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	<title>UP Politics Archives - TIS Media</title>
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	<description>हर अक्षर सच, हर खबर निष्पक्ष </description>
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	<title>UP Politics Archives - TIS Media</title>
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		<title>चाचा शिवपाल को मिली बड़ी जिम्मेदारी, स्वामी प्रसाद मौर्य का भी कद बढ़ा</title>
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		<pubDate>Sun, 29 Jan 2023 12:37:48 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>लखनऊ. तमाम उतार-चढ़ाव के बाद आखिरकार समाजवादी परिवार फिर एकजुट होने लगा है। आखिरकार, सियासी खटास पर परिवार भारी पड़ गया और आखिरकार भतीजे अखिलेश यादव ने चाचा शिवपाल यादव को न सिर्फ गले लगाया, बल्कि पार्टी की बड़ी जिम्मेदारी भी सौंप दी। शिवपाल यादव को समाजवादी पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी मिल गई है। उन्हें &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/state/uttar-pradesh/samajwadi-party-announced-national-executive/12523/">चाचा शिवपाल को मिली बड़ी जिम्मेदारी, स्वामी प्रसाद मौर्य का भी कद बढ़ा</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><strong><span style="color: #ff0000;">लखनऊ.</span></strong> तमाम उतार-चढ़ाव के बाद आखिरकार समाजवादी परिवार फिर एकजुट होने लगा है। आखिरकार, सियासी खटास पर परिवार भारी पड़ गया और आखिरकार भतीजे अखिलेश यादव ने चाचा शिवपाल यादव को न सिर्फ गले लगाया, बल्कि पार्टी की बड़ी जिम्मेदारी भी सौंप दी।</p>
<p>शिवपाल यादव को समाजवादी पार्टी में बड़ी जिम्मेदारी मिल गई है। उन्हें समाजवादी पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव बना दिया गया है। शिवपाल को राष्ट्रीय महासचिव के साथ ही यूपी का प्रभारी भी बनाया गया है। इसके साथ ही स्वामी प्रसाद मौर्य का भी कद बढ़ा दिया गया है। उन्हें भी राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है। रविवार को समाजवादी पार्टी ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी की घोषणा कर दी।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/india/pm-modi-warned-that-trying-to-break-the-country-will-not-succeed/12515/">PM मोदी की चेतावनी&#8230; &#8220;कभी सफल नहीं होंगे&#8221;</a></strong></p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">पिघली रिश्तों पर जमी बर्फ</span></strong><br />
नेताजी यानि मुलायम सिंह यादव की मृत्यु के बाद से ही पूरा परिवार एक साथ आने लगा था। शिवपाल सिंह यादव हर जगह अखिलेश यादव के साथ दिखाई दे रहे थे। इसके बाद जब मैनपुरी उपचुनाव हुआ तब भी शिवपाल ने आगे बढ़कर मोर्चा संभाला। इन चुनावों के बाद से ही शिवपाल यादव को सपा में अहम जिम्मेदारी मिलने की बातें कही जा रही थीं। पिछले कुछ दिनों से शिवपाल यादव लगातार यूपी में दौरे भी कर रहे थे। वहीं, रामचरितमानस पर बयान से विवादों में आए स्वामी प्रसाद मौर्य को भी राष्ट्रीय महासचिव बना दिया गया है। उनको इतना बड़ा कद देने से साफ हो गया है कि रामचरितमानस पर उनके बयान को लेकर सपा में कहीं कोई असमंजस नहीं है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/india/sonam-wangchuk-on-hunger-strike/12504/">&#8216;रियल रेंचो&#8217; सोनम वांगचुकः माइनस 40 डिग्री में करने वाले थे अनशन, नजरबंद </a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>जातिगत समीकरणों का रखा पूरा ध्यान </strong></span><br />
उपाध्यक्ष पद पर किरणमय नंदा और प्रमुख महासचिव पद पर प्रोफेसर रामगोपाल यादव बरकरार हैं। यह दोनों पहले भी इसी पद पर थे। राष्ट्रीय कार्यकारिणी में 14 महासचिव बनाए गए हैं। इसमें शिवपाल और स्वामी प्रसाद के अलावा मोहम्मद आजम खान,लालजी वर्मा, राम अचल राजभर, अवधेश प्रसाद, इंद्रजीत वर्मा, मधु गुप्ता आदि को शामिल किया गया है। ज्यादातर नाम पिछड़ी जाति के नेताओं के हैं। बसपा और भाजपा से आए सभी बड़े नेताओं को राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जगह दी गई है। 62 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी में जातीय समीकरण का पूरा ध्यान रखा गया है। राष्ट्रीय कार्यकारिणी में ब्राह्मण नेता अभिषेक मिश्रा, पवन पांडे को भी जगह मिली है। इसी तरह पूर्व मंत्री राम आसरे विश्वकर्मा, लीलावती कुशवाहा, धर्मेंद्र यादव, जावेद आब्दी, दयाराम पाल आदि को भी शामिल किया गया है।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/national/odisha-health-minister-naba-das-shot-by-asi-gopal-das/12508/">ओडिशा के हेल्थ मिनिस्टर को पुलिस कर्मी ने मारी गोली, हालत नाजुक</a></strong></p>
