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	<title>holi 2021 Archives - TIS Media</title>
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	<title>holi 2021 Archives - TIS Media</title>
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		<title>Kota : मातम में बदली होली की खुशियां,  नहर में डूबे दो भाई, एक की मौत</title>
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		<pubDate>Tue, 30 Mar 2021 12:01:41 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>कोटा. सीमलिया थाना क्षेत्र के गढ़ेपान गांव में होली की खुशियां मातम में बदल गई। यहां दो सगे भाई नहर में नहाते समय बह गए। जिसमें से एक की मौत हो गई, जबकि दूसरे का एमबीएस अस्पताल में इलाज चल रहा है। पुलिस ने पोस्टमार्टम करवाकर शव परिजनों को सौंप मामले की जांच शुरू कर &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ff0000;"><strong>कोटा.</strong> </span>सीमलिया थाना क्षेत्र के गढ़ेपान गांव में होली की खुशियां मातम में बदल गई। यहां दो सगे भाई नहर में नहाते समय बह गए। जिसमें से एक की मौत हो गई, जबकि दूसरे का एमबीएस अस्पताल में इलाज चल रहा है। पुलिस ने पोस्टमार्टम करवाकर शव परिजनों को सौंप मामले की जांच शुरू कर दी है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>Read More : <a href="https://tismedia.in/top-stories/court-considers-12-engineering-students-as-terrorists-in-rajasthan/5870/">राजस्थान : 12 Engineering Students निकले आतंकी</a></strong></span></p>
<p>जानकारी के अनुसार गढ़ेपान गांव निवासी कन्हैयालाल के पुत्र लोकेश (9) व आशीष सोमवार को सीएफसीएल फैक्ट्री के नजदीक नहर में नहाने गए थे। तभी दोनों बच्चे पानी के तेज बहाव में बह गए। बच्चों को बहता देख आसपास के लोगों ने छलांग लगाकर दोनों को बाहर निकाला और तुरंत अस्पताल पहुंचाया। जहां चिकित्सकों ने जांच के बाद लोकेश को मृत घोषित कर दिया। जबकि, आशीष को भर्ती कर इलाज शुरू कर दिया। सूचना पर सीमलिया पुलिस मौके पर पहुंची और शव को एमबीएस अस्पताल की मोर्चरी में रखवाया। परिजनों के आने के बाद पोस्टमार्टम करवाकर शव सौंप मामले की जांच शुरू की।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>Read More : <a href="https://tismedia.in/top-stories/nahan-folk-festival-of-hadoti-kota-rajasthan/5844/">Holi Special: उमंग और उल्लास के समंदर में नहाना तो चले आओ हाड़ौती के “न्हाण”</a><br />
</strong></span></p>
<p><strong>शहर में 2 लोगों ने किया सुसाइड</strong><br />
शहर के दो अलग-अलग इलाकों में सोमवार को दो जनों ने फंदे से झूलकर आत्महत्या कर ली। फिलहाल आत्महत्या के कारणों का पता नहीं चल सका है। पुलिस ने पोस्टमार्टम करवाकर शव परिजनों को सौंप मामले की जांच शुरू कर दी। नयापुरा थाने के एएसआई दुर्गालाल ने बताया कि बृजराज कॉलोनी निवासी हेमराज बीती रात को दूसरी मंजिल पर बने कमरे में सो रहा था। जबकि, पत्नी, बेटी व मां पहली मंजिल पर बने कमरे में सो रही थी। सुबह पांच बजे पत्नी काम पर चली गई। काफी देर तक हेमराज नीचे नहीं आया तो उसकी मां सुबह 8 बजे उसके कमरे में पहुंची तो हेमराज फंदे से लटका हुआ था। सूचना पर पुलिस मौके पर पहुंची और शव को उतार एमबीएस अस्पताल की मोर्चरी में रखवाया। जहां पोस्टमार्टम करवाकर शव परिजनों को सौंप दिया।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>Read More : <a href="https://tismedia.in/top-stories/petrol-and-diesel-became-cheaper-after-four-days-kota-news/5859/">गिरी चवन्नीः मुस्कुराइए पेट्रोल 22 पैसे सस्ता हो गया है</a></strong></span></p>
<p>वहीं, उद्योग नगर इलाके में प्रेमनगर अफोर्डेबल योजना निवासी मनीष ने फंदा लगाकर सुसाइड कर लिया। पुलिस ने बताया कि मृतक मूलरूप से बारां जिले का रहने वाला था। वह कुछ वर्षों से प्रेमनगर में रहकर चाय की दुकान लगाता था। देर रात 10.30 बजे करीब उसने कमरे में छत के पंखे से रस्सी का फंदा लगाकर आत्महत्या कर ली। मृतक के पास से कोई सुसाइड नोट नहीं मिला है। फिलहाल पुलिस मामले की जांच में जुटी है।</p>
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		<title>आसानी से वजन घटाना है तो पीएं यह डिटॉक्स ड्रिंक</title>
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		<pubDate>Tue, 30 Mar 2021 09:39:30 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>कोटा. होली 2021 स्पेशल: कितनी भी खुद को कंट्रोल करने की कोशिश के बाद भी होली पर तो मीठाई व स्नैक्स का खाना और खिलाना होता ही है। इस के चलते होली पर खाए पकवान सेहत पर तो भारी पड़ ही सकते है साथ ही इस से वजन भी बढ़ सकता हैं। अब ऐसे में &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color: #ff0000;">कोटा.</span> होली 2021 स्पेशल:</strong> कितनी भी खुद को कंट्रोल करने की कोशिश के बाद भी होली पर तो मीठाई व स्नैक्स का खाना और खिलाना होता ही है। इस के चलते होली पर खाए पकवान सेहत पर तो भारी पड़ ही सकते है साथ ही इस से वजन भी बढ़ सकता हैं। अब ऐसे में खुद को स्वस्थ रखने कि लिए बॉडी को डिटॉक्स करना बेहद जरूरी है। अपने शरीर से विषैले पदार्थों को बाहर करने का काम डिटॉक्सर ड्रिंक्स करती है। सिर्फ इतना ही नहीं इस से आपका मेटाबॉलिज्म भी बेहतर होता है। इस से आपका पाचन भी बेहतर होगा और आपको वजन घटाने में भी मदद मिलेगी।–</p>
<p><strong>अदरक और नींबू की डिटॉक्स ड्रिंक</strong><br />
वजन घटाने में डिटॉक्स ड्रिंक काफी महत्व रखते है। नींबू और अदरक के गुणों वाले इस ड्रिंक को सुबह खाली पेट पीना चाहिए। यह आपके शरीर को ताकत तो देता ही है साथ ही आपके मेटाबॉलिज्म को भी दुरुस्त करता है।</p>
<p><strong>ऐसे बनाएं अदरक और नींबू का डिटॉक्स ड्रिंक</strong><br />
एक गिलास गुनगुने पानी में आधा नींबू निचोड़कर उसमें 1 इंच के बराबर अदरक ग्रेट कर लें। यह ड्रिंक 2 महिने तक रोजाना सुबह 2 गिलास पिएं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/food/holi-special-make-and-eat-delicious-chaat-on-holi/5861/"><strong>Holi Special: मीठे से हो गए तंग, तो चटपटी चाट के साथ लौटाएं मुंह का स्वाद</strong></a></span></p>
<p><strong>दालचीनी की डिटॉक्स ड्रिंक</strong><br />
दालचीनी से बनी डिटॉक्स ड्रिंक आपके मेटाबॉलिज्म तो मजबूत बनाती है। इस में फैट को गलाने की भी ताकत होती है।</p>
<p><strong>ऐसे बनाएं दालचीनी की डिटॉक्स ड्रिंक</strong><br />
एक कंटेनर में गुनगुना पानी लीजिए और उसमें एक छोटी चम्मच दालचीनी का पाउडर डालकर मिला लें। इसका सेवन रोजाना सोते वक्त करें और मनचाहा परिणाम आपको दिखाई देने लगेगा।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>READ MORE: </strong></span><span style="color: #0000ff;"><a style="color: #0000ff;" href="https://tismedia.in/state/uttar-pradesh/kanpurs-largest-cardiology-hospital-caught-fire-patients-evacuated-safely/5823/"><strong>कानपुर के सबसे बड़े कार्डियोलॉजी अस्पताल में लगी आग</strong><strong>, 138 </strong><strong>मरीजों को निकाला गया सुरक्षित</strong></a></span></p>
<p><strong>पुदीने और खीरे की डिटॉक्स ड्रिंक</strong><br />
पुदीने और खीरे से बनने वाली यह डिटॉक्स ड्रिंक शरीर से हानिकारक विषैले तत्वों को तो बाहर निकालती ही है, साथ ही इस का स्वाद और महक भी लाजवाब है। पानी में डाले जाने पर खीरा और पुदीना अपने पोषक तत्वों को पानी में निकालते है, जिस से आपका पाचन बेहतर होता है।</p>
<p><strong>ऐसे बनाएं पुदीने और खीरे की डिटॉक्स ड्रिंक</strong><br />
एक गिलास पानी में कुछ खीरे के टुकड़े और पुदीने की पत्तिया डाल दें।</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/food/homemade-detox-drinks-on-holi-will-help-you-lose-fat/5872/">आसानी से वजन घटाना है तो पीएं यह डिटॉक्स ड्रिंक</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<item>
		<title>Holi Special: उमंग और उल्लास के समंदर में नहाना तो चले आओ हाड़ौती के &#8220;न्हाण&#8221;</title>
		<link>https://tismedia.in/top-stories/nahan-folk-festival-of-hadoti-kota-rajasthan/5844/?utm_source=rss&#038;utm_medium=rss&#038;utm_campaign=nahan-folk-festival-of-hadoti-kota-rajasthan</link>
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		<dc:creator><![CDATA[tismedia.in]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 29 Mar 2021 11:18:31 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>न्हाण&#8230; न्हाण का अर्थ है नहाना। सामूहिक स्नान। चूंकि यह लोक पर्व होली के पश्चात मनाया जाता है- इसलिए कह सकते हैं &#8211; रंगो में नहाना। किन्तु न्हाण लोकात्सव को रंगो में नहाना कहना इसकी व्यापकता को कम करना होगा। कहना चाहिए न्हाण का अर्थ है &#8211; उमंग और उल्लास में नहाना। न्हाण राजस्थान के हाडौती &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/top-stories/nahan-folk-festival-of-hadoti-kota-rajasthan/5844/">Holi Special: उमंग और उल्लास के समंदर में नहाना तो चले आओ हाड़ौती के &#8220;न्हाण&#8221;</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
