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	<title>Indian Federation of Working Journalists Archives - TIS Media</title>
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		<title>केरलः माकपा को चुनौती दूसरी संतप्ता से !</title>
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		<pubDate>Fri, 16 Apr 2021 09:29:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>केरल मार्क्सवादी कम्युनिस्टों द्वारा उसके पति की हत्या से विधवा हुयी केके रमा भी अब विधानसभा का चुनाव लड़ रहीं हैं। सोनिया कांग्रेस—नीत संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा रमा का पूर्ण समर्थन कर रहा है। वडकर (कोजिकोड जिला) से माकपा के प्रतिकार में रमा अपना विरोध मतपेटियों द्वारा व्यक्त करेंगी।  &#8211; के. विक्रम राव रमा की गाथा &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/k-vikram-rao-challenges-of-marxist-communist-party-in-kerala-elections/6805/">केरलः माकपा को चुनौती दूसरी संतप्ता से !</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<div class="kvgmc6g5 cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q">
<blockquote class="aligncenter quote-light "><p>केरल मार्क्सवादी कम्युनिस्टों द्वारा उसके पति की हत्या से विधवा हुयी केके रमा भी अब विधानसभा का चुनाव लड़ रहीं हैं। सोनिया कांग्रेस—नीत संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा रमा का पूर्ण समर्थन कर रहा है। वडकर (कोजिकोड जिला) से माकपा के प्रतिकार में रमा अपना विरोध मतपेटियों द्वारा व्यक्त करेंगी।  <cite> &#8211; के. विक्रम राव</cite></p></blockquote>
<div class="o9v6fnle cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q">
<div dir="auto"><span style="color: #ff0000;"><strong>रमा</strong></span> की गाथा बड़ी त्रासदी और विडंबना से भरी है। उसके स्वर्गीय पति टीजी चन्द्रशेखरन माकपा के जानेमाने नेता थे। स्टूडेन्ट फेडरेशन आफ इंडिया (एसएफआई) के क्रियाशील अगुवा रहे थे। माकपा के वरिष्ठों में थे। मगर माकपा मुख्यमंत्री पिनरायी वियजन के आलोचक थे। एक दिन (4 मई 2012) को वह ओचिंत्यन गांव से किसी विवाह समारोह में शिरकत कर मोटरबाइक पर घर लौट रहे थे, तो करीब पन्द्रह लोगों ने उन्हें काट डाला, टुकड़े—टुकड़े कर दिये। मुकदमा चला तो बारह हत्यारों को आजीवन कारावास हुआ। इनमें चार लोग माकपा के वरिष्ठ नेता थे। इस हत्या पर टिप्पणी करते पूर्व माकपा मुख्यमंत्री और राज्य के वरिष्ठतम कम्युनिस्ट नेता वीएस अच्युतानन्दन ने आक्रोश व्यक्त किया था और घोर भर्त्सना की थी। क्षेत्र में वर्षों से चन्द्रशेखरन अत्यधिक लोकप्रिय रहे। उनकी आलोचना थी कि विजयन ने माकपा को पांच सितारा संस्कृतिवाला बना दिया है। सर्वहारा की पार्टी नहीं रही। चन्द्रशेखरन खुलकर अपनी पार्टी की दक्षिणपंथी कार्यशैली की निंदा करते रहे। स्वाभाविक है पिनरायी विजयन से खुला मुकाबला हुआ। नतीजन अपनी जान गंवानी पड़ी। मगर माकपा सरकार ने हत्या पर खेद तक व्यक्त नहीं किया।</div>
</div>
<div class="o9v6fnle cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q">
<div dir="auto">चन्द्रशेखरन को जब माकपा से निष्कासित कर दिया गया था तो उन्होंने नया दल &#8221;क्रांतिकारी मार्क्सवादी पार्टी&#8221; बना ली। पूरे जिले में वे अत्यधिक जनप्रिय हो गये। तीव्र ईष्यावश उन्हें उनके ही पार्टी वालों ने हमेशा के लिये हटा दिया। अत: उनकी विधवा रमा अब चुनाव द्वारा माकपा से प्रतिशोध कर रही है। सोनिया—कांग्रेस ने यह सीट रमा के लिये छोड़ दिया है।</div>
</div>
<div class="o9v6fnle cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q">