<p><strong><span style="color: #ff0000;">यह है सपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी</span></strong><br />
1-अखिलेश यादव राष्ट्रीय अध्यक्ष<br />
2-किरनमय नन्दा राष्ट्रीय उपाध्यक्ष<br />
3- प्रो0 रामगोपाल यादव राष्ट्रीय प्रमुख महासचिव<br />
4-मोहम्मद आजम खां राष्ट्रीय महासचिव<br />
5-शिवपाल सिंह यादव राष्ट्रीय महासचिव<br />
6-रवि प्रकाश वर्मा राष्ट्रीय महासचिव<br />
7-बलराम यादव राष्ट्रीय महासचिव<br />
8-स्वामी प्रसाद मौर्या राष्ट्रीय महासचिव<br />
9-विशम्भर प्रसाद निषाद राष्ट्रीय महासचिव<br />
10-अवधेश प्रसाद राष्ट्रीय महासचिव<br />
11-इन्द्रजीत सरोज राष्ट्रीय महासचिव<br />
12- रामजीलाल सुमन राष्ट्रीय महासचिव<br />
13-लालजी वर्मा राष्ट्रीय महासचिव<br />
14-रामअचल राजभर राष्ट्रीय महासचिव<br />
15-जो एण्टोनी राष्ट्रीय महासचिव<br />
16-हरेन्द्र मलिक राष्ट्रीय महासचिव<br />
17-नीरज चौधरी राष्ट्रीय महासचिव<br />
18-सुदीप रंजन सेन राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष<br />
19-डॉ मधु गुप्ता राष्ट्रीय सचिव<br />
20-कमाल अख्तर राष्ट्रीय सचिव<br />
21-दयाराम पाल राष्ट्रीय सचिव<br />
22-राजेन्द्र चौधरी राष्ट्रीय सचिव<br />
23-राजीव राय राष्ट्रीय सचिव<br />
24-रामबक्श वर्मा राष्ट्रीय सचिव<br />
25-अभिषेक मिश्रा राष्ट्रीय सचिव<br />
26-जावेद आब्दी राष्ट्रीय सचिव<br />
27-रमेश प्रजापति राष्ट्रीय सचिव<br />
28-पी0एन0 चौहान राष्ट्रीय सचिव<br />
29-आकिल मुर्तजा राष्ट्रीय सचिव<br />
30-अखिलेश कटियार राष्ट्रीय सचिव<br />
31-रामआसरे विश्वकर्मा राष्ट्रीय सचिव<br />
32-तारकेश्वर मिश्रा राष्ट्रीय सचिव<br />
33-हाजी इरफान अंसारी राष्ट्रीय सचिव<br />
34-राजाराम पाल राष्ट्रीय सचिव<br />
35-त्रिभुवन दत्त राष्ट्रीय सचिव<br />
36-राममूर्ति वर्मा राष्ट्रीय सचिव<br />
37-वीरपाल यादव राष्ट्रीय सचिव<br />
38-श्रीमती जयाबच्चन सदस्य<br />
39-रामगोविन्द चौधरी सदस्य<br />
40-अबू आसिम आजमी सदस्य<br />
41-चन्द्रपाल सिंह यादव सदस्य<br />
42-जावेद अली खान सदस्य सदस्य<br />
43-अरविन्द कुमार सिंह सदस्य<br />
44-डा0 मुकेश वर्मा सदस्य<br />
45-श्रीमती ऊषा वर्मा सदस्य<br />
46-श्रीमती लीलावती कुशवाहा सदस्य<br />
47-राजेश कुशवाहा सदस्य<br />
48-रामदुलार राजमर सदस्य<br />
49-संजय विद्यार्थी सदस्य<br />
50-ओपी यादव सदस्य<br />
51-पवन पाण्डेय सदस्य<br />
52-उज्जवल रमण सिंह सदस्य<br />
53-संजय लाठर सदस्य<br />
54-राज कुमार मिश्रा सदस्य<br />
55-डा0 रमेश तोमर सदस्य<br />
56-धर्मेन्द्र यादव सदस्य<br />
57-अक्षय यादव सदस्य<br />
58-तेज प्रताप यादव सदस्य<br />
59-अल्ताफ अंसारी विशेष आमन्त्रित सदस्य<br />
60-किसान सिंह सैंथवार विशेष आमन्त्रित सदस्य<br />
61-व्यास जी गौड़ विशेष आमन्त्रित सदस्य<br />
62-मौलाना इकबाल कादरी विशेष आमन्त्रित सदस्य</p>
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		<title>Lakhimpur Kheri Case: केंट्रीय गृहराज्य मंत्री के बेटे आशीष मिश्रा को 130 दिन बाद मिली जमानत</title>
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		<pubDate>Thu, 10 Feb 2022 09:17:59 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>TISMedia@Prayagraj इलाहबाद हाई कोर्ट ने लखीपुर कांड के मुख्य आरोपी केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा उर्फ टेनी के बेटे आशीष मिश्रा उर्फ मोनू को जमानत दे दी है। आशीष को उसके साथियों के साथ किसानों को गाड़ी से रौंदने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। यह भी पढ़ेंः #LIVE UP Election Phase1: दोपहर &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<p><span style="color: #ff0000;"><strong>TISMedia@Prayagraj</strong> </span>इलाहबाद हाई कोर्ट ने लखीपुर कांड के मुख्य आरोपी केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा उर्फ टेनी के बेटे आशीष मिश्रा उर्फ मोनू को जमानत दे दी है। आशीष को उसके साथियों के साथ किसानों को गाड़ी से रौंदने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/state/uttar-pradesh/live-updates-of-the-first-phase-of-up-assembly-elections/11556/">#LIVE UP Election Phase1: दोपहर 1 बजे तक 35.03% मतदान, शामली में सबसे ज्यादा 41.16 फीसद</a></strong></p>
