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		<title>“बोझ” नहीं बनेंगी बेटियां, बिरला लेंगे “गोद”</title>
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		<dc:creator><![CDATA[tismedia.in]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 03 Jan 2025 14:04:52 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Cover Stories]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>जन्म पूर्व पोषाहार देकर सेहत से लेकर शिक्षा, स्वाबिलम्बन और शादी तक की ली जिम्मेदारी कोटा। “बेटियां” अब बोझ नहीं बनेंगी। जन्म से लेकर उनकी शादी तक हर जिम्मेदारी अब लोकसभा स्पीकर ओम बिरला उठाएंगे। उनकी शिक्षा, स्वाबिलम्बन और शादी ही नहीं उनके मातृत्व सुपोषण तक की जिम्मेदारी लेने की उन्होंने घोषणा की है। सुपोषित &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<ul>
<li><span style="color: #ff0000;"><strong>जन्म पूर्व पोषाहार देकर सेहत से लेकर शिक्षा, स्वाबिलम्बन और शादी तक की ली जिम्मेदारी</strong></span></li>
</ul>
<p>कोटा। “बेटियां” अब बोझ नहीं बनेंगी। जन्म से लेकर उनकी शादी तक हर जिम्मेदारी अब लोकसभा स्पीकर ओम बिरला उठाएंगे। उनकी शिक्षा, स्वाबिलम्बन और शादी ही नहीं उनके मातृत्व सुपोषण तक की जिम्मेदारी लेने की उन्होंने घोषणा की है। सुपोषित मां अभियान के तहत कोटा के छप्पन भोग परिसर में सुपोषित मां अभियान के तीसरे चरण के आगाज के दौरान उन्होंने हाडौती की बोटियों के लिए बड़ी घोषणा की।</p>
<p>छप्पन भोग परिसर में शुक्रवार को सुपोषित मां अभियान के तीसरे चरण का आगाज हुआ। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और उप मुख्यमंत्री दिया कुमारी ने कोटा बूंदी की 1500 गर्भवती महिलाओं को सुपोषण किट वितरित किए। उस अवसर पर मौजूद मातृशक्ति को संबोधित करते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि स्त्री के बिना मानव अस्तित्वहीन है। हमारे समाज का तानाबाना ऐसा है कि कई बार आर्थिक दुश्वारियों के कारण बेटियों का पालन-पोषण अच्छी तरह नहीं हो पाता। नतीजन राष्ट्र बेहतरीन प्रतिभाओं से वंचित रह जाता हैं। लेकिन, अब ऐसा नहीं होगा। बेटियों की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा की जिम्मेदारी हम उठाएंगे ताकि उनका सर्वांगीण विकास हो सके।</p>
<h4><strong>बेटियां अब हमारी जिम्मेदारी</strong></h4>
<p>लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि बेटियां शारीरिक रूप से स्वस्थ हों यह अत्यन्त आवश्यक है। क्योंकि, स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता है। इसके लिए उनके जन्म से ही अच्छे पोषण की व्यवस्था की जाएगी। वह ज्यादा से ज्यादा योग्य हों, इसके लिए प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक का समुचित प्रबंध किया जाएगा। स्कूली शिक्षा के साथ-साथ उनके कौशल का भी विकास किया जाएगा ताकि उनमें किशोरावस्था से ही स्वाबिलम्बन की ललक जगाई जा सके। बेटियां अपने पैरों पर खड़ी होंगी तो पूरा परिवार आर्थिक रूप से मजबूत होगा। इतना ही नहीं बेटियों की शादियों के लिए भी माता-पिता को मुश्किलों का सामना नहीं करना होगा। उनकी भव्य शादियों तक का बंदोबस्त करवाया जाएगा।</p>
<h4>मजबूत होता मातृत्व</h4>
<p>सुपोषित मां अभियान की लाभार्थियों को संबोधित करते हुए लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने कहा कि गर्भ धारण करने के बाद पोषाहार की उपलब्धता बेहत महत्वपूर्ण होती है। अब भी समाज के कई ऐसे तबके हैं जिनके पास समुचित संसाधन उपलब्ध नहीं है। कई बार देखता हूं कि गर्भवती होने के बावजूद भी महिलाओं को मजदूरी करनी पड़ती है। परिवार का पालन पोषण करने के लिए वह काम करती है, लेकिन जैसे ही रसोई में घुसती है खुद खाने के बजाय पूरे परिवार का पेट भरना उसका पहला लक्ष्य होता है। ऐसे में कई बार उसे समुचित पोषाहार नहीं मिल पाता और गर्भ में पल रहा बच्चा कमजोर रह जाता है। राष्ट्र निर्माण में समाज का यह आखिरी तबका उतना ही महत्व रखता है जितना पहले पायदान पर खड़ा आदमी। इसलिए इस तबके की महिलाओं को पर्याप्त पोषाहार उपलब्ध कराना और उनके गर्भ में पल रहे शिशु को शारीरिक एवं मानसिक रूप से स्वस्थ बनाना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। इस जिम्मेदारी को ध्यान में रखकर सुपोषित मां अभियान के तीसरे चरण का आज आगाज किया है। तीसरे चरण में अभी तक 1500 गर्भवती महिलाओं को उनके गर्भ धारण करने से लेकर शिशु को जन्म देने तक 12.5 किलो पोषाहार हर महीने निशुल्क उपलब्ध करवाया जाएगा। इतना ही नहीं गर्भवती महिलाओं और उनके गर्भ में पल रहे बच्चे की निरंतर स्वास्थ्य जांच, नियमित जांचें और दवाएं भी उपलब्ध करवाई जाएंगी।</p>
<h4>बजट में शामिल होगा सुपोषित मां अभियान</h4>
<p>उप मुख्यमंत्री दिया कुमारी ने कहा कि गर्भवती महिलाओं और गर्भ में पल रहे शिशुओं के लिए सुपोषित मां अभियान निश्चित ही एक वरदान है। एक स्त्री को गर्भवती होने के बाद सबसे ज्यादा देखभाल की जरूरत होती है, लेकिन कुछ वजहों से जब वह इस देखभाल से वंचित हो जाती है तो गर्भ में पल रहे शिशु को ही नहीं प्रसव के दौरान गर्भवती को भी तमाम परेशानियों का सामना करना पड़ता है। सुपोषित अभियान की लाभार्थियों से जब बात करने का अवसर मिला और समझा कि इस अभियान के दौरान मिलने वाली पोषाहार किट, स्वास्थ्य जांच, दवाएं और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला जी का संबल उन्हें शारीरिक ही नहीं मानसिक रुप से सुदृढ़ बना रहा है तो बेहद खुशी हुई। कोटा बूंदी की महिलाओं के वरदान सरीखा यह अभियान निश्चित रूप से पूरे प्रदेश की महिलाओं तक पहुंचना चाहिए। पूरे प्रदेश की महिलाओं को सुपोषित मां अभियान जैसी सुविधा मिल सके इसके लिए जयपुर लौटकर में मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा जी से बात कर प्रदेश के बजट में इसका प्रावधान कराने की कोशिश करूंगी।</p>
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		<title>यह कहानी नहीं: अमृता प्रीतम</title>
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		<dc:creator><![CDATA[tismedia.in]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 22 Oct 2021 04:53:49 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Art and Literature]]></category>
		<category><![CDATA[Cover Stories]]></category>
		<category><![CDATA[Amrita Pritam]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi Literature]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi Stories]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>पत्थर और चूना बहुत था, लेकिन अगर थोड़ी-सी जगह पर दीवार की तरह उभरकर खड़ा हो जाता, तो घर की दीवारें बन सकता था। पर बना नहीं। वह धरती पर फैल गया, सड़कों की तरह और वे दोनों तमाम उम्र उन सड़कों पर चलते रहे&#8230;। सड़कें, एक-दूसरे के पहलू से भी फटती हैं, एक-दूसरे के &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[
		<div class="clearfix"></div>
		<div class="about-author about-author-box container-wrapper">
			<div class="author-avatar">
				<img decoding="async" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/amrita.jpg" alt="अमृता प्रीतम (Amrita Pritam)" class="author-avatar-img" width="111" height="111" />
			</div>
			<div class="author-info">
				<h4>अमृता प्रीतम (Amrita Pritam)</h4>अमृता प्रीतम (31 अगस्त, 1919-31 अक्तूबर 2005) का जन्म, गुजरांवाला (पंजाब) में हुआ । उन्होंने पंजाबी भाषा में कविता, उपन्यास, कहानी समेत अनेक विधाओं में रचना की । उनकी मुख्य कृतियाँ हैं; उपन्यास : डॉक्टर देव, पिंजर, आह्लणा, आशू, इक सिनोही, बुलावा, बंद दरवाज़ा, रंग दा पत्ता, इक सी अनीता, चक्क नम्बर छत्ती, धरती सागर ते सीपियाँ, दिल्ली दियाँ गलियाँ, एकते एरियल, जलावतन, यात्री, जेबकतरे, अग दा बूटा, पक्की हवेली, अग दी लकीर, कच्ची सड़क, कोई नहीं जानदाँ, उनहाँ दी कहानी, इह सच है, दूसरी मंज़िल, तेहरवाँ सूरज, उनींजा दिन, कोरे कागज़, हरदत्त दा ज़िंदगीनामा; आत्मकथा : रसीदी टिकट; कहानी संग्रह : हीरे दी कनी, लातियाँ दी छोकरी, पंज वरा लंबी सड़क, इक शहर दी मौत, तीसरी औरत; कविता संग्रह : लोक पीड़, मैं जमा तू, लमियाँ वाटां , कस्तूरी, सुनेहुड़े, कागज ते कैनवस; गद्य कृतियाँ : किरमिची लकीरें, काला गुलाब, अग दियाँ लकीराँ, इकी पत्तियाँ दा गुलाब, सफ़रनामा, औरत : इक दृष्टिकोण, इक उदास किताब, अपने-अपने चार वरे, केड़ी ज़िंदगी केड़ा साहित्य, कच्चे अखर, इक हथ मेहन्दी इक हथ छल्ला, मुहब्बतनामा, मेरे काल मुकट समकाली, शौक़ सुराही, कड़ी धुप्प दा सफ़र, अज्ज दे काफ़िर उनको साहित्य अकादमी और ज्ञानपीठ पुरस्कार मिले ।
			</div>
		</div>
	
<p><span style="color: #0000ff;"><em><strong>पत्थर और चूना बहुत था, लेकिन अगर थोड़ी-सी जगह पर दीवार की तरह उभरकर खड़ा हो जाता, तो घर की दीवारें बन सकता था। पर बना नहीं। वह धरती पर फैल गया, सड़कों की तरह और वे दोनों तमाम उम्र उन सड़कों पर चलते रहे&#8230;।</strong></em></span></p>
<p>सड़कें, एक-दूसरे के पहलू से भी फटती हैं, एक-दूसरे के शरीर को चीरकर भी गुज़रती हैं, एक-दूसरे से हाथ छूड़ाकर गुम भी हो जाती हैं, और एक-दूसरे के गले से लगकर एक-दूसरे में लीन भी हो जाती थीं। वे एक-दूसरे से मिलते रहे, पर सिर्फ तब, जब कभी-कभार उनके पैरों के नीचे बिछी हुई सड़कें एक-दूसरे से आकर मिल जाती थीं।<br />
घड़ी-पल के लिए शायद सड़कें भी चौंककर रुक जाती थीं, और उनके पैर भी&#8230;<br />
और तब शायद दोनों को उस घर का ध्यान आ जाता था जो बना नहीं था&#8230;<br />
बन सकता था, फिर क्यों नहीं बना? वे दोनों हैरान-से होकर पाँवों के नीचे की ज़मीन को ऐसे देखते थे जैसे यह बात उस ज़मीन से पूछ रहे हों&#8230;<br />
और फिर वे कितनी ही देर ज़मीन की ओर ऐसे देखने लगते मानों वे अपनी नज़र से ज़मीन में उस घर की नींवें खोद लेंगे।&#8230;<br />
और कई बार सचमुच वहाँ जादू का एक घर उभरकर खड़ा हो जाता और वे दोनों ऐसे सहज मन हो जाते मानों बरसों से उस घर में रह रहे हों&#8230;</p>
<p>यह उनकी भरपूर जवानी के दिनों की बात नहीं, अब की बात है, ठण्डी उम्र की बात, कि अ एक सरकारी मीटिंग के लिए स के शहर गई। अ को भी वक्त ने स जितना सरकारी ओहदा दिया है, और बराबर की हैसियत के लोग जब मीटिंग से उठे, सरकारी दफ्तर ने बाहर के शहरों से आने वालों के लिए वापसी टिकट तैयार रखे हुए थे, स ने आगे बढ़कर अ का टिकट ले लिया, और बाहर आकर अ से अपनी गाड़ी में बैठने के लिए कहा।</p>
<p>पूछा &#8211; “सामान कहाँ है?”<br />
“होटल में।”<br />
स ने ड्राइवर से पहले होटल और फिर वापस घर चलने के लिए कहा।<br />
अ ने आपत्ति नहीं की, पर तर्क के तौर पर कहा &#8211; “प्लेन में सिर्फ दो घंटे बाकी हैं, होटल होकर मुश्किल से एयरपोर्ट पहुँचूँगी।”<br />
“प्लेन कल भी जाएगा, परसों भी, रोज़ जाएगा।” स ने सिर्फ इतना कहा, फिर रास्ते में कुछ नहीं कहा।<br />
होटल से सूटकेस लेकर गाड़ी में रख लिया, तो एक बार अ ने फिर कहा &#8211;<br />
“वक्त थोड़ा है, प्लेन मिस हो जाएगा।”<br />
स ने जवाब में कहा &#8211; “घर पर माँ इन्तज़ार कर ही होगी।”<br />
अ सोचती रही कि शायद स ने माँ को इस मीटिंग का दिन बताया हुआ था, पर वह समझ नहीं सकी &#8211; क्यों बताया था?<br />
अ कभी-कभी मन से यह ‘क्यों’ पूछ लेती थी, पर जवाब का इन्तज़ार नहीं करती थी। वह जानती थी &#8211; मन के पास कोई जवाब नहीं था। वह चुप बैठी शीशे में से बाहर शहर की इमारतों के देखती रही&#8230;<br />
कुछ देर बाद इमारतों का सिलसिला टूट गया। शहर से दूर बाहर आबादी आ गई, और पाम के बड़े-बड़े पेड़ों की कतारें शुरु हो गईं&#8230;</p>
<p>समुद्र शायद पास ही था, अ के साँस नमकीन-से हो गए। उसे लगा-पाम के पत्तों की तरह उसके हाथों में कम्पन आ गया था-शायद स का घर भी अब पास था&#8230;<br />
पेड़ों-पत्तों में लिपटी हुई-सी कॉटेज के पास पहुँचकर गाड़ी खड़ी हो गई। अ भी उतरी, पर कॉटेज के भीतर जाते हुए एक पल के लिए बाहर केले के पेड़ के पास खड़ी हो गई। जी किया &#8211; अपने काँपते हुए हाथों को यहाँ बाहर केले के काँपते हुए पत्तों के बीच में रख दे। वह स के साथ भीतर कॉटेज में जा सकती थी, पर हाथों की वहाँ ज़रूरत नहीं थी &#8211; इन हाथों से न वह अब स को कुछ दे सकती थी, न स से कुछ ले सकती थी&#8230;</p>
