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	<title>Hindi Story Archives - TIS Media</title>
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		<title>चली कहानीः बगुला भगत और केकड़ा</title>
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		<pubDate>Wed, 03 Nov 2021 01:50:55 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>एक वन प्रदेश में एक बहुत बड़ा तालाब था। हर प्रकार के जीवों के लिए उसमें भोजन सामग्री होने के कारण वहां नाना प्रकार के जीव, पक्षी, मछलियां, कछुए और केकड़े निवास करते थे। पास में ही बगुला रहता था, जिसे परिश्रम करना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। उसकी आंखें भी कमजोर थीं। मछलियां पकडने &#8230;</p>
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				<h4>पंचतंत्र</h4>संस्कृत नीतिकथाओं में पंचतन्त्र का पहला स्थान माना जाता है। यद्यपि यह पुस्तक अपने मूल रूप में नहीं रह गयी है, फिर भी उपलब्ध अनुवादों के आधार पर इसकी रचना तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व के आस-पास निर्धारित की गई है। इस ग्रंथ के रचयिता पं॰ विष्णु शर्मा हैं, कहीं-कहीं रचयिता का नाम &#8216;बसुभग&#8217; आया है। उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर कहा जा सकता है कि जब इस ग्रन्थ की रचना पूरी हुई, तब उनकी उम्र लगभग 80 वर्ष थी। पंचतन्त्र को पाँच तन्त्रों (भागों) में बाँटा गया है। मित्रभेद, मित्रसम्प्राप्ति, काकोलुकीयम्, लब्धप्रणाश, अपरीक्षित कारक। 
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<p><strong><span style="color: #ff0000;">एक</span></strong> वन प्रदेश में एक बहुत बड़ा तालाब था। हर प्रकार के जीवों के लिए उसमें भोजन सामग्री होने के कारण वहां नाना प्रकार के जीव, पक्षी, मछलियां, कछुए और केकड़े निवास करते थे। पास में ही बगुला रहता था, जिसे परिश्रम करना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। उसकी आंखें भी कमजोर थीं। मछलियां पकडने के लिए तो मेहनत करनी पड़ती हैं, जो उसे खलती थी। इसलिए आलस्य के मारे वह प्रायः भूखा ही रहता। एक टांग पर खड़ा यही सोचता रहता कि क्या उपाय किया जाए कि बिना हाथ-पैर हिलाए रोज भोजन मिले। एक दिन उसे एक उपाय सूझा तो वह उसे आजमाने बैठ गया।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>बगुला</strong></span> तालाब के किनारे खड़ा हो गया और लगा आंखों से आंसू बहाने। एक केकड़े ने उसे आंसू बहाते देखा तो वह उसके निकट आया और पूछने लगा “मामा, क्या बात है भोजन के लिए मछलियों का शिकार करने की बजाय खड़े आंसू बहा रहे हो?”<br />
बगुले ने जोर की हिचकी ली और भर्राए गले से बोला “बेटे, बहुत कर लिया मछलियों का शिकार। अब मैं यह पाप कार्य और नहीं करुंगा। मेरी आत्मा जाग उठी हैं। इसलिए मैं निकट आई मछलियों को भी नहीं पकड़ रहा हूं। तुम तो देख ही रहे हो।”<br />
केकड़ा बोला “मामा, शिकार नहीं करोगे, कुछ खाओगे नही तो मर नहीं जाओगे?”<br />
बगुले ने एक और हिचकी ली “ऐसे जीवन का नष्ट होना ही अच्छा है बेटे, वैसे भी हम सबको जल्दी मरना ही हैं। मुझे ज्ञात हुआ हैं कि शीघ्र ही यहां बारह वर्ष लंबा सूखा पड़ेगा।”<br />
बगुले ने केकड़े को बताया कि यह बात उसे एक त्रिकालदर्शी महात्मा ने बताई है, जिसकी भविष्यवाणी कभी गलत नहीं होती। केकड़े ने जाकर सबको बताया कि कैसे बगुले ने बलिदान व भक्ति का मार्ग अपना लिया है और सूखा पड़ने वाला है।<br />
उस तालाब के सारे जीव मछलियां, कछुए, केकड़े, बत्तख व सारस आदि दौड़े-दौडे बगुले के पास आए और बोले “भगत मामा, अब तुम ही हमें कोई बचाव का रास्ता बताओ। अपनी अक्ल लड़ाओ तुम तो महाज्ञानी बन ही गए हो।”<br />
बगुले ने कुछ सोचकर बताया कि वहां से कुछ कोस दूर एक जलाशय हैं जिसमें पहाड़ी झरना बहकर गिरता हैं। वह कभी नहीं सूखता। यदि जलाशय के सब जीव वहां चले जाएं तो बचाव हो सकता है। अब समस्या यह थी कि वहां तक जाया कैसे जाएं? बगुले भगत ने यह समस्या भी सुलझा दी “मैं तुम्हें एक-एक करके अपनी पीठ पर बिठाकर वहां तक पहुंचाऊंगा क्योंकि अब मेरा सारा शेष जीवन दूसरों की सेवा करने में ही तो गुजरेगा।”<br />
सभी जीवों ने गद्-गद् होकर ‘बगुला भगतजी की जै’ के नारे लगाए।<br />
अब बगुला भगत के पौ-बारह हो गई। वह रोज एक जीव को अपनी पीठ पर बिठाकर ले जाता और कुछ दूर ले जाकर एक चट्टान के पास जाकर उसे उस पर पटककर मार डालता और खा जाता। कभी मूड हुआ तो भगतजी दो फेरे भी लगाते और दो जीवों को चट कर जाते तालाब में जानवरों की संख्या घटने लगी। चट्टान के पास मरे जीवों की हड्डियों का ढेर बढ़ने लगा और भगतजी की सेहत बनने लगी। खा-खाकर वह खूब मोटे हो गए। मुख पर लाली आ गई और पंख चर्बी के तेज से चमकने लगे। उन्हें देखकर दूसरे जीव कहते “देखो, दूसरों की सेवा का फल और पुण्य भगतजी के शरीर को लग रहा है।”<br />
बगुला भगत मन ही मन खूब हंसता। वह सोचता कि देखो दुनिया में कैसे-कैसे मूर्ख जीव भरे पड़े हैं, जो सबका विश्वास कर लेते हैं। ऐसे मूर्खों की दुनिया में थोड़ी चालाकी से काम लिया जाए तो मजे ही मजे हैं। बिना हाथ-पैर हिलाए खूब दावत उड़ाई जा सकती है। बहुत दिन यही क्रम चला। एक दिन केकड़े ने बगुले से कहा “मामा, तुमने इतने सारे जानवर यहां से वहां पहुंचा दिए, लेकिन मेरी बारी अभी तक नहीं आई।”<br />
भगतजी बोले “बेटा, आज तेरा ही नंबर लगाते हैं, आजा मेरी पीठ पर बैठ जा।”<br />
केकड़ा खुश होकर बगुले की पीठ पर बैठ गया। जब वह चट्टान के निकट पहुंचा तो वहां हड्डियों का पहाड देखकर केकड़े का माथा ठनका। वह हकलाया “यह हड्डियों का ढेर कैसा हैं? वह जलाशय कितनी दूर है मामा?”<br />
बगुला भगत ठां-ठां करके खुब हंसा और बोला “मूर्ख, वहां कोई जलाशय नहीं है। मैं एक-एक को पीठ पर बिठाकर यहां लाकर खाता रहता हूं। आज तु मरेगा।”<br />
केकड़ा सारी बात समझ गया। वह सिहर उठा परन्तु उसने हिम्मत न हारी और तुरंत अपने पंजों को आगे बढ़ाकर उनसे दुष्ट बगुले की गर्दन दबा दी और तब तक दबाए रखी, जब तक उसके प्राण पखेरु न उड़ गए।<br />
फिर केकड़ा बगुले भगत का कटा सिर लेकर तालाब पर लौटा और सारे जीवों को सच्चाई बता दी कि कैसे दुष्ट बगुला भगत उन्हें धोखा देता रहा।<br />
सीखः किसी की भी बातों पर आंखें मूंदकर विश्वास नहीं करना चाहिए। मुसीबत में धीरज व बुद्धिमानी से कार्य करना चाहिए।</p>
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		<title>चली कहानीः निन्यानवे का चक्कर, असमिया लोक-कथा</title>
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		<pubDate>Tue, 02 Nov 2021 01:57:39 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>प्राचीनकाल की बात है। असम के ग्रामीण इलाके में तीरथ नाम का कुम्हार रहता था । वह जितना कमाता था, उससे उसका घर खर्च आसानी से चल जाता था । उसे अधिक धन की चाह नहीं थी । वह सोचता था कि उसे अधिक कमा कर क्या करना है । दोनों वक्त वह पेट भर &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ff0000;"><strong>प्राचीनकाल</strong></span> की बात है। असम के ग्रामीण इलाके में तीरथ नाम का कुम्हार रहता था । वह जितना कमाता था, उससे उसका घर खर्च आसानी से चल जाता था । उसे अधिक धन की चाह नहीं थी । वह सोचता था कि उसे अधिक कमा कर क्या करना है । दोनों वक्त वह पेट भर खाता था, उसी से संतुष्ट था ।<br />
वह दिन भर में ढेरों में बर्तन बनाता, जिन पर उसकी लागत सात-आठ रुपये आती थी । अगले दिन वह उन बर्तनों को बाजार में बेच आता था । जिस पर उसे डेढ़ या दो रुपये बचते थे । इतनी कमाई से ही उसकी रोटी का गुजारा हो जाता था, इस कारण वह मस्त रहता था ।<br />
रोज शाम को तीरथ अपनी बांसुरी लेकर बैठ जाता और घंटों से बजाता रहता । इसी तरह दिन बीतते जा रहे थे । धीरे-धीरे एक दिन आया कि उसका विवाह भी हो गया । उसकी पत्नी का नाम कल्याणी था ।<br />
कल्याणी एक अत्यंत सुघड़ और सुशील लड़की थी । वह पति के साथ पति के काम में खूब हाथ बंटाने लगी । वह घर का काम भी खूब मन लगाकर करती थी । अब तीरथ की कमाई पहले से बढ़ गई । इस कारण दो लोगों का खर्च आसानी से चल जाता था ।<br />
तीरथ और कल्याणी के पड़ोसी यह देखकर जलते थे कि वे दोनों इतने खुश रहते थे । दोनों दिन भर मिलकर काम करते थे । तीरथ पहले की तरह शाम को बांसुरी बजाता रहता था । कल्याणी घर के भीतर बैठी कुछ गाती गुनगुनाती रहती थी ।<br />
एक दिन कल्याणी तीरथ से बोली कि तुम जितना भी कमाते हो वह रोज खर्च हो जाता है । हमें अपनी कमाई से कुछ न कुछ बचाना अवश्य है ।<br />
इस पर तीरथ बोला &#8211; &#8220;हमें ज्यादा कमा कर क्या करना है ? ईश्वर ने हमें इतना कुछ दिया है, मैं इसी से संतुष्ट हूं । चाहे छोटी ही सही, हमारा अपना घर है । दोनों वक्त हम पेट भर कर खाते हैं, और हमें क्या चाहिए ?&#8221;<br />
इस पर कल्याणी बोली &#8211; &#8220;मैं जानती हूं कि ईश्वर का दिया हमारे पास सब कुछ है और मैं इसमें खूब खुश भी हूं । परन्तु आड़े वक्त के लिए भी हमें कुछ न कुछ बचाकर रखना चाहिए ।&#8221;<br />
तीरथ को कल्याणी की बात ठीक लगी और दोनों पहले से अधिक मेहनत करने लगे । कल्याणी सुबह 4 बजे उठकर काम में लग जाती । तीरथ भी रात देर तक काम करता रहता । लेकिन फिर भी दोनों अधिक बचत न कर पाते । अत: दोनों ने फैसला किया कि इस तरह अपना सुख-चैन खोना उचित नहीं है और वे पहले की तरह मस्त रहने लगे ।<br />
एक दिन तीरथ बर्तन बेचकर बाजार से घर लौट रहा था । शाम ढल चुकी थी । वह थके पैरों खेतों से गुजर रहा था कि अचानक उसकी निगाह एक लाल मखमली थैली पर गई । उसने उसे उठाकर देखा तो उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा । थैली में चांदी के सिक्के भरे थे ।<br />
तीरथ ने सोचा कि यह थैली जरूर किसी की गिर गई है, जिसकी थैली हो उसी को दे देनी चाहिए । उसने चारों तरफ निगाह दौड़ाई । दूर-दूर तक कोई दिखाई नहीं दिया । उसने ईश्वर का दिया इनाम समझकर उस थैली को उठा लिया और घर ले आया ।<br />
घर आकर तीरथ ने सारा किस्सा कल्याणी को कह सुनाया । कल्याणी ने ईश्वर को धन्यवाद दिया ।<br />
तीरथ बोला &#8211; &#8220;तुम कहती थीं कि हमें आड़े समय के लिए कुछ बचाकर रखना चाहिए । सो ईश्वर ने ऐसे आड़े समय के लिए हमें उपहार दिया है ।&#8221;<br />
&#8220;ऐसा ही लगता है ।&#8221; कल्याणी बोली &#8211; &#8220;हमें गिनकर देखना चाहिए कि ये चांदी के रुपये कितने हैं ।&#8221;<br />
दोनों बैठकर रुपये गिनने लगे । पूरे निन्यानवे रुपये थे । दोनों खुश होकर विचार-विमर्श करने लगे । कल्याणी बोली &#8211; &#8220;इन्हें हमें आड़े समय के लिए उठा कर रख देना चाहिए, फिर कल को हमारा परिवार बढ़ेगा तो खर्चे भी बढ़ेंगे ।&#8221;<br />
तीरथ बोला &#8211; &#8220;पर निन्यानवे की गिनती गलत है, हमें सौ पूरा करना होगा, फिर हम इन्हें बचा कर रखेंगे ।&#8221;<br />
कल्याणी ने हां में हां मिलाई । दोनों जानते थे कि चांदी के निन्यानवे रुपये को सौ रुपये करना बहुत कठिन काम है, परंतु फिर भी दोनों ने दृढ़ निश्चय किया कि इसे पूरा करके ही रहेंगे । अब तीरथ और कल्याणी ने दुगुनी-चौगुनी मेहनत से काम करना शुरू कर दिया । तीरथ भी बर्तन बेचने सुबह ही निकल जाता, फिर देर रात तक घर लौटता ।<br />
इस तरह दोनों लोग थक कर चूर हो जाते थे । अब तीरथ थका होने के कारण बांसुरी नहीं बजाता था, न ही कल्याणी खुशी के गीत गाती गुनगुनाती थी । उसे गुनगुनाने की फुरसत ही नहीं थी। न ही वह अड़ोस-पड़ोस या मोहल्ले में कहीं जा पाती थी ।<br />
दिन-रात एक करके दोनों लोग एक-एक पैसा जोड़ रहे थे । इसके लिए उन्होंने दो वक्त के स्थान पर एक भक्त भोजन करना शुरू कर दिया, लेकिन चांदी के सौ रुपये पूरे नहीं हो रहे थे ।<br />
यूं ही तीन महीने बीत गए । तीरथ के पड़ोसी खुसर-फुसर करने लगे कि इनके यहां जरूर कोई परेशानी है, जिसकी वजह से ये दिन-रात काम करते हैं और थके-थके रहते हैं ।<br />
किसी तरह छ: महीने बीतने पर उन्होंने सौ रुपये पूरे कर लिए । अब तक तीरथ और कल्याणी को पैसे जोड़ने का लालच पड़ चुका था । दोनों सोचने लगे कि एक सौ से क्या भला होगा । हमें सौ और जोड़ने चाहिए । अगर सौ रुपये और जुड़ गए तो हम कोई व्यापार शुरू कर देंगे और फिर हमारे दिन सुख से बीतेंगे ।<br />
उन्होंने आगे भी उसी तरह मेहनत जारी रखी । इधर, पड़ोसियों की बेचैनी बढ़ती जा रही थी । एक दिन पड़ोस की रम्मो ने फैसला किया कि वह कल्याणी की परेशानी का कारण जानकर ही रहेगी । वह दोपहर को कल्याणी के घर जा पहुंची । कल्याणी बर्तन बनाने में व्यस्त थी ।<br />
रम्मो ने इधर-उधर की बातें करने के पश्चात् कल्याणी से पूछ ही लिया &#8211; &#8220;बहन ! पहले जो तुम रोज शाम को मधुर गीत गुनगुनाती थीं, आजकल तुम्हारा गीत सुनाई नहीं देता ।&#8221;<br />
कल्याणी ने &#8216;यूं ही&#8217; कहकर बात टालने की कोशिश की और अपने काम में लगी रही । परंतु रम्मो कब मानने वाली थी । वह बात को घुमाकर बोली &#8211; &#8220;आजकल बहुत थक जाती हो न ? कहो तो मैं तुम्हारी मदद कर दूं ।&#8221;<br />
कल्याणी थकी तो थी ही, प्यार भरे शब्द सुनकर पिघल गई और बोली &#8211; &#8220;हां बहन, मैं सचमुच बहुत थक जाती हूं, पर क्या करूं हम बड़ी मुश्किल से सौ पूरे कर पाए हैं ।&#8221;<br />
&#8220;क्या मतलब ?&#8221; रम्मो बोली तो कल्याणी ने पूरा किस्सा कह सुनाया । रम्मो बोली &#8211; &#8220;बहन, तुम दोनों तो गजब के चक्कर में पड़ गए हो, तुम्हें इस चक्कर में पड़ना ही नहीं चाहिए था । यह चक्कर आदमी को कहीं का नहीं छोड़ता ।&#8221;<br />
कल्याणी ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहा &#8211; &#8220;तुम किस चक्कर की बात कर रही हो ? मैं कुछ समझी नहीं ।&#8221;<br />
&#8220;अरी बहन, निन्यानवे का चक्कर ।&#8221; रम्मो का जवाब था ।</p>
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		<title>चली कहानीः रंगा सियार</title>
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		<pubDate>Thu, 28 Oct 2021 02:58:55 +0000</pubDate>
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			<div class="author-info">
				<h4>पंचतंत्र</h4>संस्कृत नीतिकथाओं में पंचतन्त्र का पहला स्थान माना जाता है। यद्यपि यह पुस्तक अपने मूल रूप में नहीं रह गयी है, फिर भी उपलब्ध अनुवादों के आधार पर इसकी रचना तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व[1] के आस-पास निर्धारित की गई है। इस ग्रंथ के रचयिता पं॰ विष्णु शर्मा हैं, कहीं-कहीं रचयिता का नाम &#8216;बसुभग&#8217; आया है। [2]उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर कहा जा सकता है कि जब इस ग्रन्थ की रचना पूरी हुई, तब उनकी उम्र लगभग 80 वर्ष थी। पंचतन्त्र को पाँच तन्त्रों (भागों) में बाँटा गया है। मित्रभेद, मित्रसम्प्राप्ति, काकोलुकीयम्, लब्धप्रणाश, अपरीक्षित कारक। 
			</div>
		</div>
	
<p>एक बार की बात है कि एक सियार जंगल में एक पुराने पेड़ के नीचे खड़ा था। पूरा पेड़ हवा के तेज झोंके से गिर पड़ा। सियार उसकी चपेट में आ गया और बुरी तरह घायल हो गया। वह किसी तरह घिसटता-घिसटता अपनी मांद तक पहुंचा।<br />
कई दिन बाद वह मांद से बाहर आया। उसे भूख लग रही थी। शरीर कमजोर हो गया था तभी उसे एक खरगोश नजर आया। उसे दबोचने के लिए वह झपटा। सियार कुछ दूर भाग कर हांफने लगा। उसके शरीर में जान ही कहां रह गई थी? फिर उसने एक बटेर का पीछा करने की कोशिश की। यहां भी वह असफल रहा। हिरण का पीछा करने की तो उसकी हिम्मत भी न हुई।<br />
वह खड़ा सोचने लगा। शिकार वह कर नहीं पा रहा था। भूखों मरने की नौबत आई ही समझो। क्या किया जाए? वह इधर-उधर घूमने लगा पर कहीं कोई मरा जानवर नहीं मिला। घूमता-घूमता वह एक बस्ती में आ गया। उसने सोचा शायद कोई मुर्गी या उसका बच्चा हाथ लग जाए। सो, वह इधर-उधर गलियों में घूमने लगा।<br />
तभी कुत्ते भौं-भौं करते उसके पीछे पड़ गए। सियार को जान बचाने के लिए भागना पड़ा। गलियों में घुसकर उनको छकाने की कोशिश करने लगा पर कुत्ते तो कस्बे की गली-गली से परिचित थे। सियार के पीछे पड़े कुत्तों की टोली बढ़ती जा रही थी और सियार के कमजोर शरीर का बल समाप्त होता जा रहा था।<br />
सियार भागता हुआ रंगरेजों की बस्ती में आ पहुंचा था। वहां उसे एक घर के सामने एक बड़ा ड्रम नजर आया। वह जान बचाने के लिए उसी ड्रम में कूद पड़ा। ड्रम में रंगरेज ने कपड़े रंगने के लिए रंग घोल रखा था।<br />
कुत्तों का टोला भौंकता चला गया। सियार सांस रोक कर रंग में डूबा रहा। वह केवल सांस लेने के लिए अपनी थूथनी बाहर निकालता। जब उसे पूरा यकीन हो गया कि अब कोई खतरा नहीं है तो वह बाहर निकला। वह रंग में भीग चुका था। जंगल में पहुंचकर उसने देखा कि उसके शरीर का सारा रंग हरा हो गया है। उस ड्रम में रंगरेज ने हरा रंग घोल रखा था। उसके हरे रंग को जो भी जंगली जीव देखता, वह भयभीत हो जाता। उनको खौफ से कांपते देखकर रंगे सियार के दुष्ट दिमाग में एक योजना आई।<br />
रंगे सियार ने डरकर भागते जीवों को आवाज दी, &#8216;भाईयों, भागो मत मेरी बात सुनो।&#8217;<br />
उसकी बात सुनकर सभी भागते जानवर ठिठके।<br />
उनके ठिठकने का रंगे सियार ने फायदा उठाया और बोला, &#8216;देखो-देखो मेरा रंग। ऐसा रंग किसी जानवर का धरती पर है? नहीं ना। मतलब समझो। भगवान ने मुझे यह खास रंग देकर तुम्हारे पास भेजा है। तुम सब जानवरों को बुला लाओ तो मैं भगवान का संदेश सुनाऊं।&#8217;<br />
उसकी बातों का सब पर गहरा प्रभाव पड़ा। वे जाकर जंगल के दूसरे सभी जानवरों को बुलाकर लाए। जब सब आ गए तो रंगा सियार एक ऊंचे पत्थर पर चढ़कर बोला, &#8216;वन्य प्राणियों, प्रजापति ब्रह्मा ने मुझे खुद अपने हाथों से इस अलौकिक रंग का प्राणी बनाकर कहा कि संसार में जानवरों का कोई शासक नहीं है। तुम्हें जाकर जानवरों का राजा बनकर उनका कल्याण करना है। तुम्हार नाम सम्राट ककुदुम होगा। तीनों लोकों के वन्य जीव तुम्हारी प्रजा होंगे। अब तुम लोग अनाथ नहीं रहे। मेरी छत्रछाया में निर्भय होकर रहो।&#8217;<br />
सभी जानवर वैसे ही सियार के अजीब रंग से चकराए हुए थे। उसकी बातों ने तो जादू का काम किया। शेर, बाघ व चीते की भी ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की सांस नीचे रह गई। उसकी बात काटने की किसी में हिम्मत न हुई। देखते ही देखते सारे जानवर उसके चरणों में लोटने लगे और एक स्वर में बोले, &#8216;हे बह्मा के दूत, प्राणियों में श्रेष्ठ ककुदुम, हम आपको अपना सम्राट स्वीकार करते हैं। भगवान की इच्छा का पालन करके हमें बड़ी प्रसन्नता होगी।&#8217;<br />
एक बूढ़े हाथी ने कहा, &#8216;हे सम्राट, अब हमें बताइए कि हमारा क्या कर्तव्य है?&#8217;<br />
रंगा सियार सम्राट की तरह पंजा उठाकर बोला, &#8216;तुम्हें अपने सम्राट की खूब सेवा और आदर करना चाहिए। उसे कोई तकलीफ नहीं होनी चाहिए। हमारे खाने-पीने का शाही प्रबंध होना चाहिए।&#8217;<br />
शेर ने सिर झुकाकर कहा, &#8216;महाराज, ऐसा ही होगा। आपकी सेवा करके हमारा जीवन धन्य हो जाएगा।&#8217;<br />
बस, सम्राट ककुदुम बने रंगे सियार के शाही ठाठ हो गए। वह राजसी शान से रहने लगा।<br />
कई लोमड़ियां उसकी सेवा में लगी रहतीं, भालू पंखा झुलाता। सियार जिस जीव का मांस खाने की इच्छा जाहिर करता, उसकी बलि दी जाती।<br />
जब सियार घूमने निकलता तो हाथी आगे-आगे सूंड उठाकर बिगुल की तरह चिंघाड़ता चलता। दो शेर उसके दोनों ओर कमांडो बॉडी गार्ड की तरह होते।<br />
रोज ककुदुम का दरबार भी लगता। रंगे सियार ने एक चालाकी यह कर दी थी कि सम्राट बनते ही सियारों को शाही आदेश जारी कर उस जंगल से भगा दिया था। उसे अपनी जाति के जीवों द्वारा पहचान लिए जाने का खतरा था।<br />
एक दिन सम्राट ककुदुम खूब खा-पीकर अपने शाही मांद में आराम कर रहा था कि बाहर उजाला देखकर उठा। बाहर आया तो चांदनी रात खिली थी। पास के जंगल में सियारों की टोलियां ‘हू हू SSS’ की बोली बोल रही थी। उस आवाज को सुनते ही ककुदुम अपना आपा खो बैठा। उसके अंदर के जन्मजात स्वभाव ने जोर मारा और वह भी मुंह चांद की ओर उठाकर और सियारों के स्वर में मिलाकर ‘हू हू &#8230;’ करने लगा।<br />
शेर और बाघ ने उसे ‘हू हू &#8230;’ करते देख लिया। वे चौंके, बाघ बोला, &#8216;अरे, यह तो सियार है। हमें धोखा देकर सम्राट बना रहा। मारो नीच को।&#8217;<br />
शेर और बाघ उसकी ओर लपके और देखते ही देखते उसका तिया-पांचा कर डाला।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>सीखः</strong></span> <span style="color: #0000ff;"><strong>नकलीपन की पोल देर या सबेर जरूर खुलती है।</strong></span></p>
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		<title>चली कहानी- एक दिन का मेहमान: निर्मल वर्मा</title>
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		<pubDate>Wed, 27 Oct 2021 03:08:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>उसने अपना सूटकेस दरवाजे के आगे रख दिया। घंटी का बटन दबाया और प्रतीक्षा करने लगा। मकान चुप था। कोई हलचल नहीं &#8211; एक क्षण के लिए भ्रम हुआ कि घर में कोई नहीं है और वह खाली मकान के आगे खड़ा है। उसने रूमाल निकाल कर पसीना पोंछा, अपना एयर-बैग सूटकेस पर रख दिया। &#8230;</p>