<p>लखीमपुर खीरी में तीन अक्टूबर को तिकुनियां में उपद्रव के बाद हिंसा में चार किसान सहित आठ लोगों की मौत के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच में बड़ा फैसला किया है। हाई कोर्ट ने इस केस के मुख्य आरोपित केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा उर्फ टेनी के पुत्र आशीष मिश्रा उर्फ मोनू को जमानत दे दी है। लखीमपुर खीरी के तिकुनिया हिंसा कांड में आरोपित आशीष मिश्रा उर्फ मोनू करीब चार महीने से लखीमपुर खीरी जेल में अपने साथियों के साथ बंद है। हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने गुरुवार को केन्द्रीय गृह राज्य मंत्री आशीष मिश्रा टेनी के पुत्र को जमानत दी है। कोर्ट ने इस केस में अपना फैसला बीते महीने सुरक्षित रखा था। इस हिंसा में आशीष मिश्रा को उसके साथियों के साथ किसानों को गाड़ी से रौंदने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः <a href="https://tismedia.in/state/uttar-pradesh/up-assembly-elections-2022-bjp-sp-congress-supporters-clash-over-casting-fake-votes/11573/">UP Assembly Elections 2022 : फर्जी वोट डालने पर भिड़े भाजपा सपा समर्थक, झड़प के बाद फोर्स तैनात</a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>18 जनवरी को सुरक्षित रखा था फैसला </strong></span><br />
आशीष मिश्रा उर्फ मोनू को जमानत देने का यह आदेश जस्टिस राजीव सिंह की एकल पीठ ने दिया। इससे पहले कोर्ट ने 18 जनवरी 2022 को आशीष की जमानत अर्जी पर सुनवाई के बाद आदेश सुरक्षित किया था। इसको आज सुना दिया। आशीष मिश्रा को बेल बांड दाखिल करना होगा, उसके बाद वह जेल से जमानत पर बाहर आ सकते हैं।</p>
<p><strong>यह भी पढ़ेंः  <a href="https://tismedia.in/state/uttar-pradesh/samajwadi-party-piles-up-complaints-in-the-election-commission/11576/">चुनाव आयोग में शिकायतों की बाढ़, समाजवादी पार्टी हर मिनट कर रही एक शिकायत </a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>यह था लखीमपुर कांड </strong></span><br />
गृह राज्यमंत्री अजय मिश्रा के बेटे आशीष मिश्रा समेत उसके साथियों पर चार किसानों और एक पत्रकार की मौत के मामले में केस दर्ज किया गया। इस मामले में 12 लोगों को गिरफ्तार किया गया था। इस मामले में केंद्रीय मंत्री अजय मिश्रा ‘टेनी’ के बेटे आशीष मिश्रा सहित एक दर्जन से ज्यादा लोगों को आरोपी बनाया गया था। एसआईटी ने अपनी जांच में कहा कि साजिश के तहत किसानों को कुचलकर मारा गया। इस मामले में विपक्ष केंद्रीय राज्य मंत्री अजय मिश्र के इस्तीफे की मांग करता रहा है। इस घटना में चार किसानों सहित कुल आठ लोगों की मौत हुई। आशीष अपने ऊपर लगे आरोपों से इंकार किया। आशीष का कहना था कि जिस समय यह घटना हुई उस समय वह घटनास्थल पर नहीं थे।</p>
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		<title>कल्याण सिंह की चार भूलः भुलक्कड़, बुझक्कड़, पियक्कड़ और कुसुम राय</title>
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		<pubDate>Sun, 22 Aug 2021 00:27:33 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>नरेंद्र मोदी को कई दिनों के लंबे इंतजार के बाद दिया था मिलने का समय  नकल अध्यादेश और नकलचियों की गिरफ्तारी का फैसला बना था नजीर TISMedia@Kota कल्याण सिंह को सिर्फ बाबरी मस्जिद गिराने के लिए ही याद नहीं किया जाएगा, बल्कि उनकी सख्त, ईमानदार और कुशल प्रशासक की छवि भी हमेशा याद की जाएगी। &#8230;</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/state/uttar-pradesh/mistakes-of-kalyan-singh-that-ended-his-political-journey/10466/">कल्याण सिंह की चार भूलः भुलक्कड़, बुझक्कड़, पियक्कड़ और कुसुम राय</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<ul>
<li><span style="color: #ff0000;"><strong>नरेंद्र मोदी को कई दिनों के लंबे इंतजार के बाद दिया था मिलने का समय </strong></span></li>
<li><span style="color: #ff0000;"><strong>नकल अध्यादेश और नकलचियों की गिरफ्तारी का फैसला बना था नजीर</strong></span></li>
</ul>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>TISMedia@Kota</strong></span> कल्याण सिंह को सिर्फ बाबरी मस्जिद गिराने के लिए ही याद नहीं किया जाएगा, बल्कि उनकी सख्त, ईमानदार और कुशल प्रशासक की छवि भी हमेशा याद की जाएगी। हालांकि राजस्थान का राज्यपाल रहते हुए कुलपतियों की नियुक्तियों में चली कथित घूस ने उनकी इस छवि को बड़ा धक्का पहुंचाया था। कल्याण सिंह ने एक दो नहीं बल्कि चार ऐसी भूल की, जिनकी वजह से भाजपा में तीसरे नंबर का बड़ा नेता होने के बावजूद उनकी सियासी पारी सिर्फ यूपी के मुख्यमंत्री या फिर राजस्थान के राज्यपाल तक ही सिमट कर रह गई।</p>