<p>माँ ने शायद गाड़ी की आवाज़ सुन ली थी, बाहर आ गईं। उन्होंने हमेशा की तरह माथा चूमा और कहा -”आओ, बेटी।”<br />
इस बार अ बहुत दिनों बाद माँ से मिली थी, पर माँ ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए &#8211; जैसे सिर पर बरसों का बोझ उतार दिया हो &#8211; और उसे भीतर ले जाकर बिठाते हुए उससे पूछा -”क्या पियोगी, बेटी?”<br />
स भी अब तक भीतर आ गया था, माँ से कहने लगा &#8211; “पहले चाय बनवाओ, फिर खाना।”<br />
अ ने देखा &#8211; ड्राइवर गाड़ी से सूटकेस अन्दर ला रहा था। उसने स की ओर देखा, कहा &#8211; “बहुत थोड़ा वक्त है, मुश्किल से एयरपोर्ट पहुँचूँगी।”<br />
स ने उससे नहीं, ड्राइवर से कहा &#8211; “कल सवेरे जाकर परसों का टिकट ले आना।” और माँ से कहा -”तुम कहती थीं कि मेरे कुछ दोस्तों को खाने पर बुलाना है, कल बुला लो।”<br />
अ ने स की जेब की ओर देखा जिसमें उसका वापसी का टिकट पड़ा हुआ था, कहा -”पर यह टिकट बरबाद हो जाएगा&#8230;”</p>
<p>माँ रसोई की तरफ जाते हुए खड़ी हो गई, और अ के कन्धे पर अपना हाथ रखकर कहने लगी -”टिकट का क्या है, बेटी! इतना कह रहा है, रुक जाओ।”<br />
पर क्यों? अ के मन में आया, पर कहा कुछ नहीं। कुर्सी से उठकर कमरे के आगे बरामदे में जाकर खड़ी हो गई। सामने दूर तक पाम के ऊँचे-ऊँचे पेड़ थे। समुद्र परे था। उसकी आवाज़ सुनाई दे रही थी। अ को लगा &#8211; सिर्फ आज का ‘क्यों’ नहीं, उसकी ज़िन्दगी के कितने ही ‘क्यों’ उसके मन के समुद्र के तट पर इन पाम के पेड़ों की तरह उगे हुए हैं, और उनके पत्ते अनेक वर्षों से हवा में काँप रहे हैं।</p>
<p>अ ने घर के मेहमान की तरह चाय पी, रात को खाना खाया, और घर का गुसलखाना पूछकर रात को सोने के समय पहनने वाले कपड़े बदले। घर में एक लम्बी बैठक थी, ड्राइंग-डाइनिंग, और दो और कमरे थे &#8211; एक स का, एक माँ का। माँ ने ज़िद करके अपना कमरा अ को दे दिया, और स्वयं बैठक में सो गई।<br />
अ सोने वाले कमरे में चली गई, पर कितनी ही देर झिझकी हुई-सी खड़ी रही। सोचती रही &#8211; मैं बैठक में एक-दो रातें मुसाफिरों की तरह ही रह लेती, ठीक था, यह कमरा माँ का है, माँ को ही रहना चाहिए था&#8230;<br />
सोने वाले कमरे के पलंग में, पद… में, और अलमारी में एक घरेलू-सी बू-बास होती है, अ ने इसका एक घूँट-सा भरा। पर फिर अपना साँस रोक लिया मानो अपने ही साँसो से डर रही हो&#8230;<br />
बराबर का कमरा स का था। कोई आवाज़ नहीं थी। घड़ी पहले स ने सिर-दर्द की शिकायत की थी, नींद की गोली खाई थी, अब तक शायद सो गया था। पर बराबर वाले कमरों की भी अपनी बू-बास होती है, अ ने एक बार उसका भी घूँट पीना चाहा, पर साँस रुका रहा।</p>
<p>फिर अ का ध्यान अलमारी के पास नीचे फर्श पर पड़े हुए अपने सूटकेस की ओर गया, और उसे हँसी-सी आ गई &#8211; यह देखो मेरा सूटकेस, मुझे सारी रात मेरी मुसाफिरी की याद दिलाता रहेगा&#8230;<br />
और वह सूटकेस की ओर देखते हुए थकी हुई-सी, तकिए पर सिर रखकर लेट गई&#8230;</p>
<p>न जाने कब नींद आ गई। सोकर जागी तो खासा दिन चढ़ा हुआ था। बैठक में रात को होने वाली दावत की हलचल थी।<br />
एक बार तो अ की आँखें झपककर रह गईं &#8211; बैठक में सामने स खड़ा था। चारखाने का नीले रंग का तहमद पहने हुए। अ ने उसे कभी रात के सोने के समय के कपड़ों में नहीं देखा था। हमेशा दिन में ही देखा था &#8211; किसी सड़क पर, सड़क के किनारे, किसी कैफे में, होटल में, या किसी सरकारी मीटिंग में &#8211; उसकीयह पहचान नई-सी लगी। आँखों में अटक-सी गई&#8230;</p>
<p>अ ने भी इस समय नाइट सूट पहना हुआ था, पर अ ने बैठक में आने से पहले उस पर ध्यान नहीं दिया था, अब ध्यान आया तो अपना-आप ही अजीब लगा &#8211; साधारण से असाधारण-सा होता हुआ&#8230;<br />
बैठक में खड़ा हुआ स, अ को आते हुए देखकर कहने लगा -”ये दो सोफे हैं, इन्हें लम्बाई के रुख रख लें। बीच में जगह खुली हो जाएगी।”<br />
अ ने सोफों को पकड़वाया, छोटी मेज़ों को उठाकर कुर्सियों के बीच में रखा। फिर माँ ने चौके से आवाज़ दी तो अ ने चाय लाकर मेज़ पर रख दी।<br />
चाय पीकर स ने उससे कहा -”चलो, जिन लोगों को बुलाना है, उनके घर जाकर कह आएँ और लौटते हुए कुछ फल लेते आएँ।”<br />
दोनों ने पुराने परिचित दोस्तों के घर जाकर दस्तक दी, सन्देशे दिए, रास्ते से चीजें खरीदीं, फिर वापस आकर दोपहर का खाना खाया, और फिर बैठक को फूलों से सजाने में लग गए।</p>
<p>दोनों ने रास्ते में साधारण-सी बातें की थीं &#8211; फल कौन-कौन-से लेने हैं? पान लेने हैं या नहीं? ड्रिंक्स के साथ के लिए कबाब कितने ले लें? फलाँ का घर रास्ते में पड़ता है, उसे भी बुला लें? &#8211; और यह बातें वे नहीं थीं जो सात बरस बाद मिलने वाले करते हैं।</p>
<p>अ को सवेरे दोस्तों के घर पर पहली-दूसरी दस्तक देते समय ही सिर्फ थोड़ी-सी परेशानी महसूस हुई थी। वे भले ही स के दोस्त थे, पर एक लम्बे समय से अ को जानते थे, दरवाज़ा खोलने पर बाहर उसे स के साथ देखते तो हैरान-से हो कह उठते -”आप।”<br />
पर वे जब अकेले गाड़ी में बैठते, तो स हँस देता -”देखा, कितना हैरान हो गया, उससे बोला भी नहीं जा रहा था।”<br />
और फिर एक-दो बार के बाद दोस्तों की हैरानी भी उनकी साधारण बातों में शामिल हो गई। स की तरह अ भी सहज मन से हँसने लगी।<br />
शाम के समय स ने छाती में दर्द की शिकायत की। माँ ने कटोर में ब्राण्डी डाल दी, और अ से कहा -”लो बेटी! यह ब्राण्डी इसकी छाती पर मल दो।”<br />
इस समय तक शायद इतना कुछ सहज हो चुका था, अ ने स की कमीज़ के ऊपर वाले बटन खोले, और हाथ से उसकी छाती पर ब्राण्डी मलने लगी।<br />
बाहर पाम के पेड़ों के पत्ते और केलों के पत्ते शायद अभी भी काँप रहे थे, पर अ के हाथ में कम्पन नहीं था। एक दोस्त समय से पहले आ गया था, अ ने ब्राण्डी में भीगे हुए हाथों से उसका स्वागत करते हुए नमस्कार भी किया, और फिर कटोरी में हाथ डोबकर बाकी रहती ब्राण्डी को उसकी गर्दन पर मल दिया &#8211; कन्धों तक।</p>
<p>धीरे-धीरे कमरा मेहमानों से भर गया। अ फ्रिज सर बरफ निकालती रही और सादा पानी भर-भर फ्रिज में रखती रही। बीच-बीच में रसोई की तरफ जाती, ठण्डे कबाब फिर से गर्म करके ले आती। सिर्फ एक बार जब स ने अ के कान के पास होकर कहा -”तीन-चार तो वे लोग बी आ गए हैं, जिन्हें बुलाया नहीं था। ज़रूर किसी दोस्त ने उनसे भी कहा होगा, तुम्हें देखने के लिए आ गए हैं” &#8211; तो पल-भर के लिए अ की स्वाभाविकता टूटी, पर फिर जब स ने उससे कुछ गिलास धोने के लिए कहा, तो वह उसी तरह सहज मन हो गई।</p>
<p>महफिल गर्म हुई, ठंडी हुई, और जब लगभग आधी रात के समय सब चले गए, अ को सोने वाले कमरे में जाकर अपने सूटकेस में से रात के कपड़े निकालकर पहनते हुए लगा &#8211; कि सड़कों पर बना हुआ जादू का घर अब कहीं भी नहीं था&#8230;.</p>
<p>यह जादू का घर उसने कई बार देखा था &#8211; बनते हुए भी, मिटते हुए भी, इसलिए वह हैरान नहीं थी। सिर्फ थकी-थकी सी तकिए पर सिर रखकर सोचने लगी &#8211; कब की बात है&#8230; शायद पचीस बरस हो गए- नहीं तीस बरस &#8230;. जब पहली बार वे ज़िन्दगी की सड़कों पर मिले थे &#8211; अ किस सड़क से आई थी, स कौन-सी सड़क से आया या, दोनों पूछना भी भूल गये थे, और बताना भी। वे निगाह नीची किए ज़मीन में नींवें खोदते रहे, और फिर यहाँ जादू का एक घर बनकर खड़ा हो गया, और वे सहज मन से सारे दिन उस घर में रहते रहे।</p>
<p>फिर जब दोनों की सड़कों ने उन्हें आवाज़ें दीं, वे अपनी-अपनी सड़क की ओर जाते हुए चौंककर खड़े हो गए। देखा &#8211; दोनों सड़कों के बीच एक गहरी खाई थी। स कितनी देर उस खाई की ओर देखता रहा, जैसे अ से पूछ रहा हो कि इस खाई को तुम किस तरह से पार करोगी? अ ने कहा कुछ नहीं था, पर स के हाथ की ओर देखा था, जैसे कह रही हो &#8211; तुम हाथ पकड़कर पार करा लो, मैं महज़ब की इस खाई को पार कर जाऊँगी।</p>
<p>फिर स का ध्यान ऊपर की ओर गया था, अ के हाथ की ओर। अ की उँगली में हीरे की एक अँग्ïठी चमक रही थी। स कितनी देर तक देखता रहा, जैसे पूछ रहा हो &#8211; तुम्हारी उँगली पर यह जो कान्ïन का धागा लिपटा हुआ है, मैं इसका क्या करूँगा? अ ने अपनी उँगली की ओर देखा था और धीरे से हँस पड़ी थी, जैसे कह रही हो &#8211; तुम एक बार कहो, मैं कानून का यह धागा नाखूनों से खोल लूँगी। नाखूनों से नहीं खुलेगा तो दाँतों से खोल लूँगी।</p>
<p>पर स चुप रहा या, और अ भी चुप खड़ी रह गई थी। पर जैसे सड़कें एक ही जगह पर खड़ी हुई भी चलती रहती हैं, वे भी एक जगह पर खड़े हुए चलते रहे&#8230;</p>
<p>फिर एक दिन स के शहर से आने वाली सड़क अ के शहर आ गई थी, और अ ने स की आवाज़ सुनकर अपने एक बरस के बच्चे को उठाया था और बाहर सड़क पर उसके पास आकर खड़ी हो गई थी। स ने धीरे से हाथ आगे करके सोए हुए बच्चे को अ से ले लिया था और अपने कन्धे से लगा लिया था। और फिर वे सारे दिन उस शहर की सड़कों पर चलते रहे&#8230;</p>
<p>वे भरपूर जवानी के दिन थे &#8211; उनके लिए न धूप थी, न ­ड। और फिर जब चाय पीने के लिए वे एक कैफे में गए तो बैरे ने एक मर्द, एक औरत और एक बच्चे को देखकर एक अलग कोने की कुर्सियाँ पोंछ दी थीं। और कैफे के उस अलग कोने में एक जादू का घर बनकर खड़ा हो गया था&#8230;</p>
<p>और एक बार&#8230; अचानक चलती हुई रेलगाड़ी में मिलाप हो गया था। स भी था, माँ भी, और स का एक दोस्त भी। अ की सीट बहुत दूर थी, पर स के दोस्त ने उससे अपनी सीट बदल ली थी और उसका सूटकेस उठाकर स के सूटकेस के पास रख दिया था। गाड़ी में दिन के समय ठंड नहीं थी, पर रात ठंडी थी। माँ ने दोनों को एक कम्बल दे दिया था। आधा स के लिए आधा अ के लिए। और चलती गाड़ी में उस साझे के कम्बल के किनारे जादू के घर की दीवारें बन गई थीं&#8230;</p>
<p>जादू की दीवारें बनती थीं, मिटती थीं, और आखिर उनके बीच खँडहरों की-सी खामोशी का एक ढेर लग जाता था&#8230;<br />
स को कोई बन्धन नहीं था। अ को था। पर वह तोड़ सकती थी। फिर यह क्या था कि वे तमाम उम्र सड़कों पर चलते रहे&#8230;<br />
अब तो उम्र बीत गई&#8230; अ ने उम्र के तपते दिनों के बारे में भी सोचा और अब के ठण्डे दिनों के बारे में भी। लगा &#8211; सब दिन, सब बरस पाम के पत्तों की तरह हवा में खड़े काँप रहे थे।<br />
बहुत दिन हुए, एक बार अ ने बरसों की खामोशी को तोड़कर पूछा था &#8211; “तुम बोलते क्यों नहीं? कुछ भी नहीं कहते। कुछ तो कहो।”<br />
पर स हँस दिया था, कहने लगा -”यहाँ रोशनी बहुत है, हर जगह रोशनी होती है, मुझसे बोला नहीं जाता।”<br />
और अ का जी किया था &#8211; वह एक बार सूरज को पकड़कर बुझा दे&#8230;<br />
सड़कों पर सिर्फ दिन चढ़ते हैं। रातें तो घरों में होती हैं&#8230; पर घर कोई था नहीं, इसलिए रात भी कहीं नहीं थी &#8211; उनके पास सिर्फ सड़कें थीं, और सूरज था, और स सूरज की रोशनी में बोलता नहीं था।<br />
एक बार बोला था&#8230;<br />
वह चुप-सा बैठा हुआ था जब अ ने पूछा था -”क्या सोच रहे हो?” तो वह बोला &#8211; “सोच रहा हूँ, लड़कियों से फ्लर्ट करूँ और तुम्हें दुखी करूँ।”<br />
पर इस तरह अ दुखी नहीं, सुखी हो जाती। इसलिए अ भी हँसने लगी थी, स भी।</p>
<p>और फिर एक लम्बी खामोशी&#8230;<br />
कई बार अ के जी में आता था -हाथ आगे बढ़ाकर स को उसकी खामोशी में से बाहर ले आए, वहाँ तक जहाँ तक दिल का दर्द है। पर वह अपने हाथों को सिर्फ देखती रहती थी, उसने हाथों से कभी कुछ कहा नहीं था।<br />
एक बार स ने कहा था -”चलो चीन चलें।”<br />
“चीन?”<br />
“जाएँगे, पर आएँगे नहीं।”<br />
“पर चीन क्यों?”<br />
यह ‘क्यों’ भी शायद पाम के पेड़ के समान था जिसके पत्ते फिर हवा में काँपने लगे&#8230;<br />
इस समय अ ने तकिए पर सिर रख हुआ था, पर नींद नहीं आ रही थी। स बराबर के कमरे में सोया हुआ था, शायद नींद की गोली खाकर।<br />
अ को न अपने जागने पर गुस्सा आया, न स की नींद पर। वह सिर्फ यह सोच रही थी &#8211; कि वे सड़कों पर चलते हुए जब कभी मिल जाते हैं तो वहाँ घड़ी-पहर के लिए एक जादू का घर क्यों बनकर खड़ा हो जाता है?<br />
अ को हँसी-सी आ गई &#8211; तपती हुई जवानी के समय तो ऐसा होता था, ठीक है, लेकिन अब क्यों होता है? आज क्यों हुआ?<br />
यह न जाने क्या था, जो उम्र की पकड़ में नहीं आ रहा था&#8230;<br />
बाकी रात न जाने कब बीत गई &#8211; अब दरवाज़े पर धीरे से खटका करता हुआ ड्राइवर कह रहा या कि एयरपोर्ट जाने का समय हो गया है&#8230;<br />
अ ने साड़ी पहनी, सूटकेस उठाया, स भी जागकर अपने कमरे से आ गया, और वे दोनों दरवाज़े की ओर बढ़े जो बाहर सड़क की ओर खुलता था&#8230;<br />
