प्रेरणाः एक शिक्षक जिसने अपने पुरखों को कर दिया “अमर”

आप अपने पुरखों को कैसे याद रखते हैं, यह बेहद निजी फैसला हो सकता है। लेकिन दुनिया उन्हें कैसे याद करे यह न सिर्फ आप तय करते हैं, बल्कि आपका व्यक्तित्व और कृतित्व दोनों मिलकर सुनिश्चित करते हैं।
विश्व की सभी प्रचीन सभ्यताओं में पूर्वजों की स्मृतियों को सहेजकर रखने और खास अवसरों पर उनका स्मरण करने की परंपरा रही है। भारतीय संस्कृति में यह परंपरा निजी स्मृतियों और संस्मरणों से कुछ आगे की यात्रा तय करती दिखाई देती है। इतिहास गवाह है कि पुरखों की निशानियां संभालकर रखने के लिए भारतीयों को विशेषतौर पर पहचाना जाता है। इतना ही नहीं जब यह स्मृतियां जन कल्याण का हिस्सा बन जाती हैं तो पूर्वजों की थाथी पुनर्जीवित हो उठती है। भारतीय परंपराओं का जनकल्याण से बेहद करीब का रिश्ता रहा है। यही वजह है कि जब-जब पूर्वजों का जिक्र छिड़ा कहीं बाबड़ियां, कहीं तालाब तो कहीं धर्मशालाएं तामीर हो उठीं।
भारतीय समाज का तानाबाना बेहद मजबूती से गढ़ा गया है। विश्व का शायद एकमात्र समाज होगा जिसने शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है। यही वजह है कि पूर्वजों की स्मृतियों को चिरकाल के लिए स्थाई बनाने की जब भी चाह उभरी, हमने शैक्षणिक प्रोत्साहन की राह चुनी। स्कूलों की स्थापना से लेकर भावी संततियों को उच्च और श्रेष्ठ शिक्षा प्रदान करने के लिए सामर्थनुसार वजीफों और पारतोषिकों का चलन शुरू हुआ। नाम लेना उचित न होगा, लेकिन भारत वर्ष का बच्चा बच्चा जानता है कि तमाम ऐसी विभूतियां आर्थिक और सामाजिक बेड़ियों को तोड़कर इन शिक्षण संस्थाओं, वजीफों और पारितोषिकों के कारण राष्ट्रीय ही नहीं अंतररार्ष्ट्रीय पटल पर खूब चमकीं।
शिक्षक का पुत्र जब शिक्षक बनता है तो उसकी अभिलाषा यही होती है कि कोई भी शिक्षा से वंचित न रहने पाए। जो सक्षम नहीं हैं उनकी आर्थिक मदद की जा सके और जो काबिल हैं उन्हें पुरस्कृत कर सम्मानित मंच दिया जा सके।
खेती किसानी पर निर्भर परिवार के बच्चों के लिए 60-70 के दशक में उच्च शिक्षा किसी सपने से कम न थी। रजनीश चंद्र अग्निहोत्री ने खुद के बूते न सिर्फ अपने इस सपने को पूरा किया बल्कि, वर्ष 1970 में कानपुर यूनिवर्सिटी से एमएससी जुलॉजी में टॉप कर गोल्डमैडेल भी हासिल किया। विज्ञान के क्षेत्र में कुछ कर दिखाने के सुनहरे अवसर अब उनका दरवाजा खटखटा रहे थे, लेकिन रजनीश चंत्र अग्निहोत्री ने पद, पैसा और सम्मान तीनों को परे धकेल शिक्षा की अलख जगाने का संकल्प लिया। उन्होंने अवसरों से वंचित भावी भविष्य को गढ़ने के लिए शिक्षक बनने की राह चुनी। हालांकि उनके सहपाठी और शिक्षक इस फैसले से बेहद नाराज थे। बावजूद उसके रजनीश का फैसला मील का पत्थर साबित हुआ।
पहले शिक्षक और फिर प्रधानाचार्य के रूप में उन्होंने न सिर्फ अपनी जिम्मेदारियों का सफलता पूर्वक निर्वहन किया, बल्कि यूपी के तराई के इलाके में लखीमपुर खीरी से लेकर हरदोई तक उनकी ख्याति फीस देने वाले मास्साब के तौर पर फैल गई। अपनी तनख्वाह से वह आर्थिक और सामाजिक रूप से वंचित समाज के बच्चों की न सिर्फ फीस भरते, बल्कि उनके लिए स्लेट-खड़िया से लेकर कलम-दवात और किताब कॉपियों तक का बंदोबस्त करते। परीक्षाओं के दिनों में तो उनका घर चलता फिरती धर्मशाला हो जाता। दर्जनों बच्चे उनके घर में ही डेरा डाले रहते।