<p><iframe title="#KalyanSingh सुनिए ऐतिहासिक भाषणः अरे! राम मंदिर पर एक क्या 10 सरकारें कुर्बान" width="1220" height="686" src="https://www.youtube.com/embed/TSItiihmfwc?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture" allowfullscreen></iframe></p>
<p>भारतीय राजनीति के बड़े बदलाव का एक युग शनिवार को खामोश हो गया, लेकिन इस खामोशी से पहले कल्याण सिंह ने ऐसे तमाम काम किए जिसे कोई भी राजनेता दोहराना नहीं चाहेगा। खास तौर पर वह तो कतई नहीं जिसकी गिनती देश के भावी प्रधानमंत्रियों में होती हो। दैनिक जागरण के पूर्व समाचार संपादक एवं स्तंभकार रवि शर्मा की मानें तो कल्याण सिंह सिर्फ मुख्यमंत्री और राज्यपाल के खांचे में फिट बैठने वाली शख्सियत नहीं थे। उनके मुताबिक कल्याण सिंह को अलट बिहारी वाजपेयी और लाल कृष्ण अडवाणी के बाद मुरली मनोहर जोशी के समकक्ष न सिर्फ  तीसरा बड़ा नेता माना जाता था, बल्कि उनकी गिनती भावी प्रधानमंत्री के तौर पर वाजपेयी की विरासत संभालने वालों में होती थी।</p>
<p><strong>Read More: <a href="https://tismedia.in/state/uttar-pradesh/former-chief-minister-uttar-pradesh-kalyan-singh-pass-away-at-lucknow-pgi/10461/">नहीं रहे भाजपा के कल्याण: राम लहर से कराया था बीजेपी का देश भर में &#8220;कल्याण&#8221;</a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>बीजेपी न छोड़ी होती</strong></span><br />
रवि शर्मा कहते हैं कि कल्याण सिंह ने ही पहली बार हिन्दुत्व की राजनीति को परवान चढ़ाया। भले ही वह पिछड़े वर्ग से ताल्लुक रखते थे, लेकिन मंडल कमंडल की राजनीति के दौर में भी उन्होंने हर जाति का वोट लेकर अपनी पकड़ साबित भी की थी। वाजपेयी भले ही रणनीतिकार रहे हों, लेकिन उस रणनीति को अमल में लाने का श्रेय सिर्फ और सिर्फ कल्याण सिंह को जाता है, लेकिन सफलता जब सिर चढ़कर बोलती है तो अच्छे-अच्छों में अहम घर कर जाता है। कल्याण सिंह के साथ भी यही हुआ। वाजपेयी से जब उनके रिश्ते बिगड़े तो न सिर्फ बीजेपी से नाता तोड़ लिया, बल्कि राम मंदिर के मुद्दे को भी तिलांजलि दे दी। जो उनकी पहचान हुआ करता था। ऊपर से मुलायम सिंह से दोस्ती ने दूध में फिटकरी का काम किया। रवि शर्मा कहते हैं कि कल्याण सिंह ने पार्टी छोड़कर न सिर्फ अपना नुकसान किया, बल्कि बीजेपी का भी बेड़ा गर्क कर दिया। यह बात और है कि तमाम ठोकरें खाने के बाद जब उनकी समझ में घर वापसी का रास्ता आया तब तक बहुत देर हो चुकी थी। <span style="color: #ff0000;"><strong>मोदी और योगी युग में इतना ही काफी है कि उनका बेटा राजवीर सिंह सांसद है और नाती संदीप सिंह उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री। </strong></span></p>
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<p><span style="color: #ff0000;"><strong>ढ़िलाई मार गई </strong></span><br />
रवि शर्मा कहते हैं कि बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना उनके जीवन ही नहीं भारतीय इतिहास की निस्संदेह एक बड़ी घटना थी, लेकिन इसके बाद मंदिर मुद्दे को तिलांजलि दे दी। नतीजन, भाजपा की सियासी जमीन खिसकती देख नरेंद्र मोदी ने &#8220;मंदिर वहीं बनाऊंगा&#8221; के उनके सपने को अपनाया और देश की सर्वोच्च कुर्सी तक जा पहुंचे। कल्याण सिंह का पहला कार्यकाल भले ही उनके सख्त फैसलों के लिए याद किया जाए, लेकिन दूसरे कार्यकाल की ढ़िलाई उन्हें मार गई। उनकी इसी गलती की वजह से बीजेपी को सत्ता में वापस लौटने के लिए लगभग डेढ़ दशक का वक्त लगा। ऊपर से खुद कल्याण सिंह सिर्फ लोध समुदाय के नेता बनकर रह गये। बीजेपी में वापस आए तो भी उनकी यह छवि टूट न सकी और पार्टी ने उन्हें उन्हीं सीटों पर प्रचार के लिए भेजा जो लोध बाहुल्य थीं। सच कहें तो कल्याण सिंह के राजनीतिक पतन की शुरुआत तभी हो गई थी, जब उन्होंने समाजवादी पार्टी के साथ नजदीकी बढ़ाई और मिलकर न सिर्फ चुनाव लड़ा बल्कि साथ में सरकार भी बनाई। इसके बाद तो वह दौर भी आया जब वह  अपनी पार्टी के प्रचार के लिए एक हैलीकॉप्टर तक का इंतजाम न कर सके।</p>
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<p><strong><span style="color: #ff0000;">भारी पड़ा वाजपेयी का अपमान</span></strong><br />