ड्राइवर ने अ के हाथ से सूटकेस ले लिया था, अ को अपने हाथ और खाली-खाली से लगे। वह दहलीज़ के पास अटक-सी गई, फिर जल्दी से अन्दर गई और बैठक में सोई हुई माँ को खाली हाथों से प्रणाम करके बाहर आ गई&#8230;<br />
फिर एयरपोर्ट वाली सड़क शुरु हो गई, खत्म होने को भी आ गई, पर स भी चुप था, अ भी&#8230;</p>
<p>अचानक स ने कहा -”तुम कुछ कहने जा रही थीं?”<br />
“नहीं।”<br />
और वह फिर चुप हो गया।<br />
फिर अ को लगा &#8211; शायद स को भी &#8211; कि बहुत-कुछ कहने को था, बहुत-कुछ सुनने को, पर बहुत देर हो गई थी, और अब सब शब्द ज़मीन में गड़ गए थे &#8211; पाम के पेड़ बन गए थे और मन के समुद्र के पास लगे हुए उन पेड़ों के पत्ते शायद तब तक काँपते रहेंगे जब तक हवा चलती रहेगी..<br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>एयरपोर्ट आ गया और पाँवों के नीचे स के शहर की सड़क टूट गई&#8230;.।</strong></span></p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/story-of-amrita-pritam-yah-kahani-nahi/10961/">यह कहानी नहीं: अमृता प्रीतम</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>हिंदुस्तान आज रचेगा इतिहासः पूरा होगा 100 करोड़ टीकाकरण का आंकड़ा</title>
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		<pubDate>Thu, 21 Oct 2021 04:19:22 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>TISMedia@NewDelhi भारत आज सौ करोड़ टीके लगाने का लक्ष्य पूरा कर लेगा। संस्कृति मंत्रालय ने इस मौके पर कोरोना योद्धाओं के सम्मान में 100 धरोहरों को तिरंगे के तीनों रंगों से रोशन किया है। वहीं, 100 करोड़ टीकाकरण का आंकड़ा पार करने की दहलीज पर खड़े देश की इस सफलता के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय आज &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ff0000;"><strong>TISMedia@NewDelhi</strong></span> भारत आज सौ करोड़ टीके लगाने का लक्ष्य पूरा कर लेगा। संस्कृति मंत्रालय ने इस मौके पर कोरोना योद्धाओं के सम्मान में 100 धरोहरों को तिरंगे के तीनों रंगों से रोशन किया है। वहीं, 100 करोड़ टीकाकरण का आंकड़ा पार करने की दहलीज पर खड़े देश की इस सफलता के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय आज एक गीत और फिल्म लॉन्च करने जा रहा है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/knowledge/history-of-the-day/history-of-the-day-21st-october/10949/">History Of The Day: 21 अक्टूबर यानि राजनीतिक स्थापनाओं का दिन</a></strong></p>
<p>दुनिया की सबसे बड़ी महामारी कोविड-19 से जंग में देश महज 278 दिन में रिकॉर्ड टीकाकरण कर नया इतिहास रचने जा रहा है। देश में टीकाकरण कार्यक्रम इसी साल 16 जनवरी को शुरू हुआ था। बुधवार रात 12 बजे तक सौ करोड़ के आंकड़े तक पहुंचने में 22,42,064 टीके बाकी थे। 16 जनवरी 2021 को देश का पहला टीका दिल्ली के सफाईकर्मी मनीष कुमार को लगा था। जबकि 35,971 खुराक हर दिन लगाने के साथ ही 9 महीने पांच दिन में देश में रिकॉर्ड टीकाकरण हुआ। फिलहाल भारत में 3 टीके कोविशील्ड, कोवाक्सिन और स्पूतानिक की डोज लगाई जा रही हैं।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः<a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/story-of-dharamveer-bharti-gulki-banno/10945/"> चली कहानीः पढ़िए धर्मवीर भारती की कहानी &#8220;गुलकी बन्नो&#8221;</a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>दुनिया में कौन-कहां</strong></span><br />
विश्व स्तर पर टीकाकरण की बात करें तो चीन में अभी तक 110 करोड़ से अधिक लोगों को टीका लग चुका है। जबकि अमेरिका में 21.856 करोड़ लोगों को टीका लगने के साथ पूरे यूरोप में 44.3 करोड़ लोगों का टीकाकरण हो चुका है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/knowledge/do-you-know/know-who-was-the-real-turram-khan/10920/">खुद को बड़ा तुर्रम खां समझते हो, जानिए आखिर कौन थे असली तुर्रम खां?</a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>ऐसे मनेगा जश्न </strong></span><br />
सूत्रों के मुताबिक, 100 करोड़ वैक्सीन की खुराक पूरी होने पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) देश भर में 100 संरक्षित मंदिर और स्मारकों को तिरंगे के रंग में रोशन करेगा। इसका ट्रायल बुधवार को किया गया। एएसआई की इस योजना का मकसद कोरोना से लड़ रहे स्वास्थ्य पेशेवरों, अग्रिम पंक्ति के कार्यकर्ताओं, वैज्ञानिकों, वैक्सीन निर्माताओं और नागरिकों को सम्मान देना है। वहीं, स्वास्थ्य मंत्रालय ने 100 करोड़ टीकाकरण का आंकड़ा पार करने का जश्न मनाने की तैयारी भी शुरू कर दी है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री मनसुख मंडाविया गुरुवार को इसे लेकर एक गीत और ऑडियो विजुअल फिल्म लॉन्च करेंगे। इस संबंध में जारी एक आधिकारिक विज्ञप्ति में बताया गया है कि यह लॉन्चिंग राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली में लाल किले पर होगी।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/rajasthan/13-lakh-people-of-rajasthan-are-still-living-in-the-dark-electricity-has-not-yet-reached-300-villages/10905/">राजस्थान के 13 लाख लोग आज भी अंधेरे में काट रहे जीवन, 300 गांव में अब तक नहीं पहुंची बिजली</a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>स्वास्थ्य कर्मियों के लिए बीमा योजना की अवधि बढ़ी</strong></span><br />
कोरोना वायरस से लड़ रहे स्वास्थ्य कर्मियों के लिए बीमा योजना को 180 दिन के लिए और बढ़ा दिया गया है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने बताया कि अभी तक इसके तहत 1351 दावों का निपटारा किया जा चुका है। मंत्रालय ने एक बयान में कहा कि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण पैकेज के तहत इस नीति की वर्तमान समय सीमा 20 अक्तूबर को समाप्त हो रही थी। टीकाकरण के इस शानदार रफ्तार के साथ केंद्र सरकार का लक्ष्य इस साल के अंत तक देश की पूरी वयस्क आबादी का टीकाकरण करने की है। यह बात केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय की केंद्रीय राज्य मंत्री भारती प्रवीण पवार ने बुधवार को कही।</p>
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		<title>History Of The Day: 21 अक्टूबर यानि राजनीतिक स्थापनाओं का दिन</title>
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		<pubDate>Thu, 21 Oct 2021 04:02:13 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Cover Stories]]></category>
		<category><![CDATA[History and Culture]]></category>
		<category><![CDATA[History of the Day]]></category>
		<category><![CDATA[History of 21st October]]></category>
		<category><![CDATA[History Of The Day]]></category>
		<category><![CDATA[Jai Prakash Narayan]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>TISMedia@Kota. भारतीय इतिहास में 21 अक्टूबर राजनीतिक स्थापनाओं के दिन के तौर पर याद किया जाता है। अलाउद्दीन खिलजी के दिल्ली सल्तनत पर कब्जे से लेकर, जयप्रकाश नारायण ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी या फिर भारतीय जनसंघ की स्थापना हो या फिर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का स्वतंत्र भारत की प्रांतीय सरकार बनाना। भारतीय इतिहास में &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/knowledge/history-of-the-day/history-of-the-day-21st-october/10949/">History Of The Day: 21 अक्टूबर यानि राजनीतिक स्थापनाओं का दिन</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color: #ff0000;">TISMedia@Kota.</span></strong> भारतीय इतिहास में 21 अक्टूबर राजनीतिक स्थापनाओं के दिन के तौर पर याद किया जाता है। अलाउद्दीन खिलजी के दिल्ली सल्तनत पर कब्जे से लेकर, जयप्रकाश नारायण ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी या फिर भारतीय जनसंघ की स्थापना हो या फिर नेताजी सुभाष चन्द्र बोस का स्वतंत्र भारत की प्रांतीय सरकार बनाना। भारतीय इतिहास में यह तारीख नए आगाज की तारीख के तौर पर दर्ज है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः<a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/story-of-dharamveer-bharti-gulki-banno/10945/"> चली कहानीः पढ़िए धर्मवीर भारती की कहानी &#8220;गुलकी बन्नो&#8221;</a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>जानिए आज का भारतीय और वैश्विक इतिहासः-  </strong></span><br />
<strong><span style="color: #ff0000;">1296:</span></strong> अलाउद्दीन ख़िलजी ने दिल्ली की गद्दी पर कब्जा किया।<br />
<span style="color: #ff0000;"><strong>1577</strong></span>: गुरू रामदास ने अमृतसर नगर की स्थापना की।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">1727</span></strong>: रूस और चीन ने सीमाओं को सही करने के लिए समझौते किये।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">1797</span></strong> : अमेरिकी नौसेना के लिए बनाए गए पहले मालवाहक जहाजों में से एक द कंस्टीच्यूशंस का बोस्टन में जलावतरण किया गया।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">1805</span></strong> : स्पेन के तट पर ट्राफलगर की लड़ाई में फ्रांस और स्पेन की 33 पोत के बेड़े वाली संयुक्त नौसेना को ब्रिटेन की 27 पोत के बेड़े वाली नौसेना ने पराजित किया।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">1833</span></strong> : स्वीडन के स्टॉकहोम में अल्फ्रेड नोबेल का जन्म हुआ जिन्हें डायनामाइट के खोजकर्ता के तौर पर जाना जाता है।<br />
उनके नाम पर कुल 355 पेटेंट हैं। नोबेल पुरस्कार के नाम से दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित नागरिक सम्मान स्थापित करने का श्रेय उन्हें जाता है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/knowledge/do-you-know/know-who-was-the-real-turram-khan/10920/">खुद को बड़ा तुर्रम खां समझते हो, जानिए आखिर कौन थे असली तुर्रम खां?</a></strong></p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">1934</span></strong> : जयप्रकाश नारायण ने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">1943</span></strong> : नेताजी सुभाष चन्द्र बोस ने स्वतंत्र भारत की प्रांतीय सरकार बनाई।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">1950</span></strong> : चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी तिब्बत में दाखिल हुई और कुनलुन तथा हिमालय की विशाल पर्वत श्रृंखलाओं के बीच 16000 फुट की ऊंचाई पर स्थित इस आध्यात्मिक और शांति प्रिय देश पर कब्जा कर लिया।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">1951</span></strong>: भारतीय जनसंघ की स्थापना हुई।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">1954</span></strong> : भारत और फ्रांस ने पुडुचेरी, कराइकल, और माहे को भारतीय गणतंत्र में शामिल करने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किया। यह समझौता 1 नवम्बर से लागू हुआ।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/category/entertainment/art-and-literature/">पढ़िए एक से बढ़कर एक नामचीन लेखकों की कहानियां</a></strong></p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">1970</span></strong>: नारमन इ बारलॉग को नोबेल का शांति पुरस्कार दिया गया।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">1990</span></strong>: दूरदर्शन ने दोपहर की हिंदी व अंग्रेजी समाचार ब्लूटेन सेवाएं आरंभ कीं।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">1999</span></strong>: फिल्म निर्माता बी.आर चोपड़ा को 1999 में दादासाहेब फाल्के पुरस्कार।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">2001</span></strong>: दुनियाभर में खौफ का कारण बने एंथ्रैक्स ने अमेरिका में तीसरे व्यक्ति को अपना शिकार बनाया। डाक घर के एक कर्मचारी में इस जानलेवा बीमारी का संक्रमण पाया गया।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/rajasthan/13-lakh-people-of-rajasthan-are-still-living-in-the-dark-electricity-has-not-yet-reached-300-villages/10905/">राजस्थान के 13 लाख लोग आज भी अंधेरे में काट रहे जीवन, 300 गांव में अब तक नहीं पहुंची बिजली</a></strong></p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">2003</span></strong>: चीन और पाकिस्तान का नौसैनिक अभ्यास प्रारम्भ। चीन ने 4-बी कैरियर राकेट से दो उपग्रहों का प्रक्षेपण किया।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">2012</span></strong>: सायना नेहवाल ने डेनमार्क ओपन सुपर सीरीज ख़िताब अपने नाम कर लिया।</p>