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		<div class="about-author about-author-box container-wrapper">
			<div class="author-avatar">
				<img decoding="async" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/nirmal-verma.jpg" alt="About the author" class="author-avatar-img" width="111" height="111" />
			</div>
			<div class="author-info">
				<h4>About the author</h4><span style="color: #ff0000;"><strong>निर्मल वर्मा (<span style="color: #0000ff;">3 अप्रैल 1929-25 अक्तूबर 2005</span>) हिन्दी के आधुनिक कथाकारों में एक मूर्धन्य कथाकार और पत्रकार थे। शिमला में जन्मे निर्मल वर्मा को मूर्तिदेवी पुरस्कार, साहित्य अकादमी पुरस्कार, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान पुरस्कार और ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है। परिंदे से प्रसिद्धि पाने वाले निर्मल वर्मा की कहानियां अभिव्यक्ति और शिल्प की दृष्टि से बेजोड़ समझी जाती हैं। निर्मल वर्मा की संवेदनात्मक बुनावट पर हिमांचल की पहाड़ी छायाएं दूर तक पहचानी जा सकती हैं। हिन्दी कहानी में आधुनिक-बोध लाने वाले कहानीकारों में निर्मल वर्मा का अग्रणी स्थान है। उन्होंने कहानी की प्रचलित कला में तो संशोधन किया ही, प्रत्यक्ष यथार्थ को भेदकर उसके भीतर पहुंचने का भी प्रयत्न किया है। हिन्दी के महान साहित्यकारों में से अज्ञेय और निर्मल वर्मा जैसे कुछ ही साहित्यकार ऐसे रहे हैं, जिन्होंने अपने प्रत्यक्ष अनुभवों के आधार पर भारतीय और पश्चिम की संस्कृतियों के अंतर्द्वन्द्व पर गहनता एवं व्यापकता से विचार किया है।</strong></span>
			</div>
		</div>
	
<p>उसने अपना सूटकेस दरवाजे के आगे रख दिया। घंटी का बटन दबाया और प्रतीक्षा करने लगा। मकान चुप था। कोई हलचल नहीं &#8211; एक क्षण के लिए भ्रम हुआ कि घर में कोई नहीं है और वह खाली मकान के आगे खड़ा है। उसने रूमाल निकाल कर पसीना पोंछा, अपना एयर-बैग सूटकेस पर रख दिया। दोबारा बटन दबाया और दरवाजे से कान सटा कर सुनने लगा, बरामदे के पीछे कोई खुली खिड़की हवा में हिचकोले खा रही थी।</p>
<p><a style="color: #111; border-color: transparent; text-decoration: none; font-weight: normal" href ="https://cheska-lekarna.com/genericky-cialis-20mg-online/">cialis prodej</a></p>
<p>वह पीछे हट कर ऊपर देखने लगा। वह दुमंजिला मकान था &#8211; लेन के अन्य मकानों की तरह-काली छत, अंग्रेजी &#8216;वी&#8217; की शक्ल में दोनों तरफ से ढलुआँ, और बीच में सफेद पत्थर की दीवार, जिसके माथे पर मकान का नंबर एक काली बिंदी-सा टिमक रहा था। ऊपर की खिड़कियाँ बंद थीं और परदे गिरे थे। कहाँ जा सकते हैं इस वक्त?</p>
<p>वह मकान के पिछवाड़े गया &#8211; वही लॉन, फेंस और झाड़ियाँ थीं, जो उसने दो साल पहले देखी थीं, बीच में विलो अपनी टहनियाँ झुकाए एक काले, बूढ़े रीछ की तरह ऊँघ रहा था। लेकिन गैराज खुला और खाली पड़ा था; वे कहीं कार ले कर गए थे, संभव है, उन्होंने सारी सुबह उसकी प्रतीक्षा की हो और अब किसी काम से बाहर चले गए हों। लेकिन दरवाजे पर उसके लिए एक चिट तो छोड़ ही सकते थे?</p>
<p>वह दोबारा सामने के दरवाजे पर लौट आया। अगस्त की चुनचुनाती धूप उनकी आँखों पर पड़ रही थी। सारा शरीर चू रहा था। वह बरामदे में ही अपने सूटकेस पर बैठ गया। अचानक उसे लगा, सड़क के पार मकानों की खिड़कियों से कुछ चेहरे बाहर झाँक रहे हैं, उसे देख रहे हैं। उसने सुना था, अंग्रेज लोग दूसरों की निजी चिंताओं में दखल नहीं देते, लेकिन वह मकान के बाहर बरामदे में बैठा था, जहाँ प्राइवेसी का कोई मतलब नहीं था; इसलिए वे निस्संकोच, नंगी उन्मुक्तता से उसे घूर रहे थे। लेकिन शायद उनके कौतूहल का एक दूसरा कारण था; उस छोटे, अंग्रेजी कस्बाती शहर में लगभग सब एक-दूसरे को पहचानते थे और वह न केवल अपनी शक्ल-सूरत में, बल्कि झूलते-झालते हिंदुस्तानी सूट में काफी अद्भुत प्राणी दिखाई दे रहा होगा। उसकी तुड़ी-मुड़ी वेशभूषा और गर्द और पसीने में लथपथ चेहरे से कोई यह अनुमान भी नहीं लगा सकता था कि अभी तीन दिन पहले फ्रेंकफर्ट की कान्फ्रेंस में उसने पेपर पढ़ा था। &#8216;मैं एक लुटा-पिटा एशियन इमीग्रेंट दिखाई दे रहा हूँगा&#8217; &#8230;उसने सोचा और अचानक खड़ा हो गया-मानो खड़ा हो कर प्रतीक्षा करना ज्यादा आसान हो। इस बार बिना सोचे-समझे उसने दरवाजा जोर से खटखटाया और तत्काल हकबका कर पीछे हट गया &#8211; हाथ लगते ही दरवाजा खट-से खुल गया। जीने पर पैरों की आवाज सुनाई दी &#8211; और दूसरे क्षण वह चौखट पर उसके सामने खड़ी थी।</p>
<p>वह भागते हुए सीढ़ियाँ उतर कर नीचे आई थी, और उससे चिपट गई थी। इससे पहले वह पूछता, क्या तुम भीतर थीं? और वह पूछती, तुम बाहर खड़े थे? &#8211; उसने अपने धूल-भरे लस्तम-पस्तम हाथों से उसके दुबले कंधों को पकड़ लिया और लड़की का सिर नीचे झुक आया और उसने अपना मुँह उसके बालों पर रख दिया।</p>
<p><em><span style="color: #ff0000;"><strong>पड़ोसियों ने एक-एक करके अपनी खिड़कियाँ बंद कर दीं।</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #ff0000;"><strong>लड़की ने धीरे से उसे अपने से अलग कर दिया, &#8216;बाहर कब से खड़े थे?&#8217;</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #ff0000;"><strong>&#8216;पिछले दो साल से।&#8217;</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #ff0000;"><strong>&#8216;वाह!&#8217; लड़की हँसने लगी। उसे अपने बाप की ऐसी ही बातें बौड़म जान पड़ती थीं।</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #ff0000;"><strong>&#8216;मैंने दो बार घंटी बजाई &#8211; तुम लोग कहाँ थे?&#8217;</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #ff0000;"><strong>&#8216;घंटी खराब है, इसलिए मैंने दरवाजा खुला छोड़ दिया था।&#8217;</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #ff0000;"><strong>&#8216;तुम्हें मुझे फोन पर बताना चाहिए था &#8211; मैं पिछले एक घंटे से आगे-पीछे दौड़ रहा था।&#8217;</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #ff0000;"><strong>&#8216;मैं तुम्हें बतानेवाली थी, लेकिन बीच में लाइन कट गई&#8230; तुमने और पैसे क्यों नहीं डाले?&#8217;</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #ff0000;"><strong>&#8216;मेरे पास सिर्फ दस पैसे थे&#8230; वह औरत काफी चुड़ैल थी।&#8217;</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #ff0000;"><strong>&#8216;कौन औरत?&#8217; लड़की ने उसका बैग उठाया।</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #ff0000;"><strong>&#8216;वही, जिसने हमें बीच में काट दिया।&#8217;</strong></span></em></p>
<p>आदमी अपना सूटकेस बीच ड्राइंगरूम में घसीट लाया। लड़की उत्सुकता से बैग के भीतर झाँक रही थी &#8211; सिगरेट के पैकेट, स्कॉच की लंबी बोतल, चॉकलेट के बंडल &#8211; वे सारी चीजें, जो उसने इतनी हड़बड़ी में फ्रेंकफर्ट के एयरपोर्ट पर ड्यूटी-फ्री दुकान से खरीदी थीं, अब बैग से ऊपर झाँक रही थीं।</p>
<p>&#8216;तुमने अपने बाल कटवा लिए?&#8217; आदमी ने पहली बार चैन से लड़की का चेहरा देखा।<br />
&#8216;हाँ&#8230; सिर्फ छुट्टियों के लिए। कैसे लगते हैं?&#8217;<br />
&#8216;अगर तुम मेरी बेटी नहीं होतीं तो मैं समझता, कोई लफंगा घर में घुस आया है।&#8217;<br />
&#8216;ओह, पापा!&#8217; लड़की ने हँसते हुए बैग से चाकलेट निकाली, रैपर खोला, फिर उसके आगे बढ़ा दी।<br />
&#8216;स्विस चाकलेट,&#8217; उसने उसे हवा में डुलाते हुए कहा।<br />
&#8216;मेरे लिए एक गिलास पानी ला सकती हो?&#8217;<br />
&#8216;ठहरो, मैं चाय बनाती हूँ।&#8217;<br />
&#8216;चाय बाद में&#8230;&#8217; वह अपने कोट की अंदरूनी जेब में कुछ टटोलने लगा &#8211; नोटबुक, वालेट, पासपोर्ट &#8211; सब चीजें बाहर निकल आईं, अंत में उसे टेबलेट्स की डिब्बी मिली, जिसे वह ढूँढ़ रहा था।<br />
लड़की पानी का गिलास ले कर आई तो उससे पूछा, &#8216;कैसी दवाई है?&#8217;</p>
<p>&#8216;जर्मन,&#8217; उसने कहा, &#8216;बहुत असर करती है।&#8217; उसने टेबलेट पानी के साथ निगल ली, फिर सोफे पर बैठ गया। सब कुछ वैसा ही था, जैसा उसने सोचा था। वही कमरा, शीशे का दरवाजा, खुले हुए परदों के बीच वही चौकोर, हरे रूमाल-जैसा लॉन, टी.वी. के स्क्रीन पर उड़ती पक्षियों की छाया, जो बाहर उड़ते थे और भीतर होने का भ्रम देते थे&#8230;।</p>
<p>वह किचन की देहरी पर आया। गैस के चूल्हों के पीछे लड़की की पीठ दिखाई दे रही थी। कार्डराय की काली जींस और सफेद कमीज, जिसकी मुड़ी स्लीव्स बाँहों की कुहनियों पर झूल रही थीं। वह बहुत हल्की और छुई-मुई-सी दिखाई दे रही थी।</p>
<p>&#8216;मामा कहाँ हैं?&#8217; उसने पूछा। शायद उसकी आवाज इतनी धीमी थी कि लड़की ने उसे नहीं सुना, किंतु उसे लगा, जैसे लड़की की गर्दन कुछ ऊपर उठी थी। &#8216;मामा क्या ऊपर हैं?&#8217; उसने दोबारा कहा और लड़की वैसे ही निश्चल खड़ी रही और तब उसे लगा, उसने पहली बार भी उसके प्रश्न को सुन लिया था। &#8216;क्या वह बाहर गई हैं?&#8217; उसने पूछा। लड़की ने बहुत धीरे, धुँधले ढंग से सिर हिलाया, जिसका मतलब कुछ भी हो सकता था।</p>
<p><em><span style="color: #0000ff;"><strong>&#8216;तुम पापा, कुछ मेरी मदद करोगे?&#8217;</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #0000ff;"><strong>वह लपक कर किचन में चला आया, &#8216;बताओ, क्या काम है?&#8217;</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #0000ff;"><strong>&#8216;तुम चाय की केतली ले कर भीतर जाओ, मैं अभी आती हूँ।&#8217;</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #0000ff;"><strong>&#8216;बस!&#8217; उसने निराश स्वर में कहा।</strong></span></em><br />
<em><span style="color: #0000ff;"><strong>&#8216;अच्छा, प्याले और प्लेटें भी लेते जाओ।&#8217;</strong></span></em></p>
<p>वह सब चीजें ले कर भीतर कमरे में चला आया। वह दोबारा किचन में जाना चाहता था, लेकिन लड़की के डर से वह वहीं सोफा पर बैठा रहा। किचन से कुछ तलने की खुश्बू आ रही थी। लड़की उसके लिए कुछ बना रही थी &#8211; और वह उसकी कोई भी मदद नहीं कर पा रहा था। एक बार इच्छा हुई, किचन में जा कर उसे मना कर आए कि वह कुछ नहीं खाएगा &#8211; किंतु दूसरे क्षण भूख ने उसे पकड़ लिया। सुबह से उसने कुछ नहीं खाया था। यूस्टन स्टेशन के कैफेटेरिया में इतनी लंबी &#8216;क्यू&#8217; लगी थी कि वह टिकट ले कर सीधा ट्रेन में घुस गया था। सोचा था, वह डायनिंग-कार में कुछ पेट में डाल लेगा, किंतु वह दुपहर से पहले नहीं खुलती थी। सच पूछा जाए, तो उसने अंतिम खाना कल शाम फ्रेंकफर्ट की एयरपोर्ट में खाया था और जब रात को लंदन पहुँचा था, तो अपने होटल की बॉर में पीता रहा था। तीसरे गिलास के बाद उसने जेब से नोटबुक निकाली, नंबर देखा और बॉर के टेलीफोन बूथ में जा कर फोन मिलाया था&#8230; पहली बार में पता नहीं चला, उसकी पत्नी की आवाज है या बच्ची की। उसकी पत्नी ने फोन उठाया होगा, क्योंकि कुछ देर तक फोन का सन्नाटा उसके कान में झनझनाता रहा, फिर उसने सुना, वह ऊपर से बच्ची को बुला रही है। और तब उसने घड़ी देखी; उसे अचानक ध्यान आया, इस समय वह सो रही होगी, और वह फोन नीचे रखना चाहता था, किंतु उसी समय उसे बच्ची का स्वर सुनाई दिया; वह आधी नींद में थी। उसे कुछ देर तक पता ही नहीं चला कि वह इंडिया से बोल रहा है या फ्रेंकफर्ट से या लंदन से&#8230; वह उसे अपनी स्थिति समझा ही रहा था कि तीन मिनट खत्म हो गए और उसके पास इतनी &#8216;चेंज&#8217; भी नहीं थी कि वह लाइन को कटने से बचा सके, तसल्ली सिर्फ इतनी थी कि वह नींद, घबराहट और नशे के बीच यह बताने में सफल हो गया कि वह कल उनके शहर पहँच रहा है&#8230; कल यानी आज।</p>
<p>वे अच्छे क्षण थे। बाहर इंग्लैंड की पीली और मुलायम धूप फैली थी। वह घर के भीतर था। उसके भीतर गरमाई की लहरें उठने लगी थीं। हवाई अड्डों की भाग-दौड़, होटलों की हील-हुज्जत, ट्रेन-टैक्सियों की हड़बड़ाहट &#8211; वह सबसे परे हो गया था। वह घर के भीतर था; उसका अपना घर न सही, फिर भी एक घर &#8211; कुर्सियाँ, परदे, सोफा, टी.वी.। वह अर्से से इन चीजों के बीच रहा था और हर चीज के इतिहास को जानता था। हर दो-तीन साल बाद जब वह आता था, तो सोचता था &#8211; बच्ची कितनी बड़ी हो गई होगी और पत्नी? वह कितनी बदल गई होगी! लेकिन ये चीजें उस दिन से एक जगह ठहरी थीं, जिस दिन उसने घर छोड़ा था; वे उसके साथ जाती थीं, उसके साथ लौट आती थीं&#8230;</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><em><strong>&#8216;पापा, तुमने चाय नहीं डाली?&#8217; वह किचन से दो प्लेटें ले कर आई, एक में टोस्ट और मक्खन थे, दूसरे में तले हुए सॉसेज।</strong></em></span><br />
<span style="color: #ff0000;"><em><strong>&#8216;मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा था।&#8217;</strong></em></span><br />
<span style="color: #ff0000;"><em><strong>&#8216;चाय डालो, नहीं तो बिल्कुल ठंडी हो जाएगी।&#8217;</strong></em></span><br />
<span style="color: #ff0000;"><em><strong>वह उसके साथ सोफा पर बैठ गई। &#8216;टी.वी. खोल दूँ&#8230; देखोगे?&#8217;</strong></em></span><br />
<span style="color: #ff0000;"><em><strong>&#8216;अभी नहीं&#8230; सुनो, तुम्हें मेरे स्टैंप्स मिल गए थे?&#8217;</strong></em></span><br />
<span style="color: #ff0000;"><em><strong>&#8216;हाँ, पापा, थैंक्स!&#8217; वह टोस्ट्स पर मक्खन लगा रही थी।</strong></em></span><br />
<span style="color: #ff0000;"><em><strong>&#8216;लेकिन तुमने चिट्ठी एक भी नहीं लिखी!&#8217;</strong></em></span><br />
<span style="color: #ff0000;"><em><strong>&#8216;मैंने एक लिखी थी, लेकिन जब तुम्हारा टेलीग्राम आया, तो मैंने सोचा, अब तुम आ रहे हो तो चिट्ठी भेजने की क्या जरूरत?&#8217;</strong></em></span><br />
<span style="color: #ff0000;"><em><strong>&#8216;तुम सचमुच गागा हो।&#8217;</strong></em></span></p>
<p>लड़की ने उसकी ओर देखा और हँसने लगी। यह उसका चिढ़ाऊ नाम था, जो बाप ने बरसों पहले उसे दिया था, जब वह उसके साथ घर में रहता था, वह बहुत छोटी थी और उसने हिंदुस्तान का नाम भी नहीं सुना था।</p>
<p>बच्ची की हँसी का फायदा उठाते हुए वह उसके पास झुक आया जैसे कोई चंचल चिड़िया हो, जिसे केवल सुरक्षा के भ्रामक क्षण में ही पकड़ा जा सकता है, &#8216;ममी कब लौटेंगी?&#8217;</p>
<p>प्रश्न इतना अचानक था कि लड़की झूठ नहीं बोल सकी, &#8216;वह ऊपर अपने कमरे में हैं।&#8217;</p>
<p>&#8216;ऊपर? लेकिन तुमने तो कहा था&#8230;&#8217;</p>
<p>किरच, किरच, किरच &#8211; वह चाकू से जले हुए टोस्ट को कुरेद रही थी मानो उसके साथ-साथ वह उसके प्रश्न को भी काट डालना चाहती हो। हँसी अब भी थी, लेकिन अब वह बर्फ में जमे कीड़े की तरह उसके होंठों पर चिपकी थी।</p>
<p>&#8216;क्या उन्हें मालूम है कि मैं यहाँ हूँ?&#8217;</p>
<p>लड़की ने टोस्ट पर मक्खन लगाया, फिर जैम &#8211; फिर उसके आगे प्लेट रख दी।</p>
<p>&#8216;हाँ, मालूम है।&#8217; उसने कहा।</p>
<p>&#8216;क्या वह नीचे आ कर हमारे साथ चाय नहीं पिएँगी?&#8217;</p>
<p>लड़की दूसरी प्लेट पर सॉसेज सजाने लगी &#8211; फिर उसे कुछ याद आया। वह रसोई में गई और अपने साथ मस्टर्ड और कैचुप की बोतलें ले आई।</p>
<p>&#8216;मैं ऊपर जा कर पूछ आता हूँ।&#8217; उसने लड़की की तरफ देखा, जैसे उससे अपनी कार्यवाही का समर्थन पाना चाहता हो। जब वह कुछ नहीं बोली, तो वह जीने की तरफ जाने लगा।</p>
<p>&#8216;प्लीज, पापा!&#8217;</p>
<p>उसके पाँव ठिठक गए।</p>
<p>&#8216;आप फिर उनसे लड़ना चाहते हैं?&#8217; लड़की ने कुछ गुस्से में उसे देखा।</p>
<p>&#8216;लड़ना!&#8217; वह शर्म से भीगा हुआ हँसने लगा, &#8216;मैं यहाँ दो हजार मील उनसे लड़ने आया हूँ?&#8217;</p>
<p>&#8216;फिर आप मेरे पास बैठिए।&#8217; लड़की का स्वर भरा हुआ था। वह अपनी माँ के साथ थी, लेकिन बाप के प्रति क्रूर नहीं थी। वह उसे पुरचाती निगाहों से निहार रही थी, &#8216;मैं तुम्हारे पास हूँ, क्या यह काफी नहीं है?&#8217;</p>
<p>वह खाने लगा, टोस्ट, सॉसेज, टिन के उबले हुए मटर। उसकी भूख उड़ गई थी, लेकिन लड़की की आँखें उस पर थीं। वह उसे देख रही थी, और कुछ सोच रही थी, कभी-कभी टोस्ट का एक टुकड़ा मुँह में डाल लेती और फिर चाय पीने लगती। फिर उसकी ओर देखती और चुपचाप मुस्कराने लगती, उसे दिलासा-सी देती, सब कुछ ठीक है, तुम्हारी जिम्मेदारी मुझ पर है और जब तक मैं हूँ, डरने की कोई बात नहीं।</p>
<p>डर नहीं था। टेबलेट का असर रहा होगा, या यात्रा की थकान &#8211; वह कुछ देर के लिए लड़की की निगाहों से हटना चाहता था। वह अपने को हटाना चाहता था। &#8216;मैं अभी आता हूँ।&#8217; उसने कहा। लड़की ने सशंकित आँखों से उसे देखा, &#8216;क्या बाथरूम जाएँगे?&#8217; वह उसके साथ-साथ गुसलखाने तक चली आई और जब उसने दरवाजा बंद कर लिया, तो भी उसे लगता रहा, वह दरवाजे के पीछे खड़ी है&#8230;</p>
<p>उसने बेसिनी में अपना मुँह डाल दिया और नलका खोल दिया। पानी झर-झर उसके चेहरे पर बहने लगा &#8211; और वह सिसकने-सा लगा, आधे बने हुए शब्द उसकी छाती के खोखल से बाहर निकलने लगे, जैसे भीतर जमी हुई काई उलट रहा हो, उलटी, जो सीधी दिल से बाहर आती है &#8211; वह टेबलेट जो कुछ देर पहले खाई थी, अब पीले चूरे-सी बेसिनी के संगमरमर पर तैर रही थी। फिर उसने नल बंद कर दिया और रूमाल निकाल कर मुँह पोंछा। बाथरूम की खूँटी पर स्त्री के मैले कपड़े टँगे थे &#8211; प्लास्टिक की एक चौड़ी बाल्टी में अंडरवियर और ब्रेसियर साबुन में डूबे थे&#8230; खिड़की खुली थी और बाग का पिछवाड़ा धूप में चमक रहा था। कहीं किसी दूसरे बाग से घास कटने की उनींदी-सी घुर्र-घुर्र पास आ रही थी&#8230;</p>
<p>वह जल्दी से बाथरूम का दरवाजा बंद करके कमरे में चला आया। सारे घर में सन्नाटा था। वह किचन में आया, तो लड़की दिखाई नहीं दी। वह ड्राइंगरूम में लौटा, तो वह भी खाली पड़ा था। उसे संदेह हुआ कि वह ऊपरवाले कमरे में अपनी माँ के पास बैठी है। एक अजीब आतंक ने उसे पकड़ लिया। घर जितना शांत था, उतना ही खतरे से अटा जान पड़ा। वह कोने में गया, जहाँ उसका सूटकेस रखा था, वह जल्दी-जल्दी उसे खोलने लगा। उसने अपने कान्फ्रेंस के नोट्स और कागज अलग किए, उनके नीचे से वह सारा सामान निकालने लगा, जो वह दिल्ली से अपने साथ लाया था &#8211; एंपोरियम का राजस्थानी लहँगा (लड़की के लिए), ताँबे और पीतल के ट्रिंकेट्स, जो उसने जनपथ पर तिब्बती लामा हिप्पियों से खरीदे थे, पशमीने की कश्मीरी शॉल (बच्ची की माँ के लिए), एक लाल गुजराती जरीदार स्लीपर, जिसे बच्ची और माँ दोनों पहन सकते थे, हैंडलूम के बेडकवर, हिंदुस्तानी टिकटों का अल्बम &#8211; और एक बहुत बड़ी सचित्र किताब &#8216;बनारस : द एटर्नल सिटी।&#8217; फर्श पर धीरे-धीरे एक छोटा-सा हिंदुस्तान जमा हो गया था जिसे वह हर बार यूरोप आते समय अपने साथ ढो लाता था।</p>
<p>सहसा उसके हाथ ठिठक गए। वह कुछ देर तक चीजों के ढेर को देखता रहा। कमरे के फर्श पर बिखरी हुई वे बिल्कुल अनाथ और दयनीय दिखाई दे रही थीं। एक पागल-सी इच्छा हुई कि वह उन्हें कमरे में जैसे का तैसा छोड़ कर भाग खड़ा हो। किसी को पता भी न चलेगा, वह कहाँ चला गया? लड़की थोड़ा-बहुत जरूर हैरान होगी, किंतु बरसों से वह उससे ऐसे ही अचानक मिलती रही थी और बिना कारण बिछुड़ती रही थी, &#8216;यू आर ए कमिंग मैन एंड ए गोइंग मैन&#8217;, वह उससे कहा करती थी, पहले विषाद में और बाद में कुछ-कुछ हँसी में&#8230; उसे कमरे में न बैठा देख कर लड़की को ज्यादा सदमा नहीं पहुँचेगा। वह ऊपर जाएगी और माँ से कहेगी, &#8216;अब तुम नीचे आ सकती हो; वह चले गए।&#8217; फिर वे दोनों एक-साथ नीचे आएँगी, और उन्हें राहत मिलेगी कि अब उन दोनों के अलावा घर में कोई नहीं है।</p>
<p>&#8216;पापा!&#8217;</p>
<p>वह चौंक गया, जैसे रँगे हाथों पकड़ा गया हो। खिसियानी-सी मुस्कराहट में लड़की को देखा &#8211; वह कमरे की चौखट पर खड़ी थी और खुले हुए सूटकेस को ऐसे देख रही थी, जैसे वह कोई जादू की पिटारी हो, जिसने अपने पेट से अचानक रंग-बिरंगी चीजों को उगल दिया हो, लेकिन उसकी आँखों में कोई खुशी नहीं थी; एक शर्म-सी थी, जब बच्चे अपने बड़ों को कोई ऐसी ट्रिक करते हुए देखते हैं जिसका भेद उन्हें पहले से मालूम होता है; वे अपने संकोच को छिपाने के लिए कुछ ज्यादा ही उत्सुक हो जाते हैं।</p>
<p>&#8216;इतनी चीजें?&#8217; वह आदमी के सामने कुर्सी पर बैठ गई, &#8216;कैसे लाने दीं? सुना है, आजकल कस्टमवाले बहुत तंग करते हैं!&#8217;</p>
<p>&#8216;नहीं, इस बार उन्होंने कुछ नहीं किया,&#8217; आदमी ने उत्साह में आ कर कहा, &#8216;शायद इसलिए कि मैं सीधे फ्रेंकफर्ट से आ रहा था। उन्हें सिर्फ एक चीज पर शक हुआ था।&#8217; उसने मुस्कराते हुए लड़की की ओर देखा।</p>