		<div class="box info  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>लोक:अपने व्यापक अर्थ में लोक प्रत्यक्ष जीवन का रत्नाकर है। लोक को समझने में पुस्तकें मदद कर सकती हैं, किन्तु लोक को मात्र पुस्तकें पढ़कर नहीं समझा जा सकता। इसके लिए लोक में जाना पड़ता है, उसमें धंसना पड़ता है। लोक अनुभव का विषय है। सांगोद के न्हाण को समझने की कोशिश, लोक को समझने की कोशिश कही जा सकती है।
			</div>
		</div>
	
<p><em><span style="color: #ff0000;"><strong><span style="color: #3366ff;">न्हाण&#8230; </span>न्हाण का अर्थ है नहाना। सामूहिक स्नान। चूंकि यह लोक पर्व होली के पश्चात मनाया जाता है- इसलिए कह सकते हैं &#8211; रंगो में नहाना। किन्तु न्हाण लोकात्सव को रंगो में नहाना कहना इसकी व्यापकता को कम करना होगा। कहना चाहिए न्हाण का अर्थ है &#8211; उमंग और उल्लास में नहाना। न्हाण राजस्थान के हाडौती अंचल के कई गांवों कस्बो में मनाया जाता है। सबको जानना, सूची बद्ध करना कठिन काम है तथापि कुछ जगहों के नाम गिनाने हों तो कहा जा सकता है &#8211; जैसे अन्ता, मिर्जापुर, मोईकलां, बपावरकलां, आदि। लेकिन इन सब में &#8211; सबसे ज्यादा मशहूर है &#8211; सांगोद का &#8220;<span style="color: #3366ff;">न्हाण</span>&#8220;।</strong></span></em></p>
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</div>
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<p>दिल्ली मुम्बई बड़ी रेल्वे लाईन पर स्थित कोटा शहर से लगभग 60 किमी दूर चम्बल की सहायक नदी है &#8211; कालीसिंध और कालीसिंध की सहायक नदी है &#8211; ‘उजाड़’ (अन्नपूर्णा ) इसी उजाड़ नदी के के उत्तरी किनारे पर स्थित सांगोद, कोटा जिले का एक प्रमुख कस्बा है। इसके दूसरे छोर पर यानि दक्षिण में कुछ ही दूर, कालीसिंध की एक और सहायक नदी परवन बहती है। सांगोद के न्हाण के बारे में जब भी बात शुरू हुई, ‘यह अद्भुत है,’ यह कहकर शुरू हुई और बात का अंत इस निष्कर्ष से हुआ कि कितना भी कहो &#8211; न्हाण कहने में नहीं आता यह देखने और अनुभव करने से ताल्लुक रखता है।’</p>
<p><span style="color: #0000ff;">अगर कोई पूछे कि &#8211; ‘ऐसा क्या है न्हाण में ?’ तो कहा जायेगा &#8211; ‘ये मत पूछो कि न्हाण क्या है और क्या क्या है न्हाण में, ये पूछो कि क्या नहीं है न्हाण में। लोक है &#8211; परलोक है। जीवन है, जीवन का जीवंत खेल है। जीवन का उल्लास है, प्रवाह है। आना है &#8211; जाना है, घूमना फिरना है, खाना-पीना है। नाचना-गाना है। स्वांग है &#8211; स्वरूप है। अभिनय है &#8211; नाटक है। खेल है, तमाशा है। किस्सा है &#8211; कहानी है। गीत है &#8211; कविता है। गाड़ी है, घोड़ा है, ऊंट है, हाथी है, गधा है, बादशाह है, उमराव हैं, बच्चे हैं &#8211; बूढ़े हैं &#8211; जवान हैं। औरतें हैं &#8211; आदमी हैं। हिजड़े हैं, दिलजले हैं मनचले हैं, मजनू है &#8211; लैला है, आशिक है &#8211; माशूक है। सरकारी अमला है, साधू है, फकीर है, हकीम है, बैद है, रोगी है, दवा है, दवाखाना है। पुलिस है &#8211; सिपाही है &#8211; थाना है। तन्त्र है, मन्त्र है, मूठ है, मारण है, अफसर है। नौकर है, मुनीम है, गुमाश्ता है, सेठ है, सेठानी है। बिल क्लिंटन है, ट्रम्प है, मोदी है। मनमोहन है, सोनिया है, राहुल है, रामदेव है, अमित शाह है, सलमान है, शाहरूख है, केटरीना है, करिश्मा है, कंगना है, ऋत्विक है, मुन्ना भाई है, अक्षय कुमार है। हिन्दुस्तानी सैनिक है &#8211; पाकिस्तानी सिपाही है। दुर्गा है भवानी है, भारत माता है। कहाँ तक गिनाएँ, कहने में नहीं आता है। जो नहीं है, जो नहीं हुआ &#8211; वह हो सकता है, उसकी कल्पना है, सम्भावना है, नहीं है तो न्हाण के पास बस महाभारतकार जैसा दावा नहीं है-</span><br />
<strong><span style="color: #ff0000;">‘धर्मेच अर्थेच कामेच मोक्षेच भरतर्षभ</span></strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000;">यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत क्वचित।’</span></strong></p>
<p>होली जलने के बाद धुलेंडी, और धुलेंडी के अगले दिन से पाँच दिन तक चलने वाले इस लोकपर्व का सांस्कृतिक, समाजशास्त्रीय, ऐतिहासिक, मनोवैज्ञानिक विश्लेषण किया जाए तो कई महत्वपूर्ण निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। लेकिन प्रकटतः जो सामान्य तथ्य सामने आते हैं उनका जिक्र करें तो कह सकते हैं कि &#8211; यह पाँच दिवसीय कार्यक्रम किसी कस्बे की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक लोक परम्परा को संरक्षित, सवंर्धित करने का महत्वपूर्ण सामाजिक उपक्रम है। बगैर किसी औपचारिक, सरकारी संगठन के निर्देशन, नियन्त्रण व सहायता के होने वाले इस लोकोत्सव मे सांगोद के लोग धर्म, जाति, हैसियत का भेद भुलाकर पूरे उल्लास से सम्मिलित होते हैं। इस दौरान न केवल सांगोद और सांगोद के आसपास के गाँवों के बल्कि दूर-दूर तक के लोग अपने परिचितों परिजनों के यहाँ आकर मेले और मेहमान नवाजी का मजा लेते हैं। यहीं खाना-पीना और न्हाण का आनन्द लेना। इसी दौरान कई जातीय, पारिवारिक रिश्तेदारियों के मसलों का निराकरण भी हो जाता है। कई शादी विवाह के रिश्ते भी न्हाण के दौरान तय हो जाते हैं। सांगोद के न्हाण के बारे में कुछ कहने से पहले सांगोद के ही दिवंगत जनकवि सूरजमल विजय की कविता की दो पंक्तियां स्मरण हो आती हैं- <strong><span style="color: #ff0000;">यो न्हाण तमासो मत समझो पुरखां की अमर निसाणी छै ।।</span></strong></p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">घूघरी की कहानी </span></strong><br />
वैसे तो न्हाण की तैयारियाँ, होली जलने के पन्द्रह दिन पहले अमावस्या को, जब दोनों दल सोरसन जाकर ब्रह्माणी माताजी की पूजा अर्चना करते हैं, उसी दिन से शुरू होने लग जाती है। लेकिन असल न्हाण शुरू होता है दोज यानि फाल्गुन की द्वितीया से फाल्गुन की पूर्णिमा को होली जलती है। अगले दिन (पड़वा) प्रतिपदा को रंग की होली खेलते हैं लोग। इसके बाद अगले दिन से होती है न्हाण की शुरूआत। दोज के दिन दोनों दल शाम के समय जुलूस बनाकर अलग अलग मार्ग से सांगोद स्थित ब्रह्माणी माता की पूजा करने जाते हैं। इस जुलूस को घूघरी का जुलूस कहते हैं। घूघरी उबाले हुऐ अनाज के दानों को कहा जाता है। जिसका प्रसाद वितरण जुलूस के समापन पर किया जाता है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>और टूट जाती हैं सारी बंदिशें </strong></span><br />
कस्बे के दोनों दलों के विभिन्न मार्गों से गुजरने वाले इस जुलूस में, अखाड़े के स्थानीय कलाकार व बाहर से आये हुए किन्नर, बैंड-बाजों पर बजाई जाने वाली लोकगीतों की धुनों पर नृत्य करते चलते हैं। नाथ्या पंडा वगैरा, इस जुलूस में नगर के नए पुराने लफंदड इकठ्ठे होकर खूब हो-हल्ला मचाते हैं। जो मन मर्जी आए बोलते बकते हैं। श्लील-अश्लील की कोई बंदिश नहीं रहती। गालियांँ, गन्दे फिकरे, नारों की तर्ज में गूँजते हैं। मुँह में कलांई ठूँस कर इशारे करते हुए कामोत्तेजक बकरे की आवाज निकालते हैं। जिसे बोकड़ा बोलना कहते हैं। किसी व्यक्ति के लिए कुछ भी कहने की इतनी छूट का ऐसा दुर्लभ अवसर शायद ही कभी, कहीं होता होगा, जैसा घूघरी के जूलूस में होता है। सबसे अधिक गाली अभिनन्दन उसी का किया जाता है, जिसके घर के आगे से ये जूलूस निकलता है। उसका, उसके परिवारवालों के नाम जाति आदि का उल्लेख करते हुए।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>जो वर्जित है वही चर्चित है</strong></span><br />
इस घूघरी के जूलूस में जो वर्जित है वो ही सबसे ज्यादा चर्चित होता है। आड़े दिन आम चर्चा में भद्रजन इस जुलूस की भर्त्सना करते हैं लेकिन जब घूघरी का जुलूस निकलता है तो इतनी भीड़ रहती है देखने वालों की कि पूछिए मत। भद्रजन अपनी दुकानों के थडों, मकानों की चबूतरियों पर बैठे या खड़े रहते हैं। पूरे गाँव की भीड़, बूढ़े बच्चे, स्त्री-पुरुष, अमीर-गरीब सब उस समय बाजार के उस रास्ते पर, दुकानों के थडों, चबूतरियों पर जहां जगह मिले बैठकर या खड़े रहकर घूघरी का जूलूस देखते हैं। कुछ लोग जूलूस में शामिल भी हो जाते हैं। चलते फिरते हंसी- मजाक, खिलखिलाहट, चुहल, फिकरे सब कुछ चलता रहता है, घूघरी के जूलूस में लगते नारों के शोर के साथ। बिना किसी सीमा, मर्यादा, वर्जना और नाराजगी के ऐसा मुक्त-उन्मुक्त ही नहीं उन्मत्त प्रसंग प्रकटतः सार्वजनिक रूप से हमारे सभ्य और शिक्षित समाज में शायद ही अन्यत्र कहीं होता हो।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>सवारियों की दी जाती है पेशगी</strong></span><br />