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		<title>चली कहानीः धर्मवीर भारती की &#8220;गुलकी बन्नो&#8221;</title>
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		<dc:creator><![CDATA[tismedia.in]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 21 Oct 2021 03:40:26 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[Art and Literature]]></category>
		<category><![CDATA[Cover Stories]]></category>
		<category><![CDATA[Chali Kahani]]></category>
		<category><![CDATA[Dharamveer Bharti]]></category>
		<category><![CDATA[Gulki Banno]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi Literature]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi Stories]]></category>
		<category><![CDATA[Hindi Storytellers]]></category>
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		<category><![CDATA[Story Of The Day]]></category>
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					<description><![CDATA[<p>‘‘ऐ मर कलमुँहे !’ अकस्मात् घेघा बुआ ने कूड़ा फेंकने के लिए दरवाजा खोला और चौतरे पर बैठे मिरवा को गाते हुए देखकर कहा, ‘‘तोरे पेट में फोनोगिराफ उलियान बा का, जौन भिनसार भवा कि तान तोड़ै लाग ? राम जानै, रात के कैसन एकरा दीदा लागत है !’’ मारे डर के कि कहीं घेघा &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/story-of-dharamveer-bharti-gulki-banno/10945/">चली कहानीः धर्मवीर भारती की &#8220;गुलकी बन्नो&#8221;</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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				<img decoding="async" src="https://tismedia.in/wp-content/uploads/2021/10/bharati.jpg" alt="धर्मवीर भारती " class="author-avatar-img" width="111" height="111" />
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				<h4>धर्मवीर भारती </h4><strong><span style="color: #ff0000;">धर्मवीर भारती (२५ दिसंबर, १९२६- ४ सितंबर, १९९७) आधुनिक हिन्दी साहित्य के प्रमुख लेखक, कवि, नाटककार और सामाजिक विचारक थे। उनका जन्म इलाहाबाद के अतर सुइया मुहल्ले में हुआ। उनके पिता का नाम श्री चिरंजीव लाल वर्मा और माँ का श्रीमती चंदादेवी था। उन्होंने अध्यापन और पत्रकारिता क्षेत्र में कार्य किया । उनकी प्रमुख कृतियां हैं: काव्य रचनाएं : ठंडा लोहा, सात गीत-वर्ष, कनुप्रिया, सपना अभी भी, आद्यन्त, मेरी वाणी गैरिक वसना, कुछ लम्बी कविताएँ; कहानी संग्रह : मुर्दों का गाँव, स्वर्ग और पृथ्वी, चाँद और टूटे हुए लोग, बंद गली का आखिरी मकान, साँस की कलम से (समस्त कहानियाँ एक साथ) ; उपन्यास: गुनाहों का देवता, सूरज का सातवां घोड़ा, ग्यारह सपनों का देश, प्रारंभ व समापन; निबंध : ठेले पर हिमालय, पश्यंती; पद्य नाटक : अंधा युग; आलोचना : प्रगतिवाद : एक समीक्षा, मानव मूल्य और साहित्य</span></strong>। 
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<p>‘‘<span style="color: #ff0000;"><strong>ऐ मर कलमुँहे</strong></span> !’ अकस्मात् घेघा बुआ ने कूड़ा फेंकने के लिए दरवाजा खोला और चौतरे पर बैठे मिरवा को गाते हुए देखकर कहा, ‘‘तोरे पेट में फोनोगिराफ उलियान बा का, जौन भिनसार भवा कि तान तोड़ै लाग ? राम जानै, रात के कैसन एकरा दीदा लागत है !’’ मारे डर के कि कहीं घेघा बुआ सारा कूड़ा उसी के सर पर न फेक दें, मिरवा थोड़ा खिसक गया और ज्यों ही घेघा बुआ अन्दर गयीं कि फिर चौतरे की सीढ़ी पर बैठ, पैर झुलाते हुए उसने उल्टा-सुल्टा गाना शुरू कर किया, ‘‘तुमें बछ याद कलते अम छनम तेरी कछम !’’ मिरवा की आवाज़ सुनकर जाने कहाँ से झबरी कुतिया भी कान-पूँछ झटकारते आ गयी और नीचे सड़क पर बैठकर मिरवा का गाना बिलकुल उसी अन्दाज़ में सुनने लगी जैसे हिज़ मास्टर्स वॉयस के रिकार्ड पर तसवीर बनी होती है।<br />
अभी सारी गली में सन्नाटा था। सबसे पहले मिरवा (असली नाम मिहिरलाल) जागता था और आँख मलते-मलते घेघा बुआ के चौतरे पर आ बैठता था। उसके बाद झबरी कुतिया, फिर मिरवा की छोटी बहन मटकी और उसके बाद एक-एक कर गली के तमाम बच्चे-खोंचेवाली का लड़का मेवा, ड्राइवर साहब की लड़की निरमल, मनीजर साहब के मुन्ना बाबू-सभी आ जुटते थे। जबसे गुलकी ने घेघा बुआ के चौतरे पर तरकारियों की दुकान रखी थी तब से यह जमावड़ा वहाँ होने लगा था। उसके पहले बच्चे हकीमजी के चौतरे पर खेलते थे। धूप निकलते गुलकी सट्टी से तरकारियाँ ख़रीदकर अपनी कुबड़ी पीठ पर लादे, डण्डा टेकती आती और अपनी दुकान फैला देती। मूली, नीबू, कद्दू, लौकी, घिया-बण्डा, कभी-कभी सस्ते फल ! मिरवा और मटकी जानकी उस्ताद के बच्चे थे जो एक भंयकर रोग में गल-गलकर मरे थे और दोनों बच्चे भी विकलांग, विक्षिप्त और रोगग्रस्त पैदा हुए थे। सिवा झबरी कुतिया के और कोई उनके पास नहीं बैठता था और सिवा गुलकी के कोई उन्हें अपनी देहरी या दुकान पर चढ़ने नहीं देता था।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">आज</span></strong> भी गुलकी को आते देखकर पहले मिरवा गाना छोड़कर, ‘‘छलाम गुलकी !’’ और मटकी अपने बढ़ी हुई तिल्लीवाले पेट पर से खिसकता हुआ जाँघिया सँभालते हुए बोली, ‘‘एक ठो मूली दै देव ! ए गुलकी !’’ गुलकी पता नहीं किस बात से खीजी हुई थी कि उसने मटकी को झिड़क दिया और अपनी दुकान लगाने लगी। झबरी भी पास गयी कि गुलकी ने डण्ड उठाया। दुकान लगाकर वह अपनी कुबड़ी पीठ दुहराकर बैठ गयी और जाने किसे बुड़बुड़ाकर गालियाँ देने लगी। मटकी एक क्षण चुपचाप रही फिर उसने रट लगाना शुरू किया, ‘‘एक मूली ! एक गुलकी !&#8230;एक’’ गुलकी ने फिर झिड़का तो चुप हो गयी और अलग हटकर लोलुप नेत्रों से सफेद धुली हुई मूलियों को देखने लगी। इस बार वह बोली नहीं। चुपचाप उन मूलियों की ओर हाथ बढ़ाया ही था कि गुलकी चीख़ी, ‘‘हाथ हटाओ। छूना मत। कोढ़िन कहीं की ! कहीं खाने-पीने की चीज देखी तो जोंक की तरह चिपक गयी, चल इधर !’’ मटकी पहले तो पीछे हटी पर फिर उसकी तृष्णा ऐसी अदम्य हो गयी कि उसने हाथ बढ़ाकर एक मूली खींच ली। गुलकी का मुँह तमतमा उठा और उसने बाँस की खपच्ची उठाकर उसके हाथ पर चट से दे मारी ! मूली नीचे गिरी और हाय ! हाय ! हाय !’’ कर दोनों हाथ झटकती हुई मटकी पाँव पटकपटक कर रोने लगी। ‘‘जावो अपने घर रोवो। हमारी दुकान पर मरने को गली-भर के बच्चे हैं-’’ गुलकी चीख़ी ! ‘‘दुकान दैके हम बिपता मोल लै लिया। छन-भर पूजा-भजन में भी कचरघाँव मची रहती है !’’ अन्दर से घेघा बुआ ने स्वर मिलाया। ख़ासा हंगामा मच गया कि इतने में झबरी भी खड़ी हो गयी और लगी उदात्त स्वर में भूँकने। ‘लेफ्ट राइट ! लेफ्ट राइट !’ चौराहे पर तीन-चार बच्चों का जूलूस चला आ रहा था। आगे-आगे दर्जा ‘ब’ में पढ़नेवाले मुन्ना बाबू नीम की सण्टी को झण्डे की तरह थामे जलूस का नेतृत्व कर रहे थे, पीछे थे मेवा और निरमल। जलूस आकर दूकान के सामने रूक गया। गुलकी सतर्क हो गयी। दुश्मन की ताक़त बढ़ गयी थी।</p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>मटकी</strong></span> खिसकते-खिसकते बोली, ‘‘हमके गुलकी मारिस है। हाय ! हाय ! हमके नरिया में ढकेल दिहिस। अरे बाप रे !’’ निरमल, मेवा, मुन्ना, सब पास आकर उसकी चोट देखने लगे। फिर मुन्ना ने ढकेलकर सबको पीछे हटा दिया और सण्टी लेकर तनकर खड़े हो गये। ‘‘किसने मारा है इसे !’’<br />
‘‘हम मारा है !’’ कुबड़ी गुलकी ने बड़े कष्ट से खड़े होकर कहा, ‘‘का करोगे ? हमें मारोगे !’’ मारोगे !’’ मारेंगे क्यों नहीं ?’’ मुन्ना बाबू ने अकड़कर कहा। गुलकी इसका कुछ जवाब देती कि बच्चे पास घिर आये। मटकी ने जीभ निकालकर मुँह बिराया, मेवा ने पीछे जाकर कहा, ‘‘ए कुबड़ी, ए कुबड़ी, अपना कूबड़ दिखाओ !’’ और एक मुट्ठी धूल उसकी पीठ पर छोड़कर भागा। गुलकी का मुँह तमतमा आया और रूँधे गले से कराहते हुए उसने पता नहीं क्या कहा। किन्तु उसके चेहरे पर भय की छाया बहुत गहरी हो रही थी। बच्चे सब एक-एक मुट्ठी धूल लेकर शोर मचाते हुए दौड़े कि अकस्मात् घेघा बुआ का स्वर सुनाई पड़ा, ‘‘ए मुन्ना बाबू, जात हौ कि अबहिन बहिनजी का बुलवाय के दुई-चार कनेठी दिलवायी !’’ ‘‘जाते तो हैं !’’ मुन्ना ने अकड़ते हुए कहा, ‘‘ए मिरवा, बिगुल बजाओ।’’ मिरवा ने दोनों हाथ मुँह पर रखकर कहा, ‘‘धुतु-धुतु-धू।’’ जलूस आगे चल पड़ा और कप्तान ने नारा लगाया:<br />
अपने देस में अपना राज !<br />
गुलकी की दुकान बाईकाट !</p>
<p>नारा लगाते हुए जलूस गली में मुड़ गया। कुबड़ी ने आँसू पोंछे, तरकारी पर से धूल झाड़ी और साग पर पानी के छींटे देने लगी।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">गुलकी</span></strong> की उम्र ज़्यादा नहीं थी। यही हद-से-हद पच्चीस-छब्बीस। पर चेहरे पर झुर्रियाँ आने लगी थीं और कमर के पास से वह इस तरह दोहरी हो गयी थी जैसे अस्सी वर्ष की बुढ़िया हो। बच्चों ने जब पहली बार उसे मुहल्ले में देखा तो उन्हें ताजुज्ब भी हुआ और थोड़ा भय भी। कहाँ से आयी ? कैसे आ गयी ? पहले कहाँ थी ? इसका उन्हें कुछ अनुमान नहीं था ? निरमल ने ज़रूर अपनी माँ को उसके पिता ड्राइवर से रात को कहते हुए सुना, ‘‘यह मुसीबत और खड़ी हो गयी। मरद ने निकाल दिया तो हम थोड़े ही यह ढोल गले बाँधेंगे। बाप अलग हम लोगों का रुपया खा गया। सुना चल बसा तो डरी कि कहीं मकान हम लोग न दखल कर लें और मरद को छोड़कर चली आयी। खबरदार जो चाभी दी तुमने !’’ ‘‘क्या छोटेपन की बात करती हो ! रूपया उसके बाप ने ले लिया तो क्या हम उसका मकान मार लेंगे ? चाभी हमने दे दी है। दस-पाँच दिन का नाज-पानी भेज दो उसके यहाँ।’’<br />
‘‘हाँ-हाँ, सारा घर उठा के भेज देव। सुन रही हो घेघा बुआ !’’<br />
‘‘तो का भवा बहू, अरे निरमल के बाबू से तो एकरे बाप की दाँत काटी रही।’’ घेघा बुआ की आवाज़ आयी-‘‘बेचारी बाप की अकेली सन्तान रही। एही के बियाह में मटियामेट हुई गवा। पर ऐसे कसाई के हाथ में दिहिस की पाँचै बरस में कूबड़ निकल आवा।’’<br />
‘‘साला यहाँ आवे तो हण्टर से ख़बर लूँ मैं।’’ ड्राइवर साहब बोले, ‘‘पाँच बरस बाद बाल-बच्चा हुआ। अब मरा हुआ बच्चा पैदा हुआ तो उसमें इसका क्या कसूर ! साले ने सीढ़ी से ढकेल दिया। जिन्दगी-भर के लिए हड्डी खराब हो गयी न ! अब कैसे गुजारा हो उसका ?’’<br />
‘‘बेटवा एको दुकान खुलवाय देव। हमरा चौतरा खाली पड़ा है। यही रूपया दुइ रूपया किराया दै देवा करै, दिन-भर अपना सौदा लगाय ले। हम का मना करित है ? एत्ता बड़ा चौतरा मुहल्लेवालन के काम न आयी तो का हम छाती पर धै लै जाब ! पर हाँ, मुला रुपया दै देव करै।’’</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">दूसरे</span></strong> दिन यह सनसनीख़ेज ख़बर बच्चों में फैल गयी। वैसे तो हकीमजी का चबूतरा पड़ा था, पर वह कच्चा था, उस पर छाजन नहीं थी। बुआ का चौतरा लम्बा था, उस पर पत्थर जुड़े थे। लकड़ी के खम्भे थे। उस पर टीन छायी थी। कई खेलों की सुविधा थी। खम्भों के पीछे किल-किल काँटे की लकीरें खींची जा सकती थीं। एक टाँग से उचक-उचककर बच्चे चिबिड्डी खेल सकते थे। पत्थर पर लकड़ी का पीढ़ा रखकर नीचे से मुड़ा हुआ तार घुमाकर रेलगाड़ी चला सकते थे। जब गुलकी ने अपनी दुकान के लिए चबूतरों के खम्भों में बाँस-बाँधे तो बच्चों को लगा कि उनके साम्राज्य में किसी अज्ञात शत्रु ने आकर क़िलेबन्दी कर ली है। वे सहमे हुए दूर से कुबड़ी गुलकी को देखा करते थे। निरमल ही उसकी एकमात्र संवाददाता थी और निरमल का एकमात्र विश्वस्त सूत्र था उसकी माँ। उससे जो सुना था उसके आधार पर निरमल ने सबको बताया था कि यह चोर है। इसका बाप सौ रूपया चुराकर भाग गया। यह भी उसके घर का सारा रूपया चुराने आयी है। ‘‘रूपया चुरायेगी तो यह भी मर जाएगी।’’ मुन्ना ने कहा, ‘‘भगवान सबको दण्ड देता है।’’ निरमल बोली ‘‘ससुराल में भी रूपया चुराये होगी।’’ मेवा बोला ‘‘अरे कूबड़ थोड़े है ! ओही रूपया बाँधे है पीठ पर। मनसेधू का रूपया है।’’ ‘‘सचमुच ?’’ निरमल ने अविश्वास से कहा। ‘‘और नहीं क्या कूबड़ थोड़ी है। है तो दिखावै।’’ मुन्ना द्वारा उत्साहित होकर मेवा पूछने ही जा रहा था कि देखा साबुनवाली सत्ती खड़ी बात कर रही है गुलकी से-कह रही थी, ‘‘अच्छा किया तुमने ! मेहनत से दुकान करो। अब कभी थूकने भी न जाना उसके यहाँ। हरामजादा, दूसरी औरत कर ले, चाहे दस और कर ले। सबका खून उसी के मत्थे चढ़ेगा। यहाँ कभी आवे तो कहलाना मुझसे। इसी चाकू से दोनों आँखें निकाल लूँगी !’’<br />
