कोरोना काल और आधी आबादी का पूरा सच

2020 में आये कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया को झकझोर रख दिया विश्व के महानतम विकसित देशों के कॉमन सेन्स, हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर, संवेदनशीलता की सच्चाई दुनिया के सामने लाकर रख दी | कोविड-19 की वजह से हुए दुनिया भर में जिंदगी के पहियों और पंखों को जो लॉकडाउन लगा भविष्य में शायद ही कोई भुला पाएगा | कोरोना वायरस ने दुनिया भर के तमाम देशों के अस्तित्व और नागरिकों के जीवन में खलबली मचा रखी है | लोगों की जिंदगी अपने ही घरों में किसी कैदी जैसी हो गई जो घर से बाहर नहीं निकल सकते क्योंकि घरों के बाहर सरकारी नुमाइंदे बेतरतीब चालान काटने (आर्थिक दंड) और लठ देने को खड़े है | इन सबके के बावजूद समाज के जिस अंग पर इस वायरस का सबसे ज्यादा नकारात्मक प्रभाव पड़ा है वो है महिलाएं, जो है इस मनुष्य जाति की आधी आबादी |

अधिकांश लोगों ने कोरोनाकाल में अपना सारा वक्त घर पर खाली बैठ कर, वर्क फ्रॉम होम करके ही बिताया | पर यूएनओ के अनुसार अत्यधिक गरीबी से बच निकलने वाली बहुत सी महिलाओं के आर्थिक स्तर के पुन: गिरने का खतरा बढ़ गया है | महिलाओं की घर में भूमिका चार गुणा बढ़ गई | लॉकडाउन में महिलाएं बहुआयामी भूमिका में नजर आईं। घर में बच्चों और बुजुर्गों का ख्याल रखने, माँ, बहन, बेटी, बहु की जिम्मेदारियों के साथ-साथ ऑफिस कार्य, घरेलु कार्य (झाड़ू, पोछा, बर्तन, कपड़े, साफ-सफाई, 24 घंटे की केयर टेकर) का कार्यभार भी उन पर आ गया | फिर भी महिलाओं ने बिना किसी दुःख, तकलीफ, शिकायत के अपने सारे रूप और जिम्मेदारी भली प्रकार से निभाए | परन्तु इन सबसे महिलाओं के जीवन में बहुत सारे बड़े परिवर्तन आये जो इस रूप में देखे जा सकते है:-

असुरक्षित महिलाएं:- महामारी के प्रकोप विश्व के सभी देश झेल रहे है परन्तु इसका सबसे विपरीत प्रभाव महिलाओं की घरेलू स्थिति पर हुआ है महामारी की वजह से सभी पुरुष घरों में 24 घंटे रहने लगे जिससे उनके बीच मन मुटाव बढ़ गए और घरेलू हिंसा की वारदाते पुरे विश्व में काफी बढ़ी है | कोरोना के दौरान लगे लॉकडाउन से 243 मिलियन महिलाएं पिछले 12 महीनों में यौन या शारीरिक शोषण का शिकार हुई है | भारत, नाइजीरिया, दक्षिण अफ्रीका, पेरू, ब्राजील, मेक्सिको, रशिया जैसे देशों में रेप के केसेस बढ़े, गुमशुदा महिलाओं की संख्या में वृद्धि हुई है, महिलाओं की हत्या के आकड़ों में वृद्धि हुई साथ ही साथ यौन हिंसा की घटनाओं में अविश्वसनीय वृद्धि हुई | सितंबर माह में यूएनओ के द्वारा जारी रिपोर्ट में अनुसार लॉकडाउन के दौरान घरेलू हिंसा के मामलों में अर्जेंटीना में 25 प्रतिशत, साइप्रस और फ्रांस में 30 प्रतिशत और सिंगापुर में 33 प्रतिशत बढ़ोतरी दर्ज की गई है | भारत में भी 2015-16 में राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे में यह बात पता चली थी कि 15-49 आयु वर्ग की 33% विवाहित महिलाएं शारीरिक, यौन या भावनात्मक रूप से हिंसात्मक हिंसा का सामना किया जिसमें कोरोना के समय राष्ट्रीय महिला आयोग के अनुसार घरेलू हिंसा के मामलों की शिकायतों में 100% वृद्धि दर्ज की | आंकड़ों के मुताबिक लॉकडाउन के पहले ही हफ्ते में आयोग के सामने महिलाओं के साथ हिंसा के सैकड़ों मामले सामने आए हैं | उत्तर प्रदेश, दिल्ली, बिहार, हरियाणा, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र इसमें आगे हैं और ये केवल वो केसेस है जिसमें महिलाओं ने पत्र, ईमेल या संदेश के माध्यम से आयोग तक अपनी आप-बीती पहुंचाने का प्रयास किया | इसके अतिरिक्त ऐसे हजारों मामले है जो घरों से बाहर निकले ही नहीं | और सबसे बड़ी विडम्बना तो इस लॉकडाउन में घरेलू हिंसा से जूझ रही महिलाओं के साथ यह है की रही ये महिलाएं अब न तो आम दिनों की तरह अपने माता-पिता, भाई-बहन के पास जा सकती हैं और न ही किसी दोस्त, रिश्तेदार, सगे सम्बन्धी को मदद के लिए बुला सकती है |