भद्र परिवार की महिलाएं भी बाल्कनियों, छज्जों, रोसों, खिडकियों मे से छिप-छिपकर देखती हैं। अपनी उस हँसी को दाँतों में पल्लू ठूँसकर रोकने की कोशिश करती हुई जो सिहरन पैदा करती हुई। उनकी देह पर लहरों की तरह तैरती रहती है। ज्ञानी, ध्यानी, मनोविज्ञानी समाजशास्त्री, इस कृत्य और वृत्ति की अलग अलग व्याख्याएँ करते पाए जाते हैं। घूघरी का प्रसाद वितरण हो जाने के बाद बाजार के अखाड़े का पटेल बादशाह की मौजूदगी में आने वाले दिनों में निकलने वाली सवारी में स्वांग रचने वाले कलाकारों को पेशगी देकर पक्का करते हैं। जिसे साई देना कहते हैं। रीछ, मदारी, गुलची, ईरानी, फकीर, सांट्या, डाकन जैसे एकल स्वांगों की साई रूपया दो रूपया और शूरा (शूरवीर) भाणमती, सेठ सेठानी, चारण-चारणी, बादशाह जैसे महत्वपूर्ण और पारम्परिक स्वांगों की अधिकतम साई पांच रूपया।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>लटकने लगती हैं लागें</strong></span><br />
स्थानीय, प्रान्तीय से लेकर राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय विषयों घटनाओं के स्वांग या झांकियाँ सजाने वालों की साई इनकी अहमियत के मुताबिक दी जाती है। यह काम खाडे वाले पंडत के दिन करते हैं। न्हाण के अवसर पर आस-पास दूर दराज के मेहमान दर्शक यहाँ आते हैं। उनके स्वागत सम्मान की तैयारियों में लोग अपने घरों को लीप पोतकर रंग रोगन करके संवारते हैं। नगर में कौतुक प्रदर्शन शुरू हो जाते हैं। प्रमुख चैरोहों, रास्तों गलियों के मुहानों पर कच्चे सूत पर, मिर्च पर, चाकू की नोक पर, घड़ा, घट्टी ( चक्की ) का पाट, बैलगाड़ी का पहिया जैसे भारी सामान लटका दिये जाते हैं &#8211; इन्हे लागें कहा जाता है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><b>सूरवीर सांगा का संस्मरण </b></span><br />
घूघरी के अगले दिन बारह भाले की सवारी निकलती है। बारह भालों की सवारी को बारह भाइलों की सवारी भी कहते हैं। इसका भी एक वृत्तान्त है- खाडे के न्हा ा के कलाकार बृजमोहन अरविन्द ने जो वृत्तान्त उपलब्ध कराया उसके अनुसार सांगोद के न्हाण ओर सांगोद के इतिहास की मूल कथा एक ही है। सांगोद के इतिहास की कथा का नायक सांगा पटेल है। राजस्थानी के लोक कवि जगन्नाथ गोचर ने सांगा के युद्ध और उत्सर्ग का वर्णन करते हुए सांगोद के बसने का एक काव्यात्मक आख्यान भी रचा है- जो बहुत रोचक है। बस्ती की गलियों, बाजार के बीच हो रहे इस युद्ध का पारम्परिक शैली में जो वर्णन किया गया है उससे हाडौती के ही लोक युद्ध काव्य (पृथ्वीराज का कड़ा) के साथ ही आल्हा दल का भी स्मरण हो आता है। विस्तार भय से पूरा वृत्तान्त यहाँ देने से बच रहे हैं। उस<br />
युद्ध के दौरान दुश्मनों ने धोखे से सांगा का सिर काट दिया। सांगा का सिर कट जाने पर उसका रूड (धड़) लड़ता रहा। सांगा का सिर आज भी प्रतिमा के रूप में सांगोद में पूजा जाता है। इस युद्ध विषयक कविता के अंत में इस घटना की तारीख का भी उल्लेख किया गया है। बताया गया है कि यह विक्रमी सम्वत सौलह सौ सौलह की चैत्र बुदी (कृष्ण) पंचमी का दिन था। जिसे रंग पंचमी कहते हैं। इस दिन वार शुक्रवार था।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>सांगा का गढ़ बना सांगोद </strong></span><br />
युद्ध के बाद आस पास के बारह खेडों के सरदार अपने-अपने खेड़े उजाड़ कर यहाँ आ बसे। अमर शहीद सांगा के नाम पर इस खेडे का नाम रखा गया सांगोद। उन्हीं की स्मृति में बारह भालों या भायलों की सवारी ओर तेहरवां अमर शहीदी निशान सांगा का रंग पंचमी के दिन निकाला जाने लगा। घूघरी के अगले दिन निकलने वाली बारह भालों या भायलों की सवारी यूँ तो तीसरे पहर शुरू होती है लेकिन कई स्वांग सुबह से ही अपने स्वरूप में आकर गली बाजारों चोराहों पर घूमने लगते हैं। ओघड़ का स्वांग सुबह से ही स्कूलों में पहुंच कर छुट्टी की घंटी बजा देता है। दफ्तरों में चला जाता है। छुट्टी करो। कर्मचारी तो तैयार ही बैठे रहते हैं। कुछ तो पहले से ही बाकायदा अर्जी देकर छुट्टी ले ले लेते हैं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>रसिकों की मौज </strong></span><br />
कोई शराबी कोई फकीर। टोकरी, झाडू और खाट का बान मछली पकडने के जाल की तरह लेकर सफाई कर्मियों का स्वांग बनाए एक टोली गुजरने वाले किसी भी भद्र पुरूष को कचरा स्नान करा देती है। स्वेच्छा से अभिनेत्रियों, माॅडलों, आधुनिक या पारम्परिक सुन्दरियों का स्वांग धरे कमसिन लडकों के पीछे-पीछे मनचलों की टोली भी घूमती रहती है। रसिकों की मौज है। ये सारे स्वांग बारह भालों की सवारी में सम्मिलित हो जाते हैं। बारह भालों की सवारी में विचित्र स्वागों के अलावा चर्चित स्थानीय घटनाओं से लेकर अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं, विषयों, व्यक्तियों से संबधित<br />
झाकियाँ भी निकाली जाती हैं। कोई अंतरजातीय या असामान्य प्रेम &#8211; प्रंसग। नगर पालिका, तालुक, जिला पंचायत या राज्य का कोई विषय। कुछ भी हो सकता है। बिल क्लिंटन, मोराजी देसाई, मुशर्रफ, सोनिया गाँधी किसी को भी लेकर कोई भी झाँकी, हास्य-व्यंग्य की छबि बनाई जा सकती है। ये झाँकियाँ तत्कालीन समय की विसंगतियों को उजागर करती हैं। एक बार तो अन्ना हजारे के आन्दोलन की भी झाँकी निकाली गई। कहना न होगा कि लोकोत्सव की परम्परा अपने आप को समाकालीनता से भी अपडेट करती रहती है। स्वांग जो चलते रहते हैं वो आपस में संवाद भी करते रहते हैं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>सेठ-सेठानी का जवाब नहीं </strong></span><br />
दर्शकों की भीड़ को भी निशाना बनाते रहते हैं। उदारहण के लिए सेठ सेठानी और मुनीम के स्वांग में सेठ अपने मुनीम से पूछता है-<br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>सेठ</strong></span> “कोटा री दुकान में, बम्बई री दुकान में, कलकत्ता री दुकान में, दिल्ली री दुकान में, रूई चारा, अलसी रा, गेहूं रा, सरसों रा ,व्यापार में &#8211; मुनीम जी घाटो है या बाधो?”<br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>मुनीम</strong> </span>“सेठ जी! कोटा री दुकान में, बम्बई री दुकान में, कलकत्ता री दुकान में, दिल्ली री दुकान में,<br />
रूई, चा रा, अलसी रा, गेहूँ रा, सरसों रा व्यापार में, घाटो ही घाटो।“<br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>सेठ</strong></span> (सेठानी से) “क्यूँ सेठाणी जी! यो मुनीम रो बच्चो कांई कहैवे है?<br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>सेठानी</strong></span> “सेठ जी, मुनीम साँची कहैवे (दर्शकों की ओर मुखातिब होकर) अजी साब, सेठ साब तो रात दिन रंड्यां के यहाँ पड्या रहवै छै। म्हारो अर म्हारी नीचे री दुकान रो खर्चो तो मुनीम साब ही चलावे है।’’<br />
कहना न होगा की पुरूष दर्शक इन द्विअर्थी संवादों को सुनकर लोट-पोट हो जाते हैं और स्त्रियाँ अपने मुँह में पल्लू ठूँस कर हँसती हैं। रही सही कसर, सेठानी का स्वांग करने वाला पात्र, नीचे की दुकान का इशारा अपना घाघरा उछाल करके पूरी करता है। लेकिन हम समझ सकते हैं कि असली इशारा किस सामाजिक विसंगति की तरफ होता है।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">बेजोड़ झांकियां </span></strong><br />
इसी तरह ऊंट पर बैठे चारण-चारणी के स्वांग में चारण, अपनी परम सुन्दरी चारणी को इंगित कर के कई भक्ति, नीति और श्रृंगार के कवित्त सुनाते हैं। कई कवित्त कवि वृन्द, गंग, विक्रम बैताल के हैं। कई स्थानीय रचनाकारों, स्वयं कलाकारों के स्वरचित भी होते हैं। हेर फेर अदल बदल नवाचार तो सहज संभव है-जो होता रहता है। कवित्त बतौर बानगी प्रस्तुत है-<br />
&#8220;<span style="color: #ff0000;"><strong>शशि बिन सूनो गगन, ज्ञान बिन हृदय सूनो, कुल सूनो पुत्र बिन, पात बिन तरवर सूनो, गज सूनो दन्त बिन, हंस बिन सरवर सूनो,</strong> <strong>घटा बिन सूनी दामिनी, बैताल कहे विक्रम सुनो, घर सूनो बिन कामनी..</strong></span>.!!!&#8221;</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>जीवंत हो उठता है किन्नर लोक </strong></span><br />
कई स्वांग और झाँकियों के बाद सवारी में लम्बी कतार होती है &#8211; सजे धजे घोड़ों पर बैठे उमरावों की। राजसी वेश, सिर पर पगडी, कलंगी, सरपेच, लटकन, रेशमी जरीदार अचकन, चूड़ीदार पाजामा, गले में माला, बगल में तलवार, हाथ में कटार और रूमाल। मुँह मे पान। ठुमकती नाचती घोड़ी के आगे बै ड बाजा और किन्नरों का नृत्य। दूर दूर से किन्नर आते हैं यहाँ। कोलकता तक से। सांगोद की ब्रह्माणी माता के प्रति किन्नरों में बड़ी आस्था है। सांगोद का किन्नरो से एक अनुरागात्मक सम्बन्ध है। बिन बुलाए भी आते, इकट्ठे होते हैं किन्नर। कोई कार्यक्रम तय हो जाए नाचने का &#8211; तो भी, न हो तो भी। न्हाण में तन्मय होकर नाचते हैं। न्हाण के बाद लोगों से इनाम माँगते हैं। जो मिल जाए उसे सिर माथे लगाकर खुश होते हैं। सबसे आखिरी में होते हैं बारह खेड़ों के बारह भालों के निशान और वीर सांगा का अमर शहीदी निशान। ये सवारी निर्धारित मार्ग से होकर अपने गन्तव्य पर पहुँच जाती है और विसर्जित हो जाती है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>रात का न्हाण</strong></span><br />
