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	<title>Covid Front Line Worker Archives - TIS Media</title>
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		<title>कोरोना का कहर: सोशल मीडिया का ज्ञान नहीं, इस जमीनी हकीकत से हों वाकिफ&#8230;</title>
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		<pubDate>Tue, 27 Apr 2021 12:15:07 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>डब्ल्यूएचओ और सीडीसी ने यूके वैरिएंट, ब्राजीलियन वैरिएंट और साउथ अफ्रीकन वैरिएंट के साथ ही अन्य दो को लेकर चिंता जताई है। पहले से पहचाने गए वैरएंट के अलावा भारत में सार्स कोराेना वायरस-2 का डबल म्यूटेंट भी पाया गया है। इसने मौजूद वैक्सीन को लेकर भी चिंता पैदा कर दी है। भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने &#8230;</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span><strong><span style="color: #ff0000;">सरकार किस तरह महामारी से निपट रही है, जगजाहिर है। सौ मुंह सौ बातें हैं। दो ही ध्रुव ऐसे हैं, जिसके अनुभव और शोध पर ऐतबार किया जा सकता है। पहले बात की जाए उन चिकित्सकों के बीच की, जो संक्रमित लोगों के इलाज में लगे हैं। इस सिलसिले में 14 अप्रैल को ‘एमथ्री इंडिया‘ में एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई है। इसमें कहा गया है कि नए कोविड-19 में कई वैरिएंट का मेलमिलाप हो सकता है।</span></strong>
			</div>
		</div>
	
<p>डब्ल्यूएचओ और सीडीसी ने यूके वैरिएंट, ब्राजीलियन वैरिएंट और साउथ अफ्रीकन वैरिएंट के साथ ही अन्य दो को लेकर चिंता जताई है। पहले से पहचाने गए वैरएंट के अलावा भारत में सार्स कोराेना वायरस-2 का डबल म्यूटेंट भी पाया गया है। इसने मौजूद वैक्सीन को लेकर भी चिंता पैदा कर दी है। भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने हाल ही में भारत के 18 राज्यों से 10,787 नमूनों के जीनोम के आंकड़े जारी किए हैं, जिनमें ज्ञात वैरिएंट के 771 मामले (7.1%) दिखाए गए हैं। इनमें से 736 यूके वैरिएंट (95.4%) थे, 34 दक्षिण अफ्रीकी वैरिएंट (4.4%) थे और एक ब्राजीलियाई वेरिएंट था। महाराष्ट्र में एक डबल म्यूटेंट का पता चला है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>बेहद अक्रामक है कोरोना का नया वायरस </strong></span><br />
चिंताजनक रिपोर्ट यह भी है कि टीकाकरण की दूसरी खुराक के 14 दिनों के बाद कम गंभीर रोग से लोग संक्रमित हो जाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक mRNA के टीके (Pfizer और Moderna) P1 ब्राजीलियाई वैरिएंट और दक्षिण अफ़्रीकी B.1.351 पर काफी कम प्रभावी हैं। एस्ट्राजेनेका और जॉनसन एंड जॉनसन वैक्सीन का भी दक्षिण अफ्रीकी कम असर है। हालांकि, यूके वैरिएंट के खिलाफ काफी हद तक कारगर दिखाई दिए हैं। टीकाकरण के अपने जोखिम हैं और वायरस के प्रसार का खतरा भी बरकरार है। डबल म्यूटेंट वाले खोजे गए नए कोरोना वायरस बेहद संक्रामक हैं और इसमें सामान्य संक्रमण या टीकाकरण से पैदा हुई प्रतिरक्षा को नकारने की क्षमता है। यही वजह है कि टीकाकरण वाले लोगों में दोबारा संक्रमण के मामले दुर्लभ नहीं हैं, बहुत से केस हैं। खासतौर पर युवा आबादी इस प्रसार के लिए सुपर स्प्रेडर हैं, जिससे जोखिम कम नहीं है। भारत में तो आबादी भी खासी युवा है। यह जानना भी जरूरी है कि पिछले साल के मुकाबले अभी की स्थिति में क्या खास फर्क है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/editorial/article/why-are-we-so-afraid-about-covid-19-we-should-also-know-this-aspect-of-truth/7250/">कोरोना से इतने खौफजदा क्यों हैं, सच्चाई के इस पहलू से भी वाकिफ होना चाहिए&#8230; </a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>COVID की मौजूदा लहर: इस बार क्या बदलाव आया है?</strong></span><br />