READ MORE: ये कैसी विडंबना, महंगाई भी तिल-तिल मार रही !

महिलाओं के अवैतनिक कार्य में वृद्धि:- यूएन वुमन कि डिप्टी एक्ज़िक्यूटिव अनीता भाटिया बताती हैं, “हमने पिछले 25 वर्षों में जो भी काम किया है, वो एक साल में खो सकता है|” रोज़गार और शिक्षा के मौक़े ख़त्म सकते हैं. महिलाएं ख़राब मानसिक और शारीरिक स्वास्थ की शिकार हो सकती हैं | इस समय महिलाओं पर देखभाल का जो भार बढ़ गया है, उससे 1950 के समय की लैंगिक रूढ़ियों के फिर से क़ायम होने का ख़तरा पैदा हो गया है | कोरोना के कारण घर के कार्यों में अप्रत्याशित वृद्धि हो गई जैसे फल-सब्जियों को अच्छे से गर्म पानी से धोकर रखना, जितनी बार घर से बाहर निकलो उतनी ही बार कपड़े धोना, मास्क धोना, बार-बार टच की जाने वाली सतह की बार-बार सफाई करना आदि जिससे घर में रहने वाली महिलाओं के द्वारा किये जाने वाले अवैतनिक कार्यो की मात्रा दो गुणा हो गई परन्तु महिलाओं के द्वारा घर में किये जा रहे काम के लिए उन्हें न तो पैसे मिलते है और न ही घर के सदस्यों से इज़्ज़त | डॉ. निधि प्रजापति बताती है की “महिलाओं के द्वारा घर की देखभाल के रूप में किये गए काम की कभी सराहना नहीं होती, हमेशा से ही महिला की जिम्मेदारी कह कर उसके घर के दिए गए योगदान की अहमियत समाप्त कर दी जाती है और न ही उसके मेहनत का कोई आर्थिक लाभ उसे मिल पता है |”

जीवनयापन का संकट:- संयुक्त राष्ट्र संघ ने बताया कि वैश्विक स्तर पर 65 प्रतिशत महिलाएं अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़ी हुई हैं और अब उनके जीवन में आर्थिक अनिश्चितता का खतरा मंडरा रहा है | वर्ल्ड बैंक के अनुसार (2019) कृषि क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी का 25.69 प्रतिशत थी जो वर्तमान में बढ़ गई है | शोध के माध्यम से पाया कि कोरोना के चलते लगने वाले लॉक डाउन की वजह से काम काजी महिलाओं को पुरुषों की तुलना में अधिक नौकरियों खोने का नुकसान हुआ है | यहाँ तक की लॉकडाउन के बाद उनकी नौकरियों की रिकवरी रेट भी बहुत कम रही, उन्हें या तो नौकरी दुबारा मिली नहीं और अगर मिली भी तो उनकी तनख्वाह पहले से बहुत कम हो गई | लॉकडाउन से उन महिलाओं पर भी विपरीत प्रभाव पड़े जिनके पति काम के लिए दूसरे शहरों में जाते हैं | लॉकडाउन के कारण वे वापस नहीं लौटे, न ही काम छीन जाने के कारण पैसे भेज सके ऐसे में परिवार में बच्चों और बुजुर्गों की देख-रेख और खान-पान की जिम्मेदारी महिलाओं के कंधों पर आ गई | राशन लाना, खाना पकाना, समय पर खिलाना, साफ़ सफाई करना और इनके सबके साथ आजीविका का साधन तलाशना, खेतों में काम करना जैसे काम महिलाओं के जिम्मे आ गए  ताकि वे घर का लालन-पालन कर सके |