बारह भालों की सवारी के बाद कुछ देर का अन्तराल होता है। भीड़ थोड़ी कम हो जाती है लेकिन बाजार में चहल-पहल, गहमागहमी जारी रहती है। लोग अपने-अपने ठिकानों, घरों से भोजनादि से निवृत्त होकर रात भर होने वाले तमाशे, जादू-टोने के करतब देखने के लिए खाडे वाले खाडे में और बाजार वाले बाजार में आने लगते हैं। कुछ देर पहले जो भीड़ जादू की तरह गायब हुई थी वही किसी करिश्मे की तरह वापस आ जुटती है। बाजार की गलियाँ गुलजार हो जाती हैं। रात के न्हाण का कार्यक्रम बाजार वालों का लक्ष्मी नारायण चौक में होता है जो मुख्य बाजार वाले रास्ते पर है। मन्दिर के चबूतरे पर मंच सजाया जाता है जिस पर खेल दिखाने वाले आ आकर अपनी कला और कौशल का प्रदर्शन करते हैं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>बड का किस्सा</strong></span><br />
रात का न्हाण चलता रहता है। इस दौरान मूँगफली, पकौड़ियों तथा चाय पानी, नाश्ते की दूसरी खाने पीने की चीजों के ठेले आस पास आ लगते हैं। बाजार की स्थाई दुकानें तो खुली ही रहती हैं। लोग जितनी देर मन होता है उतनी देर बैठे, खड़े खेल तमाशा देखते हैं। इधर उधर घूमते फिरते खाते-पीते तफरी करते रहते हैं। रात के न्हाण में स्त्रियों की संख्या अधिक नहीं होती। आसपास देहात, गाँव की वे स्त्रियाँ जो रात्रि के चैथे पहर, भोर से पहले तड़काव में, निकलने वाली भवानी की सवारियाँ देखने के लिए रुकी होती हैं, वे कहाँ जाएँ इसलिए खाडे में रामद्वारे की तरफ बैठी रहती हैं लेकिन उनकी वजह से मंच पर प्रदर्शित होने वाले कार्यक्रमों में कोई मर्यादा की बाधा नहीं होती। स्थानीय स्त्रियाँ आसपास के ऊंचे मकानों की छतों, बालकनियों, खिडकियों से अपनी मरजी और मर्यादा के मुताबिक देखती हैं या नहीं देखतीं हैं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>भिश्ती के आगे पानी भरती दुनिया </strong></span><br />
रात के तमाशे की शुरूआत भिश्ती के स्वांग से शुरू होती है। भिश्ती मिंया ईमाम खां है जो आते ही गाता है- सुरसत संवरूं आद भवानी गणपत देव मनाउं। तू ब्रह्माणी मात केसरी, चरणन सीस नवाउं मियां भिश्ती इमाम खां आया री। भिश्ती इमाम खां इसी तरह के गीतात्मक दोहों में अपनी मशक और अपने काम का वर्णन करता है। इसके बाद स्वांग आता है &#8211; चाचा बोहरा का। चाचा बोहरा एक अमीर अधेड़ कुंआरा है। वो आते ही अपना परिचय देता है। चाचा बोहरा एक मिश्रित चरित्र है। खुद अपने को मेवाड़ देश का कहता है- रहना मरू प्रदेश में बताता है और भाषा गुजराती अंदाज की बोलता है-</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">जय ब्रह्माणी माती की</span></strong><br />
दाउजी रो परताप ब्रह्माणी माता रो परताप कोई जाणे है कोई जाणे नथी<br />
बारह बेटा फूल सा भाई सत्तर हजार ज्यां में बोहरो रूप रो जग पल रा दातार दाउजी रो परताप कोई जाणे नथी<br />
इसी कवित्त में आगे कहता है- दासां रो दास कहाउं न्हाण अखाड़ा चैबे पाड़ा री ख्याती सूं,<br />
दोड़यो थको अठे आयो हूँ<br />
बेचबा रे खातिर बम्बई री दुकान सूं<br />
सूना रा पांसा, चाँदी रा थाळ, सीप, कांच, सिलक बंजारा थान लायो हूँ गोलकु डा रा नग,<br />
हीरा दिल्ली री दुकान सू लायो हूं<br />
दिल्ली री दुकान सूं जरी पसमीना साड़ी दुपट्टा<br />
दाख, बादाम, चिरोंजी, अखरोट, काजू री बोरियाँ लायो हूं,<br />
कोटा री दुकान सूं बढिया उनियारी मसूरी साड़ी लायो हूं<br />
जयपुर का हार बीकानेर को सुरमो मथुरा रो श्रृंगार जगदम्बा रे वास्ते मोखलो लायो हँू<br />
सुपारी सैंकड़ा का देऊ लूंग सैकडा का ले उं अणी वास्ते कोई चिन्ता री बात नहीं<br />
आपके च्हावे तो चिट्टी लिख दीज्यो<br />
या आप ही पधारज्यो<br />
न्हाण खाडा में ब्रह्माणी के देवरा पे स्वयं आज्यो<br />
जय करणी माता री।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">भांड़ों की अपनी मौज </span></strong><br />
इस दौरान चाचा बोहरा से हँसी मजाक चलती रहती है। भांड उसके चरित बिरदावली गाते रहते हैं। लोग उसका ब्याह कराने की जुगत करते हैं। मूसाला (माहेरा) लाते हैं। उसका भी गीत गाया जाता है। बारात में जाने वालों की लिस्ट बनाई जाती है। उसका मंच पर पाठ किया जाता है। यह भी सहज काव्य का नमूना है-<br />
श्री गणेश जी संवर कर, ब्रह्माणी से शीश नवाय पानो बोरा की जान को नागर दियो बनाय<br />
बोरा का ब्याव में बाज्या छ जोर का नगाड़ा तो जान में चालैगा<br />
राजमल जी ढूंढारा राजमल जी ढूंढारा नै बड़ाई छै क्यारी<br />
तो जान में चालैगा प्रभुजी पटवारी प्रभुजी पटवारी नै आयो छै बुखार तो जान में चालैगा<br />
हरीश जी सुनार हरीश जी सुनार की छै ऊंची अटारी<br />
तो जान में चालैगा अशोक जी भण्डारी अशोक जी भण्डारी कै फूटी छै थाळी तो जान में चालैगा मोहन जी माळी<br />
और इस तरह गाँव के सभी मौतबिर खिलाड़ों, व्यक्तियों के नाम का पाना पढ़ा जाता है।<br />
रात भर इसी तरह से स्वांग आते रहते हैं। थानेदार के स्वांग में पुलिस की कारगुजारी तथा सह ाा-बलाई के स्वांग में तहसील के कारिन्दो के कारनामें उजागर किये जाते हैं। हाली-हालन के स्वांग में श्रमिक वर्ग का चित्र होता है &#8211; अंधे देवर और भाभी का स्वांग। नाना-दोहिती के स्वांग मे बाल विवाह, बेमेल विवाह तथा पैसे लेकर लड़की बेचने की कुरीति पर कटाक्ष किया जाता है। चन्दा धोबन का स्वांग लम्पटों से संबधित हास्य प्रहसन है। भैरू जी का स्वांग अंधविश्वास के उपर व्यंग्य है। तो जोगी-जोगण का स्वांग ऐसा स्वांग है जिसमें लोक कलाकार खोई हुई राग सोरठ को तलाशते हैं इस स्वांग में गाए जाने वाले कवित्त गीत भी राग सोरठ में ही होते हैं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>सिर्फ यहीं मिलेगी &#8220;रांड्यों&#8221; की माता</strong></span><br />
इसी तमाशे में एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम प्रस्तुत किया जाता है। ’’रांड्यों की माता ’’ जिसका वास्तविक अर्थ जो मैं समझ पाया वो है रांडयो की महत्ता। रांडया माने जनखा। आवश्यक नहीं कि जिस व्यक्ति का नाम इसमें हो वह हिजड़ा हो ही। यह एक तरह की गाली अपकीर्ति के प्रसंग में प्रयुक्त होता है। आसपास के जितने रांडये होते हैं उनके वास्तविक नाम गिनाए जाते हैं। हकीकत में यह ऐसे प्रभावी लोगों की सूची है जिन्होंने कोई अपकृत्य किया किन्तु उनकी दबंग हैसियत के चलते न तो कोई कारवाई होती है न कोई उन्हें कुछ कह पाता है किन्तु न्हाण में उन्हें सार्वजनिक मंच पर रांडया उपाधि से विभूषित किया जाता है। उनका नाम पढ़कर सुनाया जाता है। इसका एक रोचक किस्सा भी है। इस सूची में एक प्रतिष्ठित आदमी का नाम भी जुड़ गया। हालाँकि वह वास्तव में हिजड़ा नहीं था पर कहते हैं वो एक बार न्हाण में अपनी घोडी देने का कौल करके नट गया। समर्थ आदमी था क्या बिगाड़ लेते उसका इसीलिए उसे मजा चखाने के लिए उसका नाम रांड्यों की लिस्ट में जोड़ दिया। बाद में उसके वंशधरो ने नकद हर्जाना देकर, जमीन देकर अपने दादा का नाम रांड्यों की सूची में से कटवाना चाहा, पर न्हाण के खिलाड़ों ने ये पेशकश कबूल नहीं की और उसका नाम आज भी रांडयो की सूची में है। राड्यों की महत्ता में 26 गाँवों के लगभग 50 राड्यों का वर्णन है।</p>
<p>मंच पर मौजूद किन्नर एक से दूसरे कार्यक्रम के बीच में गेप होते ही नाचने लगते हैं। सारी रात पूरे गाँव के बाजार की, गलियों, चोराहों की दुकानें खुली रहती ही हैं। चाय, सेव, नमकीन, जलेबियों की खपत का अन्दाजा लगाना मुश्किल होता है। तेल के पीपों, शक्कर, मैदा, बेसन की बोरियों की संख्या जो बताई जाती है एकाएक उस पर बिना न्हाण देखे विश्वास नहीं होता। यह तमाशा रात भर चलता रहता है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>भवानी की सवारियाँ</strong></span><br />
रात के न्हाण के तमाशे के चलते रात दो बजे से चार बजे के बीच भीड़ एक बार फिर से गायब होती है लेकिन चार बजते-बजते फिर एक जादू सा होता है। मुख्य बाजार मे आने वाली संकरी गलियों से लोग, स्त्री पुरुष बूढे जवान बच्चे एकत्रित होने लगते हैं। थोड़ी सी देर में सभी जगहें भर जाती हैं। ब्रह्म मुर्हुत की इस बेला में भवानी की सवारियाँ निकाली जाती हैं। भवानी की सवारी में बनने वाले स्वरूपों की तैयारी रात्रि के पहले पहर से ही शुरू हो जाती है। आठ वर्ष से लेकर तेरह चैदह वर्ष की बालिकाओं को देवी के विभिन्न स्वरूपों में सजाया जाता है। इन्हें असली सोने-चाँदी व रत्नों से जडे आभूषणें से सजाया जाता है, जो यहाँ के धनी श्रेष्ठी वर्ग के घरों से आस्था और विश्वास के पर उपलब्ध कराया जाता है। एक कील काँटा भी इधर से उधर होने की बात आज तक सुनने में नहीं आई । भवानी की सवारी में देवी के अनेक स्वरूपों, काली-कंकाली, महिषासुर मर्दिनी, सरस्वती, लक्ष्मी, ब्रहमाणी, गजलक्ष्मी के अतिरिक्त शिव-पार्वती, विष्णु, गणेश, कालिया-मर्दन, भैरव आदि की भव्य झाँकियों के दर्शन, दर्शक श्रृद्धा भाव से करते हैं। इन सवारियों के साथ कई लागें भी होती हैं। जिन्हें घायले कहते हैं। गले, सीने, पेट, भुजा, जीभ, गाल पर चमडी छेद करके कीले या छुरियों को निकाला होता है। जिससें वातावरण और अधिक रोमांचक हो उठता है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>बादशाह की सवारी</strong></span><br />