उम्र के रुझान में बदलाव: इस बार गंभीर संक्रामक रोगिायों में कम उम्र या युवा भी बड़ी संख्या में चपेट में आए हैं। वे न केवल संक्रमण से प्रभावित हुए हैं, बल्कि उन्हें आईसीयू में भर्ती करने की भी जरूरत पेश आई है।<br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>आरटी पीसीआर टैस्ट:</strong></span> आरटी पीसीआर परीक्षण COVID मामलों का कुशलता से पता नहीं लगा सकते हैं।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">थ्रोंबोटिक विकार:</span> </strong>थ्रोम्बोटिक विकार 2020 मामलों के मुकाबले आम हो रहे हैं। रक्त प्रवाह में बाधाएं या थक्का जमने जैसी घटनाएं हो सकती हैं।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">टीके:</span></strong> दो खुराक के बावजूद संक्रमण न होने की या प्रतिरोधी होने की गारंटी नहीं है। ऐसे तमाम मरीजों को कोविड लक्षणों के आधार पर अस्पताल लाया गया है। हालांकि, अधिकांश मामलों में आरटी पीसीआर पर कम वायरल लोड और ट्रांसमिशन क्षमता का संकेत मिला है।<br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>उच्च सामाजिक वर्ग पर खतरा:</strong></span> सामाजिक और आर्थिक तौर पर उच्च वर्ग निचले तबके के मुकाबले कहीं ज्यादा पीड़ित है।<br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>विपत्ति:</strong> </span>आईसीयू में मरीजों की भर्ती होने वाली मौतें इस बात की गवाह हैं कि संकट किस स्तर पर है, हालांकि इसकी गिरावट जल्द होने की उम्मीद की जानी चाहिए।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">रेडियोलॉजिस्ट सीटी घावों से चिंतित हैं:</span></strong> चिंता की बात यह है कि सीटी घावों वाले मामलों का प्रतिशत इस बार बहुत ज्यादा है। कंप्यूटराइज्ड टोमोग्राफी से पता चला है कि ब्रेन में सामान्य स्थिति नहीं है, कहीं काले तो कहीं सफेद धब्बे हैं, जो संक्रमण की जद में आने वालों के लिए गंभीर स्थिति है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:  <a href="https://tismedia.in/editorial/article/vineet-singh-editor-tis-media-describing-the-misery-of-indian-journalists-amid-corona-s-second-wave/7099/">कोरोना 2.0 पत्रकारों और उनके परिवारों पर भारी पड़ रही ये महामारी </a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>नई लहर अलग कैसे है? </strong></span><br />
2020 में यह अनुमान लगाया गया था कि SARS-CoV सर्द मौसम की घटना है, हालांकि 2021 में वायरस ने सभी को गलत साबित कर दिया, इटली जैसा सर्द मौसम होना तो नहीं ही साबित हुआ। किसी सतह के जरिए वायरस का प्रसार होना अब अहम चिंता का विषय नहीं है। अब एयर ट्रांसमिशन की परिकल्पना पर जोर है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>क्या आरटी-पीसीआर अभी भी इन स्थितियों में लागू है?</strong></span><br />
RT PCR परीक्षण COVID-19 को ट्रिगर करने वाले सभी वैरिएंट का पता लगा सकता है, लेकिन कुछ नए म्यूटेंट इससे ट्रेस नहीं भी हो सकते हैं। इस वजह से चिकित्सकों के सामने डायग्नोसिस को लेकर संदेह बढ़ा है। सीरम मार्कर और सीटी का इस्तेमाल जरूरी है गंभीरता मापने को। बीमारी की पहचान के पहले दिन जब रोगी अस्वस्थ महसूस करना शुरू कर देता है, इस समय कोविड ​​प्रबंधन प्रक्रिया सबसे अहम होती है, समय का उपयोग सबसे जरूरी है। लक्षण उभरने के एक दिन पहले और तीन से चार दिन बाद वायरस अधिक संक्रामक होता है। रोगी को पहले 2-3 दिनों तक तेज बुखार होने की आशंका होती है, लेकिन इस स्तर पर मैक्रोफेज, न्यूट्रोफिल और अन्य कोशिकाएं जन्मजात प्रतिरक्षा वायरस के खिलाफ प्रतिक्रिया देना शुरू कर देती है। अतिरिक्त ऑक्सीजन की जरूरत, हाइपोक्सिया और अन्य लक्षण दूसरे सप्ताह में शुरू होते हैं। ऐसे में 7 से 10 दिनों के भीतर निरोधक दवाओं से नियंत्रण करने की कोशिश जरूरी होती है। सही समय पर कई आधुनिक दवाएं, जैसे कि स्टेरॉयड, टोसीलिज़ुमाब और प्लाज्मा, अच्छी तरह से काम करती हैं।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें:  <a href="https://tismedia.in/kota-news/doctor-rajendra-takhar-s-open-letter-on-covid-pandemic-we-are-not-losing-we-are-struggling-with-lack-of-resources/7357/">चिट्ठी में छलका डॉक्टर का दर्द, बोलेः कितने भी संसाधन हम जुटा लें, इस महामारी में कम पड़ेंगे </a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>इस तरह होती है संक्रमण की पहचान और इलाज की शुरुआत</strong></span><br />
– वायरस के संपर्क में आने के बाद दो दिन से लेकर दो सप्ताह तक संक्रमण के लक्षण दिखाई देने लगते हैं<br />