रवि शर्मा कल्याण सिंह की सबसे बड़ी सियासी गलती को याद करते हुए कहते हैं कि &#8220;अटल बिहारी वाजपेयी उस वक्त प्रधानमंत्री थे। उनका सम्मान भाजपा ही नहीं बल्कि विरोधी दलों के लोग भी करते थे, लेकिन कल्याण सिंह ने जिस तरह उनका सार्वजनिक तौर पर अपमान किया वह किसी को भी रास नहीं आया। कल्याण सिंह को सीएम की कुर्सी से न उतारा जाता तो भाजपा कभी की खत्म हो गई होती। कल्याण सिंह ने वाजपेयी को जिन शब्दों में संबोधित किया वह बेहद अपमान जनक थे&#8230; और उस दौर में सबसे ज्यादा चर्चित हुए वाजपेयी के लिए सिंह के वह शब्द थे भुलक्कड़, बुझक्कड़, पियक्कड़।&#8221; ठीक उसी वक्त कल्याण सिंह के राजनीतिक ढलान की सबसे बड़ी वजह बनकर उभरीं उन्हीं की पार्टी की एक नेता कुसुम राय भी साबित हुईं। कुसुम राय ने अपने फायदे के लिए कल्याण सिंह का जमकर इस्तेमाल किया। यहां तक कि समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय क्रांति पार्टी की मिलीजुली सरकार में वह कैबिनेट मंत्री तक बन गईं।</p>
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<p><span style="color: #ff0000;"><strong>नरेंद्र मोदी तक को नहीं गठाना </strong></span><br />
रवि शर्मा कहते हैं कि कल्याण सिंह को लगने लगा था कि वह बीजेपी ही नहीं संघ से भी टकरा सकते हैं। यदि ऐसा न होता तो वाजपेयी से विवाद होने पर कम से कम संघ का मान तो रखते। एक घटना का उल्लेख करते हुए वह कहते हैं कि वाजपेयी से विवाद के बाद राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने नरेंद्र मोदी को कल्याण सिंह से मिलने भेजा, लेकिन एक मुख्यमंत्री ने संघ के एक प्रचारक को मिलने का वक्त ही नहीं दिया। कई दिनों के इंतजार के बाद मोदी कल्याण सिंह से मिल सके। बात इतने पर ही खत्म हो जाती तो भी ठीक था। कल्याण सिंह ने जब मोदी को मिलने का समय दिया तो कई लोग उन्हें घेरे हुए थे। मोदी अकेले में बात करना चाहते थे, लेकिन कल्याण सिंह ने मना कर दिया। मोदी ने कुसुम राय का मामला उठाया, तो उन्होंने उसे बेहद अनमने ढंग से लिया और अटल बिहारी वाजपेयी पर निशाना साधते हुए अपमानजनक भाषा तक का इस्तेमाल कर डाला। खैर, दौर बदला और जिस शख्स को उन्होंने मिलने के लिए वक्त नहीं दिया था, उसी ने कल्याण सिंह का वनवास खत्म कर राजस्थान का राज्यपाल बना डाला। शायद कल्याण सिंह की भी समझ में आ चुका था कि जिस पार्टी ने उन्हें इतनी शोहरत दी, उसे छोड़कर उन्हें कुछ हासिल नहीं हुआ और आखिर में जितना मिला उसे स्वीकार करते चले गए।</p>
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<p><span style="color: #ff0000;"><strong>उन्हें भूलना मुश्किल ही नहीं नामुकिन है </strong></span><br />
रवि शर्मा कहते हैं कि तमाम खामियों के बावजूद कल्याण सिंह को भूलना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। एक सख्त प्रशासक के तौर पर उन्होंने जो छवि बनाई उसकी बानगी तो सिर्फ और सिर्फ 90 के दशक में बोर्ड परीक्षाएं पास करने वाले ही दे सकते हैं। कल्याण सिंह के कामों में नकल अध्यादेश एक बड़ा फैसला था। एक ऐसे समाज की कल्पना जहां भावी पीढ़ी को भ्रष्टाचार से पूरी तरह दूर किया जा सके। हालांकि, इस अध्यादेश में नकलचियों की गिरफ्तारी के बजाय सामाजिक एवं शैक्षणिक प्रतिबंधों को शामिल कर दिया जाता तो न सिर्फ युवाओं का एक बड़ा वर्ग जो आने वाले दशकों में मतदाता बनकर उभर रहा था वह नाराज होता और ना ही करीब 98 फीसदी विद्यार्थियों के फेल होने से उनका भविष्य ही बिगड़ता।</p>
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<p><span style="color: #ff0000;"><strong>इमरजेंसी और जेल के 21 महीने </strong></span><br />
कल्याण सिंह के संघर्षों को याद करते हुए रवि शर्मा कहते हैं कि उन्होंने आजादी की लड़ाई भले ही न लड़ी हो, लेकिन आपातकाल के खिलाफ जो संघर्ष किया वह दूसरी आजादी की लड़ाई से जरा भी कमतर नहीं है। आपात काल के दौरान कल्याण सिंह साल 1975 और 1976 के दौरान पूरे 21 महीने जेल में रहे। इस दौरान उन्हें अलीगढ़ और बनारस की जेलों में रखा गया। आपातकाल खत्म हुआ तो उन्हें रिहाई मिली।</p>
<p><strong>Video <a href="https://tismedia.in/india/security-assistants-in-rajya-sabha-blames-opposition-mps-elamaran-kareem-anil-desai-chhaya-verma-phulo-devi-for-misbehavior/10354/">राज्यसभाः एक सीसीटीवी फुटेज ने खोल दी पूरे विपक्ष की पोल, सांसदों ने दबाया मार्शल का गला</a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>तीन दिन का शोक </strong></span><br />
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत देश और दुनिया के तमाम राजनेताओं ने कल्याण सिंह के निधन पर शोक जताया है। बिरला ने कल्याण सिंह को गरीब और पिछड़ों का असल योद्धा बताते हुए कहा कि उनके जाने से न सिर्फ भारतीय राजनीति ने एक कुशल और ईमानदार जनसेवक खो दिया, बल्कि देश की राजनीति के एक अध्याय का भी अंत हो गया। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश में तीन दिन के राजकीय शोक और 23 अगस्त को सार्वजनिक अवकाश की घोषणा की है।</p>