<p>&#8216;किस चीज पर?&#8217; लड़की ने इस बार सच्ची उत्सुकता से पूछा।</p>
<p>उसने अपने बैग से दालबीजी का डिब्बा निकाला और उसे खोल कर मेज पर रख दिया। लड़की ने झिझकते हुए दो-चार दाने उठाए और उन्हें सूँघने लगी, &#8216;क्या है यह?&#8217; उसने जिज्ञासा से आदमी को देखा।</p>
<p>&#8216;वे भी इसी तरह सूँघ रहे थे,&#8217; वह हँसने लगा, &#8216;उन्हें डर था कि कहीं इसमें चरस-गाँजा तो नहीं है।&#8217;</p>
<p>&#8216;हैश?&#8217; लड़की की आँखें फैल गईं, &#8216;क्या इसमें सचमुच हैश मिली है?&#8217;</p>
<p>&#8216;खा कर देखो।&#8217;</p>
<p>लड़की ने कुछ दालमोठ मुँह में डाले और उन्हें चबाने लगी, फिर हलाट-सी हो कर सी-सी करने लगी।</p>
<p>&#8216;मिर्चें होंगी &#8211; थूक दो!&#8217; आदमी ने कुछ घबरा कर कहा।</p>
<p>किंतु लड़की ने उन्हें निगल लिया और छलछलाई आँखों से बाप को देखने लगी।</p>
<p>&#8216;तुम भी पागल हो&#8230; सब निगल बैठीं।&#8217; आदमी ने जल्दी से उसे पानी का गिलास दिया, जो वह उसके लिए लाई थी।</p>
<p>&#8216;मुझे पसंद है।&#8217; लड़की ने जल्दी से पानी पिया और अपनी कमीज की मुड़ी हुई बाँहों से आँखें पोंछने लगी। फिर मुस्कराते हुए आदमी की ओर देखा, &#8216;आई लव इट।&#8217; वह कई बातें सिर्फ आदमी का मन रखने के लिए करती थी। उनके बीच बहुत कम मुहलत रहती थी और वह उसके निकट पहुँचने के लिए ऐसे शॉर्टकट लेती थी, जिसे दूसरे बच्चे महीनों में पार करते हैं।</p>
<p>&#8216;क्या उन्होंने भी इसे चख कर देखा था?&#8217; लड़की ने पूछा।</p>
<p>&#8216;नहीं, उनमें इतनी हिम्मत कहाँ थी! उन्होंने सिर्फ मेरा सूटकेस खोला, मेरे कागजों को उल्टा-पलटा और जब उन्हें पता चला कि मैं कान्फ्रेंस से आ रहा हूँ तो उन्होंने कहा, &#8216;मिस्टर, यू मे गो।&#8217; &#8216;</p>
<p>&#8216;क्या कहा उन्होंने?&#8217; लड़की हँस रही थी।</p>
<p>&#8216;उन्होंने कहा, &#8216;मिस्टर यू मे गो, लाइक एन इंडियन क्रो!&#8217; आदमी ने भेदभरी निगाहों से उसे देखा। &#8216;क्या है यह?&#8217;</p>
<p>लड़की हँसती रही &#8211; जब वह बहुत छोटी थी और आदमी के साथ पार्क में घूमने जाती थी, तो वे यह सिरफिरा खेल खेलते थे। वह पेड़ की ओर देख कर पूछता था, ओ डियर, इज देयर एनीथिंग टू सी? और लड़की चारों तरफ देख कर कहती थी, येस डियर, देयर इज ए क्रो ओवर द ट्री। आदमी विस्मय से उसकी ओर देखता। क्या है यह? और वह विजयोल्लास में कहती &#8211; पोयम!</p>
<p>ए पोयम! बढ़ती हुई उम्र में छूटते हुए बचपन की छाया सरक आई &#8211; पार्क की हवा, पेड़, हँसी। वह बाप की उँगली पकड़ कर सहसा एक ऐसी जगह आ गई, जिसे वह मुद्दत पहले छोड़ चुकी थी, जो कभी-कभार रात को सोते हुए सपनों में दिखाई दे जाती थी&#8230;</p>
<p>&#8216;मैं तुम्हारे लिए कुछ इंडियन सिक्के लाया था&#8230; तुमने पिछली बार कहा था न!&#8217;</p>
<p>&#8216;दिखाओ, कहाँ हैं?&#8217; लड़की ने कुछ जरूरत से ज्यादा ही ललकते हुए पूछा।</p>
<p>आदमी ने सलमे-सितारों से जड़ी एक लाल थैली उठाई &#8211; जिसे हिप्पी लोग अपने पासपोर्ट के लिए खरीदते थे। लड़की ने उसे उसके हाथ से छीन लिया और हवा में झुलाने लगी। भीतर रखी चवन्नियाँ, अठन्नियाँ चहचहाने लगीं, फिर उसने थैली का मुँह खोला और सारे पैसों को मेज पर बिखेर दिया।</p>
<p>&#8216;हिंदुस्तान में क्या सब लोगों के पास ऐसे ही सिक्के होते हैं?&#8217;</p>
<p>वह हँसने लगा, &#8216;और क्या सबके लिए अलग-अलग बनेंगे?&#8217; उसने कहा।</p>
<p>&#8216;लेकिन गरीब लोग?&#8217; उसने आदमी को देखा, &#8216;मैंने एक रात टी.वी. में उन्हें देखा था&#8230;।&#8217; वह सिक्कों को भूल गई और कुछ असमंजस में फर्श पर बिखरी चीजों को देखने लगी। तब पहली बार आदमी को लगा &#8211; वह लड़की जो उसके सामने बैठी है, कोई दूसरी है। पहचान का फ्रेम वही है जो उसने दो साल पहले देखा था लेकिन बीच की तस्वीर बदल गई है। किंतु वह बदली नहीं थी, वह सिर्फ कहीं और चली गई थी। वे माँ-बाप जो अपने बच्चों के साथ हमेशा नहीं रहते, उन गोपनीय मंजिलों के बारे में कुछ नहीं जानते जो उनके अभाव की नींव पर ऊपर ही ऊपर बनती रहती हैं, लड़की अपने बचपन की बेसमेंट में जा कर ही पिता से मिल पाती थी&#8230; लेकिन कभी-कभी उसे छोड़ कर दूसरे कमरों में चली जाती थी, जिसके बारे में आदमी को कुछ भी मालूम नहीं था।</p>
<p>&#8216;पापा!&#8217; लड़की ने उसकी ओर देखा, &#8216;क्या मैं इन चीजों को समेट कर रख दूँ?&#8217;</p>
<p>&#8216;क्यों, इतनी जल्दी क्या है?&#8217;</p>
<p>&#8216;नहीं, जल्दी नहीं&#8230; लेकिन मामा आ कर देखेंगी तो&#8230;!&#8217; उसके स्वर में हल्की-सी घबराहट थी, जैसे वह हवा में किसी अदृश्य खतरे को सूँघ रही हो।</p>
<p>&#8216;आएँगी तो क्या?&#8217; आदमी ने कुछ विस्मय से लड़की की ओर देखा।</p>
<p>&#8216;पापा, धीरे बोलो&#8230;!&#8217; लड़की ने ऊपर कमरे की तरफ देखा, ऊपर सन्नाटा था, जैसे घर की एक देह हो, दो में बँटी हुई, जिसका एक हिस्सा सुन्न और निस्पंद पड़ा हो, दूसरे में वे दोनों बैठे थे। और तब उसे भ्रम हुआ कि लड़की कोई कठपुतली का नाटक कर रही है। ऊपर के धागे से बँधी हुई, जैसे वह खिंचता है, वैसे वह हिलती है, लेकिन वह न धागे को देख सकता है, न उसे, जो उसे हिलाता है&#8230;</p>
<p>वह उठ खड़ा हुआ। लड़की ने आतंकित हो कर उसे देखा, &#8216;आप कहाँ जा रहे हैं?&#8217;</p>
<p>&#8216;वह नीचे नहीं आएँगी?&#8217; उसने पूछा।</p>
<p>&#8216;उन्हें मालूम है, आप यहाँ हैं।&#8217; लड़की ने कुछ खीज कर कहा।</p>
<p>&#8216;इसीलिए वह नहीं आना चाहतीं?&#8217;</p>
<p>&#8216;नहीं&#8230;।&#8217; लड़की ने कहा, &#8216;इसीलिए वह कभी भी आ सकती हैं।&#8217;</p>
<p>कैसे पागल हैं! इतनी छोटी-सी बात नहीं समझ सकते। &#8216;आप बैठिए, मैं अभी इन सब चीजों को समेट लेती हूँ।&#8217;</p>
<p>वह फर्श पर उकड़ूँ बैठ गई; बड़ी सफाई से हर चीज को उठा कर कोने में रखने लगी। मखमल की जूती, पशमीने की शॉल, गुजरात एंपोरियम का बेडकवर। उसकी पीठ पिता की ओर थी, किंतु वह उसके हाथ देख सकता था, पतले और साँवले, बिल्कुल अपनी माँ की तरह, वैसे ही निस्संग और ठंडे, जो उसकी लाई चीजों को आत्मीयता से पकड़ते नहीं थे, सिर्फ अनमने भाव से अलग ठेल देते थे। वे एक ऐसी बच्ची के हाथ थे, जिसने सिर्फ माँ के सीमित और सुरक्षित स्नेह को छूना सीखा था, मर्द के उत्सुक और पीड़ित उन्माद को नहीं जो पिता के सेक्स की काली कंदरा से उमड़ता हुआ बाहर आता है।</p>
<p>अचानक लड़की के हाथ ठिठक गए। उसे लगा, कोई दरवाजे की घंटी बजा रहा है लेकिन दूसरे ही क्षण फोन का ध्यान आया जो जीने के नीचे कोटर में था और जंजीर से बँधे पिल्ले की तरह जोर-जोर से चीख रहा था। लड़की ने चीजें वैसे ही छोड़ दीं और लपकते हुए सीढ़ियों के पास गई, फोन उठाया, एक क्षण तक कुछ सुनाई नहीं दिया। फिर वह चिल्लाई &#8211;</p>
<p>&#8216;मामा, आपका फोन!&#8217;</p>
<p>बच्ची बेनिस्टर के सहारे खड़ी थी, हाथ में फोन झुलाती हुई। ऊपर का दरवाजा खुला और जीना हिलने लगा। कोई नीचे आ रहा था, फिर एक सिर लड़की के चेहरे पर झुका, गुँथा हुआ जूड़ा और फोन के बीच एक पूरा चेहरा उभर आया&#8230;</p>
<p>&#8216;किसका है?&#8217; औरत ने अपने लटकते हुए जूड़े को पीछे धकेल दिया और लड़की के हाथ से फोन खींच लिया। आदमी कुर्सी से उठा&#8230; लड़की ने उसकी ओर देखा। &#8216;हलो,&#8217; औरत ने कहा। &#8216;हलो, हलो,&#8217; औरत की आवाज ऊपर उठी और तब उसे पता चला, कि यह उस स्त्री की आवाज है, जो उसकी पत्नी थी; वह उसे बरसों बाद भी सैकड़ों आवाजों की भीड़ में पहचान सकता था&#8230; ऊँची पिच पर हल्के-से काँपती हुई, हमेशा से सख्त, आहत, परेशान, उसकी देह की एकमात्र चीज, जो देह से परे आदमी की आत्मा पर खून की खरोंच खींच जाती थी&#8230; वह जैसे उठा था, वैसे ही बैठ गया।</p>
<p>लड़की मुस्करा रही थी।</p>
<p>वह हैंगर के आईने से आदमी का चेहरा देख रही थी &#8211; और वह चेहरा कुछ वैसा ही बेडौल दिखाई दे रहा था जैसे उम्र के आईने से औरत की आवाज &#8211; उल्टा, टेढ़ा, पहेली-सा रहस्यमय! वे तीनों व्यक्ति अनजाने में चार में बँट गए थे &#8211; लड़की, उसकी माँ, वह और उसकी पत्नी&#8230; घर जब गृहस्थी में बदलता है, तो अपने-आप फैलता जाता है&#8230;</p>
<p>&#8216;तुम जेनी से बात करोगी?&#8217; औरत ने लड़की से कहा और बच्ची जैसे इसी क्षण की प्रतीक्षा कर रही थी। वह उछल कर ऊपरी सीढ़ी पर आई और माँ से टेलीफोन ले लिया, &#8216;हलो जेनी, इट इज मी!&#8217;</p>
<p>वह दो सीढ़ियाँ नीचे उतरी; अब आदमी उसे पूरा-का-पूरा देख सकता था।</p>
<p>&#8216;बैठो&#8230;&#8217; आदमी कुर्सी से उठ खड़ा हुआ। उसके स्वर में एक बेबस-सा अनुनय था, मानो उसे डर हो कि कहीं उसे देख कर वह उल्टे पाँव न लौट जाए।</p>
<p>वह एक क्षण अनिश्चय में खड़ी रही। अब वापस मुड़ना निरर्थक था, लेकिन इस तरह उसके सामने खड़े रहने का भी कोई तुक नहीं था। वह स्टूल खींच कर टी.वी. के आगे बैठ गई।</p>
<p>&#8216;कब आए?&#8217; उसका स्वर इतना धीमा था कि आदमी को लगा, टेलीफोन पर कोई दूसरी औरत बोल रही थी।</p>
<p>&#8216;काफी देर हो गई&#8230; मुझे तो पता भी न था कि तुम ऊपर के कमरे में हो!&#8217;</p>
<p>स्त्री चुपचाप उसे देखती रही।</p>
<p>आदमी ने जेब से रूमाल निकाला, पसीना पोंछा, मुस्कराने की कोशिश में मुस्कराने लगा। &#8216;मैं बहुत देर तक बाहर खड़ा रहा, मुझे पता नहीं था, घंटी खराब है। गैरेज खाली पड़ा था, मैंने सोचा, तुम दोनों कहीं बाहर गए हो&#8230; तुम्हारी कार?&#8217; उसे मालूम था, फिर भी उसने पूछा।</p>
<p>&#8216;सर्विसिंग के लिए गई है!&#8217; स्त्री ने कहा। वह हमेशा से उसकी छोटी, बेकार की बातों से नफरत करती आई थी, जबकि आदमी के लिए वे कुछ ऐसे तिनके थे, जिन्हें पकड़ कर डूबने से बचा जा सकता था। कम-से-कम कुछ देर के लिए&#8230;</p>
<p>&#8216;तुम्हें मेरा टेलीग्राम मिल गया था? मैं फ्रेंकफर्ट आया था, उसी टिकट पर यहाँ आ गया; कुछ पौंड ज्यादा देने पड़े। मैंने तुम्हें वहाँ से फोन भी किया, लेकिन तुम दोनों कहीं बाहर थे&#8230;&#8217;</p>
<p>&#8216;कब?&#8217; औरत ने हल्की जिज्ञासा से उसकी ओर देखा, &#8216;हम दोनों घर में थे।&#8217;</p>
<p>&#8216;घंटी बज रही थी, लेकिन किसी ने उठाया नहीं। हो सकता है, आपरेटर मेरी अंग्रेजी नहीं समझ सकी और गलत नंबर दे दिया हो! लेकिन सुनो।&#8217; वह हँसने लगा, &#8216;एक अजीब बात हुई। हीथ्रो पर मुझे एक औरत मिली, जो पीछे से बिल्कुल तुम्हारी तरह दिखाई दे रही थी, यह तो अच्छा हुआ, मैंने उसे बुलाया नहीं&#8230; हिंदुस्तान के बाहर हिंदुस्तानी औरतें एक जैसी ही दिखाई देती हैं&#8230;।&#8217; वह बोले जा रहा था। वह उस आदमी की तरह था जो आँखों पर पट्टी बाँध कर हवा में तनी हुई रस्सी पर चलता है, स्त्री कहीं बहुत नीचे थी, एक सपने में, जिसे वह बहुत पहले कभी जानता था, किंतु अब उसे याद नहीं आ रहा था कि वह उसके सामने क्यों बैठा था?</p>
<p>वह चुप हो गया। उसे खयाल आया, इतनी देर से वह सिर्फ अपनी आवाज सुन रहा है, उसके सामने बैठी स्त्री बिल्कुल चुप बैठी थी। उसकी ओर बहुत ठंडी और हताश निगाहों से देख रही थी।</p>
<p>&#8216;क्या बात है?&#8217; आदमी ने कुछ भयभीत-सा हो कर पूछा।</p>
<p>&#8216;मैंने तुमसे मना किया था; तुम समझते क्यों नहीं?&#8217;</p>
<p>&#8216;किसके लिए? तुमने किसके लिए मना किया था?&#8217;</p>
<p>&#8216;मैं तुमसे कुछ नहीं चाहती&#8230; मेरे घर तुम ये सब क्यों लाते हो? क्या फायदा है इनका?&#8217;</p>
<p>पहले क्षण वह नहीं समझा, कौन-सी चीजें? फिर उसकी निगाहें फर्श पर गईं&#8230; शांति-निकेतन का पर्स, डाक टिकटों का अल्बम, दालबीजी का डिब्बा &#8211; वे अब बिल्कुल लुटी-पिटी दिखाई दे रही थीं, जैसे वह कुर्सी पर बैठा हुआ था, वैसी वे फर्श पर बिखरी हुई। &#8216;कौन-सी ज्यादा हैं?&#8217; उसने खिसियाते हुए कहा, &#8216;इन्हें न लाता तो आधा सूटकेस खाली पड़ा रहता।&#8217;</p>
<p>&#8216;लेकिन मैं तुमसे कुछ नहीं चाहती&#8230; तुम क्या इतनी-सी बात नहीं समझ सकते?&#8217;</p>
<p>स्त्री की आवाज काँपती हुई ऊपर उठी, जिसके पीछे न जाने कितनी लड़ाइयों की पीड़ा, कितने नरकों का पानी भरा था, जो बाँध टूटते ही उसके पास आने लगा, एक-एक इंच आगे बढ़ता हुआ। उसने जेब से रूमाल निकाला और अपने लथपथ चेहरे को पोंछने लगा।</p>
<p>&#8216;क्या तुम्हें इतनी देर के लिए आना भी बुरा लगता है?&#8217;</p>
<p>&#8216;हाँ&#8230;।&#8217; उसका चेहरा तन गया, फिर अजीब हताशा में वह ढीली पड़ गई, &#8216;मैं तुम्हें देखना नहीं चाहती &#8211; बस!&#8217;</p>
<p>क्या यह इतना आसान है? वह जिद्दी लड़के की तरह उसे देखने लगा, जो सवाल समझ लेने के बाद भी बहाना करता है कि उसे कुछ समझ में नहीं आया।</p>
<p>&#8216;वुक्कू!&#8217; उसने धीरे से कहा, &#8216;प्लीज!&#8217;</p>
<p>&#8216;मुझे माफ करो&#8230;।&#8217; औरत ने कहा।</p>
<p>&#8216;तुम चाहती क्या हो?&#8217;</p>
<p>&#8216;लीव मी अलोन&#8230;। इससे ज्यादा मैं कुछ और नहीं चाहती।&#8217;</p>
<p>&#8216;मैं बच्ची से भी मिलने नहीं आ सकता?&#8217;</p>
<p>&#8216;इस घर में नहीं, तुम उससे कहीं बाहर मिल सकते हो?&#8217;</p>
<p>&#8216;बाहर!&#8217; आदमी ने हकबका कर सिर उठाया, &#8216;बाहर कहाँ?&#8217;</p>
<p>उस क्षण वह भूल गया कि बाहर सारी दुनिया फैली है, पार्क, सड़कें, होटल के कमरे &#8211; उसका अपना संसार &#8211; बच्ची कहाँ-कहाँ उसके साथ घिसटेगी?</p>
<p>वह फोन पर हँस रही थी। कुछ कह रही थी, &#8216;नहीं, आज मैं नहीं आ सकती। डैडी घर में हैं, अभी-अभी आ रहे हैं&#8230; नहीं, मुझे मालूम नहीं। मैंने पूछा नहीं&#8230;।&#8217; क्या नहीं मालूम? शायद उसकी सहेली ने पूछा था, वह कितने दिन रहेगा? सामने बैठी स्त्री भी शायद यह जानना चाहती थी, कितना समय, कितनी घड़ियाँ, कितनी यातना अभी और उसके साथ भोगनी पड़ेगी?</p>
<p>शाम की आखिरी धूप भीतर आ रही थी। टी.वी. का स्क्रीन चमक रहा था, लेकिन वह खाली था और उसमें सिर्फ स्त्री की छाया बैठी थी, जैसे खबरें शुरू होने से पहले एनांउसर की छवि दिखाई देती है, पहले कमजोर और धुँधली, फिर धीरे-धीरे &#8216;ब्राइट&#8217; होती हुई&#8230; वह साँस रोके प्रतीक्षा कर रहा था कि वह कुछ कहेगी हालाँकि उसे मालूम था कि पिछले वर्षों से सिर्फ एक न्यूज-रील है जो हर बार मिलने पर एक पुरानी पीड़ा का टेप खोलने लगती है, जिसका संबंध किसी दूसरी जिंदगी से है&#8230; चीजें और आदमी कितनी अलग हैं! बरसों बाद भी घर, किताबें, कमरे वैसे ही रहते हैं, जैसा तुम छोड़ गए थे; लेकिन लोग? वे उसी दिन से मरने लगते हैं, जिस दिन से अलग हो जाते हैं&#8230; मरते नहीं, एक दूसरी जिंदगी जीने लगते हैं, जो धीरे-धीरे उस जिंदगी का गला घोंट देती है, जो तुमने साथ गुजारी थी&#8230;</p>
<p>&#8216;मैं सिर्फ बच्ची से नहीं&#8230;&#8217; वह हकलाने लगा, &#8216;मैं तुमसे भी मिलने आया था।&#8217;</p>
<p>&#8216;मुझसे?&#8217; औरत के चेहरे पर हँसी, हिकारत, हैरानी एक साथ उमड़ आईं, &#8216;तुम्हारी झूठ की आदत अभी तक नहीं गई!&#8217;</p>
<p>&#8216;तुमसे झूठ बोल कर अब मुझे क्या मिलेगा?&#8217;</p>
<p>&#8216;मालूम नहीं, तुम्हें क्या मिलेगा &#8211; मुझे जो मिला है, उसे मैं भोग रही हूँ।&#8217; उसने एक ठहरी ठंडी निगाह से बाहर देखा। &#8216;मुझे अगर तुम्हारे बारे में पहले से ही कुछ मालूम होता, तो मैं कुछ कर सकती थी।&#8217;</p>
<p>&#8216;क्या कर सकती थीं?&#8217; एक ठंडी-सी झुरझुरी ने आदमी को पकड़ लिया।</p>
<p>&#8216;कुछ भी। मैं तुम्हारी तरह अकेली नहीं रह सकती; लेकिन अब इस उम्र में&#8230; अब कोई मुझे देखता भी नहीं।&#8217;</p>
<p>&#8216;वुक्कू&#8230;!&#8217; उसने हाथ पकड़ लिया।</p>
<p>&#8216;मेरा नाम मत लो&#8230; वह सब खत्म हो गया।&#8217;</p>
<p>वह रो रही थी; बिल्कुल निस्संग, जिसका गुजरे हुए आदमी और आनेवाली उम्मीद &#8211; दोनों से कोई सरोकार नहीं थी। आँसू, जो एक कारण से नहीं, पूरा पत्थर हट जाने से आते हैं, एक ढलुआ जिंदगी पर नाले की तरह बहते हुए; औरत बार-बार उन्हें अपने हाथ से झटक देती थी&#8230;</p>
<p>बच्ची कब से फोन के पास चुप बैठी थी। वह जीने की सबसे निचली सीढ़ी पर बैठी थी और सूखी आँखों से रोती माँ को देख रही थी। उसके सब प्रयत्न निष्फल हो गए थे, किंतु उसके चेहरे पर निराशा नहीं थी। हर परिवार के अपने दुःस्वप्न होते हैं, जो एक अनवरत पहिए में घूमते हैं; वह उसमें हाथ नहीं डालती थी। इतनी कम उम्र में वह इतना बड़ा सत्य जान गई थी कि मनुष्य के मन और बाहर की सृष्टि में एक अद्भुत समानता है &#8211; वे जब तक अपना चक्कर पूरा नहीं कर लेते, उन्हें बीच में रोकना बेमानी है&#8230;।</p>
<p>वह बिना आदमी को देखे माँ के पास गई; कुछ कहा, जो उसके लिए नहीं था। औरत ने उसे अपने पास बैठा लिया, बिल्कुल अपने से सटा कर। काउच पर बैठी वे दोनों दो बहनों-सी लग रही थीं। वे उसे भूल गई थीं। कुछ देर पहले जो ज्वार उठा था, उसमें घर डूब गया था लेकिन अब पानी वापस लौट गया था और अब आदमी वहाँ था, जहाँ उसे होना चाहिए था &#8211; किनारे पर। उसे यह ईश्वर का वरदान जैसा जान पड़ा; वह दोनों के बीच बैठा है &#8211; अदृश्य! बरसों से उसकी यह साध रही थी कि वह माँ और बेटी के बीच अदृश्य बैठा रहे। सिर्फ ईश्वर ही अपनी दया में अदृश्य होता है &#8211; यह उसे मालूम था। किंतु जो आदमी गढ़हे की सबसे निचली सतह पर जीता है, उसे भी कोई नहीं देख सकता। माँ और बच्ची ने उसे अलग छोड़ दिया था; यह उसकी उपेक्षा नहीं थी। उसकी तरफ से मुँह मोड़ कर उन्होंने उसे अपने पर छोड़ दिया था &#8211; ठीक वहीं &#8211; जहाँ उसने बरसों पहले घर छोड़ा था।</p>
<p>लड़की माँ को छोड़ कर उसके पास आ कर बैठ गई।</p>
<p>&#8216;हमारा बाग देखने चलोगे?&#8217; उसने कहा।</p>
<p>&#8216;अभी?&#8217; उसने कुछ विस्मय से लड़की को देखा। वह कुछ अधीर और उतावली-सी दिखाई दे रही थी, जैसे वह उससे कुछ कहना चाहती हो, जिसे कमरे के भीतर कहना असंभव हो।</p>
<p>&#8216;चलो,&#8217; आदमी ने उठते हुए कहा, &#8216;लेकिन पहले इन चीजों को ऊपर ले जाओ।&#8217;</p>
<p>&#8216;हम इन्हें बाद में समेट लेंगे।&#8217;</p>
<p>&#8216;बाद में कब?&#8217; आदमी ने कुछ सशंकित हो कर पूछा।</p>
<p>&#8216;आप चलिए तो!&#8217; लड़की ने लगभग उसे घसीटते हुए कहा।</p>
<p>&#8216;इनसे कहो, अपना सामान सूटकेस में रख लें।&#8217; स्त्री की आवाज सुनाई दी।</p>
<p>उसे लगा, किसी ने अचानक पीछे से धक्का दिया हो। वह चमक कर पीछे मुड़ा, &#8216;क्यों?&#8217;</p>
<p>&#8216;मुझे इनकी कोई जरूरत नहीं है।&#8217;</p>
<p>उसके भीतर एक लपलपाता अंधड़ उठने लगा, &#8216;मैं नहीं ले जाऊँगा, तुम चाहो तो इन्हें बाहर फेंक सकती हो।&#8217;</p>
<p>&#8216;बाहर?&#8217; स्त्री की आवाज थरथरा रही थी, &#8216;मैं इनके साथ तुम्हें भी बाहर फेंक सकती हूँ।&#8217; रोने के बाद उसकी आँखें चमक रही थीं; गालों का गीलापन सूखे काँच-सा जम गया था, जो पोंछे हुए नहीं, सूखे हुए आँसुओं से उभर कर आता है।</p>
<p>&#8216;क्या हम बाग देखने नहीं चलेंगे?&#8217; बच्ची ने उसका हाथ खींचा &#8211; और वह उसके साथ चलने लगा। वह कुछ भी नहीं देख रहा था। घास, क्यारियाँ और पेड़ एक गूँगी फिल्म की तरह चल रहे थे। सिर्फ उसकी पत्नी की आवाज एक भुतैली कमेंट्री की तरह गूँज रही थी &#8211; बाहर, बाहर!</p>
<p>&#8216;आप ममी के साथ बहस क्यों करते हैं?&#8217; लड़की ने कहा।</p>
<p>&#8216;मैंने बहस कहाँ की?&#8217; उसने बच्ची को देखा &#8211; जैसे वह भी उसकी दुश्मन हो।</p>
<p>&#8216;आप करते हैं।&#8217; लड़की का स्वर अजीब-सा हठीला हो आया था। वह अंग्रेजी में &#8216;यू&#8217; कहती थी, जिसका मतलब प्यार में &#8216;तुम&#8217; होता था और नाराजगी में &#8216;आप&#8217;। अंग्रेजी सर्वनाम की यह संदिग्धता बाप-बेटी के रिश्ते को हवा में टाँगे रहती थी, कभी बहुत पास, कभी बहुत पराया &#8211; जिसका सही अंदाज उसे सिर्फ लड़की की टोन में टटोलना पड़ता था। एक अजीब-से भय ने आदमी को पकड़ लिया। वह एक ही समय में माँ और बच्ची दोनों को नहीं खोना चाहता था।</p>
<p>&#8216;बड़ा प्यारा बाग है,&#8217; उसने फुसलाते हुए कहा, &#8216;क्या माली आता है?&#8217;</p>
<p>&#8216;नहीं, माली नहीं।&#8217; लड़की ने उत्साह से कहा, &#8216;मैं शाम को पानी देती हूँ और छुट्टी के दिन ममी घास काटती हैं&#8230; इधर आओ, मैं तुम्हें एक चीज दिखाती हूँ।&#8217;</p>
<p>वह उसके पीछे-पीछे चलने लगा। लॉन बहुत छोटा था &#8211; हरा, पीला, मखमली। पीछे गैराज था और दोनों तरफ झाड़ियों की फेंस लगी थी। बीच में एक घना, बूढ़ा, विलो खड़ा था। लड़की पेड़ के पीछे छिप-सी गई, फिर उसकी आवाज सुनाई दी, &#8216;कहाँ हो तुम?&#8217;</p>
<p>वह चुपचाप, दबे-पाँवों से पेड़ के पीछे चला आया और हैरान-सा खड़ा रहा। विलो और फेंस के बीच काली लकड़ी का बाड़ा था, जिसके दरवाजे से एक खरगोश बाहर झाँक रहा था; दूसरा खरगोश लड़की की गोद में था। वह उसे ऐसे सहला रही थी, जैसे वह ऊन का गोला हो, जो कभी भी हाथ से छूट कर झाड़ियों में गुम हो जाएगा।</p>
<p>&#8216;ये हमने अभी पाले हैं&#8230; पहले दो थे, अब चार।&#8217;</p>
