KotaCoaching: कोरोना के कहर से कराह रही शिक्षा नगरी, एक लाख लोगों की छिनी रोजी रोटी
5 हजार करोड़ की नेट वर्थ वाला कोचिंग कारोबार हुआ धराशायी

- राजस्थान सरकार के पास नहीं है कोई रिवाइवल प्लान, कर्ज में डूबे में हॉस्टल और मैस कारोबारी
- जयपुर में कोचिंग हब और यूपी में कोचिंग इंडस्ट्री के प्रमोशन की वजह से दुगनी हुई मुश्किलें
TISMedia@KOTA. कोरोना, कोटा पर कहर बनकर टूटा है। भावी इंजीनियर्स और डॉक्टर्स की भीड़ से अटी पड़ी रहने वाली कोटा की गलियां अब बेजार हैं। डेढ़ साल में एक लाख से ज्यादा लोगों का रोजगार छिन चुका है। आलम यह है कि हॉस्टल और मैस से जुड़े कारोबारी कर्ज के बोझ तले दबे हैं। राजस्थान की शान कहे जाने वाले इस शहर को न सिर्फ देश ने बल्कि खुद राजस्थान की सरकार तक ने भुला दिया। कोचिंग इंडस्ट्रीज के रिवाइवल प्लान की बात तो छोड़िए सरकारें कोटा की कमर तोड़ने के लिए जयपुर जैसे शहरों में नया कोचिंग हब डवलप करने में जुटी हैं। वहीं उत्तर प्रदेश की सरकार तो कोटा को नेस्तेनाबूत करने का ख्वाब ही पाले बैठी है, लेकिन शायद यह ख्वाब ख्वाब ही रहे, क्योंकि कोटा की मिट्टी में सफलता की जो भूख है वह देश के किसी दूसरे शहर में देखने तक को नहीं मिलती।
आईआईटियंस और डॉक्टर्स की खान कहा जाने वाला कोटा कोरोना के कहर से पहले जमकर फल-फूल रहा था। तरक्की ऐसी कि किसी भी शहर ही नहीं राज्य को भी इससे रस्क हो जाए। सालाना नेटवर्थ 5 हजार करोड़ के भी पार थी, लेकिन कोरोना ने शैक्षणिक नगरी कोटा की ऐसी कमर तोड़ी कि डिजिटल क्लासेज जैसे प्रयोगों के बाद भी कोटा कोचिंग इंडस्ट्रीज 400 करोड़ करोड़ के आसपास सिमट कर रह गई है।
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चौतरफा मार से कराह उठा कोटा
कोटा को कोरोना के कहर से ही नहीं जूझना पड़ा, बल्कि सरकारों के रवैये और बेदम हो चुकी शिक्षा नीति के साथ-साथ लगातार बदल रहे एग्जाम पैर्टन का भी खामियाजा भुगतना पड़ा। केंद्र में बैठी भाजपा सरकार ने इंजीनियरिंग और मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं के लिए नेशनल टेस्टिंग एजेंसी के नाम पर जो प्रयोग किया वह न सिर्फ कोटा बल्कि देश भर के शैक्षणिक शहरों, संस्थानों और विद्यार्थियों को नागवार गुजरा। एक ही परीक्षा के लिए साल में चार-चार बार होने वाले कॉम्प्टीशन ने न सिर्फ उन परीक्षाओं की गरिमा को नेस्तेनाबूत कर दिया, बल्कि नियमित और प्रवेश परीक्षाओं के लिए होने वाली पढ़ाई तक चौपट कर डाली। वहीं राजस्थान में कांग्रेस की सरकार आते ही कोटा के शैक्षणिक हब को खत्म करने के मंसूबे बनने लगे। नतीजन, एमएनआईटी को कोटा शिफ्ट करने के बजाय कोटा के कोचिंग हब की चूलें हिलाने के लिए गहलोत सरकार ने राजधानी जयपुर में सस्ती जमीनों और तमाम सुविधाओं का लालच देकर नया कोचिंग सेंटर डवलप करने की लंबी चौड़ी योजना बना डाली। वहीं यूपी जैसे राज्यों की सरकारों ने तो अपने राज्यों के बच्चों को कोटा भेजने से रोकने के लिए मुफ्त कोचिंगों तक का लालच देना शुरू कर दिया। हालांकि इन सरकारी कवायदों के नतीजे अभी तक सिफर ही रहे हैं, लेकिन कोटा को इसका दूरगामी खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।
नहीं मिला रिवाइवल पैकेज
चाहे सरकार केंद्र की हो या फिर राजस्थान की सभी ने कोरोना काल में हुए घाटे की भरपाई को लिए औद्योगिक और व्यवसायिक क्षेत्र पर रिवाइवल पैकेज की खूब बौछार की, लेकिन एजुकेशन सेक्टर और उसमें भी खास तौर पर कोटा कोचिंग सेक्टर को किसी भी सरकार ने अपने एजेंडे में शामिल नहीं किया। नतीजन, अचानक खत्म हुए दाखिलों की मार के बाद कोचिंग संस्थानों से लेकर हॉस्टल और मैस तक के सालों पुराने कर्मचारियों को वेतन देने के लाले पड़ गए। फिलवक्त, हालात इस कदर खराब हैं कि कोटा के कोचिंग सेक्टर में काम करने वाले एक लाख से ज्यादा लोग शहर छोड़कर जा चुके हैं। बाकी बचे कोटा के बाशिंदों को रोजी-रोटी चलाने के लिए बीते दिनों सब्जी बेचने से लेकर फेरी लगाते हुए कई मर्तबा देखा गया। ऐसे में कोटा कोचिंग को रिवाइवल पैकेज मिलता तो देश भर से रोजी रोटी की तलाश में कोटा आए एक लाख से ज्यादा लोगों को शहर छोड़कर न जाना पड़ता।
