43 डिग्री की तपिश में इंसाफ की मांग: कोटा मेडिकल कॉलेज हादसे पर सड़कों पर उतरे हजारों लोग

प्रसूताओं की मौत से फूटा जनाक्रोश, अस्पताल बना भरोसे की जगह भय का प्रतीक

कोटा #TIS 

राजस्थान के कोटा स्थित न्यू मेडिकल कॉलेज अस्पताल में प्रसूताओं की दर्दनाक मौतों ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया है। जिन घरों में नवजात की किलकारियां गूंजनी थीं, वहां मातम पसरा है। जिन मांओं ने अपने बच्चों को जन्म दिया, वे उन्हें अपनी गोद में लेने से पहले ही दुनिया से विदा हो गईं। यह हादसा केवल कुछ परिवारों का व्यक्तिगत दुःख नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था पर खड़ा एक गंभीर सवाल बन गया है।

इन्हीं मौतों, बिगड़ी चिकित्सा व्यवस्था और कथित दवा घोटाले के विरोध में सोमवार को 43 डिग्री तापमान के बीच हजारों की संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता और आमजन सड़कों पर उतर आए। वरिष्ठ नेता प्रहलाद गुंजल के नेतृत्व में कोटिया भील प्रतिमा से शुरू हुई रैली न्यू मेडिकल कॉलेज पहुंची, जहां प्रदर्शन सभा में बदल गया।

“सरकारी अस्पताल अब इलाज नहीं, मौत की कब्रगाह बनते जा रहे हैं”

सभा को संबोधित करते हुए कोटा प्रभारी पुष्पेंद्र भारद्वाज ने कहा कि 4 तारीख से कोटा के सरकारी अस्पतालों में मौत का तांडव हो रहा है। गरीब और ग्रामीण लोग अपने परिवार को बचाने के लिए सरकारी अस्पतालों में आते हैं, लेकिन अब वही अस्पताल उनकी मौत की कब्रगाह बनते जा रहे हैं।

उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार पूरे मामले में सच्चाई दबाने और जिम्मेदारों को बचाने की कोशिश कर रही है। उन्होंने कहा कि कोटा के कुछ प्रभावशाली नेता पूरे प्रकरण पर लीपापोती कर रहे हैं।

“इन बच्चों का जन्मदिन अब उनकी मां की पुण्यतिथि बनेगा”

प्रहलाद गुंजल ने भावुक स्वर में कहा कि यह केवल चिकित्सा लापरवाही नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं की हत्या है। उन्होंने कहा कि जिन माताओं ने अपने बच्चों को जन्म दिया, वे उन्हें देख भी नहीं सकीं। अब उन बच्चों का जन्मदिन उनकी मां की पुण्यतिथि के रूप में याद किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि अस्पतालों में लोग इलाज के लिए नहीं, बल्कि अपनी जान बचाने के लिए भाग रहे हैं। वार्ड खाली हो रहे हैं और जनता का चिकित्सा व्यवस्था से विश्वास उठता जा रहा है।

प्रदर्शन की घोषणा से ही प्रशासन घुटनों पर आया

गुंजल ने कहा कि कांग्रेस कार्यकर्ता पिछले दो दिनों से धरने पर बैठे थे, लेकिन प्रशासन कोई सुनवाई नहीं कर रहा था। जैसे ही बड़े आंदोलन की घोषणा हुई, प्रशासन सक्रिय हो गया।

उन्होंने आरोप लगाया कि पीड़ित परिवारों को डराने, धमकाने और जल्दबाजी में धरना समाप्त करवाने का प्रयास किया गया, ताकि मामला शांत किया जा सके।

अस्पताल प्रशासन ने माना—गलत दवाओं का रिएक्शन

गुंजल ने दावा किया कि जब प्रसूताओं की किडनी फेल होने की घटनाएं सामने आईं, तब अस्पताल प्रशासन ने स्वयं कहा था कि यह चिकित्सा त्रुटि नहीं, बल्कि दवाओं के रिएक्शन का मामला है।

उन्होंने सवाल उठाया कि यदि मौतों की वजह गलत दवाएं हैं, तो फिर डॉक्टरों पर कार्रवाई क्यों? किसी को निलंबित, किसी को बर्खास्त और किसी को नोटिस देकर आखिर किसे बचाया जा रहा है?

“दवा माफियाओं को बचाने में लगा जिला प्रशासन”

गुंजल ने जिला प्रशासन और चिकित्सा विभाग पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि करोड़ों रुपए की दवा सप्लाई से जुड़े लोगों को बचाया जा रहा है।

उन्होंने दावा किया कि सत्ता से जुड़े कुछ प्रभावशाली लोग आरएमएस से एनओसी लेकर सीधे दवाओं की सप्लाई कर रहे हैं और पिछले कुछ महीनों में करीब 25 करोड़ रुपए की दवाएं सप्लाई की गई हैं।

उन्होंने पूछा—यदि दवाओं से मौतें हुईं, तो जिम्मेदार कौन है? किसके दबाव में दवा सप्लायरों के नाम छिपाए जा रहे हैं !

“50 लाख मुआवजा नहीं, हमें न्याय चाहिए”

गुंजल ने चेतावनी दी कि केवल संवेदना व्यक्त करने और औपचारिक घोषणाओं से काम नहीं चलेगा। यदि 7 दिनों के भीतर पीड़ित परिवारों को 50 लाख रुपए का मुआवजा, दोषियों पर कठोर कार्रवाई और दवा माफियाओं पर मुकदमा दर्ज नहीं हुआ, तो कांग्रेस बड़ा आंदोलन करेगी।

उन्होंने कहा कि अस्पताल की व्यवस्था बाधित नहीं की जाएगी, लेकिन कलेक्ट्रेट को जाम कर प्रशासन और सरकार को जवाब देना होगा।

पीड़ितों से मिले नेता, इलाज जारी रखने के निर्देश

प्रदर्शन के बाद प्रहलाद गुंजल और पुष्पेंद्र भारद्वाज अस्पताल पहुंचे और पीड़ित परिवारों से मुलाकात की। पीड़िता रागिनी मीणा के पति ने बताया कि अस्पताल प्रशासन छुट्टी देने का दबाव बना रहा है।

इस पर गुंजल ने प्रशासनिक अधिकारियों से बात की, जिसके बाद मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट आने तक छुट्टी नहीं देने के निर्देश दिए गए।

यह सिर्फ कोटा नहीं, पूरे राजस्थान कांग्रेस की चेतावनी है

यह मामला अब केवल कोटा का नहीं रहा। यह मेडिकल कॉलेज एवं स्वास्थ्य व्यवस्था, प्रशासनिक जवाबदेही और राजनीतिक संरक्षण पर खड़ा एक बड़ा सवाल है।

यह उन मांओं के न्याय की लड़ाई है, जो अब कभी लौटकर नहीं आएंगी।

यह उन नवजात बच्चों की लड़ाई है, जिन्हें जन्म लेते ही मां का साया खोना पड़ा।

और यह उस समाज की परीक्षा है, जो अब भी इंसाफ की उम्मीद में खड़ा है।

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