– संक्रमण 15 मिनट में हो सकता है<br />
– रोग आमतौर पर 4 से 5 दिनों के बीच होने दिखने का अनुमान है<br />
– वायरस 9 दिनों के बाद खुद को दोहराता नहीं है<br />
– संक्रमण के संदेह पर तीसरे से छठे दिन के बीच छह मिनट की वॉक टेस्ट मददगार साबित हो सकता है।<br />
बुखार 101 डिग्री फारेनहाइट, CRP में तेज बढ़ोत्तरी होती है जो लीवर द्वारा बनने वाला प्रोटीन होता है, इसके बढ़ने का मतलब संक्रमण होता है, इसके अलावा 3 दिन में खांसी या छह मिनट की वॉक टेस्ट में SpO2 में 5 प्रतिशत की गिरावट, निमोनिया चेतावनी के संकेत हैं। लैंसेट 2020 फी Z एट अल की रिपोर्ट के अनुसार कोविड संक्रमण का पांचवां दिन सबसे गंभीर समय होता है।<br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>(15 सालों से पत्रकारिता के खांटी हस्ताक्षर <a href="https://www.facebook.com/ashish.saxena.39794">आशीष आनंद</a> दैनिक जागरण और अमर उजाला जैसे अखबारों से जुड़े रहे हैं। फिलहाल वह स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहे हैं एवं TIS Media की उत्तर प्रदेश टीम का प्रमुख हिस्सा हैं।)</strong></span></p>
<h5><strong>(#TISMedia का <a class="bbc-h9s9st-InlineLink e1cs6q200" href="https://www.facebook.com/tismedialive" aria-label="फ़ेसबुक, बाहरी सामग्री">फ़ेसबुक</a> पेज लाइक, <a class="bbc-h9s9st-InlineLink e1cs6q200" href="https://twitter.com/LiveTis" aria-label="ट्विटर, बाहरी सामग्री">ट्विटर</a> फॉलो, और <a class="bbc-h9s9st-InlineLink e1cs6q200" href="https://www.youtube.com/channel/UCSK0w1wptFiEg4i9f6OjR8Q" aria-label="यूट्यूब, बाहरी सामग्री">यूट्यूब</a> सब्सक्राइब कर हर पल जुड़े रहें हमारे साथ) </strong></h5>
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		<title>राजस्थान सख्त हैः Covid 19 के खात्मे को गहलोत की “खुली जंग”, इंतजाम देख रह जाएंगे भौचक</title>
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		<pubDate>Sat, 24 Apr 2021 17:41:10 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>जयपुर में शुरू हुआ स्टेट कोविड-19 कंट्रोल रूम, 24 घंटे दर्जनों अफसर करेंगे काम 67 लैब हर रोज करेंगी एक लाख से ज्यादा कोविड टेस्ट, तैयार हो रहे 47 ऑक्सीजन प्लांट 1 लाख क्वारेंटाइन बेड, 429 अस्पतालों में इलाज और 272 मोबाइल वैन तैयार कोटा. कोरोना (Covid-19) के खिलाफ राजस्थान सरकार (Rajasthan Government) ने खुली &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<ul>
<li><span style="color: #ff0000;"><strong>जयपुर में शुरू हुआ स्टेट कोविड-19 कंट्रोल रूम, 24 घंटे दर्जनों अफसर करेंगे काम</strong></span></li>
<li><span style="color: #ff0000;"><strong>67 लैब हर रोज करेंगी एक लाख से ज्यादा कोविड टेस्ट, तैयार हो रहे 47 ऑक्सीजन प्लांट</strong></span></li>
<li><span style="color: #ff0000;"><strong>1 लाख क्वारेंटाइन बेड, 429 अस्पतालों में इलाज और 272 मोबाइल वैन तैयार</strong></span></li>
</ul>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>कोटा.</strong></span> कोरोना (<strong><span style="color: #ff0000;">Covid-19</span></strong>) के खिलाफ राजस्थान सरकार (<span style="color: #ff0000;"><strong>Rajasthan Government</strong></span>) ने खुली जंग का ऐलान कर दिया है। कोरोना संक्रमण (<span style="color: #ff0000;"><strong>Coronavirus</strong></span>) की नकेल तोड़ने को राजधानी जयपुर में राज्य स्तरीय नियंत्रण कक्ष (<strong><span style="color: #ff0000;">Covid Control Room Rajasthan</span></strong>) स्थापित किया गया है। जहां सूबे के आला आईएएस से लेकर आईपीएस अफसर तीन शिफ्टों में 24 घंटे काम करेंगे। इतना ही नहीं रोजाना हो रहे 78 हजार कोरोना टेस्ट को बढ़ाकर एक लाख किया जा रहा है। लोगों को मौत के मुंह में जाने से बचाने को युद्ध स्तर पर 47 ऑक्सीजन प्लांट स्थापित किए जा रहे हैं। जिनमें से 25 ने काम भी शुरू कर दिया है। कोरोना संक्रमितों के लिए 429 अस्पतालों में इलाज मुहैया कराया जा रहा है। इसके साथ ही ग्रामीण इलाकों से मरीजों को लाने के लिए 272 मोबाइल वैन संचालित की जा रही है और गैर-गंभीर मरीजों को आइसोलेट करने के लिए 1 लाख से ज्यादा क्वारेंटाइन बेड तैयार किए जा चुके हैं।</p>