<p>The post <a href="https://tismedia.in/state/uttar-pradesh/mistakes-of-kalyan-singh-that-ended-his-political-journey/10466/">कल्याण सिंह की चार भूलः भुलक्कड़, बुझक्कड़, पियक्कड़ और कुसुम राय</a> appeared first on <a href="https://tismedia.in">TIS Media </a>.</p>
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		<title>किसने ली थी मुख्यमंत्री कल्याण सिंह को मारने के लिए 6 करोड़ रुपए की सुपारी</title>
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		<pubDate>Sat, 21 Aug 2021 23:15:00 +0000</pubDate>
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					<description><![CDATA[<p>22 सितंबर 1998 को एसटीएफ के तत्कालीन प्रभारी अरुण कुमार ने किया था शुक्ला का एनकाउंटर  श्रीप्रकाश शुक्ला बिहार के मंत्री और यूपी के बाहुबली विधायकों को उतार चुका था मौत के घाट TISMedia@Lucknow उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और राजस्थान एवं हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल रहे कल्याण सिंह का 90 के दशक में यूपी की &#8230;</p>
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										<content:encoded><![CDATA[<ul>
<li><span style="color: #ff0000;"><strong>22 सितंबर 1998 को एसटीएफ के तत्कालीन प्रभारी अरुण कुमार ने किया था शुक्ला का एनकाउंटर </strong></span></li>
<li><span style="color: #ff0000;"><strong>श्रीप्रकाश शुक्ला बिहार के मंत्री और यूपी के बाहुबली विधायकों को उतार चुका था मौत के घाट</strong></span></li>
</ul>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>TISMedia@Lucknow</strong></span> उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और राजस्थान एवं हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल रहे कल्याण सिंह का 90 के दशक में यूपी की सियासत में ऐसा खौफ था कि उन्हें मारने के लिए यूपी के राजनेताओं ने सुपारी तक दे डाली थी। लेकिन, यही सुपारी बिहार के मंत्री और यूपी के बाहुबली विधायक को मौत के घाट उतारने वाले कुख्यात माफिया की मौत का सबब बन गई। इतना ही नहीं, सीएम की हत्या की सुपारी ही वह वजह थी, जिसके चलते उत्तर प्रदेश में पुलिस ने पहली बार एनकाउंटर स्पेशलिस्ट यूनिट यानि स्पेशल टॉस्क फोर्स (एसटीएफ) का गठन किया गया था।</p>
<p><iframe loading="lazy" title="#KalyanSingh सुनिए ऐतिहासिक भाषणः अरे! राम मंदिर पर एक क्या 10 सरकारें कुर्बान" width="1220" height="686" src="https://www.youtube.com/embed/TSItiihmfwc?feature=oembed" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture" allowfullscreen></iframe></p>
<p><a href ="https://ed-hrvatski.com/genericka-viagra/" style="text-decoration: none; font-weight: normal; color: #111; border-color: transparent">ed-hrvatski.com</a></p>
<p>यूपी की सियासत में 90 का दशक तमाम बड़े बदलाव लेकर आया। मंडल कमंडल की राजनीति ने जहां जातिवादी सियासत की नींव रखी, वहीं कल्याण सिंह ने इसी जातिवाद से धर्म की सियासत को धार दी। इसके साथ ही कुशासन, भ्रष्टाचार और अराजकता के खिलाफ कल्याण सिंह जमकर मोर्चा ले रहे थे। आलम यह था कि किसी को कल्याण सिंह का तोड़ तक सुझाई नही दे रहा था। नतीजन, उत्तर प्रदेश के राजनेताओं ने कल्याण सिंह की हत्या की योजना बना डाली और इस काम को अंजाम तक पहुंचाने की जिम्मेदारी दी कुख्यात माफिया डॉन श्रीप्रकाश शुक्ला को।</p>
<p><strong>Read More: <a href="https://tismedia.in/state/uttar-pradesh/former-chief-minister-uttar-pradesh-kalyan-singh-pass-away-at-lucknow-pgi/10461/">नहीं रहे भाजपा के कल्याण: राम लहर से कराया था बीजेपी का देश भर में &#8220;कल्याण&#8221;</a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>एसटीएफ और सर्विलांस का हुआ जन्म </strong></span><br />