बच्चे डरकर पीछे हट गये। चलते-चलते सत्ती बोली, ‘‘कभी रूपये-पैसे की जरूरत हो तो बताना बहिना !’’</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">कुछ</span></strong> दिन बच्चे डरे रहे। पर अकस्मात् उन्हें यह सूझा कि सत्ती को यह कुबड़ी डराने के लिए बुलाती है। इसने उसके गु़स्से में आग में घी का काम किया। पर कर क्या सकते थे। अन्त में उन्होंने एक तरीक़ा ईजाद किया। वे एक बुढ़िया का खेल खेलते थे। उसको उन्होंने संशोधित किया। मटकी को लैमन जूस देने का लालच देकर कुबड़ी बनाया गया। वह उसी तरह पीठ दोहरी करके चलने लगी। बच्चों ने सवाल जवाब शुरू कियेः<br />
‘‘कुबड़ी-कुबड़ी का हेराना ?’’<br />
‘‘सुई हिरानी।’’<br />
‘‘सुई लैके का करबे’’<br />
‘‘कन्था सीबै! ’’<br />
‘‘कन्था सी के का करबे ?’’<br />
‘‘लकड़ी लाबै !’’<br />
‘‘लकड़ी लाय के का करबे ?’’<br />
‘‘भात पकइबे! ’’<br />
‘‘भात पकाये के का करबै ?’’<br />
‘‘भात खाबै !’’<br />
‘‘भात के बदले लात खाबै।’’<br />
और इसके पहले कि कुबड़ी बनी हुई मटकी कुछ कह सके, वे उसे जोर से लात मारते और मटकी मुँह के बल गिर पड़ती, उसकी कोहनिया और घुटने छिल जाते, आँख में आँसू आ जाते और ओठ दबाकर वह रूलाई रोकती। बच्चे खुशी से चिल्लाते, ‘‘मार डाला कुबड़ी को । मार डाला कुबड़ी को।’’ गुलकी यह सब देखती और मुँह फेर लेती।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">एक</span></strong> दिन जब इसी प्रकार मटकी को कुबड़ी बनाकर गुलकी की दुकान के सामने ले गये तो इसके पहले कि मटकी जबाव दे, उन्होंने ने अनचिते में इतनी ज़ोर से ढकेल दिया कि वह कुहनी भी न टेक सकी और सीधे मुँह के बल गिरी। नाक, होंठ और भौंह ख़ून से लथपथ हो गये। वह ‘‘हाय ! हाय !’’ कर इस बुरी तरह चीख़ी कि लड़के कुबड़ी मर गयी चिल्लाते हुए सहम गये और हतप्रभ हो गये। अकस्मात् उन्होंने देखा की गुलकी उठी । वे जान छोड़ भागे। पर गुलकी उठकर आयी, मटकी को गोद में लेकर पानी से उसका मुँह धोने लगी और धोती से खून पोंछने लगी। बच्चों ने पता नहीं क्या समझा कि वह मटकी को मार रही है, या क्या कर रही है कि वे अकस्मात् उस पर टूट पड़े। गुलकी की चीख़े सुनकर मुहल्ले के लोग आये तो उन्होंने देखा कि गुलकी के बाल बिखरे हैं और दाँत से ख़ून बह रहा है, अधउघारी चबूतरे से नीचे पड़ी है, और सारी तरकारी सड़क पर बिखरी है। घेघा बुआ ने उसे उठाया, धोती ठीक की और बिगड़कर बोलीं, ‘‘औकात रत्ती-भर नै, और तेहा पौवा-भर। आपन बखत देख कर चुप नै रहा जात। कहे लड़कन के मुँह लगत हो ?’’ लोगों ने पूछ तो कुछ नहीं बोली। जैसे उसे पाला मार गया हो। उसने चुपचाप अपनी दुकान ठीक की और दाँत से खू़न पोंछा, कुल्ला किया और बैठ गयी।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">उसके</span></strong> बाद अपने उस कृत्य से बच्चे जैसे खु़द सहम गये थे। बहुत दिन तक वे शान्त रहे। आज जब मेवा ने उसकी पीठ पर धूल फेंकी तो जैसे उसे खू़न चढ़ गया पर फिर न जाने वह क्या सोचकर चुप रह गयी और जब नारा लगाते जूलूस गली में मुड़ गया तो उसने आँसू पोंछे, पीठ पर से धूल झाड़ी और साग पर पानी छिड़कने लगी। लड़के का हैं गल्ली के राक्षस हैं !’’ घेघा बुआ बोलीं। ‘‘अरे उन्हें काहै कहो बुआ ! हमारा भाग भी खोटा है !’’ गुलकी ने गहरी साँस लेकर कहा&#8230;.।<br />
इस बार जो झड़ी लगी तो पाँच दिन तक लगातार सूरज के दर्शन नहीं हुए। बच्चे सब घर में क़ैद थे और गुलकी कभी दुकान लगाती थी, कभी नहीं, राम-राम करके तीसरे पहर झड़ी बन्द हुई। बच्चे हकीमजी के चौतरे पर जमा हो गये। मेवा बिलबोटी बीन लाया था और निरमल ने टपकी हुई निमकौड़ियाँ बीनकर दुकान लगा ली थी और गुलकी की तरह आवाज़ लगा रही थी, ‘‘ले खीरा, आलू, मूली, घिया, बण्डा !’’ थोड़ी देर में क़ाफी शिशु-ग्राहक दुकान पर जुट गये। अकस्मात् शोरगुल से चीरता हुआ बुआ के चौतरे से गीत का स्वर उठा बच्चों ने घूम कर देखा मिरवा और मटकी गुलकी की दुकान पर बैठे हैं। मटकी खीरा खा रही है और मिरवा झबरी का सर अपनी गोद में रखे बिलकुल उसकी आँखों में आँखें डालकर गा रहा है।<br />
तुरन्त मेवा गया और पता लगाकर लाया कि गुलकी ने दोनों को एक –एक अधन्ना दिया है दोनों मिलकर झबरी कुतिया के कीड़े निकाल रहे हैं। चौतरे पर हलचल मच गयी और मुन्ना ने कहा, ‘‘निरमल ! मिरवा-मटकी को एक भी निमकौड़ी मत देना। रहें उसी कुबड़ी के पास !’’ ‘‘हाँ जी !’’ निरमल ने आँख चमकाकर गोल मुंह करके कहा, ‘‘हमार अम्माँ कहत रहीं उन्हें छुयो न ! न साथ खायो, न खेलो। उन्हें बड़ी बुरी बीमारी है। आक थू !’’ मुन्ना ने उनकी ओर देखकर उबकायी जैसा मुँह बनाकर थूक दिया।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">गुलकी</span></strong> बैठी-बैठी सब समझ रही थी और जैसे इस निरर्थक घृणा में उसे कुछ रस-सा आने लगा था। उसने मिरवा से कहा, ‘‘तुम दोनों मिल के गाओ तो एक अधन्ना दें। खूब जोर से !’’ भाई-बहन दोनों ने गाना शुरू किया-माल कताली मल जाना, पल अकियाँ किछी से&#8230;’’ अकस्मात् पटाक से दरवाजा खुला और एक लोटा पानी दोनों के ऊपर फेंकती हुई घेघा बुआ गरजीं, दूर कलमुँहे। अबहिन बितौ-भर के नाहीं ना और पतुरियन के गाना गाबै लगे। न बहन का ख्याल, न बिटिया का। और ए कुबड़ी, हम तुहूँ से कहे देइत है कि हम चकलाखाना खोलै के बरे अपना चौतरा नहीं दिया रहा। हुँह ! चली हुँआ से मुजरा करावै।’’<br />
गुलकी ने पानी उधर छिटकाते हुए कहा, ‘‘बुआ बच्चे हैं। गा रहे हैं। कौन कसूर हो गया।’’<br />
‘‘ऐ हाँ ! बच्चे हैं। तुहूँ तो दूध पियत बच्ची हौ। कह दिया कि जबान न लड़ायों हमसे, हाँ ! हम बहुतै बुरी हैं। एक तो पाँच महीने से किराया नाहीं दियो और हियाँ दुनियाँ-भर के अन्धे-कोढ़ी बटुरे रहत हैं। चलौ उठायो अपनी दुकान हियाँ से। कल से न देखी हियाँ तुम्हें राम ! राम ! सब अघर्म की सन्तान राच्छस पैदा भये हैं मुहल्ले में ! धरतियौ नहीं फाटत कि मर बिलाय जाँय।’’<br />
गुलकी सन्न रह गयी। उसने किराया सचमुच पाँच महीने से नहीं दिया था। ब्रिक्री नहीं थी। मुहल्ले में उनसे कोई कुछ लेता ही नहीं था, पर इसके लिए बुआ निकाल देगी यह उसे कभी आशा नहीं थी। वैसे भी महीने में बीस दिन वह भूखी सोती थी। धोती में दस-दस पैबन्द थे। मकान गिर चुका था एक दालान में वह थेड़ी-सी जगह में सो जाती थी। पर दुकान तो वहाँ रखी नहीं जा सकती। उसने चाहा कि वह बुआ के पैर पकड़ ले, मिन्नत कर ले। पर बुआ ने जितनी जोर से दरवाजा खोला था उतनी ही जोर से बन्द कर दिया। जब से चौमास आया था, पुरवाई बही थी, उसकी पीठ में भयानक पीड़ा उठती थी। उसके पाँव काँपते थे। सट्टी में उस पर उधार बुरी तरह चढ़ गया था। पर अब होगा क्या ? वह मारे खीज के रोने लगी।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">इतने</span></strong> में कुछ खटपट हुई और उसने घुटनों से मुँह उठाकर देखा कि मौका पाकर मटकी ने एक फूट निकाल लिया है और मरभुखी की तरह उसे हबर-हबर खाती जा रही थी है, एक क्षण वह उसके फूलते-पचकते पेट को देखती रही, फिर ख्याल आते ही कि फूट पूरे दस पैसे का है, वह उबल पड़ी और सड़ासड़ तीन-चार खपच्ची मारते हुए बोली, ‘‘चोट्टी ! कुतिया ! तोरे बदन में कीड़ा पड़ें !’’ मटकी के हाथ से फूट गिर पड़ा पर वह नाली में से फूट के टुकड़े उठाते हुए भागी। न रोयी, न चीख़ी, क्योंकि मुँह में भी फूट भरा था। मिरवा हक्का-बक्का इस घटना को देख रहा था कि गुलकी उसी पर बरस पड़ी। सड़-सड़ उसने मिरवा को मारना शुरू किया, ‘‘भाग, यहाँ से हरामजादे !’’ मिरवा दर्द से तिलमिला उठा, ‘‘हमला पइछा देव तो जाई।’’ ‘‘देत हैं पैसा, ठहर तो।’’ सड़ ! सड़।&#8230; रोता हुआ। मिरवा चौतरे की ओर भागा।</p>
<p>निरमल की दुकान पर सन्नाटा छाया हुआ था। सब चुप उसी ओर देख रहे थे। मिरवा ने आकर कुबड़ी की शिकायत मुन्ना से की। और घूमकर बोला, ‘‘मेवा बता तो इसे !’ मेवा पहले हिचकिचाया, फिर बड़ी मुलायमियत से बोला, ‘‘मिरवा तुम्हें बीमारी हुई है न ! तो हम लोग तुम्हें नहीं छुएँगे । साथ नहीं खिलाएँगें तुम उधर बैठ जाओ।’’<br />
‘‘हम बीमाल हैं मुन्ना ?’’<br />
मुन्ना कुछ पिघला, ‘‘हाँ, हमें छूओ मत। निमकौड़ी खरीदना हो तो उधर बैठ जाओ हम दूर से फेंक देंगे। समझे !’’ मिरवा समझ गया सर हिलाया और अलग जाकर बैठ गया। मेवा ने निमकौड़ी उसके पास रख दी और चोट भूलकर पकी निमकौड़ी का बीजा निकाल कर छीलने लगा। इतने में उधर से घेघा बुआ की आवाज आयी, ‘‘ऐ मुन्ना !’’ तई तू लोग परे हो जाओ ! अबहिन पानी गिरी ऊपर से !’’ बच्चो ने ऊपर देखा। तिछत्ते पर घेघा बुआ मारे पानी के छप-छप करती घूम रही थीं। कूड़े से तिछत्ते की नाली बन्द थी और पानी भरा था। जिधर बुआ खड़ी थीं उसके ठीक नीचे गुलकी का सौदा था। बच्चे वहाँ से दूर थे पर गुलकी को सुनने के लिए बात बच्चों से कही गयी थी। गुलकी कराहती हुई उठी। कूबड़ की वजह से वह तनकर चिछत्ते की ओर देख भी नहीं सकती थी। उसने धरती की ओर देखा ऊपर बुआ से कहा, ‘‘इधर की नाली काहे खोल रही हो ? उधर की खोलो न !’’<br />
‘‘काहे उधर की खोली ! उधर हमारा चौका है कि नै !’’<br />
‘‘इधर हमारा सौदा लगा है।’’<br />
‘‘<span style="color: #ff0000;"><strong>ऐ है</strong> </span>!’’ बुआ हाथ चमका कर बोलीं, सौदा लगा है रानी साहब का ! किराया देय की दायीं हियाव फाटत है और टर्राय के दायीं नटई में गामा पहिलवान का जोर तो देखो ! सौदा लगा है तो हम का करी। नारी तो इहै खुली है !’’<br />
‘‘खोलो तो देखैं !’’ अकस्मात् गुलकी ने तड़प कर कहा। आज तक किसी ने उसका वह स्वर नहीं सुना था-‘‘पाँच महीने का दस रूपया नहीं दिया बेशक, पर हमारे घर की धन्नी निकाल के बसन्तू के हाथ किसने बेचा ? तुमने। पच्छिम ओर का दरवाजा चिरवा के किसने जलवाया ? तुमने। हम गरीब हैं। हमारा बाप नहीं है सारा मुहल्ला हमें मिल के मार डालो।’’<br />
‘‘हमें चोरी लगाती है। अरे कल की पैदा हुई।’’ बुआ मारे ग़ुस्से के खड़ी बोली बोलने लगी थीं।</p>
<p>बच्चे चुप खड़े थे। वे कुछ-कुछ सहमे हुए थे। कुबड़ी का यह रूप उन्होंने कभी न देखा न सोचा था<br />
‘‘हाँ ! हाँ ! हाँ। तुमने, ड्राइवर चाचा से, चाची ने सबने मिलके हमारा मकान उजाड़ा है। अब हमारी दुकान बहाय देव। देखेंगे हम भी। निरबल के भी भगवान हैं !’’<br />
‘‘ले ! ले ! ले ! भगवान हैं तो ले !’’ और बुआ ने पागलों की तरह दौड़कर नाली में जमा कूड़ा लकड़ी से ठेल दिया। छह इंच मोटी गन्दे पानी की धार धड़-धड़ करती हुई उसकी दुकान पर गिरने लगी। तरोइयाँ पहले नाली में गिरीं, फिर मूली, खीरे, साग, अदरक उछल-उछलकर दूर जा गिरे। गुलकी आँख फाड़े पागल-सी देखती रही और फिर दीवार पर सर पटककर हृदय-विदारक स्वर में डकराकर रो पड़ी, ‘‘अरे मोर बाबू, हमें कहाँ छोड़ गये ! अरे मोरी माई, पैदा होते ही हमें क्यों नहीं मार डाला ! अरे धरती मैया, हमें काहे नहीं लील लेती !’’<br />
सर खोले बाल बिखेरे छाती कूट-कूटकर वह रो रही थी और तिछत्ते का पिछले पहले नौ दिन का जमा पानी धड़-धड़ गिर रहा था।<br />
बच्चे चुप खड़े थे। अब तक जो हो रहा था, उनकी समझ में आ रहा था। पर आज यह क्या हो गया, यह उनकी समझ में नहीं आ सका । पर वे कुछ बोले नहीं। सिर्फ मटकी उधर गयी और नाली में बहता हुआ हरा खीरा निकालने लगी कि मुन्ना ने डाँटा, ‘‘खबरदार ! जो कुछ चुराया।’’ मटकी पीछे हट गयी। वे सब किसी अप्रत्याशित भय संवेदना या आशंका से जुड़-बटुरकर खड़े हो गये। सिर्फ़ मिरवा अलग सर झुकाये खड़ा था। झींसी फिर पड़ने लगी थी और वे एक-एक कर अपने घर चले गये।</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">दूसरे</span></strong> दिन चौतरा ख़ाली थी। दुकान का बाँस उखड़वाकर बुआ ने नाँद में गाड़कर उस पर तुरई की लतर चढ़ा दी थी। उस दिन बच्चे आये पर उनकी हिम्मत चौतरे पर जाने की नहीं हुई। जैसे वहाँ कोई मर गया हो। बिलकुल सुनसान चौतरा था और फिर तो ऐसी झड़ी लगी कि बच्चों का निकलना बन्द। चौथे या पाँचवें दिन रात को भयानक वर्षा तो हो ही रही थी, पर बादल भी ऐसे गरज रहे थे कि मुन्ना अपनी खाट से उठकर अपनी माँ के पास घुस गया। बिजली चमकते ही जैसे कमरा रोशनी से नाच-नाच उठता था छत पर बूदों की पटर-पटर कुछ धीमी हुई, थोड़ी हवा भी चली और पेड़ों का हरहर सुनाई पड़ा कि इतने में धड़-धड़-धड़-धड़ाम ! भयानक आवाज़ हुई। माँ भी चौंक पड़ी। पर उठी नहीं। मुन्ना आँखें खोले अँधेरें में ताकने लगा। सहसा लगा मुहल्ले में कुछ लोग बातचीत कर रहे हैं घेघा बुआ की आवाज़ सुनाई पड़ी-‘‘किसका मकान गिर गया है रे’’ ‘‘गुलकी का !’’-किसी का दूरागत उत्तर आया। ‘‘अरे बाप रे ! दब गयी क्या ?’’ ‘‘नहीं, आज तो मेवा की माँ के यहाँ सोई है ! मुन्ना लेटा था और उसके ऊपर अँधेरे में यह सवाल-जवाब इधर-से-उधर और उधर-से-इधर आ रहे थे। वह फिर काँप उठा, माँ के पास घुस गया और सोते-सोते उसने साफ़ सुना-कुबड़ी फिर उसी तरह रो रही है, गला फाड़कर रो रही है ! कौन जाने मुन्ना के ही आँगन में बैठकर रो रही हो ! नींद में वह स्वर कभी दूर कभी पास आता हुआ लग रहा है जैसे कुबड़ी मुहल्ले के हर आँगन में जाकर रो रही है पर कोई सुन नहीं रहा है, सिवा मुन्ना के।<br />
