है निकाल कर कलेजा&#8230; </a> </strong></span></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>कटारिया अकेले नहीं </strong></span><br />
राजस्थान की राजनीति में कटारिया अकेले बिगड़े बोल कहने वाले नहीं हैं। हर रोज ऐसे बयानवीर किसी न किसी अंचल से निकल कर आते हैं और माहौल को बिगाड़ने का दुःसाहस करते हैं। हाल में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और शिक्षा मंत्री गोविंद सिंह डोटासरा ने उनके आवास पर स्कूल समय में ज्ञापन देने पहुंचे शिक्षकों के प्रतिनिधिमंडल को &#8216;नाथी का बाड़ा&#8217; समझ रखा है क्या, कहकर चेता चुके हैं। भाजपा ने इस मुद्दा बनाया ताकि कांग्रेस को उपचुनाव में वोटों का नुकसान हो सके। इस बीच उपनेता राजेंद्र सिंह राठौड़ कूद पड़े। सुजानगढ़ की एक सभा में वे कांग्रेसी पर बिफर गए कि उनके नेता को सुजानगढ़ सीट नहीं निकालने देंगे। यह कोई &#8216;खालाजी का बाड़ा&#8217; नहीं है। &#8216;नाथी का बाड़ा&#8217; पर जहां सोशल मीडिया में जमकर मीम्स बने, वहीं &#8216;खालाजी का बाड़ा&#8217; को राजस्थान में असम विधानसभा चुनाव के कांग्रेस नेताओं की बाड़ाबंदी से जोड़ा गया।</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/editorial/article/election-in-reform-in-india-make-election-task-force/5691/">सुनो! सरकारः ‘इलेक्शन टॉस्क फोर्स‘ बनाकर करो चुनाव सुधार </a> </strong></span></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>जनता उखाड़ फेंके ऐसी विष बेलों को </strong></span><br />
ये सभी मामले ताजा हैं। यहां पुराने अभद्र बोलों की सूची तैयार की जाए तो पूरा ग्रंथ तैयार हो सकता है। बड़ा सवाल यहां यही है कि जनता के बीच से निकले नेता क्यों ऐसी अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं। सिर्फ सुर्खियों में बने रहने के लिए या जानबूझकर कर विवाद पैदा करने के लिए। मंशा जो चाहे हो, पर आम जनता को इस कुत्सित सोच पर कड़ा प्रहार करना होगा और उनके बीच जहर घोलने वालों को कड़ा सबक सिखाना होगा। कम से कम उन बीजों या पौधों को जड़ से उखाड़ फेंकना होगा, जो विषबेल को पोषित करने का महापाप करते हैं। जनता ने सबक सिखाने का ठान लिया तो बड़बोले नेताओं की जुबान पर स्वतः लगाम लग जाएगी।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>(<a href="https://www.facebook.com/rajesh.kasera"><span style="color: #000000;">राजेश कसेरा</span></a> राजस्थान के जाने-माने पत्रकार हैं। राजेश कसेरा, राजस्थान पत्रिका सहित कई प्रमुख हिंदी समाचार संस्थानों में पत्रकार से लेकर संपादक के तौर पर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाल चुके हैं।)</strong>  </span></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/rajasthan/editorial-article-rajesh-kasera-gulabchand-kataria-s-controversial-statement-on-maharana-pratap/6796/">प्रहार: नेताजी, सोच संभल कर बोलें, ये पब्लिक है सब जानती है&#8230;</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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