दुनिया तबाह करने फिर निकला “सफेद कबूतर”…!

एक पादरी था… स्ट्रांग्स। नस्लीय श्रेष्ठता का तगड़ा पैरोकार…। अमेरिकन्स और इसाइयो के अलावा वह न तो किसी को सभ्य मानता था और न ही श्रेष्ठ…। पादरी स्ट्रांग्स के नस्लीय श्रेष्ठता के कीड़े ने अमेरिकन्स को ऐसा काटा कि उसका जहर आज भी उनकी रगों में कुलाचें मार रहा है। यदि यह कहा जाए कि स्ट्रांग्स की मौत के सैकड़ों साल बाद भी पूरा यूरोप इस महामारी का शिकार है तो गलत नहीं होगा।
लोकतंत्र, स्वतंत्रता और स्वाधीनता के तथाकथित पैरोकार व्यापार और आर्थिक हितों का जिक्र आने भर से भरभराकर गिर जाते हैं। दुनिया को दिखाने के लिए अमेरिका अपने पूर्व राष्ट्रपति जेम्स मोनरो के नाम पर मोनरो सिद्धांत की डीगें हाकता है। जिसमें औपनिवेशिकतावादी विचारधारा से दूर रहने का संकल्प लिया गया था, लेकिन क्यूबा से लेकर हवाई, फिलिपीन्स, वियतनाम, आस्ट्रिया, ईरान, ईराक, लीबिया, सीरिया, अफगानिस्तान और फिलिस्तीन से लेकर वेनेजुएला तक इसकी धज्जियां उड़ते हुआ पूरी दुनिया ने देखी हैं।
धुरियों में बंटी दुनिया
शीत युद्ध के बाद दुनिया साफ तौर पर तीन धुरियों में बंट चुकी है। पहली दुनिया वह जिसने शक्ति से समस्त केंद्रों चाहे वह राजनैतिक हो, आर्थिक हों या सामाजिक सभी पर कब्जा कर रखा है और दूसरी दुनिया वह इसके लिए लड़ रही है। जबकि तीसरी दुनिया का हाल तो इतना बुरा है कि उसे सिर उठाने तक की इजाजत नहीं है।
राजनीतिक विचारधारा के आधार पर समझें तो फर्स्ट वर्ल्ड अमेरिका और उसके पूंजीवादी सहयोगी जिन्हें NATO देश कहा जाता है, शामिल हैं। जबकि सेकंड वर्ल्ड सोवियत संघ और उसके साम्यवादी सहयोगी (पूर्वी यूरोप, चीन, क्यूबा) थे। जबकि थर्ड वर्ल्ड वो देश थे जो किसी भी गुट का हिस्सा नहीं थे, अक्सर नव-स्वतंत्र और अविकसित (भारत, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका) थे। लेकिन तकनीकि के साथ तेजी से हुए बदलावों के चलते अब यह शब्द अब अप्रचलित हो गए हैं। अब सिर्फ और सिर्फ विकसित या विकासशील देशों या ग्लोबल साउथ/नॉर्थ की बात की जाती है, लेकिन “फर्स्ट वर्ल्ड प्रॉब्लम्स” जस की तस बनी हुई है।
तीनों ‘वर्ल्ड‘ की परिभाषा:
- फर्स्ट वर्ल्ड (प्रथम विश्व):
- विशेषता: पूंजीवादी, औद्योगिक, कथित लोकतांत्रिक (मुख्यतः)।
- उदाहरण: संयुक्त राज्य अमेरिका, पश्चिमी यूरोप (यू.के., फ्रांस, जर्मनी), कनाडा, जापान, ऑस्ट्रेलिया।
- गठबंधन: नाटो (NATO)।
- सेकंड वर्ल्ड (द्वितीय विश्व):
- विशेषता: साम्यवादी (Communist), केंद्रीकृत अर्थव्यवस्था, एकदलीय शासन।
- उदाहरण: सोवियत संघ, पूर्वी जर्मनी, पोलैंड, क्यूबा, चीन
- गठबंधन: वारसा संधि (Warsaw Pact)।
- थर्ड वर्ल्ड (तृतीय विश्व):
- विशेषता: किसी भी गुट से असंलग्न (Non-Aligned), अक्सर गरीब, विकासशील, पूर्व-औपनिवेशिक देश।
- उदाहरण: भारत (गुटनिरपेक्ष आंदोलन का हिस्सा), अफ्रीका के अधिकांश देश, मध्य पूर्व, लैटिन अमेरिका।

बवाल क्यों…?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जो कि लगातार दुनिया में शांति लाने के दावों के साथ अपने लिए नोबेल की भीख मांगता रहता है के निशाने पर वेनेजुएला या कोई दूसरा देश यूं ही नहीं आता। उसके पीछे विशुद्ध मुनाफे की सोच होती है। अमेरिका ने जिन देशों को भी तबाह किया है वह सभी मुल्क प्राकृतिक संसाधनों से लबरेज थे और अमेरिका अपना भंडार भरने के लिए उन पर अघोषित कब्जा चाहता था। खाड़ी देशों के तेल से लेकर वियतनाम की सामरिक और कृषि शक्ति उसे ललचाती रही। पाकिस्तान को पुचकार कर यही कोशिश वह भारत को कमजोर करने के लिए करता रहा है, लेकिन पहले इंदिरा गांधी और फिर अटल बिहारी वाजपेयी के दृढ़ संकल्पों ने भारत को परमाणु सक्षम राष्ट्र बनाकर उन नापाक मंसूबों पर हमेशा के लिए पानी फेर दिया है। भारत में सरकार चाहे किसी भी दल की हो, लेकिन हिंदुस्तानी जनता विदेशी हमला किसी का भी बर्दास्त नहीं करेगी यह यहां के राजनेताओं को अच्छी तरह से पता है। यही वजह है कि अमेरिकी घुसपैठ कभी भी कामियाब नहीं हो सकी।
बात वेनेजुएला की…!