<div dir="auto">मगर माकपा और मुख्यमंत्री पिनरायी विजयन को यह बर्दाश्त नहीं हुआ। माकपा ने चार निर्दलीय प्रत्याशियों से नामांकन दाखिल करा दिया। नौ उम्मीदवारों में चार रमा के नामाराशि है। अत: असली रमा की मुश्किल और मशक्कत बढ़ गयी है।</div>
</div>
<div class="o9v6fnle cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q">
<div dir="auto"><strong><span style="color: #ff0000;">रमा</span> </strong>के विरोध में वाम लोकतांत्रिक मोर्चा के एक घटक जनता दल (सेक्युलर) के प्रत्याशी हैं। भाजपा का भी एक है। यूं अमूमन केरल में शरारत के तौर पर कमजोर विपक्षी उम्मीदवार अपने सशक्त प्रत्याशी की नामाराशि वाले कई प्रत्याशियों के नामांकन दाखिल करा देतें हैं।</div>
</div>
<div class="o9v6fnle cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q">
<div dir="auto">मसलन मशहूर कांग्रेसी प्रत्याशी शशि थरुर के विरुद्ध तिरुअनंतपुरम लोकसभा क्षेत्र से 2009 में दो और शशि थरुर नामक उम्मीदवार थे। दोनों को मिलाकर आठ हजार वोट मिले। हालांकि असली थरुर की जीत की मार्जिन दस हजार थी। हार से बच गये। मगर केरल प्रदेश कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष वीएम सुधीरन के नामवाले भी दो और 2004 निर्वाचन में चुनाव लड़ रहे थे। असली सुधीरन केवल एक हजार वोट से हारे, जबकि उनकी नामा​राशि वालों को 8281 वोट मिले थे। ये वोट शायद कांग्रेस अध्यक्ष को ही मिलते। वोटरों के भ्रम के कारण वे पराजित हो गये।</div>
</div>
<div class="o9v6fnle cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q">
<div dir="auto">केरल विधानसभा निर्वाचन में कई अजूबे होते रहे है। माकपा मुख्यमंत्री विजयन का विरोध नब्बे—वर्षीय पूर्व सीएम वीएस अच्युतानन्द खुलकर कर रहे हैं। उनका मानना है कि मार्क्सवाद के चिंतन, दर्शन और सिद्धांतों को तिलांजलि देकर विजयन उसे दक्षिण पंथी, प्रतिक्रियावादी, पूंजीवादी ढर्रे पर ले जा रहे है।</div>
<div dir="auto"><strong><span style="color: #ff0000;">वे</span></strong> बार—बार मुख्यमंत्री की सोना तस्करी में लिप्तता की ओर इशारा करते है। इसलिये माकपा को अपार हानि हो रही है। मगर मसला यह है कि येचूरी सीताराम और प्रकाश करात जो स्वच्छतावादी है, इस गंदगी को क्यों सह रहे हैं? छह अप्रैल को उत्तर मिल जायेगा।</div>
</div>
<div class="o9v6fnle cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q">
<div dir="auto"><strong><span style="color: #ff0000;">रमा</span> </strong>की उम्मीदवारी की तरह विधवा वी. भाग्यवती भी संघर्षशील हैं। वे मुख्यमंत्री के विरुद्ध धर्मादम क्षेत्र से निर्दलीय चुनाव लड़ रही है। उसकी नौ और तेरह वर्ष की दो पुत्रियों का माकपा के गुण्डों ने बलात्कार और हत्या कर दिया था। भाग्यवती भी जनता से न्याय पाने की अपील पर चुनाव लड़ रहीं हैं। वडकर और धर्मदम विधानसभा के परिणाम भले ही शहीदों की विधवाओं के माकूल न हों, पर माकपा की कचूमर निकल जायेगी।</div>
<div dir="auto"></div>
</div>
</div>
<div class="o9v6fnle cxmmr5t8 oygrvhab hcukyx3x c1et5uql ii04i59q">
<div dir="auto"><span style="color: #000000;"><strong>(द इनसाइड स्टोरी परिवार के संरक्षक<span style="color: #ff0000;"> <a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के. विक्रम राव</a> </span>का शुमार देश के नामचीन पत्रकारों में होता है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर उन्होंने इमरजेंसी तक में स्वतंत्र आवाज के लिए जेल यात्रा की। महीनों की सजाएं भुगती। श्री राव,  वॉयस ऑफ अमेरिका, टाइम्स ऑफ इंडिया, इकोनोमिक टाइम्स, फिल्मफेयर और इलस्ट्रेटेड वीकली में प्रमुख पदों पर रहने के साथ-साथ नेशनल हेराल्ड के संस्थापक संपादक भी रह चुके हैं। प्रेस की नियामक संस्था &#8216;भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य रहने के अलावा मजीठिया वेतन बोर्ड और मणिसाना वेतन बोर्ड के सदस्य के तौर पर पत्रकारों के हित में लंबा संघर्ष किया है। <span style="color: #ff0000;"><a style="color: #ff0000;" href="https://www.facebook.com/profile.php?id=100001609306781">के.विक्रम राव</a>,</span> फिलहाल इंडियन फैडरेशन ऑफ वर्किंग जर्नलिस्ट #IFWJ के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। )</strong></span></div>
