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राजस्थानः रिश्वत में अस्मत मांगने वाला ACP बर्खास्त, विधानसभा में हुआ हंगामा

राजस्थान में पहली बार हुआ संविधान के अनुच्छेद 311 का ऐसा इस्तेमाल, महज 24 घंटे में सरकार ने की कार्यवाही

  • संसदीय कार्यमंत्री शांति धारीवाल ने की विधानसभा में घोषणा, विपक्ष ने की सभी दागी अफसरों को हटाने की मांग

कोटा. राजस्थान में पहली बार सरकार ने 24 घंटे में दागी अफसर को सेवा से बर्खास्त करने का फैसला कर डाला। संसदीय कार्यमंत्री शांतिधारीवाल ने सोमवार को विधानसभा में घोषणा की कि रिश्वत के बदले अस्मत मांगने वाले एसीपी कैलाश बोहरा को राज्य सरकार ने पुलिस सेवा से बर्खास्त कर दिया है। सरकार ने इस मामले को “रेयरेस्ट रेयर” मानते हुई कार्रवाई की है।

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रिश्वत में मांगी “अस्मत”
राजस्थान में रविवार को खाकी पर बड़ा दाग लगा। एसीबी ने आरपीएस अफसर कैलाश बोहरा को उनके ही दफ्तर से एक महिला के साथ आपत्तिजनक हालत में धर दबोचा। 30 वर्षीय महिला ने एसीबी में शिकायत दर्ज कराई थी कि दुष्कर्म के एक मामले में जांच के बहाने एसीपी कैलाश बोहरा उन्हें बार-बार अपने दफ्तर में बुलाता था। बोहरा ने पहले तो मामला रफा दफा करने के लिए रिश्वत मांगी, लेकिन बाद में “अस्मत” की मांग करने लगा।

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एसीबी ने दबोचा “अधनंगा”
एसीबी के महानिदेशक बीएल सोनी ने बताया कि जयपुर शहर (पूर्व) जिले की महिला अत्याचार अनुसंधान यूनिट के प्रभारी सहायक पुलिस आयुक्त कैलाश बोहरा के खिलाफ 6 मार्च को पीड़िता ने शिकायत दर्ज कराई थी। पीड़िता ने एसीबी को बताया कि जवाहर सर्किल थाने में एक युवक व अन्य लोगों के खिलाफ उसने बलात्कार और धोखाधड़ी सहित तीन मुकदमे दर्ज करवाए हैं। जिनकी जांच महिला अत्याचार अनुसंधान यूनिट के एसीपी कैलाश बोहरा खुद कर रहे हैं। इस मामले में कार्यवाही करने के लिए बोहरा ने पहले उससे पैसे मांगे, लेकिन नहीं देने पर वह पीड़िता को बार-बार अपने दफ्तर बुलाने लगे। कुछ दिनों बाद वह पीड़िता को देर सबेर या छुट्टी के दिन भी बुलाने लगे। परेशान होकर पीड़िता ने इसकी वजह जाननी चाही तो बोहरा ने खुलेआम संबंध बनाने की मांग रख दी। रविवार को बोहरा ने पीड़िता को अपने सरकारी कार्यालय में बुलाया और अंदर से दरवाजा बंद कर लिया। तब एसीबी की टीम ने कैलाश बोहरा को महिला के साथ आपत्तिजनक स्थिति में गिरफ्तार कर लिया।

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पहले किया निलंबित फिर बर्खास्त
मामले की गंभीरता को देखते हुए गृह विभाग के संयुक्त शासन सचिव रामनिवास मेहता ने सोमवार सुबह दफ्तर पहुंचते ही सबसे पहले बोहरा का निलंबंन आदेश जारी किया। लेकिन, जब विधानसभा में विपक्ष ने सरकार पर दागी पुलिस अफसरों को बचाने के आरोप लगाने की कोशिश की तो संसदीय कार्य मंत्री शांति धारीवाल ने बोहरा को बर्खास्त करने की घोषणा कर दी। धारीवाल ने सदन को बताया कि इसे रेयरेस्ट टू रेयर केस मानते हुए सरकार ने संविधान के अनुच्छेद-311 इस्तेमाल कर कार्यवाही को अंजाम दिया है।

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हंगामाः विपक्ष ने घेरी सरकार
संसदीय कार्य मंत्री शांति धारीवाल ने जैसे ही विधानसभा में कैलाश बोहरा को बर्खास्त करने की घोषणा की तो नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया ने ऐसे सभी दागी अफसरों को फील्ड पोस्टिंग से हटाने की मांग कर डाली। उन्होंने अपराधियों से संबंध रखने के बर्खास्त किए गए अफसरों को फिर से बहाल करने के मामले में सरकार को घेरने की कोशिश की। जिसके बाद सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक हो गई। कुछ विधायक अपनी कुर्सियां छोड़कर उप नेता प्रतिपक्ष के पास आकर खड़े हो गए। करीब 10 मिनट की तीखी बहस के बाद जैसे तैसे मामला शांत हुआ।

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क्या होता है अनुच्छेद 311
अधिवक्ता रोहित सिंह राजावत ने बताया कि किसी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी को उसकी सेवाओं से बर्खास्त करने के लिए पहले उसे आरोप पत्र दिया जाता है। नोटिस देने के साथ ही उसे निलंबित भी किया जा सकता है। इसके बाद आरोपों की विभागीय एवं उच्च स्तरीय जांच की जाती है। जिसमें सभी आरोपित और आरोप लगाने वाले पक्षों की सुनवाई होती है। उनके बयान दर्ज किए जाते हैं एवं साक्ष्य लिए जाते हैं। यह पूरी प्रक्रिया खासी लंबी है, लेकिन इसे पूरा करने के बाद जब जांच में आरोप साबित हो जाते हैं तभी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी को सेवाओं से बर्खास्त किया जा सकता है, लेकिन संविधान के अनुच्छेद 311 में सरकार को अधिकार है कि प्रकरण यदि बेहद गंभीर और जनहित का हो तो सेवारत व्यक्ति को इस अनुच्छेद का इस्तेमाल कर उसकी सेवाओं से बर्खास्त किया जा सकता है।

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