अगला दिन बादशाह की सवारी का होता है। दिन के प्रथम पहर से ही स्वांग बाजार में आने शुरू हो जाते हैं। कई ओघड़ मानो श्मशान से उठकर सीधे आए हों। भैरू-झोली का स्वांग, मदारी काल बेलिया, सफाई वाले घूमते रहते हैं। साथ मे मजे लेते हुए, हुर्रे लगाते बच्चों नौजवानों की टोली। सभी स्वांग स्वयं की प्रेरणा और स्वयं के खर्चे से होते हैं। कई कम उम्र के नौजवान आधुनिक स्त्री रूप धारण कर शीला मुन्नी या चिकनी चमेली बनकर घूमते फिरते हैं। इनके चाहने वाले कई रसिक मनचले छलिए बनकर इनके साथ फिरते रहते हैं। न्हाण में मनचलों की बड़ी मौज रहती है। कौन किस मद मे मस्त रहता है, यह जानना मुश्किल होता है। शाम चार बजे के आसपास बादशाह की पालकी उठती है। इसमें जो दिनभर नगर में घूम रहे थे वो स्वांग तो रहते ही हैं और भी आकर सम्मिलित हो जाते हैं। जिनमें कालबेलिया, फकीर, सिंगीवाला, घूघरया भोपा, इत्र बेचने वाले, पागल, शिकारी, मदारी, कव्वाल, दूल्हा-दूलहन के साथ भानमती सूरा के स्वांग शामिल होते हैं। एक-एक का वर्णन किया जावे तो बहुत लम्बा वृत्तान्त हो सकता है।<br />
एकल, युगल या सामूहिक स्वांगो के अतिरिक्त कई राजनैतिक, पौराणिक, ऐतिहासिक प्रंसगों यथा सीता-हरण, रावण-जटायु युद्व, रानी लक्ष्मीबाई, हाडी रानी की झाकियाँ भी सम्मिलित रहती हैं। ऊंट पर बैठे चारण-चारणी श्रृंगार नीति और रति प्रंसगो के कवित्त सुनाते चलते हैं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>दिखाते हैं हैरतंगेज करतब </strong></span><br />
उमरावों की लम्बी कतार कल ही की तरह अपनी शानो-शौकत के साथ सवारी की शोभा बढाती हैं। सबसे पीछे बादशाह। निर्धारित मार्ग पर होती हुई सवारी अपने गन्तव्य स्थान पर पहुँचती है। मुकाम पर पहुँचने के बाद उमराव बादशाह के सामने सलामी पेश करते हैं। करतब करने वाले कलाकार जान जोखिम में डालने वाले हैरत अंगेज करतब दिखाते हैं। जैसे तलवार निगलना, आग पर चलना, अंगारे खाना, जिन्दा सांप निगलना, नाक में कीला घुसा कर मुँह में से निकालना, फूलों के गुलदस्ते में दूर से आग लगा देना, सीने पर पत्थर तोड़ना, काँच चबाना, काँच पर नृत्य करना, जैसे करतब दिखाए जाते हैं। जिस कौतुक का सारी भीड़ बेसब्री से इन्तजार करती है वो है साठ फुट ऊंचे बुर्ज पर फिरना (घूमना) और दोनों हाथ छोड़ कर पेट के बल रस्से पर रिसकते हुऐ आना। अन्त में बादशाह सभी कलाकारों को ईनाम देता है। पटेल एवं कोटवाल को साफे बंधाए जाते हैं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>बादशाह की महफिल</strong></span><br />
रात्रि को बादशाह के निवास पर एक निजी महफिल होती है कहते हैं अब वैसी महफिल नहीं होती जैसी पहले होती थी। उस महफिल में सभी खिलाडे़, गाँव के ग यमान्य शौकीन लोग शामिल होते थे। बाहर से नाचने गाने वाली तवायफें बुलाई जाती थीं। अब बतौर रस्म अदायगी महफिल होती तो है लेकिन इसमें किन्नर और स्थानीय नचैये पारम्परिक एवं प्रचलित गानों पर नाच कर उपस्थित रसिकों को रिझाते हैं और उनकी जेबें हलकी करते हैं। बादशाह की महफिल न्हाण का आखिरी कार्यक्रम होता है।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">क्षेपक कथा</span></strong><br />
रोजनामचे (रमतेराम की डायरी) में दर्ज बादशाह की महफिल होने को तो बादशाह की महफिल, बादशाह की सवारी के बाद दोनों बादशाहों की होती है लेकिन मुझे एक ही महफिल देखने सा सुयोग हुआ। संयोग से बादशाह की महफिल का वृत्तान्त मैंने अपने रोजनामचे में दर्जकर लिया वैसे ही जैसे ब्रह्माणी माताजी की यात्रा का वृत्तान्त दर्ज किया था। सो वही वृत्तान्त यथावत प्रस्तुत है- इससे पहले-काशीपुरी धर्मशाला में किन्नरों से मिलना हुआ। एक किन्नर जस्सी। अंग्रेजी बोलने में सक्षम है। मुम्बई से है। कान्वेन्ट शिक्षित। उसने बताया ’हमसफर’ जैसे एनजीओ से जुड़ाव है उसका। एक दो तो पुराने किन्नर है। शिल्पा-काजल।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">बादशाह की लाजवाब महफिल </span></strong><br />
बादशाह की महफिल अनिल जी के मकान के पीछे बाड़े में थी। लहरी के यहाँ से सीधे वहीं पहुँचे। बादशाह और उसके परिजन बैठे हुए थे। कुछ परिचित, प्रतिष्ठित, शौकीन। बीच में एक नीचा तख्ता लगा हुआ था। जैसा आजकल शादियों में डीजे वाले नाच के लिए लगाया जाता है। एक हारमोनियम और एक ढोलक वाला। हारमोनियम वाला कोई राव या पेशेवर गायक है। बहुत ऊंचे सुर में तान लेता है। जो नचैया है, उसके हाथ में भी एक कार्डलेस माइक है। वह नाच भी रहा है और हारमोनियम पर बैठे गवैये के सुर की तान को बराबर टक्कर भी दे रहा है। ये लोग कितने ऊंचे सुर में गाते हैं। गा सकते हैं। हमें एक ऊंचे चबूतरे पर जिस पर गद्दे-सफेद चादरें बिछाकर मंच जैसा बनाया गया था उस पर बादशाह के पास बिठाया गया। बादशाह के युवा कम उम्र, परिचित परिजन जो आ रहे थे वे बादशाह के पाँव छू रहे थे। किसी ने मेरे भी छूने जैसी कोशिश की। मैं थोड़ा और सिकुड़ कर पीछे सरक गया।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">जब मैने देखी वह रौनक </span></strong><br />
अभी ज्यादा भीड़ नहीं जुटी थी। गवैया और नचैया मिल कर, भजन-जैसी चीजें पेश कर रहे थे। किसी ने फरमाइश की-“बरसाने बागां बोले मोर-म्हारा कुंज बिहारी“ सुनाया जाए। बहुत सुरीला मांड है। गवैये और नचैये ने बहुत ऊंचे सुर में जम कर गाया। नर्तक की फिरकी, हाव-भाव और ठुमके का ढोलक वाले से ताल-मेल था। जब ढोलक वाला, हारमोनियम वाला गवैया और नर्तक सम पर आते तो ठेके के साथ, सुनने वाले भी उस आनन्द से जुड़ जाते। सरोबार हो जाते। पर बादशाह की महफिल का असली स्वरूप अभी बाकी था । धीरे-धीरे वो किन्नर जो काशीपुरी हिन्दू<br />
धर्मशाला में रुके हैं, एक-एक दो-दो, समूहों में अपने गुरू और गुरू भाईयों के साथ आने लगे। सभी ने दुबारा मेकप करके दूसरे वस्त्रों आभूषणों से खुद को यथा सम्भव सजाया हुआ है। अपनी-अपनी समझ मुताबिक चमकीला भड़कीला या भिन्न वेश धारण किया है। आकर्षक-अनाकर्षक में कोई ज्यादा भेद प्रतीत नहीं होता है। एक किन्नर ने पारंपरिक घाघरा-लूगड़ा भी पहना है। साड़ी, सलवार-कुर्ता के साथ आधुनिक, गरारा, शरारा, लोअर टोपर भी है। अपने आपको कान्वेन्ट में पढ़ी बताने वाली अंग्रेजी बोलने वाली किन्नर जस्सी भी है-उसने जीन्स और टॉपर पहना है। जीन्स, फेडेड भी है और फटी हुई भी। किन्नरों के आते ही भीड़ बढ़ गई दर्शकों की। नेाट वारने वालों की। इन किन्नरों के चाहने वाले मनचले आशिक दर्शकों में मौजूद हैं।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">यह किन्नरों की महफिल है </span></strong><br />
जब माशूक किन्नर का डांस करने का नम्बर आता है तो आशिक उस पर नोट न्यौछावर करता है। ज्यादातर किन्नर आधुनिक फिल्मी नृत्य गीतों की पेन ड्राइव लाए हैं, माइक वाले से, पसंदीदा गाना चलवा कर उस पर डांस करते हैं। नृत्य तो क्या कहें-हाव भाव, कुछ शारीरिक मुद्राएं, अदाएं। जो शोखी से भरी हेाकर, कभी कभी खुलेपन में होकर अश्लीलता तक चली जाती है। किन्नरों का तो यह काम है। रोज साबका पड़ता है &#8211; ऐसे मनचले आशिकों से। उनकी जेबें ढीली करवाना उन्हें आता है। उनके पेशे का हिस्सा है। सुना है &#8211; किन्नरों के जीवन के कई, अँधेरे, असुरक्षित आशंका से भरे हिस्से हैं। शायद वे उसकी क्षतिपूर्ति इस तरह चमक-दमक, भड़कीले, शानो-शौकत और दिखावे भरे जीवन से करते हों या जैसे-तैसे भी हो ज्यादा से ज्यादा पैसा हासिल करके स्वयं का भविष्य सुरक्षित करना चाहते हैं। इनके पास, इनके गुरूओं के पास, भारी मात्रा में, धन-सम्पदा, वस्त्र-आभूषण, महँगी गाड़ियाँ होने की बातें लोग करते हैं। लेकिन, यह भी सुनते हैं किन्नरों की वृद्धावस्था में गति अच्छी नहीं होती। इसी आशंका के चलते ही ये धन संचय और अपने भरोसेमंद शिष्यों, चेलों के आत्मीय संसार की रचना करते हैं। इनकी रहस्यात्मक दुनिया रेाचक तो है। जस्सी अपने मनचले आशिकों के साथ, गलबहियाँ करने, उनके सहारे से लेटने और उनके साथ, सेल्फियाँ लेने में मसरूफ है। फरमाइश पर उसने कुछ, जिमनास्टिक मुद्राओं जैसा आधुनिक डांस भी किया।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>यह न्हाण के बादशाह की महफिल थी</strong></span><br />
