मानवता पर भारी पड़ रही कोरोना काल में मुनाफाखोरी
महामारी मुनाफाखोरों के लिए बना स्वर्णिम काल

“शर्मिंदा है मानवता आज,
विश्वास ने हाथ जो छोडा है,
खुल्ले आम जिंदगियों से खेल,
आज मानव ने मानवता को तोडा है |”
2019 में आई कोरोना नाम की महामारी ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मनुष्य, सगे-सम्बन्धी, समस्त मानवीय रिश्तों और सरकार की मानवता और मानव जीवन के प्रति दृष्टिकोण का इम्तिहान लिया है| प्रारंभ में देश में लॉकडाउन लगाकर कोरोना को नियंत्रित किया गया लोगों ने सब्र और धैर्य का परिचय दिया पर जैसे ही परिस्थितियां सामान्य जीवन की रस्ते पर बढने लगी लोगों के साथ सरकार भी लापरवाह हो गई| एक ओर देश की सरकार ने विश्व स्वास्थ्य संगठन एवं वैज्ञानिकों के द्वारा दी गई दूसरी लहर की चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया और सब कुछ ऐसे खोल दिया जैसे कोरोना हमारे देश में था ही नहीं|
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विभिन्न राज्यों में सरकारों के विरोध के बावजूद चुनाव आयोग के आदेशानुसार इस कोरोना वायरस की भयावता के बीच खूब चुनाव कराये, चुनावी रैलियाँ निकली, सरकारों ने धार्मिक-सामाजिक आयोजनों करने की अनुमति दी| वही कुछ लोगों की मानवीयता इस कोरोना काल में पूरी तरह से समाप्त हो चुकी| उन्हें ये महामारी मुनाफा कमाने का एक स्वर्णिम काल प्रतीत हुआ| महामारी के शुरू होने से लेकर अभी तक जो भी इंसान इस महामारी का फायदा उठा सकता था उसने इसका भरपूर लाभ उठाया अब चाहे उनके इस लाभ के लालच में किसी बेबस, बेगुनाह, निर्दोष सजीव की जान के साथ सब कुछ ही क्यों न लुट गया हो| पहले जब कोरोना की दवाई, इंजेक्शन वैक्सीन नहीं आई थी तब लॉकडाउन के समय जिन दुकानदारों को सरकार ने आवश्यक श्रेणी में रख दुकान खोलने की अनुमति दी थी उन्होंने मुनाफाखोरी की सारी सीमाएं लाँघ दी| लोगों के बीमारी से बचने के डर का उन्होंने जितना चाहा उतना फायदा उठाया| 10 रूपए की कीमत वाला मास्क 50 रूपए में, 50 की कीमत वाला मास्क 400 रूपए में बेचा, प्रतिदिन काम में आने वाली वस्तुओं फल सब्जियों, राशन के सामानों की कीमत में अप्रत्याशित वृद्धि के साथ बेचा| मास्क, सेनेटाईजर की खूब कालाबाजारी की गई| और अब जब कोरोना की दूसरी लहर के साथ मौत का तांडव दिखा रहा है जिसमें हमारे पास दवाई, वैक्सीन, इंजेक्शन, ओक्सिमीटर, ऑक्सीजन कनसनट्रेटर आदि सब आ गए तब भी कुछ डॉक्टरों, अस्पतालों, दवा दुकानदारों, ऑक्सीजन-एम्बुलेंस की सुविधा देने वालों ने मानवता और इंसानियत के सारे बंधन तोड़कर मानवीयता को तार-तार कर दिए| बचाव के लिए आवश्यक हर वास्तु जैसे दवाई, वैक्सीन, इंजेक्शन, ओक्सिमीटर, ऑक्सीजन कनसनट्रेटर की धड़ल्ले से कालाबाजारी हो रही है जिस पर कोई रोक लगती दिखाई नहीं देती|
डॉक्टर के मुताबिक और रिपोर्ट्स के अनुसार कोरोना से सबसे ज्यादा फेफड़ों में संक्रमण होता है पर वास्तव में देखा जाये इस कोरोना ने सबसे ज्यादा इंसानी रिश्तों को संक्रमित किया है इंसान ने अपनों का ही साथ छोड़ दिया, अपने घर, परिवार, पडौसी, रिश्तेदार, दोस्त की मदद करने पर उसे कोरोना संक्रमण और बीमारी याद आती है, घर के बाहर कदम नहीं रखेंगे और ब्लैक में दुकान खोल कर दोगुनी कीमत पर शटर खोलकर आगे-पीछे से चोरी छुपे सामान देने में इन्हें कुछ नहीं होता उसमें इन्हें इंसानियत नजर आती है|