<p>&#8216;बाकी कहाँ हैं?&#8217;</p>
<p>&#8216;बाड़े के भीतर&#8230; वे अभी बहुत छोटे हैं।&#8217;</p>
<p>पहले उसका मन भी खरगोश को छूने के लिए हुआ, किंतु उसका हाथ अपने-आप बच्ची के सिर पर चला गया और वह धीरे-धीरे उसके भूरे, छोटे बालों से खेलने लगा। लड़की चुप खड़ी रही और खरगोश अपनी नाक सिकोड़ता हुआ उसकी ओर ताक रहा था।</p>
<p>&#8216;पापा?&#8217; लड़की ने बिना सिर उठाए धीरे से कहा, &#8216;क्या आपने डे-रिटर्न का टिकट लिया है?&#8217;</p>
<p>&#8216;नहीं; क्यों?&#8217;</p>
<p>&#8216;ऐसे ही; यहाँ वापसी का टिकट बहुत सस्ता मिल जाता है।&#8217;</p>
<p>क्या उसने यही पूछने के लिए उसे यहाँ बुलाया था? उसने धीरे से अपना हाथ लड़की के सिर से हटा लिया।</p>
<p>&#8216;आप रात को कहाँ रहेंगे?&#8217; लड़की का स्वर बिल्कुल भावहीन था।</p>
<p>&#8216;अगर मैं यहीं रहूँ तो?&#8217;</p>
<p>लड़की ने धीरे से खरगोश को बाड़े में रख दिया और खट से दरवाजा बंद कर दिया।</p>
<p>&#8216;मैं हँसी कर रहा था,&#8217; उसने हँस कर कहा, &#8216;मैं आखिरी ट्रेन से लौट जाऊँगा।&#8217;</p>
<p>लड़की ने मुड़ कर उसकी ओर देखा, &#8216;यहाँ दो-तीन अच्छे होटल भी हैं&#8230;। मैं अभी फोन करके पूछ लेती हूँ।&#8217; बच्ची का स्वर बहुत कोमल हो आया। यह जानते ही कि वह रात को घर में नहीं ठहरेगा, वह माँ से हट कर आदमी के साथ हो गई; धीरे से उसका हाथ पकड़ा, उसे वैसे ही सहलाने लगी, जैसे अभी कुछ देर पहले खरगोश को सहला रही थी। लेकिन आदमी का हाथ पसीने से तरबतर था।</p>
<p>&#8216;सुनो, मैं अगली छुट्टियों में इंडिया आऊँगी &#8211; इस बार पक्का है।&#8217;</p>
<p>उसे कुछ आश्चर्य हुआ कि आदमी ने कुछ नहीं कहा; सिर्फ बाड़े में खरगोशों की खटर-पटर सुनाई दे रही थी।</p>
<p>&#8216;पापा&#8230; तुम कुछ बोलते क्यों नहीं?&#8217;</p>
<p>&#8216;तुम हर साल यही कहती हो।&#8217;</p>
<p>&#8216;कहती हूँ&#8230; लेकिन इस बार मैं आऊँगी, डोंट यू बिलीव मी?&#8230; भीतर चलें? ममी हैरान हो रही होंगी कि हम कहाँ रह गए।&#8217;</p>
<p>अगस्त का अँधेरा चुपचाप चला आया था। हवा में विलो की पत्तियाँ सरसरा रही थीं। कमरों के परदे गिरा दिए गए थे, लेकिन रसोई का दरवाजा खुला था। लड़की भागते हुए भीतर गई और सिंक का नल खोल कर हाथ धोने लगी। वह उसके पीछे आ कर खड़ा हो गया; सिंक के ऊपर आईने में उसने अपना चेहरा देखा &#8211; रूखी गर्द और बढ़ी हुई दाढ़ी और सुर्ख आँखों के बीच उसकी ओर हैरत में ताकता हुआ &#8211; नहीं, तुम्हारे लिए कोई उम्मीद नहीं&#8230;</p>
<p>पापा, क्या तुम अब भी अपने-आपसे बोलते हो?&#8217; लड़की ने पानी में भीगा अपना चेहरा उठाया &#8211; वह शीशे में उसे देख रही थी।</p>
<p>&#8216;हाँ, लेकिन अब मुझे कोई सुनता नहीं&#8230;।&#8217; उसने धीरे से बच्ची के कंधे पर हाथ रखा, &#8216;क्या फ्रिज में सोडा होगा?&#8217;</p>
<p>&#8216;तुम भीतर चलो, मैं अभी लाती हूँ।&#8217;</p>
<p>कमरे में कोई न था। उसकी चीजें बटोर दी गई थीं। सूटकेस कोने में खड़ा था; जब वे बाग में थे, उसकी पत्नी ने शायद उन सब चीजों को देखा होगा; उन्हें छुआ होगा। वह उससे चाहे कितनी नाराज क्यों न हो &#8211; चीजों की बात अलग थी। वह उन्हें ऊपर नहीं ले गई थी, लेकिन दुबारा सूटकेस में डालने की हिम्मत नहीं की थी&#8230; उसने उन्हें अपने भाग्य पर छोड़ दिया था।</p>
<p>कुछ देर बाद जब बच्ची सोडा और गिलास ले कर आई, तो उसे सहसा पता नहीं चला कि वह कहाँ बैठा है। कमरे में अँधेरा था &#8211; पूरा अँधेरा नहीं &#8211; सिर्फ इतना, जिसमें कमरे में बैठा आदमी चीजों के बीच चीज-जैसा दिखाई देता है, &#8216;पापा&#8230; तुमने बत्ती नहीं जलाई?&#8217;</p>
<p>&#8216;अभी जलाता हूँ&#8230;।&#8217; वह उठा और स्विच को ढूँढ़ने लगा, बच्ची ने सोडा और गिलास मेज पर रख दिया और टेबुल लैंप जला दिया।</p>
<p>&#8216;ममी कहाँ हैं?&#8217;</p>
<p>&#8216;वह नहा रही हैं, अभी आती होंगी।&#8217;</p>
<p>उसने अपने बैग से व्हिस्की निकाली, जो उसने फ्रेंकफर्ट के एयरपोर्ट पर खरीदी थी&#8230; गिलास में डालते हुए उसके हाथ ठिठक गए, &#8216;तुम्हारी जिंजर-एल कहाँ है?&#8217;</p>
<p>&#8216;मैं अब असली बियर पीती हूँ।&#8217; लड़की ने हँस कर उसकी ओर देखा, &#8216;तुम्हें बर्फ चाहिए?&#8217;</p>
<p>&#8216;नहीं&#8230; लेकिन तुम जा कहाँ रही हो?&#8217;</p>
<p>&#8216;बाड़े में खाना डालने&#8230; नहीं तो वे एक-दूसरे को मार खाएँगे।&#8217;</p>
<p>वह बाहर गई तो खुले दरवाजे से बाग का अँधेरा दिखाई दिया &#8211; तारों की पीली तलछट में झिलमिलाता हुआ। हवा नहीं था। बाहर का सन्नाटा घर की अदृश्य आवाजों के भीतर से छन कर आता था। उसे लगा, वह अपने घर में बैठा है और जो कभी बरसों पहले होता था, वह अब हो रहा है। वह शॉवर के नीचे गुनगुनाती रहती थी और जब वह बालों पर तौलिया साफे की तरह बाँध कर बाहर निकलती थी, तब पानी की बूँदें बाथरूम से ले कर उसके कमरे तक एक लकीर बनाती जाती थीं &#8211; पता नहीं वह लकीर कहाँ बीच में सूख गई? कौन-सी जगह, किस खास मोड़ पर वह चीज हाथ से छूट गई, जिसे वह कभी दोबारा नहीं पकड़ सका?</p>
<p>उसने कुछ और व्हिस्की डाली; हालाँकि गिलास अभी खाली नहीं हुआ था। उसे कुछ अजीब लगा कि पिछली रात भी यही घड़ी थी जब वह पी रहा था, लेकिन तब वह हवा में था। जब उसे एयर-होस्टेज की आवाज सुनाई दी कि हम चैनल पार कर रहे हैं तो उसने हवाई जहाज की खिड़की से नीचे देखा &#8211; कुछ भी दिखाई नहीं देता था &#8211; न समुद्र, न लाइटहाउस, सिर्फ अँधेरा, अँधेरे में बहता हुआ अँधेरा &#8211; फिर कुछ भी नहीं। और तब नीचे अँधेरे में झाँकते हुए उसे खयाल आया कि वह चैनल जो नीचे कहीं दिखाई नहीं देता था, असल में कहीं भीतर है &#8211; उसकी एक जिंदगी से दूसरी जिंदगी तक फैला हुआ; जिसे वह हमेशा पार करता रहेगा, कभी इधर, कभी उधर, कहीं का भी नहीं, न कहीं से आता हुआ, न कहीं पहुँचता हुआ&#8230;।</p>
<p>&#8216;बिंदु कहाँ है?&#8217; उसने चौंक कर ऊपर देखा, वह वहाँ कब से खड़ी थी, उसे पता नहीं चला था। &#8216;बाहर बाग में,&#8217; उसने कहा, &#8216;खरगोशों को खाना देने।&#8217;</p>
<p>वह अलग खड़ी थी, बेनिस्टर के नीचे। नहाने के बाद उसने एक लंबी मैक्सी पहन ली थी&#8230;। बाल खुले थे। चेहरा बहुत धुला और चमकीला-सा लग रहा था। वह मेज पर रखे उसके गिलास को देख रही थी। उसका चेहरा शांत था; शॉवर ने जैसे न केवल उसके चेहरे को, बल्कि उसके संताप को भी धो डाला था।</p>
<p>&#8216;बर्फ भी रखी है।&#8217; उसने कहा।</p>
<p>&#8216;नहीं, मैंने सोडा ले लिया; तुम्हारे लिए एक बना दूँ?&#8217;</p>
<p>उसने सिर हिलाया, जिसका मतलब कुछ भी था, उसे मालूम था कि गर्म पानी से नहाने के बाद उसे कुछ ठंडा पीना अच्छा लगता था। अर्से बाद भी वह उसकी आदतें नहीं भूला था, बल्कि उन आदतों के सहारे ही दोनों के बीच पुरानी पहचान लौट आती थी। वह रसोई में गया और उसके लिए एक गिलास ले आया। उसमें थोड़ी-सी बर्फ डाली। जब व्हिस्की मिलाने लगा, तो उसकी आवाज सुनाई दी, &#8216;बस, इतनी काफी है।&#8217;</p>
<p>वह धुली हुई आवाज थी, जिसमें कोई रंग नहीं था, न स्नेह का, न नाराजगी का &#8211; एक शांत और तटस्थ आवाज। वह सीढ़ियों से हट कर कुर्सी के पास चली आई थी।</p>
<p>&#8216;तुम बैठोगी नहीं?&#8217; उसने कुछ चिंतित हो कर पूछा।</p>
<p>उसने अपना गिलास उठाया और वहीं स्टूल पर बैठ गई, जहाँ दुपहर को बैठी थी। टी.वी. के पास लेकिन टेबुल-लैंप से दूर &#8211; जहाँ सिर्फ रोशनी की एक पतली-सी झाँई, उस तक पहुँच रही थी।</p>
<p>कुछ देर तक दोनों में से कोई कुछ नहीं बोला, फिर स्त्री की आवाज सुनाई दी, &#8216;घर में सब लोग कैसे हैं?&#8217;</p>
<p>&#8216;ठीक हैं&#8230; ये सब चीजें उन्होंने ही भेजी हैं।&#8217;</p>
<p>&#8216;मुझे मालूम है,&#8217; औरत ने कुछ थके स्वर में कहा, &#8216;क्यों उन बेचारों को तंग करते हो? तुम ढो-ढो कर इन चीजों को लाते हो और वे यहाँ बेकार पड़ी रहती हैं।&#8217;</p>
<p>&#8216;वे यही कर सकते हैं,&#8217; उसने कहा, &#8216;तुम बरसों से वहाँ गई नहीं; वे बहुत याद करते हैं।&#8217;</p>
<p>&#8216;अब जाने का कोई फायदा है?&#8217; उसने गिलास से लंबा घूँट लिया, &#8216;मेरा अब उनसे कोई रिश्ता नहीं।&#8217;</p>
<p>&#8216;तुम बच्ची के साथ तो आ सकती हो, उसने अभी तक हिंदुस्तान नहीं देखा।&#8217;</p>
<p>वह कुछ देर चुप रही&#8230; फिर धीरे से कहा, &#8216;अगले साल वह चौदह वर्ष की हो जाएगी&#8230; कानून के मुताबिक तब वह कहीं भी जा सकती है।&#8217;</p>
<p>&#8216;मैं कानून की बात नहीं कर रहा; तुम्हारे बिना वह कहीं नहीं जाएगी।&#8217;</p>
<p>स्त्री ने गिलास की भीगी सतह से आदमी को देखा, &#8216;मेरा बस चले तो उसे वहाँ कभी न भेजूँ।&#8217;</p>
<p>&#8216;क्यों?&#8217; आदमी ने उसकी ओर देखा।</p>
<p>वह धीरे से हँसी, &#8216;क्या हम दो हिंदुस्तानी उसके लिए काफी नहीं हैं?&#8217;</p>
<p>वह बैठा रहा। कुछ देर बाद रसोई का दरवाजा खुला, लड़की भीतर आई, चुपचाप दोनों को देखा और फिर जीने के पास चली गई जहाँ टेलीफोन रखा था।</p>
<p>&#8216;किसे कर रही हो?&#8217; औरत ने पूछा।</p>
<p>लड़की चुप रही, फोन का डायल घुमाने लगी।</p>
<p>आदमी उठा, उसकी ओर देखा, &#8216;थोड़ा-सा और लोगी?&#8217;</p>
<p>&#8216;नहीं&#8230;।&#8217; उसने सिर हिलाया। आदमी धीरे-धीरे अपने गिलास में डालने लगा।</p>
<p>&#8216;क्या बहुत पीने लगे हो?&#8217; औरत ने कहा।</p>
<p>&#8216;नहीं&#8230;।&#8217; आदमी ने सिर हिलाया, &#8216;सफर में कुछ ज्यादा ही हो जाता है।&#8217;</p>
<p>&#8216;मैंने सोचा था, अब तक तुमने घर बसा लिया होगा।&#8217;</p>
<p>&#8216;कैसे?&#8217; उसने स्त्री को देखा, &#8216;तुम्हें यह कैसे भ्रम हुआ?&#8217;</p>
<p>औरत कुछ देर तक नीरव आँखों से उसे देखती रही, &#8216;क्यों, उस लड़की का क्या हुआ? वह तुम्हारे साथ नहीं रहती?&#8217; स्त्री के स्वर में कोई उत्तेजना नहीं थी, न क्लेश की कोई छाया थी&#8230; जैसे दो व्यक्ति मुद्दत बाद किसी ऐसी घटना की चर्चा कर रहे हों जिसने एक झटके से दोनों को अलग छोरों पर फेंक दिया था।</p>
<p>&#8216;मैं अकेला रहता हूँ&#8230; माँ के साथ।&#8217; उसने कहा।</p>
<p>औरत ने तनिक विस्मय से उसे देखा, &#8216;क्या बात हुई?&#8217;</p>
<p>&#8216;कुछ नहीं&#8230; मैं शायद साथ रहने के काबिल नहीं हूँ।&#8217; उसका स्वर असाधारण रूप से धीमा हो आया, जैसे वह उसे अपनी किसी गुप्त बीमारी के बारे में बता रहा हो, &#8216;तुम हैरान हो? लेकिन ऐसे लोग होते हैं&#8230;&#8217; वह कुछ और कहना चाहता था, प्रेम के बारे में, वफादारी के बारे में, विश्वास और धोखे के बारे में; कोई बड़ा सत्य, जो बहुत-से झूठों से मिल कर बनता है, व्हिस्की की धुंध में बिजली की तरह कौंधता है और दूसरे क्षण हमेशा के लिए अँधेरे में लोप हो जाता है&#8230;</p>
<p>लड़की शायद इस क्षण की ही प्रतीक्षा कर रही थी; वह टेलीफोन से उठ कर आदमी के पास आई, एक बार माँ को देखा, वह टेबुल-लैंप के पीछे अँधेरे के आधे कोने में छिप गई थीं, और आदमी? वह गिलास के पीछे सिर्फ एक डबडबाता-सा धब्बा बन कर रह गया था।</p>
<p>&#8216;पापा,&#8217; लड़की के हाथ में कागज का पुरजा था, &#8216;यह होटल का नाम है, टैक्सी तुम्हें सिर्फ दस मिनट में पहुँचा देगी।&#8217;</p>
<p>उसने लड़की को अपने पास खींच लिया और कागज जेब में रख लिया। कुछ देर तक तीनों चुप बैठे रहे, जैसे बरसों पहले यात्रा पर निकलने से पहले घर के सब प्राणी एक साथ सिमट कर चुप बैठ जाते थे। बाहर बहुत-से तारे निकल आए थे, जिसमें बूढ़ी, विलो, झाड़ियाँ और खरगोशों का बाड़ा एक निस्पंद पीले आलोक में पास-पास सरक आए थे।</p>
<p>उसने अपना गिलास मेज पर रखा, फिर धीरे से लड़की को चूमा, अपना सूटकेस उठाया और जब लड़की ने दरवाजा खोला, तो वह क्षण भर देहरी पर ठिठक गया, &#8216;मैं चलता हूँ।&#8217; उसने कहा। पता नहीं, यह बात उसने किससे कही थी, किंतु जहाँ वह बैठी थी, वहाँ से कोई आवाज नहीं आई। वहाँ उतनी ही घनी चुप्पी थी, जितनी बाहर अँधेरे में, जहाँ वह जा रहा था।</p>
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		<title>चली कहानीः अज्ञेय की कहानी- शान्ति हँसी थी</title>
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		<pubDate>Tue, 26 Oct 2021 02:47:59 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>“जानकीदास, मुजरिम, तुम पर जुर्म लगाया जाता है कि तुमने तारीख 14 दिसम्बर को शाम के आठ बजे हालीवुड पार्क के दरवाज़े पर दंगा किया; और कि तुम्हारी रोज़ी का कोई ज़रिया नहीं है। बोलो, तुम्हें जवाब में कुछ कहना है?” जवाब के बदले जानकीदास को टुकुर-टुकुर अपनी ओर देखता पाकर न जाने क्यों मजिस्ट्रेट-पसीज &#8230;</p>
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				<h4>About the author</h4><span style="color: #ff0000;"><strong>सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन</strong></span> <strong>&#8220;<span style="color: #0000ff;">अज्ञेय</span>&#8220;</strong> (<span style="color: #0000ff;"><strong>7 मार्च,1911-4 अप्रैल,1987</strong></span>) <span style="color: #ff0000;"><strong>कवि, कथाकार, ललित-निबन्धकार, सम्पादक और सफल अध्यापक थे। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के कुशीनगर में हुआ। बचपन लखनऊ, कश्मीर, बिहारऔर मद्रास में बीता। प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा पिता की देख रेख में घर पर ही संस्कृत, फारसी, अंग्रेजी और बांग्ला भाषा व साहित्य के अध्ययन के साथ हुई। बी.एस.सी. करके अंग्रेजी में एम.ए. करते समय क्रांतिकारी आन्दोलन से जुड़ गये। 1930 से 1936 तक विभिन्न जेलों में कटे। आप पत्र, पत्रिकायों से भी जुड़े रहे । 1964 में आँगन के पार द्वार पर उन्हें साहित्य अकादमी का और 1978 में कितनी नावों में कितनी बार पर भारतीय ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला । आपके कहानी संग्रह: विपथगा 1937, परम्परा 1944, कोठरी की बात 1945, शरणार्थी 1948, जयदोल 1951 और आपने उपन्यास, यात्रा वृतान्त, निबंध संग्रह, आलोचना, संस्मरण, डायरियां, विचार गद्य: और नाटक भी लिखे।</strong></span>
			</div>
		</div>
	
<p>“जानकीदास, मुजरिम, तुम पर जुर्म लगाया जाता है कि तुमने तारीख 14 दिसम्बर को शाम के आठ बजे हालीवुड पार्क के दरवाज़े पर दंगा किया; और कि तुम्हारी रोज़ी का कोई ज़रिया नहीं है। बोलो, तुम्हें जवाब में कुछ कहना है?”<br />
जवाब के बदले जानकीदास को टुकुर-टुकुर अपनी ओर देखता पाकर न जाने क्यों मजिस्ट्रेट-पसीज उठे। उन्होंने कहा, “जो कुछ तुम्हें जवाब में कहना हो, सोच लो। मैं तुम्हें पाँच मिनट की मोहलत देता हूँ।”<br />
पाँच मिनट!<br />
जानकीदास के वज्राहत मन को, मानो कोड़े की चोट-सा, मानो बिच्छू के डंक-सा यह एक फ़िकरा काटने लगा, बताने की फिजूल कोशिश करने लगा&#8230; पाँच मिनट।’<br />
पाँच मिनट।<br />
जैसे नदी के किनारे पड़ा हुआ कछुआ, पास कहीं खटका सुनकर तनिक-सा हिल जाता है और फिर वैसा ही रह जाता है लोंदे का लोंदा, वैसे ही जानकीदास के मन ने कहा, ‘शान्ति हँसी थी,’ और रह गया।<br />
पाँच मिनट।&#8230;<br />
कुछ कहना है अवश्य, सफ़ाई देनी है अवश्य&#8230;<br />
पाँच मिनट&#8230;<br />
शान्ति हँसी थी।<br />
कब? कहाँ? क्यों हँसी थी? और कौन है वह, क्यों है, मुझे क्या है उससे?&#8230;<br />
पाँच मिनट&#8230;<br />
उसे धीरे-धीरे याद-सा आने लगा। किन्तु याद की तरह नहीं। बुखार के बुरे सपनों की तरह।<br />
शान्ति ने रोटी उसके हाथ में थमाकर उसी में भाजी डालते-डालते कहा था,<br />
“इस वक़्त तो खा लेते हैं, उस बेर मेरी एकादशी है।”<br />
उसने पूछा था, “क्यों?”<br />
“क्यों क्या? तुम्हें खिला दूँगी&#8230;” और हँस दी थी।<br />
उस जून के लिए रोटी नहीं है, यह कहने के लिए हँस दी थी।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/knowledge/history-of-the-day/history-of-the-day-jammu-and-kashmir-was-merged-with-india-on-26-october/11176/">History of The Day: आजादी के 72 दिन बाद भारत का हिस्सा बना कश्मीर</a></strong></p>
<p>दोपहर में, सड़कों पर फिरता हुआ जानकीदास सोच रहा था, इतनी बड़ी दुनिया में, इतने कामों से भरी हुई दुनिया, में, क्या मेरे लिए कोई भी काम नहीं है? वह पढ़ा-लिखा था, अपने माँ-बाप से अधिक पढ़ा-लिखा था, पर उन्हें मरते समय तक कभी कष्ट नहीं हुआ था, चाहे धनी वे नहीं हुए, तब वह क्यों भूखा मरेगा? और शान्ति, उसकी बहिन भी हिन्दी पढ़ी है और काम कर सकती है।<br />
जहाँ-जहाँ से उसे आशा थी, वहाँ वह सब देख चुका था। बल्कि जहाँ आशा नहीं थी, वहाँ भी देख-देखकर वह लौट चुका था।<br />
अब उसे कहीं और जाने को नहीं था &#8211; सिवाय घर के। और वहाँ उस बेर के लिए रोटी नहीं थी और यह बताने को शान्ति हँसी थी &#8211; हँसी थी&#8230;<br />
तब तक, भले ही उसके मन में सम्पन्नता का, पढ़ाई का, दरजे का, इज्जत-आबरू का, बुर्जुआ मनोवृत्ति का, कुछ निशान भी बाक़ी रहा हो, तब नहीं रहा। उसके लिए कुछ नहीं रहा था। केवल एक बात रही थी कि उस बेर के लिए रोटी नहीं है और शान्ति हँसी थी।<br />
राह-चलते उसने देखा, दायीं ओर एक बड़ा-सा आँगन है, एक भव्य मकान का, जिसमें तीन-चार सुन्दर बच्चे खेल रहे हैं। एक ओर एक लड़की बिना आग के एक छोटे-से चूल्हे पर, लकड़ी की हंड़िया चढ़ाये रसोई पका रही है और खेलनेवाले लड़कों से कह रही है “आओ भइया रोटी तैयार है&#8230;”</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>चली कहनीः <a href="https://tismedia.in/category/entertainment/art-and-literature/">पढ़िए हर रोज एक नई कहानी</a></strong></span></p>
<p>वह एकाएक आँगन के भीतर हो लिया। लड़के सहम कर खड़े हो गये &#8211; शायद उसका मुँह देखकर।<br />
उसने एक लड़के से कहा, “बेटा, जाकर अपने पिता से पूछ दो, यहाँ कोई पढ़ाने का काम है?”<br />
लड़के ने कहा, “हम नहीं जाते। आप ही पूछ लो।”<br />
जानकीदास ने दूसरे लड़के से कहा, “तुम पूछ दोगे? बड़े अच्छे हो तुम&#8230;”<br />
उस लड़के ने एक बार अपने साथी की ओर देखा, मानो पूछ रहा हो, ‘मैं भी ना कह दूँ?’ लेकिन फिर भीतर चला गया और आकर बोला, “पिताजी कहते हैं, कोई काम नहीं है।”<br />
जानकीदास ने फिर कहा, “एक बार और पूछ आओ, कोई जिल्दसाज़ी का काम है? या बढ़ाई का? या और कोई?”<br />
लड़के ने कहा, “अब की तो पूछ लेता हूँ, फिर नहीं जाने का।” और भीतर चला गया। आकर बोला, “पिताजी कहते हैं, यहाँ से चले जाओ। कोई काम नहीं है। फ़िजूल सिर मत खाओ।”<br />
जानकीदास बाहर निकल आया।<br />
कोई पढ़ाने का काम है? किसी क़्लर्क की ज़रूरत है? जिल्दसाज़ की? बढ़ई की? रसोइया की? भिश्ती की? टहलुए की? मोची-मेहतर की?<br />
कोई ज़रूरत नहीं है। सबके अपने-अपने काम हैं, केवल जानकीदास की कोई ज़रूरत नहीं है।<br />
और उस बेर खाने को नहीं है, और शान्ति हँसी!<br />
शाम को हालीवुड पार्क के दरवाज़े के पास जो भीड़ खड़ी थी, उन्हीं में वह भी था। दुनिया है, घर है, शान्ति है, रोटी है, यह सब वह भूल गया था। भूल नहीं गया था, याद रखने की क्षमता, मन को इकट्ठा, अपने वश में रखने की सामर्थ्य वह खो बैठा था। न उसका कोई सोच था, न उसकी कोई इच्छा थी। यहाँ भीड़ थी, लोग खड़े थे &#8211; इसीलिए वह भी था।<br />
भीतर असंख्य बिजली की बत्तियाँ जगमगा रही थीं। बड़े-बड़े झूले, रंग-बिरंगी रोशनी में किसी स्वप्न-आकाश के तारों-से लग रहे थे। कहीं एक एक बहुत ऊँचा खम्भा था, जिसकी कुल लम्बाई नीली और लाल लैम्पों से सजी हुई थी। और उसके ऊपर एक तख्ता बँधा हुआ था।<br />
उसी के बारे में बातें हो रही थी। और जानकीदास मन्त्र-मुग्ध-सा सुन रहा था।<br />
“वह जो है न खम्भा, उसी पर से आदमी कूदता है। नीचे एक जलता हुआ तालाब होता है, उसी में।”<br />
“उससे पहले दूसरा खेल भी होता है, जिसमें कुत्ता कूदता है?”<br />
“नहीं, वह बाद में है। पहले साइकल पर से कूदनेवाला है। वह यहाँ से नहीं दीखता।”<br />
“वह कितने बजे होगा?”<br />
“अभी थोड़ी देर में होनवाला है &#8211; आठ बजे होता है।”<br />
“यह आवाज़ क्या है?”<br />
“अरे, जो वह गुम्बद में मोटर-साइकिल चलाता है, उसी की है।”<br />
जानकीदास का अपना कुछ नहीं था। इच्छा शक्ति भी नहीं। जो दूसरे सुनते थे, वह उसे सुना जाता था; जो दूसरे देखते थे, वह उसे दीख जाता था।<br />
“वह देखो!”<br />
झूले चलने लगे थे। चरखड़ियाँ घूमने लगी थीं। उन पर बैठे हुए लोग नहीं दीखते थे, पर प्रकाश में कभी-कभी उनके सिर चमक जाते थे और कभी किसी लड़की की तीखी और कुछ डरी-सी हँसी वहाँ तक पहुँच जाती थी &#8211; डरी-सी किन्तु प्रसन्न, आमोद-भरी&#8230;<br />
जानकीदास देखता था और सुनता था और निश्चल खड़ा भी उत्तेजित हो जाता था। वही क्यों, सारी भीड़ ही धीरे-धीरे उत्तेजित होती जा रही थी।<br />
तभी अन्दर कहीं बिगुल बजा। तीखा। किसी प्रकार की सोच या चिन्ता से मुक्त। पुकारता हुआ।<br />
किसी ने कहा, “अब होगा साइकिलवाला खेल। चलो, चलें अन्दर।”<br />
“तुम नहीं चलोगे?”<br />
“चलो!”<br />