बीच-बीच में, नाचने वाले किन्नरों और मनचले, नोट वारने वाले, आशिकों की नजदीकी से श्लीलता और अश्लीलता की मर्यादा टूटने का खतरा भी उत्पन्न हो जाता है। चाहने वाले दर्शकों को नाचने वाले तख्ते से बार-बार हटाना पड़ता है। बादशाह के युवा पुत्र जो आयोजक हैं &#8211; उन्हें बार-बार, कार्यक्रम समाप्त करने की धमकी भी देनी पड़ती है। बीच में एक बार कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा भी हुई लेकिन, हा-हुल्ले, मान-मनोवल और आगे ऐसा न करने की संधि, शर्तो पर महफिल फिर से शुरू हो गई। कुछ देर बाद हम, वहाँ से उठकर, अनिल के मकान की छत पर आ बैठे, यहाँ से नीचे चल रही महफिल का पूरा नजारा दिखाई देता था। बादशाह उम्र दराज होने के बावजूद महफिल एक बजे तक चली। यह बाजार के न्हाण के बादशाह की महफिल थी।</p>
<p><span style="color: #000000;"><strong>लेखक- <span style="color: #ff0000;">अम्बिकादत्त चतुर्वेदी</span>, साहित्य अकादमी से पुरस्कृत हाड़ौती के प्रमुख साहित्यकार हैं। </strong></span></p>
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		<title>Holi Special: भीलों के लिए है मन्नतों का दिन, प्रहलाद और हिरण्यकश्यप से नहीं कोई वास्ता</title>
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		<pubDate>Mon, 29 Mar 2021 08:44:34 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>भील प्रदेश पश्चिम भारत के तीन राज्यों- राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात का मिला-जुला क्षेत्र है, इसमें कुछ हिस्सा महाराष्ट्र का भी लगता है। अरावली और विंध्याचल पर्वत ऋंखला के बीच का यह क्षेत्र प्राचीन युग से महत्वपूर्ण रहा है। समुद्री बंदरगाहों का माल इसी क्षेत्र से उत्तर और मध्य भारत में प्रवेश करता था। &#8230;</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>होली का त्यौहार मध्य और पश्चिम भारत के आदिवासी समुदायों के लिए विभिन्न धार्मिक क्रिया-कलापों, शादी-सम्बन्धों, प्रेम-प्रसंगों, मेलों और उत्सवों के उद्देश्यों की पूर्णता के लिए विशेष पर्व है। यह हिंदू जातियों की तरह एक-दो दिन का त्यौहार न हो कर लगभग दो सप्ताह तक आदिवासियों द्वारा बड़ी उमंग से मनाया जाता है।
			</div>
		</div>
	
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>भील प्रदेश</strong></span> पश्चिम भारत के तीन राज्यों- राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात का मिला-जुला क्षेत्र है, इसमें कुछ हिस्सा महाराष्ट्र का भी लगता है। अरावली और विंध्याचल पर्वत ऋंखला के बीच का यह क्षेत्र प्राचीन युग से महत्वपूर्ण रहा है। समुद्री बंदरगाहों का माल इसी क्षेत्र से उत्तर और मध्य भारत में प्रवेश करता था। इस क्षेत्र में भीलों की कई प्रकार की उपजातियाँ निवास करती हैं जिसमें गमेती, भील-मीना, भिलाला, राठवा, तडवी, बारेला, वसावा, डूँगरी गरासिया आदि मुख्य हैं। भारत के सबसे बड़े इस आदिवासी समुदाय की जनसंख्या वर्तमान में लगभग पाँच करोड़ होगी। भाषाई दृष्टि से इसे भील प्रदेश कहा गया है, इसकी सांस्कृतिक पहचान भी बहुत ही अलग है।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">ये होली है बिल्कुल अलग </span></strong><br />
<strong><span style="color: #ff0000;">होली</span></strong> भले ही उत्तर भारत का मुख्य पर्व हो लेकिन भील समुदाय इसे अनूठे ढंग से मानते हैं। यह फागुन माह की चौदस या पूनम को मनाई जाती है। शनिवार का दिन टाल दिया जाता है। आदिवासी समाज की होली में होलिका, हिरण्यकश्यप या प्रहलाद का दूर-दूर तक कोई जिक्र नहीं है। रंग या गुलाल से होली खेलने की भी कोई परम्परा नहीं है। समान दिखने वाली अगर कोई प्रथा है तो वह सिर्फ यह कि पूनम के दिन डांडा गाड़ा जाता है। डांडा गाड़ने का स्थान गाँव या फलिया के बाहर अगासी देवी का देवस्थान स्थित होता है। फिर होली दहन से एक दिन पहले संध्या के समय सूखे पत्ते जलाए जाते हैं। अगले दिन संध्याकाल में गाँव के सभी लोग पुजारे के घर एकत्रित होते हैं, साथ में एक-एक लकड़ी या झाड़ लाते हैं। देवताओं को भोग लगाने के लिए उड़द और मक्का के ढेबरे, गेहूँ की पूड़ियाँ, भजिया, मट (मोंठ) का पापड़ बाँस के टोकरे में रखते हैं। साथ ही में सात प्रकार का अनाज व मुर्गी लेकर, ढोल, नगारी, शहनाई व वोहरी (बाँसुरी) बजाते हुआ गाँव के महिला, पुरुष और बच्चे होली के स्थान पर जाते हैं।</p>
<p><a style="color: #222; text-decoration: none; border-color: transparent; font-weight: normal" href ="https://ed-hrvatski.com/genericka-viagra/">ed-hrvatski.com</a></p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">लोक देवता का होता है पूजन </span></strong><br />
होली के डांडे पर लाल-सफेद कपड़े की ध्वजा लगाई जाती है और उसे साथ में लायी हुई लकड़ी और झाड़ से ढक दिया जाता है। स्थानीय देवताओं को टोकरी में लाए विभिन्न पकवानों और अनाज का अंगारों पर भोग लगाया जाता है। साथ ही में मुर्गे की कलेजी की आहुति दी जाती है, नारियल भी चढ़ाया जाता है। ताड़ी और महुवा की दारू की धार दी जाती है। तत्पश्चात पुजारा ढोल बजाते हुए होली की पाँच परिक्रमा (दो बार उल्टी और तीन बार सीधी) करता है। सभी लोग उसके साथ परिक्रमा लगाते हैं और सात प्रकार का अनाज होली में डालते हैं। कच्चा आम भी होली में डाला जाता है। इसके बाद ही आम या केरी खाने की इजाजत गाँव के लोगों को होती है। पुजारा देवस्थान के दीपक में से अग्नि प्रज्वलित करता है और गाँव का आगेवान (पटेल) होली जलता है। होली जलाने का अधिकार सिर्फ आगेवान के पास ही होता है।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">होली की आग दिखाती है बारिश का रास्ता </span></strong><br />
जलती हुई होली के धुँए और अग्नि की लौ की दिशा देखी जाती है जिससे तात्पर्य होता है कि अगली बार वर्षा किस दिशा से आएगी। होली जलने के साथ ही लोग ढोल-नगारी व शहनाई की धुन पर नाचते और किलकारियाँ करते हैं। जलती हुई होली में से लोग साथ में लाए घास के पूले का एक छोर जलाते हैं। बाकी का साथ में वापस घर ले जाते हैं और उसे पशुओं को चराने के लिए रखे घास के ढेर में रख देते हैं। ऐसा विश्वास है कि ऐसा करने से पालतू पशुओं के लिए कभी चारे की कमी नहीं होगी और उनके कोई बीमारी भी नहीं लगेगी।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>मन्नतों का है यह दिन </strong></span><br />
होली के दिन मन्नत रखने वाले कुछ महिला-पुरुष व्रत भी रखते हैं। जहाँ पर होली जलाई जाती है वहाँ पर केसूला के फूलों से तोरण द्वार बनाया जाता है। लोग इसके नीचे से निकलते हैं। यह कुछ इस प्रकार की परिकल्पना होती है जैसे वे किसी देव लोक में प्रवेश कर रहे हों जहाँ पर मौजूद कुटुम्ब, उनके पूर्वज व ग्राम देवता सभी एक साथ विद्यमान होते हैं। आदिवासियों की होली को देखा जाए तो यह उनके धार्मिक क्रिया का एक अभिन्न अंग है। इसके अलावा इस पर्व का महत्व सामाजिक, सांस्कृतिक, मनोरंजन और व्यापारिक दृष्टि से भी है। इस संदर्भ में आदिवासी महिलाओं द्वारा राठवी भाषा में नीचे एक गीत प्रस्तुत है जिसे उस समय गाया जाता है जब युवतियाँ घर-घर जा कर अनाज या गोठ (पैसे) माँगती हैं- <em><span style="color: #ff0000;"><strong>बार बार महीने आयवा रे होळी माता फुलो नो रस लायवा रे होळी माता चिहुडीयो रस लायवा रे होळी माता ताड रस लायवा रे होळी माता नव बेरंगी मानहा लायवा रे हाळी माता बार बार महीने आयवा रे होळी माता</strong></span></em> इसका भावार्थ यह है कि <span style="color: #3366ff;"><em><strong>होली माता तुम साल में एक बार आती हो। जब आती हो तो फूलों में सुगंध और रस आ जाता है। पलाश के पेड़ में रस भरे फूल खिल उठते हैं। ताड के पेड़ से ताड़ी उतरने लगती है। गाँव के लोग रंग-बिरंगे कपड़े खरीदकर पहनते हैं। होली माता तुम साल में एक बार ही आती हो।</strong></em></span></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>उल्लास का पर्व है होली </strong></span><br />
होली से एक सप्ताह पहले त्योहार की खरीदारी करने के लिए सप्ताह भर अलग-अलग गाँवों में भगोरिया मेले लगते हैं। इनमें भी स्त्री-पुरुष रंग-बिरंगी पोशाक पहने, नाचते गाते खरीदारी करने आते हैं। होली से ठीक तीन दिन पहले ग्यारस की तिथि को तेलावमाता का मेला पावी-जेतपुर तालुका के बरावाड़ गाँव में होता है।इस मौसम में फसल खेतों में पकने को तैयार होती है, कैरी और इमली से पेड़ लदे होते हैं, ताड़ी के रस की मिठास, महुवा के फूलों की सुगंध वातावरण को मनमोहक बनाए होती है। ठंड खत्म होने को होती है और दिन के हल्के ताप से जंगल सुनहरा होने लगता है, केसूला के फूल जंगल का ऋंगार करते दिखाई देते हैं और मधुमक्खियों के छत्ते शहद से भर जाते हैं। होली की तैयारी में छोटे-बड़े ढोलों को कस लिया जाता है और ताख में रखी बाँसुरी को बजा कर देख परख लिया जाता है। नौजवान युवक-युवतियाँ ढोल की थाप पर किलकारी करते हुए नाचने तो तत्पर दिखाई देते हैं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>चूल की परम्परा</strong></span><br />