<div dir="auto"></div>
</div>
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		<title>क्रूरतम तानाशाह की बरसीः बस यही खामोशी मेरा उत्तर है&#8230;</title>
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		<pubDate>Fri, 05 Mar 2021 15:29:51 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>के. विक्रम राव, अध्यक्ष, इंडियन फैडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट  एकदा राजधानी मास्को के सत्ताभवन क्रेमलिन में सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठतम अधिनायकों की बैठक हो रही थी। महासचिव निकिता खुश्चोव बता रहे थे कि: &#8221;जोसेफ स्टालिन रुसी इतिहास में क्रूरतम तानाशाह रहा। इसने लाखों निर्दोष जनों का कत्ल कराया।&#8221; इस पर पीछे से आवाज आई : &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/cover-stories/68th-death-anniversary-of-dictator-stalin/4975/">क्रूरतम तानाशाह की बरसीः बस यही खामोशी मेरा उत्तर है&#8230;</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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<li><span style="color: #ff0000;"><strong>के. विक्रम राव, अध्यक्ष, इंडियन फैडरेशन ऑफ जर्नलिस्ट </strong></span></li>
</ul>
<p>एकदा राजधानी मास्को के सत्ताभवन क्रेमलिन में सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठतम अधिनायकों की बैठक हो रही थी। महासचिव निकिता खुश्चोव बता रहे थे कि: &#8221;जोसेफ स्टालिन रुसी इतिहास में क्रूरतम तानाशाह रहा। इसने लाखों निर्दोष जनों का कत्ल कराया।&#8221; इस पर पीछे से आवाज आई : &#8221;कामरेड, तब आपने विरोध क्यों नहीं किया ?&#8221; खुश्चेव ने पूछा: &#8221;किसका प्रश्न है यह?&#8221; सभागार में एकदम शांति पसर गयी। खुश्चेव ने कहा: &#8221;बस यही खामोशी मेरा उत्तर है।&#8221;</p>
<p>आज (5 मार्च 2021) <span style="color: #000000;">रुसी तानाशाह जोसेफ विस्सारवियानोविच स्टालिन की 68वीं पुण्य (मुक्ति) तिथि</span> है। एक अनुमान में उसने अपने राज में डेढ़ करोड़ को मौत दी। द्वितीय विश्वयुद्ध में 90 लाख रुसी सैनिकों की बलि चढ़ाई। <strong><span style="color: #ff0000;">इसी युद्ध में स्टालिनग्राद में पकड़े गये नाजी सेना के पराजित जवानों में थे इतालवी तानाशाह तथा हिटलर के हमराही बेनिटो मुसोलिनी के एक सिपाही। उनका नाम था स्टिफानो मियानों। उनकी पुत्री है सोनिया मियानो—गांधी, अब भारतीय कांग्रेसी नेता।</span></strong></p>
<p>संसद में शोकसभा (6 मार्च 1953) के दौरान स्टालिन को श्रद्धांजलि देते हुये जवाहरलाल नेहरु ने कहा था: &#8221;इस रुसी नेता ने अपना वजन और प्रभाव विश्वशांति के पक्ष में डाला था।&#8221; स्टालिन ने कभी भी अपने विरोधियों को जीवित नहीं छोड़ा था। महान विचारक और लेनिन के विशेष अनुयायी लियोन ट्रॉट्स्की को देश से निकाला। मेक्सिको में वे शरणार्थी थे जब स्पेनी कम्युनिस्ट जेइम मर्काडर ने हथौड़े से ट्रॉट्स्की का सिर फोड़कर हत्या (अगस्त 1948) कर दी थी। स्टालिन ने भेजा था।</p>
<p>स्टालिन के सर्वाधिक निष्ठावान अनुगामी थे चीन के माओ जेडोंगे और उत्तर कोरिया के किम इल सुंग। दोनों के नाम असंख्य हत्याओं का कीर्तिमान दर्ज है। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी में बीटी रणदिवे, पीसी जोशी, श्रीपाद अमृत डांगे, ज्योति बासु आदि स्टालिन के कट्टर अनुयायी थे।</p>