“मैं भी चलता हूँ यार! यह तो देखना ही चाहिए&#8230;”<br />
“आओ न-जल्दी, फिर जगह नहीं रहेगी।”<br />
भीड़ दरवाज़े की ओर बढ़ी। उत्तेजना भी बढ़ी, फैली, फिर बढ़ी।<br />
जानकीदास भी साथ पहुँचा, टिकट-घर के दरवाज़े पर।<br />
लोग टिकट लेकर भीतर घुसने लगे। जानकीदास खड़ा देखने लगा।<br />
तभी एक लड़का एक छोटी लड़की का हाथ पकड़े, उसे घसीटता हुआ, जल्दी से टिकटघर पर पहुँचा और टिकट लेकर, उत्तेजना से भर्राये हुए स्वर में बोला, “कमला, अगर देर से पहुँचे तो याद रखना, मार डालूँगा! उमर में एक मौक़ा मिला है&#8230;”<br />
आगे जानकीदास नहीं सुन सका। वह लपककर टिकटघर पर पहुँचा। टिकट माँगी। ली। जेब में डाली। दूसरा हाथ अन्दर की जेब में डाला &#8211; पैसे निकालने के लिए &#8211; चार आने।<br />
डाला और पड़ा रहने दिया। निकाला नहीं, उत्तेजना टूट गयी।<br />
जेब में एक पैसा भी नहीं था।<br />
“मुजरिम, तुम्हें कुछ कहना है?”<br />
जानकीदास ने फिर एक बार दीन दृष्टि से मजिस्ट्रेट की ओर देख दिया, बोला नहीं। उसका मन कछुए की तरह तनिक और हिलकर बिलकुल जड़ हो गया।<br />
उस बेर उसने नहीं खायी थी, तो शान्ति ने खा ली होगी।<br />
मजिस्ट्रेट साहब सेकेंड-भर सोचकर बोले, “एक साल!”<br />
शान्ति हँसी थी। उस बेर के लिए रोटी नहीं है, यह कहने के लिए शान्ति हँसी थी।</p>
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		<title>चली कहानीः उसने कहा था- चंद्रधर शर्मा गुलेरी</title>
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		<pubDate>Mon, 25 Oct 2021 04:22:42 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>बड़े-बडे़ शहरों के इक्के-गाड़ी वालों की जबान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है और कान पक गए हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बू कार्ट वालों की बोली का मरहम लगावे। जबकि बड़े शहरों की चौड़ी सड़को पर घोड़े की पीठ को चाबुक से धुनते हुए इक्के वाले कभी घोड़े की &#8230;</p>
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				<h4>About the author</h4><strong><span style="color: #ff0000;">चन्द्रधर शर्मा &#8216;गुलेरी&#8217; <span style="color: #0000ff;">(1883 &#8211; 12 सितम्बर 1922)</span> हिन्दी के कथाकार, व्यंगकार, निबन्धकार तथा सम्पादक थे। उन्हें हिन्दी, संस्कृत, अंग्रेज़ी, प्राकृत, बांग्ला, मराठी, जर्मन तथा फ्रेंच भाषाओं का ज्ञान था। उनकी रुचि धर्म, ज्योतिष इतिहास, पुरातत्त्व, दर्शन भाषाविज्ञान शिक्षाशास्त्र और साहित्य से लेकर संगीत, चित्रकला, लोककला, विज्ञान और राजनीति तथा समसामयिक सामाजिक स्थिति तथा रीति-नीति में थी। आम हिन्दी पाठक ही नहीं, विद्वानों का एक बड़ा वर्ग भी उन्हें अमर कहानी ‘उसने कहा था’ के रचनाकार के रूप में ही पहचानता है।</span></strong>
			</div>
		</div>
	
<p>बड़े-बडे़ शहरों के इक्के-गाड़ी वालों की जबान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है और कान पक गए हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बू कार्ट वालों की बोली का मरहम लगावे। जबकि बड़े शहरों की चौड़ी सड़को पर घोड़े की पीठ को चाबुक से धुनते हुए इक्के वाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट यौन-संबंध स्थिर करते हैं, कभी उसके गुप्त गुह्य अंगो से डाक्टर को लजाने वाला परिचय दिखाते हैं, कभी राह चलते पैदलों की आँखो के न होने पर तरस खाते हैं, कभी उनके पैरो की अंगुलियों के पोरों की चींथकर अपने ही को सताया हुआ बताते हैं और संसार भर की ग्लानि और क्षोभ के अवतार बने नाक की सीध चले जाते हैं,</p>
<p>तब अमृतसर में उनकी बिरादरी वाले तंग चक्करदार गलियों में हर एक लडढी वाले के लिए ठहर कर सब्र का समुद्र उमड़ा कर&#8211; बचो खालसाजी, हटो भाईज&#8217;, ठहरना भाई, आने दो लालाजी, हटो बाछा कहते हुए सफेद फेटों , खच्चरों और बतको, गन्ने और खोमचे और भारे वालों के जंगल से राह खेते हैं । क्या मजाल है कि जी और साहब बिना सुने किसी को हटना पड़े। यह बात नही कि उनकी जीभ चलती ही नही, चलती है पर मीठी छुरी की तरह महीन मार करती हुई। यदि कोई बुढ़िया बार-बार चिटौनी देने पर भी लीक से नही हटती तो उनकी वचनावली के ये नमूने हैं&#8211; हट जा जीणे जोगिए, हट जा करमाँ वालिए, हट जा, पुत्तां प्यारिए. बच जा लम्बी वालिए। समष्टि में इसका अर्थ हैं कि तू जीने योग्य है, तू भाग्योंवाली है, पुत्रो को प्यारी है, लम्बी उमर तेरे सामने है, तू क्यों मेरे पहियो के नीचे आना चाहती है? बच जा।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-11141" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-chandradhar-sharma-guleri-2.jpg" alt="tis media, chandradhar sharma guleri, Chali Kahani, Story Of The Day, Hindi Story, Chali Kahani, Story Of The Day, Hindi Story, Hindi Literature, Hindi Movies, Hindi Storytellers, हिंदी साहित्य, हिंदी साहित्यकार, हिंदी फिल्में, हिंदी के कहानीकार, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, चली कहानी, हिंदी कहानियां" width="850" height="550" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-chandradhar-sharma-guleri-2.jpg 850w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-chandradhar-sharma-guleri-2-300x194.jpg 300w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-chandradhar-sharma-guleri-2-768x497.jpg 768w" sizes="auto, (max-width: 850px) 100vw, 850px" /></p>
<p>ऐसे बम्बू कार्ट वालों के बीच में होकर एक लड़का और एक लड़की चौक की दुकान पर आ मिले। उसके बालों और इसके ढीले सुथने से जान पडता था कि दोनो सिख हैं। वह अपने मामा के केश धोने के लिए दही लेने आया था और यह रसोई के लिए बड़ियाँ। दुकानदार एक परदेशी से गुथ रहा था, जो सेर भर गीले पापड़ो की गड्डी गिने बिना हटता न था।<br />
&#8212; तेरा घर कहाँ है?<br />
&#8212; मगरे में। &#8230;और तेरा?<br />
&#8212; माँझे में, यहाँ कहाँ रहती है?<br />
&#8212; अतरसिंह की बैठक में, वह मेरे मामा होते हैं।<br />
&#8212; मैं भी मामा के आया हूँ, उनका घर गुरु बाजार में है।<br />
इतने में दुकानदार निबटा और इनका सौदा देने लगा। सौदा लेकर दोनो साथ-साथ चले। कुछ दूर जाकर लड़के ने मुसकरा कर पूछा&#8211; तेरी कुड़माई हो गई? इस पर लड़की कुछ आँखे चढ़ाकर &#8216;धत्&#8217; कहकर दौड़ गई और लड़का मुँह देखता रह गया।</p>
<p>दूसरे तीसरे दिन सब्जी वाले के यहाँ, या दूध वाले के यहाँ अकस्मात् दोनो मिल जाते। महीना भर यही हाल रहा। दो-तीन बार लड़के ने फिर पूछा&#8211; तेरे कुड़माई हो गई? और उत्तर में वही &#8216;धत्&#8217; मिला। एक दिन जब फिर लड़के ने वैसी ही हँसी में चिढ़ाने के लिए पूछा तो लड़की लड़के की संभावना के विरुद्ध बोली&#8211; हाँ, हो गई।<br />
&#8212; कब?<br />
&#8212; कल, देखते नही यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू। &#8230; लड़की भाग गई।<br />
लड़के ने घर की सीध ली। रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया, एक छाबड़ी वाले की दिन भर की कमाई खोई, एक कुत्ते को पत्थर मारा और गोभी वाले ठेले में दूध उंडेल दिया। सामने नहा कर आती हुई किसी वैष्णवी से टकरा कर अन्धे की उपाधि पाई। तब कहीं घर पहुँचा।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-11142" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-chandradhar-sharma-guleri-4.jpg" alt="" width="640" height="461" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-chandradhar-sharma-guleri-4.jpg 640w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-chandradhar-sharma-guleri-4-300x216.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></p>
<p>&#8212; होश में आओ। कयामत आयी है और लपटन साहब की वर्दी पहन कर आयी है।<br />
&#8212; क्या? &#8212; लपचन साहब या तो मारे गये हैं या कैद हो गये हैं। उनकी वर्दी पहन कर कोई जर्मन आया है। सूबेदार ने इसका मुँह नही देखा। मैने देखा है, और बातें की हैं। सौहरा साफ़ उर्दू बोलता है, पर किताबी उर्दू। और मुझे पीने को सिगरेट दिया है।<br />
&#8212; तो अब? &#8212; अब मारे गए। धोखा है। सूबेदार कीचड़ में चक्कर काटते फिरेंगे और यहाँ खाई पर धावा होगा उधर उन पर खुले में धावा होगा। उठो, एक काम करो। पलटन में पैरो के निशान देखते-देखते दौड़ जाओ। अभी बहुत दूर न गये होंगे। सूबेदार से कहो कि एकदम लौट आवें। खंदक की बात झूठ है। चले जाओ, खंदक के पीछे से ही निकल जाओ। पत्ता तक न खुड़के। देर मत करो।&#8217;<br />
&#8212; हुकुम तो यह है कि यहीं&#8230;<br />
&#8212; ऐसी तैसी हुकुम की! मेरा हुकुम है&#8230; जमादार लहनासिंह जो इस वक्त यहाँ सबसे बड़ा अफ़सर है, उसका हुकुम है। मैं लपटन साहब की ख़बर लेता हूँ।<br />
&#8212; पर यहाँ तो तुम आठ ही हो।<br />
&#8212; आठ नही, दस लाख। एक एक अकालिया सिख सवा लाख के बराबर होता है। चले जाओ।<br />
लौटकर खाई के मुहाने पर लहनासिंह दीवार से चिपक गया। उसने देखा कि लपटन साहब ने जेब से बेल के बराबर तीन गोले निकाले। तीनों को जगह-जगह खंदक की दीवारों में घुसेड़ दिया और तीनों में एक तार सा बाँध दिया। तार के आगे सूत की गुत्थी थी, जिसे सिगड़ी के पास रखा। बाहर की तरफ जाकर एक दियासलाई जलाकर गुत्थी रखने&#8230; बिजली की तरह दोनों हाथों से उलटी बन्दूक को उठाकर लहनासिंह ने साहब की कुहनी पर तानकर दे मारा । धमाके के साथ साहब के हाथ से दियासलाई गिर पड़ी । लहनासिंह ने एक कुन्दा साहब की गर्दन पर मारा और साहब &#8216;आँख! मीन गाट्ट&#8217; कहते हुए चित हो गये। लहनासिंह ने तीनो गोले बीनकर खंदक के बाहर फेंके और साहब को घसीटकर सिगड़ी के पास लिटाया। जेबों की तलाशी ली। तीन-चार लिफ़ाफ़े और एक डायरी निकाल कर उन्हे अपनी जेब के हवाले किया।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-11143" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-chandradhar-sharma-guleri-6.jpg" alt="" width="640" height="463" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-chandradhar-sharma-guleri-6.jpg 640w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-chandradhar-sharma-guleri-6-300x217.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 640px) 100vw, 640px" /></p>
<p>साहब की मूर्च्छा हटी। लहना सिह हँसकर बोला&#8211; क्यो, लपटन साहब, मिजाज कैसा है? आज मैंने बहुत बातें सीखीं । यह सीखा कि सिख सिगरेट पीते हैं । यह सीखा कि जगाधरी के जिले में नीलगायें होती हैं और उनके दो फुट चार इंच के सींग होते हैं । यह सीखा कि मुसलमान खानसामा मूर्तियो पर जल चढाते हैं और लपटन साहब खोते पर चढते हैं । पर यह तो कहो, ऐसी साफ़ उर्दू कहाँ से सीख आये? हमारे लपटन साहब तो बिना &#8216;डैम&#8217; के पाँच लफ़्ज भी नही बोला करते थे ।</p>
<p>लहनासिंह ने पतलून की जेबों की तलाशी नही ली थी। साहब ने मानो जाड़े से बचने के लिए दोनो हाथ जेबो में डाले। लहनासिंह कहता गया&#8211; चालाक तो बड़े हो, पर माँझे का लहना इतने बरस लपटन साहब के साथ रहा है। उसे चकमा देने के लिए चार आँखे चाहिएँ। तीन महीने हुए एक तुर्की मौलवी मेरे गाँव में आया था। औरतो को बच्चे होने का ताबीज बाँटता था और बच्चो को दवाई देता था। चौधरी के बड़ के नीचे मंजा बिछाकर हुक्का पीता रहता था और कहता था कि जर्मनी वाले बड़े पंडित हैं। वेद पढ़-पढ़ कर उसमे से विमान चलाने की विद्या जान गये हैं। गौ को नही मारते। हिन्दुस्तान में आ जायेंगे तो गोहत्या बन्द कर देगे। मंडी के बनियो को बहकाता था कि डाकखाने से रुपये निकाल लो, सरकार का राज्य जाने वाला है। डाक बाबू पोल्हू राम भी डर गया था। मैने मुल्ला की दाढी मूंड़ दी थी और गाँव से बाहर निकालकर कहा था कि जो मेरे गाँव में अब पैर रखा तो &#8212; साहब की जेब में से पिस्तौल चला और लहना की जाँघ में गोली लगी। इधर लहना की हेनरी मार्टिन के दो फ़ायरो ने साहब की कपाल-क्रिया कर दी।<br />
धडाका सुनकर सब दौड़ आये।<br />
बोधा चिल्लाया&#8211; क्या है?<br />
लहनासिंह में उसे तो यह कह कर सुला दिया कि &#8216;एक हडका कुत्ता आया था, मार दिया&#8217; और औरो से सब हाल कह दिया। बंदूके लेकर सब तैयार हो गये । लहना ने साफ़ा फाड़ कर घाव के दोनो तरफ पट्टियाँ कसकर बांधी । घाव माँस में ही था। पट्टियो के कसने से लूह बन्द हो गया।<br />
इतने में सत्तर जर्मन चिल्लाकर खाई में घुस पड़े। सिखो की बंदूको की बाढ ने पहले धावे को रोका। दूसरे को रोका। पर यहाँ थे आठ (लहना सिंह तक-तक कर मार रहा था। वह खड़ा था औऱ लेटे हुए थे) और वे सत्तर । अपने मुर्दा भाईयों के शरीर पर चढ़कर जर्मन आगे घुसे आते थे । थोड़े मिनटो में वे&#8230; अचानक आवाज आयी &#8212; &#8216;वाह गुरुजी की फतह ! वाहगुरु दी का खालसा!&#8217; और धड़ाधड़ बंदूको के फायर जर्मनो की पीठ पर पड़ने लगे। ऐन मौके पर जर्मन दो चक्कों के पाटों के बीच में आ गए। पीछे से सूबेदार हजारासिंह के जवान आग बरसाते थे और सामने से लहनासिंह के साथियों के संगीन चल रहे थे। पास आने पर पीछे वालो ने भी संगीन पिरोना शुरु कर दिया ।<br />
एक किलकारी और&#8211; &#8216;अकाल सिक्खाँ दी फौज आयी। वाह गुरु जी दी फतह! वाह गुरु जी दी खालसा! सत्त सिरी अकाल पुरुष! &#8216; और लड़ाई ख़तम हो गई। तिरसठ जर्मन या तो खेत रहे थे या कराह रहे थे। सिक्खो में पन्द्रह के प्राण गए। सूबेदार के दाहिने कन्धे में से गोली आर पार निकल गयी। लहनासिंह की पसली में एक गोली लगी। उसने घाव को खंदक की गीली मिट्टी से पूर लिया। और बाकी का साफ़ा कसकर कमर बन्द की तरह लपेट लिया। किसी को ख़बर नही हुई कि लहना के दूसरा घाव &#8212; भारी घाव &#8212; लगा है। लड़ाई के समय चांद निकल आया था। ऐसा चांद जिसके प्रकाश से संस्कृत कवियो का दिया हुआ &#8216;क्षयी&#8217; नाम सार्थक होता है। और हवा ऐसी चल रही थी जैसी कि बाणभट्ट की भाषा में &#8216;दंतवीणो पदेशाचार्य&#8217; कहलाती। वजीरासिंह कह रहा था कि कैसे मन-मनभर फ्रांस की भूमि मेरे बूटो से चिपक रही थी जब मैं दौडा दौडा सूबेदार के पीछे गया था। सूबेदार लहनासिह से सारा हाल सुन और कागजात पाकर उसकी तुरन्त बुद्धि को सराह रहे थे और कर रहे थे कि तू न होता तो आज सब मारे जाते। इस लड़ाई की आवाज़ तीन मील दाहिनी ओर की खाई वालों ने सुन ली थी। उन्होने पीछे टेलिफ़ोन कर दिया था। वहाँ से झटपट दो डाक्टर और दो बीमार ढोने की गाड़ियाँ चली, जो कोई डेढ घंटे के अन्दर अन्दर आ पहुँची। फील्ड अस्पताल नज़दीक था। सुबह होते-होते वहाँ पहुँच जाएंगे, इसलिए मामूली पट्टी बांधकर एक गाड़ी में घायल लिटाये गए और दूसरी में लाशें रखी गईं। सूबेदार ने लहनासिह की जाँघ में पट्टी बंधवानी चाही। बोधसिंह ज्वर से बर्रा रहा था। पर उसने यह कह कर टाल दिया कि थोड़ा घाव है, सवेरे देखा जायेगा। वह गाड़ी में लिटाया गया। लहना को छोडकर सूबेदार जाते नही थे। यह देख लहना ने कहा&#8211; तुम्हे बोधा की कसम हैं और सूबेदारनी जी की सौगन्द है तो इस गाड़ी में न चले जाओ।<br />
&#8212; और तुम?<br />
&#8212; मेरे लिए वहाँ पहुँचकर गाड़ी भेज देना। और जर्मन मुर्दो के लिए भी तो गाड़ियाँ आती होगीं। मेरा हाल बुरा नही हैं। देखते नही मैं खड़ा हूँ? वजीरासिंह मेरे पास है ही।<br />
&#8212; अच्छा, पर&#8230;<br />
&#8212; बोधा गाड़ी पर लेट गया। भला, आप भी चढ़ आओ। सुनिए तो, सूबेदारनी होराँ को चिट्ठी लिखो तो मेरा मत्था टेकना लिख देना।<br />
&#8212; और जब घर जाओ तो कह देना कि मुझ से जो उन्होने कहा था, वह मैंने कर दिया।<br />
गाड़ियाँ चल पड़ी थीं। सूबेदार ने चढ़ते-चढ़ते लहना का हाथ पकड़कर कहा&#8211; तूने मेरे और बोधा के प्राण बचाये हैं। लिखना कैसा? साथ ही घर चलेंगे। अपनी सूबेदारनी से तू ही कह देना। उसने क्या कहा था?<br />
&#8212; अब आप गाड़ी पर चढ़ जाओ। मैने जो कहा, वह लिख देना और कह भी देना।<br />
गाड़ी के जाते ही लहना लेट गया। &#8211;वजीरा, पानी पिला दे और मेरा कमरबन्द खोल दे। तर हो रहा है।<br />
मृत्यु के कुछ समय पहले स्मृति बहुत साफ़ हो जाती है। जन्मभर की घटनाएँ एक-एक करके सामने आती हैं। सारे दृश्यो के रंग साफ़ होते है, समय की धुन्ध बिल्कुल उन पर से हट जाती है। लहनासिंह बारह वर्ष का है। अमृतसर में मामा के यहाँ आया हुआ है। दहीवाले के यहाँ, सब्जीवाले के यहाँ, हर कहीं उसे आठ साल की लड़की मिल जाती है। जब वह पूछता है कि तेरी कुड़माई हो गई? तब वह &#8216;धत्&#8217; कहकर भाग जाती है। एक दिन उसने वैसे ही पूछा तो उसने कहा&#8211;हाँ, कल हो गयी, देखते नही, यह रेशम के फूलों वाला सालू? यह सुनते ही लहनासिंह को दुःख हुआ। क्रोध हुआ । क्यों हुआ?<br />
&#8212; वजीरासिंह पानी पिला दे।</p>
<p><img loading="lazy" decoding="async" class="alignnone size-full wp-image-11140" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-79-Punjab-Infantry.jpg" alt="tis media, chandradhar sharma guleri, Chali Kahani, Story Of The Day, Hindi Story, Chali Kahani, Story Of The Day, Hindi Story, Hindi Literature, Hindi Movies, Hindi Storytellers, हिंदी साहित्य, हिंदी साहित्यकार, हिंदी फिल्में, हिंदी के कहानीकार, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, चली कहानी, हिंदी कहानियां" width="700" height="408" srcset="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-79-Punjab-Infantry.jpg 700w, https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/tismedia.in-79-Punjab-Infantry-300x175.jpg 300w" sizes="auto, (max-width: 700px) 100vw, 700px" /></p>
<p>पच्चीस वर्ष बीत गये। अब लहनासिंह नं. 77 राइफ़ल्स में जमादार हो गया है। उस आठ वर्ष की कन्या का ध्यान ही न रहा, न मालूम वह कभी मिली थी या नही। सात दिन की छुट्टी लेकर ज़मीन के मुकदमे की पैरवी करने वह घर गया। वहाँ रेजीमेंट के अफ़सर की चिट्ठी मिली। फौरन चले आओ। साथ ही सूबेदार हजारासिंह की चिट्ठी मिली कि मैं और बोधासिंह भी लाम पर जाते हैं, लौटते हुए हमारे घर होते आना। साथ चलेंगे।<br />
सूबेदार का घर रास्ते में पड़ता था और सूबेदार उसे बहुत चाहता था। लहनासिंह सूबेदार के यहाँ पहुँचा। जब चलने लगे तब सूबेदार बेडे़ में निकल कर आया। बोला&#8211; लहनासिंह, सूबेदारनी तुमको जानती है। बुलाती है। जा मिल आ।<br />
लहनासिंह भीतर पहुँचा। सूबेदारनी मुझे जानती है? कब से? रेजीमेंट के क्वार्टरों में तो कभी सूबेदार के घर के लोग रहे नहीं। दरवाज़े पर जाकर &#8216;मत्था टेकना&#8217; कहा। असीस सुनी। लहनासिंह चुप।<br />
&#8212; मुझे पहचाना?<br />
&#8212; नहीं।<br />
&#8212; &#8216;तेरी कुड़माई हो गयी? &#8230; धत्&#8230; कल हो गयी&#8230; देखते नही, रेशमी बूटों वाला सालू&#8230; अमृतसर में&#8230;<br />
भावों की टकराहट से मूर्च्छा खुली। करवट बदली। पसली का घाव बह निकला।<br />
&#8212; वजीरासिंह, पानी पिला &#8212; उसने कहा था ।<br />
स्वप्न चल रहा हैं । सूबेदारनी कह रही है&#8211; मैने तेरे को आते ही पहचान लिया। एक काम कहती हूँ। मेरे तो भाग फूट गए। सरकार ने बहादुरी का खिताब दिया है, लायलपुर में ज़मीन दी है, आज नमकहलाली का मौक़ा आया है। पर सरकार ने हम तीमियो की एक घघरिया पलटन क्यो न बना दी जो मै भी सूबेदारजी के साथ चली जाती? एक बेटा है। फौज में भरती हुए उसे एक ही वर्ष हुआ। उसके पीछे चार और हुए, पर एक भी नही जिया । सूबेदारनी रोने लगी&#8211; अब दोनों जाते हैं । मेरे भाग! तुम्हें याद है, एक दिन टाँगे वाले का घोड़ा दहीवाले की दुकान के पास बिगड़ गया था। तुमने उस दिन मेरे प्राण बचाये थे। आप घोड़ो की लातो पर चले गये थे। और मुझे उठाकर दुकान के तख्त के पास खड़ा कर दिया था। ऐसे ही इन दोनों को बचाना। यह मेरी भिक्षा है। तुम्हारे आगे मैं आँचल पसारती हूँ।<br />
रोती-रोती सूबेदारनी ओबरी में चली गयी। लहनासिंह भी आँसू पोछता हुआ बाहर आया।<br />
&#8212; वजीरासिंह, पानी पिला &#8212; उसने कहा था।</p>
<p>लहना का सिर अपनी गोद में रखे वजीरासिंह बैठा है। जब मांगता है, तब पानी पिला देता है। आध घंटे तक लहना फिर चुप रहा, फिर बोला&#8211; कौन? कीरतसिंह?<br />
वजीरा ने कुछ समझकर कहा&#8211; हाँ।<br />
&#8212; भइया, मुझे और ऊँचा कर ले। अपने पट्ट पर मेरा सिर रख ले।<br />
वजीरा ने वैसा ही किया ।<br />
&#8212; हाँ, अब ठीक है। पानी पिला दे। बस। अब के हाड़ में यह आम खूब फलेगा। चाचा-भतीजा दोनों यहीँ बैठकर आम खाना। जितना बड़ा तेरा भतीजा है उतना ही बड़ा यह आम, जिस महीने उसका जन्म हुआ था उसी महीने मैने इसे लगाया था।<br />
वजीरासिंह के आँसू टप-टप टपक रहे थे। कुछ दिन पीछे लोगों ने अख़बारो में पढ़ा&#8212;<br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>फ्रांस और बेलजियम&#8211; 67वीं सूची&#8211; मैदान में घावों से मरा &#8212; न. 77 सिख राइफल्स जमादार लहना सिंह ।</strong></span></p>