स्वास्थ्य, यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य तथा लैंगिक समानता पर विपरीत प्रभाव:- लम्बे समय से लगे लॉकडाउन ने महिलओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर विपरीत प्रभाव डाले है | मासिक धर्म स्वच्छता के स्तर में अविश्वसनीय गिरावट आई है क्योंकि महिलाओं और बालिकाओं को सेनेटरी नैपकिन तक उपलब्ध नहीं हो रहे | एक ओर स्कूल बंद होने के कारण लड़कियों को सरकार की तरफ से मिलने वाले निशुल्क सेनेटरी नैपकिन वितरण की व्यवस्था बंद होने से गरीब बालिकाओं के सामने स्वयं की स्वच्छता का संकट खड़ा हो गया है | दूसरी ओर महिलाओं और बच्चियों को इसलिए परेशानियों का सामना अधिक करना पड़ रहा है क्योंकि वे लॉकडाउन के कारण घर के बाहर जा नहीं सकती और लोक-लाज, सामाजिक बंधन, शर्म के कारण घर के पुरुषों से सेनेटरी नैपकिन जैसी अत्यंत महत्वपूर्ण वस्तु बाजार से मंगा नहीं सकती | ऐसे में वे जलन, खुजली, सर्विक्स कैंसर जैसी अनेक भयंकर समस्याओं और बिमारियों को निमंत्रण दे रही | यूएन के अनुसार महामारी के कारण महिलाओं के यौन एवं प्रजनन स्वास्थ्य तथा लैंगिक समानता की दिशा में पिछले 25 वर्षों में जो प्रगति हुई उस पर विपरीत प्रभाव पड़ा है | आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं की पूर्ति में बाधा उत्पन्न होने से महिलाओं और लड़कियों तक स्वास्थ्य सेवाएं नहीं पहुँच रही है | लगातार लॉक डाउन से मासिक धर्म प्रबंधन, प्रसव के पहले और बाद की देखभाल, परिवार नियोजन और गर्भनिरोधक आपूर्ति आदि संसाधनों से भी महिलाओं और सरकार का ध्यान हट गया है जिससे कई महिलाओं ने तो इस कोरोना में अपनी जान भी गवां दी है | प्रजनन स्वास्थ्य सेवाओं सहित आवश्यक स्वास्थ्य सेवाओं की लंबे समय से सीमित उपलब्धता महिलाओं के पुरे विश्व में हानिकारक साबित हो रही है |

READ MORE: सरकार बहादुर! सांस लेने में दिक्कत है तो क्या ‘गर्व’ से सीना फुलाकर काम चलाएं

तनाव में वृद्धि:- कोरोना की वजह से घर के सभी सदस्यों अपना सारा वक्त सरकार के द्वारा लगाये गए लॉक डाउन के कारण घर पर ही बिताया| जिसकी वजह से बहुत सारे लड़ाई-झगडे पुरानी-नई बातों के कारण घरों में शुरू हो गए | परिवार जन, बच्चों, बड़े-बुजुर्गों के स्वास्थ्य की चिंता हमेशा महिलाओं को रहने लगी | लगातार घर-ऑफिस के काम सामंजस्य बिठाने की कोशिश ने तनाव के स्तर को और बढ़ा दिया | महीनों तक लगे देशव्यापी लॉकडाउन से बच्चों को स्कूल से छुट्टी मिल गई है और कई नौकरीपेशा लोगों को दफ्तर नहीं जाने और घर से काम करने का मौका मिल गया है परन्तु  लाखों नौकरीपेशा महिलाओं की समस्याएं दोगुनी हो गई हैं | वर्क फ्रॉम होम की डबल जिम्मेदारी के अंतर्गत लंबे समय तक एक ही जगह बैठकर काम करने की वजह से महिलाओं को कंधे व पीठदर्द की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है जिसे वे नजरअंदाज करके अपने दूसरे कामों को निपटाती हैं| ऐसे में भविष्य का आर्थिक संकट, चिंता-अनिश्चितता, तनाव, अनिंद्रा, चिडचड़ापन, थकान, मानसिक अस्थिरता, कुण्ठा जैसी मनोवैज्ञानिक समस्याएं महिलाओं के स्वास्थ्य को बिगाड़ रही है |