<p>यह सोवियत और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टियों के मौकापरस्ती का दृष्टांत है। द्वितीय विश्वयुद्ध के पहले दौर में हिटलर से स्टालिन ने &#8221;शाश्वत&#8221; मित्रता की संघि पर हस्ताक्षर किये। तब भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने साम्राज्यवादी युद्ध का नाम देकर गांधीजी और कांग्रेस का ब्रिटेन के विरुद्ध जनान्दोलन में साथ दिया। कुछ समय बाद नाजी जर्मनी ने रुस पर आक्रमण किया तो स्टालिन ने ब्रिटेन से मित्रता की संधि कर ली। इस पर तत्काल भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने ब्रिटिश—विरोधी साम्राज्यवादी जंग को बंद कर ब्रिटेन का समर्थन किया। कांग्रेस का साथ छोड़ दिया। &#8221;भारत छोड़ो&#8221; आन्दोलन की मुखालफत की। रातों—रात जनयुद्ध कहकर ये भारतीय कम्युनिस्ट ब्रिटिश राज और उसकी पुलिस के मुखबिर बन गये। स्वाधीनता आंदोलन के साथ द्रोह किया। ज्योति बसु तब नेताजी सुभाष बोस हिटलर—टोजो का कुत्ता कहते थे। नई दिल्ली के गोलमार्केट में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का मुख्यालय ए.के. गोपालन भवन है। वहां माओ तथा स्टालिन के बड़े चित्र अभी भी लगे हैं।</p>
<p>स्टालिन की कुछ मशहूर उक्तियां दिलचस्प हैं। उन्होंने कहा था : &#8221;सत्ता की शक्ति लम्बी बन्दूक से आती है।&#8221; (माओ ने भी मिलती—जुलती बात कही थी : &#8221;राजशक्ति का स्रोत बन्दूक की नाल में है&#8221;)। स्टालिन ने आम चुनाव पर कहा था : &#8221;जनता बस जान ले कि मतदान हो रहा है। जो वोट डालते है वे कुछ भी तय नहीं करते। जो मतगणना करता है, वे ही हर बात तय करते हैं।&#8221; स्टालिन के समय ईवीएम नहीं था। इस सोवियत पुरोधा की अवधारणा थी कि रेशमी दस्तानों से क्रान्ति नहीं की जाती। वे कहते थे कि &#8221;इतिहास ही हीरो बनाता है, न कि हीरो इतिहास को।&#8221; स्वयं को वे सोवियत इतिहास की देन मानते थे। मौत पर बड़ा उदार नजरिया था। उनकी राय थी कि एक आदमी मारा गया तो सिर्फ त्रासदी है। लाखों मारे गये तो बस आंकड़ों का विषय है।</p>
<p>क्रीमिया में सागरतटीय याल्टा द्वीप में हिटलर—विरोधी मोर्चे के नेताओं की बैठक (4—11 फरवरी 1945) हुयी थी। एजेण्डा था कि विश्वयुद्ध में जीत के बाद इन तीनों विजेता राष्ट्रों से कब्जियायी जमीन का बटवारा कैसे होगा? तभी नाश्ते पर भेंट में ब्रिटिश प्रधानमंत्री विंस्टन चर्चिल ने कहा कि, &#8221;कल रात मैंने एक सपना देखा। वैश्विक सरकार बनी है। मैं उसका प्रधानमंत्री बना हूं।&#8221; राष्ट्रपति फ्रेंकलिन रूजवेल्ट ने कहा : &#8221;ठीक ऐसा ही सपना मैंने भी देखा। फर्क बस इतना था कि मैं विश्व का राष्ट्रपति बना।&#8221; अब बारी थी स्टालिन के बोलने की। उन्होंने अपने पाइप से राख झाड़ते हुये कहा : &#8221;और किसने आप दोनों को राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री नामित किया ?&#8221; फिर मुस्करा दिये।</p>
<p>भले ही स्टालिन क्रूरतम जल्लाद कहलाये पर एशिया और अफ्रीकी गुलाम राष्ट्रों के स्वाधीनता—संघर्ष् में मददगार थे। भारत की कम्युनिस्ट पार्टी को अकूत वित्तीय सहायता तो बेतहाशा मिलती थी। &#8221;सोवियत भूमि&#8221; पुरस्कार और फ्री रुसी यात्रा का करीब सारे प्रमुख कम्युनिस्ट नेता लुत्फ ले चुकें हैं। चिकित्सा लाभ भी। एक हमारे कम्युनिस्ट पत्रकार साथी थे। स्टालिन के अनन्य प्रशंसक। उन्हें कब्ज की शिकायत थी। वे चिकित्सा हेतु मास्को गये। लौटकर भारत आये तो उन्हें पेचिश हो गयी थी। दस्त थमते नहीं थे। फिर भी हमारे साम्यवादियों को वोल्गा के उस पार स्वर्ग ही नजर आया करता था। इन सब को पकड़ कर मिखाइल गोर्बाचोव ने उनके गोड़ तोड़ को दिये। सोवियत साम्राज्य खत्म् कर डाला। तो हमारी आज ऐसे जोसेफ स्टालिन को हमारी भावभीनी श्रद्धांजलि।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">यह लेखक के अपने विचार हैं&#8230;। लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। </span></strong></p>
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