रजनीश चंद्र अग्निहोत्री ने सिर्फ सामाजिक सरोकारों को ही जीवंत नहीं किया, बल्कि अपने परिवार को भी सरोकार और संस्कारों से भर दिया। जिस दौर में महिला शिक्षा अकल्पनीय लगने लगी थी खास तौर पर ग्रामीण अंचल में उन्होंने अपनी पत्नी बिंदेश्वरी अग्निहोत्री को उच्च शिक्षा के लिए प्रेरित किया। बिंदेश्वरी के सिर पर सिर्फ उनके तीन बच्चों महेंद्र, सुबोध और अनूप की ही जिम्मेदारी न थी, उनके पति की जगाई शिक्षा की अलख के कारण उनका घर बच्चों से हमेशा भरा रहता। जिनके लालन-पालन के साथ-साथ पठन-पाठन का आधारभूत कार्य भी वही संभालती। बावजूद इसके उन्होंने हिंदी में स्नातकोत्तर तक शिक्षा हासिल करने में सफलता पाई।
उच्च शिक्षित और समाज को समर्पित माता-पिता के सेवा कर्मों का फल था जो रजनीश और बिंदेश्वरी के तीनों बच्चों ने न सिर्फ उच्च शिक्षा प्राप्त की, बल्कि पिता की राह पर चलते हुए शिक्षा क्षेत्र में अपनी पहचान स्थापित की। उनके बड़े पुत्र डॉ. महेंद्र अग्निहोत्री लखनऊ विश्वविद्यालय में फिजिक्स के प्रोफेसर हैं। वहीं मंझले पुत्र डॉ. सुबोध अग्निहोत्री राजस्थान के इकलौते मुक्त विश्वविद्यालय वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय कोटा में पत्रकारिता विभाग के निदेशक एवं प्रोफेसर हैं। प्रोफेसर सुबोध ने शिक्षण क्षेत्र में ही नहीं पत्रकारिता में भी अपना कलम का लोहा मनवाया है। वह बीबीसी के बेस्ट यंग रिपोर्टर जैसे अवार्डों से नवाजे जा चुके हैं। जबकि छोटे बेटे अनूप अग्निहोत्री दिल्ली की एक अंतरराष्ट्रीय कंपनी में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं।
जहां चाह, वहां राह
वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय (वीएमओयू) आने के बाद प्रोफेसर सुबोध अग्निहोत्री इस बात से खासे परेशान थे कि तमाम सुविधाएं होने के बावजूद विश्वविद्यालय में छात्र संख्या बेहद कम क्यों हैं? भारतीय विश्वविद्यालय संघ (एआईयू) के चेयरमैन और तत्कालीन कुलपति प्रो. विनय पाठक के समक्ष अपनी चिंता जाहिर की तो प्रो. पाठक इस समस्या के समाधान के लिए कई नवाचारों पर विमर्श करने लगे। वीएमओयू में छात्र संख्या बढ़ाने के लिए प्रो. पाठक ने दाखिला प्रक्रिया को आसान बनाने के साथ-साथ मेधावी विद्यार्थियों को प्रोत्साहित करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया। प्रो. विनय पाठक और प्रो. सुबोध अग्निहोत्री, डॉ. पातांजलि मिश्र, एसबी सिंह और सौरभ पांडे के साथ-साथ उनकी पूरी टीम ने सबसे पहले पूरे राजस्थान में बच्चों को घर बैठे आसान तरीके से दाखिला देने का रास्ता निकाला। इसके बाद पाठ्य सामग्री को डिजिटलाइज करने और परीक्षा परिणामों में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों के लिए नए पदक दिए जाने की शुरुआत की।
पुरखों को कर दिया “अमर”