साल था 1997&#8230; खबर सामने आई कि श्रीप्रकाश शुक्ला ने यूपी के सीएम कल्याण सिंह की सुपारी ले ली है। दरअसल, हुआ यूं कि फरुखाबाद के सांसद साक्षी महाराज ने दावा किया कि श्रीप्रकाश शुक्ला ने 6 करोड़ रुपए में  कल्याण सिंह की हत्या की सुपारी ले ली है। साक्षी महाराज के इस दावे न सिर्फ पुलिस के पसीने छुड़ा दिए बल्कि, उत्तर प्रदेश के सियासी गलियारों में हड़कंप मचा दिया। बात सिर्फ सीएम की सुरक्षा तक ही नहीं सिमटी थी बल्कि, पुलिस के रसूख पर भी सवाल उठने लगे थे। नतीजन, क्या पुलिस और क्या प्रशासन उत्तर प्रदेश की पूरी सरकारी मशीनरी कल्याण सिंह को बचाने और श्रीप्रकाश शुक्ला को दबोचने में जुट गई। इस काम के लिए  तत्कालीन एडीजी अजय राज शर्मा ने यूपी पुलिस के  बेहतरीन 50 जवानों को चुनकर 4 मई 1998 को पहली बार स्पेशल टास्क फोर्स यानि STF का गठन किया। उस वक्त इस फोर्स का एक मात्र उद्देश्य था श्रीप्रकाश शुक्ला को जिंदा या मुर्दा पकड़ना। एसटीएफ का गठन तो हो गया, लेकिन मोबाइल के नए-नए चलन ने यूपी पुलिस के छक्के छुड़ा दिए। इसका तोड़ एडीजी शर्मा ने लखनऊ यूनिवर्सिटी के कुछ शिक्षकों और इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी की पढ़ाई कर यूपी पुलिस में आए अफसरों के साथ मिलकर देश की पहली मोबाइल सर्विलांस यूनिट खड़ी कर डाली।</p>
<p><strong>Read More: <a href="https://tismedia.in/kota-news/crime/kota-police-arrested-husband-who-killed-wife/10438/">हत्यारा पति गिरफ्तारः लव मैरिज के बाद रिजवाना बनी &#8220;अंतिम&#8221; के प्रेम का हुआ खूनी अंत</a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>एसटीएफ ने मार गिराया शुक्ला </strong></span><br />
22 सितंबर 1998 के दिन मोबाइल सर्विलांस यूनिट ने एसटीएफ प्रभारी अरुण कुमार को सूचना दी कि श्रीप्रकाश शुक्ला दिल्ली से गाजियाबाद की तरफ आ रहा है। शुक्ला की लोकेशन ट्रेस कर रही इस टीम की सूचना इतनी सटीक थी कि जैसे उसकी कार इंदिरापुरम इलाके में दाखिल हुई, एसटीएफ ने उसे घेर लिया। एसटीएफ ने श्रीप्रकाश शुक्ला को सरेंडर करने के लिए कहा, लेकिन वह नहीं माना और देखते ही देखते दोनों तरफ से गोलियां चलने लगीं। फायरिंग शुरू होते ही एसटीएफ के जांबाजों ने चारों ओर से श्रीप्रकाश शुक्ला पर जवाबी हमला बोल दिया। ताबड़तोड़ गोलियां चलीं तो सीएम की सुपारी लेने वाले श्रीप्रकाश शुक्ला को अपनी ही जान से हाथ धोना पड़ा।उन दिनों शुक्ला का यूपी में ऐसा खौफ था कि उसके मरने की खबर खुद मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने विधानसभा में दी थी।</p>
<p><strong>Read More: <a href="https://tismedia.in/state/uttar-pradesh/sp-mp-shafiqur-rehman-barq-gave-controversial-statement-on-taliban/10411/">सपा सांसद ने तालिबान की तारीफ में पढ़े कसीदे, बोले- रूस और अमेरिका तक को खदेड़ दिया</a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>खौफ का दूसरा नाम था श्रीप्रकाश शुक्ला </strong></span><br />
श्रीप्रकाश शुक्ला का जन्म गोरखपुर के बड़हलगंज के ममखोर गांव में हुआ था। वह शहर के दाउदपुर मोहल्ले में रहता था। तीन भाइयों में सबसे छोटा श्रीप्रकाश बचपन से ही मनमौजी था, लेकिन जैसे-जैसे वह बड़ा होता गया उसका खौफ यूपी ही नहीं बिहार सहित देश के कई राज्यों में फैलने लगा। यूपी और बिहार में आतंक का पर्याय बन चुके कुख्यात माफिया सरगना श्री प्रकाश शुक्ला से अपराधी ही नहीं, पुलिस भी खौफ खाती थी। शुक्ला का खौफ तब और ज्यादा बढ़ गया जब साल 1997 में शेरे पूर्वांचल के नाम से मशहूर बाहुबली विधायक वीरेंद्र प्रताप शाही को उसने लखनऊ में दिनदहाड़े मौत के घाट उतार दिया था। महाराजगंज के लक्ष्मीपुर के विधायक वीरेंद्र शाही की उन दिनों यूपी की सियासत में तूती बोलती थी। शाही की हत्या के बाद शुक्ला के नाम का सिक्का चलने लगा।</p>
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<p><span style="color: #ff0000;"><strong>बिहारी हत्याकांड से दहला बिहार </strong></span><br />
श्रीप्रकाश शुक्ला का खौफ दिनों दिन ऐसा बढ़ा कि उसने छोटे-मोटे अपराध छोड़ सियासी दुश्मनों का शिकार करना शुरू कर दिया। शाही की हत्या के बाद शुक्ला ने बिहार सरकार के मंत्री बृज बिहारी प्रसाद की हत्या की सुपारी ली। खौफ के मारे बिहारी प्रसाद भारी भरकम सुरक्षा बंदोबस्तों के साथ अस्पताल में भर्ती हो गए। बावजूद इसके श्रीप्रकाश ने 13 जून 1998 को पटना स्थित इंदिरा गांधी अस्पताल के बाहर बिहारी प्रसाद के सुरक्षाकर्मियों के सामने ही उन्हें गोलियों से भून डाला। मंत्री की हत्या से पूरा बिहार दहल उठा। इस हत्या कांड में सामने आया कि बृज बिहारी प्रसाद पर विधायक देवेंद्र नाथ दुबे की हत्या करने का आरोप था। विधायक देवेंद्र नाथ दुबे और श्रीप्रकाश शुक्ल बहुत अच्छे मित्र थे। इसीलिए शुक्ला दोस्त की हत्या का बदला लेना चाहता था। बड़ी बात यह थी कि इस हत्याकांड में शुक्ला ने एके 47 का इस्तेमाल किया था। जिससे पुलिस उसके अंडरवर्ल्ड से कनेक्शन जोड़ने लगी। बिहारी प्रसाद की हत्या के बाद श्रीप्रकाश ने कल्याण सरकार में कैबिनेट मंत्री हरिशंकर तिवारी की हत्या की सुपारी ले ली, लेकिन श्रीप्रकाश के हमले के बावजूद वह बचने में कामयाब हो गए। उसने चौथी सियासी सुपारी कल्याण सिंह की ली थी, लेकिन कल्याण सिंह के राज में उन्हें मारना नामुमकिन था और यह कल्याण सिंह ने साबित भी कर दिखाया। बृज बिहारी प्रसाद की हत्या के थोड़े ही समय के बाद शुक्ल ने अजीत सरकार की कथित रूप से हत्या कर दी जो पूर्णियां के विधायक थे।</p>