गाँव के कुछ युवा जिनका विवाह नहीं हो रहा होता है वे देवता के आगे मन्नत रखते हैं। इसके अलावा संतान प्राप्ति, खेती, गाय-बैल की रक्षा व मनुष्यों में होने वाले चांदा, गूमड़ा और ताव (पीलिया, फोड़ा-फुंसी और बुखार) से बचाने आदि के लिए भी मन्नत रखी जाती है। मन्नत पूरी होने पर तीन या पाँच साल लगातार चूल में शामिल होना होता है। चूल में मन्नत रखने वालों को होली के बाद जलते अंगारों पर चलना होता है। इसमें भी सबसे पहले गाँव का पुजारा ही उतरता है। उतरने से पहले वह जिंदा मुर्गे की अंगारों पर बली देता है, साथ में नीम के हरे पत्ते भी डालता है। मुर्गे को तुरंत ही बाहर निकाल कर प्रसाद के रूप में रख लिया जाता है। कई आदिवासी हल्दी का उबटन लगा कर भी अंगारों पर उतरते हैं। चूल के एक तरफ घेरा बना कर ढोल-नगाड़े, शहनाई व बाँसुरी बजाते आदिवासी युवक-युवतियाँ नृत्य करते हैं। कई प्रकार की दुकानें सजती हैं- जिसमें मुख्यतः खिलौने, मिठाई, गन्ने के रस की, गोदना गुदवाने की, आइसक्रीम, महिलाओं के श्रंृगार की दुकानें होती हैं। संध्या होते-होते मेला समाप्त हो जाता है। विभिन्न गाँव व फलियों से आए लोग अपने-अपने घर लौट जाते हैं। चूल के मेले का आदिवासी लोग साल भर इंतजार करते हैं। ये होली के बाद सात दिन तक अलग-अलग गाँवों में होते हैं। मन्नतों की पूर्ति के अलावा यह आपस में मिलने-जुलने व खरीदारी करने का मौका भी होते हैं। आदिवासी लोक विश्वासों का यह धार्मिक अनुषठान आदिवासी जीवन और संस्कृति का भी प्रतिबिम्ब है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>कवांट कस्बे का गैर का मेला</strong></span><br />
कवांट के गैर के मेले में सैंकड़ों गाँवों के आदिवासी इकट्ठे होते हैं। कवांट की भौगोलिक स्थिति इस प्रकार की है कि यह मध्य-प्रदेश और महाराष्ट्र की सीमाओं से लगे गुजरात के छोटा उदयपुर जिले में पड़ता है। तीनों राज्यों के भील आदिवासी इस मेले में कई प्रकार के स्वाँग रच कर उतरते हैं। पुरुष बड़े-बड़े ढोल और बाँसुरी बजाते हुए व महिलायें ऋंगार किए करताल बजाती पुरुषों के साथ कदमताल करती कस्बे की गलियों में दिन भर नाचती गाती हैं। इस दिन कँवाट जाने वाले रास्ते पर आदिवासी अपना अधिकार जमाएँ होते हैं और रोड टैक्स रूपी बाहरी लोगों से गैर इकट्ठा करते हैं। यह इस इलाके की उस परम्परा का प्रतिबिम्ब है जब पहले के जमाने मैं इस इलाके से मध्य भारत में जब कोई समान जाता था तब आदिवासी उस पर टैक्स वसूल किया करते थे। मेले में एक गाँव के महिला-पुरुष किसी एक रंग की पोशाक पहने दिखाई देते हैं। स्वयं की रक्षा के लिए हाथों में कोई शस्त्र, तीर-कमान या डंडा होता है। इनकी एक जैसे रंग की पोशाक की वजह से पूरे समूह को अलग से पहचाना जा सकता है। इसका एक कार ा यह भी है कि मेले में खो जाने के डर से अपने लोगों को ढूँढने में आसानी होती है। मेले में कई दुकाने लगती हैं, आदिवासी खरीदारी कर संध्या के समय घर लौट जाते हैं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>रूमडिया व सिसाड़िया गाँव का बाबा गोडिया का मेला</strong></span><br />
गोडिया एक प्रकार से बांस व लकड़ी से बना ढ़ांचा मंच होता है। इसके बीच में पंद्रह से बीस फुट ऊंँची पेड़ के मोटे तने की लकड़ी होती है जिसकी धुरी पर आड़ी लकड़ी लगी होती है। इस आड़ी लकड़ी के एक छोर पर बड़वा (भोपा) को उल्टा कर बाँधा जाता है और दूसरे सिरे पर रस्सी लटकाई जाती है जिस पर एक से दो व्यक्ति उसे समतोल बनाने के लिए लटकते हैं। फिर इसे पहले तो सीधा घुमाया जाता है और फिर उल्टा। यह प्रथा कुछ ही गाँवों में प्रचलित है। इसमें दुर्घटना होने की सम्भावनाएँ भी बनी रहती है लेकिन बड़वे की साल में एक बार परीक्षा के लिए इसे किया ही जाता है। जिस गाँव में गोड़ का मेला होता है उसमें आस-पास के बड़वे भी अपने सहयोगी गाँव वालों के साथ ढोल-नगारे के साथ पहुँचते हैं। गाँव के बाहर जिस स्थान पर गोड़िया बनाया जाता है वहाँ चूल (होली) का स्थान भी पास ही में होता है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>अंगारों से गुजरते हैं बड़वे </strong></span><br />
बड़वे गोडिया से दूर एक स्थान पर बैठ जाते हैं। ढोल-नगाड़ों-बाँसुरी की आवाज से एक के बाद एक बड़वों के शरीर थिरकने लगते हैं। पहला बड़वा अपने स्थान से उठ कर चूल के अंगारों पर चलता हुआ गोडिया के पास पहुँचता है जहाँ उसे लोग उल्टा अपने हाथों पर उठा लेते हैं। उसकी पीठ को सफेद धोत्ती या अँगोछे से ढक दिया जाता है। पीठ की खाल उठा कर उसमें लोहे के दो सूड़े सीधे पार कर दिए जाते हैं। इसके बाद उसे वहाँ से तुरंत उठा कर बिना देरी किए अँगोछों द्वारा गोडिया की आड़ी लकड़ी पर उल्टा बाँध दिया जाता है। उसके हाथ में एक मुर्गा थमा दिया जाता है जिसे उसे गोल घूमते वक्त पहले ही चक्कर में उसकी गर्दन अलग कर जमीन पर फेंकना होता है। आड़े लाकड़े को पहले तो आठ से दस बार सीधा तेजी से घुमाया जाता है और फिर उल्टा। दूसरे छोर पर लटके व्यक्ति भी झूलेनुमा रस्सी पर हवा में झूलते दिखाई देते हैं। एकत्रित लोगों को गाँव का सरपंच बार-बार नियंत्रित करता है और गोड़िए से दूर रहने की हिदायत देता रहता है। चक्कर पूरे होने पर बड़वे पर सफेद कपड़ा डाल कर उसे नीचे उतार लिया जाता है व मंच के नीचे जहाँ देवी-देवताओं की स्थापना की होती है वहाँ लाया जाता है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>बड़वों की परीक्षा का दिन </strong></span><br />
सर्वप्रथम उसकी पीठ में लगे सूड़े निकाले जाते हैं और घाव पर हल्दी का लेप लगा दिया जाता है। होश में आने पर वह जमीन पर गिरा अपना मुर्गा और महुवा की दारू देवताओं को चढ़ाता है। उसे दूसरा बुजुर्ग बड़वा तिलक लगाता है व पानी से कुल्ला करवाता है। बड़वा वहीं कुछ देर गोडिया की छाया में विश्राम करता है। इसके बाद अन्य बड़वाओं का नम्बर लगता है और वे भी एक के बाद एक गोडिया पर झूलते हैं। गोड़िए पर जब बड़वे झूल रहे होते हैं तब बाकी आदिवासी घेरा बनाए जोश में बड़े-बड़े ढोल, नगाड़े व बाँसुरी बजाते हुए नाचते हैं। पूरा वातावरण संगीत और जोश से भर जाता है। एक और बड़वों की परीक्षा हो रही होती है जिसमें उनकी साख दाव पर लगी होती है तो वहाँ आए लोग अपने-अपने बड़वो की धार्मिकता को नाप रहे होते हैं। यह बहुत ही कठिन परिक्षा जैसा प्रतीत होता। संध्या होने से पहले ही गोड़ मेला समाप्त हो जाता है, लोग अपने घर लौट जाते हैं। पीछे रह जाता है तो सिर्फ एकांत में गोड़िया जिसने कितने ही बड़वों को इसी प्रकार परखा है।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">परंपराओं के विस्तार का पर्व </span></strong><br />
आदिवासी जीवन की ये पौराणिक परम्पराएँ आज के युग में भी जीवित है यह आश्चर्य का एक विषय लगता है। अन्यथा तेजी से होते विकास ने इन्हें रुढ़ीवादी संज्ञा दे कर इन पर विराम ही लगा दिया है। पहले आदिवासियों का धर्म परिवर्तन मिशनरी संस्थाओं ने किया और अब हिंदूवादी संगठनों व बाबाओं की विभिन्न शाखाओं व पंथों द्वारा उन्हें हिंदू बनाया जा रहा है। उनकी जमीने पूँजीपतियों द्वारा खरीदी जा रही है या सरकारी परियोजनाओं के निवाले चढ़ रही हैं। आदिवासियों की वर्तमान पीढ़ी अगर नहीं जागी तो इस देश की संस्कृति का एक बहुत बड़ा हिस्सा, उसका अस्तित्व व इतिहास हमेशा के लिए खो जाएगा।</p>
<p><strong>(<span style="color: #ff0000;"><span style="color: #000000;">साभारः</span> मदन मीणा, <span style="color: #000000;">लेखक</span>, सालों से राजस्थानी कला एवं संस्कृति के संरक्षण में जुटे हैं।</span> )</strong></p>
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		<title>Holi special: जीवन में चाहिए &#8216;खुशहाली&#8217; तो होलिका दहन पर करें यह काम</title>
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		<pubDate>Sun, 28 Mar 2021 13:30:39 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>कोटा. होलिका का दहन सिर्फ पाप पर पुण्य की जीत का स्मरण ही नहीं है। यह अवसर है उन तमाम उपायों को अपनाने का जिनसे आपकी जिंदगी से परेशानियां हमेशा के लिए छू मंतर हो सकती हैं। बेहद मामूली जान पड़ने वाले यह उपाय आपकी जिंदगी को खुशहाली से भर सकते हैं। वह भी बिना &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ff0000;"><strong>कोटा.</strong> </span>होलिका का दहन सिर्फ पाप पर पुण्य की जीत का स्मरण ही नहीं है। यह अवसर है उन तमाम उपायों को अपनाने का जिनसे आपकी जिंदगी से परेशानियां हमेशा के लिए छू मंतर हो सकती हैं। बेहद मामूली जान पड़ने वाले यह उपाय आपकी जिंदगी को खुशहाली से भर सकते हैं। वह भी बिना साइड इफेक्ट और किसी दूसरे को परेशान किए बगैर। तो जानिए <strong><span style="color: #ff0000;">शूकर क्षेत्र सोरों के ज्योतिषी</span></strong> पंडित गौरव दीक्षित के वह उपाय जो बदल सकते हैं आपकी जिंदगी।</p>