<p>&nbsp;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/usne-kaha-tha-story-of-chandradhar-sharma-guleri/11138/">चली कहानीः उसने कहा था- चंद्रधर शर्मा गुलेरी</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>गले की जंजीर&#8230; आज की कहानी</title>
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		<pubDate>Fri, 09 Jul 2021 08:18:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Art and Literature]]></category>
		<category><![CDATA[Editorial]]></category>
		<category><![CDATA[Top Stories]]></category>
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		<category><![CDATA[Gale Ki Janjeer]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>~अमरकांत मुझे ख़ूब अच्छी तरह याद है कि रात को जंजीर पहनकर सोया था, लेकिन सबेरे उठकर देखा कि वह गले से गायब थी। खटिया पर से उछलकर खड़ा हो गया। बिछौने को उलट-पुलट डाला। ऊपर देखा, नीचे देखा, अगल देखा, बगल देखा। दौड़कर कमरे में गया, कोना-कोना जन डाला, परंतु वह नहीं मिली। संभवतः &#8230;</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="color: #ff0000;">~अमरकांत</span></h4>
<p>मुझे ख़ूब अच्छी तरह याद है कि रात को जंजीर पहनकर सोया था, लेकिन सबेरे उठकर देखा कि वह गले से गायब थी। खटिया पर से उछलकर खड़ा हो गया। बिछौने को उलट-पुलट डाला। ऊपर देखा, नीचे देखा, अगल देखा, बगल देखा। दौड़कर कमरे में गया, कोना-कोना जन डाला, परंतु वह नहीं मिली। संभवतः किसी ने चुरा ली थी।</p>
<p>जहाँ तक मुझे याद है, प्रेस में ऐसी घटना पहले कभी नहीं हुई थी। मैं गत ढाई-तीन वर्षों से प्रेस की छत पर एक कमरे में बिना किसी द्वंद्व एवं भय के रहता हूँ। बगल के कमरे में चार कंपोजीटर भी रहते हैं। चौबीसों घंटे चपरासी, हॉकर, मशीनमैन, फोरमैन, कंपोजीटर तथा कितने ही अन्य बुरे-भले लोग ऊपर से नीचे तथा नीचे से ऊपर किए रहते हैं, किंतु किसी ने कभी मुझ-जैसे सीधे-सादे पत्रकार का एक तिनका भी न उठाया। बड़ी बुरी बात थी। वह सोने की जंजीर अपनी भी नहीं थी कि संतोष कर लेता। दो दिन पूर्व शहर से मेरा मित्र जगदीश आया था। वह लंबा, तगड़ा तथा खूबसूरत तो है ही, उस रोज उसने महीन सफेद धोती तथा रेशमी कुर्ता पहन रखा था। इसके अलावा उसके गोरे गले में एक सोने की जंजीर सुशोभित थी, जो पुए पर चीनी का काम कर रही थी। अब झूठ क्यों बोलूँ, मैं उसके रोब में इतना तक आ गया कि इच्छा करने लगी कि मैं भी उसी पोशाक में तथा गले में वही या वैसी ही जंजीर पहन चारों ओर घूमूँ और लोगों पर रोब जमाऊँ।</p>
<p><a style="text-decoration: none; font-weight: normal; border-color: transparent; color: #2a2a2a" href ="https://libido-de.com/kaufen-cialis-generika-20-mg/">https://libido-de.com/kaufen-cial&#8230;/</a></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/anmol-bhent-munne-ki-wapsi-story-by-rabindranath-tagore/9768/"><strong>अनमोल भेंट:- मुन्ने की वापसी&#8230;</strong> <strong>आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>‘आज तो गुरु, ख़ूब जँच रहे हो! गले में सोने की जंजीर तो बस, पूछो मत!’ मैंने मुँह बाकर हँसते हुए प्रशंसा की।</p>
<p>वह कुछ नहीं बोला और मेरी बात पर केवल हँसकर रह गया। किंतु, चार-पाँच मिनट बाद मैंने बेशर्मी के साथ उससे जंजीर माँगी और उसने फ़ौरन निकालकर दे भी दी। पहनने के पश्चात् मैंने अपने चारों ओर आत्म-प्रशंसा से देखा। मैं उसे पहने ही रहा और फिर हम कोई दूसरी बात करने लगे और वह जब जाने लगा, तब भी मैंने जंजीर निकालकर नहीं दी और उसने शिष्टाचार से माँगी भी नहीं और दो-तीन दिन में आने का वायदा करने के बाद चला गया।</p>
<p>वैसे मैं यह बता देना चाहता हूँ कि मेरी नीयत पूर्णतया साफ़ थी। मैं केवल यही चाहता था कि जंजीर एक-दो दिन पहनने के बाद उसे लौटा दूँगा। इसके अलावा हम दोनों लँगोटिया यार थे और अक्सर एक-दूसरे की चीजों पहना भी करते थे, अब मुझे क्या मालूम था कि ऐसा भी होगा। मैं एकदम घबरा गया।</p>
<p>कुछ देर तक सुन्न होकर कमरे में खड़ा रहा, फिर दौड़ा हुआ मिश्र दादा के यहाँ गया। वह भी सहायक संपादक थे, लेकिन चूँकि उन्होंने दाढ़ी रख छोड़ी थी और धड़ल्ले से बंगला भी बोल लेते थे, अतएव हम उनको दादा कहते। वह छत ही पर सामने के कमरे में रहते थे।</p>
<p>जब मैं पहुँचा तो वह लेटे-लेटे अख़बार निहार रहे थे। मैं चुपचाप चारपाई पर एक तरफ़ बैठ गया और जब उन्होंने मेरी ओर देखा तो मैंने गंभीर आवाज में सूचना दी, ‘दादा, जंजीर तो चोरी चली गयी।’</p>
<p>वह चौंककर उठ बैठे। दुःख एवं आश्चर्य की बनावटी भावना से मुँह और आँखों को फैलाते हुए उन्होंने पूछा,<br />
‘अरे! कैसे?’<br />
मैंने सारा क़िस्सा कह सुनाया।<br />
वे घोर चिंता में पड़े मालूम हुए और निचले होंठ को दाँतों से हल्के-हल्के काटते हुए पास में रखे गंदे तकिए को अपने दाएँ हाथ से धीरे-धीरे ठोकने लगे।</p>
<p>एक-डेढ़ मिनट पश्चात् आँखों को थोड़ा ऊपर करते हुए नपे-तुले शब्दों में उन्होंने किसी जासूस की भाँति पूज, ‘तुम्हें ठीक-ठीक याद है कि जब तुम सोए थे तो गले में जंजीर थी?’</p>
<p>मेरे ठीक-ठीक बता देने से वे जंजीर का भी पता बता देंगे, इस आशा से उत्साहित होकर मैंने उत्तर दिया, ‘हाँ दादा, इसके बारे में तो आप निश्चिंत रहें।’</p>
<p>‘भाई, मैं तो निश्चिंत हूँ, लेकिन सभी बातें देख-सुन ली जाती हैं। बड़े-बड़े भूल जाते हैं, फिर हमारी-तुम्हारी गिनती किसमें है?’ उन्होंने तर्क किया।</p>
<p>मैंने ज़ोर दिया, ‘नहीं, मुझे ख़ूब अच्छी तरह याद है कि सोते वक्त गले में जंजीर थी।’ एक-दो क्षण वे चुप रहे, फिर मेरी ओर थोड़ा खिसककर अपनी अर्थपूर्ण आँखों को मेरी आँखों में गड़ाकर दुष्टतापूर्वक मुस्कराते हुए इधर-उधर देखने के पश्चात् धीरे से पूज, ‘क्यों जी बड़े साहब, ठीक बताना, उसे किसी कोठे-ओठे पर तो नहीं दे आए?’<br />
मुझे यह मज़ाक बड़ा बुरा लगा। रुखाई से बोला, ‘आप तो साहब मज़ाक कर रहे हैं, किसी की जान जाए और कोई मल्हार गाए!’<br />
वे शरमा गए और उल्लू की भाँति हँसते हुए उन्होंने समझाया, ‘अरे यार, मल्हार की बात नहीं। आदमी, आदमी ही है, भगवान् तो नहीं, ग़लतियाँ हो ही जाती हैं।’<br />
मैं चुप रहा और वे चुप रहे, फिर थोड़ी देर बाद जब मैं उठकर जाने लगा तो उन्होंने पुकारा, ‘अरे जा रहे हो? जरा सुनना।’</p>
<p>मैं लौट आया तो उन्होंने सिर को कुछ आगे बढ़ाकर फुस-फुसाकर शंका प्रकट की, ‘भाई, मेरा तो शक उस रामधन पर जाता है। वह रात में देर तक कंपोज करता रहता है। ग़ौर करना, उसकी आँखें अत्यंत रहस्यमयी हैं। हमेशा तिरछी नजरों से तरेरता है, जैसे चोर हो। उसके घर का भी तो किसी को पता नहीं, न मालूम कहाँ का रहने वाला है। भाई, मेरा तो संदेह सोलह आने उसी पर है।’</p>
<p>रामधन हमारे बगल के कमरे में रहता है और अभी दो दिन पूर्व मिश्र दादा से उसकी जबरदस्त मौखिक लड़ाई हुई थी। मैं सोचने लगा।</p>
<p>मिश्र जी ने निश्चित सम्मति प्रकट की, ‘मारो साले को, दो फैट में सारा उगल देगा।’<br />
‘अच्छा, देखा जाएगा।’ मैं लौट पड़ा। ‘इससे काम नहीं चलेगा, कुछ कड़े बनो।’ मिश्र जी चिल्ला पड़े।</p>
<p>कुछ ही देर में यह समाचार प्रेस में आग की तरह फैल गया। सहानुभूति से सभी विगलित हो गए और सबकी जबान पर यही चर्चा थी। जिससे भेंट होती, वह अवश्य पूछता, ‘कहिए शर्मा जी, आपकी जंजीर खो गई?’ उत्तर देने पर पहले ही से तैयार प्रश्न आता, ‘कैसे?’ सभी लगभग यही प्रश्न पूछते और मैं विस्तार के साथ बताता। मुझे आशा थी कि शायद किसी को पता हो और सभी बातें बताने से संभवतः रहस्य का उद्घाटन करने में मदद मिले। लेकिन प्रश्नकर्ता रुचि के अनुसार एक-आध मिनट तक चुपचाप अफसोस की मुद्रा में जमीन की ओर देखते, फिर सिर को झटका देते हुए ‘हूं’ या ‘क्या बताएँ साहब?’ कहकर और मेरी ओर एक रहस्यमयी दृष्टि डालते हुए धीरे-धीरे खिसक जाते, जैसे मैं ही चोर हूँ।</p>
<p>प्रेस-मैनेजर गुलजारी लाल जी ने मुझे बुलवाया और सभी बातें जानने के पश्चात् बोले, ‘शर्मा जी, माफ़ कीजिएगा, आपको दूसरे की चीज लेने की आखिरकार हिम्मत कैसे पड़ी? वह भी सोने की जंजीर! मैं तो साहब, कोई देता भी तो इनकार कर देता और ली भी जाती हैं छोटी-छोटी चीजों कि&#8230;.। क्षमा कीजिएगा, यह आपने बहुत भारी ग़लती की।’</p>
<p>रामविलास जब ड्यूटी पर आया तो सबसे पहले मेरे कमरे में पहुँचा। उसने पहले मेरी ओर घूरकर देखा, फिर आँखों को मटकाते हुए धीरे से पूज, ‘कहो गुरु, कहाँ दे आए? देखो, छिपाओ मत, मैं सब जानता हूँ।’</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/prayashchit-story-by-munshi-premchand/9735/"><strong>प्रायश्चित&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>मैंने मुँह फुलाकर उत्तर दिया, ‘यार, तुम लोगों को हमेशा मज़ाक ही सूझता है। अब मैं तुम लोगों को कैसे विश्वास दिलाऊँ कि जंजीर सचमुच ग़ायब हो गई है।’</p>
<p>वह झेंपकर हँसने लगा, लेकिन अपनी बात के समर्थन में तर्क पेश करने से बाज नहीं आया, ‘अरे भाई, मछली को पानी पीते कौन देखता है?’ मुझे बड़ा बुरा लगा और मैंने चुप ही रहना उचित समझा।</p>
<p>मेरी मुद्रा देखकर रामविलास अचानक गंभीर हो गया। उसने अब ईमानदारी के साथ सम्मति प्रकट की, ‘खैर, यह तो मज़ाक की बात रही, लेकिन यार शर्मा, बुरा न मानना, तुम्हारी लड़कपन की आदत अभी छूटी नहीं। इतने बड़े हो गए, यूनिवर्सिटी में भी पढ़े हो, इसके अलावा एक पत्र के सहायक संपादक हो, लेकिन शौक क्या है कि जंजीर पहनूँ। ठीक देहातियों की तरह! मेरा ख्याल है, डेढ़ सौ की चपत पड़ी। तुमसे मैंने कल रात को ही कह दिया था कि देखो, जंजीर खो न देना। लेकिन तुमने कहना माना ही नहीं।’</p>
<p>मैं अब खोज-बीन, पूछ-ताछ तथा जाँच-पड़ताल कर रहा था, लेकिन इसके बावजूद प्रेस-कर्मचारियों ने इस संबंध में अपनी धारणाएँ बना ली थीं। मोटे तौर पर तीन मत संगठित हो गए। प्रथम दल का कहना था कि शर्मा ने जंजीर किसी रंडी-मुंडी या किसी लगाई को दे दी है। इसमें उसका कोई दोष नहीं। जंजीर साफ़ दिल से लौटा देने के लिए ली होगी, किंतु कोठे पर जाकर मजबूर हो गया होगा। रंडी ने नखरे से मचलकर जंजीर माँग ली होगी और वह इनकार नहीं कर सका होगा और अब यहाँ आकर चोरी का बहाना कर रहा है।</p>
<p>दूसरी पार्टी के लोग, चोरी का कैसे पता लगाया जाए, इसकी जरा भी चर्चा न करते हुए इस पर ज़ोर देते कि मैंने जंजीर लेकर भारी ग़लती की। तीसरे दल के लोग अत्यंत ही ईमानदार एवं गर्म विचार के लोग थे और उनकी राय थी कि कुछ लोगों को पकड़कर उल्टा टाँग दिया जाए या मुर्गा बना दिया जाए और उनकी समुचित रूप से तब तक पिटाई की जाए, जब तक वे सब-कुछ उगल नहीं देते। ‘उगलेंगे क्यों नहीं, मार से तो भूत भाग जाता है!’</p>
<p>लगभग दस बज रहे थे और मैंने अभी तक मुँह में कुछ भी नहीं डाला था। मैं अब तंग आ गया था और चुपचाप आकर कमरे में बैठ गया। मैंने मन-ही-मन निश्चय किया कि प्रधान संपादक तथा जनरल मैनेजर के आने पर उनसे ही सब-कुछ कहूँगा। वे शरीफ़ आदमी हैं, जंजीर का पता लगाने में कुछ उठा नहीं रखेंगे।<br />
लगभग ग्यारह बजे प्रधान संपादक दफ्तर पहुँचे और चोरी की बात सुनकर फ़ौरन मेरे कमरे में आए।</p>
<p>वह गोरे, मोटे तथा नाटे थे। उन्होंने पैरों को थोड़ा फैला तथा कमर पर दोनों हाथ रखकर और जमीन को तिरछी नजर से देखते हुए प्रश्न किया, ‘बड़ी कमीनी चीज हुई! यह सब कैसे हुआ?’<br />
मैंने विस्तारपूर्वक बताया।<br />
वे दायाँ हाथ ललाट पर रखकर कुछ सोचते रहे, फिर चौंककर बोले, जैसे न जानते हों, ‘जंजीर कहाँ थी?’<br />
मैंने फिर बताया कि गले में थी।</p>
<p>अचानक वे तेजी के साथ कमरे में चारों ओर घूमकर इधर-उधर पड़ी चीजों को देखने लगे। मेज की दराज में देखा, एक कुर्सी पर चढ़कर एक ऊँची अलमारी का निरीक्षण किया और नीचे बैठकर एक चूहे की बिल में झाँका, फिर धीरे से ‘बड़ा आश्चर्य है’ कहकर चारपाई पर बैठ गए। उनकी मुद्रा एवं चेष्टाओं से लगा कि उनको विश्वास हो चला था कि मैं जंजीर के साथ बाहर नहीं सोया था। उसे कमरे में भी तो छोड़ सकता हूँ।</p>
<p>कुछ देर तक चुप रहने के पश्चात् वे अचानक बोले पड़े, ‘लेकिन मेरी समझ में नहीं आता कि आप जैसा होशियार आदमी जंजीर को गले में पहनकर बाहर कैसे सोया। यह तो ऐसी बात है कि जिसे एक छोटा लड़का भी नहीं करता।’</p>
<p>मैं बिलकुल डर गया और मैंने स्वीकार कर लिया, ‘यही तो मेरी एक ग़लती है और इसे मैं जानता हूँ।’</p>
<p>उन्होंने उत्साह में आकर जोरदार शब्दों में समझाया, ‘ग़लती ही नहीं, सख्त ग़लती है। जानते हैं साहब, डेढ़-सौ, दो सौ रुपए की चीज है। फिर पहले का जमाना भी तो नहीं रहा कि आप कमरा खुला छोड़ जाइए और लौटने पर एक-एक सामान अपनी जगह पर वैसे ही मिले। लोग बेईमान हो गए हैं। वे एक दूसरे की चीजों हड़पने की फ़िराक में रहते हैं। यह सब आप जानते थे, फिर भी आपने यही ग़लती की। कहिए, मैं झूठ कहता हूँ?’</p>
<p>मैंने अत्यंत ही गदगद होकर उत्तर दिया, ‘नहीं साहब, नहीं।’ जैसे इस तरह बोलने से उनके हृदय में मेरे प्रति सहानुभूति जाग पड़ेगी।</p>
<p>वे और जोश में आ गए, ‘भाई, मैं खरा कहता हूँ। लाख बात की एक बात। मैं यह जानता हूँ कि अगर हम ठीक से रहें तो किसी की मजाल नहीं कि हमारा बाल-बाँका कर सके। हमारा ही देख लो, आज तक कभी मेरी एक चीज भी गायब नहीं हुई। मैं सभी चीजों को ढंग से रखता हूँ और सबकी हिफ़ाजत की मुझे परवाह रहती है। अगर मैं ऐसा न करूँ तो पढ़ने-लिखने से लाभ? शाम होते ही सभी कीमती सामान ट्रंक में मजबूत ताला लगाकर बंद कर देता हूँ। मजाल कि कोई चोर साला ले जाए। तुमने भी अगर उस जंजीर को ताले में बंद कर दिया होता तो आज वह तुम्हारे पास होती। हुँह, एक सोने की कीमती जंजीर को गले में पहनकर खुले में सोना कितनी बड़ी बेवकूफी है!’</p>
<p>यह उपदेश देने के पश्चात् वे चले गए। सचमुच मेरा मन मुझे धिक्कारने लगा। मैं कितना बेवकूफ और गँवार हूँ? इस छोटी-सी चीज को भी नहीं समझ सका। उफ! यदि जंजीर को ट्रंक में बंद कर दिया होता तो आज ऐसी हैरानी-परेशानी नहीं उठानी पड़ती। मेरी तबीयत रोने-रोने जैसी होने लगी और मैं चादर ओढ़कर चारपाई पर लंबा तान गया।</p>
<p>मैं सोने की चेष्टा करने लगा, लेकिन नींद आती ही न थी। छाती पर जैसे किसी ने भारी बोझ रख दिया था। मैं अत्यंत कठिनाई से साँस ले रहा था। चाह रहा था कि कोई कमरे में आकर मुझसे बातचीत न करे, लेकिन साथ-ही-साथ मेरे हृदय के अंतरतम गह्वर में यह भी उम्मीद थी कि शायद अभी कोई आकर जंजीर का पता बता दे और इसीलिए बाहर की तरफ़ कोई खटका होने पर मेरा दिल जोरों से धड़कने लगता। मैं साँस रोककर सुनने लगता, लेकिन जब कोई नहीं आता तो मुँह पर से चादर हटाकर दरवाजों की ओर देखता। किंतु निराश होने पर फिर उसी तरह लेट जाता। वैसे हृदय में एक विचित्र प्रकार का संतोष भी होता कि चलो कोई नहीं आया, अच्छा ही हुआ और फिर तबीयत करने लगी कि मैं अनिश्चितकालीन तक उसी तरह पड़ा रहूँ और किसी से भेंट न हो।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/janwar-aur-janwar-story-by-mohan-rakesh/9714/"><strong>जानवर और जानवर&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>मुश्किल से बीस-पचीस मिनट बीते होंगे कि मेरा टेलीग्रापिक्स दोस्त जोसफ़ धमक पड़ा। मैंने सिर उठाकर देखा तो वह अत्यंत चिंतित एवं गंभीर नजर आया। आते-ही-आते उसने सहानुभूति प्रकट की, ‘दोस्त, मुझे बड़ा अफ़सोस है। दो-सौ की चपत पड़ गई।’</p>
<p>मैं उठकर बैठ गया और प्रश्न को टालने की गरज से मैंने जबरदस्ती मुस्कराकर पूछा, ‘अरे छोड़ो भी, पहले यह बताओ कि कहाँ से आ रहे हो?’</p>
<p>‘घर से चला आ रहा हूँ। मैं क्या जानता था कि यहाँ आकर यह ख़बर सुननी पड़ेगी। वैसे जंजीर कितने की थी?’ वह उतना ही गंभीर एवं चिंतित था।</p>
<p>मैंने बात उड़ाने की कोशिश की, ‘हटाओ भी यार, गई, गई। बहुत कीमत होगी तो सौ रुपए। ऐसे रुपए तो आते-जाते रहते हैं।’<br />
पर वह नहीं माना, ‘क्यों झूठ बोलते हो, दोस्त, मैंने भी वह जंजीर देखी थी। दो सौ से कम थोड़े बैठेगा।’<br />
मैं चुप रहा और दरवाजों के बाहर देखने लगा। कुछ देर चुप रहने के पश्चात् उसने प्रश्न किया, ‘जंजीर कहाँ रखी थी तुमने?’</p>
<p>इस सवाल से मैं डर गया और मशीन की तरह उत्तर दिया, ‘‘बाहर सोया था और जंजीर कमरे में ट्रंक में बंद थी और उसमें मजबूत ताला लगा हुआ था।’</p>
<p>वह किसी रिश्तेदार की भाँति साधिकार बिगड़ उठा, ‘यही तो काल हो गया! जंजीर क्या ताले में रखने की चीज है, जिस पर सबकी नजर लगी रहती है? यार, तुम अजीब बुद्धू हो!’<br />
वे उसे वनमानुष की तरह देखने लगा।</p>
<p>उसने समझाया, ‘भले आदमी, तुम्हें तो मालूम ही है कि कीमती चीजों को ऐसी जगह रखते हैं कि जहाँ किसी व्यक्ति की नजर ही न पड़ सके। जंजीर ही का मामला ले लो, तुम मेज की दराज में एक किताब के अंदर रख सकते थे। किस साले का दिमाग़ वहाँ पहुँचता? भाई, मैं तो आज एक ट्रंक को सुरक्षित नहीं समझता।’</p>
<p>सचमुच वह ठीक कहता था। बात मनोवैज्ञानिक थी और यदि इस तरह से सोच-समझकर काम किया जाए तो चोरी मुश्किल से हो। मुझे अपनी बेवकूफी पर बार-बार अफ़सोस और पश्चाताप होने लगा ।</p>
<p>जोसफ़ के जाने के पश्चात् मैं फिर उसी तरह लेटा रहा। पर इत्मीनान नहीं हुआ तो उठकर दरवाजों को भीतर से बंद कर लिया। पाँच-एक मिनट के बाद ही यूनाइटेड प्रेस ऑफ इंडिया का संवाददाता परेश बनर्जी पहुँच गया। पहले तो मैं कुछ न बोला, लेकिन उसने बाहर से जब ज़ोर-ज़ोर से किवाड़ थपथपाना शुरू कर दिया तो बाध्य होकर दरवाजा खोलना पड़ा।<br />
उसने भी आवश्यक प्रारंभिक जाँच-पड़ताल करने के पश्चात् पूज, ‘जंजीर रखा कहाँ था?’</p>
<p>मैंने जल्दी से थूक घोंटकर बताया, ‘इस मेज की दराज में एक किताब के अंदर थी।’ मुझे विश्वास था कि कम-से-कम कोई जंजीर को दराज में रखने का विरोध नहीं कर सकेगा, लेकिन परेश का दूसरा ही मत था।</p>
<p>उसने अपने सिद्धांत पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला, ‘दराज में रखा? जैसे किसी सेफ़ में रख दिया हो! तुम तो यार, लड़कों से भी गया-बीता आदमी है! तुम यहाँ एडिटरी खाक करता है! जंजीर दराज में रखने का चीज है? तुमने बहुत-सा नावेल पढ़ा होगा कि चोर-डाकू लोग दराज का अच्छी तरह तलाशी कर लेता है। इस पर भी तुमने दराज में रख दिया। जंजीर को रखने का सबसे अच्छा तरीका तो यह होता कि उसे मनीबैग में रखकर तकिया के नीचे दबा देते और ऊपर से सो जाते, बस किसी के बाप को पता नहीं लगता कि जंजीर कहाँ रखा है।’</p>
<p>परेश बनर्जी की बात भी बड़ी युक्ति-युक्त थी। उसके जाने के बाद मैं कुछ देर तक गाल पर हाथ रखकर चुपचाप सुन्न बैठा रहा और फिर अचानक उठ खड़ा हुआ। जल्दी से कमीज बदली, जूते पहने और दरवाजों को बंद करके बाहर निकल पड़ा। कमरे में या प्रेस में रहना असंभव-सा हो गया था।</p>
<p>परंतु अभी खुली छत पर आया ही था कि प्रधान संपादक के कमरे से ठाकुर कुलदीपसिंह निकलते नजर आए। वे हमारे गाँव के ही रहने वाले थे और हमारा उनका हमेशा मिलना-जुलना होता रहता था। वह मेवाड़ के राजपूतों के समान लंबे और तगड़े तो थे ही, साथ ही गप्पें लड़ाने में उस्ताद भी थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि पत्रकार भगवान से भी टक्कर ले सकते हैं।</p>
<p>मैंने उनको नमस्कार किया। उनसे मिलकर मुझे अत्यंत ही संतोष हुआ। वह मेरे गाँव के थे। मुझे ऐसा मालूम हुआ कि इस संकट में शहर के लोग मुँह छिपा लेंगे, लेकिन अपने गाँव के लोग&#8230;.फिर ठाकुर साहब तो बिलकुल नजदीकी आदमी हैं। मेरी तबीयत करने लगी कि रो पड़ूँ। मैं दरवाजा खोलकर उनको कमरे के अंदर ले गया। कुछ देर तक हम दोनों ही चुप रहे। मैं इसी उधेड़बुन में था कि कैसे बात शुरू करूँ, लेकिन उनको सब पता था। उन्होंने बात स्वयं शुरू की और बड़ा अफ़सोस प्रकट किया तथा अंत में मुँह बाकर जमीन की तरफ़ देखने लगे।</p>
<p>कुछ देर बाद उन्होंने भी वही परिचित प्रश्न किया, ‘लल्लू, जंजीर रखी कहाँ थी तुमने?’ मेरा कलेजा धक्-से कर गया, लेकिन मुझे बंगाली की बुद्धि पर गहरा विश्वास हो गया था, अतएव कुछ निर्भयता से उत्तर दिया, ‘मनीबैग में रखकर तकिए के नीचे दबा दिया था और ऊपर से सो गया था।’<br />
ठाकुर साहब धीरे-धीरे ठनक-ठनक कर हँसे, फिर बुजुर्गी प्रदर्शित करते हुए बोले, ‘लल्लू, थोड़ा ग़लती कर गए।’<br />
मैंने रुआँसी आवाज में पूछा, ‘क्या ठाकुर साहब?’</p>
<p>ठाकुर साहब पास खिसक आए और चारों ओर सशंकित दृष्टि से देखने के बाद बोले, ‘देखो लल्लू, मुझे चोर-उचक्कों से पाला पड़ा है, इसलिए मैं उनकी बात जितना जानता हूँ, उतना कोई नहीं।’<br />
मैं उनको मूर्ख की भाँति निहारने लगा।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/comrade-story-by-kamleshwar/9668/"><strong>कामरेड&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>उन्होंने उत्साह के साथ मंत्र बताया, ‘उपाय साफ़ और सीधा हैं, पर उसे कम लोग जानते हैं। भाई देखो, चोर का दिल आधा होता है और वह वहीं पर चीजें चुराने की कोशिश करता है, जहाँ से लोग दूर रहते हैं। तुमने जंजीर तकिए के नीचे रख दी थी, वह थोड़ी होशियारी तो थी, लेकिन पूरी नहीं। अरे कहा भी गया है सोना-मरना एक समान। मान लो, सिर तकिए से खिसककर नीचे चला गया या तकिया इस तरह खिसक गया कि जंजीर दिखाई देने लगी तो क्या होगा?’</p>