<p>कोरोना के बढ़ते संक्रमण को रोकने को लेकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत खासे सख्त हैं। केंद्र सरकार की मदद मिलती न देख अब राजस्थान ने अपनी लड़ाई खुद लड़ने का फैसला किया है। गहलोत सरकार ने एक साथ मरीज, अस्पताल, दवाओं और ऑक्सीजन से लेकर अंतिम संस्कार तक हर मोर्चे पर अभियान छेड़ दिया है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/kota-news/corona-control-room-creat-in-kota-officers-appointed-for-medicine-and-oxygen-supply-in-hospitals/7224/">कोटा के अस्पतालों में मरीजों को बेड-दवा और ऑक्सीजन दिलवाएंगे ये &#8220;सुपर 30&#8221;</a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>खत्म होगा घमासान</strong></span><br />
दिनों दिन भयावह होते कोरोना संक्रमण के बाद अस्पतालों में बेड से लेकर दवाओं और ऑक्सीजन तक के लिए मचे घमासान को खत्म करने के लिए मुख्यमंत्री अशोक गहलोत खुद मैदान में कूद पड़े हैं। चिकित्सीय व्यवस्थाओं को सुधारने के लिए मुख्यमंत्री ने राजधानी जयपुर में हाईटेक कोरोना कंट्रोल रूम की स्थापना की है। यह कंट्रोल रूम 24 घंटे लगातार काम करेगा। डीआईजी सीआईडी सीबी जय नारायण को इसका प्रभारी अधिकारी बनाया गया है। उनके निर्देशन में सूबे के आला अफसर तीन शिफ्टों में लगातार काम करेंगे।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>वॉर रूम की तरह करेगा काम</strong></span><br />
जयपुर के तिलक मार्ग पर स्थित आईटी बिल्डिंग में बनाया गया राज्य स्तरीय कंट्रोल रूम वार रूम की तरह काम करेगा। जहां जिलेवार अस्पतालों, उन अस्पातालों में ऑक्सीजन और नॉन ऑक्सीजन बेड की संख्या, कितने भरे हैं और कितने खाली, कितने मरीज वेटिंग में जैसे इलाज के लिए बेहद जरूरी काम की रियल टाइम मॉनीटरिंग के साथ साथ दवाओं से लेकर ऑक्सीजन की उपलब्धता एवं आवश्यकताओं और सप्लाई की पूरी व्यवस्था की जाएगी। मेडिकल इमरजेंसी से जुड़े सभी विभागों को कॉर्डिनेट करने का भी काम यहीं से किया जाएगा। कंट्रोल रूम की एक-एक रिपोर्ट मुख्यमंत्री के प्रमुख सचिव कुलदीप राका, मुख्य सचिव निरंजन आर्य, प्रमुख सचिव गृह अभय कुमार और प्रमुख सचिव चिकित्सा सिद्धार्थ महाजन को भेजी जाएगी। इस कोर टीम को तत्काल निर्णय लेने और कार्यवाही करने के अधिकार दिए गए हैं।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/rajasthan/covid-19-74-peoples-deaths-in-24-hours-from-corona-at-rajasthan-15355-positive-case-found-in-today/7216/">सरकार की सख्ती के बाद ठिठका कोरोना, मौत अब भी बेलगाम </a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>सूबे के तेज तर्रार अफसरों को किया तैनात</strong></span><br />
तीन शिफ्ट में काम करने वाले स्टेट कोविड कंट्रोल रूम में तेज तर्रार अफसरों की तैनाती की गई है। सुबह आठ से शाम चार बजे तक की पहली शिफ्ट डीआईजी सीआईडी सीबी जयनारायण, उपनिदेशक, सैनिक कल्याण बोर्ड मीनाक्षी मीणा, कृषि विवि रजिस्ट्रार अल्का विश्नोई, एएसपी चेतराम सेवदा, एएसपी रामेश्वर प्रसाद की ड्यूटी रहेगी। इसके बाद शाम 4 बजे से रात 12 बजे तक की दूसरी शिफ्ट में डीआईजी एटीएस अंशुमान भौमियां, मदरसा बोर्ड सचिव हरिताम कुमार आदित्य, राजस्थान आजीविका कौशल मिशन जीएम करतार सिंह, एएसपी शिवलाल बैरवा, एएसपी सुरेंद्र सिंह सागर को तैनात किया गया है। जबकि  रात 12 से सुबह 8 बजे तक की तीसरी शिफ्ट में डीआईजी एससीआरबी डॉ़ रवि, उपायुक्त स्कूल शिक्षा परिषद सोमदत्त दीक्षित, बाल विकास उपनिदेशक मोहन सिंह, एएसपी विजयपाल सिंह, एएसपी अश्विनी अत्रे की तैनाती की गई है। इसके साथ ही एक रिजर्व टीम भी बनाई गई है। जिसमें डीआईजी विजिलेंस सत्येंद्र सिंह, संस्कृत विवि रजिस्ट्रार सुरेंद्र सिंह यादव, देवस्थान सहायक आयुक्त आकाश रंजन, एएसपी रामावतार सोनी, डिप्टी कमांडेंट आरएसी गोविंद देथा रहेंगे।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>जल्द एक लाख टेस्ट होंगे हर रोज</strong></span><br />