प्रो. विनय पाठक की प्रेरणा और मार्गदर्शन ने प्रो. सुबोध को एक नई राह दिखाई। ऐसी राह जिस पर चल कर उन्होंने अपने पुरखों को हमेशा के लिए अमर कर दिया। दरअसल हुआ यह कि प्रो. पाठक ने मेधावी विद्यार्थियों को पुरुस्कृत करने की जो योजना शुरू की वह आर्थिक भंवर में फंसती दिखाई दी। दीक्षांत समारोह में मेधावी छात्रों को सम्मानित करने के लिए विशिष्ट पदक दिए जाने थे। एक बार शुरू हुआ यह नवाचार आगे चलकर कहीं बंद न हो जाए इसलिए एक लाख रुपए प्रति पदक विश्वविद्यालय के विशेष खाते में जमा करवाया जाना था। जिसके ब्याज से हर वर्ष पदक एवं प्रमाण पत्र का खर्चा उठाया जाता।
मामला फंसता देख प्रो. सुबोध अग्निहोत्री ने एक नहीं बल्कि दीक्षांत समारोह में दो विशिष्ट पदक दिए जाने की राह बना दी। रजनीश और बिंदेश्वरी के पुत्रों प्रोफेसर महेंद्र, प्रोफेसर सुबोध और अनूप अग्निहोत्री ने तय किया कि उनकी दिवंगत माताजी स्वर्गीय श्री बिंदेश्वरी अग्निहोत्री के नाम से मास्टर ऑफ जर्नलिज्म ( पत्रकारिता में स्नातकोत्तर) के टॉपर को विशिष्ट पदक प्रदान किया जाएगा। जिसका समस्त खर्च वह लोग उठाएंगे। आनन-फानन मे एक-सवा लाख रुपए जमा कर दिए गए।
सुबोध अग्निहोत्री यहीं न रुके। जब उनके विषय में स्नातकोत्तर स्तर पर अव्वल आने वाले विद्यार्थी को कुलपति और कुलाधिपति के हाथों से विशिष्ट मैडेल पहनाया जाएगा तो फिर स्नातक के टॉपर को क्यों नहीं…? इसी संकल्प के साथ उन्होंने अपने मौसेरे भाई और अंतरराष्ट्रीय दवा कारोबारी अश्विनी त्रिपाठी की रजामंदी लेकर अपने मौसाजी की स्मृति में बैचलर ऑफ जर्नलिज्म (पत्रकारिता में स्नातक) के टॉपर के लिए स्वर्गीय करुणा शंकर त्रिपाठी विशिष्ट पदक की शुरुआत की करवाई। दरअसल अश्विनी भी अपनी मौसी पास रहकर पढ़े बढ़े हैं। तो भाइयों और परिवार का यह प्रेम और लगाव यहां भी साथ हो लिया।
ऐतिहासिक साबित हुआ कदम
प्रो. विनय पाठक की इच्छा शक्ति का ही परिणाम था जो वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय में मेधावी विद्यार्थियों को प्रेरित करने के लिए ऐसे ऐतिहासिक कदम उठाए जा सके। वीएमओयू पत्रकारिता विभाग द्वारा वर्ष 2014 में एमजे और बीजे के टॉपर विद्यार्थियों के लिए पुरस्कार योजना की शुरुआत हुई। हालांकि साल 2019 के पाद बाद से एमजे के लिए दिए जाने वाले मेडल तकनीकी कारणों से नहीं दिया जा रहा है क्योंकि कोर्स स्थगीत चल रहा है। जबकि बीजे का मेडल लगातार दिया जा रहा है। इन पदकों से पत्रकारिता के विद्यार्थियों को नई पहचान और प्रेरणा मिल रही है। इन दोनों मेडल के लिए विवि में एक-एक लाख एक हज़ार रुपए की धनराशि की एफडी करवाई गई थी जिसके ब्याज से पदक तैयार किए जाते हैं। इस नावाचार का नतीजा यह निकला कि न सिर्फ विश्वविद्यालय में छात्र संख्या बढ़ी बल्कि राजस्थान ही नहीं देश भर से विद्यार्थी दाखिला लेने आने लगे। देश का शायद ही कोई ऐसा विश्वविद्यालय या संस्थान होगा जिसमें पत्रकारिता का पाठ्यक्रम पढ़ाया जाता हो और वहां वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय में पढ़ा हुआ छात्र या छात्रा शिक्षक न हो।