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कोचिंग खुले तो बात बने
कोरोना की पहली लहर के दौरान करीब 90 फीसदी विद्यार्थी कोटा छोड़कर चले गए। जिन्हें सुरक्षित उनके घरों तक पहुंचाने के लिए कोटा के कोचिंग संस्थानों ने अपनी जान झोंक दी थी। कोरोना की फर्स्ट वेब खत्म होने के बाद कोटा के कोचिंग संस्थानों को बच्चों के वापस आने की उम्मीद जगी। यह सफल भी हुई, लेकिन करीब 50 हजार बच्चे वापस लौटे ही थे कि कोरोना की दूसरी जानलेवा लहर ने फिर से उठ खड़े होने की तैयारी में जुटे कोटा की कमर तोड़ दी। कोचिंग संस्थानों ने करोड़ों रुपए खर्च कर बच्चों की सुरक्षा के लिए कोविड गाइड लाइन के मुताबिक क्लास रूम से लेकर कैंटीन और हॉस्टल तक में अत्याधुनिक सुरक्षा इंतजाम किए थे, लेकिन दो महीने के भीतर ही एक बार फिर सबकुछ धराशाई हो गया। जानलेवा साबित हुई कोरोना की दूसरी लहर ने आईआईटी और मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करने आए बच्चों को अपने घर लौटने के लिए मजबूर कर दिया।
कब खुलेंगी कोचिंग तय नहीं
चार दशक पहले देश की प्रमुख औद्योगिक नगरी सुमार कोटा के कारोबार को झटका लगा तो सिर्फ कोचिंग संस्थानों ने अपने अकेले दम पर न सिर्फ शहर को उजड़ने से बल्कि हजारों जिंदगियां खत्म होने भी बचाईं। इतना ही नहीं देश भर से रोजगार की तलाश में आए लोगों को फिर से काम दिया। लेकिन, जब कोटा का कोचिंग कारोबार कोरोना के कहर से दो चार हुआ तो उसे सहारा देने के लिए कोई खड़ा नहीं हुआ। ढ़ाई लाख बच्चों से दिन रात गुलजार रहने वाले कोचिंग सेंटर, हॉस्टल और बाजार उनके जाते ही ऐसे वीरान हुए कि इस कारोबार से जुड़े लोगों की बात तो छोड़िए कोटा के आम शहरी को भी रोजी रोटी चलाने के लिए कड़े संघर्ष का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में हर तरफ और हर कोई एक ही उम्मीद लगाए बैठा है कि कोचिंग खुलें तो उनकी जिंदगी में पसरा मुसीबतों का साया खत्म हो। क्योंकि कोटा शहर की 70 फीसदी आर्थिक व्यवस्था इन्हीं कोचिंग संस्थानों में पढ़ने के लिए आने वाले छात्रों पर निर्भर है।
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कोई आवाज क्यों नहीं उठाता
कोटा हॉस्टल एसोसिएशन के संस्थापक अध्यक्ष मनीष जैन कहते हैं कि केंद्र से लेकर राज्यों की सरकारें तमाम उद्योग धंधों की कोरोना से उबरने के लिए आर्थिक मदद कर रही हैं, लेकिन कोटा की कोचिंग इंडस्ट्रीज किसी के भी एजेंडे में नहीं है। जबकि देश का शायद की कोई ब्यूरोक्रेट या पॉलिटीशियन हो जिसने किसी न किसी बच्चे का यहां दाखिला न कराया हो। कोरोना का असर कोटा के बाशिदों जिनमें खासतौर पर कोचिंग कारोबार से जुड़े लोगों चाहे वह कोचिंग संचालक हों, शिक्षक-कर्मचारी हों या फिर हॉस्टल-पीजी और मैस ही चलाने वाले लोग क्यों न हों हर किसी पर बहुत बुरा पड़ा है। ऐसे में जब पूरा शहर बर्बादी की कगार पर खड़ा हो फिर भी कोई उसे बचाने की कोशिश क्यों नहीं कर रहा यह समझ से परे है। उन्होंने कहा कि कोटा की कोचिंग इंडस्ट्रीज को कोटा के लोग बचाने के लिए खासी जद्दोजहद कर रहे हैं, लेकिन जब तक सरकारें, अफसर और नेता-मंत्री हाथ नहीं बढ़ाएंगे तब तक यह कोशिशें पूरी नहीं हो सकेंगी। कोई कुछ न कर सके तो कम से कम इतना तो कर ही दे कि सभी सुरक्षा मानकों की पालना के आधार पर कोचिंग संस्थान खुलवाने की कोशिश करे। ऐसे में जब मॉल, होटल और रेस्टोरेंट तक खोल दिए गए हों तब कोचिंग संस्थान न खोलना कोटा के साथ न सिर्फ धोखा है, बल्कि उसे खत्म करने की साजिश भी है।