रसोई में जकड़ी महिला:- कोरोना के कारण घर के सारे सदस्य घरों में बंद हो गए साथ ही होटल रेस्टोरेंट भी बंद जिससे महिलाओं पर किचन का अतिरिक्त भार बढ़ गया घर में बच्चे, बुजुर्ग, जवान, पति आदि की समय समय पर आने वाली अलग अलग खाने, स्नैक्स, चाय, कॉफ़ी, शरबत की फरमाइशों ने महिलाओं को रसोई के दरवाजों में सीमित करके रख दिया | संक्रमण के डर से लोग अब बाहर के खाने के बजाये घर पर ही स्वादिष्ट नए नए व्यंजन बनाने की मांग करने लगे जिसके कारण महिलाओं का सारा समय खाना बनाने की तैयारी में रसोई में ही निकल जाता |

महिलाओं की स्वतंत्रता में कमी:- कोरोना के चलते कामवालियों और ऐसे दूसरे हेल्परों की गैर-मौजूदगी ने महिलाओं की मुसीबतें कई गुनी बढ़ा दी हैं क्योंकि अब उन्हें ही सारा काम करना था | लॉकडाउन हुआ तो सभी ऑफिस, स्कूल, कॉलेज, पार्लर, फक्ट्रियाँ आदि बंद हो गई जिससे महिलाओं की आर्थिक आजादी के साथ साथ सामाजिक आजादी भी ख़तम हो गई | घर में रहते हुए अब उनकी व्यक्तिगत आजादी पूरी तरह से समाप्त हो गई थी घर में उनके पास अपने दोस्तों, रिश्तेदारों और माता-पिता से बात करने का समय भी अतिरिक्त कार्यभार के चलते छीन गया | हर वक्त इस बात का ख्याल रखना, अलर्ट रहना कि पति, बच्चे या घर के बुजुर्गों को किसी चीज की जरूरत तो नहीं ताकि उन्हें किसी तरह की कोई तकलीफ न हो, कोरोना से सुरक्षा से सम्बन्धी सभी साधन उनके पास है या नहीं आदि में ही महिलाओं की जिंदगी उलझ कर रह गई| घर, बढे-बुजुर्ग, बच्चों व परिवार के अन्य सदस्यों का ख्याल रखते-रखते हुए उनका समय कब खत्म हो जाता है, उन्हें खुद पता नहीं चलता| ऑफिस और घर दोनों को अच्छे से संतुलित करने के लिए  महिलाएं देर तक जागकर काम कर रही हैं| ऐसे में पूरी नींद न होने के कारण इसका सीधा असर उनके स्वास्थ्य पर साफ दिखाई पड़ रहा है| महिलाएं खुद के लिए समय निकलना ही भूल गई |

READ MORE: मुद्दा: आखिर क्यों काल के गाल में समा रहे हैं पत्रकार, सिर्फ अप्रैल महीने में 77 की मौत

माताओं की ऑनलाइन क्लास:- इस कोरोना काल में बच्चों की ऑनलाइन क्लासेस शुरू हो गई जिसमें स्कूल कॉलेज के द्वारा बच्चों पर क्लास में उपस्थित होने का दबाव बनाया गया ऐसे में घर की महिलाओं और माताओं के हिस्से में एक काम और बढ़ गया क्योंकि जो बच्चे छोटे थे उनके साथ घर के सारे काम सुबह जल्दी निपटाने के बाद उन्हें भी पूरे समय बैठे रहना पड़ता था ताकि बच्चे अपनी पढ़ाई से ध्यान न हटाए| ऑनलाइन क्लासेस में जो प्रोजेक्ट दिए गए उनको पूरा करने, जो निर्देश दिए जा रहे है उन्हें समझना जैसी गतिविधियों ने महिलाओं को पुनः स्कूल में भर्ती करा दिया |

संक्षिप्त रूप में देखा जाये तो कोरोना के कारण महिलाओं की जिंदगी पूरी तरह से बदल गई है | उनके व्यक्तिगत, सामाजिक, आर्थिक, शारीरिक, मानसिक और मनोवैज्ञानिक जीवन के पहलुओं पर कोरोना ने विपरीत प्रभाव डाला है जिससे उभरने में उन्हें कई साल तक लग सकते है |

डॉ. निधि प्रजापति
अध्यक्ष : सोसाइटी हैस ईव इंटरनेशनल चैरिटेबल ट्रस्ट

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!