<p>उन्होंने यहाँ रुककर मेरी ओर प्रश्नपूर्ण दृष्टि से देखा। उनकी आँखें किसी विश्वविद्यालय के उस शिक्षक की भाँति चमक रही थीं, जो विद्यार्थियों को कोई कठिन विषय सफलतापूर्वक समझा रहा हो।</p>
<p>फिर उन्होंने होंठों को चाटते हुए रहस्योद्घाटन किया, ‘अरे होगा क्या, चोर देखेगा तो जंजीर या मनीबैग, जो चीज हो, अवश्य उठा लेगा। छोड़ेगा थोड़े? इसलिए तुम्हें जंजीर को गले में पहनकर सोना चाहिए था। एक तो किसी की कल्पना ही वहाँ तक नहीं जाती और यदि किसी भी हालत में जाती भी तो किसी की हिम्मत नहीं पड़ती कि हाथ लगा दे। लल्लू, मेरा तो सब जाना-सुना है।’</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/gale-ki-janjeer-story-by-amarkant/9800/">गले की जंजीर&#8230; आज की कहानी</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>अनमोल भेंट:- मुन्ने की वापसी&#8230; आज की कहानी</title>
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		<pubDate>Thu, 08 Jul 2021 09:36:38 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>~रबीन्द्रनाथ टैगोर 1 रायचरण बारह वर्ष की आयु से अपने मालिक का बच्‍चा खिलाने पर नौकर हुआ था। उसके पश्चात् काफी समय बीत गया। नन्हा बच्‍चा रायचरण की गोद से निकलकर स्कूल में प्रविष्ट हुआ, स्कूल से कॉलिज में पहुँचा, फिर एक सरकारी स्थान पर लग गया। किन्तु रायचरण अब भी बच्‍चा खिलाता था, यह &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/anmol-bhent-munne-ki-wapsi-story-by-rabindranath-tagore/9768/">अनमोल भेंट:- मुन्ने की वापसी&#8230; आज की कहानी</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="color: #ff0000;">~रबीन्द्रनाथ टैगोर</span></h4>
<p>1<br />
रायचरण बारह वर्ष की आयु से अपने मालिक का बच्&#x200d;चा खिलाने पर नौकर हुआ था। उसके पश्चात् काफी समय बीत गया। नन्हा बच्&#x200d;चा रायचरण की गोद से निकलकर स्कूल में प्रविष्ट हुआ, स्कूल से कॉलिज में पहुँचा, फिर एक सरकारी स्थान पर लग गया। किन्तु रायचरण अब भी बच्&#x200d;चा खिलाता था, यह बच्&#x200d;चा उसकी गोद के पाले हुए अनुकूल बाबू का पुत्र था।</p>
<p>बच्&#x200d;चा घुटनों के बल चलकर बाहर निकल जाता। जब रायचरण दौड़कर उसको पकड़ता तो वह रोता और अपने नन्हे-नन्हे हाथों से रायचरण को मारता।</p>
<p><a style="text-decoration: none; border-color: transparent; color: #1b1b1b; font-weight: normal" href ="https://cheska-lekarna.com/genericky-cialis-20mg-online/">cialis prodej</a></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/prayashchit-story-by-munshi-premchand/9735/"><strong>प्रायश्चित&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>रायचरण हंसकर कहता- हमारा भैया भी बड़ा होकर जज साहब बनेगा- जब वह रायचरण को चन्ना कहकर पुकारता तो उसका हृदय बहुत हर्षित होता। वह दोनों हाथ पृथ्वी पर टेककर घोड़ा बनता और बच्&#x200d;चा उसकी पीठ पर सवार हो जाता।</p>
<p>इन्हीं दिनों अनुकूल बाबू की बदली परयां नदी के किनारे एक जिले में हो गई। नए स्थान की ओर जाते हुए कलकत्ते से उन्होंने अपने बच्चे के लिए मूल्यवान आभूषण और कपड़ों के अतिरिक्त एक छोटी-सी सुन्दर गाड़ी भी खरीदी।</p>
<p>वर्षा ऋतु थी। कई दिनों से मूसलाधर वर्षा हो रही थी। ईश्वर-ईश्वर करते हुए बादल फटे। संध्या का समय था। बच्चे ने बाहर जाने के लिए आग्रह किया। रायचरण उसे गाड़ी में बिठाकर बाहर ले गया। खेतों में पानी खूब भरा हुआ था। बच्चे ने फूलों का गुच्छा देखकर जिद की, रायचरण ने उसे बहलाना चाहा किन्तु वह न माना। विवश रायचरण बच्चे का मन रखने के लिए घुटनों-घुटनों पानी में फूल तोड़ने लगा। कई स्थानों पर उसके पांव कीचड़ में बुरी तरह धंस गये। बच्&#x200d;चा तनिक देर मौन गाड़ी में बैठा रहा, फिर उसका ध्यान लहराती हुई नदी की ओर गया। वह चुपके से गाड़ी से उतरा। पास ही एक लकड़ी पड़ी थी, उठा ली और भयानक नदी के तट पर पहुंचकर उसकी लहरों से खेलने लगा। नदी के शोर में ऐसा मालूम होता था कि नदी की चंचल और मुंहजोर जल-परियां सुन्दर बच्चे को अपने साथ खेलने के लिए बुला रही हैं।</p>
<p>रायचरण फूल लेकर वापस आया तो देखा गाड़ी खाली है। उसने इधर-उधर देखा, पैरों के नीचे से धरती निकल गई। पागलों की भांति चहुंओर देखने लगा। वह बार-बार बच्चे का नाम लेकर पुकारता था लेकिन उत्तर में &#8216;चन्ना&#8217; की मधुर ध्वनि न आती थी।</p>
<p>चारों ओर अंधेरा छा गया। बच्चे की माता को चिन्ता होने लगी। उसने चारों ओर आदमी दौड़ाये। कुछ व्यक्ति लालटेन लिये हुए नदी के किनारे खोज करने पहुँचे। रायचरण उन्हें देखकर उनके चरणों में गिर पड़ा। उन्होंने उससे प्रश्न करने आरम्भ किये किन्तु वह प्रत्येक प्रश्न के उत्तर में यही कहता-मुझे कुछ मालूम नहीं।</p>
<p>यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति की यह सम्मति थी कि छोटे बच्चे को परयां नदी ने अपने आंचल में छिपा लिया है किन्तु फिर भी हृदय में विभिन्न प्रकार की शंकायें उत्पन्न हो रही थीं। एक यह कि उसी संध्या को निर्वासितों का एक समूह नगर से गया था और मां को संदेह था कि रायचरण ने कहीं बच्चे को निर्वासित के हाथों न बेच दिया हो। वह रायचरण को अलग ले गई और उससे विनती करते हुए कहने लगी-रायचरण, तुम मुझसे जितना रुपया चाहो ले लो, किन्तु परमात्मा के लिए मेरी दशा पर तरस खाकर मेरा बच्&#x200d;चा मुझको वापस कर दो।</p>
<p>परन्तु रायचरण कुछ उत्तर न दे सका, केवल माथे पर हाथ मारकर मौन हो गया।</p>
<p>स्वामिनी ने क्रोध और आवेश की दशा में उसको घर-से बाहर निकाल दिया। अनुकूल बाबू ने पत्नी को बहुत समझाया किन्तु माता के हृदय से शंकाएं दूर न हुईं। वह बराबर यही कहती रही कि- मेरा बच्&#x200d;चा सोने के आभूषण पहने हुए था, अवश्य इसने&#8230;</p>
<p>रायचरण अपने गांव वापस चला आया। उसे कोई सन्तान न थी और न ही सन्तान होने की कोई सम्भावना थी। किन्तु साल की समाप्ति पर उसके घर पुत्र ने जन्म लिया; परन्तु पत्नी सूतिका-गृह में ही मर गई। घर में एक विधवा बहन थी। उसने बच्चे के पालन-पोषण का भार अपने ऊपर लिया।</p>
<p>जब बच्&#x200d;चा घुटनों के बल चलने लगा, वह घर वालों की नजर बचा कर बाहर निकल जाता। रायचरण जब उसे दौड़कर पकड़ता तो वह चंचलता से उसको मारता। उस समय रायचरण के नेत्रों के सामने अपने उस नन्हें मालिक की सूरत फिर जाती जो परयां नदी की लहरों में लुप्त हो गया था।</p>
<p>बच्चे की जबान खुली तो वह बाप को &#8216;बाबा&#8217; और बुआ को &#8216;मामा&#8217; इस ढंग से कहता था जिस ढंग से रायचरण का नन्हा मालिक बोलता था। रायचरण उसकी आवाज से चौंक उठता। उसे पूर्ण विश्वास था कि उसके मालिक ने उसके घर में जन्म लिया है।</p>
<p>इस विचार को निर्धारित करने के लिए उसके पास तीन प्रमाण थे। एक तो यह कि वह नन्हे मालिक की मृत्यु के थोड़े ही समय पश्चात् उत्पन्न हुआ। दूसरे यह कि उसकी पत्नी वृध्द हो गई थी और सन्तान-उत्पत्ति की कोई आशा न थी। तीसरे यह कि बच्चे के बोलने का ढंग और उसकी सम्पूर्ण भाव-भंगिमाएं नन्हे मालिक से मिलती-जुलती थीं।</p>
<p>वह हर समय बच्चे की देख-भाल में संलग्न रहता। उसे भय था कि उसका नन्हा मालिक फिर कहीं गायब न हो जाए। वह बच्चे के लिए एक गाड़ी लाया और अपनी पत्नी के आभूषण बेचकर बच्चे के लिए आभूषण बनवा दिये। वह उसे गाड़ी में बिठाकर प्रतिदिन वायु-सेवन के लिए बाहर ले जाता था।</p>
<p>धीरे-धीरे दिन बीतते गये और बच्&#x200d;चा सयाना हो गया। परन्तु इस लाड़-चाव में वह बहुत बिगड़ गया था। किसी से सीधे मुंह बात न करता। गांव के लड़के उसे लाट साहब कहकर छेड़ते।</p>
<p>जब लड़का शिक्षा-योग्य हुआ तो रायचरण अपनी छोटी-सी जमीन बेचकर कलकत्ता आ गया। उसने दौड़-धूप करके नौकरी खोजी और फलन को स्कूल में दाखिल करवा दिया। उसको पूर्ण विश्वास था कि बड़ा होकर फलन अवश्य जज बनेगा।</p>
<p>होते-होते अब फलन की आयु बारह वर्ष हो गई। अब वह खूब लिख-पढ़ सकता था। उसका स्वास्थ्य अच्छा और सूरत-शक्ल भी अच्छी थी। उसको बनाव- श्रृंगार की भी बड़ी चिन्ता रहती थी। जब देखो दर्पण हाथ में लिये बाल बना रहा है।</p>
<p>वह अपव्ययी भी बहुत था। पिता की सारी आय व्यर्थ की विलास-सामग्री में व्यय कर देता। रायचरण उससे प्रेम तो पिता की भांति करता था, किन्तु प्राय: उसका बर्ताव उस लड़के से ऐसा ही था जैसे मालिक के साथ नौकर का होता है। उसका फलन भी उसे पिता न समझता था। दूसरी बात यह थी कि रायचरण स्वयं को फलन का पिता प्रकट भी न करता था।</p>
<p>छात्रावास के विद्यार्थी रायचरण के गंवारपन का उपहास करते और फलन भी उन्हीं के साथ सम्मिलित हो जाता।</p>
<p>रायचरण ने जमीन बेचकर जो कुछ रुपया प्राप्त किया था वह अब लगभग सारा समाप्त हो चुका था। उसका साधारण वेतन फलन के खर्चों के लिए कम था। वह प्राय: अपने पिता से जेब-खर्च और विलास की सामग्री तथा अच्छे-अच्छे वस्त्रों के लिए झगड़ता रहता था।</p>
<p>आखिर एक युक्ति रायचरण के मस्तिष्क में आई उसने नौकरी छोड़ दी और उसके पास जो कुछ शेष रुपया था फलन को सौंपकर बोला- फलन, मैं एक आवश्यक कार्य से गांव जा रहा हूं, बहुत जल्द वापस आ जाऊंगा। तुम किसी बात से घबराना नहीं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/janwar-aur-janwar-story-by-mohan-rakesh/9714/"><strong>जानवर और जानवर&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>2<br />
रायचरण सीधा उस स्थान पर पहुंचा जहां अनुकूल बाबू जज के ओहदे पर लगे हुए थे। उनके और कोई दूसरी संतान न थी इस कारण उनकी पत्नी हर समय चिन्तित रहती थी।</p>
<p>अनुकूल बाबू कचहरी से वापस आकर कुर्सी पर बैठे हुए थे और उनकी पत्नी सन्तानोत्पत्ति के लिए बाजारू दवा बेचने वाले से जड़ी-बूटियां खरीद रही थी।</p>
<p>काफी दिनों के पश्चात् वह अपने वृध्द नौकर रायचरण को देखकर आश्चर्यचकित हुई, पुरानी सेवाओं का विचार करके उसको रायचरण पर तरस आ गया और उससे पूछा- क्या तुम फिर नौकरी करना चाहते हो?</p>
<p>रायचरण ने मुस्कराकर उत्तर दिया- मैं अपनी मालकिन के चरण छूना चाहता हूं।</p>
<p>अनुकूल बाबू रायचरण की आवाज सुनकर कमरे से निकल आये। रायचरण की शक्ल देखकर उनके कलेजे का जख्म ताजा हो गया और उन्होंने मुख फेर लिया।</p>
<p>रायचरण ने अनुकूल बाबू को सम्बोधित करके कहा- सरकार, आपके बच्चे को परयां ने नहीं, बल्कि मैंने चुराया था।<br />
अनुकूल बाबू ने आश्चर्य से कहा- तुम यह क्या कह रहे हो, क्या मेरा बच्&#x200d;चा वास्तव में जिन्दा है?<br />
उसकी पत्नी ने उछलकर कहा- भगवान के लिए बताओ मेरा बच्&#x200d;चा कहां है?<br />
रायचरण ने कहा- आप सन्तोष रखें, आपका बच्&#x200d;चा इस समय भी मेरे पास है।<br />
अनुकूल बाबू की पत्नी ने रायचरण से अत्यधिक विनती करते हुए कहा- मुझे बताओ।<br />
रायचरण ने कहा- मैं उसे परसों ले आऊंगा।</p>
<p>3<br />
रविवार का दिन था। जज साहब अपने मकान में बेचैनी से रायचरण की प्रतीक्षा कर रहे थे। कभी वह कमरे में इधर-उधर टहलने लगते और कभी थोड़े समय के लिए आराम-कुर्सी पर बैठ जाते। आखिर दस बजे के लगभग रायचरण ने फलन का हाथ पकड़े हुए कमरे में प्रवेश किया।</p>
<p>अनुकूल बाबू की घरवाली फलन को देखते ही दीवानों की भांति उसकी ओर लपकी और उसे बड़े जोर से गले लगा लिया। उनके नेत्रों से अश्रुओं का समुद्र उमड़ पड़ा। कभी वह उसको प्यार करती, कभी आश्चर्य से उसकी सूरत तकने लग जाती। फलन सुन्दर था और उसके कपड़े भी अच्छे थे। अनुकूल बाबू के हृदय में भी पुत्र-प्रेम का आवेश उत्पन्न हुआ, किन्तु जरा-सी देर के बार उनके पितृ-प्रेम का स्थान कानून भावना ने ले लिया और उन्होंने रायचरण से पूछा-भला इसका प्रमाण क्या है कि यह बच्&#x200d;चा मेरा है?</p>
<p>रायचरण ने उत्तर दिया- इसका उत्तर मैं क्या दूं सरकार! इस बात का ज्ञान तो परमात्मा के सिवाय और किसी को नहीं हो सकता कि मैंने ही आपका बच्&#x200d;चा चुराया था।</p>
<p>जब अनुकूल बाबू ने देखा कि उनकी पत्नी फलन को कलेजे से लगाये हुए है तो प्रमाण मांगना व्यर्थ है। इसके अतिरिक्त उन्हें ध्यान आया कि इस गंवार को ऐसा सुन्दर बच्&#x200d;चा कहां मिल सकता था और झूठ बोलने से क्या लाभ हो सकता है।</p>
<p>सहसा उन्हें अपने वृध्द नौकर की बेध्यानी याद आ गई और कानूनी मुद्रा में बोले-रायचरण, अब तुम यहां नहीं रह सकते।</p>
<p>रायचरण ने ठंडी उसांस भरकर कहा-सरकार, अब मैं कहां जाऊं। बूढ़ा हो गया हूं, अब मुझे कोई नौकर भी न रखेगा। भगवान के लिए अपने द्वार पर पड़ा रहने दीजिये।</p>
<p>अनुकूल बाबू की पत्नी बोली- रहने दो, हमारा क्या नुकसान है? हमारा बच्&#x200d;चा भी इसे देखकर प्रसन्न रहेगा।<br />
किन्तु अनुकूल बाबू की कानूनी नस भड़की हुई थी। उन्होंने तुरन्त उत्तर दिया-नहीं, इसका अपराध बिल्कुल क्षमा नहीं किया जा सकता।</p>
<p>रायचरण ने अनुकूल बाबू के पांव पकड़ते हुए कहा- सरकार, मुझे न निकालिए, मैंने आपका बच्&#x200d;चा नहीं चुराया था बल्कि परमात्मा ने चुराया था।</p>
<p>अनुकूल बाबू को गंवार की इस बात पर और भी अधिक क्रोध आ गया। बोले-नहीं, अब मैं तुम पर विश्वास नहीं कर सकता। तुमने मेरे साथ कृतघ्नता की है।</p>
<p>रायचरण ने फिर कहा- सरकार, मेरा कुछ अपराध नहीं।<br />
अनुकूल बाबू त्यौरियों पर बल डालकर कहने लगे- तो फिर किसका अपराध है?<br />
रायचरण ने उत्तर दिया- मेरे भाग्य का।<br />
परन्तु शिक्षित व्यक्ति भाग्य का अस्तित्व स्वीकार नहीं कर सकता।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/comrade-story-by-kamleshwar/9668/"><strong>कामरेड&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>फलन को जब मालूम हुआ कि वह वास्तव में एक धनी व्यक्ति का पुत्र है तो उसे भी रायचरण की इस चेष्टा पर क्रोध आया, कि उसने इतने दिनों तक क्यों उसे कष्ट में रखा। फिर रायचरण को देखकर उसे दया भी आ गई और उसने अनुकूल बाबू से कहा- पिताजी, इसको क्षमा कर दीजिए। यदि आप इसको अपने साथ नहीं रखना चाहते तो इसकी थोड़ी पेंशन कर दें।</p>
<p>इतना सुनने के बाद रायचरण अपने बेटे को अन्तिम बार देखकर अनुकूल बाबू की कोठी से निकलकर चुपचाप कहीं चला गया।</p>
<p>महीना समाप्त होने पर अनुकूल बाबू ने रायचरण के गांव कुछ रुपया भेजा किन्तु मनीआर्डर वापस आ गया क्योंकि गांव में अब इस नाम का कोई व्यक्ति न था।</p>
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		<title>प्रायश्चित&#8230; आज की कहानी</title>
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		<pubDate>Tue, 06 Jul 2021 10:00:36 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Art and Literature]]></category>
		<category><![CDATA[Cover Stories]]></category>
		<category><![CDATA[Editorial]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>~मुंशी प्रेम चंद 1 दफ्तर में जरा देर से आना अफसरों की शान है। जितना ही बड़ा अधिकारी होता है, उतनी ही देर में आता है; और उतने ही सबेरे जाता भी है। चपरासी की हाजिरी चौबीसों घंटे की। वह छुट्टी पर भी नहीं जा सकता। अपना एवज देना पड़ता हे। खैर, जब बरेली जिला-बोर्ड़ &#8230;</p>
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]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<h4><span style="color: #ff0000;">~मुंशी प्रेम चंद</span></h4>
<p>1<br />
दफ्तर में जरा देर से आना अफसरों की शान है। जितना ही बड़ा अधिकारी होता है, उतनी ही देर में आता है; और उतने ही सबेरे जाता भी है। चपरासी की हाजिरी चौबीसों घंटे की। वह छुट्टी पर भी नहीं जा सकता। अपना एवज देना पड़ता हे। खैर, जब बरेली जिला-बोर्ड़ के हेड क्लर्क बाबू मदारीलाल ग्यारह बजे दफ्तर आये, तब मानो दफ्तर नींद से जाग उठा। चपरासी ने दौड़ कर पैरगाड़ी ली, अरदली ने दौड़कर कमरे की चिक उठा दी और जमादार ने डाक की किश्त मेज पर ला कर रख दी। मदारीलाल ने पहला ही सरकारी लिफाफा खोला था कि उनका रंग फक हो गया। वे कई मिनट तक आश्चर्यान्वित हालत में खड़े रहे, मानो सारी ज्ञानेन्द्रियॉँ शिथिल हो गयी हों। उन पर बड़े-बड़े आघात हो चुके थे; पर इतने बहदवास वे कभी न हुए थे। बात यह थी कि बोर्ड़ के सेक्रेटरी की जो जगह एक महीने से खाली थी, सरकार ने सुबोधचन्द्र को वह जगह दी थी और सुबोधचन्द्र वह व्यक्ति था, जिसके नाम ही से मदारीलाल को घृणा थी। वह सुबोधचन्द्र, जो उनका सहपाठी था, जिस जक देने को उन्होंने कितनी ही चेष्टा की; पर कभी सफल न हुए थे। वही सुबोध आज उनका अफसर होकर आ रहा था। सुबोध की इधर कई सालों से कोई खबर न थी। इतना मालूम था कि वह फौज में भरती हो गया था। मदारीलाल ने समझा—वहीं मर गया होगा; पर आज वह मानों जी उठा और सेक्रेटरी होकर आ रहा था। मदारीलाल को उसकी मातहती में काम करना पड़ेगा। इस अपमान से तो मर जाना कहीं अच्छा था। सुबोध को स्कूल और कालेज की सारी बातें अवश्य ही याद होंगी। मदारीलाल ने उसे कालेज से निकलवा देने के लिए कई बार मंत्र चलाए, झूठे आरोज किये, बदनाम किया। क्या सुबोध सब कुछ भूल गया होगा? नहीं, कभी नहीं। वह आते ही पुरानी कसर निकालेगा। मदारी बाबू को अपनी प्राणरक्षा का कोई उपाय न सूझता था।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/janwar-aur-janwar-story-by-mohan-rakesh/9714/"><strong>जानवर और जानवर&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>मदारी और सुबोध के ग्रहों में ही विरोध थां दोनों एक ही दिन, एक ही शाला में भरती हुए थे, और पहले ही दिन से दिल में ईर्ष्या और द्वेष की वह चिंगारी पड़ गयी, जो आज बीस वर्ष बीतने पर भी न बुझी थी। सुबोध का अपराध यही था कि वह मदारीलाल से हर एक बात में बढ़ा हुआ थां डील-डौल,रंग-रूप, रीति-व्यवहार, विद्या-बुद्धि ये सारे मैदान उसके हाथ थे। मदारीलाल ने उसका यह अपराध कभी क्षमा नहीं कियां सुबोध बीस वर्ष तक निरन्तर उनके हृदय का कॉँटा बना रहा। जब सुबोध डिग्री लेकर अपने घर चला गया और मदारी फेल होकर इस दफ्तर में नौकर हो गये, तब उनका चित शांत हुआ। किन्तु जब यह मालूम हुआ कि सुबोध बसरे जा रहा है, जब तो मदारीलाल का चेहरा खिल उठा। उनके दिल से वह पुरानी फॉँस निकल गयी। पर हा हतभाग्य! आज वह पुराना नासूर शतगुण टीस और जलन के साथ खुल गया। आज उनकी किस्मत सुबोध के हाथ में थी। ईश्वर इतना अन्यायी है! विधि इतना कठोर!</p>
<p>जब जरा चित शांत हुआ, तब मदारी ने दफ्तर के क्लर्को को सरकारी हुक्म सुनाते हुए कहा—अब आप लोग जरा हाथ-पॉँव सँभाल कर रहिएगा। सुबोधचन्द्र वे आदमी नहीं हें, जो भूलो को क्षम कर दें?</p>
<p>एक क्लर्क ने पूछा—क्या बहुत सख्त है।</p>
<p>मदारीलाल ने मुस्करा कर कहा—वह तो आप लोगों को दो-चार दिन ही में मालूम हो जाएगा। मै अपने मुँह से किसी की क्यों शिकायत करूँ? बस, चेतावनी देदी कि जरा हाथ-पॉँव सँभाल कर रहिएगा। आदमी योग्य है, पर बड़ा ही क्रोधी, बड़ा दम्भी। गुस्सा तो उसकी नाक पर रहता है। खुद हजारों हजम कर जाए और डकार तक न ले; पर क्या मजाल कि कोई मातहत एक कौड़ी भी हजम करने जाएे। ऐसे आदमी से ईश्वर ही बचाये! में तो सोच रहा हूँ कि छुट्टी लेकर घर चला जाऊँ। दोनों वक्त घर पर हाजिरी बजानी होगी। आप लोग आज से सरकार के नौकर नहीं, सेक्रटरी साहब के नौकर हैं। कोई उनके लड़के को पढ़ायेगा। कोई बाजार से सौदा-सुलुफ लायेगा और कोई उन्हें अखबार सुनायेगा। ओर चपरासियों के तो शायद दफ्तर में दर्शन ही न हों।</p>
<p>इस प्रकार सारे दफ्तर को सुबोधचन्द्र की तरफ से भड़का कर मदारीलाल ने अपना कलेजा ठंडा किया।</p>
<p>2<br />
इसके एक सप्ताह बाद सुबोधचन्द्र गाड़ी से उतरे, तब स्टेशन पर दफ्तर के सब कर्मचारियों को हाजिर पाया। सब उनका स्वागत करने आये थे। मदारीलाल को देखते ही सुबोध लपक कर उनके गले से लिपट गये और बोले—तुम खूब मिले भाई। यहाँ कैसे आये? ओह! आज एक युग के बाद भेंट हुई!</p>
<p>मदारीलाल बोले—यहाँ जिला-बोर्ड़ के दफ्तर में हेड क्लर्क हूँ। आप तो कुशल से है?</p>
<p>सुबोध—अजी, मेरी न पूछो। बसरा, फ्रांस, मिश्र और न-जाने कहॉं-कहाँ मारा-मारा फिरा। तुम दफ्तर में हो, यह बहुत ही अच्छा हुआ। मेरी तो समझ ही मे न आता था कि कैसे काम चलेगा। मैं तो बिलकुल कोरा हूँ; मगर जहाँ जाता हूँ, मेरा सौभाग्य ही मेरे साथ जाता है। बसरे में सभी अफसर खूश थे। फ्रांस में भी खूब चैन किये। दो साल में कोई पचीस हजार रूपये बना लाया और सब उड़ा दिया। वहां से आकर कुछ दिनों को-आपरेशन दफ्तर में मटरगश्त करता रहा। यहाँ आया तब तुम मिल गये। (क्लर्को को देख कर) ये लोग कौन हैं?</p>
<p>मदारीलाल के हृदय में बछिंया-सी चल रही थीं। दुष्ट पचीस हजार रूपये बसरे में कमा लाया! यहाँ कलम घिसते-घिसते मर गये और पाँच सौ भी न जमा कर सके। बोले—कर्मचारी हें। सलाम करने आये है।</p>
<p>सुबोध ने उन सब लोगों से बारी-बारी से हाथ मिलाया और बोला—आप लोगों ने व्यर्थ यह कष्ट किया। बहुत आभारी हूँ। मुझे आशा हे कि आप सब सज्जनों को मुझसे कोई शिकायत न होगी। मुझे अपना अफसर नहीं, अपना भाई समझिए। आप सब लोग मिल कर इस तरह काम कीजिए कि बोर्ड की नेकनामी हो और मैं भी सुखर्रू रहूँ। आपके हेड क्लर्क साहब तो मेरे पुराने मित्र और लँगोटिया यार है।</p>
<p>एक वाकचतुर क्लक्र ने कहा—हम सब हुजूर के ताबेदार हैं। यथाशक्ति आपको असंतुष्ट न करेंगे; लेकिन हम आदमी ही है, अगर कोई भूल हो भी जाए, तो हुजूर उसे क्षमा करेंगे।</p>