<p><strong>Read More: <a href="https://tismedia.in/kota-news/crime/husband-kills-wife-by-stabbing-her-in-kota/10433/">हत्याः पति ने बीच सड़क पर चाकू से काटा पत्नी का गला</a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>खौफ से दहला पूर्वांचल </strong></span><br />
शुक्ला का अंडरवर्ल्ड के माफियाओं और बिहार के राजनेताओं से ऐसा कनेक्शन सेट हुआ कि वह अपहरण के धंधे में भी उतर आया। 26 मई 1998 को शुक्ला ने लखनऊ के बॉटनीकल गार्डन से एक बड़े व्यापारी के बेटे कुनाल रस्तोगी का अपहरण कर लिया। बच्चे के पिता ने जब बचाने की कोशिश की तो शुक्ला ने उसकी वहीं सरेआम हत्या कर डाली। सूत्रों का कहना है कि बच्चे को छोड़ने के लिए शुक्ला ने पांच करोड़ की फिरौती वसूली थी। पहलवानी के शौकीन शुक्ला ने साल 1993 में पहली बार राकेश तिवारी नाम के शख्स की हत्या की थी। जिससे डरकर वह बैंकाक भाग गया था। लेकिन, जब वह बैंकाक से लौटकर भारत आया तो जरायम की दुनिया में उसने बड़ी धाक से साथ वापसी की। उसकी धमक ऐसी थी कि लौटते ही बिहार के कुख्यात बाहुबली सूरजभान की गैंग में शामिल होकर राजनीति में भी सक्रिय हो गया। उसके सियासी सपने इतने ज्यादा बढ़ चुके थे कि चिल्लापुर विधानसभा से चुनाव लड़ने की तैयारी करने लगा था। साही की हत्या के बाद आशंका जताई जाने लगी कि कहीं शुक्ला हरिशंकर तिवारी की भी हत्या न कर दे।</p>
<p><strong>Read More: <a href="https://tismedia.in/kota-news/crime/nikhil-tekwani-murder-case-kota/10414/">मोबाइल कारोबारी की निर्मम हत्या, जंगलों में फेंका शव, पहचान मिटाने को जलाई कार, तीन आरोपी गिरफ्तार</a></strong></p>
<p><span style="color: #ff0000;"><strong>वो कौन थी! </strong></span><br />
शुक्ला के एनकाउंटर पर यूपी एसटीएफ को एक करोड़ रुपए से ज्यादा का खर्चा करना पड़ा था। शुक्ला को पकड़ने के लिए सिर्फ पटना, दिल्ली और लखनऊ के बीच ही यूपी पुलिस ने एक लाख किलोमीटर की हवाई यात्रा कर डाली थी। लेकिन, किसी को अंदाजा तक नहीं था कि शुक्ला की &#8220;महिला मित्र&#8221; उसकी मौत का सबब बन जाएगी। दरअसल हुआ यूं कि श्रीप्रकाश दिल्ली के बसंतकुंज इलाके में छिपा था। वह सूरज भान से हथियारों की डील करने रांची जाने की कोशिश में जुटा था, लेकिन पालम एयरपोर्ट से फ्लाइट पकड़ने से पहले गाजियाबाद में रहने वाली उसकी महिला मित्र ने उसे मिलने के लिए बुला लिया और इस मुलाकात की खबर यूपी एसटीएफ को लग गई। बस फिर क्या था, श्रीप्रकाश शुक्ला उससे मिलने से पहले ही ढ़ेर हो गया। जरायम की दुनिया में श्रीप्रकाश शुक्ला ऐसा पहला गैंगस्टर था, जिसने मोबाइल को न सिर्फ नेटवर्किंग का हथियार बनाया, बल्कि उसे पता था कि यह मोबाइल उसे एक दिन पकड़वा भी सकता है। इसलिए हर सप्ताह वह सिम और हैंड सेट तक बदल देता था। बावजूद इसके मोबाइल ही उसके खात्मे की वजह बना।</p>
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<p><span style="color: #ff0000;"><strong>शुक्ला की डायरी और कल्याण सिंह की मुसीबत </strong></span><br />
शुक्ला के एनकाउंटर के बाद एसटीएफ ने एक फोन और एक डायरी बरामद की। इस डायरी ने राजनीति के तमाम घिनौने चेहरों को बेनकाब कर दिया था, लेकिन राजनीतिक दवाबों के चलते यह डायरी पुलिस के दफ्तरों में न जाने कहां गायब हो गई। दरअसल, शुक्ला के एनकाउंटर के बाद यूपी के सियासी गलियारों में खासा हड़कंप मचा था। वह थी वह डायरी और फोन। सूत्रों की मानें तो एसटीएफ की जांच में खुलासा हुआ कि शुक्ला के तार यूपी सरकार के मंत्रियों तक से जुड़े थे। न सिर्फ राजनेता, बल्कि पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों से भी उसका अच्छा दोस्ताना था और इन लोगों ने शुक्ला को बचाने की तमाम कोशिशें भी कीं। हालांकि यह कोशिशें कोई अहसान या दोस्ती का कर्ज चुकाने के लिए नहीं की गई थी, क्योंकि इसकी एवज में इन लोगों ने शुक्ला से मोटी रकम हासिल की थी। शुक्ला के एनकाउंटर के बाद एसटीएफ के सदस्य प्रीतम सिंह की हत्या के बाद यह मामला और ज्यादा गहरा गया। क्योंकि प्रीतम की हत्या शुक्ला के गिरोह ने ही की थी। जिसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह की मुसीबतें भी खासी बढ़ गई थीँ।</p>
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