कोरोना वॉर से जुड़ी तैयारियों के बारे में  द इनसाइड स्टोरी (TIS Media) को जानकारी देते हुए स्वास्थ्य मंत्री डॉ. रघु शर्मा ने बताया कि फिलहाल राजस्थान की 36 राजकीय, 29 निजी और 2 केंद्रीय प्रयोगशालाओं में हर रोज 78 हजार कोरोना सेंपल की जांच हो रही है। सेंपल इकट्ठे करने के लिए पूरे प्रदेश में 134 आरटीपीसीआर मशीन एवं 69 आरएनए एक्सट्रेक्टर मशीन उपलब्ध करवाई गई हैं। जल्द से जल्द पूरे प्रदेश में रोजाना एक लाख से अधिक जांच करवाए जाएंगे। उन्होंने बताया कि अब तक 81 लाख 11 हजार 760 लोगों की कोरोना जांच हो चुकी है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/editorial/article/plans-must-be-made-at-the-grassroots-level-to-deal-with-the-disaster-of-corona/7205/">तांडव मचा रही आपदा, प्रबंधन हुआ लापता</a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>429 अस्पतालों में इलाज</strong></span><br />
चिकित्सा मंत्री ने बताया कि प्रदेश के 654 चिकित्सा संस्थानों में कोरोना रोगियों का उपचार किया जा रहा है। 225 निजी अस्पतालों के अलावा सरकारी स्तर पर 282 कोविड केयर सेन्टर, 87 डेडीकेटेड कोविड हैल्थ सेन्टर और 60 डेडिकेटेड कोविड हॉस्पिटल दिन रात काम कर रहे हैं। हालात से निपटने के लिए राजस्थान में फिलहाल 42 हजार 886 आइसोलेशन बेड, 8532 ऑक्सीजन सपोर्टेड बेड एवं 2326 आईसीयू बेड मौजूद हैं। लेकिन, इसके बाद भी हम ऑक्सीजन सपोर्ट वाले बेड की संख्या बढ़ाकर 20 हजार तक लाने की कोशिश कर रहे हैं। केंद्र से आए वेंटिलेटर खराब निकले, लेकिन फिर भी 1749 वेंटिलेटर का हमने इंतजाम किया है। सभी उपजिला एवं जिला अस्पतालों में सेन्ट्रलाइज्ड ऑक्सीजन पाइपलाइन स्थापित की जा चुकी है। प्रदेश में इस वक्त 25 ऑक्सीजन प्लांट पूरी रफ्तार से काम कर रहे हैं। जबकि 18 ऑक्सीजन प्लांट स्थापित करने का काम युद्ध स्तर पर चालू है।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>272 मोबाइल वैन, सवा लाख क्वारनटाइन बेड</strong></span><br />
शर्मा ने बताया कि कोरोना डेडिकेटेड हॉस्पीटलों का लोड कम करने के लिए संदिग्ध और कम गंभीर मरीजों के उपचार के लिए अब तक 1 लाख 14 हजार 288 क्वारनटाइन बेड एवं 42 हजार 886 आइसोलेशन बेड तैयार किए जा चुके हैं। इसके साथ ही दूर दराज के गांवों में मेडिकल स्टाफ के साथ 272 मेडिकल मोबाईल वैन भी संचालित की जा रही है। ताकि, ग्रामीणों को इलाज के लिए शहर की ओर न भागना पड़े। उन्होंने बताया कि फिलहाल राजस्थान में 1 लाख 27 हजार 616 एक्टिव केस हैं, लेकिन वहीं दूसरी ओर 3 लाख 67 हजार 485 कोरोना पॉजिटिव मरीज ठीक होकर घर जा चुके हैं।</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/rajasthan/chief-minister-ashok-gehlot-waged-open-war-against-corona/7227/">राजस्थान सख्त हैः Covid 19 के खात्मे को गहलोत की “खुली जंग”, इंतजाम देख रह जाएंगे भौचक</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>कोरोना 2.0: पत्रकारों और उनके परिवारों पर भारी पड़ रही महामारी</title>
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		<pubDate>Thu, 22 Apr 2021 13:47:20 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>मीडिया संस्थानों में कोविड 1.0 के दौरान खर्चे बचाने के नाम पर हजारों पत्रकारों की नौकरियां छीन ली थी। अचानक नौकरियों से निकाले गए लोगों ने सरकार से लेकर अदालतों तक के दरवाजे खटखटाए, लेकिन देश के श्रम कानून मालिकानों के आगे बौने साबित हो गए। मीडिया संस्थानों ने स्टाफ तो खूब घटाया, लेकिन बात &#8230;</p>
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		<div class="box info  aligncenter">
			<div class="box-inner-block">
				<span class="fa tie-shortcode-boxicon"></span>कोरोना की दूसरी लहर पत्रकारों ही नहीं उनके परिवारों पर भी खासी भारी पड़ रही है। कोविड 1.0 में दर्जनों जान लेने के बाद कोविड 2.0 पत्रकारों के लिए काल साबित हो रहा है। बड़ी बात यह है कि युवा पत्रकारों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। लेकिन, विडंबना यह है कि जिन कंपनियों के लिए पत्रकार अपनी जान दे रहे हैं वह मीडिया हाउस उनकी मदद के लिए आगे आते हैं और न ही सरकारें उन्हें फ्रंटलाइन वॉरियर मानती हैं। ऐसे में बेहद कम तनख्वाहों पर नौकरी करने वाले इन मुलाजिमों की मौत उनके परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ बनकर टूट पड़ती है। <span style="color: #ff0000;"><strong>&#8211; फ्री वाइसः विनीत सिंह</strong></span>