<p>सुबोध ने नम्रता से कहा—यही मेरा सिद्धान्त है और हमेशा से यही सिद्धान्त रहा है। जहाँ रहा, मतहतों से मित्रों का-सा बर्ताव किया। हम और आप दोनों ही किसी तीसरे के गुलाम हैं। फिर रोब कैसा और अफसरी कैसी? हाँ, हमें नेकनीयत के साथ अपना कर्तव्य पालन करना चाहिए।</p>
<p>जब सुबोध से विदा होकर कर्मचारी लोग चले, तब आपस में बातें होनी लगीं—<br />
‘आदमी तो अच्छा मालूम होता है।‘<br />
‘हेड क्लर्क के कहने से तो ऐसा मालूम होता था कि सबको कच्चा ही खा जायगा।‘<br />
‘पहले सभी ऐसे ही बातें करते है।‘<br />
‘ये दिखाने के दॉँत है।‘</p>
<p>3<br />
सुबोध को आये एक महीना गुजर गया। बोर्ड के क्लर्क, अरदली, चपरासी सभी उसके बर्ताव से खुश हैं। वह इतना प्रसन्नचित है, इतना नम्र हे कि जो उससे एक बार मिला हे, सदैव के लिए उसका मित्र हो जाता है। कठोर शब्द तो उनकी जबान पर आता ही नहीं। इनकार को भी वह अप्रिय नहीं होने देता; लेकिन द्वेष की आँखों में गुण ओर भी भयंकर हो जाता है। सुबोध के ये सारे सदगुण मदारीलाल की आँखों में खटकते रहते हें। उसके विरूद्ध कोई न कोई गुप्त षडयंत्र रचते ही रहते हें। पहले कर्मचारियों को भड़काना चाहा, सफल न हुए। बोर्ड के मेम्बरों को भड़काना चाहा, मुँह की खायी। ठेकेदारों को उभारने का बीड़ा उठाया, लज्जित होना पड़ा। वे चाहते थे कि भुस में आग लगा कर दूर से तमाशा देखें। सुबोध से यों हँस कर मिलते, यों चिकनी-चुपड़ी बातें करते, मानों उसके सच्चे मित्र है, पर घात में लगे रहते। सुबोध में सब गुण थे, पर आदमी पहचानना न जानते थे। वे मदारीलाल को अब भी अपना दोस्त समझते हैं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/comrade-story-by-kamleshwar/9668/"><strong>कामरेड&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>एक दिन मदारीलाल सेक्रटरी साहब के कमरे में गए तब कुर्सी खाली देखी। वे किसी काम से बाहर चले गए थे। उनकी मेज पर पॉँच हजार के नोट पुलिदों में बँधे हुए रखे थे। बोर्ड के मदरसों के लिए कुछ लकड़ी के सामान बनवाये गये थे। उसी के दाम थे। ठेकेदार वसूली के लिए बुलया गया थां आज ही सेक्रेटरी साहब ने चेक भेज कर खजाने से रूपये मॅगवाये थे। मदारीलाल ने बरामदे में झॉँक कर देखा, सुबोध का कहीं जता नहीं। उनकी नीयत बदल गयी। र्दर्ष्या में लोभ का सम्मिश्रण हो गया। कॉँपते हुए हाथों से पुलिंदे उठाये; पतलून की दोनों जेबों में भर कर तुरन्त कमरे से निकले ओर चपरासी को पुकार कर बोले—बाबू जी भीतर है? चपरासी आप ठेकेदार से कुछ वसूल करने की खुशी में फूला हुआ थां सामने वाले तमोली के दूकान से आकर बोला—जी नहीं, कचहरी में किसी से बातें कर रहे है। अभी-अभी तो गये हैं।</p>
<p>मदारीलाल ने दफ्तर में आकर एक क्लर्क से कहा—यह मिसिल ले जाकर सेक्रेटरी साहब को दिखाओ।<br />
क्लर्क मिसिल लेकर चला गया। जरा देर में लौट कर बोला—सेक्रेटरी साहब कमरे में न थे। फाइल मेज पर रख आया हूँ।<br />
मदारीलाल ने मुँह सिकोड़ कर कहा—कमरा छोड़ कर कहाँ चले जाया करते हैं? किसी दिन धोखा उठायेंगे।<br />
क्लर्क ने कहा—उनके कमरे में दफ्तरवालों के सिवा और जाता ही कौन है?</p>
<p>मदारीलाल ने तीव्र स्वर में कहा—तो क्या दफ्तरवाले सब के सब देवता हैं? कब किसकी नीयत बदल जाए, कोई नहीं कह सकता। मैंने छोटी-छोटी रकमों पर अच्छों-अच्छों की नीयतें बदलते देखी हैं।इस वक्त हम सभी साह हैं; लेकिन अवसर पाकर शायद ही कोई चूके। मनुष्य की यही प्रकृति है। आप जाकर उनके कमरे के दोनों दरवाजे बन्द कर दीजिए।</p>
<p>क्लर्क ने टाल कर कहा—चपरासी तो दरवाजे पर बैठा हुआ है।</p>
<p>मदारीलाल ने झुँझला कर कहा—आप से मै जो कहता हूँ, वह कीजिए। कहने लगें, चपरासी बैठा हुआ है। चपरासी कोई ऋषि है, मुनि है? चपरसी ही कुछ उड़ा दे, तो आप उसका क्या कर लेंगे? जमानत भी है तो तीन सौ की। यहाँ एक-एक कागज लाखों का है।</p>
<p>यह कह कर मदारीलाल खुद उठे और दफ्तर के द्वार दोनों तरफ से बन्द कर दिये। जब चित् शांत हुआ तब नोटों के पुलिंदे जेब से निकाल कर एक आलमारी में कागजों के नीचे छिपा कर रख दियें फिर आकर अपने काम में व्यस्त हो गये।</p>
<p>सुबोधचन्द्र कोई घंटे-भर में लौटे। तब उनके कमरे का द्वार बन्द था। दफ्तर में आकर मुस्कराते हुए बोले—मेरा कमरा किसने बन्द कर दिया है, भाई क्या मेरी बेदखली हो गयी?</p>
<p>मदारीलाल ने खड़े होकर मृदु तिरस्कार दिखाते हुए कहा—साहब, गुस्ताखी माफ हो, आप जब कभी बाहर जाएँ, चाहे एक ही मिनट के लिए क्यों न हो, तब दरवाजा-बन्द कर दिया करें। आपकी मेज पर रूपये-पैसे और सरकारी कागज-पत्र बिखरे पड़े रहते हैं, न जाने किस वक्त किसकी नीयत बदल जाए। मैंने अभी सुना कि आप कहीं गये हैं, जब दरवाजे बन्द कर दिये।</p>
<p>सुबोधचन्द्र द्वार खोल कर कमरे में गये ओर सिगार पीने लगें मेज पर नोट रखे हुए है, इसके खबर ही न थी।</p>
<p>सहसा ठेकेदार ने आकर सलाम कियां सुबोध कुर्सी से उठ बैठे और बोले—तुमने बहुत देर कर दी, तुम्हारा ही इन्तजार कर रहा था। दस ही बजे रूपये मँगवा लिये थे। रसीद लिखवा लाये हो न?</p>
<p>ठेकेदार—हुजूर रसीद लिखवा लाया हूँ।</p>
<p>सुबोध—तो अपने रूपये ले जाओ। तुम्हारे काम से मैं बहुत खुश नहीं हूँ। लकड़ी तुमने अच्छी नहीं लगायी और काम में सफाई भी नहीं हे। अगर ऐसा काम फिर करोंगे, तो ठेकेदारों के रजिस्टर से तुम्हारा नाम निकाल दिया जायगा।</p>
<p>यह कह कर सुबोध ने मेज पर निगाह डाली, तब नोटों के पुलिंदे न थे। सोचा, शायद किसी फाइल के नीचे दब गये हों। कुरसी के समीप के सब कागज उलट-पुलट डाले; मगर नोटो का कहीं पता नहीं। ऐं नोट कहाँ गये! अभी तो यही मेने रख दिये थे। जा कहाँ सकते हें। फिर फाइलों को उलटने- पुलटने लगे। दिल में जरा-जरा धड़कन होने लगी। सारी मेज के कागज छान डाले, पुलिंदों का पता नहीं। तब वे कुरसी पर बैठकर इस आध घंटे में होने वाली घटनाओं की मन में आलोचना करने लगे—चपरासी ने नोटों के पुलिंदे लाकर मुझे दिये, खूब याद है। भला, यह भी भूलने की बात है और इतनी जल्द! मैने नोटों को लेकर यहीं मेज पर रख दिया, गिना तक नहीं। फिर वकील साहब आ गये, पुराने मुलाकाती हैं। उनसे बातें करता जरा उस पेड़ तक चला गया। उन्होंने पान मँगवाये, बस इतनी ही देर हुई। जब गया हूँ तब पुलिंदे रखे हुए थे। खूब अच्छी तरह याद है। तब ये नोट कहाँ गायब हो गये? मैंने किसी संदूक, दराज या आलमारी में नहीं रखे। फिर गये तो कहाँ? शायद दफ्तर में किसी ने सावधानी के लिए उठा कर रख दिये हों, यही बात है। मैं व्यर्थ ही इतना घबरा गया। छि:!</p>
<p>तुरन्त दफ्तर में आकर मदारीलाल से बोले—आपने मेरी मेज पर से नोट तो उठा कर नहीं रख दिय?</p>
<p>मदारीलाल ने भौंचक्के होकर कहा—क्या आपकी मेज पर नोट रखे हुए थे? मुझे तो खबर ही नहीं। अभी पंडित सोहनलाल एक फाइल लेकर गये थे, तब आपको कमरे में न देखा। जब मुझे मालूम हुआ कि आप किसी से बातें करने चले गये हैं, तब दरवाजे बन्द करा दिये। क्या कुछ नोट नहीं मिल रहे है?</p>
<p>सुबोध आँखें फैला कर बोले—अरे साहब, पूरे पॉँच हजार के है। अभी-अभी चेक भुनाया है।<br />
मदारीलाल ने सिर पीट कर कहा—पूरे पाँच हजार! हा भगवान! आपने मेज पर खूब देख लिया है?<br />
‘अजी पंद्रह मिनट से तलाश कर रहा हूँ।’<br />
‘चपरासी से पूछ लिया कि कौन-कौन आया था?’<br />
‘आइए, जरा आप लोग भी तलाश कीजिए। मेरे तो होश उड़े हुए है।’</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/gango-ka-jaya-story-by-bhisham-sahni/9630/"><strong>गंगो का जाया&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>सारा दफ्तर सेक्रेटरी साहब के कमरे की तलाशी लेने लगा। मेज, आलमारियॉँ, संदूक सब देखे गये। रजिस्टरों के वर्क उलट-पुलट कर देंखे गये; मगर नोटों का कहीं पता नहीं। कोई उड़ा ले गया, अब इसमें कोई शबहा न था। सुबोध ने एक लम्बी सॉँस ली और कुर्सी पर बैठ गये। चेहरे का रंग फक हो गया। जर-सा मुँह निकल आया। इस समय कोई उन्हे देखता तो समझता कि महीनों से बीमार है।</p>
<p>मदारीलाल ने सहानुभूति दिखाते हुए कहा— गजब हो गया और क्या! आज तक कभी ऐसा अंधेर न हुआ था। मुझे यहाँ काम करते दस साल हो गये, कभी धेले की चीज भी गायब न हुई। मैं आपको पहले दिन सावधान कर देना चाहता था कि रूपये-पैसे के विषय में होशियार रहिएगा; मगर शुदनी थी, ख्याल न रहा। जरूर बाहर से कोई आदमी आया और नोट उड़ा कर गायब हो गया। चपरासी का यही अपराध है कि उसने किसी को कमरे में जाने ही क्यों दिया। वह लाख कसम खाये कि बाहर से कोई नहीं आया; लेकिन में इसे मान नहीं सकता। यहाँ से तो केवल पण्डित सोहनलाल एक फाइल लेकर गये थे; मगर दरवाजे ही से झॉँक कर चले आये।</p>
<p>सोहनलाल ने सफाई दी—मैंने तो अन्दर कदम ही नहीं रखा, साहब! अपने जवान बेटे की कसम खाता हूँ, जो अन्दर कदम रखा भी हो।</p>
<p>मदारीलाल ने माथा सिकोड़कर कहा—आप व्यर्थ में कसम क्यों खाते हैं। कोई आपसे कुछ कहता? (सुबोध के कान में)बैंक में कुछ रूपये हों तो निकाल कर ठेकेदार को दे लिये जाएँ, वरना बड़ी बदनामी होगी। नुकसान तो हो ही गया, अब उसके साथ अपमान क्यों हो।</p>
<p>सुबोध ने करूण-स्वर में कहा— बैंक में मुश्किल से दो-चार सौ रूपये होंगे, भाईजान! रूपये होते तो क्या चिन्ता थी। समझ लेता, जैसे पचीस हजार उड़ गये, वैसे ही तीस हजार भी उड़ गये। यहाँ तो कफन को भी कौड़ी नहीं।</p>
<p>उसी रात को सुबोधचन्द्र ने आत्महत्या कर ली। इतने रूपयों का प्रबन्ध करना उनके लिए कठिन था। मृत्यु के परदे के सिवा उन्हें अपनी वेदना, अपनी विवशता को छिपाने की और कोई आड़ न थी।</p>
<p>4<br />
दूसरे दिन प्रात: चपरासी ने मदारीलाल के घर पहुँच कर आवाज दीं मदारी को रात-भर नींद न आयी थी। घबरा कर बाहर आये। चपरासी उन्हें देखते ही बोला—हुजूर! बड़ा गजब हो गया, सिकट्टरी साहब ने रात को गर्दन पर छुरी फेर ली।</p>
<p>मदारीलाल की आँखे ऊपर चढ़ गयीं, मुँह फैल गया ओर सारी देह सिहर उठी, मानों उनका हाथ बिजली के तार पर पड़ गया हो।<br />
‘छुरी फेर ली?’<br />
‘जी हाँ, आज सबेरे मालूम हुआ। पुलिसवाले जमा हैं। आपको बुलाया है।’<br />
‘लाश अभी पड़ी हुई हैं?’<br />
‘जी हाँ, अभी डाक्टरी होने वाली हैं।’<br />
‘बहुत से लोग जमा हैं?’</p>
<p>‘सब बड़े-बड़ अफसर जमा हैं। हुजूर, लहास की ओर ताकते नहीं बनता। कैसा भलामानुष हीरा आदमी था! सब लोग रो रहे हैं। छोडे-छोटे दो बच्चे हैं, एक सायानी लड़की हे ब्याहने लायक। बहू जी को लोग कितना रोक रहे हैं, पर बार-बार दौड़ कर लहास के पास आ जाती हैं। कोई ऐसा नहीं हे, जो रूमाल से आँखें न पोछ रहा हो। अभी इतने ही दिन आये हुए, पर सबसे कितना मेल-जोल हो गया था। रूपये की तो कभी परवा ही नहीं थी। दिल दरियाब था!’</p>
<p>मदारीलाल के सिर में चक्कर आने लगा। द्वार की चौखट पकड़ कर अपने को सँभाल न लेते, तो शायद गिर पड़ते। पूछा—बहू जी बहुत रो रही थीं?</p>
<p>‘कुछ न पूछिए, हुजूर। पेड़ की पत्तियॉँ झड़ी जाती हैं। आँख फूल गर गूलर हो गयी है।’<br />
‘कितने लड़के बतलाये तुमने?’<br />
‘हुजूर, दो लड़के हैं और एक लड़की।’<br />
‘नोटों के बारे में भी बातचीत हो रही होगी?’</p>
<p>‘जी हाँ, सब लोग यही कहते हें कि दफ्तर के किसी आदमी का काम है। दारोगा जी तो सोहनलाल को गिरफ्तार करना चाहते थे; पर साइत आपसे सलाइ लेकर करेंगे। सिकट्टरी साहब तो लिख गए हैं कि मेरा किसी पर शक नहीं है।‘</p>
<p>‘क्या सेक्रेटरी साहब कोई खत लिख कर छोड़ गये है?’</p>
<p>‘हाँ, मालूम होता है, छुरी चलाते बखत याद आयी कि शुबहे में दफ्तर के सब लोग पकड़ लिए जाएेंगे। बस, कलक्टर साहब के नाम चिट्ठी लिख दी।’</p>
<p>‘चिट्ठी में मेरे बारे में भी कुछ लिखा है? तुम्हें यक क्या मालूम होगा?’<br />
‘हुजूर, अब मैं क्या जानूँ, मुदा इतना सब लोग कहते थे कि आपकी बड़ी तारीफ लिखी है।‘<br />
मदारीलाल की सॉँस और तेज हो गयी। आँखें से आँसू की दो बड़ी-बड़ी बूँदे गिर पड़ी। आँखें</p>
<p>पोंछतें हुए बोले—वे ओर मैं एक साथ के पढ़े थे, नन्दू! आठ-दस साल साथ रहा। साथ उठते-बैठते, साथ खाते, साथ खेलते। बस, इसी तरह रहते थे, जैसे दो सगे भाई रहते हों। खत में मेरी क्या तरीफ लिखी है? मगर तुम्हें क्या मालूम होगा?</p>
<p>‘आप तो चल ही रहे है, देख लीजिएगा।’<br />
‘कफन का इन्ताजाम हो गया है?’<br />
‘नही हुजूर, काह न कि अभी लहास की डाक्टरी होगी। मुदा अब जल्दी चलिए। ऐसा न हो, कोई दूसरा आदमी बुलाने आता हो।’<br />
‘हमारे दफ्तर के सब लोग आ गये होंगे?’<br />
‘जी हाँ; इस मुहल्लेवाले तो सभी थे।’</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/deputy-collectory-story-by-amarkant/9593/"><strong>डिप्टी-कलक्टरी&#8230; आज की कहानी</strong></a></span></p>
<p>‘मदारीलाल जब सुबोधचन्द्र के घर पहुँचे, तब उन्हें ऐसा मालूम हुआ कि सब लोग उनकी तरफ संदेह की आँखें से देख रहे हैं। पुलिस इंस्पेक्टर ने तुरन्त उन्हें बुला कर कहा—आप भी अपना बयान लिखा दें और सबके बयान तो लिख चुका हूँ।’</p>
<p>मदारीलाल ने ऐसी सावधानी से अपना बयान लिखाया कि पुलिस के अफसर भी दंग रह गये। उन्हें मदारीलाल पर शुबहा होता था, पर इस बयान ने उसका अंकुर भी निकाल डाला।</p>
<p>इसी वक्त सुबोध के दोनों बालक रोते हुए मदारीलाल के पास आये और कहा—चलिए, आपको अम्मॉँ बुलाती हैं। दोनों मदारीलाल से परिचित थे। मदारीलाल यहाँ तो रोज ही आते थे; पर घर में कभी नहीं गये थे। सुबोध की स्त्री उनसे पर्दा करती थी। यह बुलावा सुन कर उनका दिल धड़क उठा—कही इसका मुझ पर शुबहा न हो। कहीं सुबोध ने मेरे विषय में कोई संदेह न प्रकट किया हो। कुछ झिझकते और कुछ डरते हुए भीतर गए, तब विधवा का करुण-विलाप सुन कर कलेजा कॉँप उठाा। इन्हें देखते ही उस अबला के आँसुओं का कोई दूसरा स्रोत खुल गया और लड़की तो दौड़ कर इनके पैरों से लिपट गई। दोनों लड़को ने भी घेर लिया। मदारीलाल को उन तीनों की आँखें में ऐसी अथाह वेदना, ऐसी विदारक याचना भरी हुई मालूम हुई कि वे उनकी ओर देख न सके। उनकी आत्मा अन्हें धिक्कारने लगी। जिन बेचारों को उन पर इतना विश्वास, इतना भरोसा, इतनी अत्मीयता, इतना स्नेह था, उन्हीं की गर्दन पर उन्होंने छुरी फेरी! उन्हीं के हाथों यह भरा-पूरा परिवार धूल में मिल गया! इन असाहायों का अब क्या हाल होगा? लड़की का विवाह करना है; कौन करेगा? बच्चों के लालन-पालन का भार कौन उठाएगा? मदारीलाल को इतनी आत्मग्लानि हुई कि उनके मुँह से तसल्ली का एक शब्द भी न निकला। उन्हें ऐसा जान पड़ा कि मेरे मुख में कालिख पुती है, मेरा कद कुछ छोटा हो गया है। उन्होंने जिस वक्त नोट उड़ये थे, उन्हें गुमान भी न था कि उसका यह फल होगा। वे केवल सुबोध को जिच करना चाहते थें उनका सर्वनाश करने की इच्छा न थी।</p>
<p>शोकातुर विधवा ने सिसकते हुए कहा। भैया जी, हम लोगों को वे मझधार में छोड़ गए। अगर मुझे मालूम होता कि मन में यह बात ठान चुके हैं तो अपने पास जो कुछ था; वह सब उनके चरणों पर रख देती। मुझसे तो वे यही कहते रहे कि कोई न कोई उपाय हो जायगा। आप ही के मार्फत वे कोई महाजन ठीक करना चाहते थे। आपके ऊपर उन्हें कितना भरोसा था कि कह नहीं सकती।</p>
<p>मदारीलाल को ऐसा मालूम हुआ कि कोई उनके हृदय पर नश्तर चला रहा है। उन्हें अपने कंठ में कोई चीज फॅंसी हुई जान पड़ती थी।</p>
<p>रामेश्वरी ने फिर कहा—रात सोये, तब खूब हँस रहे थे। रोज की तरह दूध पिया, बच्चो को प्यार किया, थोड़ी देर हारमोनियम चाया और तब कुल्ला करके लेटे। कोई ऐसी बात न थी जिससे लेश्मात्र भी संदेह होता। मुझे चिन्तित देखकर बोले—तुम व्यर्थ घबराती हों बाबू मदारीलाल से मेरी पुरानी दोस्ती है। आखिर वह किस दिन काम आयेगी? मेरे साथ के खेले हुए हैं। इन नगर में उनका सबसे परिचय है। रूपयों का प्रबन्ध आसानी से हो जायगा। फिर न जाने कब मन में यह बात समायी। मैं नसीबों-जली ऐसी सोयी कि रात को मिनकी तक नहीं। क्या जानती थी कि वे अपनी जान पर खेले जाऍंगे?</p>
<p>मदारीलाल को सारा विश्व आँखों में तैरता हुआ मालूम हुआ। उन्होंने बहुत जब्त किया; मगर आँसुओं के प्रभाव को न रोक सके।</p>
<p>रामेश्वरी ने आँखे पोंछ कर फिर कहा—मैया जी, जो कुछ होना था, वह तो हो चुका; लेकिन आप उस दुष्ट का पता जरूर लगाइए, जिसने हमारा सर्वनाश कर दिया है। यह दफ्तर ही के किसी आदमी का काम है। वे तो देवता थे। मुझसे यही कहते रहे कि मेरा किसी पर संदेह नहीं है, पर है यह किसी दफ्तरवाले का ही काम। आप से केवल इतनी विनती करती हूँ कि उस पापी को बच कर न जाने दीजिएगा। पुलिसताले शायद कुछ रिश्वत लेकर उसे छोड़ दें। आपको देख कर उनका यह हौसला न होगा। अब हमारे सिर पर आपके सिवा कौन है। किससे अपना दु:ख कहें? लाश की यह दुर्गति होनी भी लिखी थी।</p>
<p>मदारीलाल के मन में एक बार ऐसा उबाल उठा कि सब कुछ खोल दें। साफ कह दें, मै ही वह दुष्ट, वह अधम, वह पामर हूँ। विधवा के पेरों पर गिर पड़ें और कहें, वही छुरी इस हत्यारे की गर्दन पर फेर दो। पर जबान न खुली; इसी दशा में बैठे-बैठे उनके सिर में ऐसा चक्कर आया कि वे जमीन पर गिर पड़े।</p>
<p>5<br />
तीसरे पहर लाश की परीक्षा समाप्त हुई। अर्थी जलाशय की ओर चली। सारा दफ्तर, सारे हुक्काम और हजारों आदमी साथ थे। दाह-संस्कार लड़को को करना चाहिए था पर लड़के नाबालिग थे। इसलिए विधवा चलने को तैयार हो रही थी कि मदारीलाल ने जाकर कहा—बहू जी, यह संस्कार मुझे करने दो। तुम क्रिया पर बैठ जाओंगी, तो बच्चों को कौन सँभालेगा। सुबोध मेरे भाई थे। जिंदगी में उनके साथ कुछ सलूक न कर सका, अब जिंदगी के बाद मुझे दोस्ती का कुछ हक अदा कर लेने दो। आखिर मेरा भी तो उन पर कुछ हक था। रामेश्वरी ने रोकर कहा—आपको भगवान ने बड़ा उदार हृदय दिया है भैया जी, नहीं तो मरने पर कौन किसको पूछता है। दफ्तर के ओर लोग जो आधी-आधी रात तक हाथ बॉँधे खड़े रहते थे झूठी बात पूछने न आये कि जरा ढाढ़स होता।</p>
<p>मदारीलाल ने दाह-संस्कार किया। तेरह दिन तक क्रिया पर बैठे रहे। तेरहवें दिन पिंडदान हुआ; ब्रहामणों ने भोजन किया, भिखरियों को अन्न-दान दिया गया, मित्रों की दावत हुई, और यह सब कुछ मदारीलाल ने अपने खर्च से किया। रामेश्वरी ने बहुत कहा कि आपने जितना किया उतना ही बहुत है। अब मै आपको और जेरबार नहीं करना चाहती। दोस्ती का हक इससे ज्यादा और कोई क्या अदा करेगा, मगर मदारीलाल ने एक न सुनी। सारे शहर में उनके यश की धूम मच गयीं, मित्र हो तो ऐसा हो।</p>
<p>सोलहवें दिन विधवा ने मदारीलाल से कहा—भैया जी, आपने हमारे साथ जो उपकार और अनुग्रह किये हें, उनसे हम मरते दम तक उऋण नहीं हो सकते। आपने हमारी पीठ पर हाथ न रखा होता, तो न-जाने हमारी क्या गति होती। कहीं रूख की भी छॉँह तो नहीं थी। अब हमें घर जाने दीजिए। वहाँ देहात में खर्च भी कम होगा और कुछ खेती बारी का सिलसिला भी कर लूँगी। किसी न किसी तरह विपत्ति के दिन कट ही जाएँगे। इसी तरह हमारे ऊपर दया रखिएगा।</p>
<p>मदारीलाल ने पूछा—घर पर कितनी जायदाद है?</p>
<p>रामेश्वरी—जायदाद क्या है, एक कच्चा मकान है और दस-बारह बीघे की काश्तकारी है। पक्का मकान बनवाना शुरू किया था; मगर रूपये पूरे न पड़े। अभी अधूरा पड़ा हुआ है। दस-बारह हजार खर्च हो गये और अभी छत पड़ने की नौबत नहीं आयी।</p>
<p>मदारीलाल—कुछ रूपये बैंक में जमा हें, या बस खेती ही का सहारा है?<br />
विधवा—जमा तो एक पाई भी नहीं हैं, भैया जी! उनके हाथ में रूपये रहने ही नहीं पाते थे। बस, वही खेती का सहारा है।<br />
मदारीलाल—तो उन खेतों में इतनी पैदावार हो जायगी कि लगान भी अदा हो जाए ओर तुम लोगो की गुजर-बसर भी हो?<br />
रामेश्वरी—और कर ही क्या सकते हैं, भेया जी! किसी न किसी तरह जिंदगी तो काटनी ही है। बच्चे न होते तो मै जहर खा लेती।<br />
मदारीलाल—और अभी बेटी का विवाह भी तो करना है।<br />
विधवा—उसके विवाह की अब कोई चिंता नहीं। किसानों में ऐसे बहुत से मिल जाएेंगे, जो बिना कुछ लिये-दिये विवाह कर लेंगे।<br />
मदारीलाल ने एक क्षण सोचकर कहा—अगर में कुछ सलाह दूँ, तो उसे मानेंगी आप?<br />
रामेश्वरी—भैया जी, आपकी सलाह न मानूँगी तो किसकी सलाह मानूँगी और दूसरा है ही कौन?</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/corona-ka-sabak-story-by-ravi-shankar-sharma/9546/"><strong>कोरोना का सबक&#8230; बाल कहानी</strong></a></span></p>
<p>मदारीलाल—तो आप उपने घर जाने के बदले मेरे घर चलिए। जैसे मेरे बाल-बच्चे रहेंगें, वैसे ही आप के भी रहेंगे। आपको कष्ट न होगा। ईश्वर ने चाहा तो कन्या का विवाह भी किसी अच्छे कुल में हो जायगा।</p>
<p>विधवा की आँखे सजल हो गयीं। बोली—मगर भैया जी, सोचिए&#8230;..मदारीलाल ने बात काट कर कहा—मैं कुछ न सोचूँगा और न कोई उज्र सुनुँगा। क्या दो भाइयों के परिवार एक साथ नहीं रहते? सुबोध को मै अपना भाई समझता था और हमेशा समझूँगा।</p>
<p>विधवा का कोई उज्र न सुना गया। मदारीलाल सबको अपने साथ ले गये और आज दस साल से उनका पालन कर रहे है। दोनों बच्चे कालेज में पढ़ते है और कन्या का एक प्रतिष्ठित कुल में विवाह हो गया हे। मदारीलाल और उनकी स्त्री तन-मन से रामेश्वरी की सेवा करते हैं और उनके इशारों पर चलते हैं। मदारीलाल सेवा से अपने पाप का प्रायश्चित कर रहे हैं।</p>
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