अमेरिका और वेनेजुएला के बीच विवाद का केंद्र बीते तीन दशकों से ‘तेल’ रहा है। दरअसल, वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा सिद्ध तेल भंडार है, जो कि इस दक्षिण अमेरिकी देश को जबरदस्त तौर पर समृद्ध करने की क्षमता रखता है। इसके अलावा वेनेजुएला में सोना और गैस के भी भंडार हैं। 1990 के दशक और इससे पहले तक वेनेजुएला की खुली अर्थव्यवस्था में अमेरिका की कंपनियां भी सम्मिलित रही थीं।
दोनों देशों के बीच विवाद की पहली चिंगारी 1999 में भड़की जब वेनेजुएला में वामपंथी राष्ट्रपति ह्यूगो शावेज की सरकार सत्ता में आई। शावेज ने वेनेजुएला में गरीबी को मुद्दा बनाकर चुनाव जीता और देश के तेल को अपने लोगों की भलाई में लगाने का वादा कर पूरे देश के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण कर दिया। इसका असर यह हुआ कि वेनेजुएला के तेल उद्योग में अमेरिकी कंपनियों की भूमिका घट गई। इस बीच वेनेजुएला की वाम सरकार ने क्यूबा, रूस और चीन के साथ ईरान से करीबी बढ़ा ली, जो सीधे तौर पर अमेरिका की शक्ति को चुनौती देने के कदम के तौर पर देखा जाने लगा।
दोनों देशों के रिश्ते तब और खराब हो गए, जब ह्यूगो शावेज के खिलाफ 2002 में तख्तापलट की असफल कोशिश हुई। वेनेजुएला सरकार ने इसके पीछे तब अमेरिका को जिम्मेदार ठहराया था। इसके बाद से दोनों देशों की दूरियां लगातार बढ़ती चली गईं। 2013 में ह्यूगो शावेज की मौत के बाद निकोलस मादुरो वेनेजुएला के राष्ट्रपति बने। तबसे लेकर अब तक वेनेजुएला की विदेश नीति अमेरिका के प्रति जैसी की तैसी ही बनी हुई है। हालांकि, अमेरिका लगातार वेनेजुएला पर अपने तेल सेक्टर को खोलने का दबाव बनाने के लिए तरह-तरह के प्रतिबंध लगाता रहा है। इससे वेनेजुएला की अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव भी पड़ा है।
अमेरिकी अधिकारियों ने कई मौकों पर खुले तौर पर कहा है कि वेनेजुएला का तेल वॉशिंगटन का है, और वे अमेरिकी कंपनियों के फायदे के लिए वेनेजुएला के तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण को पलटवाना चाहते हैं। ओबामा और बाइडन जैसे डेमोक्रेट नेताओं के अंतर्गत अमेरिका ने कूटनीतिक तौर पर वेनेजुएला पर दबाव बनाया। हालांकि, ट्रंप प्रशासन ने 2017 में वेनेजुएला पर तेल प्रतिबंध लगाए और 2019 में उन्हें और कड़ा कर दिया। इससे वेनेजुएला की कच्चे तेल को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेचने की क्षमता बाधित हुई। अब अपने दूसरे कार्यकाल में ट्रंप प्रशासन ने वेनेजुएला पर कार्रवाई को और सख्त कर दिया है और हवाई हमलों की भी शुरुआत कर दी है।

अमेरिका के लिए वेनेजुएला क्यों जरूरी?