			</div>
		</div>
	
<p>मीडिया संस्थानों में कोविड 1.0 के दौरान खर्चे बचाने के नाम पर हजारों पत्रकारों की नौकरियां छीन ली थी। अचानक नौकरियों से निकाले गए लोगों ने सरकार से लेकर अदालतों तक के दरवाजे खटखटाए, लेकिन देश के श्रम कानून मालिकानों के आगे बौने साबित हो गए। मीडिया संस्थानों ने स्टाफ तो खूब घटाया, लेकिन बात जब काम की आई तो जिसे पहले पांच लोग कर रहे थे अब उसे एक ही आदमी से करवाया जाने लगा। आखिर, मरता क्या न करता की स्थिति में नौकरियां बचाने के लिए देश भर के पत्रकारों ने अपनी क्षमताओं से भी ज्यादा काम किया। 6 जून 2020 को दिल्ली एम्स की चौथी मंजिल से कूदकर जान देने वाले पत्रकार तरुण सिसोदिया की मौत को चाहकर भी नहीं भूल सकते। कोविड पॉजिटिव होने के बाद भी तरुण एम्स से लगातार काम कर रहे थे। उनके सीनियर्स ने उन्हें दिलासा देना तो दूर काम कम करने तक की जहमत तक नहीं उठाई।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>भयावह है आंकड़े</strong></span><br />
कोरोना की पहली लहर के दौरान 1 मार्च 2020 के बाद दुनिया भर के 602 पत्रकारों की कोरोना की चपेट में आकर अधिकारिक मौत हुई थी। हालांकि यह आंकड़ा वास्तविकता से बेहद कम है, क्योंकि किसी भी देश की सरकार ने पत्रकारों की मौत के अलग से आंकड़े जारी नहीं किए थे। जेनेवा स्थित अंतरराष्ट्रीय मीडिया निगरानी सगंठन प्रेस इम्बलम कैंपेन (पीईसी) के महासचिव ब्लाइस लेम्पेन कहते हैं कि कोरोना की चपेट मे आकर मरने वाले पत्रकारों की वास्तविक संख्या का आंकलन करना फिलहाल असंभव है। क्योंकि, न तो सरकारें और न ही उन्हें नौकरी देने वाले मीडिया संस्थान इस तरह के आंकड़े संभाल कर रखते हैं। लेम्पेन बताते हैं कि साल 2020 में कोरोना महामारी से मरने वाले पत्रकारों के मामले में सबसे ज्यादा भयावह हालात लैटिन अमेरिका के थे। यहां सबसे ज्यादा 303 पत्रकारों की कोरोना की चपेट में आने से मौत हुई। जबकि एशिया में 145, यूरोप में 94, उत्तरी अमेरिका में 32 और अफ्रीका में 28 मौतें रिकॉर्ड की गईं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>आखिर मौत की वजह क्या</strong></span><br />
अंतरराष्ट्रीय मीडिया निगरानी सगंठन प्रेस इम्बलम कैंपेन (पीईसी) के महासचिव ब्लाइस लेम्पेन कहते हैं कि कोरोना वायरस महामारी जब दुनिया भर में लाखों लोगों की जान ले चुकी थी, तब भी पत्रकार इस दौरान अपनी जान दांव पर लगाकर खबरें निकाल रहे थे। वह बता रहे थे कि दुनिया कितने मुश्किल दौर में फस चुकी है। वह एक सच्चे सिपाही की तरह कोरोना के मोर्चे पर अग्रिम पंक्ति में खड़े होकर काम कर रहे थे। इस मोर्चे पर सिर्फ पत्रकार ही नहीं थे&#8230; उनके परिजन भी थे। क्योंकि, काम खत्म करने के बाद पत्रकार लौटकर घर ही जाता है। जहां वह परिजनों के साथ मिलकर उनके साथ बैठकर अपने दिन भर के बुरे अनुभवों को खत्म करने की कोशिश करता है। लेम्पेन कहते हैं कि दुनिया के तमाम मुल्कों और मीडिया संस्थानों ने वर्क फ्रॉम होम का ढ़ोंग तो खूब किया, लेकिन वास्तविकता यह है कि उस दौरान न सिर्फ पत्रकारों को फील्ड में जमकर दौड़ाया गया, बल्कि विरोध करने वाले लोगों के सुदूर तबादले किए गए, उन्हें अखबार बांटने तक के काम में झोंक दिया गया। इससे भी बड़ी चीज जूम मिटिंग के नाम पर उन्हें 24 घंटे का बंधुआ मजदूर बना दिया गया। विरोध करने पर नौकरी से निकाला गया सो अलग।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>संकट में पत्रकारिता</strong></span><br />