बच्चों के मन में कोई बात इतनी गहरी लकीर बनाती कि उधर से उनका ध्यान हटे ही नहीं। सामने गुलकी थी तो वह एक समस्या थी, पर उसकी दुकान हट गयी, फिर वह जाकर साबुन वाली सत्ती के गलियारे में सोने लगी और दो-चार घरों से माँग-मूँगकर खाने लगी, उस गली में दिखती ही नहीं थी। बच्चे भी दूसरे कामों में व्यस्त हो गये। अब जाड़े आ रहे थे। उनका जमावड़ा सुबह न होकर तीसरे पहर होता था। जमा होने के बाद जूलूस निकलता था। और जिस जोशीले नारे से गली गूँज उठती थी वह था-‘घेघा बुआ को वोट दो।’’ पिछले दिनों म्युनिसिपैलिटी का चुनाव हुआ था और उसी में बच्चों ने यह नारा सीखा था। वैसे कभी-कभी बच्चों में दो पार्टियाँ भी होती थीं, पर दोनों को घेघा बुआ से अच्छा उम्मीदवार कोई नहीं मिलता था अतः दोनों गला फाड़-फाड़कर उनके ही लिए बोट माँगती थीं।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">उस</span></strong> दिन जब घेघा बुआ के धैर्य का बाँध टूट गया और नयी-नयी गालियों से विभूषित अपनी पहली इलेक्शन स्पीच देने ज्यों ही चौतरे पर अवतरित हुईं कि उन्हें डाकिया आता हुआ दिखाई पड़ा। वह अचकचाकर रूक गयीं। डाकिये के हाथ में एक पोस कार्ड था और वह गुलकी को ढूँढ़ रहा था। बुआ ने लपक कर पोस्टकार्ड लिया, एक साँस में पढ़ गयीं। उनकी आँखें मारे अचरज के फैल गयीं, और डाकिये को यह बताकर कि गुलकी सत्ती साबुनवाली के ओसारे में रहती है, वे झट से दौड़ी-दौड़ी निरमल की माँ ड्राइवर की पत्नी के यहाँ गयीं। बड़ी देर तक दोनों में सलाह-मशविरा होता रहा और अन्त में बुआ आयीं और उन्होंने मेवा को भेजा, ‘‘जा गुलकी को बुलाय ला !’’<br />
पर जब मेवा लौटा तो उसके साथ गुलकी नहीं वरन् सत्ती साबुनवाली थी और सदा की भाँति इस समय भी उसकी कमर से वह काले बेंट का चाकू लटक रहा था, जिससे वह साबुन की टिक्की काटकर दुकानदारों को देती थी। उसने आते ही भौं सिकोड़कर बुआ को देखा और कड़े स्वर में बोली, ‘‘क्यों बुलाया है गुलकी को ? तुम्हारा दस रूपये किराया बाकी था, तुमने पन्द्रह रूपये का सौदा उजाड़ दिया ! अब क्या काम है !’’ ‘‘अरे राम ! राम ! कैसा किराया बेटी ! अन्दर जाओ-अन्दर जाओ !’ बुआ के स्वर में असाधारण मुलायमियत थी। सत्ती के अन्दर जाते ही बुआ ने फटाक् से किवाड़ा बन्द कर लिये। बच्चों का कौतूहल बहुत बढ़ गया था। बुआ के चौके में एक झँझरी थी। सब बच्चे वहाँ पहुँचे और आँख लगाकर कनपटियों पर दोनों हथेलियाँ रखकर घण्टीवाला बाइसकोप देखने की मुद्रा में खड़े हो गये।<br />
अन्दर सत्ती गरज रही थी, ‘‘बुलाया है तो बुलाने दो। क्यों जाए गुलकी ? अब बड़ा खयाल आया है। इसलिए की उसकी रखैल को बच्चा हुआ है जो जाके गुलकी झाड़ू-बुहारू करे, खाना बनावे, बच्चा खिलावे, और वह मरद का बच्चा गुलकी की आँख के आगे रखैल के साथ गुलछर्रे उड़ावे !’’</p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">निरमल</span></strong> की माँ बोलीं, ‘‘अपनी बिटिया, पर गुजर तो अपने आदमी के साथ करैगी न ! जब उसकी पत्नी आयी है तो गुलकी को जाना चाहिए। और मरद तो मरद। एक रखैल छोड़ दुई-दुई रखैल रख ले तो औरत उसे छोड़ देगी ? राम ! राम !’’<br />
‘‘नहीं, छोड़ नहीं देगी तो जाय कै लात खाएगी ?’’ सत्ती बोली।<br />
‘‘अरे बेटा !’’ बुआ बोलीं, ‘‘भगवान रहें न ? तौन मथुरापुरी में कुब्जा दासी के लात मारिन तो ओकर कूबर सीधा हुइ गवा। पती तो भगवान हैं बिटिया। ओका जाय देव !’’<br />
‘‘हाँ-हाँ, बड़ी हितू न बनिये ! उसके आदमी से आप लोग मुफ्त में गुलकी का मकान झटकना चाहती हैं। मैं सब समझती हूँ।’’<br />
निरमल की माँ का चेहरा ज़र्द पड़ गया। पर बुआ ने ऐसी कच्ची गोली नहीं खेली थी। वे डपटकर बोलीं, ‘‘खबरदार जो कच्ची जबान निकाल्यो ! तुम्हारा चरित्तर कौन नै जानता ! ओही छोकरा मानिक&#8230;’’<br />
जबान खींच लूँगी, ‘‘सत्ती गला फाड़कर चीख़ी जो आगे एक हरूफ़ कहा।’’ और उसका हाथ अपने चाकू पर गया-<br />
‘‘अरे ! अरे ! अरे !’’ बुआ सहमकर दस क़दम पीछे हट गयीं-‘‘तो का खून करबो का, कतल करबो का ?’’ सत्ती जैसे आयी थी वैसे ही चली गयी।<br />
तीसरे दिन बच्चों ने तय किया कि होरी बाबू के कुएँ पर चलकर बर्रें पकड़ी जायें। उन दिनों उनका जहर शान्त रहता है, बच्चे उन्हें पकड़कर उनका छोटा-सा काला डंक निकाल लेते और फिर डोरी में बाँधकर उन्हें उड़ाते हुए घूमते। मेवा, निरमल और मुन्ना एक-एक बर्रे उड़ाते हुए जब गली में पहुँचे तो देखा बुआ के चौतरे पर टीन की कुरसी डाले कोई आदमी बैठा है। उसकी अजब शक्ल थी। कान पर बड़े-बड़े बाल, मिचमिची आँखें, मोछा और तेल से चुचुआते हुए बाल। कमीज और धोती पर पुराना बदरंग बूट। मटकी हाथ फैलाये कह रही है, “एक डबल दै देव! एक दै देव ना?” मुन्ना को देखकर मटकी ताली बजा-बजाकर कहने लगी, “गुलकी का मनसेधू आवा है। ए मुन्ना बाबू! ई कुबड़ी का मनसेधू है।” फिर उधर मुड़कर- “एक डबल दै देव।” तीनों बच्चे कौतूहल में रुक गये। इतने में निरमल की माँ एक गिलास में चाय भरकर लायी और उसे देते-देते निरमल के हाथ में बर्रे देखकर उसे डाँटने लगी। फिर बर्रे छुड़ाकर निरमल को पास बुलाया और बोली, “बेटा, ई हमारी निरमला है। ए निरमल, जीजाजी हैं, हाथ जोड़ो! बेटा, गुलकी हमारी जात-बिरादरी की नहीं है तो का हुआ, हमारे लिए जैसे निरमल वैसे गुलकी। अरे, निरमल के बाबू और गुलकी के बाप की दाँत काटी रही। एक मकान बचा है उनकी चिहारी, और का?&#8221;; एक गहरी साँस लेकर निरमल की माँ ने कहा।<br />
“अरे तो का उन्हें कोई इनकार है?&#8221;; बुआ आ गयी थीं, “अरे सौ रुपये तुम दैवे किये रहय्यू, चलो तीन सौ और दै देव। अपने नाम कराय लेव?”<br />
“पाँच सौ से कम नहीं होगा?” उस आदमी का मुँह खुला, एक वाक्य निकला और मुँह फिर बन्द हो गया।<br />
“भवा! भवा! ऐ बेटा दामाद हौ, पाँच सौ कहबो तो का निरमल की माँ को इनकार है?”<br />
अकस्मात् वह आदमी उठकर खड़ा हो गया। आगे-आगे सत्ती चली आ रही थी | पीछे-पीछे गुलकी। सत्ती चौतरे के नीचे खड़ी हो गयी। बच्चे दूर हट गये। गुलकी ने सिर उठाकर देखा और अचकचाकर सर पर पल्ला डालकर माथे तक खींच लिया। सत्ती दो-एक क्षण उसकी ओर एकटक देखती रही और फिर गरजकर बोली, “यही कसाई है! गुलकी, आगे बढ़कर मार दो चपोटा इसके मुँह पर! खबरदार जो कोई बोला?&#8221;; बुआ चट से देहरी के अन्दर हो गयीं, निरमल की माँ की जैसे घिग्घी बँध गयी और वह आदमी हड़बड़ाकर पीछे हटने लगा।<br />
“बढ़ती क्यों नहीं गुलकी! बड़ा आया वहाँ से बिदा कराने?”<br />
गुलकी आगे बढ़ी ; सब सन्न थे ; सीढ़ी चढ़ी, उस आदमी के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगीं। गुलकी चढ़ते-चढ़ते रुकी, सत्ती की ओर देखा, ठिठकी, अकस्मात् लपकी और फिर उस आदमी के पाँव पर गिर के फफक-फफककर रोने लगी, “हाय! हमें काहे को छोड़ दियौ! तुम्हारे सिवा हमारा लोक-परलोक और कौन है! अरे, हमरे मरै पर कौन चुल्लू भर पानी चढ़ायी।<br />
सत्ती का चेहरा स्याह पड़ गया। उसने बड़ी हिकारत से गुलकी की ओर देखा और गुस्से में थूक निगलते हुए कहा, “कुतिया!&#8221;; और तेजी से चली गयी। निरमल की मां और बुआ गुलकी के सर पर हाथ फेर-फेरकर कह रही थीं, “मत रो बिटिया! मत रो! सीता मैया भी तो बनवास भोगिन रहा। उठो गुलकी बेटा! धोती बदल लेव कंघी चोटी करो। पति के सामने ऐसे आना असगुन होता है। चलो!&#8221;;<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">गुलकी</span></strong> आँसू पोंछती-पोंछती निरमल की माँ के घर चली। बच्चे पीछे-पीछे चले तो बुआ ने डाँटा, “ऐ चलो एहर, हुँआ लड्डू बँट रहा है का?&#8221;;<br />
दूसरे दिन निरमल के बाबू (ड्राइवर साहब), गुलकी और जीजाजी दिन-भर कचहरी में रहे। शाम को लौटे तो निरमल की माँ ने पूछा, “पक्का कागज लिख गया?” “हाँ-हाँ रे, हाकिम, के सामने लिख गया।” फिर जरा निकट आकर फुसफुसाकर बोले, “मट्टी के मोल मकान मिला है। अब कल दोनों को बिदा करो।” “अरे, पहले सौ रुपये लाओ! बुआ का हिस्सा भी तो देना है?” निरमल की माँ उदास स्वर में बोली, “बड़ी चंट है बुढ़िया। गाड़-गाड़ के रख रही है, मर के साँप होयगी।&#8221;;<br />
सुबह निरमल की माँ के यहाँ मकान खरीदने की कथा थी। शंख, घण्टा-घड़ियाली, केले का पत्ता, पंजीरी, पंचामृत का आयोजन देखकर मुन्ना के अलावा सब बच्चे इकट्ठा थे। निरमल की माँ और निरमल के बाबू पीढ़े पर बैठे थे; गुलकी एक पीली धोती पहने माथे तक घूँघट काढ़े सुपारी काट रही थी और बच्चे झाँक-झाँककर देख रहे थे। मेवा ने पहुँचकर कहा, “ए गुलकी, ए गुलकी, जीजाजी के साथ जाओगी क्या?&#8221;; कुबड़ी ने झेंपकर कहा, “धत्त रे! ठिठोली करता है&#8221;; और लज्जा-भरी जो मुसकान किसी भी तरुणी के चेहरे पर मनमोहक लाली बनकर फैल जाती, उसके झुर्रियोंदार, बेडौल, नीरस चेहरे पर विचित्र रूप से बीभत्स लगने लगी। उसके काले पपड़ीदार होठ सिकुड़ गये, आँखों के कोने मिचमिचा उठे और अत्यन्त कुरुचिपूर्ण ढंग से उसने अपने पल्ले से सर ढाँक लिया और पीठ सीधी कर जैसे कूबड़ छिपाने का प्रयास करने लगी। मेवा पास ही बैठ गया। कुबड़ी ने पहले इधर-उधर देखा, फिर फुसफुसाकर मेवा से कहा, “क्यों रे! जीजाजी कैसे लगे तुझे?” मेवा ने असमंजस में या संकोच में पड़कर कोई जवाब नहीं दिया तो जैसे अपने को समझाते हुए गुलकी बोली, “कुछ भी होय। है तो अपना आदमी! हारे-गाढ़े कोई और काम आयेगा? औरत को दबाय के रखना ही चाहिए।” फिर थोड़ी देर चुप रहकर बोली, “मेवा भैया, सत्ती हमसे नाराज है। अपनी सगी बहन क्या करेगी जो सत्ती ने किया हमारे लिए। ये चाची और बुआ तो सब मतलब के साथी हैं हम क्या जानते नहीं? पर भैया अब जो कहो कि हम सत्ती के कहने से अपने मरद को छोड़ दें, सो नहीं हो सकता।” इतने में किसी का छोटा-सा बच्चा घुटनों के बल चलते-चलते मेवा के पास आकर बैठ गया। गुलकी क्षण-भर उसे देखती रही फिर बोली, “पति से हमने अपराध किया तो भगवान् ने बच्चा छीन लिया, अब भगवान् हमें छमा कर देंगे।” फिर कुछ क्षण के लिए चुप हो गयी। “क्षमा करेंगे तो दूसरी सन्तान देंगे?” “क्यों नहीं देंगे? तुम्हारे जीजाजी को भगवान् बनाये रखे। खोट तो हमी में है। फिर सन्तान होगी तब तो सौत का राज नहीं चलेगा।&#8221;;<br />
इतने में गुलकी ने देखा कि दरवाजे पर उसका आदमी खड़ा बुआ से कुछ बातें कर रहा है। गुलकी ने तुरत पल्ले से सर ढंका और लजाकर उधर पीठ कर ली। बोली, “राम! राम! कितने दुबरा गये हैं। हमारे बिना खाने-पीने का कौन ध्यान रखता! अरे, सौत तो अपने मतलब की होगी। ले भैया मेवा, जा दो बीड़ा पान दे आ जीजा को?” फिर उसके मुँह पर वही लाज की बीभत्स मुद्रा आयी- “तुझे कसम है, बताना मत किसने दिया है।”<br />
मेवा पान लेकर गया पर वहाँ किसी ने उसपर ध्यान ही नहीं दिया। वह आदमी बुआ से कह रहा था, “इसे ले तो जा रहे हैं, पर इतना कहे देते हैं, आप भी समझा दें उसे- कि रहना हो तो दासी बनकर रहे। न दूध की न पूत की, हमारे कौन काम की; पर हाँ औरतिया की सेवा करे, उसका बच्चा खिलावे, झाड़ू-बुहारू करे तो दो रोटी खाय पड़ी रहे। पर कभी उससे जबान लड़ाई तो खैर नहीं । हमारा हाथ बड़ा जालिम है। एक बार कूबड़ निकला, अगली बार परान निकलेगा।”<br />
“क्यों नहीं बेटा! क्यों नहीं?” बुआ बोलीं और उन्होंने मेवा के हाथ से पान लेकर अपने मुँह में दबा लिये।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">करीब</span></strong> तीन बजे इक्का लाने के लिए निरमल की माँ ने मेवा को भेजा। कथा की भीड़-भाड़ से उनका मूड़ पिराने; लगा था, अतः अकेली गुलकी सारी तैयारी कर रही थी। मटकी कोने में खड़ी थी। मिरवा और झबरी बाहर गुमसुम बैठे थे। निरमल की माँ ने बुआ को बुलवाकर पूछा कि बिदा-बिदाई में क्या करना होगा, तो बुआ मुँह बिगाड़कर बोलीं, “अरे कोई जात-बिरादरी की है का? एक लोटा में पानी भर के इकन्नी-दुअन्नी उतार के परजा-पजारू को दे दियो बस?” और फिर बुआ शाम को बियारी में लग गयीं।<br />