रेमडेसिविर नामक एंटी-वायरल इंजेक्शन, जिसकी कीमत सरकार ने तय कर दी है और जिसके लिए स्वयं केंद्र सरकार का कहना है की ये दवाई कोरोना के लिए रामबांड नहीं है जिसका उपयोग केवल उन्ही मरीजों के लिए किया जा सकता है जिसका ऑक्सीजन लेवल नीचे है। फिर भी उसकी उपयोगिता की अफवाहों के अन्धाधुन दौड़ में अधिकारिओं, नेताओं और रसूखदारों की मिली भगत से इंजेक्शन 10 से 1 लाख रूपए में बेचा जा रहा है| आम जनता को तो इंजेक्शन मिल ही नहीं रहा, जान-पहचान और रसूख वाले लोग बहुत मिन्नतें करके अपने नेताओं के प्रभाव से बड़ी मुश्किलों से इंजेक्शन प्राप्त कर पा रहे है| मुनाफाखोरी के इस गंदे काले धंधे में तो गुजरात से मुंबई के रास्ते लाखों नकली नमक और गुल्कोज के रेमडेसिविर नामक इंजेक्शन पूरे देश में लोगों की जान से खेलने के लिए बेच दिए गए और इंजेक्शन लगने के बाद भी लोगों की हो रही लगातार मौत का कारण भी हो सकता है की ऐसे ही नकली इंजेक्शन हो जिसकी कीमत 100 रूपए भी नहीं थी और उसके लिए लोगों ने अपना बैंक बैलेंस और सेविंग सब दाव पर लगा दी| मरीजों की जान बचाने वाली एम्बुलेंस घर से हॉस्पिटल और हॉस्पिटल से घर ले जाने के लिए 2 से 5 किलोमीटर के 10000 से 25000 और उससे ज्यादा किलोमीटर होने पर लाखों में रुपयों में चार्ज कर रही है|
प्राइवेट अस्पतालों में जहाँ पर सरकार के आदेशानुसार कोरोना का इलाज किया जा रहा वहां तो ऐसी लूट मची है की पूछो ही मत अस्पताल के बाहर नोटिस बोर्ड लगा रखा है की बेड और ऑक्सीजन दोनों ही नहीं होने के किसी भी कोरोना मरीज को भर्ती नहीं किया जा रहा है फिर अस्पताल का ही कोई व्यक्ति पीछे से जाकर रिश्वत लेकर लाखों-हजारों में वेंटीलेटर वाले बेड देते है| अगर मरीज की मृत्यु भी हो जा रही है तो परिवार वालों को बताया नहीं जा रहा बस दिखावे के लिए वेंटिलेटर पर डालकर मरीज के घरवालों से अपनी तिजोरी भरने में लगे है| जब तक हॉस्पिटल का पूरा बिल नहीं भर दिया जाता जिसमें लोगों की जमीने-गहने-संपत्ति तक बिक रही है तब तक मनुष्य का मृत निर्जीव शरीर भी परिवार जन को नहीं सौपा जा रहा|
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इसके साथ ही सरकारी योजनाओं जैसे आयुष्मान भारत योजना या चिरंजीवी योजना का लाभ उठाने वाले गरीबों के लिए तो कौड़ में खाज वाली स्थिति हो गई है उन्हें तो अस्पताल में भर्ती ही नही किया जा रहा जबकि उनका पैसा सरकार से वापस उन्हें मिल जायेगा, लेकिन क्योंकि अस्पताल वालों को पता है की सरकारी योजनाओं में नियमानुसार भुगतान होगा इसमें कोई भी हेरा फेरी नहीं हो सकती वो अन्धाधुन पैसे कमाने के मौके का फायदा नहीं उठा पाएंगे उन्होंने अपने अस्पताल के रास्ते गरीबों के लिए बंद कर दिए है|
ऐसे लोगों के बारे में देख-सुनकर जिनका ईमान-धर्म सब इस कोरोना में बिक चुका है एक ही बात जहन में आती है:-
“मनुष्य ने दिखा दिया उनमें कितनी इंसानियत है,
दानव तो सारे मर गए,
