किसकी खुलेगी किस्मत, तय करेगा मतदाता !

निकाय चुनाव 2026 की दस्तक—किसे दें मत, किसे न दें; फैसला केवल प्रत्याशी का नहीं, नगर के भविष्य का भी

 

कोटा TIS

 

निकाय चुनाव 2026 की आहट के साथ राजनीतिक हलचल तेज होने लगी है। संभावित प्रत्याशी सक्रिय हैं, समर्थकों की गोलबंदी शुरू हो गई है और मतदाताओं से संपर्क का सिलसिला भी बढ़ने लगा है। हर दावेदार अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश करेगा। कोई विकास के सपने दिखाएगा तो कोई पुराने संबंधों और राजनीतिक पहचान के सहारे समर्थन मांगेगा। मगर इस पूरे चुनावी परिदृश्य में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका उस मतदाता की है, जिसके हाथ में लोकतंत्र की असली ताकत है।

अब सवाल चेहरे का नहीं, चरित्र का है

नगर निकाय का चुनाव किसी राजनीतिक दल या प्रत्याशी को जिताने भर का अवसर नहीं है। यह आने वाले वर्षों में नगर की दिशा और दशा तय करने का निर्णय है। सड़क, नाली, सफाई, पेयजल, प्रकाश व्यवस्था, कचरा प्रबंधन, अतिक्रमण और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे सीधे आम नागरिक के जीवन को प्रभावित करते हैं।

इसलिए मतदाता को इस बार केवल चेहरा देखकर निर्णय नहीं करना चाहिए। चरित्र कैसा है, पिछला काम कैसा रहा है और जनता के बीच उसकी उपलब्धता कितनी रही है—इन सवालों के जवाब तलाशना जरूरी है।

वोट मांगने वालों से हिसाब भी मांगे

चुनाव के समय जनता के दरवाजे तक पहुंचना आसान है, लेकिन चुनाव जीतने के बाद पांच वर्ष तक जनता के बीच रहना कठिन। यही वह कसौटी है, जिस पर प्रत्याशियों को परखा जाना चाहिए।

मतदाता को प्रत्याशी से सवाल पूछने चाहिए—वार्ड की प्रमुख समस्याएं क्या हैं? उनके समाधान की योजना क्या है? विकास के लिए उनकी प्राथमिकताएं क्या हैं? क्या वे जीतने के बाद भी आम नागरिक के लिए उसी तरह उपलब्ध रहेंगे?

लोकतंत्र में मतदाता केवल वोट देने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधि का वास्तविक मूल्यांकनकर्ता भी है।

जाति, प्रलोभन और दबाव से ऊपर उठकर फैसला

चुनाव में जातीय समीकरण, व्यक्तिगत रिश्ते, राजनीतिक दबाव और प्रलोभन हमेशा प्रभाव डालने की कोशिश करते हैं। लेकिन एक जागरूक मतदाता को इन सबसे ऊपर उठकर नगरहित को प्राथमिकता देनी होगी।

मतदाता किसी प्रत्याशी का ऋणी नहीं है। उसका वोट किसी एहसान का बदला नहीं, बल्कि उसके अधिकार की अभिव्यक्ति है। इसलिए मत उसी व्यक्ति को मिलना चाहिए, जो ईमानदारी, संवेदनशीलता, कार्यक्षमता और जनसेवा की कसौटी पर खरा उतरता हो।

मतदान से दूरी नहीं, लोकतंत्र में भागीदारी जरूरी

कई बार मतदाता यह सोचकर मतदान से दूर रह जाता है कि उसके एक वोट से क्या फर्क पड़ेगा। यही सोच लोकतंत्र को कमजोर करती है। एक-एक मत मिलकर ही जनादेश बनता है और कई बार चुनावी मुकाबले में कुछ मतों का अंतर ही परिणाम बदल देता है।

इसलिए मतदान के दिन घर से निकलें, अपने मताधिकार का प्रयोग करें और बिना किसी भय, दबाव या प्रलोभन के अपने विवेक से मतदान करें।

न तो किसी के कहने मात्र से वोट दें और न ही किसी के दबाव में मतदान करें। प्रत्याशियों को परखें, उनके काम और विचारों को समझें और फिर अपने मत का निर्णय स्वयं करें।

किस्मत प्रत्याशियों की नहीं, नगर की भी खुले

चुनाव के बाद किसी एक प्रत्याशी की जीत होगी, लेकिन वास्तविक जीत तभी मानी जाएगी जब जनता का विश्वास जीतने वाला प्रतिनिधि नगर के विकास में अपनी भूमिका निभाए।

किसी की राजनीतिक किस्मत खुलेगी, किसी का सपना अधूरा रह जाएगा। मगर मतदाता को यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रत्याशियों की किस्मत से ज्यादा महत्वपूर्ण नगर की किस्मत है।

सलिए इस बार सवाल सिर्फ इतना नहीं होना चाहिए कि “कौन जीतेगा?” बल्कि सवाल यह होना चाहिए कि “जीतने के बाद कौन जनता के बीच खड़ा रहेगा?”

एक मत, पांच वर्षों का निर्णय

मतदान के दिन उंगली पर लगने वाली स्याही कुछ दिनों में फीकी पड़ जाएगी, लेकिन उस एक मत का प्रभाव पूरे पांच वर्ष दिखाई देगा। इसलिए मतदान भावनाओं में नहीं, विवेक से होना चाहिए।

अपना वोट अवश्य दें। सही प्रत्याशी चुनें। नगर के हित में चुनें।

जिसे भी मत दें, ऐसा प्रतिनिधि चुनें जो मतदाता के मन का मालिक बनने नहीं, जनता का सेवक बनने की भावना लेकर मैदान में उतरा हो।

अब समय कम है। चुनावी तस्वीर जल्द साफ होगी और मतपेटी प्रत्याशियों की किस्मत का फैसला करेगी।

किसकी खुलेगी किस्मत, तय करेगा मतदाता।

लेकिन उस फैसले से केवल प्रत्याशी का भविष्य नहीं, पूरे नगर का भविष्य तय होगा।

मतदान करें—क्योंकि आपका एक वोट केवल एक प्रत्याशी नहीं चुनता, बल्कि आपके नगर के अगले पांच वर्षों की दिशा तय करता है।

TIS KOTA

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