सोलर पार्कों के लिए जमीन बेचने वाले ही कर रहे खेजड़ी बचाने का आंदोलन
पर्यावरण के नाम पर हल्ला मचाने वाले एनजीओ करते हैं सबसे ज्यादा सौदेबाजी

- विकास को लेकर लोगों की दोहरी मानसिकता पर आरबीएसई के चेयरमैन ने उठाए तीखे सवाल
कोटा। राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष हनुमान सिंह राठौड़ ने विकास को लेकर अपनाए जाने वाले दोहरे मापदंडों पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने बीकानेर के खेजड़ी बचाओ आंदोलन से लेकर घड़साना के किसान आंदोलन तक को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा कि सोलर प्लांटों के लिए जमीन बेचने वाले ही खेजड़ी बचाने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। इतना ही नहीं पर्यावरण बचाने के नाम पर काम कर रहे एनजीओ सबसे ज्यादा सौदेबाजी करते हैं।
विकसित भारत का खाका खींचने के लिए कोटा में आयोजित राजस्थान भूगोल परिषद के राष्ट्रीय सम्मेलन के मुख्य अतिथि एवं राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष हनुमान सिंह राठौड़ ने पर्यावरण संरक्षण के नाम पर चल रहे स्वयं सेवी संगठनों के आंदोलनों को विकास के रास्ते की सबसे बड़ी बाधा बताया।
राजस्थान भूगोल परिषद के राष्ट्रीय सम्मेलन के उदघाटन सत्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि एक तरफ तेजी से ऊर्जा की खपत बढ़ रही है, लेकिन वहीं दूसरी ओर ऊर्जा उपलब्ध कराने वाले प्राकृतिक संसाधन पेट्रोल और कोयला खत्म हो रहे हैं। ऐसे में वैकल्पिक ऊर्जा की तरफ बढ़ना एकमात्र विकल्प बचता है। सौर ऊर्जा के लिए हमारे पास पर्याप्त साधन और संसाधन उपलब्ध हैं, लेकिन जैसे ही हम सोलर प्लांट लगाने की बात करते हैं तो जमीन की जरूरत पड़ती है और जमीन के लिए जैसे ही जैसलमेर, बीकानेर और बाड़मेर जाते हैं, तो वहां खेजडी और खजूर खड़े हो जाते हैं।

अब कंट्रोवर्सी यह है कि जो लोग सोलर प्लांट लगाने के लिए अपने खेत-जमीन बेच रहे हैं, वही लोग आंदोलन कर रहे हैं खेजड़ी बचाने के लिए। ऊपर से कहते हैं विकास लाओ। वही लोग पूरा इन्वेस्टमेंट ठप कर रहे हैं। ऐसे में सोलर पार्क लगाने के लिए दूसरा इन्वेस्टर कहां से आएगा राजस्थान में..?
उन्होंने कहा कि हमारे पास ऐसी तकनीकी मौजूद हैं जो हजार साल पुराने पेड़ को भी एक जगह से ले जाकर दूसरी जगह स्थापित कर सकती हैं, लेकिन यह लोग उस तकनीकी की बात नहीं करते, क्योंकि उस तकनीकी की नहीं उन्हें तो बार्गेनिंग की बात करनी है।
आरबीएसई के चेयरमैन एचएस राठौड़ ने आगे कहा कि आजकल जितने एनजीओ बने हैं पर्यावरण के नाम पर अधिकांश सौदेबाजी करने वाले हैं। विकास को रोककर उसमें से किस प्रकार से अपना हित संबंध बनाए जा सकें, वो करते हैं।
उन्होंने कहा कि इस समय देश में दोहरी मानसिकता का माहौल बनाया जा रहा है। एक तरफ लोगों को विकास चाहिए, लेकिन दूसरी तरफ उसके लिए जरूरी संसाधन वह देने को तैयार नहीं हैं। वह चाहते हैं कि यह संसाधन भी कोई और ही दे।
उन्होंने कहा कि लोगों को नेटवर्क तो पूरा चाहिए, लेकिन वह यह भी चाहते हैं कि मोबाइल टॉवर उनके मुहल्ले में न लगे। इन सभी वजहों से आंदोलन हो रहा है राजस्थान में। आप जिसे विकास कहते हैं वह विकास भी आप चाहते हैं और उस विकास को बनाने के लिए जिन-जिन माध्यमों की आवश्यक्ता है वह भी आप नहीं देना चाहते यह विचारधारा बन गई है।
एथोनॉल तो चाहिए लेकिन फेक्ट्री कहीं और लगे। पानी चाहिए, उसके लिए नहर होनी चाहिए, लेकिन नहर बनाने के लिए खेत जमीन मेरी नहीं किसी और की ली जानी चाहिए। ऐसा कैसे संभव हो सकता है।
राठौड़ ने कहा कि हमें सतत और समावेशी विकास की ओर बढ़ना होगा। ऐसा विकास जिसमें सभी का हित शामिल हो। जो तत्कालिक समस्याओं का समाधान नहीं, पीढियों तक को लाभान्वित कर सके।
इस दौरान कोटा विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. बीपी सारस्वत, राजस्थान भूगोल परिषद के अध्यक्ष प्रो. संतोष आनंद, महासचिव प्रो. एसएस भट्ट, प्रो. एचएस शर्मा, प्रो. बीएल शर्मा, प्रो. घनश्याम शर्मा, प्रो. भवानी सिंह, प्रो. सुबोध कुमार, डॉ. आलोक चौहान, डॉ. कपिल गौतम, प्रो. जेपी शर्मा, डॉ. केआर चौधरी सहित बड़ी संख्या में देश भर से आए भूगोल के शोधार्थी एवं शिक्षक मौजूद थे।