इक्का आते ही जैसे झबरी पागल-सी इधर-उधर दौड़ने लगी। उसे जाने कैसे आभास हो गया कि गुलकी जा रही है, सदा के लिए। मेवा ने अपने छोटे-छोटे हाथों से बड़ी-बड़ी गठरियाँ रखीं, मटकी और मिरवा चुपचाप आकर इक्के के पास खड़े हो गये। सर झुकाये पत्थर-सी चुप गुलकी निकली। आगे-आगे हाथ में पानी का भरा लोटा लिये निरमल थी। वह आदमी जाकर इक्के पर बैठ गया। “अब जल्दी करो!&#8221;; उसने भारी गले से कहा। गुलकी आगे बढ़ी, फिर रुकी और टेंट से दो अधन्नी निकाले- “ले मिरवा, ले मटकी?” मटकी जो हमेशा हाथ फैलाये रहती थी, इस समय जाने कैसा संकोच उसे आ गया कि वह हाथ नीचे कर दीवार से सट कर खड़ी हो गयी और सर हिलाकर बोली, “नहीं ?”–“नहीं बेटा! ले लो!” गुलकी ने पुचकारकर कहा। मिरवा-मटकी ने पैसे ले लिये और मिरवा बोला, “छलाम गुलकी! ए आदमी छलाम?&#8221;;<br />
“अब क्या गाड़ी छोड़नी है?” वह फिर भारी गले से बोला।<br />
“ठहरो बेटा, कहीं ऐसे दामाद की बिदाई होती है?” सहसा एक बिलकुल अजनबी किन्तु अत्यन्त मोटा स्वर सुनायी पड़ा। बच्चों ने अचरज से देखा, मुन्ना की माँ चली आ रही हैं। “हम तो मुन्ना का आसरा देख रहे थे कि स्कूल से आ जाये, उसे नाश्ता करा लें तो आयें, पर इक्का आ गया तो हमने समझा अब तू चली। अरे! निरमल की माँ, कहीं ऐसे बेटी की बिदाई होती है! लाओ जरा रोली घोलो जल्दी से, चावल लाओ, और सेन्दुर भी ले आना निरमल बेटा! तुम बेटा उतर आओ इक्के से!&#8221;;<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">निरमल</span></strong> की माँ का चेहरा स्याह पड़ गया था। बोलीं, “जितना हमसे बन पड़ा किया। किसी को दौलत का घमण्ड थोड़े ही दिखाना था?” “नहीं बहन! तुमने तो किया पर मुहल्ले की बिटिया तो सारे मुहल्ले की बिटिया होती है। हमारा भी तो फर्ज था। अरे माँ-बाप नहीं हैं तो मुहल्ला तो है। आओ बेटा?” और उन्होंने टीका करके आँचल के नीचे छिपाये हुए कुछ कपड़े और एक नारियल उसकी गोद में डालकर उसे चिपका लिया। गुलकी जो अभी तक पत्थर-सी चुप थी सहसा फूट पड़ी। उसे पहली बार लगा जैसे वह मायके से जा रही है। मायके से अपनी माँ को छोड़कर छोटे-छोटे भाई-बहनों को छोड़कर और वह अपने कर्कश फटे हुए गले से विचित्र स्वर से रो पड़ी।<br />
“ले अब चुप हो जा! तेरा भाई भी आ गया?” वे बोलीं। मुन्ना बस्ता लटकाये स्कूल से चला आ रहा था। कुबड़ी को अपनी माँ के कन्धे पर सर रखकर रोते देखकर वह बिल्कुल हतप्रभ-सा खड़ा हो गया- “आ बेटा, गुलकी जा रही है न आज! दीदी है न! बड़ी बहन है। चल पाँव छू ले! आ इधर?” माँ ने फिर कहा। मुन्ना और कुबड़ी के पाँव छुए? क्यों? क्यों? पर माँ की बात! एक क्षण में उसके मन में जैसे एक पूरा पहिया घूम गया और वह गुलकी की ओर बढ़ा। गुलकी ने दौड़कर उसे चिपका लिया और फूट पड़ी- “हाय मेरे भैया! अब हम जा रहे हैं! अब किससे लड़ोगे मुन्ना भैया? अरे मेरे वीरन, अब किससे लड़ोगे?” मुन्ना को लगा जैसे उसकी छोटी-छोटी पसलियों में एक बहुत बड़ा-सा आँसू जमा हो गया जो अब छलकने ही वाला है। इतने में उस आदमी ने फिर आवाज दी और गुलकी कराहकर मुन्ना की माँ का सहारा लेकर इक्के पर बैठ गयी। इक्का खड़-खड़ कर चल पड़ा। मुन्ना की माँ मुड़ी कि बुआ ने व्यंग्य किया, “एक आध गाना भी बिदाई का गाये जाओ बहन! गुलकी बन्नो ससुराल जा रही है!” मुन्ना की माँ ने कुछ जवाब नहीं दिया, मुन्ना से बोली, “जल्दी घर आना बेटा, नाश्ता रखा है?”<br />
पर<strong><span style="color: #ff0000;"> पागल</span></strong> मिरवा ने, जो बम्बे पर पाँव लटकाये बैठा था, जाने क्या सोचा कि वह सचमुच गला फाड़कर गाने लगा, “बन्नो डाले दुपट्टे का पल्ला, मुहल्ले से चली गयी राम?” यह उस मुहल्ले में हर लड़की की बिदा पर गाया जाता था। बुआ ने घुड़का तब भी वह चुप नहीं हुआ, उलटे मटकी बोली, “काहे न गावें, गुलकी नै पैसा दिया है?” और उसने भी सुर मिलाया, “बन्नो तली गयी लाम! बन्नो तली गयी लाम! बन्नो तली गयी लाम!”<br />
मुन्ना चुपचाप खड़ा रहा। मटकी डरते-डरते आयी- “मुन्ना बाबू! कुबड़ी ने अधन्ना दिया है, ले लें?”<br />
“ले ले” बड़ी मुश्किल से मुन्ना ने कहा और उसकी आँख में दो बड़े-बड़े आँसू डबडबा आये। उन्हीं आँसुओं की झिलमिल में कोशिश करके मुन्ना ने जाते हुए इक्के की ओर देखा। गुलकी आँसू पोंछते हुए परदा उठाकर मुड़-मुड़कर देख रही थी। मोड़ पर एक धचके से इक्का मुड़ा और फिर अदृश्य हो गया।<br />
<strong><span style="color: #ff0000;">सिर्फ</span></strong> झबरी सड़क तक इक्के के साथ गयी और फिर लौट गयी।</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/entertainment/art-and-literature/story-of-dharamveer-bharti-gulki-banno/10945/">चली कहानीः धर्मवीर भारती की &#8220;गुलकी बन्नो&#8221;</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>Rajasthan: हत्या और आत्महत्या से दहला हाड़ौती</title>
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		<pubDate>Thu, 21 Oct 2021 02:35:49 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>पति ने फेवरेट शर्ट नहीं पहनी तो पत्नी ने दी जान  दादी के बारहवें से पहले नवयुवक झूला फंदे पर  TISMedia@Kota राजस्थान का हाड़ौती संभाग खूनी संघर्ष से लेकर आत्महत्याओं के कारण दहल उठा। कोटा जिले के कैथून थाना क्षेत्र के मोरपा गांव में कुत्ते को पत्थर मारने के विवाद में हुए खूनी संघर्ष ने &#8230;</p>
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<li><strong><span style="color: #ff0000;">पति ने फेवरेट शर्ट नहीं पहनी तो पत्नी ने दी जान </span></strong></li>
<li><strong><span style="color: #ff0000;">दादी के बारहवें से पहले नवयुवक झूला फंदे पर </span></strong></li>
</ul>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>TISMedia@Kota</strong></span> राजस्थान का हाड़ौती संभाग खूनी संघर्ष से लेकर आत्महत्याओं के कारण दहल उठा। कोटा जिले के कैथून थाना क्षेत्र के मोरपा गांव में कुत्ते को पत्थर मारने के विवाद में हुए खूनी संघर्ष ने एक बुजुर्ग की जान ले ली। जबकि, कोटा के आरके पुरम थाना क्षेत्र में 23 साल की विवाहिता ने सिर्फ इसलिए फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली कि पति ने उसकी पसंद की शर्ट नहीं पहनी थी। जबकि, बूंदी जिले के कापरेन थाना क्षेत्र में एक युवक ने सुसाइड कर लिया। जिसके कारणों का पता नहीं चल सका है।</p>
<p><strong>Read More: <a href="https://tismedia.in/rajasthan/brutal-murder-of-a-woman-in-jaipur-one-kg-of-silver-was-robbed-by-cutting-both-legs/10938/">भैंस चराने गई महिला की गला काटकर हत्या, दोनों पैर काटकर 1 किलो चांदी के कड़े लूट ले गए हत्यारे</a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>जमीन थी वजह, कुत्ते का बहाना </strong></span><br />
कैथून थाना क्षेत्र के मोरपा गांव में एक बीघा जमीन को लेकर दो पक्षों में करीब 10 साल से विवाद चल रहा था। मामला कोर्ट में है, लेकिन रंजिश दिलों में घर करे बैठी थी। दो दिन पहले कुत्ते को पत्थर मारने को लेकर दोनों पक्षों में आपस में बहस हुई थी। जिसके बाद बुधवार को 62 वर्षीय राजाराम के घर हथियार बंद 10-12 लोग ट्रैक्टर में सवार होकर आए। घर मे घुसकर मारपीट की। घटना में राजाराम मीणा (62) की मौत हो गई। उसकी पत्नी अयोध्या बाई और बेटा सोनू मीणा घायल हो गया।</p>
<p><strong>Read More: <a href="https://tismedia.in/kota-news/crime/vmou-former-mpd-director-arrested-in-12-crore-printing-scam/10935/">VMOU: 12 करोड़ के प्रिंटिंग घोटाले में एमपीडी का पूर्व निदेशक गिरफ्तार</a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>घर में घुसकर किया हमला </strong></span><br />
मृतक के बेटे सोनू ने बताया कि राजाराम, रामेश्वर, लोकेश भंवर लाल समेत 10-12 लोग हाथों में सरिए और गंडासे लेकर उनके घर आ धमके। आते ही उन्होंने सोनू पर सरिए से हमला किया। सोनू ने पिता को छत पर भेज दिया। आरोपी गैलरी का गेट तोड़ते हुए अंदर घुस गए। बीच बचाव में उसकी मां आई तो उस पर भी वार किया। आरोपी फिर छत पर चले गए। पिता छत से दूसरे के खेत में कूद गए। इतने में आरोपियों ने पिता को घेर लिया। और सरिए और गंडासे से हमला कर उनकी हत्या कर दी।</p>
<p><strong>Read More: <a href="https://tismedia.in/rajasthan/mla-meena-kanwar-got-angry-after-cutting-the-challan-of-a-relative-who-was-driving-drunk/10929/">‘क्या हुआ थोड़ी पी ली तो’, रिश्तेदार का चालान काटने पर भड़की कांग्रेस MLA</a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>युवक ने किया सुसाइड</strong></span><br />
बूंदी जिले के कापरेन थाना क्षेत्र में फंदा लगाकर एक युवक ने सुसाइड कर लिया। एसआई शक्ति सिंह ने बताया कि रोटेदा कस्बे में मेघवाल बस्ती निवासी हनुमान मेघवाल (19) पुत्र मोहन लाल ने बुधवार दोपहर को घर में अकेले होने पर अपने कमरे का दरवाजा बंद कर पंखे से रस्सी पर झूलकर आत्महत्या कर ली। कुछ दिन पहले ही उसकी दादी का देहांत हो गया था। गुरुवार को बारह दिनों की रसोई के सामान लेने के लिए मृतक के पिता मोहन लाल व परिजन ट्रैक्टर ट्रॉली से कापरेन गए थे। जब परिजन सामान लेकर वापस पहुंचे तो सामान उतराने के लिए हनुमान को बुलाने गए। हनुमान के कमरे के दरवाजा अंदर से लगा देख आवाज लगाई, नहीं खुलने पर दरवाजा तोड़ा तो कमरे में फंदे से लटका मिला। बाद में हनुमान को नीचे उतारा और पुलिस को सूचना दी गई। साथ ही हनुमान के जीवित होने की उम्मीद के चलते परिजन कापरेन अस्पताल के लिए रवाना हुए लेकिन हनुमान की रास्ते मे ही मौत हो जाने से वापस घर ले गए।</p>
<p><strong>Read More: <a href="https://tismedia.in/knowledge/do-you-know/know-who-was-the-real-turram-khan/10920/">खुद को बड़ा तुर्रम खां समझते हो, जानिए आखिर कौन थे असली तुर्रम खां?</a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>ये कैसी नाराजगी </strong></span><br />
आरके पुरम थाना क्षेत्र में 23 साल की विवाहिता ने फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली। मृतका अंजली सुमन कोटा के रामचंद्रपुरा की रहने वाली थी। 2 साल पहले मध्यप्रदेश के मंदसौर निवासी शुभम के साथ उसकी शादी हुई थी, लेकिन शुभम कोटा में नौकरी करता था। उसने पति से उसकी पसंद की शर्ट पहनने को कहा जिसे लेकर बहस हो गई। पति बिना खाना खाए ही घर से निकल गया था। ड्यूटी पर जाने के बाद पत्नी ने पति को फोन कर कहा था, मुझे आप से बात करनी है। मैंने उससे कहा कि ड्यूटी से लौटकर बात करता हूं। आधे घंटे बाद तो पड़ोसी का फोन आया कि अंजली ने फांसी लगा ली। मृतका के मायके वालों ने मामले की जांच करवा कर कानूनी कार्रवाई करने की शिकायत दी है।</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/breaking/rajasthan-kota-division-stunned-by-murder-and-suicides/10942/">Rajasthan: हत्या और आत्महत्या से दहला हाड़ौती</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>VMOU: 12 करोड़ के प्रिंटिंग घोटाले में एमपीडी का पूर्व निदेशक गिरफ्तार</title>
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		<pubDate>Tue, 19 Oct 2021 18:16:50 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>TISMedia@Kota वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय (Vardhman Mahaveer Open University) में हुए 12 करोड़ रुपए के प्रिंटिंग घोटाला में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (Anti Corruption Bureau) ने यूनिवर्सिटी के मटेरियल, प्रोडेक्शन एंड डिस्ट्रीब्यूशन डिपार्टमेंट के तत्कालीन डायरेक्टर और पब्लिकेशन कंपनी के मालिक को धर दबोचा। एसीबी ने दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर एसीबी कोर्ट में पेश किया। &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ff0000;"><strong>TISMedia@Kota</strong></span> वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय (Vardhman Mahaveer Open University) में हुए 12 करोड़ रुपए के प्रिंटिंग घोटाला में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (Anti Corruption Bureau) ने यूनिवर्सिटी के मटेरियल, प्रोडेक्शन एंड डिस्ट्रीब्यूशन डिपार्टमेंट के तत्कालीन डायरेक्टर और पब्लिकेशन कंपनी के मालिक को धर दबोचा। एसीबी ने दोनों आरोपियों को गिरफ्तार कर एसीबी कोर्ट में पेश किया। जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/rajasthan/mla-meena-kanwar-got-angry-after-cutting-the-challan-of-a-relative-who-was-driving-drunk/10929/">‘क्या हुआ थोड़ी पी ली तो’, रिश्तेदार का चालान काटने पर भड़की कांग्रेस MLA</a></strong></p>
