एक होनहार डॉक्टर की बलि चढ़ाने वालो… जवाब तो देना पड़ेगा…!

वो महज 29 साल की हैं…। उनके सामने उनकी पूरी जिंदगी पड़ी है…। अभी तो काम शुरू भी नहीं किया था उससे पहले कुछ गिद्ध मंडराए और एक होनहार डॉक्टर का भविष्य नोंच कर चले गए…। सिर्फ अपने कुछ चहेतों को बचाने के लिए…।
दो मासूमों को यतीम बनाने और उनकी मांओं की मौत का दाग अभी धुला भी नहीं था कि न्यू मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल मैनेजमेंट ने अपने ही साथी चिकित्सक की बलि चढ़ा डाली…। हे धरती के भगवानो इससे बड़ा पाप कुछ और नहीं हो सकता।
डॉ. श्रद्धा की आंखों में आंसू थे…। उनकी मानसिक स्थिति बद्तर हो चली थी…। लोगों को जवाब देते देते थक चुकीं थीं कि न्यू मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में दो प्रसूताओं की जान लेने वाली चिकित्सक वो नहीं कोई और है…। जिसे बचाने के लिए न्यू मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ. नीलेश जैन और अधीक्षक डॉ. आशुतोष शर्मा ने जान झोंक रखी है…।
यह वो दो नाम हैं जिन्होंने न सिर्फ अपने साथी चिकित्सक के विश्वास की हत्या की बल्कि लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा और स्वास्थ्य मंत्री गजेंद्र सिंह खींवसर की आंखों तक में धूल झोंक दी…। दो प्रसूताओं की मौत और छह की किड़नी फेल होने के बाद सबसे बड़ा सवाल यही था कि आखिर इन महिलाओं का ऑपरेशन किसने किया… लेकिन, इन दोनों जिम्मेदार अधिकारियों ने आज तक मीडिया के इस सवाल का जवाब नहीं दिया… देते भी तो कैसे क्योंकि किसी चहेते को बचाना जो था…।
सरकार भी नकारा है और उसके जांच कर्ता भी अकर्मण्य…। क्या उन्हें जांच शुरू करने से पहले इन दोनों जिम्मेदार अधिकारियों को निलंबित नहीं करना चाहिए था… निलंबन तो दूर की बात उनके पदों से भी नहीं हटाया गया… ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इन लोगों ने अपने चहेतों को बचाने के लिए हॉस्पिटल के रिकॉर्ड्स में हेर-फेर नहीं की होगी…।
जरूर की होगी… तभी तो सभी प्रसूताओं के ऑपरेशन के लिए यूटीबी चिकित्सक डॉ. श्रद्धा उपाध्याय को जिम्मेदार ठहरा कर उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं। क्या किसी के पैर में फ्रेक्चर हो रहा हो और वह घंटों ऑपरेशन थियेटर में खड़ा रहकर एक दो नहीं आठ-आठ ऑपरेशन कर सकता है….?
यही सवाल हमने डॉ. श्रद्धा उपाध्याय से किया… तो उन्होंने जवाब दिया “इन छह महिलाओं का ऑपरेशन करना तो दूर मैं ऑपरेशन थियेटर तक में नहीं गई… मैने नाइफ तक नहीं उठाई… फिर मैं कैसे जिम्मेदार हो सकती हूं…। एक मई को पैर में फ्रेक्चर हुआ… मैने छुट्टी ले ली, लेकिन यूटीबी सर्विस में ज्यादा अवकाश न होने के कारण मेरी ड्यूटी ओपीडी में लगा दी गई….। अब ऐसे में मैं कैसे जिम्मेदार हो सकती हूं…।“
डॉ. श्रद्धा कहती हैं कि मुझे तो किसी ने पूछा तक नहीं, कोई जांच नहीं हुई कोई बयान नहीं लिए गए, सीधे अखबार से पता चला कि मुझे सारी घटना के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया गया है और मेरी सेवाएं खत्म कर दी गई हैं।
चिंता नौकरी की नहीं, चिंता उस दाग की है जो मेरे निरपराध होने के बावजूद मेरे ऊपर थोप दिया गया… मुझ पर जो कलंक लगा है उसे कैसे धोया जाए… इसका जवाब किसी के पास हो तो दे। मुझे इसी शहर में रहना है… इसी शहर में काम करना है…. और पूरी जिंदगी पड़ी है… कैसे इस दाग को लेकर रहा जा सकता है… इसका जवाब जिम्मेदारों को देना होगा। निष्पक्ष जांच करनी होगी… और मुझे इंसाफ दिए बिना एक तरफा कार्यवाही स्वीकार्य नहीं करूंगी। मैं लड़ूंगी और आखिर तक लड़ूंगी… जब तक इंसाफ न मिल जाए।