पर कुछ लोगों ने जता दिया कितनी जिन्दा हैवानियत है |”
आखिर कहा गई मनुष्य की इंसानियत जो ऐसे बुरे समय में मुनाफा कमाने की सोच रहा है| कुछ लोगों की मुनाफा और फायदा उठाने की लालसा ने इंसानियत का गला घोट दिया| पैसों के लालच में इंसान का जमीर इतना गिर गया है की वो मानवता अपने जीवन से निकाल चुका है और इंसानियत खो दी है| हैवान बनकर लोगों की मजबूरी का फायदा उठाने वाले का काम दैत्य प्रकृति का प्रतीत होता है | फेफड़ों के बाद, कोरोना ने रिश्तों और मानवीयता को ही सबसे ज्यादा छल्लनी है|
परन्तु ऐसा नहीं है की हर व्यक्ति ऐसा हो, इंसानियत आज भी बहुतों के दिलों में निवास कर रही है उनकी मानवता और इंसानियत के लिए धन्यवाद शब्द बहुत छोटा और निष्क्रिय हो जाता, उनके सेवाभाव का कोई सानी नहीं है उनके सेवाभाव को देखकर जरूरतमंदों की देखकर आंखें भर आती हैं| देश के हजारों युवा, समाजसेवी, समाजसेवी संगठनों और विभिन्न धार्मिक संगठनों ने इस बीमारी से लड़ने के लिए अपनी सारी ताकत लगा रखी है| कई लोगों ने अपने घर, संस्थान, गोदाम, फैक्ट्री को क्वारंटाइन और इलाज करने के लिए अस्पताल और क्वारंटाइन सेंटर में बदल दिए है| कुछ लोग ऐसे है जिन्होंने अपनी महंगी-महंगी लग्जरी गाड़ियों को ऑक्सीजन के साथ एम्बुलेंस में तब्दील कर दिया और बिना किसी खर्चे लोगों की सेवा कर रहे| कोई मास्क, सेनेटाइजर, साबुन बांट रहा है तो कोई सैकड़ों लोगों को अपने संसाधनों का उपयोग करके खाना खिला रहा है| कई लोग निशुल्क ऐसे मृत शरीरों का अंतिम संस्कार कर रहे जिनके शरीर को उनके परिवारों वालों ने ही हाथ लगाने, लेने या अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया क्योंकि उनके लिए मानवता का धर्म सर्वोत्तम है वो ना जात देखते है-ना पात, ना धर्म- ना रंग, ना अमीरी-ना गरीबी, ना ऊँच-ना नीच| कोई दिन रात लोगों का जीवन बचाने के लिए प्लाज्मा के लिए गुहार लगा-लगा कर कोरोना की भयानक बीमारी से स्वास्थ्य हुए लोगों को समझा कर उनकी काउन्सलिंग करके प्लाज्मा डोनेट करवा रहा है|
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सरकार की भूमिका: सरकारो को जिन्होंने अपनी सरकार जनता के वोट से बनाई है वे अपने सांसदों, विधायकों, अध्यक्षों, नेताओं, प्रतिनिधियों को आदेश दे की घर में दुबककर न बैठे जनता तक दवाईयाँ, ऑक्सीजन, इंजेक्शन, ओक्सिमीटर, ऑक्सीजन कनसनट्रेटर आदि पहुचाएं| जितनी ताकत, धन-जन बल चुनाव जीतने में लगाते है उतनी ही ताकत इस बीमारी को हराने में लगाये| साथ ही यह नितांत आवश्यक हो चुका है की सरकार इस महामारी के दौर में वृहद् स्तर पर अभियान चलाकर, स्टिंग ओपरेशन करके, औचक निरक्षण करके जो लोग हॉस्पिटल में बेड, दवाइयों, रेमदिसिविर इंजेक्शन, ऑक्सीजन, हॉस्पिटल में बेड मुनाफाखोरी, कालाबाजारी, में लिप्त उनके विरुद्ध कठोर कार्यवाही करे| ऐसा कानून लागू हो जो ऐसा करने वालो के ऊपर पाबन्दी लगा सके क्योंकि ऐसा करना मानवता, मानवीयता और मानव अस्तित्व के खिलाफ है और उनके अमानवीय कार्यों से लाखों हजारों लोगों की जान जा सकती है|
लेखिका: डॉ. निधि प्रजापति
अध्यक्ष : सोसाइटी हैस ईव इंटरनेशनल चैरिटेबल ट्रस्ट