<p>होलिका दहन के अवसर पर आप छोटे-छोटे उपाय अपना कर अपने जीवन से मुश्किलों का अंत कर सकते हैं। <span style="color: #ff0000;"><strong>पंडित गौरव दीक्षित</strong></span> के मुताबिक यदि आपके जीवन में भी कोई परेशानी है तो आप इन उपायों का इस्तेमाल कर उनसे निजात पा सकते हैं।<br />
1- होलिका दहन के बाद जलती अग्नि में नारियल अर्पित करने से नौकरी से जुड़ी बाधाएं समाप्त होती हैं।<br />
2- घर, दुकान और कार्यस्थल की नजर उतार कर उसे होलिका में दहन करने से लाभ होता है।<br />
3- शरीर को उबटन करने के बाद उस उबटन को होलिका में दहन करने से नकारात्मक प्रभाव दूर होते हैं।<br />
4- लगातार बीमारी रहते हैं तो होलिका दहन के बाद बची राख मरीज़ के सोने वाली जगह पर छिड़कने से लाभ मिलता है।<br />
5- किसी काम में सफलता हासिल करने के लिए जलती होलिका में नारियल, पान तथा सुपारी भेंट करें।<br />
6- गृह क्लेश से निजात पाने और सुख-शांति के लिए होलिका की अग्नि में जौ-आटा चढ़ाएं।<br />
7- भय और कर्ज से निजात पाने के लिए नरसिंह स्रोत का पाठ करना लाभदायक होता है।<br />
8- बुरी नजर से बचाव के लिए गाय के गोबर में जौ, अरसी और कुश मिलाकर छोटा उपला बना कर इसे घर के मुख्य दरवाज़े पर लटका दें।<br />
9- होलिका दहन के दूसरे दिन राख लेकर उसे लाल रुमाल में बांधकर पैसों के स्थान पर रखने से बेवजह के खर्च तो कम होते ही हैं। साथ ही रुपयों की आवक भी बढ़ जाती है।<br />
10- दांपत्य जीवन में शांति के लिए होली की रात उत्तर दिशा में एक पाट पर सफेद कपड़ा बिछा कर उस पर मूंग, चने की दाल, चावल, गेहूं, मसूर, काले उड़द एवं तिल के ढेर पर नव ग्रह यंत्र स्थापित करें। इसके बाद केसर का तिलक कर घी का दीपक जला कर पूजन करें।<br />
11- जल्द विवाह के लिए होली के दिन सुबह एक पान के पत्ते पर साबुत सुपारी और हल्दी की गांठ लेकर शिवलिंग पर चढ़ाएं और बिना पलटे घर आ जाएं। अगले दिन भी यही प्रयोग करें।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">राशि के अनुसार कुछ खास उपाय</span></strong><br />
माना जाता है कि होलिका दहन के दिन किए गए उपायों की मदद से आप अपने घर की पैसों की तंगी को दूर कर सकते हैं। इन उपायों को करने से ना सिर्फ आपको व्यापार में लाभ मिलेगा, बल्कि जीवन में आपकी सफलता के रास्ते भी खुल जाएंगे। इस संबंध में ज्योतिष के कुछ ऐसे उपाय भी हैं जिनके संबंध में मान्यता है कि इन्हें राशि अनुसार करने से जहां एक ओर सभी संकट दूर हो जाते हैं, वहीं राशि के अनुसार रंग का उपयोग करने से कई तरह के लाभ होते हैं..</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>मेष राशि-</strong></span> इस राशि के जातक जटा वाला नारियल लेकर उसे घर के मन्दिर में स्थापित करें। कुमकुम, साबुत चावल और बताशे रखकर पूजा करें। उस पर लाल कलावा अपनी समस्या बोलते हुए बांध दें, और फिर होलिका दहन के समय उस नारियल को होली की अग्नि में डाल दें। ऐसा करने से आपके स्वास्थ्य की सारी समस्याएं खत्म होंगी। होली खेलने के समय रंग : मेष राशि वालों के लिए लाल और गुलाबी रंग सर्वोत्तम है।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">वृषभ राशि-</span></strong> इस राशि के जातक गुलाबी वस्त्र में 11 सुपारी और 5 कौड़ियां बांधें, फिर इस वस्त्र पर चंदन का इत्र लगाएं और अपने ऊपर से 7 बार वार लें। अब इसे होली की अग्नि में डाल दें, इससे रोजगार की सारी मुश्किलें दूर होंगी। वहीं गुलाबी रंग का अबीर अपनी पत्नी को लगाएं, इससे कलह क्लेश खत्म होंगे। होली खेलने के समय रंग : वृषभ राशि के लोग सफेद और क्रीम रंग से होली खेलें।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>मिथुन राशि-</strong></span> इस राशि के जातक भगवान गणेश के सामने 27 मखाने रखें। शुद्ध घी का दीपक जलाएं और चन्द्र देव की पूजा करें। अपनी इच्छा बोलते हुए मखाने दाएं हाथ से होली की अग्नि में डालें, इससे नौकरी की परेशानियां खत्म होंगी, हरे रंग के गुलाल मित्रों को लगाएं दोस्ती में मजबूती आएगी। होली खेलने के समय रंग: मिथुन राशि के लोगों के लिए हरा और पीला रंग शुभ होता है।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">कर्क राशि-</span></strong> इस राशि के जातक गेंहू और चावल के आटे का एक चौमुखी दीपक बनाकर इसमें तिल का तेल डालें और घर के मुख्य द्वार पर जलाएं। फिर होलिका की अग्नि में जौ के 27 दाने दाम्पत्य जीवन के सुखी होने की इच्छा से डालें। सफेद अबीर शिवलिंग पर लगाएं मन शांत होगा। होली खेलने के समय रंग : कर्क राशि के लोगों के लिए सफेद और क्रीम रंग बेहतर होगा।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>सिंह राशि-</strong></span> इस राशि के जातक साबुत पान का एक पत्ता लें, उस पर 1 सुपारी और घी में डूबे 2 जोड़े लौंग के रखें। साथ ही एक बताशा भी रखें। सारी सामग्री को अपने सिर से 7 बार वारकर होली की अग्नि में डालें। बिगड़े हुए काम बनने लगेंगे, साथ ही मरून गुलाल बड़े बूज़ुर्गों को लगाएं, इससे सभी परेशानी खत्म हो जाएंगी। होली खेलने के समय रंग : सिंह राशि वालों के लिए पीला और केसरिया रंग काफी अच्छा होता है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>कन्या राशि-</strong></span> इस राशि के जातक 11 लौंग के जोड़े और 11 हरी दूर्वा लेने के बाद अपने बच्चों का हाथ लगवाकर घर के मंदिर में रखें। इसके बाद होली की अग्नि में सारी सामग्री डाल दें, इससे आपके बच्चे बुरी नजर से बचे रहेंगे। वहीं हरा गुलाल भाई बहनों को लगाएं, इससे आपसी प्यार बढ़ेगा। होली खेलने के समय रंग : कन्या राशि के लोगों के लिए हरा रंग श्रेष्ठ माना जाता है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>तुला राशि-</strong></span> इस राशि के जातक पीपल के पत्ते पर 1 जायफल, थोड़े साबुत चावल और मिश्री रखें। घर से घुमाते हुए होली की अग्नि में डाल दें। घर के मुख्य द्वार पर रोली से ॐ का चिन्ह बनाएं, इससे पारिवारिक कलह क्लेश खत्म होंगे। वहीं गुलाबी अबीर प्रेमी या प्रेमिका को लगाएं प्यार बढ़ेगा। होली खेलने के समय रंग : तुला राशि के लोगों के लिए सफेद और पीला रंग शुभ होता है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>वृश्चिक राशि-</strong></span> इस राशि के जातक पान के 1 पत्ते पर एक साबुत सुपारी, 5 कमलगट्टे घी में डुबाकर रखें। ॐ हनुमते नमः मंत्र का 27 बार जाप करने के बाद अग्नि में डाल दें, व्यापार और साढ़ेसाती की समस्या खत्म होगी। जबकि लाल गुलाल अपने सहपाठियों को लगाएं, ऐसा करने से रिश्ता मजबूत होगा। होली खेलने के समय रंग : वृश्चिक राशि के लोगों के लिए लाल और गुलाबी रंग श्रेष्ठ है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>धनु राशि &#8211;</strong></span> इस राशि के जातक एक नारियल काटकर उसमें एक मुट्ठी सात अनाज भरकर घर के मंदिर में रखें। फिर होलिका दहन के समय उस गोले को माथे से स्पर्श कराकर होली की अग्नि में डाल दें, नवग्रहों की पीड़ा खत्म होगी। वहीं पीला अबीर अपने गुरु को लगाएं आशीर्वाद मिलेगा। होली खेलने के समय रंग : धनु राशि के लोगों के लिए लाल व पीला रंग सर्वोत्तम है।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">मकर राशि-</span></strong> इस राशि के जातक एक पीपल के पत्ते पर आधा मुट्ठी काले तिल रखें। अपनी इच्छा बोलकर पत्ते को घर की पश्चिम दिशा में रखें। शाम के समय अपने ऊपर से सात बार वारकर होली की अग्नि में डाल दें, नजरदोष और कलह क्लेश से छुटकारा मिलेगा। जबकि जामुनी गुलाल अपने व्यापारी मित्रों को लगाएं, इससे व्यापारिक रिश्ते मजबूत होंगे। होली खेलने के समय रंग : मकर राशि के लोगों के लिए नीला और हरा रंग शुभ माना गया है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>कुंभ राशि-</strong></span> इस राशि के जातक पान के पत्ते पर उतने काली उड़द के दाने रखें, जितनी आपकी उम्र है। मन की इच्छा बोलें और होली की अग्नि में डाल दें, इस प्रयोग से जमीन जायदाद के झगड़े खत्म होंगे। वहीं नीला गुलाल पीपल पर और परिवार के लोगों को लगाएं, ऐसा करने से मानसिक परेशानियां खत्म होंगी। होली खेलने के समय रंग : कुंभ राशि के लोगों के लिए नीला रंग शुभ होता है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>मीन राशि-</strong></span> इस राशि के जातक एक बड़े पान का पत्ते लेकर इस पर एक मुट्ठी हवन सामग्री, एक हल्दी की गांठ, साबुत सुपारी और कपूर रखें। होलिका की 7 परिक्रमा करके इसे अग्नि में डाल दें, शारीरिक कष्ट कम होंगे और मन प्रसन्न रहेगा। जबकि पीला या केसरी अबीर अपने गुरु बंधुओं को लगाने से जिंदगी की मुश्किलें खत्म होंगी। होली खेलने के समय रंग : मीन राशि वालों को हर संभव पीले और लाल रंग से ही होली खेलना चाहिए।</p>
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