पीईसी के महासचिव ब्लाइस लेम्पेन ने एक बयान में कहा, &#8220;खबरों की सच्चाई पता करने और वास्तविकता जानने के कारण पत्रकारों का फील्ड मे जाना मजबूरी है। जिसके वजह से वह कोरना वायरस की चपेट में आते हैं और इसके बाद वह दो तरफा मुश्किलों यानि नौकरी एवं जान जाने के खतरे के बीच एक कमरे में आइसोलेट हो जाते हैं। रही बात फ्रीलांसर और वर्क फ्रॉम होम की तो यह सबसे बड़ा छालावा है क्योंकि पत्रकारिता ऐसा काम है जिसे घर बैठकर किसी भी सूरत में नहीं किया जा सकता। ऊपर से पत्रकारों की मृत्यु का कारण अक्सरकर स्पष्ट नहीं किया जाता। उनकी मृत्यु की घोषणा नहीं की जाती है या कोई विश्वसनीय स्थानीय जानकारी नहीं होती है। पिछले साल मार्च के बाद से पेरू में सबसे ज्यादा मीडियाकर्मी कोरोना महामारी में मारे गए। पेरू में कोरोना वायरस की वजह से सबसे ज्यादा 93 मीडियाकर्मियों की मौत हुई। इसके बाद ब्राजील में 55, भारत में 53, मेक्सिको में 45, इक्वाडोर में 42, बांग्लादेश में 41, इटली में 37 और अमेरिका 31 पत्रकारों की मौत हुई। लेकिन, किसी भी सरकार या नौकरी प्रदाता मीडिया संस्थान ने पत्रकारों को कोरोना वॉरियर मानना तो दूर फ्रंट लाइन वर्कर तक नहीं माना। जिसके चलते उन्हें किसी भी तरह की मदद की बात तो दूर घर चलाने के लिए आर्थिक सहायता तक नहीं मिल सकी। जिनकी नौकरी छीन ली गई उन पर तो मानसिक और आर्थिक, दो तरफा हमला किया गया।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>कोरोना 2.0ः हालात भयावह</strong></span><br />
सरकार भले ही पत्रकारों को फ्रंटलाइन वर्कर न मान रहीं हो लेकिन पत्रकार कोरोना संक्रमितों के साथ घर से लेकर अस्पताल और अगर कोई अनहोनी होती है तो अस्पताल से लेकर शमशान तक साथ रहते है। यही कारण है कि पत्रकारिता जगत को इसका नुकसान भी उठाना पड़ रहा है। कोरोना की दूसरी लहर में जहां 2 दर्जन से अधिक पत्रकारों की अभी तक मौत हो चुकी है, तो उनके परिवार भी इससे अछूते नहीं हैं। बहुत से पत्रकारों ने अपने परिजनों को इस कोरोना काल में खोया है। अभी भी बहुत से पत्रकार अस्पतालो में जिंदगी और मौत से लड़ रहे हैं । कोरोना की दूसरी लहर में जहां बीती 27 मार्च को उत्तर प्रदेश राज्य मान्यता प्राप्त पत्रकार समिति के सदस्य प्रमोद श्रीवास्तव की कोरोना वायरस की वजह से मृत्यु होने के बाद ऐसा सिलसिला शुरू हुआ जिसने पूरे पत्रकारिता जगत की आंखों को नम कर रखा है । यह पत्रकारों के काम करने का हौसला ही है कि वह इतना दर्द झेलने के बाद भी लगातार अपने कर्तव्य पथ पर डटे हुए हैं।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>युवाओं को खोने का गम</strong></span><br />
कोरोना वायरस के दुष्प्रकोप से ताविशी श्रीवास्तव जैसी अनुभवी पत्रकार को नहीं बचाया जा सका तो अंकित शुक्ला जैसे युवा पत्रकार भी करोना की वजह से हम सबके बीच नही रहे। बीते दिनों वरिष्ठ पत्रकार पी पी सिंहा, पवन मिश्रा, बरेली के युवा पत्रकार प्रशांत सक्सेना की कोरोना के कारण मौत हो हुई । वहीं वरिष्ठ पत्रकार राशिद मास्टर साहब, यूएनआई ब्यूरो चीफ हिमांशु जोशी, वरिष्ठ पत्रकार सच्चिदानंद सच्चे, दुर्गा प्रसाद शुक्ला, मोहम्मद वसीम, हमजा रहमान, रफीक, आगरा के वरिष्ठ पत्रकार पंकज कुलश्रेष्ठ और ब्रजेश पटेल जैसे कई साहसी पत्रकार थे, जिन्हें कोरोना ने निगल लिया ।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>परिवारों पर भी टूटा कहर</strong></span><br />
कोरोना ने सिर्फ पत्रकारों को ही नहीं प्रभावित किया, बल्कि उनके परिवारों पर भी कहर बनकर टूटा । दैनिक जागरण के पत्रकार अंकित शुक्ला की जहां कोरोना के कारण मौत हो गई तो उसके 1 दिन पहले उनके ताऊ की और अंकित शुक्ला की मौत के 3 दिन बाद उनके पिता की भी इसी वायरस के चलते मृत्यु हो गई। वहीं उनकी मां और पत्नी अभी भी अस्पताल में अपना इलाज करा रही है। इस तरह की विभीषिका को सुनकर शायद ही कोई ऐसा हो जिसकी आंखें नम ना हो जाए। वही अमर उजाला के वरिष्ठ पत्रकार आलोक दीक्षित की माता को कोरोना वायरस ने निगल लिया, वरिष्ठ पत्रकार राजीव श्रीवास्तव की माता की भी मृत्यु कोरोना और सिस्टम की बदहाली के कारण हुई। वरिष्ठ पत्रकार शिव शंकर गोस्वामी ने अपनी माता और दामाद को इस वायरस के कारण खो दिया।इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार पुनीत मोहन और आकाश यादव के पिता की भी मौत कोरोना वायरस और बदहाल सिस्टम के कारण ही हुई। वरिष्ठ पत्रकार अल्ह्मरा खान की मां और हिंदी खबर के कैमरामैन मनोज की माता और भाभी की भी जान इस कोरोना वायरस ने ली। कोरोना ने पत्रकारों और उनके परिवारो को बुरी तरह से प्रभावित किया हैं लेकिन सरकार इस पर कोई ध्यान नही दे रही। वरिष्ठ पत्रकार एवं नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट इंडिया के संस्थापक सदस्य डॉ. बचन सिंह सिकरवार कहते हैं कि पत्रकार सबसे दयनीय अवस्था में है। पत्रकार अस्पताल से लेकर शमशान तक काम करता है, लेकिन फिर भी उसे फ्रंटलाइन वर्कर नहीं माना जाता। बड़ी बात यह है कि पत्रकारों की मौत के बाद सरकारों से लेकर उनकी खुद की जमात सबसे पहले यही सवाल उठाती है कि आखिर वह किस अखबार में और संस्थान में पत्रकार थे? क्या मान्यता प्राप्त पत्रकार थे? क्या सरकार ने उनके गले में कोई पट्टा डाला था या फिर उनके खुद के संस्थान ने&#8230; यदि नहीं तो पत्रकार को पत्रकार मानता कौन है?</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>सुनो! सरकार&#8230;</strong></span><br />
नेशनल यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट इंडिया के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष रतन दीक्षित पत्रकारों के हालातों से खासे निराश हैं। वह कहते हैं कि पत्रकारों के लिए सरकारों की बात तो छोड़िए उनके संस्थान तक संवेदनशील नहीं है। उनसे चरित्र प्रमाण पत्र तो हर कोई मांगता है, लेकिन किस हालात में काम कर रहे हैं, यह पूछने की जहमत कोई नहीं उठाता। अफसरों, मंत्रियों और सरकारों के करीब कोई पत्रकार है भी तो उनकी संख्या कितनी है&#8230; गिनती पर गिने जा सकते हैं ऐसे लोग, लेकिन बाकी की पूरी जमात इलाज करना तो दूर इस हाल में ईमानदारी से अपना घर तक नहीं चला पा रही है। ऐसे में उनकी मौत के बाद परिवार की जिंदगी बद से बदतर हो जाती है। सिर्फ कोरोना संक्रमण की बात करें तो पत्रकारों के आर्थिक हालात ऐसे नहीं है कि वह मंहगा इलाज करवा सकें। इसके लिए न तो उनके पास बीमे हैं और न ही दवाओं के खर्च उठाने के पैसे। रियायतों और आर्थिक मदद तो सिर्फ जुमला भर है। वर्किंग जर्नलिस्ट को अब हमे सूचीबद्ध करना होगा। उनकी मदद के लिए आगे आना ही होगा। सरकार अपनी जिम्मेदारी न समझे तो फिर इस वर्ग को खुद के लिए झंडा उठाना होगा। नहीं तो पत्रकारिता संकट में फस जाएगी।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>गुजारिश&#8230;</strong></span><br />
द इनसाइट स्टोरी (TIS Media) के जुबैर खान, हिमांशु हेमनानी द लीडर हिंदी के आशीष सक्सेना और अतीक खान कहते हैं कि कोरोना की दूसरी लहर जिस तरह से पत्रकारिता क्षेत्र को प्रभावित कर रही है शायद ही इतना कहर किसी और क्षेत्र पर पड़ा हो लेकिन फिर भी सोशल मीडिया पर पत्रकारों को लेकर अपशब्द बोले जाते हैं। अगली बार सोशल मीडिया पर पत्रकारों को लेकर अपशब्द लिखने से पहले उनके समर्पण पर जरूर ध्यान दें। कोरोना के इस दौर में पत्रकारों को आम लोगों की मांगो के लिए अपनी जान तक गंवानी पड़ रही है जिसका सरकारी बीमा तक नही होता। अब भी तमाम लोग ऐसे हैं जो आम आदमी के लिए सरकार और माफियाओं से लड़ रहे हैं, लेकिन हर किसी को एक ही नजर से देखना बंद नहीं होगा तो उस रोज जब पत्रकारों को कोसने वाले मुश्किल में फसेंगे तब उनकी मदद के लिए कोई खांटी पत्रकार बाकी नहीं बचा होगा। उस रोज&#8230; फिर कोसना कि अब वैसे पत्रकार पैदा ही कहां होते हैं।</p>
<h6><strong><span style="color: #ff0000;">(लेखक- <a href="https://www.facebook.com/UdaiVineetSingh/">विनीत सिंह </a> <a href="https://www.facebook.com/tismedialive">द इनसाइड स्टोरी</a> (<a href="https://www.youtube.com/channel/UCSK0w1wptFiEg4i9f6OjR8Q">TIS Media</a>) के संपादक हैं। 22 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय हैं। दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका, सहारा, अमर उजाला, इंडिया टुडे, आउट लुक, एएनआई, सीएनईबी, जनमत और एनडीटीवी जैसे प्रमुख मीडिया संस्थानों से जुड़े रहने के साथ ही बरेली कॉलेज के पत्रकारिता विभाग में तीन वर्षों तक अध्यापन कार्य भी कर चुके हैं) </span></strong></h6>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/editorial/article/vineet-singh-editor-tis-media-describing-the-misery-of-indian-journalists-amid-corona-s-second-wave/7099/">कोरोना 2.0: पत्रकारों और उनके परिवारों पर भारी पड़ रही महामारी</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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