वेनेजुएला दक्षिण अमेरिका में स्थित है, जो कि अमेरिका के काफी करीब है। इस देश के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है, जिसे 303 अरब बैरल से भी ज्यादा आंका जाता है। कई प्रतिबंधों की वजह से यह अब तक अनछुआ भंडार है। इसके अलावा वेनेजुएला में सोना और गैस का भी जबरदस्त भंडार है। यूं तो वेनेजुएला की ओर से इन पदार्थों का निर्यात न के बराबर है, लेकिन अगर अमेरिका की इस तक पहुंच होती है तो ट्रंप प्रशासन को मध्य पूर्व (भारत के पश्चिम एशिया) में तेल की खरीद पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। वह सीधे वेनेजुएला के तेल भंडार का दोहन कर के अपने ऊर्जा बाजार को आगे बढ़ा सकता है और अपने तेल रिजर्व को सुरक्षित भी रख सकता है।
इसके अलावा वेनेजुएला में बीते वर्षों में जिस तरह से भूराजनीतिक घटनाक्रम बदले हैं, वह भी अमेरिका के लिए चिंता बढ़ाने वाले हैं। दरअसल, वेनेजुएला के तेल उद्योग का राष्ट्रीयकरण होने के बाद से चीन और रूस ने वेनेजुएला से रिश्ते बढ़ाए हैं और उसे अरबों डॉलर की सहायता मुहैया कराई है। कई बार यह सहायता वेनेजुएला के तेल के लिए ही दी गई है। दूसरी तरफ वेनेजुएला ने रूस, चीन, ईरान और क्यूबा से हथियार और सुरक्षा के लिए कई उपकरण भी हासिल किए हैं। ऐसे में ट्रंप सरकार वेनेजुएला पर दबाव बनाकर एक बार फिर पूरे दक्षिण अमेरिका में अपना वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश में है।
अमेरिका के आरोप
अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि वेनेजुएला की निकोलस मादुरो सरकार अमेरिका में ड्रग्स (विशेष रूप से फेंटेनाइल और कोकीन) की तस्करी में शामिल है। ट्रंप प्रशासन ने इसे एक राष्ट्रीय आपातकाल मानते हुए वेनेजुएला को निशाना बनाने की कोशिश की है। ट्रंप ने आरोप लगाया है कि मादुरो के शासन में वेनेजुएला के लाखों नागरिकों को अमेरिका आने को मजबूर होना पड़ा है, जिससे अमेरिका में प्रवासी संकट बढ़ा है। इन लोगों के 2013 से ही देश छोड़कर भागने का दावा किया गया है। अमेरिका ने वेनेजुएला के दो आपराधिक समूहों- ट्रेन डी अरागुआ और कार्टेल डी लॉस सोलेस (जिसका नेतृत्व कथित तौर पर मादुरो करते हैं) को विदेशी आतंकवादी संगठन (फॉरेन टेररिस्ट ऑर्गनाइजेशन) के तौर पर चिह्नित किया है।
वेनेजुएला का जवाब
वेनेजुएला सरकार उन आरोपों को सिरे से खारिज करती है, जिसके तहत उस पर अवैध नशीले पदार्थों की तस्करी और अपने नागरिकों के दमन का आरोप लगाया जाता है। वेनेजुएला का आरोप है कि ड्रग्स के दावों को सिर्फ एक बहाने के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, ताकि वेनेजुएला में सत्ता परिवर्तन या तख्तापलट करके वेनेजुएला की विशाल तेल संपत्ति पर अमेरिका कब्जा कर सके।
क्या कहते हैं कानूनी विशेषज्ञ?
कानूनी विशेषज्ञों ने इस मामले में ट्रंप प्रशासन की कार्रवाइयों पर चिंता जताई है, उनका कहना है कि अंतरराष्ट्रीय महासागर क्षेत्र में जहाजों को निशाना बनाना अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन हो सकता है। अमेरिका की ओर से बिना सबूत दिए वेनेजुएला की नावों पर हमला न्याय से परे जाकर हत्याओं के जैसी स्थिति है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने भी आंशिक नौसैनिक नाकाबंदी की आलोचना की है और इसे वेनेजुएला के खिलाफ अवैध सशस्त्र आक्रामकता बताया है।
तानाशाह ट्रंप…!
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप विशुद्ध कारोबारी हैं। सत्ता की आड़ में अपने परिवार का कारोबार बढ़ाने के लिए वह क्या कर रहे हैं अमेरिकन्स को छोड़ किसी से नहीं छिपा। इतना ही नहीं कभी कनाड़ा तो कभी पनामा पर कब्जे का ऐलान करना यह साबित करने के लिए काफी है कि उनकी सोच पादरी स्ट्रांग्स की श्रेष्ठता और विस्तारवाद से कितना मेल खाती है। ट्रंप को नोबल पुरस्कार मिलेगा या नहीं यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन उनकी शांति की सफेद कबूतर दुनिया को फिर से खून में नहलाने के लिए निकल पड़ा है यह तय है। अमेरिका ही नहीं दुनिया के किसी भी देश की ऐसी विस्तारवादी सोच का खुले तौर पर विरोध होना चाहिए ताकि किसी भी देश का लोकतंत्र और उस देश के नागरिकों की स्वतंत्रता एवं संप्रभुता पर आंच न आए।