<p>एकेडमिक सेशन 2016-17 के लिए वीएमओयू ने पाठ्य पुस्तकों की छपाई के लिए टेंडर निकाला था। टेंडर की शर्त थी कि वार्षिक टर्नओवर 12 करोड़ रुपए से ज्यादा वाली फर्म ही इसमें शामिल हो पाएगी। जबकि यूनिवर्सिटी ने न्यूनतम दर के आधार पर 18 पैसे प्रति पेज प्रिंटिंग दर देने वाली मथुरा की फर्म सरस्वती प्रेस को कार्यादेश जारी कर दिया।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/knowledge/do-you-know/know-who-was-the-real-turram-khan/10920/">खुद को बड़ा तुर्रम खां समझते हो, जानिए आखिर कौन थे असली तुर्रम खां?</a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>टेंडर नहीं मिला तो की शिकायत </strong></span><br />
इस टेंडर के लिए मथुरा के ही प्रज्ञा पब्लिकेशन ने भी टेंडर डाला था, लेकिन उसे टेंडर नहीं मिला। जिसके बाद प्रज्ञा पब्लिकेशन के प्रफुल्ल गोयल ने इस मामले में एसीबी को घोटाले की शिकायत दी। गोयल ने आरोप लगाया कि टेंडर की सबसे प्रमुख शर्त थी कि एनुअल टर्नओवर 12 करोड़ होना चाहिए था, लेकिन यूनिवर्सिटी ने महज 5 करोड़ एनुअल टर्नओवर वाली फर्म को टेंडर दे दिया है। इसके साथ ही टेंडर की शर्त के अनुसार जिस कागज पर प्रिंटिंग होनी थी, उससे घटिया स्तर के कागज पर पाठ्य पुस्तकों की छपाई की जा रही है। इससे वीएमओयू को करोड़ों रुपए का नुकसान हुआ है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ें : <a href="https://tismedia.in/state/uttar-pradesh/uttar-pradesh-ayodhya-bjp-mla-khabbu-tiwari-sentenced-to-five-years-in-fake-marksheet-case/10932/">BJP: फिर लगी फर्जी मार्कशीट की आग, विधायक को पांच साल की सजा</a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>एसीबी ने तीन लोगों को माना दोषी</strong></span><br />
शिकायत के आधार पर एसीबी कोटा ने साल 2017 में वीएमओयू के खिलाफ भ्रष्टाचार का मुकदमा दर्ज कर कार्यवाही शुरू कर दी। मामले की जांच जांच बारां एसीबी को सौंपी गई। जांच में बारां एसीबी ने वीएमओयू के मटेरियल, प्रोडेक्शन एंड डिस्ट्रीब्यूशन डिपार्टमेंट (एमपीडी) के तत्कालीन निदेशक करण सिंह और तत्कालीन वित्त नियंत्रक सुरेश चंद्र के साथ साथ सरस्वती प्रिंटिंग प्रेस मथुरा के अमित अग्रवाल को दोषी पाया। आरोप साबित होने के बाद अमित अग्रवाल और करण सिंह को एसीबी ने गिरफ्तार कर लिया और एसीबी कोर्ट कोटा में पेश किया। जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया है। मामले में आरोपी बनाए गए वीएमओयू के बाकी सभी कर्मचारियों को एसीबी ने क्लीन चिट दे दी है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/state/uttar-pradesh/shivpal-yadav-announced-that-psp-will-not-merge-with-sp/10923/">UP Assembly Election 2022: भतीजे के आगे नहीं झुकेंगे चाचा&#8230;</a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>शर्मा की गिरफ्तारी बाकी </strong></span><br />
वहीं दूसरी ओर मामले में वीएमओयू के पूर्व वित्त नियंत्रक एवं घोटाले के तीसरे आरोपी सुरेश चंद्र शर्मा की गिरफ्तारी अभी बाकी है। एसीबी ने पूर्व वित्त नियंत्रक को क्यों गिरफ्तार नहीं किया इसे लेकर सवाल उठ रहे हैं। जबकि इस मामले में सबसे बड़ी जिम्मेदारी उनकी ही बन रही थी। क्योंकि निविदाओं के दस्तावेजों के सत्यापन का काम शर्मा ने ही किया था।</p>
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		<title>BJP: फिर लगी फर्जी मार्कशीट की आग, विधायक को पांच साल की सजा</title>
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		<pubDate>Tue, 19 Oct 2021 06:39:37 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>TISMedia@Lucknow 29 साल पुराने एक फर्जी मार्कशीट मामले में BJP विधायक को विशेष कोर्ट ने पांच साल की सजा सुनाई है। मामले में कोर्ट ने तत्‍कालीन छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष व सपा नेता को भी दोषी करार दिया है। अयोध्या(Ayodhya) की गोसाईगंज सीट (Gosaiganj) से बीजेपी विधायक इंद्र प्रताप तिवारी उर्फ खब्बू तिवारी (Indra Pratap &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/state/uttar-pradesh/uttar-pradesh-ayodhya-bjp-mla-khabbu-tiwari-sentenced-to-five-years-in-fake-marksheet-case/10932/">BJP: फिर लगी फर्जी मार्कशीट की आग, विधायक को पांच साल की सजा</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ff0000;"><strong>TISMedia<span style="color: #000000;">@</span>Lucknow</strong></span> 29 साल पुराने एक फर्जी मार्कशीट मामले में BJP विधायक को विशेष कोर्ट ने पांच साल की सजा सुनाई है। मामले में कोर्ट ने तत्&#x200d;कालीन छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष व सपा नेता को भी दोषी करार दिया है। अयोध्या(Ayodhya) की गोसाईगंज सीट (Gosaiganj) से बीजेपी विधायक इंद्र प्रताप तिवारी उर्फ खब्बू तिवारी (Indra Pratap Tiwari) को विशेष कोर्ट ने पांच साल की सुनाई।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/rajasthan/mla-meena-kanwar-got-angry-after-cutting-the-challan-of-a-relative-who-was-driving-drunk/10929/">‘क्या हुआ थोड़ी पी ली तो’, रिश्तेदार का चालान काटने पर भड़की कांग्रेस MLA</a></strong></p>
<p>29 साल पहले साकेत महाविद्यालय में अंक पत्र व बैक पेपर में कूट रचित दस्तावेज के सहारे धोखाधड़ी व हेराफेरी करने के मामले में विधायक के साथ ही छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष व सपा नेता फूलचंद यादव और चाणक्य परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष कृपा निधान तिवारी पर सोमवार को अपराध साबित होने पर एमपी/एमएलए कोर्ट ने दोषी माना। विशेष न्यायाधीश (एमपी/एमएलए कोर्ट) पूजा सिंह ने बीजेपी विधायक इन्द्र प्रताप तिवारी खब्बू सहित तीनों आरोपियों को पांच-पांच वर्ष की सजा सुनाई। सभी पर 19 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। फैसले के बाद तीनों आरोपियों को कड़ी सुरक्षा व्यवस्था के बीच न्यायिक हिरासत में जेल भेजने का आदेश दिया है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/knowledge/do-you-know/know-who-was-the-real-turram-khan/10920/">खुद को बड़ा तुर्रम खां समझते हो, जानिए आखिर कौन थे असली तुर्रम खां?</a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>29 साल पहले का है मामला</strong></span><br />
यह मामला अयोध्या के थाना रामजन्म भूमि का वर्ष 1992 का है। अभियोजन पक्ष के मुताबिक 14 फरवरी 1992 में साकेत स्नातकोत्तर महाविद्यालय में फर्जी अंक पत्रों के आधार पर प्रवेश प्राप्त करने का मामला प्रकाश में आया था। इनमें फूलचंद यादव बीएससी प्रथम वर्ष की परीक्षा 1986 में फेल होने और बैक पेपर परीक्षा के उपरांत भी बीएससी द्वितीय वर्ष में प्रवेश पाने के योग्य नहीं थे, परंतु विश्वविद्यालय की ओर से दिए गए बैक पेपर के रिजल्&#x200d;ट में हेरफेर कर धोखाधड़ी और षड्यंत्र के आधार पर पास होने की मार्कशीट प्राप्&#x200d;त की।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/state/uttar-pradesh/shivpal-yadav-announced-that-psp-will-not-merge-with-sp/10923/">UP Assembly Election 2022: भतीजे के आगे नहीं झुकेंगे चाचा&#8230;</a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>धोखाधड़ी के आधार पर लिया प्रवेश</strong></span><br />
वहीं इंद्र प्रताप तिवारी ने बीएससी द्वितीय वर्ष परीक्षा 1990 में अनुत्तीर्ण होने के बावजूद बीएससी तृतीय वर्ष और कृपानिधान तिवारी ने प्रथम वर्ष 1989 में एलएलबी प्रथम वर्ष में अनुत्तीर्ण होने के बावजूद छल कपट कर एलएलबी द्वितीय वर्ष में प्रवेश प्राप्त कर लिया। इन लोगों ने महाविद्यालय में छल व धोखाधड़ी के आधार पर प्रवेश प्राप्त कर लिया था। साकेत महाविद्यालय के तत्कालीन प्राचार्य यदुवंश राम त्रिपाठी के संज्ञान में यह मामला आया तब 18 फरवरी 1992 को उन्होंने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक से मिलकर इन तीनों के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने के लिए तहरीर दी थी। वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने थाना रामजन्मभूमि को मामले में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर कानूनी कार्यवाही का आदेश दिया। इसी के साथ इंद्र प्रताप तिवारी, छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष फूलचंद यादव व चाणक्य परिषद के अध्यक्ष कृपानिधान तिवारी के विरुद्ध 24/ 1992 अंतर्गत धारा 420 467 468 471 के तहत दर्ज किया गया।</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/state/uttar-pradesh/uttar-pradesh-ayodhya-bjp-mla-khabbu-tiwari-sentenced-to-five-years-in-fake-marksheet-case/10932/">BJP: फिर लगी फर्जी मार्कशीट की आग, विधायक को पांच साल की सजा</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>‘क्या हुआ थोड़ी पी ली तो’, रिश्तेदार का चालान काटने पर भड़की कांग्रेस MLA</title>
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		<pubDate>Tue, 19 Oct 2021 06:20:56 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>पति के साथ थाने में दिया धरना, वीडियो हुआ वायरल  TISMedia@Jaipur राजस्थान (Rajasthan) में शराब पीकर गाड़ी चलाने पर पुलिस (Police) ने एक युवक का चालान काट दिया। ये बात कांग्रेस (Congress) की एक महिला विधायक को नागवार गुजरी और वो पुलिस स्टेशन में ही धरने (MLA Protest In Police Station) पर बैठ गईं। विधायक मीना &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/rajasthan/mla-meena-kanwar-got-angry-after-cutting-the-challan-of-a-relative-who-was-driving-drunk/10929/">‘क्या हुआ थोड़ी पी ली तो’, रिश्तेदार का चालान काटने पर भड़की कांग्रेस MLA</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<ul>
<li><span style="color: #ff0000;"><strong>पति के साथ थाने में दिया धरना, वीडियो हुआ वायरल </strong></span></li>
</ul>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>TISMedia<span style="color: #000000;">@</span>Jaipur </strong></span>राजस्थान (Rajasthan) में शराब पीकर गाड़ी चलाने पर पुलिस (Police) ने एक युवक का चालान काट दिया। ये बात कांग्रेस (Congress) की एक महिला विधायक को नागवार गुजरी और वो पुलिस स्टेशन में ही धरने (MLA Protest In Police Station) पर बैठ गईं। विधायक मीना कंवर (Meena Kanwar) ने कहा कि कोई बात नहीं, बच्चे हैं थोड़ा बहुत पी लिया तो क्या गुनाह किया?</p>
<p>कांग्रेस विधायक (Congress MLA) मीना कंवर का एक वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। इस वीडियो में शेरगढ़ विधान सभा सीट से कांग्रेस विधायक मीना कंवर अपने पति उम्मेद सिंह चंपावत (Ummed Singh Champawat) के साथ धरने पर बैठी हैं। दरअसल धरने के पीछे की वजह पुलिस का चालान काटना बताया जा रहा है।</p>
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<p>शेरगढ़ से कांग्रेस विधायक मीना कंवर के रिश्तेदार का शराब के नशे में गाड़ी चलाते पुलिस ने मोटर व्हीकल एक्ट में चालान कर दिया। पहले तो विधायक पति उम्मेद सिंह राठौड़ ने संबंधित पुलिसकर्मी से आग्रह किया कि वह उनका रिश्तेदार है। लेकिन पुलिसकर्मी नहीं माना तो विधायक और उनके पति थाने पहुंच गए। यहां दोनों पुलिसकर्मियों के सामने ही थाने की फर्श पर बैठ गए। इसके बाद भी विधायक आग्रह करती रहीं, लेकिन पुलिसकर्मी नहीं माना और मामला उच्च अधिकारियों तक पहुंच गया।</p>
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<p><span style="color: #ff0000;"><strong>वीडियो बनाने पर दी चेतावनी</strong></span><br />
कांग्रेस पार्टी से विधायक मीना कंवर और उनके पति ने अपना परिचय देते हुए पुलिसकर्मियों से आग्रह किया, लेकिन पुलिसकर्मी कानून का हवाला देते हुए गाड़ी को सीज करने की बात कहता रहा। यहां तक कि विधायक ने ​वीडियो बनाने वाले को भी चेतावनी दे दी। विधायक खुली चेतावनी देते हुए कह रही है कि आप वीडियो बना रहे हो, यह अच्छा नहीं कर रहे हैं, यह बंद कर दीजिये।</p>
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<p><span style="color: #ff0000;"><strong>उठ रहे सवाल</strong></span><br />
उधर, सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद लोगों में भी सवाल उठ रहे हैं कि विधायक का ऐसे मामले में थाने जाकर हस्तक्षेप करना ठीक नहीं था, क्योंकि पुलिस तो कानून के अनुसार अपना काम कर रही थी।</p>
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