विचारः अब हुआ बंगाल में प्रजातंत्र का सूर्योदय


वन्दे मातरम्, जन-गण-मन, जय हिन्द के उद् घोष की पवित्र भूमि बंगाल में ईमानदारी से प्रजातंत्र का सूर्योदय 4 मई, 2026 को हुआ। आजादी के बावजूद जनता को अब तक आजादी का अहसास नहीं होने दिया।

आम नागरिक राजनैतिक गुण्डागिर्दी और आतंक के साये में जी रहा था। स्वेच्छानुसार मतदान संभव नहीं था।  भय के माहौल में होने वाले मतदान से जनप्रतिनिधियों का स्तर बहुत गिर गया । जिस सिस्टम से वह जीत कर आया है उस सिस्टम में गरीब के दुख – दर्द एवं विकास की चिंता करने की उसे जरूरत नहीं थी । पुलिस, प्रशासन एवं राजनैतिक दादा लोग संगठित हो गये । आम जनता के लिए न्याय के दरवाजे बंद हो गये । प्रजातंत्र एवं संवैधानिक मर्यादाओं की खुलेआम धज्जियां उड़ा दी गई।  आजादी के आंदोलन में बंगाल की अग्रणी भूमिका रही। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ होने वाले हर आंदोलन में बंगाल के नागरिकों ने  पूरे जोश- खरोश के साथ भाग लिया। 1950 में आर्थिक विकास की दृष्टि से बंगाल देश में दूसरा स्थान रखता था, दुर्भाग्य से आज 22 वें स्थान पर है। भय के वातावरण में उद्योग धंधे बंद होते गए। अधिकांश उद्योगपतियों ने बंगाल ही छोड़ दिया। बेरोजगारी व गरीबी का आलम यह है की लाखों बंगाली अपना घरबार छोड़कर रोजगार के लिए आज दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, राजस्थान में रहने के लिए मजबूर है। 26 वर्ष कांग्रेस, 34 साल वामपंथी एवं 15 वर्ष ममता के कालखंड में बंगाल कंगाल हो गया ।

75 वर्ष की लंबी अवधि तक मुसलमानों के प्रति अति सौहार्द एवं सहानुभूति रखने वाली सरकारों के कारण बंगाल में हिंदू द्वितीय श्रेणी का  नागरिक बन गया  । अपने ही देश में हिंदू कमजोर हो गया । “जय श्री राम” का नारा लगाना अपराध हो गया । चारों ओर “अल्लाह-हो-अकबर” की आवाज़ गूंजने लग गयी । बांग्लादेशी घुसपैठियें  सम्मानित नागरिक एवं मतदाता बन गये । मुख्यत: 1977 से  वामपंथी एवं  ममता राज में गुंडागिर्दी से उत्पन्न भय के माहौल में मतदाता अपने मनपसंद प्रत्याशी को वोट देना ही भूल गये। कुछ जागरूक राजनैतिक एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं की पिछले 10 वर्षों की तपस्या से परिस्थितियों एवं वातावरण में परिवर्तन हुआ।हिंदुओं को  समझ में आ गया कि हमें भी संगठित होना होगा । मुसलमानों की भांति एक स्वर से मतदान करना होगा ।

ध्यान रहे कि आजाद भारत के पहले आम चुनाव (1952) में भारतीय जनसंघ को  लोकसभा की कुल तीन सीटों पर विजय प्राप्त हुई थी, उनमें से दो सीटें बंगाल से थी ।  जनसंघ के संस्थापक डॉ० श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंगाल से ही थे । अर्थात् मेरे कहने का मंतव्य यह है कि बंगाल की भूमि हमेशा राष्ट्र भाव से औतप्रोत रही है । धन्य हो चुनाव आयोग का जिसने SIR के माध्यम से मतदाता सूचियों को ठीक करने का संवैधानिक कार्य अनेक तरह की राजनैतिक चुनोतियों के मध्य पूर्ण किया । तत्पश्चात् चुनाव के समय 2.50 लाख केंद्रीय सुरक्षा बल के जवानों की तैनाती करके बंगाल में भरोसे का वातावरण बनाया। परिणामस्वरुप देश के इतिहास में पहली बार 93% मतदान हुआ । प्रजातंत्र का आधार ही निष्पक्ष मतदान है इसलिए  चुनाव आयोग की इस प्रकार की सक्रियता देश के हर चुनाव में आवश्यक है ।

प्रदेश के चुनाव परिणामों का प्रभाव देखिये कि मात्र 20 दिन पश्चात् फाल्टा विधानसभा में हुए मतदान के वोटिंग  पेटर्न  में क्रांतिकारी परिवर्तन नजर आया ।  लगभग सभी हिन्दू वोट भा.ज.पा. को और मुस्लिम वोट वामपंथियों, कांग्रेस और टी.एम.सी. में बंट गये  ।  उसमे भी टी.एम.सी को सबसे कम मत मिले और उसके प्रत्याशी की जमानत जब्त हो गयी । बंगाल चुनाव परिणामों से देश की राजनीतिक दिशा बदलेगी । वर्तमान विपक्ष को हिन्दूओं के प्रति मोह पैदा करना होगा ।

कुर्सी के लालच में फिर किसी प्रदेश में प्रजातंत्र की ऐसी दुर्गति को रोकने के लिए चुनाव आयोग के साथ-साथ स्थानीय प्रशासन एवं पुलिस को संवैधानिक मर्यादाओं में बांधना होगा। राजनैतिक कार्यकर्ताओं एवं पुलिस के मध्य अनैतिक गठबंधन को समाप्त करने के लिए कठोर प्रशासनिक व्यवस्था करनी होगी।  मेरा सुझाव है कि भारतीय प्रशासनिक एवं पुलिस सेवा के अधिकारियों को किसी एक प्रदेश में 10 वर्ष तक ही सेवा में रखना चाहिये। संबंधित प्रदेश के प्रशासनिक एवं पुलिस अधिकारियों को किसी एक डिवीजन में 10 वर्ष तक ही रखा जाना चाहिये। लगातार एक ही स्थान पर रहने से ही इस प्रकार के गठबंधन बन जाते हैं।  नि:संदेह इससे भ्रष्टाचार पर भी लगाम लगेगी । ऐसे अनैतिक गठबन्धन को रोकने की चर्चा जब आगे बढ़ेगी तो अनेक सुझाव एवं विचार सामने आयेंगे।

1947 का भारत और 2026 के भारत में जमीन और आसमान का अन्तर है। इस प्रगति एवं परिवर्तन का आधार प्रजातंत्र ही है । यह प्रजातंत्र बातों से नहीं मिला है, लाखों भारतीयों के बलिदान का पुरस्कार है । ऐसे अमूल्य प्रजातंत्र को सभी राज्यों में जीवन्त बनाए रखने की जिम्मेदारी हम सभी मतदाताओं की भी है ।

कैलाश सोडाणी

कैलाश सोडाणी

प्रो. कैलाश सोडाणी, पूर्व कुलपति, वर्धमान महावीर खुला विश्वविद्यालय, कोटा

( यह लेखक के अपने विचार हैं।) 

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